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मंगलवार, 2 जुलाई 2013

आपके घर पर कोई अतिक्रमण कर ले तो..?


आपके घर पर अगर कोई अतिक्रमण कर ले तो कैसे लगेगा..? आपकी कार पार्किंग की जगह कोई और अपनी गाड़ी पार्क कर ले तो कैसा लगेगा..?
जाहिर है बहुत गुस्सा आएगा लेकिन ऐसे में आप क्या करेंगे..? प्यार से समझाने के बाद भी जब अतिक्रमणकारी नहीं मानेगा तो फिर आप क्या करेंगे..?
कुछ समझ आया कि केदारनाथ में ऐसा क्यों हुआ..?
समझ आया कि क्यों भागीरथी, मंदाकिनी, अलकनंदा, पिंडर और दूसरी नदियां क्यों अपने साथ सब कुछ बहा कर ले गई..!
जिस तरह आपके घर में कोई जबरन घुसकर कब्जा कर ले और बाहर जाने का नाम न ले ठीक उसी तरह पहाड़ों में नदियों में स्वार्थी, लालची लोगों ने कब्जा करने की कोशिश की..! पहाड़ों का सीना छलनी कर दिया तो नदियों की धारा को रोकने का प्रयास किया..! नतीजा सबके सामने है। जिस तरह हम अपने घर में किसी के अतिक्रमण को बर्दाश्त नहीं कर सकते ठीक उसी तरह नदियों और पहाड़ों ने भी ऐसा ही किया..!
और तो और हिमालय की गोद में बसे भगवान शिव के पावन धाम केदारनाथ को भी नहीं छोड़ा। मंदाकिनी के किनारों पर खड़े कर दिए दो-तीन मंजिले होटल, धर्मशाला और लॉज...सजा ली प्रसाद की थाली और फूलों की दुकान। किसलिए..? सिर्फ अपने निजि स्वार्थ के लिए..! पैसा कमाने के लिए..! तो क्यों न होती तबाही..? केदार बाबा क्यों अपने धाम में अतिक्रमण बर्दाश्त करते..? क्यों केदारनाथ की शांति भंग करने वालों को सबक नहीं सिखाते..?
जिम्मेदार लोगों (शसन-प्रशासन) ने अपनी जिम्मेदारी ठीक ढंग से निभाई होती तो शायद हालात इतने बुरे नहीं होते लेकिन जिम्मेदार लोगों की जेबें गरम हो रही थी तो उन्होंने आंख मूंद कर गहरी नींद में सो जाना ही बेहतर समझा। जिम्मेदार लोग सो रहे थे और पहाड़ों का सीना छलनी हो रहा था...नदियों की धारा को जंजीरों में बांधा जा रहा था। पहाड़ खोखले हो चुके थे, हरियाली मुरझा चुकी थी और नदियां नालों में बदल चुकी थी तो फिर आप ही बताओ कि क्यों न होता विनाश..? क्यों न गिरते पहाड़..? क्यों न रौद्र रुप धारण करती भागीरथी, अलकनंदा, मंदाकिनी, पिंडर और दूसरी नदियां..?
अब रोते रहो कुदरत के कहर का राग अलापते हुए कुदरत ने तो अपना हिसाब बराबर कर लिया..!

deepaktiwari555@gmail.com