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शनिवार, 18 जुलाई 2015

क्यों मनमोहन सिंह बनने लगे हैं मोदी ?

हमारे देश के अब तक के प्रधानमंत्रियों में मौनी बाबा नाम का पेटेंट तो मनमोहन सिंह के पास ही था लेकिन कुछ मामलों में अब मनमोहन सिंह के पेटेंट पर खतरा मंडराने लगा है। इस अनचाहे पेटेंट से तो मनमोहन सिंह क्या कोई भी बचना चाहेगा, ऐसे में इस पेटेंट को चुनौती मिलती देख खुश तो मनमोहन सिंह भी बहुत होंगे। आखिर कोई तो मिला जो इस मामले में उनकी बराबरी पर खड़ा दिखाई देने लगा है।
बात मनमोहन सिंह के बाद देश की पीएम कि कुर्सी पर विराजमान नरेन्द्र दामोदर दास मोदी की हो रही है। एक साल में मोदी सरकार ने जनता से किए कितने वादे पूरे किए ये तो बाद की बात है। सवाल अब कुछ मामलों में मोदी की रहस्यमयी चुप्पी पर उठने लगे हैं। ऐसे नहीं है कि दहाड़ मारने वाले नरेन्द्र मोदी अब मनमोहन सिंह हो गए हैं। लेकिन जब सवाल उनके मंत्रिमंडल सहयोगी, पार्टी के विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री या पार्टी नेताओं पर उठते हैं तो उन पर पीएम मोदी की चुप्पी खलती है।
बात ललित मोदी से रिश्तों को लेकर घिरी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की हो, फर्जी डिग्री विवाद में घिरी मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी की हो, ललित मोदी से ही रिश्तों को लेकर सुर्खियों में आई राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे हो या फिर खूनी घोटाले के नाम से विख्यात हो चुके व्यापंम घोटाले में घिरे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और कथित चावल घोटाले में सवालों में आए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह की हों। पीएम मोदी इन मामलो में मौन ही रहे।
इन मामलों में मोदी की मौनी इमेज सोचने पर मजबूर करते हैं कि आखिर क्यों विपक्ष पर निशाना साधने का कोई मौका नहीं छोड़ने वाले मोदी, जनता से मन की बातकरने वाले पीएम मोदी इन पर क्यों मौन हो जाते हैं।  
ऐसा नहीं है कि पीएम बनने के बाद मोदी ने चुप्पी साध ली है। पीएम मोदी खूब दहाड़ रहे हैं, देश से लेकर विदेश में उनकी गूंज सुनाई दे रही है। लेकिन अहम ओहदे पर बैठी सुषमा, स्मृति, वसुंधरा, शिवराज और रमन सिंह के मामलों में पीएम चुप्पी साधे हुए हैं।
पीएम मोदी को हो सकता है अपने सहयोगियों पर जरूरत से ज्यादा भरोसा हो, विपक्ष के आरोप राजनीति से प्रेरित लगते हों, लेकिन सवाल यही कि फिर वे इन पर खामोश क्यों हैं ? प्रधानमंत्री होने के नाते इन सब पर उनकी सोच सार्वजनिक होना तो बनता ही है।
इन मुद्दों पर मोदी क्यों खामोश हैं, ये तो वे ही बेहतर जानते होंगे लेकिन मोदी की ये खामोशी अब चुभने लगी है, कुछ मामलों में मोदी को मनमोहन सिंह बनाने में लगी है।

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मंगलवार, 14 जुलाई 2015

सूप तो सूप, छलनी भी बोले जिसमें 72 छेद !

उत्तर प्रदेश में आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर के लिए मुलायम का दिल कठोर हो गया। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह आईपीएस अधिकारी को कथित तौर पर धमकाते हैं, सुधर जाने की हिदायत देते हैं लेकिन मुलायम पुत्र और सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इस कथित धमकी को नेता दी की सलाह समझकर भूल जाने की हिदायत देते हैं। कहते हैं नेता जी हमें भी तो सलाह देते हैं, इसमें क्या गलत है।
अखिलेश जी नेता जी का आपको सलाह देने समझ में भी आता है। खुद सीएम की कुर्सी पर बैठने की बजाए पुत्र को सीएम बनाने के बाद सरकार कैसे चलानी है, इसकी सलाह तो अब पिता और चाचा लोग ही देंगे ना। सो वे कर रहे हैं, लेकिन एक आईपीएस अधिकारी को फोन पर धमकाना कहां तक जायज है ?
आखिर पिता के बोल हैं तो फिर कैसे पुत्र इसे गलत ठहरा दे, सो अखिलेश का ये कहना कहीं से भी हैरानी भरा नहीं लगता। लेकिन राजनीति के जिस पड़ाव में मुलायम सिंह यादव पहुंच चुके हैं, वहां पर मुलायम का एक अधिकारी के लिए इस तरह कठोर होना सोचने पर मजबूर करता है।
हैरानी इसलिए भी होती है कि मुलायम सिंह अमिताभ ठाकुर को 2006 में घटित फिरोजाबाद के जसराना की एक घटना की याद दिलाते हुए ठाकुर का उससे भी बुरा हश्र करने की बात कहते हैं। कथित ऑडियो टेप में मुलायम कहते हैं कि उन्होंने ही अमिताभ ठाकुर को सपा कार्यकर्ताओं से बचाया था।
दरअसल ये घटना 2006 की है, तब अमिताभ ठाकुर फिरोजाबाद में एसपी थे और सूबे की कमान मुलायम सिंह यादव के हाथ में थी। उसी दौरान एसपी विधायक और मुलायम सिंह यादव के समधी रामवीर सिंह ने शिवपाल सिंह यादव को जसराना के एक कार्यक्रम में बुलाया था। कार्यक्रम स्थल पर एसपी कार्यकर्ताओं और पुलिस के बीच बदइंतजामी को लेकर विवाद हुआ और पुलिसकर्मियों को पीटा गया। एसपी अमिताभ ठाकुर मौके पर पहुंचे तो उनके साथ भी हाथापाई हुई और कार्यकर्ता उन्हें स्कूल परिसर में खींच ले गए। इसकी जानकारी मिलते ही तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने समर्थकों को समझा-बुझा कर एसपी अमिताभ ठाकुर को छुड़वाया और उनसे मामले की रिपोर्ट न दर्ज करने की हिदायत दी।
ये घटना ये भी बताती है कि सपा राज में मुलायम सिंह के मुख्यमंत्री रहते हुए कैसे सपा कार्यकर्ताओं में इतनी हिम्मत थी कि वे पुलिसकर्मियों की पिटाई करने के साथ ही एक आईपीएस अधिकारी पर भी हमला करने से नहीं हिचकिचाए।
मतलब साफ है कि सपा राज में सपा नेताओं में कानून का कोई खौफ नहीं है। होता तो शायद जसराना में अमिताभ ठाकुर के साथ ये सब घटित न होता और न मुलायम उसकी मिसाल दे रहे होते।
वैसे भी ये वही मुलायम सिंह हैं जो रेप की घटनाओं पर कहते सुनाई देते हैं कि लड़कों से गलती हो जाती है।
ये वही मुलायम सिंह हैं, जो यूपी में पुलिस अधिकारी जिया उल हक समेत तीन लोगों की मौत पर विपक्षी पार्टी बसपा के यूपी में जंगलराज और गुंडाराज होने की बात पर जवाब देते हैं कि- “सूप बोले तो बोले, छलनी भी बोले जिसमें बहत्तर छेद। मायावती की सरकार के कई मंत्री और विधायक रेप, भ्रष्टाचार जैसे मामलों में जेल की सजा काट रहे हैं, ऐसे में उन्हें सपा सरकार के बारे में बोलने का कोई हक नहीं है (पढ़ें- छलनी भी बोले जिसमें 72 छेद..!)
अब अमिताभ ठाकुर जब मुलायम सिंह के खिलाफ लखनऊ के हजरतगंज थाने में शिकायत दर्ज कराते हैं तो अगले ही दिन ठाकुर के खिलाफ रेप की एफआईआर दर्ज हो जाती है। साथ ही यूपी सरकार ठाकुर को अनुशासनहीनता के आरोप में सस्पेंड कर देती है। लेकिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव मुलायम के कठोर दिल की कहानी को सलाह समझकर भूल जाने की हिदायत देते नजर आते हैं।
सत्ता हाथ में है तो सब जायज है, वही यूपी में हो रहा है, लेकिन मुलायम और अखिलेश समेत सपाईयों को ये नहीं भूलना चाहिए कि जनता सब देख रही है और 2017 के विधानसभा चुनाव में भी अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है।  

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रविवार, 12 जुलाई 2015

“खूनी व्यापम”- कैसे हो सीबीआई पर भरोसा ?

मध्य प्रदेश में व्यापम घोटाले से खूनी व्यापम बनने की इस रहस्यमयी कहानी की परतें खंगालने का जिम्मा मध्य प्रदेश एसआईटी के पास था। एक तरफ एसआईटी जांच कर रही थी दूसरी तरफ व्यापम से जुड़े लोगों की रहस्यमयी मौतों का सिलसिला अनवरत जारी था। ऐसे में मध्य प्रदेश एसआईटी पर संदेह के बादल गहराने लाजिमी थे।
मध्य प्रदेश में भी अपना राजनीतिक वजूद तलाशने में लगी कांग्रेस को शिवराज सरकार पर वार करने का सुनहरा अवसर हाथ आया तो कांग्रेस कैसे इसे छोड़ती। वैसे भी राजनीति में लाशों पर सियासत की पुरानी रीत रही है। ये रीत किसी खास राजनीतिक दल की नहीं बल्कि ये निर्भर करती है कि सत्ता में कौन है और विपक्ष में कौन ?
महाघोटाले का तमगा हासिल कर चुके व्यापम में किस की शह पर धड़ल्ले से फर्जीवाड़ा हुआ ये तो जांच का विषय है। लेकिन सियासत, जांच रिपोर्ट का कहां इंतजार करती है। लिहाजा शिवराज सिंह चौहान के इस्तीफे के साथ ही इस महाघोटाले की सीबीआई जांच की मांग उठने लगी। आरोप ये कि एसआईटी पर किसी को भरोसा नहीं है और एसआईटी राज्य सरकार के इशारे पर काम कर रही है।
देर से जागे शिवराज सिंह चौहान के पास विपक्ष के हमलों से बचने का कोई दूसरा रास्ता नहीं था लिहाजा मामले की जांच हाईकोर्ट औऱ सुप्रीम कोर्ट के रास्ते सीबीआई के पास पहुंच चुकी है। सीबीआई ने मामले की जांच शुरु तो कर दी है, लेकिन सवाल ये उठता है कि सुप्रीम कोर्ट से तोते की संज्ञा पा चुकी सीबीआई की जांच पर भरोसा किया जा सकता है ?
ये सवाल उठना इसलिए भी लाजिमी है क्योंकि सीबीआई पर केन्द्र सरकार के दबाव में काम करने के आरोप आज के नहीं बरसों पुराने हैं। ये आरोप कितने सही हैं, कहा नहीं जा सकता लेकिन इन आरोपों के चलते सीबीआई की विश्वसनीयता हमेशा सवालों के घेरे में रही है।
केन्द्र में यूपीए सरकार थी तो विपक्षी दल सरकार पर सीबीआई को अपने सियासी फायदे के लिए इस्तेमाल करने का आरोप लगाते रहे हैं। अब एनडीए सरकार है तो सत्ता से विपक्ष में आई पार्टियां भी इस सुर में बात करने लगी हैं।
अगर दो साल, पांच साल, दस साल में सीबीआई व्यापम घोटाले की जांच पूरी कर किसी निष्कर्ष पर पहुंचती है तो क्या गारंटी है कि सीबीआई पर फिर सवाल नहीं उठाए जाएंगे ? जाहिर है मामले की सीबीआई जांच की मांग करने वाले लोग ही उस वक्त उनके मन माफिक जांच रिपोर्ट न आने पर सीबीआई की विश्वसनीयता पर फिर से सवाल खड़े करेंगे।
ये होता आया है और पूरी उम्मीद भी है कि ये फिर से होगा, लेकिन इसके बाद भी किसी भी मामले की निष्पक्ष जांच के लिए नाम सिर्फ सीबीआई का ही लिया जाता है। साथ ही सीबीआई पर केन्द्र सरकार के ईशारे पर काम करने का भी आरोप भी लगाया जाता है। राजनीतिक दलों की ये दोगुली भाषा अपनी समझ से तो बाहर है।
बहरहाल हम तो यही उम्मीद करते हैं कि विश्वसनीयता के संकट से जूझ रही सीबीआई व्यापम घोटालों की एक-एक परत को पूरी निष्पक्षता से खोलेगी और इससे जुड़े लोगों की मौत के राज पर से पर्दा उठेगा। ताकि खूनी व्यापम से सने हाथों के पीछे के असली चेहरे बेनकाब हों।


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शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

दोगुनी सैलरी, लग्जरी बस और शौचालय !

सांसद वेतन में सौ फीसदी का ईजाफा चाहते हैं। दिल्ली के आम विधायकों को खर्च के लिए 84 हजार रूपए मासिक की पगार कम पड़ जाती है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव आम जनता की तरह सरकारी बस में सफर करना चाहते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि ये तीन कहानियां अलग अलग है, लेकिन इनके किरदार एक ही हैं, राजनेता !
वही लोग, जो जनता के बीच वोट मांगते वक्त ये कहते आए हैं कि वे जनता की सेवा के लिए राजनीति में आए हैं। उन्हें सत्ता की कोई लालसा नहीं है। लेकिन जनता के इन जनप्रतिनिधियों को अब जनता की सेवा के लिए अपनी जेब की चिंता भी सताने लगी है। वे जनता की सेवा का हवाला देते हुए मोटी पगार के साथ ही सरकारी सुख सुविधाओं से भी पूरी तरह लैस हो जाना चाहते हैं।
खाना भी बाजार से दस गुना दाम पर सरकारी सब्सिडी का खाने वाले हमारे सांसदों को पगार में सौ फीसदी का ईजाफा चाहिए। (पढ़ें-क्यों न बढ़े ? आखिर सवाल सांसदों की पगार का है !)
समाज सेवी अन्ना हजारे के आंदोलन से जन्मी आम आदमी की राजनीति करने का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी पर दिल्ली की जनता ने भरोसा जताया कि शायद इनकी कथनी और करनी में फर्क नहीं होगा। लेकिन अब दिल्ली के आम विधायकों भी अपनी जेब की चिंता सताने लगी है। जनता की सेवा के लिए विधायकों को 84 हजार रूपए मासिक वेतन कम पड़ने लगा है।
जनसेवा करने वाले नेताओं की ये कहानी यहीं खत्म नहीं हो जाती। तेलंगाना राज्य के लिए लंबी लड़ाई का हिस्सा रहे टीआरएस के केसीआर इन सब से दो कदम आगे हैं। तेलंगाना के पिछड़ेपन की कहानियों सुनाने वाले केसीआर आंध्र प्रदेश से अलग होने के बाद तेलंगाना राज्य के मुख्यमंत्री बने तो तेलंगाना के लोगों को उम्मीद जगी थी कि शायद अब तेलंगाना का विकास होगा। लेकिन पांच करोड़ की लग्जरी बस खरीद की कहानी तो कुछ और ही बयां कर रही है। विकास तेलंगाना का हो रहा है या केसीआर का ? दिन तेलंगाना के बहुर रहे हैं या फिर केसीआर के, ये इस घटना से साफ हो जाता है।
मजेदार बात तो ये है कि पांच करोड़ की इस लग्जरी बस की खरीद पर सीएम ऑफिस के प्रवक्ता ने बताया, ''सीएम भी राज्य के अन्य नागरिकों की तरह सरकारी बस से सफर करना चाहते हैं। यह कोई लग्जरी बस नहीं है
समझ गए ना आप कि केसीआर आम जनता की तरह सरकारी बस में सफर करना चाहते हैं, इसलिए पांच करोड़ की इस बस को खरीदा गया है।
याद रखिए ये सब उस देश में हो रहा है, जहां एक लड़की इसलिए खुदकुशी कर लेती है क्योंकि उसे शौच के लिए खुले में बाहर जाना पड़ता है। वो अपने माता-पिता से घर में शौचालय निर्माण की मांग करती है लेकिन उसके माता-पिता पैसे की तंगी के चलते घर में शौचालय का निर्माण नहीं करवा पाते। झारखंड के दुमका की ये कहानी बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है।
दुमका की ये कहानी सुर्खियां जरूर बटोर रही हैं लेकिन सवाल फिर खड़ा होता है कि आखिर कितने दिन? क्या हमारे सासंदों को, विधायकों को लग्जरी बस खरीदने वाले मुख्यमंत्री के साथ ही स्वच्छ भारत और हर घर शौचालय का नारा देने वाले हमारे प्रधानमंत्री को ये ख़बर झकझोर पाएगी ? अगर इसका जवाब हां में है, तो क्या उम्मीद करें कि अब ये तस्वीर बदलेगी ?


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ख़बरों में सिर्फ हेमा मालिनी ! क्या सिर्फ वीआईपी और सेलीब्रिटी ही हैं ख़बर ?

ख़बरों में सिर्फ अभिनेत्री और भाजपा सांसद हेमा मालिनी है, ट्विटर पर हेमा मालिनी ट्रेंड कर रही है। लेकिन तेज रफ्तार दौड़ती हेमा मालिनी की मर्सडीज से जिस माता-पिता ने अपनी बच्ची को खोया उनकी चिंता किसी को नहीं है। इतनी ख़बर जरूर है कि ऑल्टो कार में सवार एक बच्ची की इस हादसे में मौत हो गई और चार लोग घायल हो गए। लेकिन वो लोग कहां है, उनकी सेहत कैसी है. ये जानने की फुर्सत किसी के पास नहीं है।
हेमा मालिनी को कितनी चोट लगी, कहां कहां चोट लगी ? उनकी कितनी जांच हुई, कहां कहां दर्द हो रहा है, कितना दर्द हो रहा है ? हर ख़बर टीवी पर है लेकिन नहीं है तो इस हादसे का दूसरा पक्ष। दूसरी गाड़ी में सवार वो घायल, जिन्हें भी चोट लगी है। कुछ को शायद हेमा मालिनी से भी ज्यादा लेकिन वो पिक्चर से गायब हैं, इसे उनका दुर्भाग्य कहेंगे कि वे वीआईपी नहीं है।  
हेमा मालिनी की सेहत को लेकर अस्पताल बकायदा मेडिकल बुलेटिन भी जारी करता है। हेमा मालिनी की सेहत की हर एक ख़बर का अपडेट दिया जा रहा है लेकिन अपडेट गायब है तो उस परिवार का जिसने इस हादसे में अपने कलेजे के टुकड़े को खो दिया।
कथित तौर पर डेढ़ सौ किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ रही हेमा मालिनी की मर्सडीज के ड्राईवर को तो गिरफ्तार कर लिया गया है, लेकिन सवाल बरकरार है कि क्या वीआईपी के लिए हिंदुस्तान में कोई कानून नहीं है ? सेलीब्रिटी और तेज रफ्तार के कहर की कहानियां हमारे देश में नई नहीं है। इस कहानी में एक और अध्याय जुड़ गया हेमा मालिनी की मर्सडीज से हुए इस हादसे का।
ये कहानी और भी दर्दनाक उस वक्त हो जाती हैं, जब हादसे के बाद कथित वीआईपी, सेलीब्रिटी वहां से खामोशी से निकल जाते हैं। हादसे में हुए घायलों की सुध लेने तक की फुर्सत उनके पास नहीं होती।
जैसी की ख़बर है कि इस हादसे के बाद हेमा मालिनी ने भी इस दस्तूर को निभाया और दूसरे घायलों को उनके हाल पर छोड़ अपने ईलाज की चिंता में चुपचाप वहां से निकल गई। ठीक है चोट ड्रीम गर्ल को भी लगी थी, लेकिन उनकी गाड़ी से हादसे के बाद क्या उन्हें घायलों की सुध नहीं लेनी चाहिए थी ? इसका जवाब तो हेमा मालिनी ही बेहतर दे सकती हैं।
हादसे में जो बच्ची इस दुनिया को छोड़ गई, वो तो कभी लौट कर नहीं आएगी, लेकिन सवाल ये है कि क्या अब भी रफ्तार के कहर को रोकने के लिए हमारी सरकार कुछ ठोस कदम उठाएगी। साथ ही एक और सवाल कि क्या हमारे देश में ख़बर का मतलब सिर्फ वीआईपी और सेलीब्रिटी ही हैं, आम आदमी का क्या ?


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बुधवार, 1 जुलाई 2015

क्यों न बढ़े ? आखिर सवाल सांसदों की पगार का है !


संसद की एक समिति ने सांसदों की पगार दोगुनी करने और पूर्व सांसदों की पेंशन 75 प्रतिशत बढ़ाने की सिफारिश की है। इस ख़बर के बाहर आते ही हंमामा मचा है। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर क्यों सांसदों की पगार दोगुनी की जाए, पूर्व सांसदों की पेंशन में बढ़ोतरी की जाए ?
मुझे तो ये समझ नहीं आ रहा कि आखिर क्यों हमारे बेचारे सांसदों, पूर्व सांसदों की पगार और पेंशन बढ़ाने की सिफारिश मात्र पर उन पर ताने कसे जा रहे हैं ?
अब आप ये बताओ जो सांसद संसद की कैंटिन में बाजार दाम से दस गुना सस्ता खाना खाता हो, उसकी पगार क्यों न बढ़ाई जाए ? हमारे माननीय के पास पैसा होता कहां है ? जैसे-तैसे बेचारे चंदा एकत्र करके लाखों-करोड़ों जमा करते हैं और फिर इस पैसे को खर्च करके चुनाव जीत कर संसद में पहुंचते हैं, ऐसे में उनकी पगार तो बढ़नी ही चाहिए न।
अब सब्सिडी का खाना नहीं मिलेगा, पगार नहीं बढ़ेगी तो कैसे हमारे सांसद काम करेंगे ? संसद में कैसे हंगामा करेंगे ?
संसद को चलने से रोकने के लिए कैसे पूरे मन से जतन कर पाएंगे ?
पांच साल तक जी-तोड़ मेहनत करते हैं सांसद, ऐसे में 50 हजार रूपए की मामूली पगार में कैसे उनका गुजारा होगा ?
अब मानसून सत्र शुरु होने वाला है, कैसे हमारे सांसद महोदय हंगामे के बादल बरसाकर संसद को तर कर पाएंगे ? बहुत काम होता है भई, बहुत मेहनत करनी पड़ती है, हर कोई नहीं समझ सकता।
पगार की तारीख आते ही जब हर किसी के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है फिर यहां तो पगार बढ़ने की बात है, वो भी पूरे 100 फीसदी। अब एक पल के लिए सोचो, सांसदों की पगार दोगुनी हो जाती है तो फिर वे कितने मन से काम करेंगे। कम से कम संसद में सोएंगे तो नहीं ही ! क्या पता इस जोश में एक-आध चक्कर अपने संसदीय क्षेत्र का ही लगा लें, जनहित के कुछ काम ही करवा दें। सोचो देश की जनता का कितना भला होगा ?
इसलिए मैं तो कहता हूं कि विरोध मत करो। सब मिलकर मांग करो की हमारे सांसदों की पगार सौ फीसदी नहीं पूरे दो सौ फीसदी बढ़ा दो। पूर्व सांसदों की पगार भी 75 फीसदी नहीं पूरे सौ फीसदी बढ़ा दो, आखिर उन्होंने भी जनता के लिए सांसद रहते हुए कितना कुछ किया है। संसद में जनता की आवाज को बुलंद किया है भई।


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रविवार, 28 जून 2015

'हर राजनेता @#% बहुत &*%@ होता है !

राजेश रंजन कहो, पप्पू यादव कहो, क्या फर्क पड़ता है, लेकिन खबरदार जो राजनेता कहा ! ठीक है, बिहार के मधेपुरा से सांसद हैं, लेकिन राजनेता तो नहीं हैं ना। होते तो क्या राजनेताओं को गालियां बकते। वादे कर उन्हें पूरा न करने पर राजनेता रूपी कौम की तारीफ शायद ही कभी सुनने को मिले लेकिन पप्पू यादव ने जो बोला वो भी कहां सुनाई पड़ता है।
क्या कहा था पप्पू यादव ने, ये अभी तक आपने नहीं सुना है तो पढ़ लीजिए, सांसद जी बोले कि 'हर राजनेता @#% बहुत &*%@ होता है। मेरा बस चले तो राजनेता मिले और शूट ऐट साइट कर देना चाहिए। नाग मिले छोड़ दीजिए, राजनेता मिले, लात कंठ पर देकर मारिए। सोसाइटी को किसी ने कमजोर किया तो @%#( पॉलिटिशन ने।'
ये शब्द हैं देश की संसद में जनता के हक की आवाज़ उठाने वाले सांसद पप्पू यादव के। वो पप्पू यादव जो द्रोहकाल के पथिक नामक एक किताब भी लिख चुके हैं।
पप्पू यादव हाल ही में पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल से निष्कासित भी किये जा चुके हैं। बिहार में विधानसभा चुनाव सामने खड़ा है ऐसे में राजद से निकाले जाने के बाद से ही पप्पू यादव नया राजनीतिक ठौर तलाशते दिखाई दिए, लेकिन ठौर ना मिलने पर पप्पू यादव ने अपनी नई पार्टी जन क्रांति अधिकार मोर्चा का ही गठन कर लिया।
बिहार में अपना राजनीतिक वजूद बचाने की कोशिश में लगे पप्पू यादव का एक राजनेता होते हुए, राजनेताओं को गालियां बकना समझ से परे है। पप्पू यादव जी एक सवाल आपसे, क्या आप राजनेता नहीं है ?  इस सवाल का जवाब आप ना में तो नहीं दे पाएंगे फिर आप क्या हुए ? आप भी तो इस कौम का ही एक हिस्सा हैं। आप ने इस कौम में रहते हुए कोई अति विशिष्ट कार्य किया हो तो वो ही बता दीजिए। गूगल बाबा भी थक गए, लेकिन आपके बारे में ऐसा कुछ हमें खोज के नहीं दे पाए, जो आपको इन राजनेताओं से लग पहचान दिलाता हो। आपके नाम के साथ सीपीआईएम के नेता अजीत सरकार के बारे में कुछ सूचनाएं छनकर जरूर मिल गई।
खैर छोड़िए, ये तो पुरानी बात हो गई। लेकिन ये तो आपके कंठ से ताजा शब्द वर्षा हुई है, राजनेताओं के लिए। अब इस पर क्या कहेंगे ?
बिहार का विधानसभा चुनाव सामने खड़ा है, आपने नई पार्टी का गठन किया है ? कैसे खुद को जनता के सामने जस्टिफाई करेंगे कि आप राजनीति कर रहे हैं, आपकी राजनीतिक पार्टी है, लेकिन आप राजनेता नहीं है। आपकी पार्टी के प्रत्याशी जो विभिन्न सीटों से चुनाव लड़ेंगे वे कैसे अपने आप को जस्टिफाईकरेंगे ?
सपना तो आप बिहार का अगला मुख्यमंत्री बनने का देख रहे हैं लेकिन ये तो बताते जाईए जनाब कि जनता कैसे आप पर विश्वास करेगी ? क्यों आप पर आपकी पार्टी के प्रत्याशियों पर भरोसा करेगी ? नई-नई पार्टी का गठन किया है आपने, लगता है आवेश में आप कुछ ज्यादा ही बोल गए ! आज नहीं तो कल यही आप कहेंगे भी।


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ललित मोदी, ट्वीट और मीडिया !

ललित मोदी, अब तो ये नाम सुनते-सुनते कान पकने लगे हैं। टीवी खोलो, अख़बार उठाओ बस हर तरफ सिर्फ और सिर्फ ललित मोदी ने ये ट्वीट किया, इसका नाम लिया, उसका नाम लिया, इसके अलावा और कुछ भी नहीं है।
ललित मोदी खुद लंदन में आराम फरमा रहा है, लेकिन भूचाल हिंदुस्तान में आया हुआ है। चाय पीते-पीते ललित मोदी ट्वीट कर रहा है और भारतीय मीडिया पागल हुआ जा रहा है। सीधी सी बात कहूं तो ललित मोदी जो चाह रहा है, वही भारतीय मीडिया में चल रहा है।
पहले सवालों में घिरी, अक्सर विवादों से परे रहने वाली सुषमा स्वराज। सुषमा की ललित मोदी को मदद की ख़बर से सुषमा स्वराज सवालों के घेरे में आती दिखाई दी, तो मोदी सरकार के एक साल के कार्यकाल में कुछ बड़ा खोजने की कोशिश कर रही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को तो मानो राजनीतिक ऑक्सीजन मिल गई। सुषमा के बाद विवादों में घिरी धौलपुर की महारानी और वर्तमान में राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे। कांग्रेस आक्रमक थी और बीजेपी बैकफुट पर लेकिन अब ललित मोदी का ट्वीट आया कि उन्होंने गांधी परिवार से भी मुलाकात की थी। राबर्ट और प्रियंका वाड्रा से वे मिले थे। ट्वीट आने की देर थी, बैकफुट पर खड़ी बीजेपी अचानक से आक्रमक हो गई। सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे पर जवाब देने से बचने वाली भाजपा अब कांग्रेस से सवाल कर रही है।
ललित मोदी ट्वीट पर ट्वीट कर रहा है और सत्ता से गलियारों से विपक्ष तक छटपटा रहे हैं। कुछ समाचार चैनल 24 घंटे सिर्फ ललित मोदी के चक्कर में घनचक्कर बने हुए हैं। सवालों में घिरे नेताओं के पीछे साए की तरह लगे हुए हैं। हर एक सेकेंड की रिपोर्टिंग का बखान कर रहे हैं। हमने ये खुलासा किया, हमने ये दिखाया। साथ ही इस इंतजार में हैं कि अब किसी का इस्तीफा हो तो फिर ख़बर का असर दिखाया जाए कि कैसे उनकी ख़बर ने दिग्गजों को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया !
नैतिकता के तकाजे पर इस्तीफा अब पुरानी बात हो गई है। वैसे भी सत्ता का नशा इतनी आसानी से तो नहीं उतरता ! ऐसे में कैसे हाथ आई कुर्सी को कोई कैसे छोड़ दे ? इसके लिए जरूरत होती है साहस की, जो आजकल के राजनेताओं में तो दिखने से रहा।
मतलब साफ है सुषमा और राजे के इस्तीफे के इंतजार में अपनी रात काली कर रहे लोगों को कुछ हासिल नहीं होने वाला। इस्तीफा, वो भी ऐसे वक्त में जब बिहार का विधानसभा चुनाव सामने खड़ा है। अब क्यों बिहार का किला फतह करने की आस लगाए बैठी भाजपा बैठे बिठाए अपने विरोधियों को निशाना साधने का मौका देगी ?


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सोमवार, 22 जून 2015

योग पर धर्म का चश्मा !

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की प्लानिंग से लेकर क्लोजिंग तक योग पर धर्म का तड़का लगा। राजपाथ जब योगपथ में तब्दील हुआ, तो आरएसस से डेप्युटेशन पर बीजेपी में आए राम माधव की निगाहें किसी को तलाश रही थीं। पैंतीस हजार से ज्यादा की भीड़ में आम आदमी को खोजना भले ही आटे में सुई ढ़ूंढ़ने के बराबर हो लेकिन खास पर नज़र पड़ ही जाती है।
शाम ढ़लते ढ़लते राम माधव ट्विटर पर चह-चहाए। योग दिवस पर उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की गैर मौजूदगी पर सवाल खड़े कर दिए। लेकिन क्या है कि अगर तड़के में मिर्च ज्यादा हो जाए तो छींक आने लगती है। राम माधव के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। हालांकि जल्द ही उन्हें गलती का एहसास हुआ और माफी मांगते हुए बाद में उन्होंने अपना ट्वीट डिलीट भी कर दिया। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। राम माधव की छींक से शुरु हुआ मामला सामूहिक सर्दी-जुकाम में तब्दील हो चुका था।
राम माधव की माफी का मतलब ये बिल्कुल नहीं की मुद्दा खत्म हो जाता है।  आखिर माधव के मन की बात सार्वजनिक हो गई थी। ये पता चल चुका था कि  कहीं न कहीं वो हामिद अंसारी की अनुपस्थिति के बहाने धर्म के मुद्दे को हवा देने की कोशिश कर रहे थे।
संयोग देखिए, अपनी ही पार्टी के बड़े नेता अमित शाह का पटना में योग ना करना राम माधव को नजर नहीं आया, लेकिन राजपथ पर योग करते 35,985 लोगों की भीड़ में हामिद अंसारी की अनुपस्थिति उन्हें खल गई।
हैरानी उस वक्त और ज्यादा हुई, जब उपराष्ट्रपति कार्यालय से योग दिवस में हामिद अंसारी के शामिल नहीं होने का स्पष्टीकरण दिया गया कि उन्हें न्यौता ही नहीं मिला था। फिर आयुष मंत्री श्रीपद नाईक बोले, कि अगर किसी कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मुख्य अतिथि है तो राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति को निमंत्रण नहीं दिया जाता।
नाईक साहब आपके तर्क तो अपनी समझ से परे है। दुनिया को न्यौता देकर योग दिवस पर रिकार्ड बनाने की चाहत रखने वाले आप अगर उपराष्ट्रपति को न्यौता भेज देते तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ता ?  
गजब है, आप दुनिया से तो योग करने का आह्वान करते हैं, लेकिन अपने देश के उपराष्ट्रपति को निमंत्रित करने में नियम की किताब खोल कर बैठ जाते हैं।
विडंबना है कि योग को धर्म के चश्मे से ना देखने की अपील करने वाली भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की ही आंखों पर कम से कम योग के मामले पर तो धर्म चश्मा चढ़ा हुआ दिखाई दे रहा है, ऐसे में कैसे दूसरे लोग इनकी बातों पर भरोसा कर अपने-अपने चश्में उतारें ?


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मंगलवार, 16 जून 2015

सुषमा के बहाने, राजनीतिक ऑक्सीजन तलाशती कांग्रेस !

रविवार से ख़बरों में सिर्फ सुषमा स्वराज ही हैं, सुषमा पर आरोप लगे हैं कि सुषमा स्वराज ने ललित मोदी की मदद की। ललित मोदी सुषमा की कृपा से लंदन से पुर्तगाल गए और अपनी बीमार पत्नी के साथ रहने के बाद वापस लंदन आ गए !
सुषमा स्वराज ने ललित मोदी की भारत से पुर्तगाल जाने में मदद की होती और पुर्तगाल पहुंचकर मोदी भारत लौटते ही नहीं, तो समझ में आता कि सुषमा ने ललित मोदी को बीमार पत्नी की मदद के नाम पर भारत से फरार करवा दिया। सुषमा के इस्तीफे की जोर शोर से तब मांग होती, तो समझ में भी आता, लेकिन 2014 के आम चुनाव के बाद से ही राजनीतिक ऑक्सीजन तलाश रही कांग्रेस को तो बस मुद्दा चाहिए था। जो सुषमा-ललित मोदी प्रकरण के बहाने कांग्रेस को मिल भी गया! ऐसे में कांग्रेस क्यों बैठे-बिठाए हाथ आए इस मुद्दे को जाने दे भला ? सुषमा-ललित मोदी प्रकरण के बहाने एक साल पूरा कर चुकी मोदी सरकार को घेराबंदा का मौका जो कांग्रेस को मिला है।
लेकिन कांग्रेस की घेराबंदी कारगर होती नहीं दिख रही है, वजह है सुषमा स्वराज का कद! सुषमा स्वराज इस्तीफा देना चाहें भी, तो शायद ही सुषमा का इस्तीफा मंजूर हो। सुषमा स्वराज का इस्तीफा न सिर्फ सरकार को घेरने की कोशिश कर रही कांग्रेस की बड़ी जीत होगी, बल्कि बीते एक साल में बेदाग होने का दम भर रही मोदी सरकार की एक बड़ी राजनीतिक हार होगी! साथ ही इसके बहाने अगले चार साल तक मोदी सरकार पर कांग्रेस निशाना साधते रहेगी!
ऐसे में सुषमा का इस्तीफे की आस लगाए बैठे लोगों की ये मुराद शायद ही पूरी हो पाए। सुषमा की जगह कोई और छोटे कद का मंत्री होता तो शायद ज्यादा दबाव पड़ने पर उससे इस्तीफा ले भी लिया जाता, हालांकि ये भी भाजपा इतनी आसानी से होने नहीं देती। कुल मिलाकर तो फिलहाल यही कह सकते हैं कि राजनीति की पिच पर मोदी सरकार से सुषमा स्वराज का विकेट गिराना कांग्रेस के लिए टेढ़ी खीर ही साबित होता दिख रहा है।
बहरहाल कांग्रेस बाउंसर पर बाउंसर फेंक रही है, लेकिन सरकार, संगठन और संघ के साथ ही कुछ विपक्षी साथी सुषमा की ढ़ाल बनकर मजबूती से सुषमा के साथ खड़े दिखाई दे रहे है। ऐसे में देखना ये रोचक होगा कि एक साल में मोदी सरकार के खिलाफ बमुश्किल हाथ आए इस मुद्दे को कांग्रेस कितने दिन जिंदा रख पाती है।


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शनिवार, 13 जून 2015

लेकिन इनको शर्म नहीं आती !

सफाई कर्मचारियों की हड़ताल क्या समाप्त हुई, दिल्ली की सड़कों पर सफेद टोपी लगाए आप नेताओं के साथ ही भगवा टोपी लगाए भाजपा नेताओं का हुजूम उमड़ पड़ा। हड़ताल समाप्त होने के बाद सफाई कर्मचारी अपने काम में जुट चुके थे, लेकिन नेताओं का सियासत का कीड़ा शांत नहीं हुआ था। लाव-लश्कर के साथ ये अजब कौम मानो घर से सौगंध खाकर निकली थी कि 48 घंटे में दिल्ली को चमका देंगे। दिल्ली कितना चमकेगी ये तो पता नहीं लेकिन इनकी सियासत जरूर चमकती दिखाई दी।
सफाई कर्मचारियों की हड़ताल के दौरान जब पूर्वी दिल्ली के लोगों का जीना दूभर हो गया था, सड़कें कूड़े के ढेर से पट चुकी थी। उस वक्त दिल्ली को चमकाने की ख्याल किसी राजनेता के दिल में नहीं आया। कूड़े की सड़ांध इनकी नाक तक नहीं पहुंची थी, लेकिन सफाई कर्मचारियों के काम में जुटते ही इनका ज़मीर भी जाग गया कि दिल्ली तो हमारी भी है, दिल्ली तो देश की शान है, हमें इसको चमकाना है।
इनके कारनामों को देखकर दिल्ली वासियों को शर्म आ गई। कई जगह से दिल्ली वासियों ने इनको खदेड़ा भी, लेकिन इनको शर्म नहीं आई। ये टीवी पर गला फाड़-फाड़ कर बेशर्मों की तरह एक-दूसरे पर आरोप मढ़ते रहे।
स्वच्छ भारत का प्रधानमंत्री मोदी का नारा जब दिल्ली में ही दम तोड़ने लगा था तो भी दिल्ली के मोदी भक्त भाजपा कार्यकर्ताओं की नींद नहीं टूटी। हैरानी तो उस वक्त भी हुई, जब स्वच्छता पसंद पीएम मोदी को भी बदसूरत होती दिल्ली नज़र नहीं आई।
ऐसा ही कुछ हाल आम आदमी की पार्टी होने का दावा करने वाली आपनेताओं का भी था, जो हाथ में झाड़ू उठाने से कतराते दिखाई दिए, वही झाड़ू जिसके दम पर आप ने दिल्ली से भाजपा और कांग्रेस का सफाया कर दिया था।
सियासत का ये रंग कोई नया नहीं है, अलग-अलग मौकों पर राजनेताओं को सियासी रंग बदलते जनता ने कई बार देखा है, ये सब देख जनता को शर्म आ जाती है, लेकिन शर्म इन्हें नहीं आती !


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शुक्रवार, 12 जून 2015

भूख नहीं कमबख़्त सियासत मार देती है !



पापी पेट का सवाल है, वरना कौन कमबख्त तन को झुलसा देने वाली गर्मी में जी तोड़ मेहनत करता। अगर पापी पेट ना हो, तो दिन-रात खून-पसीना एक करने की ज़रूरत ही ना पड़े, लेकिन इतनी जद्दोजहद के बाद अगर मेहनताने के लिए भी आंदोलन का रास्ता अख्तियार करना पड़े, तो क्या ?
पूर्वी दिल्ली में सड़क किनारे जगह-जगह लगे कूड़े के ढ़ेर इस आंदोलन की कहानी खुद बयां कर रहे हैं। खास बात ये, कि हक की इस लड़ाई में सबसे ज्यादा नुकसान भी लड़ने वालों का ही होता है। फिर आम जनता तो है ही उस घुन की तरह है जो आटे के साथ हमेशा से पिसती आई है।
अगर कोई फायदे में है, तो वह है, इस लड़ाई के दूसरे सिरे पर खड़ी सरकार और सत्ता की लालसा लिए राजनीतिक दल, जिन्हे सफाई कर्मचारियों की परेशानी में भी अपना वोट बैंक दिखाई पड़ रहा है। सफाई कर्मचारियों की इस परेशानी में वे भले ही तन से साथ खड़े होने का दम भर रहे हैं, लेकिन असल में सियासी कौम अपने सियासी नफे नुकसान के गणित में उलझी हुई है।
इस जंग का आगाज़ करने वाले पूर्वी नगर निगम के सफाई कर्मचारियों के घर में खाने के लाले पड़े हुए हैं लेकिन घर से भरपेट नाश्ता कर इनके आंदोलन में शामिल होने वाले राजनीतिक दलों के नुमाईंदे एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का खेल खेल रहे हैं।
सफाई कर्मचारियों के साथ ही इस लड़ाई का असर झेल रही आम जनता की दुश्वारियों से बेख़बर राजनेता अपनी-अपनी सियासत चमकाने में बेहद व्यस्त हैं। कुछ एसी कमरों में बैठकर प्रेस कांफ्रेंस कर एक दूसरे पर निशाना साध रहे हैं तो कुछ लाव-लश्कर के साथ धरना स्थल पर ही इनके सबसे बड़े हिमायती नज़र आ रहे हैं।
राजनीति को बदलने का सपना दिखाकर आम आदमी के नारे के साथ दिल्ली की सत्ता में काबिज अरविंद केजरीवाल सरकार हो, दिल्ली में नाम की विपक्षी पार्टी भाजपा या फिर राजनीतिक ऑक्सीजन तलाश रही कांग्रेस, सभी इनकी समस्या की बात कर रहे हैं, समाधान की नहीं ! हां, समाधान के सवाल पर गेंद एक-दूसरे के पाले में सरकाने में जरूर इनका कोई सानी नहीं है।
हालांकि दिल्ली सरकार को हाईकोर्ट की फटकार के बाद दो दिनों में बकाया वेतन के एमसीडी अधिकारियों के आश्वासन के बाद आखिर सफाई कर्मचारियों ने अपनी हड़ताल समाप्त करने का ऐलान जरूर किया है, लेकिन इसके बाद भी सवाल ये उठता है कि आखिर ऐसी नौबत ही क्यों आन पड़ी ? इस सवाल का जवाब शायद ही कोई राजनेता दे पाए। साफ है, मेहनत करने वालों को भूख नहीं कमबख़्त सियासत मार देती है !


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बुधवार, 10 जून 2015

बिहार- सत्ता के लिए जहर का प्याला !

बिहार में चुनाव में बस अब थोड़ा वक्त बचा है, ऐसे में सत्ता के महायुद्ध की तैयारियां भी जोर पकड़ने लगी हैं। बिहार का चुनाव हमेशा से ही दिलचस्प रहा है, लेकिन इस बार बिहार चुनाव के नतीजे सिर्फ सरकार बनाने के गुणा-भाग तक ही सीमित नहीं रहेगें बल्कि बिहार के जरिए देश में राज करने वालों का राजनीतिक भविष्य भी तय करेगें।
केन्द्र की सत्ता में काबिज होने के बाद भाजपा जहां मोदी लहर के सहारे बिहार में भी भगवा फहराने का सपना देख रही है, वहीं मोदी लहर को हवा करने के लिए बिहार की राजनीति के दिग्गज एक मंच पर आ गए हैं।
ये सत्ता की ही लालसा है कि लालू और नीतिश कुमार की दोस्ती पहले दुश्मन न करे दोस्त ने वो काम किया है गुनगुनाते हुए दुश्मनी में तब्दील हुई और फिर से सत्ता के लिए दोनों दुश्मनी भुला, य़े दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे का राग गुनगुनाते दिखाई दे रहे हैं।
दुश्मनी से वापस दोस्ती का ये सफर कितना हसीन रहेगा इसके लिए दोस्ती का ऐलान करते वक्त लालू प्रसाद यादव के इस बयान से लगाया जा सकता है कि वे बिहार में भाजपा को रोकने के लिए किसी भी ज़हर को पीने के लिए तैयार हैं
ज़हर का प्याला तो सामने था नहीं, मतलब साफ है कि ये ज़हर और को नहीं बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार हैं, जिनके नेतृत्व में लालू की राजद और जदयू ने चुनाव लड़ने का फैसला लिया है।
लालू के राज को जंगलराज बताकर जनता का भरोसा जीतने वाले नीतिश कुमार कैसे जनता के बीच लालू के हाथों में हाथ डाल वोट मांगेंगे ये देखना उतना ही दिलचस्प होगा, जितना की लालू का नीतिश को मुख्यमंत्री बनाने के लिए बिहार की जनता से वोट मांगना।
सत्ता की सीढ़ी में अपनी पीढ़ी को चढ़ाने में विश्वास रखने वाले लालू प्रसाद यादव के लिए परिवारवाद से बाहर निकलना इतना आसान तो नहीं लगता। आसान होता तो शायद राबड़ी देवी का नाम बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री की सूची में कभी नहीं जुड़ता लेकिन बिहार में ऐसा हुआ और इसे संभव करने वाले लालू ही थे।
बिहार में सत्ता के इस महायुद्ध में योद्धाओं की कमी होती नहीं दिख रही है, निर्णायक न सही लेकिन जातिवाद के तड़के से सत्ता का गणित बिगाड़ने वाले योद्धा भी किंग मेकर बनने का सपना देखने लगे हैं। कभी नीतिश के मांझी  रहे जीतनराम हो या फिर लालू प्रसाद के पप्पू यादव, अपनी अपनी पार्टी से नाता तोड़ने के बाद ये दोनों योद्धा भी नीतिश और लालू की राह मुश्किल करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।
कह सकते हैं कि बिहार में इस बार सत्ता के लिए बिहार के इतिहास की सबसे रोचक जंग देखने को मिलेगी, लेकिन दोस्ती-दुश्मनी-दोस्ती के इस पाठ को बिहार की जनता कितना समझ पाएगी, ये तो चुनावी नतीजे ही तय करेंगे।


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