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रविवार, 24 मार्च 2013

राजनीति- चोर-चोर मौसेरे भाई..!


अब तक तो सिर्फ सुना ही था कि चोर- चोर मौसेरे भाई होते हैं...लेकिन उत्तराखंड में इसकी बानगी भी खूब देखने को मिल रही है। मीडिया मे भले ही कांग्रेसी और भाजपाई एक दूसरे को आरोपों की बौछार कर खूब गरियाते देते फिरते दिखाई देते हों लेकिन पर्दे की पीछे की सच्चाई कुछ और ही है..!  भाजपा सरकार के कार्यकाल के घोटालों की जांच के लिए गठित भाटी जांच आयोग की टीडीसी घोटाले में रिपोर्ट सरकार को सौंपने के बाद भाजपा के खिलाफ बहुगुणा सरकार के नरम रवैये को देखते हुए तो कम से कम ऐसा ही लग रहा है..! (जरूर पढ़ें- विजय बहुगुणा कैसे बने मुख्यमंत्री..?)
दरअसल भाटी जांच आयोग की रिपोर्ट में दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की बजाए बहुगुणा सरकार दोषियों को बचाते हुए मामले की लीपापोती करने में लगी है..! सरकार ने जांच आयोग की रिपोर्ट में उजागर नेताओं और अफसरों को अलग – अलग वर्ग में बांट दिया है। सरकार ने जहां एक ही अपराध में शामिल नेताओं के खिलाफ आयोग की रिपोर्ट को तहरीर में बदलकर अज्ञात के नाम से थाने में मुकदमा दर्ज कराया है तो वहीं रिपोर्ट में दोषी ठहराए गए अफसरों पर कार्रवाई की बजाए उसका परीक्षण कराने का फैसला लिया है। यानि की तहरीर के आधे हिस्से का परीक्षण सरकार करेगी और बाकी की विवेचना पुलिस करेगी जबकि कानून के जानकारों की नजरों में ये गलत है।
सत्ता में आने के बाद कांग्रेस ने भाजपा शासन में घोटालों की बाढ़ आने का आरोप लगाते हुए भाजपा शासन के सभी घोटालों को बेनकाब कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का दम भरा था। घोटालों की जांच के लिए बकायदा बहुगुणा सरकार ने भाटी जांच आयोग का गठन भी किया था। इसके तहत भाटी जांच आयोग ने टीडीसी घोटाले पर हाल ही में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी जिसके बाद दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने का दम भरने वाले बहुगुणा सरकार के तेवर ही बदल गए और अब सरकार दोषियों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट कराने से भी पीछे हट रही है..! जबकि भाटी आयोग ने जब सरकार को जांच रिपोर्ट सौंपी थी तो मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने साफ कहा था कि रिपोर्ट में भाजपा के एक पूर्व मुख्यमंत्री और जिन लोगों को दोषी ठहराया गया है उनके खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज करायी जाएगी लेकिन अब अचानक बहुगुणा साहब को लगता है कि नामजद रिपोर्ट कराना जरूरी नहीं है। बहुगुणा अब कह रहे हैं कि नामजद रिपोर्ट दर्ज कराना अवश्यक नहीं था। (जरूर पढ़ें- शराब के लिए पैसे हैं...रसोई गैस के लिए नहीं..!)
आखिर बीते कुछ दिनों में ऐसा क्या हुआ कि भाजपाईयों के खिलाफ आक्रमक तेवर दिखाने वाले कांग्रेसी मुख्यमंत्री के तवर एकदम से नरम पड़ गए..? (जरूर पढ़ें- विजय बहुगुणा- कैसा गैरसैंणकैसा स्वाभिमान..? )
क्या भाजपा और कांग्रेस में पर्दे की पीछे कोई बड़ी डील हुई या फिर बहुगुणा साहब ये समझ गए कि सत्ता से बेदखल होने के बाद भविष्य में कभी उनकी बारी भी आ सकती है लिहाजा ज्यादा तेवर दिखाए तो कल कहीं उनके ये तेवर उन पर ही भारी न पड़ जाएं..!
जाहिर है अगर ऐसा कुछ नहीं हुआ तो फिर दर्ज रिपोर्ट नामजद होनी चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जनता के सामने तो विपक्षी दलों को चोर और भ्रष्टाचारी बताने वाले राजनीतिक दल खुद को जनता का हितैषी साबित करने की पूरी कोशिश करते हैं लेकिन जब भ्रष्टाचार और घोटालों की जांच के लिए गठित भाटी जांच आयोग जैसे किसी आयोग की रिपोर्ट आती है तो उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है..! (जरूर पढ़ें- 50 लाख का जनता दरबार..!)
कहा भी जाता है कि राजनीति में न तो कोई स्थाई दोस्त होता है और न ही स्थाई दुश्मन। क्या पता कब..? कहां किसका वक्त बदल जाए..? किसकी जरूरत कब..? कहां आन पड़े..? इसलिए वक्त के साथ अपने तेवर बदलते चलो क्या पता कल कहीं अपने ही पाप का घड़ा फूट जाए..! तब कौन काम आएगा..? कहीं बहुगुणा साहब भी तो यही नहीं कर रहे..? लगे रहो बहुगुणा साहब...लगे रहो अभी तो सिर्फ टीडीसी घोटाले की जांच रिपोर्ट आई है अभी तो 5 और घोटालों की जांच रिपोर्ट आनी हैं तब भी तो आपको अपने भविष्य की चिंता करते हुए भ्रष्टाचारियों और घोटालेबाजों का वर्तमान सुरक्षित करना है फिर चाहे वो विपक्षी पार्टी के ही क्यों न हों...आखिर सवाल आपके भविष्य से भी तो जुड़ा हुआ है..!
  
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