कुल पेज दृश्य

शनिवार, 9 नवंबर 2013

CBI – तोता जो कभी उड़ा ही नहीं !

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने सीबीआई को असंवैधानिक क्या करार दिया सीबीआई की जांच के घेरे में आए नेताओं को तो मानो मुंह मांगी मुराद मिल गयी। बीते दिनों सर्वोच्च न्यायालय के नेताओं के राजनीतिक भविष्य पर विराम लगाने संबंधी फैसले से दहशत में आए जो नेता कल तक न्यायालय को पानी पी पीकर कोस रहे थे। वही नेता अब गुवाहाटी हाईकोर्ट के एक फैसले से फूले नहीं समा रहे हैं। आखिर इस फैसले ने उनके लिए सीबीआई के शिकंजे से बाहर निकलने का एक रास्ता जो तैयार कर दिया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि सीबीआई का गठन कुछ वक्त के लिए गृह मंत्रालय के प्रस्ताव के जरिए किया गया था। 1 अप्रैल 1963 का वो प्रस्ताव न तो केंद्रीय कैबिनेट का फैसला था और न ही उसे राष्ट्रपति की मंज़ूरी थी। लिहाजा वो विभागीय आदेश के अलावा कुछ भी नहीं है। ऐसे में DSPE एक्ट, 1946 के तहत सीबीआई पुलिस फोर्स की तरह बर्ताव नहीं कर सकती। हाईकोर्ट ने कहा है कि सीबीआई पुलिस फोर्स नहीं है, लिहाजा न तो वह जांच कर सकती है और न ही चार्जशीट दाखिल कर सकती है।
2जी मामले में आरोपी पूर्व संचार मंत्री ए राजा समेत कई आरोपियों ने तो इस आदेश के हवाला देते हुए उनके खिलाफ अदालती कार्यवाही रोकने की तक मांग कर डाली। कांग्रेस नेता सज्जन कुमार ने भी 84 दंगों में अपने खिलाफ दाखिल सीबीआई की चार्जशीट और जांच को गैरकानूनी करार देने की मांग की है। चारा घोटाले में जेल की हवा खा रहे लालू प्रसाद यादव की पत्नी राबड़ी देवी भी गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले का स्वागत करती दिखाई दे रही हैं।  
जाहिर है सीबीआई की जांच के घेरे में मौजूद सभी लोगों के लिए गुवाहाटी हाईकोर्ट का फैसला संजीवनी की तरह आया और इसे भुनाने की कवायद भी इन लोगों ने शुरु कर दी थी लेकिन इनकी ये खुशी ज्यादा देर तक नहीं रह सकी और केन्द्र की अर्जी पर सर्वोच्च न्यायालय ने गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले पर 6 दिसंबर तक रोक लगा दी। गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले ने केन्द्र सरकार की नींद उड़ा दी थी ऐसे में इस फैसले के खिलाफ आनन फानन में केन्द्र ने इस फैसले पर रोक के लिए सर्वोच्च न्यायालय में अर्जी दाखिल कर दी ताकि कई अहम मामलों में सीबीआई जांच में कोई रुकावट न आए।
करीब 2500 जांच अधिकारियों समेत करीब 6000 कर्मचारियों वाली सीबीआई हर साल करीब 1000 केसों की जांच करती है, जिनमें से 66 प्रतिशत केस सिर्फ भ्रष्टाचार के ही होते हैं। गुवाहाटी हाईकोर्ट का फैसला निश्चित तौर पर इन केसों को प्रभावित करता और भ्रष्टाचारियों को कुछ हद तक राहत मिलती और उनके हौसले बुलंद होते ऐसे में सरकार का सुप्रीम कोर्ट जाना तो लाजिमी ही था। सीबीआई को सर्वोच्च न्यायालय से फिलहाल संजीवनी तो मिल गयी है लेकिन गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले ने सीबीआई के अस्तित्व पर सवाल तो खड़े कर ही दिए हैं। हैरत की बात तो ये है कि सीबीआई जिसे देश की सबसे बड़ी व विश्वसनीय जांच एजेंसी का तमगा प्राप्त है, वह कभी इस विश्वास को कायम ही नहीं रख पाई। सीबीआई पर सियासी दबाव में काम करने के आरोप लगते रहे तो राजनीतिक दलों पर भी अपने सियासी फायदे के लिए सीबीआई का इस्तेमाल करने के आरोप लगे। केन्द्र सरकारें भले ही इसे नकारते रहे हों लेकिन सर्वोच्च न्यायालय का सीबीआई को पिंजरे में बंद तोते की उपाधि से नवाजना और खुद सीबीआई निदेशक का एजेंसी पर सरकार के दवाब को स्वीकार करना सीबीआई की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता रहा है, लेकिन इस बार तो सीबीआई के अस्तित्व पर ही हाईकोर्ट ने सवाल खड़े कर दिए हैं।
सीबीआई की जांच की धीमी रफ्तार कहें या फिर जांच में बाहरी दखल का असर पिछले पांच सालों में सीबीआई ने 300 से ज्यादा केसों की जांच को इसलिए रोक दिया क्योंकि उनकी तय डेडलाइन पूरी हो चुकी थी। इसके अलावा ऐसे केसों की फेरहिस्त भी लंबी है जिनमें सालों से सिर्फ जांच ही चल रही है। हालांकि सीबीआई ने केसों की जांच रफ्तार को तेज करने के लिए इसकी तय समय सीमा को दो से घटाकर एक साल कर दिया लेकिन इसके बाद भी सीबीआई के पास लंबित केसों की लंबी फेरहिस्त मौजूद है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि सीबीआई कितने दबाव में काम करती है और कितनी स्वतंत्रता और निष्पक्षता से कार्य कर रही है। इसके पीछे एक वजह जांच अधिकारियों और अन्य स्टॉफ की कमी भी हो सकती है लेकिन सिर्फ यही एक वजह का होना समझ में तो बिल्कुल नहीं आता।
बहरहाल आड़े मौके पर सीबीआई को ढाल बनाकर खुद को बचाने वाली सरकार अब सीबीआई को कैसे बचाती है ये तो 6 दिसंबर को ही सामने आएगा जब सरकार सर्वोच्च न्यायालय में सीबीआई को संवैधानिक ठहराने के लिए अपनी दलीलें पेश करेगी।


deepaktiwari555@gmail.com

एक्जिट पोल ने उड़ाई कांग्रेस की नींद !

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से पहले तमाम समाचार चैनलों और एजेंसियों के एक्जिट पोल जहां भाजपा को चुनाव नतीजों से पहले ही खुशी की एक बड़ी वजह दे रहे हैं, वहीं कांग्रेस की मुश्किलों में ईजाफा करते दिखाई दे रहे हैं। एक्जिट पोल पांच राज्यों में से चार प्रमुख राज्यों दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार बनने का दावा कर रहे हैं तो भाजपा का खुश होना लाजिमी भी है, लेकिन कांग्रेस की हार का दावा कर रहे ये एक्जिट पोल कांग्रेस को रास नहीं आ रहे हैं, शायद इसलिए ही कांग्रेस ने चुनाव आयोग की उस राय से झट से अपनी सहमति जता दी, जिसमें चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक दलों से चुनाव पूर्व होने वाले एक्जिट पोल पर बैन लगाने पर राय मांगी थी। कांग्रेस भले ही इसके पीछे ये तर्क दे रही है कि ऐसे सर्वे जनता के फैसले को प्रभावित करते हैं, लेकिन कहीं न कहीं कांग्रेस की इस मांग के पीछे एक डरी हुई कांग्रेस नजर आ रही है।
2014 के आम चुनाव से पहले काफी अहम माने जा रहे पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव पूर्व एक्जिट पोल में चार प्रमुख राज्यों में से दो राज्यों दिल्ली और राजस्थान में सत्ता में काबिज और दो राज्यों मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सत्ता पाने को बेकरार कांग्रेस की संभावित हार से कहीं न कहीं कांग्रेस क्या कांग्रेस की जगह कोई दूसरा राजनीतिक दल होता तो शायद फिलहाल चुनाव पूर्व एक्जिट पोल पर उसका यही नजरिया होता, जो अभी कांग्रेस का इन सर्वे को लेकर है।
ऐसे सर्वे जीत की आस लगाए बैठे किसी भी राजनीतिक दल का मनोबल तोड़ने के लिए काफी है और यही अभी कांग्रेस के साथ भी हो रहा है। लेकिन कांग्रेस के पास इसका जवाब नहीं होगा कि आज से पहले जिन सर्वे में कांग्रेस की संभावित विजय दिखाई जाती थी उस वक्त तो कांग्रेस को ये सर्वे खूब भाते थे और कांग्रेसी इस पर खूब इतराते थे।  
कांग्रेस घबराई हुई है तो एक्जिट पोल में चार प्रमुख राज्यों में अपनी संभावित जीत देख रही भाजपाई खूब इतरा रहे हैं, इसलिए भाजपा को चुनाव पूर्व एक्जिट पोल से कई आपत्ति नहीं है और भाजपा की मानें तो कांग्रेस का इसको बैन करने के पक्ष में इसलिए है, क्योंकि वो अपनी संभावित हार से बौखला गई है। शायद इसलिए ही भाजपा के पीएम इन वेटिंग नरेन्द्र मोदी ये तक बोल गए कि अगर कांग्रेस एक्जिट पोल सर्वे पर बैन लगाने की बात कह रही है तो क्यों ना चुनाव आयोग और न्यायालयों पर भी पाबंदी लगा दी जाए?
भाजपा का ये सवाल तो जायज है लेकिन भाजपा नेताओं को ये नहीं भूलना चाहिए कि अगर ये सर्वे के नतीजे उल्ट होते तो शायद भाजपा अभी कांग्रेस वाली स्थिति में होती और इन सर्वे को बेबुनियाद बताने का कोई मौका नहीं छोड़ती। 
वैसे सवाल तो ये भी उठता है कि क्या चुनाव पूर्व एक्जिट पोल के नतीजे जनता को बरगला सकते हैं और बरगला सकते हैं तो किस हद तक..? कांग्रेस का तो यही मानना है कि ऐसा हो सकता है और ऐसे सर्वे जनता के फैसले को प्रभावित करते हैं लेकिन मेरा व्यक्तिगत तौर पर ये मानना है कि आज का मतदाता सर्वे में दिखाई जाने वाले संभावित जीत या हार को ध्यान में न रखते हुए स्थानीय मुद्दों और अपने क्षेत्र के प्रत्याशी को ज्यादा तरजीह देते हैं और उसी के आधार पर अपने मत का प्रयोग करते हैं। कैडर वोट के मामले में हम इसे लागू नहीं कर सकते क्योंकि कैडर वोट तो पार्टी को मिलना ही मिलना है फिर चाहे पार्टी का प्रत्याशी कितना ही अच्छा या खराब क्यों न हों।  
लेकिन इससे भी बड़ा सवाल तो ये है कि क्या वाकई एक्जिट पोल के नतीजे पक्षपात पूर्ण होते हैं? सर्वे के नतीजों की निष्पक्षता पर सवाल हमेशा से उठते रहे हैं लेकिन अगर सर्वे के संपूर्ण रॉ डाटा को भी संबंधित एजेंसियां सार्वजनिक करे तो कुछ हद तक इस सवाल को जवाब तो मिल ही सकता है। ये बात अलग है कि जिस पार्टी की संभावित हार दिखाई जाएगी उसके नेता तो हमेशा ही इन सर्वे के निष्पक्ष होने पर सवाल उठाते रहेंगे। वैसे भी ये सर्वे सैंपल के आधार पर होते हैं और उसी के आधार पर पूरे प्रदेश की सभी सीटों में किसी भी पार्टी की संभावित जीत या हार का आंकलन एजेंसियां करती हैं। इन सर्वे के आधार पर हम पूर्ण रूप से ये नहीं मान सकते की फलां राज्य में फलां दल की सरकार बनेगी ही क्योंकि जनता ने कई बार इन एक्जिट पोल को गलत भी साबित किया है।
बहरहाल सर्वे चाहें कुछ कह रहें हों, किसी को खुश की वजह तो किसी को दुखी कर रहे हों, लेकिन असल फैसला तो जनता की अदालत में ही होगा ऐसे में देखना रोचक होगा कि 8 दिसंबर को किसके चेहरे पर जीत खुशी होगी और किसके चेहरे पर हार का गम।


deepaktiwari555@gmail.com

गुरुवार, 7 नवंबर 2013

दीपावाली पर तोहफे की खुशी

दीपावाली से दो दिन पहले की बात है, एक पार्सल बुक कराने के लिए पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के पार्सल कार्यालय कम गोदाम में जाना हुआ। कर्मचारी से लेकर वहां रहे वहां रखे पार्सल सब कुछ अस्त व्यस्त ही नजर आ रहे थे। पार्सलों के बीच से जैसे तैसे में अंदर दाखिल हुआ तो नजारा कुछ यूं था। एक कर्मचारी पार्सल के ऊपर ही आराम से पालती मारकर बैठा हुआ था तो दूसरा वहां रखी एक मेज पर। एक तीसरा व्यक्ति हाथ बांधकर खड़ा हुआ था। पास ही पड़ी एक दूसरी मेज पर रंगीन कागजों में लिपटे कुछ गिफ्ट पैक रखे हुए थे। कुछ ड्राई फ्रूट टाईप पैकेट दिखाई दे रहे थे और साथ में कुछ बड़े बड़े पैकेट भी थे। जो शायद आज ही इन्हें मिले थे। कर्मचरियों के बीच दीपावली के गिफ्ट को लेकर चर्चा जोरों पर थी।
उसके कुछ अंश इश प्रकार हैं।
पहला कर्मचारी – यार दीपावली को सिर्फ दो दिन बचे हैं, लेकिन इस बार गिफ्ट बहुत कम मिले हैं।
दूसरा कर्मचारी – हां यार, जो गिफ्ट मिले भी हैं, वो बड़े छोटे – छोटे और सस्ते हैं।
तीसरा कर्मचारी निश्चिंत भाव में – अरे यार अभी दो दिन बाकी हैं दीपावाली पर और गिफ्ट आएंगे अभी तो।
कर्मचारियों की गंभीर चर्चा में दखल देते हुए मैंने बीच में अपना एक पार्सल बुक कराने के लिए उनको टोका तो उनकी शारीरिक भाषा देखकर ऐसे लगा जैसे मैंने कोई बड़ी भूल कर दी। खैर मेरा 10 मिनट के काम में उन्होंने दो घंटे लगा दिए और बीच बीच में उनके दीपावाली के तोहफों की चर्चा जारी रही, जो समय बीतने के साथ चिंता में तब्दील होती जा रही थी।
इसी बीच एक शख्स वहां पहुंचा तो सभी कर्मचारियों को बांछें खिल गयी। वो उसे देखते ही अपनी कुर्सी से खड़े होकर उसे दीपावली की बधाई देने लगे। दरअसल उस शख्स के साथ एक लड़का था जिसके हाथ में चमकदार रंगीन कागजों में लिपटे ड्राई फ्रूट के डिब्बे और कुछ दूसरे उपहार थे। उस शख्स ने एक कागज निकाला और सबके नाम के आगे पैन से कुछ लिखा और कर्मचारियों को दीवाली की बधाई के साथ ही तोहफे देने लगा। इसकी क्या जरुरत थी, ऐसा बोलते हुए बड़े ही सहज भाव से सभी कर्मचारियों ने अपना काम छोड़ पहले तोहफे स्वीकार कर लिए।
ये वाक्या बहुत ही आम है, जो आपने भी दीपावाली पर अपने आस पास देखा होगा। आपको भी दीपावाली पर इस तरह के तोहफे मिले होंगे, मुझे भी मिले हैं। लेकिन जिस रेलवे पार्सल कार्यालय के बहाने मैं तमाम ऐसे सरकारी दफ्तरों में दीपावाली से पहले होने वाले तोहफों की सुगबुगाहट और चर्चा की बात कर रहा हूं वह सिर्फ दीपावाली पर तोहफों के मिलने का एक आम घटनाक्रम तो बिल्कुल भी नहीं दिखाई देता है।
जाहिर है जो लोग तोहफों की लालसा पाले बेकरारी से तोहफों का इंतजार करते हैं वो उन तोहफों के बदले सालभर तोहफे बांटने वाले के लिए काफी कुछ करते होंगे। तोहफे बांटने वालों के कई ऐसे काम आसानी से कर देते होंगे, जो या तो नियमों के खिलाफ होते होंगे या फिर इससे उन्हें मोटा मुनाफा होता होगा। वैसे भी आज के समय में ऐसे ही कोई मुफ्त में किसी को क्यों तोहफे बांटेगा..?
दरअसल ये तोहफे बांटने वालों के एक तरह का इन्वेस्टमेंट होता है, जिसे वे दीपावाली के मौके पर करते हैं और फिर सालभर इस इन्वेंस्टमेंट का रिटर्न लेते रहते हैं। वैसे इसे देशी भाषा में रिश्वत कहते हैं, जो कि गैर कानूनी है लेकिन दीपावाली पर दिया गया तोहफा न तो रिश्वत कहकर दिया जाता है और न ही रिश्वत कहकर लिया जाता है, इसे तो बस मिठाई कहा जाता है, जो खूब खिलाई भी जाती है और खाई भी जाती है।
खास बात तो ये है कि मलाईदार पदों पर बैठे कई आला अधिकारियों को ये नजराने हरे हरे नोटों के रूप में मिठाई के डिब्बे में बंद कर दिए जाते हैं और इसे भी नाम मिठाई का ही दिया जाता है वैसे भी देखना वालों के लिए तो ये मिठाई का ही डिब्बा है। बहरहाल जिन्हें इस तरह के खूब तोहफे मिले उनकी दीपावाली तो खूब रोशन रही लेकिन जिन्हें कम तोहफे मिले वे बेसब्री से अगली दीपावाली का इंतजार जरुर कर रहे होंगे।

फिलहाल तो सभी मित्रों को मेरी तरफ से दीपावली की शुभकामनाएं


deepaktiwari555@gmail.com

गुरुवार, 31 अक्टूबर 2013

मोदी रन – पार्ट 2


(जरुर पढ़ें - मोदी रन PART-1)
कर्नाटक में भ्रष्टाचार के कुहासे में कहीं गुम हो गई भाजपा की साख को खोजते खोजते मोदी ने कर्नाटक को पार तो कर लिया लेकिन कर्नाटक के आगे की राह मोदी के लिए और भी कांटों भरी थी क्योंकि कर्नाटक के बाद मोदी की गाड़ी आंध्र प्रदेश में जो प्रवेश कर रही है। आंध्र प्रदेश, जहां की 42 लोकसभा सीटों में से 33 पर कांग्रेस का कब्जा है, वहां पर हाल ही में जेल से छूटे वाईएसआर कांग्रेस के जगनमोहन रेड्डी को साथ लेकर अपनी नैया पार लगाने की कोशिश में लगी भाजपा को पार लगाने में भी मोदी को पसीने छूट रहे हैं। मोदी रन में आंध्र प्रदेश को डिजाईन भी कुछ इस तरह किया गया है कि मोदी आसानी से आंध्र का किला फतह न कर पाएं लेकिन यहां मोदी समर्थकों को निराश होने की बिल्कुल भी जरुरत नहीं है, क्योंकि यहां तो रीटेक के कई मौके हैं और एक बार गिर पड़े तो फिर से उसी रास्ते पर चल पड़ो, यहां कौन रोकने वाला है। हां इतना जरूर है कि इस बार यहां पर तेलंगाना का मसला भी नए गुल खिलाने की ओर संकेत दे रहा है। अब ये क्या रंग लाएगा ये तो वक्त ही बताएगा फिलहाल तो रीटेक के साथ गिरते पड़ते मोदी ने आंध्र को भी पार कर ही लिया है।
आंध्र के बाद मोदी रन ने बिहार में एंट्री मारी है, वही बिहार जिसकी 40 लोकसभा सीटों में से 20 पर जदयू का कब्जा है तो 12 सीटें भाजपा के भी पास हैं और कांग्रेस सिर्फ 2 पर ही सिमटी हुई है। वही बिहार जो केन्द्र की राजनीति की दशा और दिशा तय करता है। वही बिहार जहां भाजपा के मुताबिक उसे राजनीति में बेवफाई मिली है, वही बिहार जिसके मुख्यमंत्री को मोदी फूटी आंख नहीं सुहाते, वही बिहार जहां मोदी का स्वागत धमाकों के साथ होता है, वही बिहार जिसके मुखिया मोदी की बातों को झूठा साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। जाहिर है ऐसे में बिहार को पार पाना आसान तो बिल्कुल नहीं है और बिहार के मामले पर तो पूरे देश की निगाहें भी टिकी हैं कि आखिर जनता अपनी अदालत में किसे बेवफाई की सजा देगी मोदी की भाजपा को या फिर नीतिश की जदयू को।
मोदी रन में तो मोदी को बिहार में बहुत ज्यादा दिक्कत पेश आती नहीं दिखाई दी और एक – आद रीटेक के बाद मोदी बिहार को पार कर यूपी को रवाना हो गए, वही यूपी जिसे फतह करने की तैयारी मोदी ने सौंपी है, अपने हनुमान यानि कि अमित शाह को। जाहिर है 80 लोकसभा सीटों वाला उत्तर प्रदेश हमेशा से सबसे अहम केन्द्र रहा है और हमेशा रहेगा। लेकिन क्या इतना आसान होगा मोदी के लिए अपने हनुमान के बूते यूपी को पार पाना, उस यूपी को जहां कि राजनीति धर्म और जातिवाद के मकड़जाल में उलझी हुई है। जो कभी समाजवादी पार्टी की साईकिल में सवार होने से गुरेज नहीं करती तो बसपा के हाथी की सवारी से भी उसे परहेज नहीं है। खास बात तो ये है कि कांग्रेस का हाथ भी इन्हें अपना सा लगने लगता है, तो कमल खिलाने में भी यहां के लोग नहीं हिचकिचाते। 2009 में सपा की 23, कांग्रेस की 21, बसपा की 20 और भाजपा की 10 सीटें भी तो कुछ इसी ओर ईशारा कर रही हैं। लेकिन इस बार तस्वीर कुछ बदली बदली सी है। ऐसे में कौन यूपी के दम पर केन्द्रीय सत्ता में अपना दबदबा बनाएगा ये तो वक्त ही तय करेगा। मोदी भी जब यूपी में पहुंचे तो मानो उनकी राह में कांटों की फसल लहलहा रही थी लेकिन मोदी ने कई रीटेक के बाद ही सही यूपी को आखिर पार कर ही लिया। जारी है...

मोदी रन का सफर अभी बाकी है, तमिलनाडु, असम, मध्य प्रदेश, पंजाब, वेस्ट बंगाल, हरियाणा, ओडिशा जैसे तमाम राज्य से मोदी रन को तो अभी गुजरना है...मिलते हैं बहुत जल्द मोदी रन कि आखिरी किश्त के साथ।

deepaktiwari555@gmail.com

सोमवार, 28 अक्टूबर 2013

धमाके, शिंदे और “रज्जो”


पटना दहल रहा था लेकिन हमारे माननीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे मुंबई में फिल्म रज्जो के म्यूजिक एलबन रीलीज के कार्यक्रम में जाने की तैयारी कर रहे थे। धमाके के घायल अस्पताल में कराह रहे थे लेकिन शिंदे साहब मंच पर फिल्म अभिनेत्री कंगना राणावत के साथ खिलखिला रहा थे। पूरा देश जानना चाहता था कि आखिर क्यों इन धमाकों की कोई भनक तक केन्द्र व राज्य सरकार के साथ ही खुफिया एजेंसियों को नहीं लग पायी लेकिन शिंदे के लिए शायद रज्जो ज्यादा जरूरी थी। कितनी जरूरी इस बात का अंदाजा शिंदे के उस बयान से लगाया जा सकता है जब वे कार्यक्रम के बाद मीडिया के सवालों का जवाब दे रहे थे। (जरूर पढ़ें- क्यों पड़े हो शिंदे के पीछे..?)
बकौल शिंदे समय न होने के बाद भी वे इस कार्यक्रम में पहुंचे थेक्योंकि उनका इस कार्यक्रम में पहुंचने की दिली ख्वाहिश थी। लेकिन घटनास्थल पर जाने का, पटना के अस्पताल में भर्ती घायलों से मिलने का, जांच एजेंसियों के साथ ही पुलिस दोषियों की धरपकड़ के लिए क्या कदम उठा रही है, इसको जानने का शिंदे के पास वक्त नहीं था। गृहमंत्री शिंदे की प्राथमिक्ता में रज्जो के म्यूजिक लॉंचिंग का कार्यक्रम सबसे ऊपर था जबकि धमाकों की पूरी जानकारी लेना शायद उनकी प्राथमिक्ता में नहीं था। शायद इसलिए ही धमाकों के घंटों बाद तक गृहमंत्री साहब के पास धमाकों से संबंधित पुख्ता जानकारी तक नहीं थी।
याद दिलाना चाहूंगा कि ये वही सुशील कुमार शिंदे हैं, जो कोयला घोटाले पर ये कहते हैं कि लोगों की याददाश्त कमजोर होती है और बफोर्स की तरह लोग इसे भी भूल जाएंगे। शायद पटना धमाकों पर भी गृहमंत्री शिंदे कुछ ऐसा ही सोच रहे होंगे इसलिए ही उन्होंने अपनी पटना पहुंचने की बजाए मुंबई वाले कार्यक्रम को ज्यादा तरजीह दी। (पढ़ें - नहीं चाहते दलित गृहमंत्री..!)    
वैसे एक वाजिब वजह और दिखाई देती है देश के गृहमंत्री शिंदे की इस आचरण के पीछे। बात ज्यादा दिन पुरानी नहीं है, जब राहुल गांधी ने एक रैली में कहा था कि खुफिया एजेंसी के एक अधिकारी ने उन्हें बताया कि यूपी के मुजफ्फरनगर में दंगों के बाद से वहां के कुछ मुस्लिम युवकों से पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई संपर्क करने की कोशिश कर रही है। जब देश की खुफिया एजेंसिया गृहमंत्री की बजाए एक सासंद को देश की सुरक्षा से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी दे रही है तो फिर शिंदे क्यों न बेफिक्र होंगे। शायद खुफिया एजेंसियों के लिए गृहमंत्री से ज्यादा कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ज्यादा महत्वपूर्ण होंगे। अब ये क्यों होंगे इसे लिखने की शायद जरुरत नहीं है।

रविवार, 27 अक्टूबर 2013

सुरक्षा में कोई चूक नहीं !

निशाने पर पटना, 7 धमाके, 5 लोगों की मौत, 100 के करीब घायल लेकिन बकौल बिहार मुखिया नीतिश कुमार सुरक्षा में कोई चूक नहीं हुई। धमाके के बाद मीडिया से मुखातिब नीतिश कुमार ने सुरक्षा में चूक की बात से साफ इंकार कर दिया। सुरक्षा में चूक का सवाल शुरु से लेकर आखिर तक कई कई बार नीतिश के सामने आया लेकिन नीतिश ने एक बार भी चूक की बात को स्वीकार नहीं किया।
नीतिश कहते हैं कि किसी भी तरह की ऐसी कोई घटना होने के कोई पूर्व सूचना या अलर्ट किसी भी एजेंसी ने जारी नहीं किया था। इसका मतलब तो ये हुआ नीतिश बाबू की जब आपकी सरकार के पास, खुफिया एजेंसियों के पास किसी तरह की अनहोनी की पूर्व सूचना होगी या इस पर अलर्ट जारी हुआ होगा तो ही सुरक्षा में चूक की बात को स्वीकार किया जा सकता है। लेकिन ये बात समझ में नहीं आयी कि अगर खुफिया एजेंसियों को किसी तरह के धमाके या हमले की पूर्व सूचना मिल जाती है तो फिर क्यों धमाके या आतंकी हमले होते हैं, ऐसे केस में तो किसी भी तरह की अनहोनी कभी होनी ही नहीं चाहिए।
नीतिश जी आप बार बार इसी बात को दोहरा रहे थे कि सुरक्षा में कोई चूक नहीं हुई, चलिए आपकी बात को हम स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन ये बताईए कि आखिर कैसे बिहार की राजधानी पटना निर्दोष लोगों के खून से लाल हो गई..?
कैसे पटना के गांधी मैदान में धमाके कैसे हो गए..?
कैसे रैली स्थल तक विस्फोटक सामग्री पहुंच गई..?
ये खुफिया तंत्र की बड़ी नाकामी तो है ही, लेकिन सवाल नीतिश जी आप पर भी उठते हैं क्योंकि आप बिहार के मुख्यमंत्री हैं। जिम्मेदारी आप की भी बनती है। आप ये कहकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकते कि खुफिया एजेंसियों ने किसी तरह का कोई अलर्ट जारी नहीं किया था और ऐसा बिहार में पहली बार हुआ है। ये सवाल और भी गंभीर इसलिए हो जाते हैं क्योंकि आप सात धमाकों में 5 लोगों की मौत के बाद भी यही कहते हैं कि सुरक्षा में किसी तरह की कोई चूक नहीं हुई है। वो भी ऐसे वक्त पर जब एक दिन पहले ही देश के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी पटना में मौजूद थे, ऐसे में तो सुरक्षा व्यवस्था इतनी ताक चौबंद होनी चाहिए थी कि सात धमाके क्या एक पटाखा भी नहीं फूटना चाहिए था।
नीतिश जी आपको सुरक्षा में चूक नहीं दिखाई देती, आपके मुताबिक सुरक्षा चाक चौबंद थी। लेकिन अगर हिम्मत है तो उन लोगों के परिजनों से आंख में आंखें डालकर ये बात कहिए जिन्होंने अपनों को इन धमाकों में खोया है। सुरक्षा में चूक न होती तो नीतिश जी मारे गए निर्दोष 5 लोग आज रैली के बाद अपने घर पहुंचते लेकिन घर पहुंची तो उनकी मौत की ख़बर।
उम्मीद करते हैं नीतिश जी कि अब जांच में और कोई चूक नहीं होगी और मानवता के दुश्मन, 5 निर्दोष लोगों की मौत के गुनहगार जल्द सलाखों के पीछे होंगे।


deepaktiwari555@gmail.com

मोदी रन PART-1

2014 के भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र दामोदर दास मोदी दौड़ रहे हैं, बेतहाशा दौड़ रहे हैं, बिना रूके दौड़ रहे हैं, गिर कर संभल रहे हैं फिर दौड़ रहे हैं, ये छोड़िए मौका मिलते ही उड़ने से भी परहेज नहीं करते। बस हर हाल में मंजिल पा लेना चाहते हैं, प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच जाना चाहते हैं। आखिर मोदी कहां दौड़ रहे हैं, कहां गिर रहे हैं और कहां उड़ रहे हैं, इस पर बात करने से पहले मोदी के चाहने वालों को जिक्र करना चाहूंगा जो किसी भी सूरत में मोदी को देश के अगले प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं।
मोदी के चाहने वालों को लगता है कि मोदी देश के प्रधानमंत्री बनेंगे तो देश की सारी समस्याओं को चुटकी बजाते ही हल कर देंगे। फिर चाहे वो गिरते रुपए को थामने की बात हो, अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की बात हो, महंगाई को कम करने की बात हो, बेरोजगारी का मसला हो, अपराध मुक्त समाज की बात हो या फिर अपने धूर्त पड़ोसी पाकिस्तान और चीन से सख्ती से निपटने की बात हो। मोदी के चाहने वालों को ये लगने लगा है कि ये सब सिर्फ और सिर्फ नरेन्द्र दामोदर दास मोदी के बूते की ही बात है। जाहिर है ये सब इतना आसान तो है नहीं जितना कि मोदी समर्थक समझ रहे हैं और दूसरों को समझा रहे हैं।   
खैर मोदी की दौड़ जारी है और मोदी के चाहने वाले भी मोदी को खूब दौड़ा रहे हैं और जिस तेजी से ये दौड़ चल रही है, उसे देखकर तो ऐसा लगता है कि मोदी समर्थकों का बस चले तो वे मनमोहन सिंह को हटाकर मोदी को आज ही प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा दें। दरअसल प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए मोदी रन का सफर जारी है। मोदी के गढ़ गुजरात से शुरू हुई मोदी रन देश के सभी राज्यों से होकर गुजर रही है लेकिन मोदी रनगैर भाजपा शासित राज्यों के साथ ही उन राज्यों में मोदी के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही है, जहां पर भाजपा के पास या तो गिनी चुनी सीटें हैं या फिर उन राज्यों में भाजपा की झोली सूनी ही रही है।
मैंने सोचा क्यों न मोदी रन में अपने भी हाथ आजमाएं जाएं। गुजरात से मोदी रन शुरु करते हुए मैंने भी आज मोदी को दौड़ना में कोई कसर नहीं छोड़ी, पहले गुजरात, फिर महाराष्ट्र, फिर उत्तराखंड, नरेन्द्र मोदी को एक पल के लिए भी आराम करने का मौका नहीं दिया। बस दौड़ाते रहा, दौड़ाते रहा, लेकिन ये क्या जैसे ही राजस्थान आया मोदी की तो मानो रफ्तार ही थम गयी। दो कदम दौड़ते ही मोदी धड़ाम से नीचे गिर जाते। समझ में नहीं आया कि आखिर राजस्थान का किला फतह करने में क्यों मोदी को पसीने आ रहे हैं। 2009 के आम चुनाव के नतीजे उठाकर देखा तो समझ में आया कि यहां तो 25 में से 20 लोकसभा सीटें कांग्रेस के कब्जे में हैं, जबकि भाजपा के पास सिर्फ 4 लोकसभा सीटें है और एक बची हुई सीट निर्दलीय के कब्जे में है। जाहिर है 4 से 25 न सही 20 में भी अगर पहुंचना है तो दम तो लगाना ही पड़ेगा और ये राह इतनी आसान भी नहीं, शायद इसीलिए ही मोदी को राजस्थान पार करने में पसीना आ रहा है।
मैंने सोचा ऐसे तो मोदी प्रधानमंत्री कैसे बन पाएंगे, कैसे अपने पीएम इन वेटिंग के टिकट को कनफर्म कर पाएंगे। अभी तो राजस्थान में ही एंट्री की है, इसके बाद तो आंध्र प्रदेश है, बिहार है, उत्तर प्रदेश है, कर्नाटक है, तमिलनाडु है और न जाने कितने ऐसे राज्य जहां की डगर मोदी के लिए आसान तो बिल्कुल भी नहीं रहने वाली।
खैर गिरते – पड़ते मोदी ने आखिरकार राजस्थान का किला भी फतह कर ही लिया। राजस्थान के बाद मोदी पहुंचे केरला लेकिन यहां तो हालात और भी मुश्किल निकले। मुश्किल होते भी क्यों न यहां की 20 लोकसभा सीटों में भाजपा शून्य जो है, जबकि कांग्रेस 13 सीटों की मालिक है। गिर कर उठने के फिर से दौड़ में शामिल होने के कई मौके थे, लिहाजा ये पड़ाव भी पार हो गया लेकिन इसके बाद आया भाजपा का दक्षिण का वो किला जिसे भाजपा ने बमुश्किल फतह किया था लेकिन अब वो बीते जमाने की बात हो गयी है। वर्तमान में भले ही भाजपा के पास कुल 28 में से 19 सीटें हों और कांग्रेस 6 सीटों की मालिक हो, लेकिन इसी साल कर्नाटक में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे जो भाजपा को 2008 की 110 विधानसभा सीटों से 40 सीटों पर ले आए, ये बताने के लिए काफी हैं कि 2014 में भाजपा के लिए 2009 का इतिहास दोहराना बिल्कुल भी आसान नहीं होगा। जारी है...

मोदी रन में आज तो फिलहाल में कर्नाटक तक ही पहुंच पाया, अभी तो कई राज्य बाकी हैं, जल्द लौटता हूं मोदी रन PART -2” के साथ।


deepaktiwari555@gmail.com

शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2013

पीएम बनने लायक सोच तो लाईए राहुल जी

कांग्रेस युवराज राहुल गांधी मनमोहन सरकार के फैसलों पर सवाल उठाते हुए प्रधानमंत्री की समझ और अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा देते हैं, लेकिन हमारे दिलेर प्रधानमंत्री इसके बाद भी कहते हैं कि वे राहुल को प्रधानमंत्री बनना देखना चाहते हैं और राहुल के लिए किसी भी वक्त पीएम की कुर्सी खाली करने को तैयार हैं। केन्द्रीय मंत्रियों से लेकर कांग्रेस शासित सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और कांग्रेस का हर छोटा बड़े नेता चाटुकारिता की हदें पार करते हुए राहुल के गुणगान करते नहीं आघाते। हर कांग्रेसी को राहुल गांधी देश के पीएम की कुर्सी के लिए सबसे योग्य नेता नजर आते हैं। सोनिया गांधी को भी शायद ये लगने लगा, जिसके बाद सोनिया ने जनवरी 2013 में जयपुर में कांग्रेस के चिंतन शिविर में राहुल को कांग्रेस उपाध्यक्ष के रूप में पार्टी में नंबर दो की कुर्सी सौंप दी गई। लेकिन राहुल बाबा को देखकर ये लगता नहीं कि राहुल गांधी को ये बात समझ में आ रही है। पांच राज्यों के चुनाव प्रचार मे निकले राहुल गांधी बांहे चढ़ाकर लोगों से जिस तरह बात कर रहे हैं, जिस तरह की बातें कर रहे हैं, उससे तो कम से कम यही जाहिर होता है।
राहुल कहते हैं कि कांग्रेस सभी लोगों को साथ लेकर चलती है लेकिन राहुल की चुनावी जनसभाओं को देखकर तो ऐसा नहीं लगता। राहुल कहते हैं कांग्रेस धर्म की राजनीति नहीं करती, लोगों को आपस में बांटने का काम नहीं करती लेकिन राहुल बोल क्या रहे हैं इसका अंदाजा शायद उन्हें भी नहीं है या फिर ये खास वर्ग को लुभाने के लिए कांग्रेस की चुनाव से पहले एक सियासी चाल है..!
राहुल बार बार अपनी दादी इंदिरा गांधी औऱ पिता राजीव गांधी की हत्या का जिक्र कर क्या जताना चाह रहे हैं..? क्या ये वोट के लिए सिर्फ एक भावुक अपील है या फिर से गढ़े मुर्दों को उखाड़ने की एक कवायद जो लोगों के बीच नफरत की आग को और ज्यादा भड़काएगी और एक खास वर्ग को कांग्रेस की तरफ मोड़ेगी..!
मुजफ्फरनगर दंगा पीड़ित दंगे की कड़वी यादों को अपने दिल से निकाल फेंकना चाहते हैं लेकिन राहुल अपनी हर जनसभा में मुजफ्परनगर दंगों को जिक्र कर लोगों के जख्मों को हरा कर रहे हैं..!
जिस राहुल गांधी को देश की सबसे बड़ा राजनीतिक दल का हर एक कार्यकर्ता भावी प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहती है, उस राहुल गांधी के पास क्या जनता के सामने बोलने के लिए कुछ नहीं है। क्यों राहुल गांधी भविष्य की बजाए उस भूतकाल की बात कर रहे हैं जो लोगों को को सिर्फ दुख ही देगा..?
क्यों वे भविष्य की, विकास की, खुशहाली की बात नहीं कर रहे..? क्या राहुल गांधी की सोच को लकवा मार गया है..?
क्यों वो बार बार अपने परिवार की हत्याओं का जिक्र पर वोट के लिए एक भावुक अपील कर रहे हैं और समुदाय विशेष के वोटों के लिए बड़ी मुश्किल से शांत हुई दंगों की आग को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं..?
राहुल को क्यों बार बार जनता को ये याद दिलाने की जरुरत पड़ रही है कि उसने एक गांव में जाकर पानी पिया तो उसका पेट खराब हो गया, गांव में एक रात गुजारी तो मुझे मच्छरों ने काट लिया। किसने बोला था राहुल जी आपको उन गांवों में जाने के लिए। अगर गए तो और कैमरे के सामने पानी पीना पड़ ही गया था, रात गुजारनी पड़ ही गयी थी तो उसके बाद आपने क्या कर लिया। उस एक गांव की ही कायाकल्प कर देते, वहां लोगों को साफ पीने का पानी मुहैया करा देते, उस गांव को उत्कृष्ट गांव बनाकर दिखा देते तो आपको हक होता कि ये बोलने का कि आपने वहां पर जाकर पानी पिया था और एक रात उस गांव में गुजारी थी लेकिन वहां तो हालात आज भी वैसे ही हैं।
राहुल जी भारत की 121 करोड़ जनता का तो पता नहीं लेकिन आपकी पार्टी के कार्यकर्ता और कांग्रेस के चाटुकार नेताओं की फौज के साथ ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तो आपको देश का प्रधानमंत्री बनता देखना चाहते ही हैं, कम से कम उनके सपने को पूरा करने के लिए ही सही प्रधानमंत्री बनने लायक सोच तो लाइए, सोच तो लाईए राहुल जी।


deepaktiwari555@gmail.com

गुरुवार, 24 अक्टूबर 2013

प्याज, सत्ता और मतदाता

प्याज के दामों से सबसे ज्यादा प्रभावित दिल्ली में तो मैं नहीं हूं लेकिन एक और चुनावी राज्य राजस्थान की राजधानी जयपुर में शाम को टहलते वक्त आपस में प्याज की कीमतों पर चर्चा कर रही महिलाओं के एक झुंड ने मेरा ध्यान अपनी ओर जरुर खींचा। चलते चलते में जितना समझ पाया वो यही था कि उनमें से एक महिला आज ही बाजार से प्याज खरीद कर लाई थी और प्याज की कीमतों पर दूसरी महिलाओं का सामान्य ज्ञान बढ़ा रही थी। चारों तरफ चर्चा में सिर्फ प्याज ही है, प्याज की कीमतों पर बहस और चर्चाओं का दौर जारी है तो उन दिनों को याद किया जा रहा है जब लोग सब्जीवाले से बिना दाम पूछे प्याज तुलवा लेते थे।
ऐसे वक्त पर जब पांच राज्यों में चुनावी मौसम अपने पूरे शबाब पर है, सत्ता पाने के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों की मतदाताओं को लुभाने की कोशिशें जारी हैं। प्याज सत्ताधारी दलों के लिए किसी विलेन से कम साबित नहीं हो रहा है। प्याज रूपी विलेन की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार और खाद्य मंत्री के वी थॉमस से मुलाकात कर दिल्ली में प्याज की आपूर्ति में सुधार लाने का अनुरोध करना पड़ा।
दिल्ली की सियासत में प्याज की अहमियत को शीला दीक्षित से बेहतर और कौन समझ सकता है, क्योंकि ये वही प्याज है जिसने 1998 में सत्ताधारी भाजपा को पटखनी देते हुए दिल्ली में अपना झंडा फहराया था। प्याज की आसमान छूती कीमतें शायद शीला को 1998 का वो दौर याद दिला रही होंगी और शायद यही शीला दीक्षित की डर की वजह भी है।
शीला दीक्षित की पूरी कोशिश यही है कि चुनाव से पहले कैसे भी प्याज की कीमतें जमीन पर आ जाएं ताकि प्याज न खरीद पाने की मतदाताओं का गुस्सा कम से कम दिल्ली में मतदान की तारीख 4 दिसंबर को शीला सरकार के खिलाफ न निकले। प्याज के चढ़ते दामों पर शीला की उड़ी हुई नींद का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि शीला ने सस्ते दाम में प्याज बेचने देने के लिए चुनाव आयोग के सामने गुहार लगाई है।
वैसे अच्छी बात ये है कि प्याज की आसमान चढ़ती कीमतों का ये डर आम आदमी से ज्यादा अब राजनीतिक दलों को सताने लगा है, क्योंकि प्याज की कीमतें जितनी चढ़ेंगी नेताओं की कुर्सी जाने का डर भी उतना ही बढ़ता जाएगा। ये डर दिखने भी लगा है और पांच साल तक जनता की सुध न लेने वाली सरकार के मुखिया को अब अचानक से नजर आने लगा है कि प्याज लोगों की थाली से गायब हो रहा है और प्याज के रुप में महंगाई किस कदर सुरसा के मुंह की तरह बढ़ रही है। अब इन्हें लोगों को सस्ते दाम पर प्याज उपलब्ध कराने की चिंता भी सताने लगी है और आम आदमी की पहुंच से दूर हो रहे प्याज को उनकी थाली में लाने का वादा भी ये करने लगे हैं। ये बात अलग है कि सरकार के पांच साल के कार्यकाल में इन्होंने आम जनता की सुध लेने की जहमत तक नहीं उठाई।
बहरहाल चुनावी मौसम में एक बार फिर से प्याज अहम रोल अदा करने जा रहा है, वोट के लिए प्याज की कीमतों को जमीन पर लाने के लिए नेता किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं, वो जमाखोरों औऱ मुनाफाखोरों को जमकर कोस रहे हैं लेकिन बहुत कम लोग ये जानते हैं कि जमाखोरों औऱ मुनाफाखोरों को संरक्षण देने वाले भी ये नेतागण ही हैं ऐसे में देखना ये होगा कि क्या मतदाता इस न दिखाई पड़ने वाले राजनातिक गठजोड़ को समझ पाएंगे और अपने वोट के जरिए ऐसे भ्रष्ट नेताओं को सबक सिखाएंगे..?

deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

लोकायुक्त पर रार !

सरकार किसी की और श्रेय विरोधी ले जाए, ऐसे कैसे हो सकता है। अगर होता दिखाई दे और नेताजी खामोश बैठे रहें ऐसे तो संभव ही नहीं है। भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसने वाले लोकायुक्त अधिनियम को लेकर उत्तराखंड में सत्तापक्ष और विपक्ष में मचा घमासान तो कुछ इसी ओर ईशारा कर रहा है। लोकायुक्त अधिनियम को राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की मंजूरी मिलने के बाद भी जिस तरह से बहुगुणा सरकार ने इसको लागू करने को लेकर लचर रवैया अपनाया है, उसके बाद इस अधिनियम के अधर में लटकने का आसार ज्यादा दिखाई दे रहे हैं। खास बात ये है कि मुख्यमंत्री महोदय को अधिनियम में खामियां नजर आती हैं लेकिन उनकी ही पार्टी के नेता और विधानसभा अध्यक्ष गोविंद कुंजवाल चाहते हैं कि लोकायुक्त कानून को उसके मूल रूप में ही लागू किया जाए और जरुरत महसूस होने पर ही आवश्यक संशोधन किए जाएं।
दो साल पहले लोकपाल को लेकर जब समाज सेवी अन्ना हजारे का आंदोलन अपने चरम पर था ठीक उसी वक्त उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले दोबारा प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाले भाजपा के भुवन चंद्र खंडूड़ी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सशक्त लोकायुक्त लाने का वायदा किया था और उसी के तहत राज्य विधानसभा में इस विधेयक को रखा गया था। जिसे तत्कालीन राज्यपाल मार्गेट अल्वा ने अपनी सहमति देते हुए इसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेज दिया था। जिसके बाद बीती चार सितंबर को राष्ट्रपति ने इस विधेयक पर अपने हस्ताक्षर किए और लोकायुक्त अधिनियम का उत्तराखंड मे लागू होने का रास्ता साफ हो गया।
राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजे जाने और राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने की समयावधि के बीच उत्तराखंड में सत्ता परिवर्तन हो चुका था और 2012 के विधानसभा चुनाव में कांटे के मुकाबले के बाद आखिरकार कांग्रेस राज्य में सरकार बनाने में सफल साबित हुई और मुख्यमंत्री के तौर पर विजय बहुगुणा ने शपथ ली।
सूबे का निजाम बदला तो वह कैसे लोकायुक्त का श्रेय पिछली सरकार को दे सकता था लिहाजा बहुगुणा ने राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद भी लोकायुक्त अधिनियम के कई प्रावधानों पर आपत्ति जताते हुए ये संकेत दिए हैं कि पिछली भाजपा सरकार द्वारा पारित ये विधेयक शायद ही अपने मूल रूप में लागू हो पाए। हालांकि इस पर अखिरी फैसला सात नवंबर को होने वाली बहुगुणा कैबिनेट की बैठक में ही होगा लेकिन मुख्यमंत्री बहुगुणा ये कह चुके हैं कि इस अधिनियम में संशोधन भी किया जा सकता या फिर इसे निरस्त कर नया विधेयक भी लाया जा सकता है।
दरअसल कभी न्यायाधीश रहे मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को निचली न्यायपालिका को लोकायुक्त के दायरे में लाना असंवैधानिक लग रहा है। वहीं मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा ने लोकायुक्त को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इतना सशक्त लोकायुक्त किसी राज्य मे नहीं बना है और इससे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा। साथ ही इसमें किसी तरह के संशोधन को अनुचित ठहराते हुए सरकार से इसे इसके मूल स्वरूप में लागू करने की मांग की है। लेकिन उत्तराखंड में फिलहाल इस लोकायुक्त अधिनियम का लागू होना फिलहाल टेढ़ी खीर नजर आ रही है क्योंकि कांग्रेसी खेमा इसमें भी अपना नफा नुकसान तलाश रहा है।
वर्तमान स्वरूप में इस लोकायुक्त अधिनियम के लागू होने की स्थिति में भ्रष्टाचार पर कितना अंकुश लगता और भ्रष्टाचारियों पर कितनी नकेल कसती ये तो वक्त ही तय करता। लेकिन फिलहाल श्रेय की लड़ाई में भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसने वाला कानून उत्तराखंड में लागू होने से पहले ही दम तोड़ता दिखाई दे रहा है और शायद भ्रष्टाचारी राजनेता भी तो यही चाहते हैं।

deepaktiwari555@gmail.com

राहुल गांधी का डर !

20 जनवरी 2013 को राजस्थान की राजधानी जयपुर में कांग्रेस के चिंतन शिविर में पार्टी का उपाध्यक्ष बनने से पहले राहुल गांधी ने अपनी मां से ये जाना कि सत्ता जहर के समान है, लेकिन आश्चर्य उस वक्त हुआ जब पता चला कि राहुल गांधी ने इसे सिर्फ जाना पर समझा बिल्कुल भी नहीं। कई सवाल खड़े हुए, बहस के कई दौर चले कि अगर सत्ता जहर है तो फिर राहुल  गांधी क्यों इस जहर को पीने के लिए ललायित दिखाई पड़ रहे हैं। एक बार फिर से राजस्थान की धरती पर राहुल गांधी को ये एहसास हुआ है कि सत्ता का ये जहर उन्हें कभी भी निगल सकता है। राहुल गांधी ने जिस तरह से अपनी दादी व देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और अपने पिता व देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या का जिक्र करते हुए अपनी हत्या की आशंका जतायी उससे तो कम से कम यही जाहिर होता है कि राहुल गांधी को अब ये डर भी सताने लगा है कि सत्ता रुपी जहर एक दिन उनकी भी जान ले सकता है।
सवाल फिर खड़ा होता है कि क्या ये सिर्फ एक डर है या फिर सत्ता के लिए मतदाताओं से एक भावुक अपील जो लोगों को डराती है और भावुकता में बहकर एक बार फिर से कांग्रेस को सत्ता सौंपने की बात कहती है। राहुल के मन में चाहे जो कुछ हो लेकिन चुनावी जनसभा में मंच से कही गए राहुल के ये शब्द एक आम आदमी को, खासकर देश के युवा मतदाताओं को बहुत कुछ सोचने पर मजबूर जरुर करती है।
देश का एक युवा नेता जो अघोषित तौर पर 2014 के लिए कांग्रेस पार्टी का घोषित प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार है, वह कांग्रेस में नंबर दो की कुर्सी संभालने के बाद से अपने परिवार की कुर्बानियों का हवाला देते हुए भावुक अपील कर मतदाताओं से वोट मांग रहा है।
क्या इस युवा नेता के पास अपनी सोच के दम पर, अपनी भावी योजनाओं के दम पर, अपने कार्यों के दम पर मतदाताओं से वोट मांगने की कुव्वत नहीं है..?
क्या इस युवा नेता के पास देश के लाखों युवाओं के सपनों को नए पंख लगाने का दम नहीं है..?
क्या इस युवा नेता के पास देश का, शहरों का, गांवों का, हर गली कूचे के विकास का कोई रोडमैप दिखाकर जनता से वोट मांगने का हौसला नहीं है..?
क्या इस युवा नेता के पास एक भ्रष्टाचार मुक्त, भ्रष्टाचारियों मुक्त सरकार देने का भरोसा मतदाताओं को देने का दम नहीं है..?
क्या इस युवा नेता के पास एक अपराध मुक्त समाज देने का भरोसा देश की जनता को देने की हिम्मत नहीं है..?
अगर इऩ सब सवालों का जवाब हां में होता तो शायद 2014 के कांग्रेस के अघोषित तौर पर घोषित पीएम उम्मीदवार राहुल गांधी अपने परिवार में हुई मौतों का हवाला देते हुए सत्ता पाने के लिए भावुकता भरी अपील नहीं करते लेकिन अफसोस ऐसा हुआ नहीं !


deepaktiwari555@gmail.com

सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

सीएम बहुगुणा का खाने का रिकार्ड !

राजनीति में भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार की राजनीति में मस्त भ्रष्ट राजनेताओं को देखकर तो ऐसा लगने लगा था कि नेता सिर्फ भ्रष्टाचार की हांडी में पकने वाले घोटालों के लजीज व्यंजन का ही स्वाद चखते हैं। हर साल, हर महीने एक नई डिश भ्रष्टाचार की हांडी से उतरती है, इसे भ्रष्ट नेताओं से बेहतर और कौन बता सकता है कि हर नई डिश पिछली डिश से भी ज्यादा लजीज होती है। लेकिन आपको जानकर शायद हैरानी होगी कि हमारे ये महान नेतागण खाना भी खाते हैं। न सिर्फ खाते हैं बल्कि यहां पर भी वे खाने के सारे रिकार्ड अपने नाम करना चाहते हैं। दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों का तो पता नहीं लेकिन देवभूमि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा तो कुछ ऐसा ही कर रहे हैं।
दरअसल ये बात निकली उत्तराखंड के हल्दवानी के आरटीआई एक्टिविस्ट गुरविंदर सिंह चढ्ढा की एक आरटीआई से जो उन्होंने उत्तराखंड मुख्यमंत्री आवास और कार्यालय पर बीते एक साल के दौरान चाय पानी पर हुए खर्च की जानकारी को लेकर लगाई थी। मुख्यमंत्री कार्यालय से जो जानकारी मिली उसे जानकर एक बार को आपके भी होश उड़ जाएंगे।
मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा उपलब्ध कराई गयी जानकारी के अनुसार 13 मार्च 2012 को विजय बहुगुणा के उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज होने के बाद से अगस्त 2013 तक मुख्यमंत्री आवास और मुख्यमंत्री कार्यालय में चाय पानी, खाने पीने पर 56 लाख 74 हजार 728 रूपए खर्च किए गए हैं।
कुल 537 दिनों में औसतन एक दिन का चाय पानी, खाने पीने का खर्च 10 हजार 567 रूपए बैठता है। इसमें से मुख्यमंत्री कार्यालय में 27 लाख 34 हजार 153 रुपए खर्च किए गए तो मुख्यमंत्री कार्यालय में 29 लाख 40 हजार 575 रुपए खर्च किए गए। समझ से बाहर है कि आखिर सीएम आवास और कार्यालय में किस किस को क्या खिलाया और खुद खिलाया जाता है कि रोज का हजारों रुपए का खर्च आता है।
उत्तराखंड के सातवें मुख्यमंत्री बनने के बाद से लेकर काम को लेकर कम विवादों के लेकर ज्यादा चर्चा में रहने वाले विजय बहुगुणा के आवास और कार्यालय का 537 दिनों का ये खर्च 56 लाख 74 हजार 728 रूपए तब पहुंचा जब माननीय मुख्यमंत्री देहरादून में कम दिल्ली में ज्यादा रहते हैं।
बहुगुणा साहब को ये रकम भी शायद कम लगती हो क्योंकि जब वे सरकारी विज्ञापन के नाम पर कुछ महीनों में ही करीब 22 करोड़ अपनी छवि चमकाने के लिए पानी की तरह बहा सकते हैं, तो फिर खाने पीने में रोज के 10 हजार 567 रूपए खर्च करना विजय बहुगुणा के लिए कौन सी बड़ी बात है। (जरुर पढ़ें- मीडिया पर मेहरबान बहुगुणा सरकार !)
अगर फ्लैशबैक में जाएं तो शायद इस बात का जवाब हमें वहां पर मिल जाएं कि आखिर बहुगुणा ने ऐसा क्या खाया और खिलाया कि 537 दिनों में उनके आवास और कार्यालय पर खाने पीने पर 56 लाख 74 हजार रूपए खर्च हो गए। 2012 में उत्तराखंड में आपदा के बाद बहुगुणा ने आपदा प्रभावितों को उनके हाल में छोड़ शाही दावत उड़ाते देखे गए थे। इस साल भी जून में भीषण आपदा के बाद भी कुछ ऐसा ही हाल देखने को मिला था। जाहिर है शाही दावतों का दौर जारी रहेगा तो फिर क्यों न सीएम आवास का खर्च 29 लाख 40 हजार 575 रूपए पहुंचेगा और सीएम दफ्तर का खर्च 27 लाख 34 हजार 153 रुपए पहुंचेगा। एक बात और गौर करने लायक है, वो ये कि ये उसी कांग्रेस पार्टी के मुख्यमंत्री हैं, जिनके नेता सीना तान के ये कहते फिरते हैं कि 5 रुपए में एक व्यक्ति भरपेट भोजन कर सकता है।


deepaktiwari555@gmail.com

शनिवार, 19 अक्टूबर 2013

आम आदमी के भी तो सपने हैं

सपने तो सभी देखते हैं, एक सपना ही तो है जो अपना है, जो चाहे देखो, जिसे चाहो देखो, जो मन चाहे वो करो। न तो कोई सपने देखने का टिकट मांगने वाला और न ही आपको सपने देखने से रोकने वाला। ऐसे में अगर यूपी के उन्नाव के डौंडिया खेड़ा गांव में एक साधु शोभन सरकार ने सपने में राजा राम बक्श सिंह के किले में जमीन के अंदर सोने का भंडार देख लिया तो कौन सा गुनाह हो गया..!
ये बात अलग है कि साधु के सपने को मूर्त रूप देने के लिए केन्द्रीय मंत्री चरण दास महंत ने पूरी ताकत लगा दी जिसके बाद केन्द्र सरकार को भी साधु के सपने वाला सोने का भंडार नजर आने लगा और जीएसआई और एएसआई को काम पर लगा दिया कि खुदाई शुरु कर सोना निकाल कर लाओ। खास बात ये है कि डौडिया खेड़ा गांव के साधु शोभन सरकार ने ये सपना गहरी नींद में बंद आंखों से देखा था जबकि केन्द्र सरकार को ये सपना खुली आंखों से ही दिखाई देने लगा है और सरकार को उम्मीद है कि वे जनता से हकीकत में किए वादों को पूरा न कर पाए तो क्या साधु के सपने को पूरा करके ही दम लेंगे।
डौडिया खेड़ा में लगा मेला इसका प्रमाण भी है और जिस तरह से उन्नाव के डीएम ने फावड़ा चलाकर खजाने की खोज में खुदाई का शुभारंभ किया उससे तो यही जाहिर होता है कि सरकार के साथ ही आला प्रशासनिक अधिकारी भी कर्म से ज्यादा सपने में विश्वास रखते हैं।
सपने देखना और उसे पूरा करने की कोशिश करना अच्छी बात है लेकिन सरकार ने इतनी तत्परता अगर रोज रात को भूखे पेट सोने वाले के किसी दिन भरपेट खाना मिलने के सपने को पूरा करने में दिखाई होती तो कितना अच्छा होता।
सरकार ने अगर इतनी तत्परता एक बेरोजगार के नौकरी के सपने को पूरा करने में दिखाई होती तो कितना अच्छा होता।
सरकार ने इतनी तत्परता कर्ज के बोझ तले दबे किसान के खुशहाल जीवन के सपने को पूरा करने में दिखाई होती तो कितना अच्छा होता।
सरकार ने इतनी तत्परता अपराध मुक्त समाज का सपना देखने वाले एक आम आदमी के सपने को पूरा करने में दिखाई होती तो कितना अच्छा होता।
सरकार ने इतनी तत्परता महंगाई के बोझ तले आम आदमी के जरुरी सामान उसकी पहुंच में होने के सपने को पूरा करने में दिखाई होती तो कितना अच्छा होता।
सरकार ने इतनी तत्परता स्विस बैंकों में जमा काले धन को वापस लाने के आम आदमी के सपने को पूरा करने में दिखाई होती तो कितना अच्छा होता।
सरकार ने इतनी तत्परता बिजली, पानी और सड़क से महरूम लाखों लोगों के बिजली, पानी और सड़क के सपने को पूरा करने में दिखाई होती तो कितना अच्छा होता।
सरकार से ऐसे सपनों को पूरा करने की उम्मीद लगाए बैठी इस देश की जनता के सपनों की फेरहिस्त काफी लंबी है, जो न तो नाजायज है और न ही इतनी मुश्किल जिसे पूरा करना किसी सरकार के बस की बात न हो लेकिन इन सपनों को पूरा करने का वक्त हमारी सरकार के पास नहीं है, क्योंकि वे तो कुर्सी के सपने को पूरा करने में ही व्यस्त हैं।
क्योंकि वे तो अपनी तिजोरियों को भरने के सपने देखने और उन्हें पूरा करने में व्यस्त हैं।
क्योंकि वे तो देश की जनता को जाति और धर्म के आधार पर बांट कर राज करने के अपने सपने को पूरा करने में ही व्यस्त हैं।
बहरहाल डौडिया खेड़ा में सपने को सोने में बदलने की कवायद जारी है, सोने के सपने पर भरोसा तो नहीं लेकिन फिर भी उम्मीद करते हैं कि ये सपना पूरा हो। साथ ही ये भी उम्मीद करते हैं कि सरकार साधु के सपने की तरह आम आदमी के उन सपनों को पूरा करने में भी इतनी ही तत्परता दिखाए। जिसके लिए न ही किसी तरह के सर्वे की जरुरत है और न ही किसी खुदाई की। जरूरत है तो सिर्फ ईमानदारी और सपनों को पूरा करने की इच्छाशक्ति की।      

deepaktiwari555@mail.com


शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

देवदूतों का बोलबाला !

आस्था के बाजार में सब कुछ बिकता है, बस आपके पास बेचने का हुनर होना चाहिए और खरीदने वाले की जेब में पैसा। वैसे धर्मस्थलों पर आपने कभी न कभी इस बात का अनुभव जरुर किया होगा। मेरा हाल ही में अजमेर और पुष्कर भ्रमण के दौरान कुछ ऐसा ही अनुभव रहा। हालांकि ये अनुभव मैं इससे पहले भी कई प्रसिद्ध धर्मस्थलों पर ले चुका हूं, लेकिन इस बार का अनुभव इसलिए आपसे साझा कर रहा हूं क्योंकि अब तक मैं समझता था कि ये सब सिर्फ हिंदुओं के धर्मस्थलों पर ही देखने को मिलता है, लेकिन वास्तव में अधिकतर धर्मस्थलों पर देवदूतों की ही तूती बोलती है।
बीते दिनों अपने कुछ मित्रों के साथ विश्व प्रसिद्ध दरगाह शरीफ अजेमर और पुष्कर जाना हुआ। गरीब नवाज़ के दर पर पहुंचते ही यहां भी हमें कुछ लोग ऐसे भी मिले जो आस्था के महाबाजार में आस्था के पुजारियों की जेबों को ढीली करने का कोई मौका नहीं छोड़ते। अचानक से हमारे सामने प्रकट हुए एक महाशय ने भी हमें भीड़ से अलग हटकर बिना लाईन में लगे फटाफट दर्शन कराने का ऑफर दिया। इसके बदले में इन महाशय ने कोई पैसे की मांग तो नहीं कि लेकिन पुष्प हमें खरीदने ही थे, तो ऐसे में ऑफर बुरा नहीं लगा क्योंकि यहां से हमें पुष्कर के लिए भी कूच करना था और शाम तक जयपुर भी पहुंचना था।
खैर हम इन महाशय के साथ हो लिए और भारी भीड़ होने के बावजूद सिर्फ 5 मिनट में हम दर्शन कर फारिग हो गए। वहां भी नजराने के नाम पर पैसों की मांग करने वालों की कोई कमी नहीं थी। नजराने की डिमांड इस कीमत पर की जा रही थी कि ख्वाजा आपकी हर मुराद पूरी करेंगे और आपकी झोली खुशियों से भर देंगे। ये समझ नहीं आया कि क्या बिना नजराने के ख्वाजा अपने दर पर दुआ मांगने वालों की दुआओं को कबूल नहीं करेंगे और उन्हें खाली हाथ लौटा देंगे।
ख्वाजा के दर से हम पुष्कर के लिए रवाना हो गए। पुष्कर की धरती पर अभी हमारी गाड़ी ढंग से रुकी भी नहीं थी कि एक सज्जन हमारी गाड़ी के पास पहुंच गए। गाड़ी से नीचे उतरते ही इन महाशय ने ब्रह्मा जी के मंदिर के साथ ही पुष्कर सरोवर के दर्शन और यहां के धार्मिक महत्व को बताने की कीमत 50 रुपए बताते हुए अपने साथ चलने का अनुरोध किया। पुष्कर के धार्मिक महत्व और इतिहास की पूरी जानकारी देने के बाद ये हमें एक प्रसाद की दुकान पर लेकर गए और प्रसाद खरीदकर पूजा करने के लिए चलने की बात कही। जिसके बाद पुष्कर सरोवर के किनारे हम पांच मित्रों को इन्होंने वहां पर पहले से बैठे 5 अलग अलग पंडितों के पास बैठने के लिए कहा। पंडित जी ने कुछ ही मिनटों में पूजा संपन्न करा दी लेकिन पूजा के दौरान एक बार बीच में भोग के नाम पर 501 से लेकर 5001 तक की भेंट देने का अनुरोध किया और आखिर में अपनी दक्षिणा की मांगी की ताकि पूजा का फल हम लोगों को मिल सके। ये बात इस अंदाज में कह गई कि मानो भोग के लिए पैसे और पूजा कि मुहंमांगी दक्षिणा न देने पर जैसे भगवान हमसे रुष्ट हो जाएंगे और हम दर्शन करने के बाद भी प्रभु की कृपा से वंचित रह जाएंगे। खैर हम सभी ने अपनी-अपनी सामर्थ्य अनुसार पंडित जी को दक्षिणा दी और इसके बाद हम दर्शन के लिए ब्रह्मा जी के मंदिर पहुंच गए। आखिर में ये सज्जन हमें मंदिर के बार स्थित एक देवी देवताओं की प्रतिमाओं की दुकान में भी लेकर गए और लगे हाथों दुकान से सामान खरीदने की सलाह भी दे डाली।
कुल मिलाकर दरगाह शरीफ से लेकर पुष्कर तक मुझे एक ही बात समझ में आयी कि धर्मस्थलों में भगवान के दर्शन हो या न हों लेकिन देवदूतों के दर्शन आपको जरुर हो जाएंगे जो देवों के दर्शन और पुण्य कमाने के नाम पर आपकी जेब ढीली करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं, लेकिन ये बात समझ में नहीं आयी कि निर्मल बाबा की तरह श्रद्धालुओं को प्रभु की कृपा दिलाने का दावा करने वाले इन देवदूतों पर आखिर प्रभु की कृपा क्यों नहीं बरसती।


deepaktiwari555@gmail.com