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शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

ख़बरों में सिर्फ हेमा मालिनी ! क्या सिर्फ वीआईपी और सेलीब्रिटी ही हैं ख़बर ?

ख़बरों में सिर्फ अभिनेत्री और भाजपा सांसद हेमा मालिनी है, ट्विटर पर हेमा मालिनी ट्रेंड कर रही है। लेकिन तेज रफ्तार दौड़ती हेमा मालिनी की मर्सडीज से जिस माता-पिता ने अपनी बच्ची को खोया उनकी चिंता किसी को नहीं है। इतनी ख़बर जरूर है कि ऑल्टो कार में सवार एक बच्ची की इस हादसे में मौत हो गई और चार लोग घायल हो गए। लेकिन वो लोग कहां है, उनकी सेहत कैसी है. ये जानने की फुर्सत किसी के पास नहीं है।
हेमा मालिनी को कितनी चोट लगी, कहां कहां चोट लगी ? उनकी कितनी जांच हुई, कहां कहां दर्द हो रहा है, कितना दर्द हो रहा है ? हर ख़बर टीवी पर है लेकिन नहीं है तो इस हादसे का दूसरा पक्ष। दूसरी गाड़ी में सवार वो घायल, जिन्हें भी चोट लगी है। कुछ को शायद हेमा मालिनी से भी ज्यादा लेकिन वो पिक्चर से गायब हैं, इसे उनका दुर्भाग्य कहेंगे कि वे वीआईपी नहीं है।  
हेमा मालिनी की सेहत को लेकर अस्पताल बकायदा मेडिकल बुलेटिन भी जारी करता है। हेमा मालिनी की सेहत की हर एक ख़बर का अपडेट दिया जा रहा है लेकिन अपडेट गायब है तो उस परिवार का जिसने इस हादसे में अपने कलेजे के टुकड़े को खो दिया।
कथित तौर पर डेढ़ सौ किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ रही हेमा मालिनी की मर्सडीज के ड्राईवर को तो गिरफ्तार कर लिया गया है, लेकिन सवाल बरकरार है कि क्या वीआईपी के लिए हिंदुस्तान में कोई कानून नहीं है ? सेलीब्रिटी और तेज रफ्तार के कहर की कहानियां हमारे देश में नई नहीं है। इस कहानी में एक और अध्याय जुड़ गया हेमा मालिनी की मर्सडीज से हुए इस हादसे का।
ये कहानी और भी दर्दनाक उस वक्त हो जाती हैं, जब हादसे के बाद कथित वीआईपी, सेलीब्रिटी वहां से खामोशी से निकल जाते हैं। हादसे में हुए घायलों की सुध लेने तक की फुर्सत उनके पास नहीं होती।
जैसी की ख़बर है कि इस हादसे के बाद हेमा मालिनी ने भी इस दस्तूर को निभाया और दूसरे घायलों को उनके हाल पर छोड़ अपने ईलाज की चिंता में चुपचाप वहां से निकल गई। ठीक है चोट ड्रीम गर्ल को भी लगी थी, लेकिन उनकी गाड़ी से हादसे के बाद क्या उन्हें घायलों की सुध नहीं लेनी चाहिए थी ? इसका जवाब तो हेमा मालिनी ही बेहतर दे सकती हैं।
हादसे में जो बच्ची इस दुनिया को छोड़ गई, वो तो कभी लौट कर नहीं आएगी, लेकिन सवाल ये है कि क्या अब भी रफ्तार के कहर को रोकने के लिए हमारी सरकार कुछ ठोस कदम उठाएगी। साथ ही एक और सवाल कि क्या हमारे देश में ख़बर का मतलब सिर्फ वीआईपी और सेलीब्रिटी ही हैं, आम आदमी का क्या ?


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बुधवार, 1 जुलाई 2015

क्यों न बढ़े ? आखिर सवाल सांसदों की पगार का है !


संसद की एक समिति ने सांसदों की पगार दोगुनी करने और पूर्व सांसदों की पेंशन 75 प्रतिशत बढ़ाने की सिफारिश की है। इस ख़बर के बाहर आते ही हंमामा मचा है। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर क्यों सांसदों की पगार दोगुनी की जाए, पूर्व सांसदों की पेंशन में बढ़ोतरी की जाए ?
मुझे तो ये समझ नहीं आ रहा कि आखिर क्यों हमारे बेचारे सांसदों, पूर्व सांसदों की पगार और पेंशन बढ़ाने की सिफारिश मात्र पर उन पर ताने कसे जा रहे हैं ?
अब आप ये बताओ जो सांसद संसद की कैंटिन में बाजार दाम से दस गुना सस्ता खाना खाता हो, उसकी पगार क्यों न बढ़ाई जाए ? हमारे माननीय के पास पैसा होता कहां है ? जैसे-तैसे बेचारे चंदा एकत्र करके लाखों-करोड़ों जमा करते हैं और फिर इस पैसे को खर्च करके चुनाव जीत कर संसद में पहुंचते हैं, ऐसे में उनकी पगार तो बढ़नी ही चाहिए न।
अब सब्सिडी का खाना नहीं मिलेगा, पगार नहीं बढ़ेगी तो कैसे हमारे सांसद काम करेंगे ? संसद में कैसे हंगामा करेंगे ?
संसद को चलने से रोकने के लिए कैसे पूरे मन से जतन कर पाएंगे ?
पांच साल तक जी-तोड़ मेहनत करते हैं सांसद, ऐसे में 50 हजार रूपए की मामूली पगार में कैसे उनका गुजारा होगा ?
अब मानसून सत्र शुरु होने वाला है, कैसे हमारे सांसद महोदय हंगामे के बादल बरसाकर संसद को तर कर पाएंगे ? बहुत काम होता है भई, बहुत मेहनत करनी पड़ती है, हर कोई नहीं समझ सकता।
पगार की तारीख आते ही जब हर किसी के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है फिर यहां तो पगार बढ़ने की बात है, वो भी पूरे 100 फीसदी। अब एक पल के लिए सोचो, सांसदों की पगार दोगुनी हो जाती है तो फिर वे कितने मन से काम करेंगे। कम से कम संसद में सोएंगे तो नहीं ही ! क्या पता इस जोश में एक-आध चक्कर अपने संसदीय क्षेत्र का ही लगा लें, जनहित के कुछ काम ही करवा दें। सोचो देश की जनता का कितना भला होगा ?
इसलिए मैं तो कहता हूं कि विरोध मत करो। सब मिलकर मांग करो की हमारे सांसदों की पगार सौ फीसदी नहीं पूरे दो सौ फीसदी बढ़ा दो। पूर्व सांसदों की पगार भी 75 फीसदी नहीं पूरे सौ फीसदी बढ़ा दो, आखिर उन्होंने भी जनता के लिए सांसद रहते हुए कितना कुछ किया है। संसद में जनता की आवाज को बुलंद किया है भई।


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रविवार, 28 जून 2015

'हर राजनेता @#% बहुत &*%@ होता है !

राजेश रंजन कहो, पप्पू यादव कहो, क्या फर्क पड़ता है, लेकिन खबरदार जो राजनेता कहा ! ठीक है, बिहार के मधेपुरा से सांसद हैं, लेकिन राजनेता तो नहीं हैं ना। होते तो क्या राजनेताओं को गालियां बकते। वादे कर उन्हें पूरा न करने पर राजनेता रूपी कौम की तारीफ शायद ही कभी सुनने को मिले लेकिन पप्पू यादव ने जो बोला वो भी कहां सुनाई पड़ता है।
क्या कहा था पप्पू यादव ने, ये अभी तक आपने नहीं सुना है तो पढ़ लीजिए, सांसद जी बोले कि 'हर राजनेता @#% बहुत &*%@ होता है। मेरा बस चले तो राजनेता मिले और शूट ऐट साइट कर देना चाहिए। नाग मिले छोड़ दीजिए, राजनेता मिले, लात कंठ पर देकर मारिए। सोसाइटी को किसी ने कमजोर किया तो @%#( पॉलिटिशन ने।'
ये शब्द हैं देश की संसद में जनता के हक की आवाज़ उठाने वाले सांसद पप्पू यादव के। वो पप्पू यादव जो द्रोहकाल के पथिक नामक एक किताब भी लिख चुके हैं।
पप्पू यादव हाल ही में पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल से निष्कासित भी किये जा चुके हैं। बिहार में विधानसभा चुनाव सामने खड़ा है ऐसे में राजद से निकाले जाने के बाद से ही पप्पू यादव नया राजनीतिक ठौर तलाशते दिखाई दिए, लेकिन ठौर ना मिलने पर पप्पू यादव ने अपनी नई पार्टी जन क्रांति अधिकार मोर्चा का ही गठन कर लिया।
बिहार में अपना राजनीतिक वजूद बचाने की कोशिश में लगे पप्पू यादव का एक राजनेता होते हुए, राजनेताओं को गालियां बकना समझ से परे है। पप्पू यादव जी एक सवाल आपसे, क्या आप राजनेता नहीं है ?  इस सवाल का जवाब आप ना में तो नहीं दे पाएंगे फिर आप क्या हुए ? आप भी तो इस कौम का ही एक हिस्सा हैं। आप ने इस कौम में रहते हुए कोई अति विशिष्ट कार्य किया हो तो वो ही बता दीजिए। गूगल बाबा भी थक गए, लेकिन आपके बारे में ऐसा कुछ हमें खोज के नहीं दे पाए, जो आपको इन राजनेताओं से लग पहचान दिलाता हो। आपके नाम के साथ सीपीआईएम के नेता अजीत सरकार के बारे में कुछ सूचनाएं छनकर जरूर मिल गई।
खैर छोड़िए, ये तो पुरानी बात हो गई। लेकिन ये तो आपके कंठ से ताजा शब्द वर्षा हुई है, राजनेताओं के लिए। अब इस पर क्या कहेंगे ?
बिहार का विधानसभा चुनाव सामने खड़ा है, आपने नई पार्टी का गठन किया है ? कैसे खुद को जनता के सामने जस्टिफाई करेंगे कि आप राजनीति कर रहे हैं, आपकी राजनीतिक पार्टी है, लेकिन आप राजनेता नहीं है। आपकी पार्टी के प्रत्याशी जो विभिन्न सीटों से चुनाव लड़ेंगे वे कैसे अपने आप को जस्टिफाईकरेंगे ?
सपना तो आप बिहार का अगला मुख्यमंत्री बनने का देख रहे हैं लेकिन ये तो बताते जाईए जनाब कि जनता कैसे आप पर विश्वास करेगी ? क्यों आप पर आपकी पार्टी के प्रत्याशियों पर भरोसा करेगी ? नई-नई पार्टी का गठन किया है आपने, लगता है आवेश में आप कुछ ज्यादा ही बोल गए ! आज नहीं तो कल यही आप कहेंगे भी।


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ललित मोदी, ट्वीट और मीडिया !

ललित मोदी, अब तो ये नाम सुनते-सुनते कान पकने लगे हैं। टीवी खोलो, अख़बार उठाओ बस हर तरफ सिर्फ और सिर्फ ललित मोदी ने ये ट्वीट किया, इसका नाम लिया, उसका नाम लिया, इसके अलावा और कुछ भी नहीं है।
ललित मोदी खुद लंदन में आराम फरमा रहा है, लेकिन भूचाल हिंदुस्तान में आया हुआ है। चाय पीते-पीते ललित मोदी ट्वीट कर रहा है और भारतीय मीडिया पागल हुआ जा रहा है। सीधी सी बात कहूं तो ललित मोदी जो चाह रहा है, वही भारतीय मीडिया में चल रहा है।
पहले सवालों में घिरी, अक्सर विवादों से परे रहने वाली सुषमा स्वराज। सुषमा की ललित मोदी को मदद की ख़बर से सुषमा स्वराज सवालों के घेरे में आती दिखाई दी, तो मोदी सरकार के एक साल के कार्यकाल में कुछ बड़ा खोजने की कोशिश कर रही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को तो मानो राजनीतिक ऑक्सीजन मिल गई। सुषमा के बाद विवादों में घिरी धौलपुर की महारानी और वर्तमान में राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे। कांग्रेस आक्रमक थी और बीजेपी बैकफुट पर लेकिन अब ललित मोदी का ट्वीट आया कि उन्होंने गांधी परिवार से भी मुलाकात की थी। राबर्ट और प्रियंका वाड्रा से वे मिले थे। ट्वीट आने की देर थी, बैकफुट पर खड़ी बीजेपी अचानक से आक्रमक हो गई। सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे पर जवाब देने से बचने वाली भाजपा अब कांग्रेस से सवाल कर रही है।
ललित मोदी ट्वीट पर ट्वीट कर रहा है और सत्ता से गलियारों से विपक्ष तक छटपटा रहे हैं। कुछ समाचार चैनल 24 घंटे सिर्फ ललित मोदी के चक्कर में घनचक्कर बने हुए हैं। सवालों में घिरे नेताओं के पीछे साए की तरह लगे हुए हैं। हर एक सेकेंड की रिपोर्टिंग का बखान कर रहे हैं। हमने ये खुलासा किया, हमने ये दिखाया। साथ ही इस इंतजार में हैं कि अब किसी का इस्तीफा हो तो फिर ख़बर का असर दिखाया जाए कि कैसे उनकी ख़बर ने दिग्गजों को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया !
नैतिकता के तकाजे पर इस्तीफा अब पुरानी बात हो गई है। वैसे भी सत्ता का नशा इतनी आसानी से तो नहीं उतरता ! ऐसे में कैसे हाथ आई कुर्सी को कोई कैसे छोड़ दे ? इसके लिए जरूरत होती है साहस की, जो आजकल के राजनेताओं में तो दिखने से रहा।
मतलब साफ है सुषमा और राजे के इस्तीफे के इंतजार में अपनी रात काली कर रहे लोगों को कुछ हासिल नहीं होने वाला। इस्तीफा, वो भी ऐसे वक्त में जब बिहार का विधानसभा चुनाव सामने खड़ा है। अब क्यों बिहार का किला फतह करने की आस लगाए बैठी भाजपा बैठे बिठाए अपने विरोधियों को निशाना साधने का मौका देगी ?


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सोमवार, 22 जून 2015

योग पर धर्म का चश्मा !

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की प्लानिंग से लेकर क्लोजिंग तक योग पर धर्म का तड़का लगा। राजपाथ जब योगपथ में तब्दील हुआ, तो आरएसस से डेप्युटेशन पर बीजेपी में आए राम माधव की निगाहें किसी को तलाश रही थीं। पैंतीस हजार से ज्यादा की भीड़ में आम आदमी को खोजना भले ही आटे में सुई ढ़ूंढ़ने के बराबर हो लेकिन खास पर नज़र पड़ ही जाती है।
शाम ढ़लते ढ़लते राम माधव ट्विटर पर चह-चहाए। योग दिवस पर उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की गैर मौजूदगी पर सवाल खड़े कर दिए। लेकिन क्या है कि अगर तड़के में मिर्च ज्यादा हो जाए तो छींक आने लगती है। राम माधव के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। हालांकि जल्द ही उन्हें गलती का एहसास हुआ और माफी मांगते हुए बाद में उन्होंने अपना ट्वीट डिलीट भी कर दिया। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। राम माधव की छींक से शुरु हुआ मामला सामूहिक सर्दी-जुकाम में तब्दील हो चुका था।
राम माधव की माफी का मतलब ये बिल्कुल नहीं की मुद्दा खत्म हो जाता है।  आखिर माधव के मन की बात सार्वजनिक हो गई थी। ये पता चल चुका था कि  कहीं न कहीं वो हामिद अंसारी की अनुपस्थिति के बहाने धर्म के मुद्दे को हवा देने की कोशिश कर रहे थे।
संयोग देखिए, अपनी ही पार्टी के बड़े नेता अमित शाह का पटना में योग ना करना राम माधव को नजर नहीं आया, लेकिन राजपथ पर योग करते 35,985 लोगों की भीड़ में हामिद अंसारी की अनुपस्थिति उन्हें खल गई।
हैरानी उस वक्त और ज्यादा हुई, जब उपराष्ट्रपति कार्यालय से योग दिवस में हामिद अंसारी के शामिल नहीं होने का स्पष्टीकरण दिया गया कि उन्हें न्यौता ही नहीं मिला था। फिर आयुष मंत्री श्रीपद नाईक बोले, कि अगर किसी कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मुख्य अतिथि है तो राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति को निमंत्रण नहीं दिया जाता।
नाईक साहब आपके तर्क तो अपनी समझ से परे है। दुनिया को न्यौता देकर योग दिवस पर रिकार्ड बनाने की चाहत रखने वाले आप अगर उपराष्ट्रपति को न्यौता भेज देते तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ता ?  
गजब है, आप दुनिया से तो योग करने का आह्वान करते हैं, लेकिन अपने देश के उपराष्ट्रपति को निमंत्रित करने में नियम की किताब खोल कर बैठ जाते हैं।
विडंबना है कि योग को धर्म के चश्मे से ना देखने की अपील करने वाली भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की ही आंखों पर कम से कम योग के मामले पर तो धर्म चश्मा चढ़ा हुआ दिखाई दे रहा है, ऐसे में कैसे दूसरे लोग इनकी बातों पर भरोसा कर अपने-अपने चश्में उतारें ?


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मंगलवार, 16 जून 2015

सुषमा के बहाने, राजनीतिक ऑक्सीजन तलाशती कांग्रेस !

रविवार से ख़बरों में सिर्फ सुषमा स्वराज ही हैं, सुषमा पर आरोप लगे हैं कि सुषमा स्वराज ने ललित मोदी की मदद की। ललित मोदी सुषमा की कृपा से लंदन से पुर्तगाल गए और अपनी बीमार पत्नी के साथ रहने के बाद वापस लंदन आ गए !
सुषमा स्वराज ने ललित मोदी की भारत से पुर्तगाल जाने में मदद की होती और पुर्तगाल पहुंचकर मोदी भारत लौटते ही नहीं, तो समझ में आता कि सुषमा ने ललित मोदी को बीमार पत्नी की मदद के नाम पर भारत से फरार करवा दिया। सुषमा के इस्तीफे की जोर शोर से तब मांग होती, तो समझ में भी आता, लेकिन 2014 के आम चुनाव के बाद से ही राजनीतिक ऑक्सीजन तलाश रही कांग्रेस को तो बस मुद्दा चाहिए था। जो सुषमा-ललित मोदी प्रकरण के बहाने कांग्रेस को मिल भी गया! ऐसे में कांग्रेस क्यों बैठे-बिठाए हाथ आए इस मुद्दे को जाने दे भला ? सुषमा-ललित मोदी प्रकरण के बहाने एक साल पूरा कर चुकी मोदी सरकार को घेराबंदा का मौका जो कांग्रेस को मिला है।
लेकिन कांग्रेस की घेराबंदी कारगर होती नहीं दिख रही है, वजह है सुषमा स्वराज का कद! सुषमा स्वराज इस्तीफा देना चाहें भी, तो शायद ही सुषमा का इस्तीफा मंजूर हो। सुषमा स्वराज का इस्तीफा न सिर्फ सरकार को घेरने की कोशिश कर रही कांग्रेस की बड़ी जीत होगी, बल्कि बीते एक साल में बेदाग होने का दम भर रही मोदी सरकार की एक बड़ी राजनीतिक हार होगी! साथ ही इसके बहाने अगले चार साल तक मोदी सरकार पर कांग्रेस निशाना साधते रहेगी!
ऐसे में सुषमा का इस्तीफे की आस लगाए बैठे लोगों की ये मुराद शायद ही पूरी हो पाए। सुषमा की जगह कोई और छोटे कद का मंत्री होता तो शायद ज्यादा दबाव पड़ने पर उससे इस्तीफा ले भी लिया जाता, हालांकि ये भी भाजपा इतनी आसानी से होने नहीं देती। कुल मिलाकर तो फिलहाल यही कह सकते हैं कि राजनीति की पिच पर मोदी सरकार से सुषमा स्वराज का विकेट गिराना कांग्रेस के लिए टेढ़ी खीर ही साबित होता दिख रहा है।
बहरहाल कांग्रेस बाउंसर पर बाउंसर फेंक रही है, लेकिन सरकार, संगठन और संघ के साथ ही कुछ विपक्षी साथी सुषमा की ढ़ाल बनकर मजबूती से सुषमा के साथ खड़े दिखाई दे रहे है। ऐसे में देखना ये रोचक होगा कि एक साल में मोदी सरकार के खिलाफ बमुश्किल हाथ आए इस मुद्दे को कांग्रेस कितने दिन जिंदा रख पाती है।


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शनिवार, 13 जून 2015

लेकिन इनको शर्म नहीं आती !

सफाई कर्मचारियों की हड़ताल क्या समाप्त हुई, दिल्ली की सड़कों पर सफेद टोपी लगाए आप नेताओं के साथ ही भगवा टोपी लगाए भाजपा नेताओं का हुजूम उमड़ पड़ा। हड़ताल समाप्त होने के बाद सफाई कर्मचारी अपने काम में जुट चुके थे, लेकिन नेताओं का सियासत का कीड़ा शांत नहीं हुआ था। लाव-लश्कर के साथ ये अजब कौम मानो घर से सौगंध खाकर निकली थी कि 48 घंटे में दिल्ली को चमका देंगे। दिल्ली कितना चमकेगी ये तो पता नहीं लेकिन इनकी सियासत जरूर चमकती दिखाई दी।
सफाई कर्मचारियों की हड़ताल के दौरान जब पूर्वी दिल्ली के लोगों का जीना दूभर हो गया था, सड़कें कूड़े के ढेर से पट चुकी थी। उस वक्त दिल्ली को चमकाने की ख्याल किसी राजनेता के दिल में नहीं आया। कूड़े की सड़ांध इनकी नाक तक नहीं पहुंची थी, लेकिन सफाई कर्मचारियों के काम में जुटते ही इनका ज़मीर भी जाग गया कि दिल्ली तो हमारी भी है, दिल्ली तो देश की शान है, हमें इसको चमकाना है।
इनके कारनामों को देखकर दिल्ली वासियों को शर्म आ गई। कई जगह से दिल्ली वासियों ने इनको खदेड़ा भी, लेकिन इनको शर्म नहीं आई। ये टीवी पर गला फाड़-फाड़ कर बेशर्मों की तरह एक-दूसरे पर आरोप मढ़ते रहे।
स्वच्छ भारत का प्रधानमंत्री मोदी का नारा जब दिल्ली में ही दम तोड़ने लगा था तो भी दिल्ली के मोदी भक्त भाजपा कार्यकर्ताओं की नींद नहीं टूटी। हैरानी तो उस वक्त भी हुई, जब स्वच्छता पसंद पीएम मोदी को भी बदसूरत होती दिल्ली नज़र नहीं आई।
ऐसा ही कुछ हाल आम आदमी की पार्टी होने का दावा करने वाली आपनेताओं का भी था, जो हाथ में झाड़ू उठाने से कतराते दिखाई दिए, वही झाड़ू जिसके दम पर आप ने दिल्ली से भाजपा और कांग्रेस का सफाया कर दिया था।
सियासत का ये रंग कोई नया नहीं है, अलग-अलग मौकों पर राजनेताओं को सियासी रंग बदलते जनता ने कई बार देखा है, ये सब देख जनता को शर्म आ जाती है, लेकिन शर्म इन्हें नहीं आती !


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शुक्रवार, 12 जून 2015

भूख नहीं कमबख़्त सियासत मार देती है !



पापी पेट का सवाल है, वरना कौन कमबख्त तन को झुलसा देने वाली गर्मी में जी तोड़ मेहनत करता। अगर पापी पेट ना हो, तो दिन-रात खून-पसीना एक करने की ज़रूरत ही ना पड़े, लेकिन इतनी जद्दोजहद के बाद अगर मेहनताने के लिए भी आंदोलन का रास्ता अख्तियार करना पड़े, तो क्या ?
पूर्वी दिल्ली में सड़क किनारे जगह-जगह लगे कूड़े के ढ़ेर इस आंदोलन की कहानी खुद बयां कर रहे हैं। खास बात ये, कि हक की इस लड़ाई में सबसे ज्यादा नुकसान भी लड़ने वालों का ही होता है। फिर आम जनता तो है ही उस घुन की तरह है जो आटे के साथ हमेशा से पिसती आई है।
अगर कोई फायदे में है, तो वह है, इस लड़ाई के दूसरे सिरे पर खड़ी सरकार और सत्ता की लालसा लिए राजनीतिक दल, जिन्हे सफाई कर्मचारियों की परेशानी में भी अपना वोट बैंक दिखाई पड़ रहा है। सफाई कर्मचारियों की इस परेशानी में वे भले ही तन से साथ खड़े होने का दम भर रहे हैं, लेकिन असल में सियासी कौम अपने सियासी नफे नुकसान के गणित में उलझी हुई है।
इस जंग का आगाज़ करने वाले पूर्वी नगर निगम के सफाई कर्मचारियों के घर में खाने के लाले पड़े हुए हैं लेकिन घर से भरपेट नाश्ता कर इनके आंदोलन में शामिल होने वाले राजनीतिक दलों के नुमाईंदे एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का खेल खेल रहे हैं।
सफाई कर्मचारियों के साथ ही इस लड़ाई का असर झेल रही आम जनता की दुश्वारियों से बेख़बर राजनेता अपनी-अपनी सियासत चमकाने में बेहद व्यस्त हैं। कुछ एसी कमरों में बैठकर प्रेस कांफ्रेंस कर एक दूसरे पर निशाना साध रहे हैं तो कुछ लाव-लश्कर के साथ धरना स्थल पर ही इनके सबसे बड़े हिमायती नज़र आ रहे हैं।
राजनीति को बदलने का सपना दिखाकर आम आदमी के नारे के साथ दिल्ली की सत्ता में काबिज अरविंद केजरीवाल सरकार हो, दिल्ली में नाम की विपक्षी पार्टी भाजपा या फिर राजनीतिक ऑक्सीजन तलाश रही कांग्रेस, सभी इनकी समस्या की बात कर रहे हैं, समाधान की नहीं ! हां, समाधान के सवाल पर गेंद एक-दूसरे के पाले में सरकाने में जरूर इनका कोई सानी नहीं है।
हालांकि दिल्ली सरकार को हाईकोर्ट की फटकार के बाद दो दिनों में बकाया वेतन के एमसीडी अधिकारियों के आश्वासन के बाद आखिर सफाई कर्मचारियों ने अपनी हड़ताल समाप्त करने का ऐलान जरूर किया है, लेकिन इसके बाद भी सवाल ये उठता है कि आखिर ऐसी नौबत ही क्यों आन पड़ी ? इस सवाल का जवाब शायद ही कोई राजनेता दे पाए। साफ है, मेहनत करने वालों को भूख नहीं कमबख़्त सियासत मार देती है !


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बुधवार, 10 जून 2015

बिहार- सत्ता के लिए जहर का प्याला !

बिहार में चुनाव में बस अब थोड़ा वक्त बचा है, ऐसे में सत्ता के महायुद्ध की तैयारियां भी जोर पकड़ने लगी हैं। बिहार का चुनाव हमेशा से ही दिलचस्प रहा है, लेकिन इस बार बिहार चुनाव के नतीजे सिर्फ सरकार बनाने के गुणा-भाग तक ही सीमित नहीं रहेगें बल्कि बिहार के जरिए देश में राज करने वालों का राजनीतिक भविष्य भी तय करेगें।
केन्द्र की सत्ता में काबिज होने के बाद भाजपा जहां मोदी लहर के सहारे बिहार में भी भगवा फहराने का सपना देख रही है, वहीं मोदी लहर को हवा करने के लिए बिहार की राजनीति के दिग्गज एक मंच पर आ गए हैं।
ये सत्ता की ही लालसा है कि लालू और नीतिश कुमार की दोस्ती पहले दुश्मन न करे दोस्त ने वो काम किया है गुनगुनाते हुए दुश्मनी में तब्दील हुई और फिर से सत्ता के लिए दोनों दुश्मनी भुला, य़े दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे का राग गुनगुनाते दिखाई दे रहे हैं।
दुश्मनी से वापस दोस्ती का ये सफर कितना हसीन रहेगा इसके लिए दोस्ती का ऐलान करते वक्त लालू प्रसाद यादव के इस बयान से लगाया जा सकता है कि वे बिहार में भाजपा को रोकने के लिए किसी भी ज़हर को पीने के लिए तैयार हैं
ज़हर का प्याला तो सामने था नहीं, मतलब साफ है कि ये ज़हर और को नहीं बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार हैं, जिनके नेतृत्व में लालू की राजद और जदयू ने चुनाव लड़ने का फैसला लिया है।
लालू के राज को जंगलराज बताकर जनता का भरोसा जीतने वाले नीतिश कुमार कैसे जनता के बीच लालू के हाथों में हाथ डाल वोट मांगेंगे ये देखना उतना ही दिलचस्प होगा, जितना की लालू का नीतिश को मुख्यमंत्री बनाने के लिए बिहार की जनता से वोट मांगना।
सत्ता की सीढ़ी में अपनी पीढ़ी को चढ़ाने में विश्वास रखने वाले लालू प्रसाद यादव के लिए परिवारवाद से बाहर निकलना इतना आसान तो नहीं लगता। आसान होता तो शायद राबड़ी देवी का नाम बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री की सूची में कभी नहीं जुड़ता लेकिन बिहार में ऐसा हुआ और इसे संभव करने वाले लालू ही थे।
बिहार में सत्ता के इस महायुद्ध में योद्धाओं की कमी होती नहीं दिख रही है, निर्णायक न सही लेकिन जातिवाद के तड़के से सत्ता का गणित बिगाड़ने वाले योद्धा भी किंग मेकर बनने का सपना देखने लगे हैं। कभी नीतिश के मांझी  रहे जीतनराम हो या फिर लालू प्रसाद के पप्पू यादव, अपनी अपनी पार्टी से नाता तोड़ने के बाद ये दोनों योद्धा भी नीतिश और लालू की राह मुश्किल करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।
कह सकते हैं कि बिहार में इस बार सत्ता के लिए बिहार के इतिहास की सबसे रोचक जंग देखने को मिलेगी, लेकिन दोस्ती-दुश्मनी-दोस्ती के इस पाठ को बिहार की जनता कितना समझ पाएगी, ये तो चुनावी नतीजे ही तय करेंगे।


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56 इंच के सीने का सच !

मणिपुर में हमारे वीर सैनिकों की शहादत के बदला जिस तरह से भारतीय सेना ने म्यांमार सेना के साथ साझा ऑपरेशन में बड़े पैमाने पर उग्रवादियों के ठिकानों को ध्वस्त कर उनका सफाया करने के बाद लिया, वो 18 वीर जवानों की शहादत के बाद दिल को एक सुकून पहुंचाने वाली ख़बर थी।
ये बात अलग है कि जिस मां-बाप ने अपने लाल को खोया है, जिस बहन ने अपने भाई को खोया है, जिस पत्नी ने अपने सुहाग को खोया है और जिन बच्चों के सिर से उनके पिता का साया उठ गया है, उनका अपना तो कभी लौटकर नहीं आने वाला और न ही उसकी कमी कभी पूरी होने वाली है, लेकिन ये ख़बर उनके दुख को कुछ हद तक कम जरूर करने वाली है।
भारतीय शूरवीरों की इस जवाबी कार्रवाई की चहुं ओर तारीफ हो रही है और केन्द्र की मोदी सरकार भी इसका श्रेय लेने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है। हालात तो ये है कि मोदी की सेना मोदी के 56 इंच के सीने का बखान करते नहीं थक रही है। सोशल मीडिया में मोदी की सेना के साथ ही 56 इंच के सीने का बखान करने में मोदी भक्त भी पीछे नहीं हैं !  
भारतीय सेना की यह जवाबी कार्रवाई निश्चित तौर पर काबिले तारीफ है, जैसा कि कहा जा रहा है कि सीमा पार म्यांमार में भारतीय शूरवीरों ने खुद को खरोंच आए बिना उग्रवादियों के ठिकानों को नेस्तनाबूद करने के साथ ही उग्रवादियों को भी मौत के घाट उतार दिया है, वह वाकई में हर भारतीय का सीने को 56 इंच का कर देती है।
मोदी सरकार इसका जमकर श्रेय ले, कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हो जाती, क्योंकि बात सिर्फ मणिपुर की नहीं है। मणिपुर की बात होगी तो बात कश्मीर की भी होगी। मोदी सरकार म्यांमार की कार्रवाई का श्रेय ले सकती है तो मोदी सरकार को कश्मीर में जो हो रहा है, उसकी भी जिम्मेदारी लेनी होगी ! वो भी तब जब जम्मू-कश्मीर सरकार में पीएम नरेन्द्र मोदी वाली भारतीय जनता पार्टी अहम सहयोगी है।
लेकिन कश्मीर में जो हो रहा है, उसकी जिम्मेदारी लेने के लिए मोदी सरकार का एक भी मंत्री ट्विटर में नजर नहीं आता। तिरंगे की जगह पाकिस्तान के झंडे खुलेआम लहराए जा रहे हैं, पाकिस्तान जिंदाबाद के नारों से घाटी गूंज रही है लेकिन ऐसा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत शायद किसी में दिखाई नहीं देती। अलगाववादी कश्मीर से लेकर दिल्ली तक सरकार और देश के खिलाफ जहर उगलते दिखाई देते हैं लेकिन होता क्या है, ये बताने की शायद जरूरत नहीं है !
कुछ एक भाजपा नेताओं का ज़मीर राजनीति से इतर जागता भी है तो उनका कद इतना छोटा है कि उनकी आवाज अलवागववादियों के नारों की गूंज में ही दम तोड़ देती है !
ऐसे वक्त में 56 इंच के सीने का बखान करने वालों को भी मानो सांप सूंघ जाता है। ऐसा नहीं है कि इस पर बात नहीं होती, बातें बहुत बड़ी-बड़ी होती हैं, लेकिन ये सिर्फ जुबानी जमा खर्च होता है, जो अक्सर ऐसी घटनाओं के बाद सरकार के बचाव में मीडिया में परोस दिया जाता है।
फिलहाल तो यही उम्मीद करते हैं, 56 इंच के सीने का फुलाव कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक एक सा रहेगा, और जिस दिन ये होगा हर भारतीय का सीना भी खुद ब खुद 56 इंच का हो जाएगा।

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शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

भाजपा की शाजिया: हवा के साथ चल !

हवा का रुख जिधर हो, उधर ही चलने में समझदारी है, इस लिहाज से सोचा-समझा जाए तो किरण बेदी के बाद अब शाजिया इल्मी की समझ को न समझने की कोई वाजिब वजह नहीं दिखाई देती है। आम आदमी पार्टी के झंडे तले 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमाने वाली शाजिया  ने पहले आप का झाड़ू छोड़ भजपा का स्वच्छता अभियान का झाड़ू हाथ में थामा और फिर कमल का फूल।
आम आदमी पार्टी में रहते हुए भाजपा समेत दूसरे विरोधी राजनीतिक दलों के खिलाफ मोर्चा लेने वाली शाजिया ने अपने राजनीतिक विरोधियों पर वार करने का कभी कोई मौका नहीं छोड़ा। शाजिया को भाजपा समेत दूसरी विरोधी राजनीतिक दलों में पहले देश का भविष्य अंधकारमय नजर आता था, लेकिन अब यही शाजिया को भाजपा में अपना भविष्य उज्जवल नजर आने लगा है !
भाजपा में शामिल होते वक्त शाजिया क चेहरे की खुशी देखने लायक थी। शाजिया कह रही हैं कि वे चुनाव नहीं लड़ना चाहती, सिर्फ जनता की सेवा करना चाहती हैं। लेकिन शाजिया जी, जरा ये भी बता दीजिए कि क्या बिना राजनीति के जनता की सेवा नहीं हो सकती या फिर भाजपा में रहकर जनता की सेवा ज्यादा अच्छी तरह से हो सकती है !
किरण बेदी की ही तरह भाजपा को कोसने वाली शाजिया का भाजपा में शामिल होने के पीछे महत्वकांक्षाओं का बड़ा पहाड़ है, जिन्हें पूरा करने में फिलहाल के राजनीतिक हालात तो मोदी लहर पर सवार भाजपा पर सवार होने के संकेत दे रहे हैं ! फिर शाजिया ने क्या गलत किया, भाजपा का दामन थाम कर। छह महीने के अंदर पहले दिल्ली की आरके पुरम विधानसभा सीट से और फिर गाजियाबाद लोकसभा सीट से चुनाव में मात खाने के बाद शाजिया को शायद ये बात समझ में आ गई थी कि वर्तमान राजनीतिक हालात में भाजपा से बेहतर विकल्प उनके पास नहीं हो सकता, वो भी विधानसभा चुनाव के वक्त !
आप की टोपी पहनकर कभी भाजपा के कमल को मुरझाने की हर मुमकिन कोशिश करने वाली शाजिया इल्मी अब कमल खिलाने के लिए जी जान लगाती नज़र आएंगी! बहरहाल कड़कड़ाती सर्दी में कोहरे में खोई दिल्ली में हीटर और ब्लोअर न सही, लेकिन दिल्ली का चुनावी मौसम दिल्लीवासियों को खूब गर्मी का एहसास करा रहा है !


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गुरुवार, 15 जनवरी 2015

किरण बेदी मौका भी दस्तूर भी, फिर पीछे क्यों रहना


दिल्ली का नया निज़ाम कौन बनेगा, इसका फैसला तो दिल्ली की जनता ही करेगी लेकिन दिल्ली की सर्द हवाएं चुनावी मौसम में अब गर्माहट का एहसास कराने लगी हैं। किरण बेदी का नया राजनीतिक अवतार दिल्ली की सर्दी पर भारी चुनावी गर्मी का एहसास कराने के लिए काफी है।
समाजसेवी अन्ना हजारे के मंच पर तिरंगा लहराती किरण बेदी के तीखे ट्वीट कभी नरेन्द्र मोदी के प्रति उनकी भावनाओं को बयां किया करते थे। जिनमें से एक में ये भी जिक्र था कि गुज़रात दंगों पर मोदी को एक दिन स्पष्टीकरण देना होगा, लेकिन मोदी का समय बदला तो अब किरण बेदी भी बदली बदली नजर आने लगी हैं। आधिकारिक तौर पर भगवा रंग में रंग चुकी बेदी के इस नए अवतार की झलक तो कई महीने पहले से ही दिखने लगी थी, जब उन्होंने भाजपा और नरेन्द्र मोदी की तारीफ में कसीदे पढ़ने शुरु कर दिए थे।
दिल्ली चुनाव के ऐलान के बाद किरण बेदी का भाजपा का दामन थामने के पीछे की संभावित वजह पर भी बात करेंगे लेकिन पहले ये जानना जरूरी है कि आखिर भाजपा और मोदी के प्रति किरण बेदी का हृदय परिवर्तन कैसे हुआ..?
आखिर क्या वो वजह रही, जिसके चलते बेदी ने कमल का फूल हाथ में ले लिया..?
बेदी इसका जवाब देते हुए कहती हैं कि वे मोदी के प्रेरक नेतृत्व से उन्हें प्रेरणा मिली हैं। अब यहां पर सवाल ये उठता है कि नेतृत्व तो मोदी ने गुजरात में भी किया था लेकिन क्या वो प्रेरक नहीं था या फिर मोदी पीएम बनने के बाद ज्यादा प्रभावी हो गए हैं..?
खैर छोड़िए, माना बेदी की बात में दम है, लेकिन अब सवाल ये उठता है कि क्यों भाजपा में शामिल होने की प्रेरण बेदी को चुनाव के वक्त ही मिली..?
जाहिर है, ये महज एक इत्तेफाक तो नहीं हो सकता !  तो क्या किरण बेदी की राजनीतिक महत्वकांक्षाएं कुछ ज्यादा ही उछाल मारने लगी थी..? क्या बेदी को दिल्ली का सीएम बनाए जाने का जो शिगूफा पहले छिड़ा था, उसने बेदी को भाजपा का दामन थामने के लिए ज्यादा प्रेरित तो नहीं किया..?
वो भी ऐसे वक्त पर जब भाजपा के पास सीएम की कुर्सी के लिए कोई दमदार नेता मौजूद नहीं है, जो भाजपा की राह के सबसे बड़े रोड़ा बनकर उभरे आपअरविंद केजरीवाल को बराबरी की टक्कर दे सके। वैसे भी तमाम ओपिनियन पोल भी मोदी लहर पर सवार भाजपा की दिल्ली में सरकार बनाने की भविष्यणवाणी कर रहे हैं। ऐसे में मौका भी था और दस्तूर भी, फिर किरण बेदी क्यों न इसे हाथों हाथ लेती..?  

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सोमवार, 12 जनवरी 2015

दिल्ली में मोदी जादू या “आप” का झाड़ू ?

दिल्ली को एक बार फिर से मौका मिला है, अपनी सरकार चुनने का। दिल्ली की राजगद्दी में कौन बैठेगा इसका फैसला करने का ! 7 फरवरी को दिल्ली की जनता अपनी सरकार चुनेगी और 10 फरवरी को धुंध में लिपटी दिल्ली की तस्वीर शीशे की तरह साफ हो जाएगी कि आखिर दिल्ली को उसका राजा मिलेगा या फिर दिल्ली की कहानी फिर से वहीं अटक जाएगी जहां से इस नई कहानी की शुरुआत हुई थी। राजनीतिक दल तो बेकरार हैं ही लेकिन दिल्ली की जनता कितनी बेकरार है, ये भी 7 फरवरी को ही साफ हो जाएगा!
चुनाव की तारीख के ऐलान के बहाने एक छोटी सी तस्वीर है, जो वाकई में काफी रोचक है और ये तस्वीर खुद कहती है कि दिल्ली की जंग भी उतनी ही रोचक होगी।
तस्वीर दिल्ली के आरके पुरम विधानसभा क्षेत्र के आरके पुरम सेक्टर 9 के छोटी सी मार्केट की है। दिल्ली के रामलीला मैदान में मोदी की रैली से एक दिन पहले 9 जनवरी 2015 को चाय की दुकान पर काम करने वाला समीर जिसकी उम्र करीब 21-22 वर्ष होगी मुझसे पूछता है कि सर, कल मोदी रामलीला मैदान में आ रहे हैं। मैंने हां में जवाब दिया तो वह तपाक से बोला, मैं तो कल मोदी जी से मिलने रामलीला मैदान जाऊंगा।
अगले दिन 10 जनवरी को मोदी रामलीला मैदान में रैली को संबोधित कर रहे होते हैं तो उस चाय की दुकान का नजारा बदला बदला सा है। मोबाईल पर समाचार चैनल में मोदी का भाषण चल रहा है, और चाय की दुकान वाला मोनू चाय बनाते बनाते मोदी के भाषण को सुन रहा है, वहां खड़े कुछ लोगों का ध्यान भी छोटे से मोबाईल में भाषण देते दिखाई दे रहे मोदी की तरफ ही है। लेकिन दुकान में आज समीर नदारद है, पूछने पर मोनू बताता है कि समीर रामलीला मैदान गया है मोदी को सुनने के लिए !
चाय की दुकान के पास बिजली के खंभे में आम आदमी पार्टी का पोस्टर लगा है। पोस्टर में बताया गया है कि आम आदमी पार्टी के सर्वे में आरके पुरम सीट आम आदमी पार्टी जीत रही है, ऐसे में चुनाव में आम आदमी पार्टी को ही वोट करें !
उसी दिन शाम का वक्त, समय करीब 7 बजे के करीब। कान में अरविंद केजरीवाल की आवाज सुनाई दे रही है। पास जाकर दिखाई दिया कि एक बड़े एलसीडी में केजरीवाल का रिकार्डेड भाषण बज रहा है। साथ ही दिल्ली में केजरीवाल सरकार के 49 दिनों के कार्यों का बखान किया जा रहा है। वहां से आते जाते लोग एक झलक एलसीडी को देखने के लिए रूकते हैं, फिर आगे बढ़ जाते हैं ! चाय की दुकान पर चाय पी रहे लोग भी एलसीडी को निहार रहे हैं, तो पास ही एक दुकान में मोमो खाते हुए लोगों का ध्यान भी एलसीडी की ही तरफ है।
चुनाव की तारीख का ऐलान होने से पहले की दिल्ली की एक विधानसभा की ये तस्वीर बताने के लिए काफी है कि जनवरी में दिल्ली की कड़कड़ाती सर्दी में भी सियासी पारा अपने चरम पर है। ये तस्वीर मोदी लहर के असर की एक झलक दिखाती है, तो दिल्ली में 49 दिन की सरकार के मुखिया रहे अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की पूर्ण बहुमत पाने की ललक भी दिखाती है। दिल्ली की सत्ता पाने के लिए हर कोई बेकरार है, फिर चाहे भाजपा हो, आप हो या फिर अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही कांग्रेस! ऐसे में अब जब चुनावी तारीख का ऐलान हो चुका है तो हर कोई बस मतदाताओं को साधने की जुगत में जुट गया है। वैसे भी इस घड़ी का राजनीतिक दलों ने बड़ी ही बेसब्री से इंतजार किया है।  
कहते भी हैं कि इंतजार का फल मीठा होता है, देखना ये होगा कि इंतजार का ये मीठा फल दिल्ली में किसकी झोली में गिरता है।


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रविवार, 28 दिसंबर 2014

जम्मू-कश्मीर- बनेगी समझौते की सरकार !

मिशन तो 44 का था लेकिन जम्मू कश्मीर में अपने दम पर 25 सीटें जीतना भी भारतीय जनता पार्टी के लिए किसी सपने की ही तरह था, लेकिन चुनावी नतीजों ने भाजपा को इतराने का मौका दे दिय़ा था। मिशन 44 भले ही 25 सीटों पर ही अटक गया हो, लेकिन भाजपा के लिए ये 25 सीटें भी किसी चमत्कार की ही तरह हैं। भाजपा खुशी भले ही मना रही हो लेकिन घाटी में भाजपा का खाता भी न खुलना ये साबित करने के लिए काफी है कि जम्मू कश्मीर में अपने दम पर सरकार बनाने के लिए उसे घाटी की अवाम में विश्वास पैदा करना जरूरी है।
चुनावी नतीजों के बाद पहली बार राज्य में सीटों के मामले में नंबर दो की पोजिशन में खड़ी भाजपा सरकार गठन में फिलहाल किंगमेकर की स्थिति में दिखाई दे रही है। सरकार गठन का कवायद जारी है और भाजपा किसी भी सूरत में हाथ आया ये मौका गंवाना नहीं चाहती। शायद इसलिए ही चुनाव प्रचार के दौरान परिवारवाद को लेकर नेश्नल कांफ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी को कोसने वाली भाजपा अब इन दोनों के साथ मिलकर भी सरकार बनाने की जुगत में जुट गई है। भाजपा को अब तो न ही एनसी से हाथ मिलाने में कोई गुरेज है और न ही पीडीपी से।
राज्य में किसी भी दल को भले ही जनता ने स्पष्ट जनादेश नहीं दिया लेकिन इसके बाद भी सरकार बनाने की जोड़तोड़ अपने चरम पर है। मोदी लहर पर सवार अतिउत्साहित भाजपा अपने कांग्रेस मुक्त नारे को साकार करने के लिए राज्य में सरकार गठन के लिए पूरी ताकत लगा दी है तो 2008 से सत्ता का वनवास झेल रही पीडीपी इस वनवास को ख्त्म करना चाहती है। ऐसे में सत्ता से बेदखल हुए एनसी भी सिर्फ 15 सीटें जीतने के बाद भी सत्ता का हिस्सा बने रहना चाहती है।
शायद इसलिए ही एनसी और पीडीपी को भाजपा से हाथ मिलाने में तकलीफ नहीं है तो इसी तरह 12 सीटें जीतने वाली कांग्रेस को भी पीडीपी या एनसी के साथ जाने से कोई गुरेज नहीं है!
लोकतंत्र में जनता पर एक और चुनाव के बोझ से तो बेहतर है कि राज्य में सरकार गठित हो लेकिन सरकार बनेगी कैसे इस पर संशय फिलहाल बरकरार है! वर्तमान राजनीतिक हालात को देखते हुए चुनाव प्रचार के दौरान एक दूसरे को पानी पी पी कर कोसने वाले राजनीतिक दल अगर हाथ मिलाकर सरकार बना लेते हैं तो हैरानी नहीं होनी चाहिए ! अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षाओं को साधने के लिए राजनीतिक समझौते के गुणा भाग के जरिए कौन जम्मू कश्मीर की सत्ता पर 6 साल का सफर शुरु करेगा इस पर से भी जल्द ही पर्दा हट ही जाएगा लेकिन जम्मू कश्मीर में सरकार गठन की ये गुणा भाग भाजपा, पीडीपी, एनसी और कांग्रेस के साथ ही उन तमाम छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों पर भी जरूर सवाल खड़ा करेगा, जो वोट के लिए चुनाव से पहले जनता के बीच गए तो किसी और वादे के साथ थे लेकिन सत्ता के लिए अपने वादों से पलट गए ! बहरहाल देखना रोचक होगा कि अपने इस फैसले को ये राजनीतिक दल जनता के सामने कैसे जायज ठहराते हैं !

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गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

132 चिराग बुझे, पाकिस्तान नहीं संभला !

पेशावर में जो हुआ, उसके बाद किसी का भी खून खौलना लाजिमी है, पाकिस्तान का भी खून खौला और पाकिस्तान ने भी आतंकियों के सफाए की कसम खाई। पाकिस्तान के खैबर के कबीलाई इलाकों में तिराह घाटी में तालिबान के ठिकानों पर 57 आतंकवादियों को मौत के घाट उतारने की ख़बर भी आई। ये ख़बर 132 मासूमों के माता पिता के दर्द पर तो मरहम नहीं लगा सकती, लेकिन पाक का ये कदम आतंकियों की पनाहगाह बने रहने के आरोपों को कुछ हद तक धोने की तरफ एक बढ़ता हुआ कदम जरूर था। हालांकि ये कदम कितने आगे बढ़ेगा इस पर शक बरकरार था !
शक बरकरार था और कुछ ही घंटों में ये साबित भी हो गया जब पाकिस्तान से एक और ख़बर आई। पेशावर में तालिबान की कायराना करतूत के बाद आतंकियों का खात्मा करने का दम भरने वाले पाकिस्तान से इस ख़बर का आना हैरान करने वाला था। साथ ही पाकिस्तान की बातों पर भरोसा करने का भरोसा तोड़ने वाला भी ! (पढ़ें-एक हाथ में पेंसिल, एक में बंदूक !)
ख़बर ये कि भारत में आतंक फैलाने के आरोपी जकीउर्रहमान लखवी को पाकिस्तान की एक अदालत ने जमानत दे दी है। लश्कर तैयबा का कमांडर लखवी मुंबई हमलों के उन सात आरोपियों में से एक है, जिन पर पाकिस्तान में मुंबई हमलों का केस चल रहा है। लखवी के अलावा अब्दुल वाजिद, मजहर इकबाल, सादिक, शाहिद जमील रियाज, जमील अहमद और यूनस अंजुम को 2009 में गिरफ्तार किया गया था। इन सब पर मुंबई में 2008 में हुए आतंकी हमलों की साजिश रचने का आरोप है। इन हमलों में 166 लोग मारे गए थे जबकि 300 से ज्यादा घायल हुए थे।
आतंकियों के खात्मे की बात करना और 166 लोगों की मौत के आरोपी, जिसके पुख्ता सबूत भारत ने पाकिस्तान को दिए हैं, उसे पाकिस्तान में जमानत मिल जाना वाकई में हैरान करता है। आतंकवाद का दंश झेलने के बाद भी पाकिस्तान का ये रवैया बताने के लिए काफी है कि आतंकियों को समाप्त करने की पाकिस्तान का संदेश सिर्फ और सिर्फ पेशावर में तालिबान के कायराना एक्शन का रिएक्शन भर है ! ऐसा लगता है, पाक में चीजें फिर से पहले जैसी हो जाएंगी और आतंकियों के लिए पाकिस्तान की धरती एक महफूज ठिकाने की ही तरह बना रहेगा !
हाफिज सईद, मुंबई हमले का मास्टरमाईंड से बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है, भारत पेशावर का शोक मना रहा है और वो पाकिस्तान के लोगों के दिल में भारत के खिलाफ ज़हर भर रहा है, भारत को खत्म करने की बात कर रहा है ! लेकिन पाकिस्तान खामोश है, उसे हाफिज़ सईद पाकिस्तान की सम्मानित शख्सियत में से एक है !
ये दोहरा रवैया ही तो है, जो पाकिस्तान को आतंक के मामले में हर बार बेनकाब करता रहा है, लेकिन इस बार लगा था कि शायद पाकिस्तान संभल जाएगा !
वो समझ जाएगा कि जिस राह में वह चल रहा है, वो उसके पैरों को ही लहूलुहान करेगी ! जिस हथियारों की फसल को वो बो रहा है, या बोए जाते देख रहा है, वो उसकी धरती पर ही खून की नदियां बहा देगी !
जिस आतंक की फैक्ट्री को वो अपनी आंखों के सामने फलने फूलने दे रहा है, वो उसका ही घर जला देगी
132 घरों के बुझे हुए चिराग तो फिर कभी रोशन नहीं हो सकते लेकिन लगा था कि खुद की लगाई आतंक की आग में जल रहे पाकिस्तान में इन मासूमों की दर्दनाक मौत के बाद शायद उम्मीदों के दिए जलेंगे और पाकिस्तान आतंक के अंत की लड़ाई के ऐलान को अंजाम तक पहुंचाएगा लेकिन जकीउर्रहमान लखवी की जमानत की ख़बर और हाफिज सईद के जहरीले बोल के बाद उम्मीदों के ये दिए भी अब टिमटिमाने लगे हैं !
उम्मीद तो यही करते हैं कि आतंक की आंधी में उम्मीदों के ये दिए सदा जलते रहेंगे और पाकिस्तान के पेशावर में क्या पूरी दुनिया में किसी घर का चिराग आतंकी हमलों में नहीं बुझेगा !


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