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गुरुवार, 25 सितंबर 2014

महाराष्ट्र - दोस्त, दोस्त न रहा

दुश्मन का दुश्मन, दोस्त की कहावत को आपने सुनी ही होगी, महाराष्ट्र में 25 साल से भाजपा और शिवसेना तो 15 साल से कांग्रेस और एनसीपी गठबंधन इस कहावत को चरितार्थ कर भी रहे थे। लेकिन महाराष्ट्र के आगामी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा-शिवसेना और कांग्रेस-एनसीपी के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर चली आ रही तकरार एक ही दिन में एक ही घंटे के अंतराल में नतीजे तक पहुंच गई। नतीजा भी ऐसा कि 25 सालों से चली आ रही भाजपा-शिवसेना की राहें जुदा हो गईं तो 15 सालों का कांग्रेस और एनसीपी का साथ भी छूट गया। महाराष्ट्र की राजनीति में अच्छा खासा दखल रखने वाली चारों पार्टियों का अब कोई दोस्त नहीं है। सामने हैं तो सिर्फ चंद घंटे पहले साथ रहने वाले दोस्त से बने राजनीतिक दुश्मन, जिन्हें मात देकर ही वे महाराष्ट्र की सियासत का सरताज बन सकते हैं। आगामी विधानसभा चुनाव में महाराष्ट्र की सत्ता को अकेले दम पर हासिल करने का अति विश्वास शायद भाजपा, शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस चारों को ही है। शायद इसलिए ही चारों ने सियासी दोस्ती से बढ़कर सीटों को अहमियत दी और मनमाफिक सीट न मिलने पर एकला चलो की नीति अपनाने में जरा भी देर नहीं की।
चारों ही दलों को अपने सहयोगी से ज्यादा खुद पर भरोसा है, कि वे ज्यादा सीटों पर चुनाव जीत सकते हैं, शायद इसलिए ही वे ज्यादा से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ना चाहते थे। लेकिन सवाल ये उठता है कि जो महाराष्ट्र की राजनीति में अब तक नहीं हुआ क्या अब संभव हो पाएगा..?
क्या जो पार्टी, चाहे वो भाजपा हो, शिवसना हो, कांग्रेस हो या फिर एनसीपी अपने कोटे की सीटों में से भी आधिकतर सीटों पर जीत हासिल न कर पाई हों, वह सभी सीटों पर चुनाव लड़ते हुए अकेले दम पर सरकार बनाने की स्थिति में आ सकती हैं…? (पढ़ें- चरम पर तकरार लेकिन सपना महाराष्ट्र में सरकार !)
क्या जो जनता पहले गठबंधन के नाम पर सहयोगी पार्टी को वोट देने में पीछे नहीं हटती थी, वो एकला चलो की राह पर निकली इन पार्टी के उम्मीदवारों पर इतना भरोसा कर पाएंगी कि वे विधानसभा पहुंच जाएं..?
क्या गठबंधन के नाम पर एकजुट होने वाला वोटबैंक, एकला चलने पर सिर्फ एक ही तरफ झुकेगा, जैसे होता आया है या फिर नहीं..?
जीत के भरोसे पर याराना खत्म करना शायद आसान काम है, लेकिन उस भरोसे का भरोसा जनता को दिलाना और अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में आना इतना आसान काम नहीं है, लेकिन चारों ही प्रमुख दलों को लगता है कि वे जनता का भरोसा जीतने में कामयाब हो जाएंगे।
अकेले सभी 288 सीटों पर चुनाव लड़ते हुए भले ही ज्यादा सीटें जीतने की उम्मीदें पाल बैठे हैं, लेकिन चारों ही पार्टियां ये भूल रही हैं कि उऩ्होंने अपनी जीत की राह में एक और बीज को खुद ही बोया है, जो उनका महाराष्ट्र की सत्ता में काबिज होने के ख्वाब को चकनाचूर कर सकता है, जिसकी बहुत ज्यादा संभावना भी साफ दिखाई दे रही है।
बहरहाल महाराष्ट्र की राजनीति क्या करवट लेगी ये तो 19 अक्टूबर को महाराष्ट्र के चुनावी नतीजे आने के साथ ही साफ हो जाएगा लेकिन इस सब के आधार पर इतना अनुमान लगाना कठिन तो नहीं है, कि अगर महाराष्ट्र की जनता ने भावनाओं में बहकर अपने मताधिकार का प्रयोग किया तो उन्हें बहुत जल्द एक और चुनाव उनके स्वागत में तैयार बैठा मिलेगा, जिसके खर्च का बोझ भी जनता की ही जेब से निकलेगा। फिलहाल तो हम सभी दलों को शुभकामनाएं दे सकते हैं और महाराष्ट्र की जनता से ये उम्मीद कर सकते हैं कि वे बेहतर प्रत्याशियों को चुनेंगे और महाराष्ट्र में एक स्थिर सरकार के लिए वोट करेंगे।


deepaktiwari555@gmail.com

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