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मंगलवार, 3 सितंबर 2013

मनमोहन सिंह से बेहतर पीएम और कहां ?

15 अगस्त के बाद लगा था कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सुनने का मौका अब 26 जनवरी को ही मिलेगा लेकिन संसद में कोयला घोटाले पर आखिर प्रधानमंत्री को सुनने का मौका मिल ही गया। कोयला घोटाले से जुड़े दस्तावेज गायब हो गए हैं, ऐसे में सवाल उठने लाजिमी थे। देर से ही सही मनमोहन सिंह ने इस पर आखिर अपनी चुप्पी तोड़ी लेकिन जो प्रधानमंत्री ने बोला उसके बाद लगा कि अगर मनमोहन सिंह बिना कुछ बोले ही विदेश यात्रा पर निकल जाते तो ज्यादा अच्छा था..!
कोयला घोटाले से जुड़ी अहम फाइलों के गायब होने पर प्रधानमंत्री का संसद में जवाब था कि सरकार के पास छिपाने के लिए कुछ भी नहीं है। वैसे देखा जाए तो प्रधानमंत्री ने क्या गलत कहा..? (पढ़ें- अब मेरे राजदां और भी हैं..!)
सरकार के पास छिपाने के लिए है क्या..? जो था वो देश के सामने आ ही गया है। कोयला घोटाला, कॉमनवेल्थ खेल घोटाला, टूजी स्पैक्ट्रम घोटाला और न जाने कौन कौन से घोटाले, सभी तो देश के सामने आ ही गए हैं, जो नहीं आए हैं वो धीरे धीरे सबके सामने आ ही रहे हैं, अब और प्रधानमंत्री क्या छिपाएंगे..?
एक रुपया ही है, लेकिन वो भी डॉलर के आगे घुटने टेक रहा है। पेट्रोल और डीजल है, दोनों सेंचुरी जड़ने की ओर बढ़ रहे हैं..! रोजमर्रा की चीजों के दाम आसमान में पहुंच गए हैं...वाकई में है ही क्या सरकार के पास छिपाने के लिए..? हम बेवजह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कोस रहे हैं, आखिर सब कुछ तो सरकार ने जनता को दिखा दिया, सोने का भंडार तक विदेशियों के लिए खोलने की तैयारी कर ली है और हम कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री को देश की चिंता नहीं है। (जरुर पढ़ें- काश, मनमोहन सिंह वास्तव में पीएम होते..!)
प्रधानमंत्री ये भी कह रहे हैं कि कोयला घोटाले की जांच में सरकार सीबीआई को पूरा सहयोग कर रही है। यहां भी कौन सा प्रधानमंत्री ने झूठ बोला..? ठीक ही तो कहा सरकार सीबीआई को ये बताकर पूरा सहयोग कर रही है कि जांच में किसे क्लीन चिट देनी है और किसे नहीं..? अब प्रधानमंत्री ने यही सच तो बोला उस पर भी हो हल्ला मचा है..! आखिर 80 साल की उम्र में देश चला रहे किसी व्यक्ति पर ऐसे आरोप लगाना ठीक नहीं है। वो भी ऐसे व्यक्ति पर जो फैसले लेने के लिए दूसरों पर निर्भर हो, जो बिना पूछे कोई कार्य न करता हो, जो स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस के अलावा कभी कभार ही अपनी जुबान खोलता हो और कुछ बोले भी तो सामने वाले से बिना झिझक पूछ लेने की हिम्मत रखता है कि ठीक है। अरे भई इससे अच्छा प्रधानमंत्री देश को भला कहां मिल सकता है।

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बुधवार, 28 अगस्त 2013

ये भूख है बड़ी..!

2014 को ध्यान में रखते हुए चार महत्वपूर्ण राज्यों दिल्ली, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस अध्यक्ष और यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने देश के गरीबों का पेट भरने का इंतजाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और लोकसभा में खाद्य सुरक्षा विधेयक ध्वनिमत से पारित हो गया..!
विपक्ष ने भी संशोधन के जरिए जरुर इसमें अपनी भूमिका बनाने की कोशिश की लेकिन वास्तव में विपक्ष चाहकर भी इसका विरोध नहीं कर सकता था लिहाजा ये जानते हुए भी कि ये खाद्य सुरक्षा विधेयक नहीं बल्कि वोट सुरक्षा विधेयक भाजपा सहित तमाम विपक्षी दलों ने इस बिल के रास्ते में अड़चन लगाने के अपने इरादे छोड़ दिए..! हालांकि बिल की टाइमिंग को लेकर भाजपा के मुरली मनोहर जोशी से लेकर सपा के मुलायम सिंह यादव ने जरुर बहस के दौरान अपनी दिल की भड़ास बाहर निकाली..!
खाद्य सुरक्षा विधेयक की अगर बात करें तो इससे देश की 67 फीसदी आबादी को हर महीने 5 किलो अनाज प्रति व्यक्ति के हिसाब से बाजार से कम मूल्य पर दिया जाएगा। चावल 3 रुपये प्रति किलो के हिसाब से तो गेंहू 2 रुपये प्रति किलो के हिसाब से जबकि बाकी अनाजों को 1 रुपये प्रति किलो के आधार पर देश की 75 फीसदी ग्रामीण आबादी और 50 फीसदी शहरी आबादी को दिया जाएगा..!
बहुत अच्छी बात है कि कम से कम कोई गरीब परिवार जैसा सरकार सोच रही है कि भूखा नहीं सोएगा और उस खाने के अधिकार के जरिए सरकारी राशन की दुकान से उसके हिस्से का अन्न मिलेगा लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि जिस नीयत से खाने का अधिकार बिल लाया गया है, क्या वास्तव में क्रियान्वयन तक ये नीयत कायम रह पाएगी..!
देश की 67 फीसदी आबादी यानि की करीब 80 करोड़ लोगों का पेट भरने के लिए अनाज की मांग 5.5 करोड़ मिट्रिक टन से बढ़कर 6.1 मिट्रिक टन हो जाएगी। साथ ही फूड सब्सिडी लागू होने पर सरकार के खजाने पर अतिरिक्त बोझ करीब 20,000 करोड़ रुपये होगा। इसके लिए करीब 6.123 करोड़ टन फूडग्रेन्स की जरूरत होगी और फूड सब्सिडी बिल पर कुल फूड सब्सिडी कवर करीब 1.3 लाख करोड़ रुपये होगा।
क्या दम तोड़ती अर्थव्यवस्था के बीच सरकार इस योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए फंड जुटाने के साथ ही संसाधनों का इंतजाम कर पाएगी..?
क्या 80 करोड़ लोगों का पेट भरने के लिए दिल्ली से जो पैसा चलकर राज्यों में जाएगा और फिर पूरे सिस्टम के जरिए गरीबों तक अन्न पहुंचेगा वह क्या उतनी ही मात्रा में पहुंचेगा और उसकी गुणवत्ता पर कोई बदलाव नहीं आएगा..?
क्या गारंटी है कि दूसरी सरकारी योजनाओं की तरह ये योजना भी भ्रष्टाचार की भेंट नहीं चढ़ेगी..? क्या वास्तव में गरीबों को उनका हक मिल पाएगा और उनके हिस्से का खाद्यान्न पीछे के दरवाजे से निजी गोदामों में नहीं जाएगा..?
ऐसे तमाम सवाल हैं जो खाने के अधिकार के सही क्रियान्वयन को लेकर लगातार जेहन में उठ रहे हैं..! ये सवाल उठने इसलिए भी लाजिमी है क्योंकि इससे पहले भी ऐसी तमाम सरकारी योजनाएं हैं, जो शुरु तो की गयी थी आमजन के लिए लेकिन वास्तविक हकदारों को उन योजनाओं का लाभ कभी मिल ही नहीं पाया..! सबसे बड़ा और सबक लेने वाला उदाहरण भी यूपीए सरकार की एक औऱ महत्वकांक्षी योजना मनरेगाही है, जिसके बूते यूपीए ने सत्ता सुख तो भोगा लेकिन इस योजना ने भ्रष्टाचार के निए नए रिकार्ड खड़े किए..!
121 करोड़ की आबादी वाले जिस देश में भूखों की तादाद ही करीब 45 करोड़ से अधिक हो, भूख से हर रोज हजारों लोग दम तोड़ते हों उस देश को शायद ऐसे किसी योजना की सबसे ज्यादा जरुरत है लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या ये विधेयक भूखे सोने वाले के भूख के डर को कभी पूरी तरह मिटा पाएगा..?
वहीं खाद्य सुरक्षा विधेयक आगामी चुनाव में कांग्रेस के लिए वोट सुरक्षा विधेयक बन पाएगा या नहीं ये तो चुनाव नतीजों के बाद ही तय होगा लेकिन भारत जैसे देश में जिसकी नसों में भ्रष्टाचार का कीड़ा पूरी रफ्तार से दौड रहा है वहां पर ये विधेयक भ्रष्टाचारियों के लिए एक सोने का अंडा देने वाली मुर्गी की तरह दिखाई दे रहा है..!
हालात तो यही बयां कर रहे हैं कि 80 करोड़ लोगों का पेट भरे न भरे लेकिन ये योजना भ्रष्टाचारियों की जेबें जरुर भर देगी..! 80 करोड़ लोगों को खाद्य सुरक्षा मिले या न मिले लेकिन भ्रष्टाचार करने वालों को अपने भविष्य के लिए कालेधन की सुरक्षा जरुर मिलेगी..!
उम्मीद तो यही करते हैं कि ऐसा न हो और 80 करोड़ क्या भारत के एक भी नागरिक को कभी भूखे पेट न सोना पड़े और सोनिया गांधी ने जो प्रतिबद्धता इस बिल को लेकर दिखाई है और जो वादा देश की जनता से किया है वो पूरा हो और भविष्य में कभी किसी सर्वे में ये न कहा जाए कि विश्व के 95 करोड़ भूखों में से लोगों में से 45 करोड़ भारत में हैं..!


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सोमवार, 26 अगस्त 2013

जनता अपना फैसला कब सुनाएगी..?



वो बातें बड़ी बड़ी करते हैं...खुद को देश का सच्चा हितैषी बताते हैंभारत और भारतवासियों के विकास की बातें करते हैं, दम तोड़ती अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की बातें करते हैं..! बेरोजगारी दूर करने के साथ ही महंगाई से निजात दिलाने का वादा करते हैं..! विदेशी बैंकों में जमा कालेधन को भारत में वापस लाने की बात करते हैं, भ्रष्टाचार और अपराध को खत्म करने का भी वादा करते हैं..! धूर्त पड़ोसियों पाकिस्तान और चीन को सबक सिखाने का भी दम भरते हैं..!
इस सब के नाम पर देश की जनता से सत्ता की चाबी सौंपने की अपील करते हैं लेकिन...लेकिन अफसोस जब बारी आती है इस कसौटी पर खुद को साबित करने की तो ये भी उसी जमात में शामिल हो जाते हैं जिनके हाथ से सत्ता खुद को सौंपने की ये जनता से अपील कर रहे होते हैं..!
जाहिर है सभी एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं जो खुद को एक दूसरे से अलग दिखाने के सिर्फ ढोंग ही करते हैं..! कहावत भी है कि चोर-चोर मौसेरे भाई, बात बात पर कुर्सी – मेज तोड़ने वाले ये लोग अपने व्यक्तिगत हितों के लिए सामूहिक रुप से हुंकार भरते हुए संसद में मेज थपथपाने में देर नहीं करते क्योंकि ये इनकी कौम का जो मामला है..!
खुद की जान पर बन आई तो राजनीतिक दलों ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को पलटने में जरा भी देर नहीं की जिसने दागी नेताओं के राजनीतिक भविष्य पर पूर्ण विराम तो नहीं लेकिन विराम लगाने का रास्ता जरुर खोल दिया था..! अपने राजनीतिक भविष्य पर संकट के बादल मंडराते देख आपस में लड़ने वाले सभी दल एक हो गए औऱ जन प्रतिनिधित्व कानून में संशोधन संबंधी प्रस्ताव पर सर्वदलीय बैठक में सभी दलों की सहमति के बाद केन्द्रीय कैबिनेट ने भी इस पर अपनी मुहर लगा दी है..! जिसके बाद अब न तो निचली अदालत से दो साल या अधिक की सजा होने पर सांसदो, विधायकों की सदस्यता रद्द होगी और न ही हिरासत में रहते हुए चुनाव लड़ने पर रोक रहेगी..!
सत्ताधारी दल तो गले तक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है लेकिन विपक्ष क्या कर रहा है..? विपक्ष इस सब का हवाला देकर जनता से 2014 में सत्ता की चाबी मांग रहा है लेकिन जब बात अपने किए किसी एक वादे को ही चुनाव पूर्व पूरा करने की बारी आई तो इन्होंने अपना असली रंग दिखा दिया..! ये अपने दागी साथियों को बचाने के लिए एकसाथ खड़े हो गए और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने की सरकारी कवायद का विरोध करने की बजाए कधे से कंधा मिलाकर चलने में भी इन्होंने जरा सी देर नहीं की..! सत्ता पक्ष के साथ ही क्या भाजपा, क्या सपा, क्या बसपा, क्या जदयू..? समूचा विपक्ष अपने साथियों के व भविष्य में अपने राजनीतिक भविष्य पर मंडराते संभावित खतरे से निपटने के लिए एक ही छतरी के नीचे आ गए..!
आपराधिक इतिहास वाले नेताओं की देश के छोटे बड़े सभी राजनीतिक दलों में कितनी पैठ है इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि मई 2009 की नेशनल इलेक्शन वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक 15वीं लोकसभा में 150 दागी सांसद हैं जिनमें से 73 के खिलाफ गंभीर आरोप हैं। वहीं राज्यों की बात करें तो दागी विधायकों के मामले में झारखंड देश में सबसे अव्वल है, जहां पर कुल विधायकों में से 72 फीसदी (55 विधायक) विधायकों के खिलाफ कोई न कोई आपराधिक मामला चल रहा है। 55 में से भी 24 विधायकों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं। बिहार इस सूची में दूसरे नंबर पर है जहां पर 58 फीसदी (140 विधायक) विधायक दागी हैं जिनमें से भी 84 विधायकों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं। महाराष्ट्र इस फेरहिस्त में 51 फीसदी (146 विधायक) विधायकों के साथ तीसरे नंबर है जिनमें से 56 विधायकों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं। विधायकों की संख्या के साथ चौथे नंबर पर उत्तर प्रदेश विराजमान है, जहां दागी विधायकों का प्रतिशत 47(189 विधायक) है, जिसमें से 98 विधायकों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं।
अन्य राज्यों में भी हालात कुछ जुदा नहीं है और बड़ी संख्या में दागी विधायक राज्य की विधानसभाओं की शोभा बढ़ा रहे हैं। सिर्फ मणिपुर ही इकलौता ऐसा राज्य है जहां पर किसी भी विधायक के खिलाफ कोई भी आपराधिक मामला नहीं है और सभी 60 विधायक बेदाग हैं।
राजनीतिक दलों के चश्मे से देखें तो इन्होंने क्या गलत किया..? कौन अपने भविष्य पर विराम लगने का रास्ता खुला रखना चाहेगा..? वही तो इन्होंने भी किया, सत्ता के लिए आपस में जूतम पैजार तक करने से बाज नहीं आने वाले ये नेता अपने भविष्य पर आंच आते देख एक सुर में गाने लगे..! आंकड़ें चीख चीख कर यही गवाही दे रहे हैं कि अगर राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए एक नहीं होते तो शायद हमारी संसद और देश की तस्वीर ही बदल जाती, जो शायद राजनीतिक दल कभी नहीं चाहेंगे..! सुप्रीम कोर्ट के फैसले को तो इन्होंने पलटने में देर नहीं की पर जनता का फैसला ये नहीं पलट पाएंगे, लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या जनता चुनाव में अपनी वोट की ताकत से दागियों के खिलाफ फैसला सुनाएगी..?  


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गुरुवार, 22 अगस्त 2013

खुश रहने के लिए गालिब ख्याल अच्छा है !

खुश रहने के लिए गालिब ख्याल अच्छा है...ये पंक्तियां भारत सरकार पर बिल्कुल सटीक बैठती दिखाई दे रही हैं..! दरअसल बात सुपर हर्कुलस विमान की हो रही है, जिसे भारत ने पिछले दिनों दौलत बेग ओल्दी क्षेत्र में उतारा है..! हम अपनी ही जमीन में विमान उतारकर ठीक इसी तरह खुश हुए जा रहे हैं जैसे भारत ने अपनी जमीन में नहीं बल्कि चीनी सीमा में घुसकर चीन के इलाके में अपना विमान उतारा हो जबकि इसके उलट चीन की हिमाकत लगातार बढ़ती ही जा रही है..! लद्दाक में बार बार घुसपैठ के बाद चीन ने अरुणाचल प्रदेश में  20 किलोमीटर तक घुसपैठ की..! इतना ही नहीं खबर तो ये भी है कि चीनी सैनिक 2 दिनों तक भारतीय सीमा में रुके भी..!
बीते 8 महीनों मे चीन करीब 150 से ज्यादा बार एलएसी का उल्लंघन कर भारतीय सीमा में घुसपैठ कर चुका है और हम चीन के आगे सिर्फ हाथ जोडकर चीन को ऐसा न करने की विनती ही कर पा रहे हैं..!
जब सरकार से कुछ न हो पाया तो अपने ही क्षेत्र दौलत बेग ओल्दी में सुपर हर्कुलस विमान पहली बार उतार दिया। अपनी ही जमीन पर विमान उतरा कर भले ही हम इतरा रहे हैं लेकिन चीन तो काफी पहले से ही एलएसी के दूसरी तरफ अपनी सीमांत इलाकों को पूरी तरह विकसित करने में लगा हुआ है, जो आने वाले वक्त में भारत के लिए बड़ा खतरा भी बन सकता है..! लेकिन हमारी सरकार को या तो इस बात का आभास ही नहीं है या फिर वह जनबूझकर आंख मूंद कर बैठी है..!
एक तरफ से पाकिस्तान ने पहले ही नाक में दम कर रखा है और दूसरी तरफ से चीनी सैनिक बार बार भारतीय सीमा में घुसपैठ कर भारत को चुनौती दे रहे हैं लेकिन भारत सरकार के रवैये को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे उसे देश की सुरक्षा की कोई परवाह ही नहीं है..!
पाकिस्तान के साथ हम कर क्या रहे हैं...पाक सेना गोलीबारी करती है तो अब हम जवाबी फायरिंग कर दे रहे हैं लेकिन पाक को करारा जवाब देने में हमारी सरकार पता नहीं क्यों अभी भी कतरा रही हैं..! चीन की घुसपैठ बढ़ती जा रही है तो हम अपनी ही सीमा में मालवाहक विमान सुपर हर्क्युलस को उतार कर खुश हुए जा रहे हैं..! दरअल हमारी सरकार में शामिल लोग अपने व्यक्तिगत हितों की रक्षा में इतने उलझे हुए हैं कि उन्हें देश की रक्षा की कोई चिंता नहीं है..!  
बात जब ज्यादा आगे बढ़ जाती है तो प्रधानमंत्री जी का कुछ ऐसा बयान आता है कि हमारे धैर्य की परीक्षा मत लो”, हम किसी भी उकसाने वाले कार्रवाई का कड़ा जवाब देंगे लेकिन प्रधानमंत्री जी आपसे गुजारिश है कि चीन और पाकिस्तान जैसे धूर्त पडोसियों के सामने हाथ जोड़ने से काम नहीं चलने वाला..! चुनाव और वोट की चिंता छोड़कर जरा देश के बारे में सोचिए वर्ना कहीं ऐसा न हो कि चुनाव के नतीजों में भी आपको ख्यालों में ही खुश रहना पड़े..!


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बुधवार, 21 अगस्त 2013

अब बोलो आसाराम, ताली कितने हाथ से बजी ?

क्या कहा..? नाम है आसाराम ! अरे आसाराम कम से कम रामके नाम का ही मान रख लेते ! दिल्ली गैंगरेप के बाद तो बड़ा ज्ञान बांट रहे थे ! उस वक्त तो दरिंदों के बीच फंसी पीडिता को तो दरिंदों को अपना धर्म भाई बनाने की गुहार करने तक की सलाह दे डाली थी..! उल्टा उसे ही दोषी ठहरा दिया था..! खुद बड़े धर्मात्मा बने फिरते हो, फिर ये क्या कर डाला..! रती भर भी शर्म नहीं आई..! नाबालिग पर नीयत डोल गई..! अब समझ आया आसाराम दिल्ली गैंगरेप पर बघारे गए तुम्हारे ज्ञान का सही मतलब..! (पढ़ें- दिल्ली गैंगरेप- राम-रामआसाराम!)
संत का चोला ओढ़ लेने से मन का पाप नहीं छिप जाता आसाराम..! और छिपा भी लोगे तो कब तक..? कब तक अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर, लोगों को डरा धमका कर अपने पापों पर पर्दा डालते रहोगे..! वैसे भी सच्चाई ज्यादा दिन तक छिपी नहीं रह सकती..! वो तो उस मासूम ने हिम्मत दिखा दी वर्ना धर्म का लबादा ओढ़ कर पता नहीं तुम कब तक अपने कुकर्मों को छिपाते रहते और जाने कितनों की जिंदगियां बर्बाद करते..!
वैसे भी आसाराम तुम्हारे जैसे अधर्मी से देश को बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं थी..! होली के नाम पर पानी की बर्बादी करते हो और ऊपर से हेकड़ी दिखाकर कहते हो कि भगवान से तो मेरी यारी है, जब चाहे बारिश करवा दूंगा..!(पढ़ें- महान हैं आसाराम जैसे संत..!)
एक मासूम गैंगरेप का शिकार होती है और कहते हो ताली एक हाथ से नहीं बजती..! अब क्या कहोगे जब खुद पर यौन शोषण का आरोप लगा है..! अब नहीं कहोगे की ताली एक हाथ से नहीं बजती..!
गलती तुम्हारी भी नहीं है आसाराम, जब तक देशवासी अंधविश्वास में डूबे रहेंगे तुम्हारे जैसों को भगवान का दर्जा गेकर सिर माथे पर बैठाते रहेंगे ये सिलसिला नहीं रुकने वाला..! पता नहीं कब हटेगा लोगों की आंखों से अंधविश्वास का ये पर्दा जिसकी आड़ में आसाराम जैसे लोग ऐश कर रहे हैं..!


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रुपया तो उठने की चीज है !

रुपया इतना कैसे गिर सकता है कि उठाने में पसीने निकल आएं, वैसे अपना व्यक्तिगत अनुभव बताऊं तो मैंने तो हमेशा रुपये को उठते हुए ही देखा है..! राशन लेने जाओ तो लाला उठा लेता है, दूध लेने जाओ तो दूधवाला उठा लेता है, पेट्रोल भराने जाओ तो पेट्रोल पंप वाला उठा लेता है, बस, ट्रेन या हवाई जहाज में सफर करो हर जगह रुपये को उठते हुए ही देखा है..! और तो और कभी सुलभ शौचालय का इस्तेमाल करो तो वहां भी रुपया उठ जाता है..!
ऐसे में जब चारों और रुपए के गिरने की ही चर्चा और उस पर चिंता हो रही थी तो इस पर सहसा यकीन नहीं हो रहा था..! लेकिन मेरे एक मित्र ने सड़क पर गिरे हुए रुपए को उठाने की लाख कोशिश करने के बाद रुपये के न उठने का अनुभव मुझ से साझा किया तो समझ में आया कि वाकई में रुपया कुछ ज्यादा ही गिर चुका है, इतना ज्यादा कि अब इसका उठना नामुमकिन सा लग रहा है..!
मित्र ने रुपए के न उठने की जो अनुभव साझा किया वो कुछ इस तरह का था।  मित्र के अनुसार वो कुछ सामान खरीदने बाजार गया था, मंदी का असर बाजार में भी था और भीड़ न होने से बाजार की तंग गलियां भी काफी चौड़ी दिखाई दे रही थे..! ग्राहकों के साथ व्यस्त रहने वाले दुकानदार ग्राहकों के इंतजार में अपनी अपनी दुकान के आगे टाईम पास कर रहे थे..!
सड़क पर चलते हुए मित्र की निगाह सडक पर पड़ी किसी चमकीली वस्तु पर पड़ी, पास जाकर देखा तो वह रुपया था। रुपये तो देखते हुए वह ठिठक गया, उसने जल्दी से अपनी दोनों तरफ देखा कि कहीं किसी का ध्यान उस पर तो नहीं है, आश्वसत होने पर वह रुपये की ओर हाथ बढ़ाते हुए तेजी से नीचे झुका लेकिन रुपया उसके हाथ में नहीं आया, उसने दोबारा रुपये को उठाने की कोशिश की लेकिन रुपया उठने को तैयार नहीं था, इसी बीच उसे बगल की दुकान के सामने बैठे तीन – चार लोगों की जोर से हंसने की आवाज सुनाई दी तो वह एकपल को झेंप गया और तेजी से वहां से आगे निकल आया..! वह समझ गया था कि ये आस पास के दुकानदारों की शरारत थी..!
दरअसल मंदी में टाइम पास कर रहे आस पास के दुकानदारों ने रुपए के एक तरफ डामर लगाकर उसे सड़क पर चिपका दिया था ताकि कोई भी उसे उठाने की कोशिश करे तो वह उसके हाथ में न आए..! भले ही दुकानदारों ने टाईम पास के लिए मस्ती के लिए ये सब किया हो लेकिन रुपये की ये कहानी अपने आप में बहुत कुछ बयां करती है..! कुछ मिलाकर रुपया इसी तरह गिरता रहा तो वॉट आम जनता की ही लगनी है, उन्हें इससे क्या फर्क पड़ता है जिनका काला – सफेद सारा रुपया विदेशी बैंकों में जमा है..! वैसे भी ये लोग आम जनता की मेहनत के रुपये को भ्रष्टाचार और घोटालों के जरिए उठाना अच्छी तरह जानते हैं..! पता नहीं,  सत्ता के नशे में मदहोश देश के इन कथित कर्णधारों को देश के जनता कब गिराएगी..!


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मंगलवार, 20 अगस्त 2013

आखिर आलाकमान को भी तो खुश करना है !

उत्तराखंड में आई भीषण आपदा को दो महीने का वक्त बीत जाने के बाद भी सरकार प्रभावितों तक राहत सामग्री पहुंचाने के साथ ही उनके पुनर्वास के लिए प्रभावी कदम उठाने में विफल रही है..! आपदा राहत कार्यों को सही ढंग से अंजाम देने में विफल रहने और इस दौरान दिल्ली दरबार पर माथा टेकने में व्यस्त रहने पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की खूब आलोचना भी हुई लेकिन हैरत की बात है कि इसके बाद भी जैसे तैसे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने विजय बहुगुणा की कुर्सी अभी तक एकदम सही सलामत है..! (पढ़ें- उत्तराखंड के वो दिल्ली वाले मुख्यमंत्री..!)
हालांकि चर्चाएं तो अभी भी गर्म हैं कि आगामी एक-दो महीने में बहगुणा पर गाज गिर सकती है और मुख्यमंत्री की कुर्सी उनसे छीनकर किसी और को सौंपी जा सकती है, इन चर्चाओं से कुर्सी के दूसरे दावेदार मन ही मन खुश भी हो रहे हैं, लेकिन दूर दूर तक मुख्यमंत्री की कुर्सी के दावेदार न होने के बाद भी अगर बहुगुणा जैसे तैसे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बन सकते हैं तो वे ये भी अच्छी तरह जानते हैं कि कैसे अपनी कुर्सी बचानी है..! (जरुर पढ़ें- विजय बहुगुणा कैसे बने मुख्यमंत्री?)
फिर चाहे दिल्ली दरबार के चक्कर लगाने पड़ें या फिर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के रुप में देखने का राग अलापना पड़े, बहुगुणा किसी भी जुगत को आजमाने से नहीं चूकते..!
सियासी आपदा प्रबंधन के बीच बहुगुणा को फिर से एक ऐसा ही मौका मिल गया है जिसे भुनाने में बहुगुणा ने बिल्कुल भी देर नहीं की..!
बहुगुणा ने आलाकमान को खुश करने के लिए 2014 के मद्देनजर यूपीए सरकार की महत्वकांक्षी योजना खाद्य सुरक्षा योजना को उत्तराखंड में लांच करने में देर नहीं की, ये बात अलग है कि बहुगुणा सरकार आपदा प्रभावितों को दो वक्त का राशन मुहैया कराने में विफल रही है..!
आपदा का दंश झेल रहे उत्तराखंड में इस योजना से 61 लाख से ज्यादा परिवारों को इसका लाभ मिलेगा जबकि लोगों को सस्ता खाद्यान्न उपलब्ध कराने के लिए सरकारी खजाने पर करीब 155 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा..! उत्तराखंड सरकार ने इस योजना को लांच तो कर दिया लेकिन प्रदेशवासियों को इसका लाभ दो सितंबर 2013 से मिलना शुरु होगा..!
दरअसल अपदा प्रबंधन में विफल रहे बहुगुणा का ये कदम खुद के सियासी आपदा प्रबंधन की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है क्योंकि बहुगुणा भी इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि आपदा प्रबंधन में सरकारी विफलता के कारण उनकी कुर्सी डगमगा रही है और इसे बचाने का एक ही तरीका है कि कोई भी जुगत लगाकर बस आलाकमान को खुश किया जाए, फिर बहुगुणा के लिए इस नाजुक वक्त पर इससे अच्छा मौका और क्या हो सकता था..? बहुगुणा ने भी देर नहीं की और राजीव गांधी के जन्मदिवस के मौके पर दिल्ली सरकार की तरह खाद्य सुरक्षा योजना को लांच कर दिया..!
शायद बहुगुणा की ये जुगत काम भी कर जाए और उनकी कुर्सी बच जाए क्योंकि आलाकमान तो बहुगुणा टाइप लोगों की ही सुनता है क्योंकि ऐसे लोग आलाकमान के आदेश पर सवाल नहीं करते बस आदेशों का पालन करते हैं और शायद यही आलाकमान चाहता भी है, तभी तो दौड़ में न होने के बाद भी सबको दरकिनार कर विजय बहुगुणा उत्तराखंड की कुर्सी पर काबिज हो गए..! (पढ़ें- वाह बहुगुणा ! हजारों मर गए, अब याद आया कर्तव्य..!)

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रविवार, 18 अगस्त 2013

प्याज न खाने से नहीं मरता कोई..!

खाने में और सलाद में प्याज का मजा तो मेरे जैसे प्याज के शौकीन ही समझ सकते हैं..! मजे से प्याज खा भी रहे थे, बाजार में प्याज 35 से 40 रुपए किलो मिल भी जा रहा था लेकिन सभी समाचार चैनलों के साथ ही अख़बारों में प्याज के दाम आसमन में, थाली से प्याज गायब टाईप ख़बरों ने प्याज को एक बेशकीमती वस्तु बना दिया है..! प्याज की तुलना सेब के दामों सी की जाने लगी तो जो प्याज 35 से 40 किलो रुपए बिक रहा था वो प्याज रातों रात 60 से 80 रुपए किलो बिकने लगा..! (जरुर पढ़ें- एक प्याज की ताकत)
मीडिया का भी अगर प्याज पर ध्यान केन्द्रित नहीं होता तो शायद प्याज पर न तो महंगाई के पंख लगते और न ही मैं आज ये पोस्ट लिख रहा होता और आज एक बेशकीमती वस्तु बना प्याज सब्जी वाली के ठेले में आलू के बराबर में पड़ा - पड़ा चुपचाप बिक रहा होता..!
सिर्फ प्याज से अगर किसी भूखे का पेट भरता तो बात समझ में भी आती और प्याज के दामों को लेकर मच रहे हो हल्ले में भईया हम भी शामिल हो जाते लेकिन सच तो ये है कि किसी गरीब परिवार में सब्जी प्याज के बिना तो बन सकती है, वह प्याज के सलाद के बिना तो खाना खा सकता है लेकिन उस परिवार के पास सब्जी और रोटी खरीदने के पैसे ही अगर न हों तो क्या कर लिजिएगा..?
जाहिर है उसके पास अगर पैसा है भी तो उसकी पहली प्राथमिकता रोटी, सब्जी, दाल चावल ही होगी न की सिर्फ प्याज..! बावजूद इसके प्याज को लेकर तो हो हल्ला मचा है लेकिन एक गरीब परिवार दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कैसे करेगा इसकी फिक्र किसी को नहीं है..!
दिल्ली का ही अगर उदाहरण ले लें तो कांग्रेस सरकार के 14 साल के कार्यकाल में दिल्ली में 737 लोगों की मौत की वजह भूख और गरीबी रही है..! विश्व के 95 करोड़ भूखों में से 45 करोड़ तो भारत में ही है, जिनमें से हर रोज कई लोग भूख के चलते दम तोड़ देते हैं..! मुझे नहीं लगता कि इनमें से कोई भी एक ऐसा रहा होगा जिसकी मौत प्याज के दाम बढ़ने के कारण या प्याज न खा पाने के कारण हुई हो..!
आटा 20 से 30 रुपए किलो मिल रहा है, खाने लायक चावल 30 रुपए से कम में नहीं मिल रहा है, दालें 70 से 80 रुपए किलो मिल रही हैं और सब्जियों के दाम तो खुद सब्जी वाला किलो में नहीं बताता कि कहीं खरीदने वाला ही न वापस लौट जाए..! ऐसे में सिर्फ एक प्याज के दामों को लेकर इतना हो हल्ला कहां तक सही है..? और तो और प्याज के दाम पर सरकार भी बावली हुई जा रही है..! खासकर दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार को शायद 1998 याद आ रहा है और आगामी विधानसभा चुनाव में सत्ता से बेदखल होने का डर सता रहा है तो 1998 में सत्ता गंवाने वाली भाजपा को 1998 का ये दोहराव सत्ता की एक सीढ़ी नजर आ रही है..! शायद इसलिए ही भाजपा प्याज की बढ़ती कीमतों को सरकार के खिलाफ मुद्दा बनाने की तैयारी कर रही है तो सरकार प्याज के सरकारी स्टॉल लगाकर जनता की नाराजगी दूर करने का प्रयास कर रही है..!
कुल मिलाकर प्याज के नाम पर सिर्फ सियासत हो रही है..! समाचार चैनल और अखबार अपनी-अपनी टीआरपी बढ़ा रहे हैं, वर्ना एक प्याज की इतनी मजाल कि वो बिना कटे ही लोगों की आंख से आंसू टपका दे..!  


शनिवार, 17 अगस्त 2013

क्योंकि ये एक पत्रकार की लड़ाई है..!

किसी फैक्ट्री या मिल में कर्मचारियों के साथ ज्यादती होती या फिर उसका उत्पीडन होता है तो फैक्ट्री/मिल के सभी कर्मचारी भी प्रबंधन के इस फैसले के खिलाफ आवाज उठाते हैं..! व्यापारियों को लगता है कि सरकार उनके हित में फैसले नहीं ले रही है तो व्यापारी भी एक दिन का सांकेतिक बंद या फिर चक्का जाम कर अपनी आवाज उठाते हैं..! सरकारी कर्मचारी अपनी मांगों के लिए हड़ताल का रास्ता अख्तियार करते हैं..!
ये छोड़िए हमारे नेतागण तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ भी आवाज उठाने से गुरेज नहीं करते क्योंकि उन्हें लगता है कि कोर्ट के फैसले उनकी राजनीति का कहीं बंटाधार न हो जाए..! इस सब के बीच मीडिया की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि मीडिया ही एक ऐसा माध्यम है जो फैक्ट्री या मिल के कर्मचारियों के साथ ही सरकारी कर्मचारियों और व्यापारियों के साथ ही अपने हक की लड़ाई के लिए लड़ रहे लोगों के लिए सरकार तक पहुंचने का एक माध्यम बनता है..!
सरकार और शोषित के बीच पुल का कार्य करने वाले पत्रकार शोषित जनता को उनका हक दिलवाने का दम भरते हैं लेकिन बात जब खुद के शोषण/उत्पीडन के खिलाफ आवाज उठाने की आती है तो यही पत्रकार चुप्पी साध कर बैठ जाते हैं, जैसे इन्होंने कोई गुनाह किया हो और ये लोग इस गुनाह की सजा भुगत रहे हों..! आपको जानकर हैरत होगी कि दूसरों के हक की आवाज उठाने वाले पत्रकार ही सबसे ज्यादा शोषण का शिकार हैं..! कई मीडिया संस्थान  दो – दो महीने तक अपने कर्मचारियों को वेतन नहीं देते हैं तो कई संस्थानों में कब, किस दिन किसी पत्रकार को अगले दिन से बिना कोई कारण बताए नौकरी में न आने का नोटिस थमा दिया जाए ये कोई नहीं जानता..?
एक बार फिर ऐसा ही हुआ है, देश के सबसे बड़े पूंजीपतियों में से मुकेश अंबानी ने नेटवर्क 18 समूह से करीब 300 से ज्यादा मीडियाकर्मियों को नौकरी से चलता कर दिया है..! लेकिन हैरत की बात है कि मीडिया की अब तक की सबसे बड़ी छंटनी के खिलाफ पत्रकार खामोश हैं..! दूसरों के हक के लिए सरकार को कठघरे में खड़े करने वाली पत्रकार बिरादरी पूंजीपति के आगे नतमस्तक है और कोई भी नेटवर्क 18 प्रबंधन के इस फैसले के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है..! दुख की बात तो ये है कि इन चैनलों के संपादक की कुर्सी पर बैठे तथाकथित बड़े-बड़े पत्रकार आशुतोष और राजदीप सरदेसाई भी अपने कर्मचारियों के साथ खड़े नहीं दिखाई दे रहे हैं..!   
इन संस्थानों के इस फैसले के खिलाफ पत्रकार बिरादरी में जबरदस्त गुस्सा तो है लेकिन अंबानी जैसे पूंजीपति के इस कत्लेआम के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत शायद किसी में नहीं है..!
सोशल मीडिया में एक छोटी सी मुहिम जारी भी है लेकिन इसमें भी खुलकर अपनी बात कहने वाले पत्रकार गिने चुने ही हैं..!  भाई लोग ये जानते हैं कि आज ये कत्लेआम एक संस्थान में हुआ है और कल उनके बारी भी आ सकती है लेकिन इसके बाद भी इस कत्लेआम का विरोध करने का दम शायद किसी में नहीं है..! आज नहीं तो कल ये होगा और छंटनी के नाम पर पत्रकारों को नौकरी से निकाल भी दिया जाएगा लेकिन पत्रकार कुछ नहीं बोलेंगे क्योंकि इन्हें शायद अपनी लड़ाई लड़नी ही नहीं आती क्योंकि या तो हम इसके आदि हो गए हैं या फिर हमने इसी को अपनी नियति मान लिया है..!

deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 14 अगस्त 2013

लेकिन प्रधानमंत्री से उम्मीद करते हैं कि…

पूरा देश आजादी की 67वीं वर्षगांठ के जश्न की तैयारियों में डूबा हुआ है। वर्ष में सिर्फ दो दिन (26 जनवरी और 15 अगस्त) मौन व्रत तोड़ने वाले हमारे प्रधानमंत्री माननीय मनमोहन सिंह के मौन टूटने का वक्त भी करीब आ गया है, उम्मीद करते हैं मनमोहन सिंह लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करने के बाद अपनी सोनिया मैडम की तरफ देखकर ये नहीं पूछेंगे कि ठीक है(जरुर पढ़ें-दिल्ली गैंगरेप- ठीक हैलोग इसे भी भूल जाएंगे !)
मनमोहन सिंह लाल किले की प्राचीर से यूपीए टू की उपलब्धियों को गिनाते हुए यूपीए टू के कार्यकाल को स्वर्णिम करार देते हुए देश को गर्व करने का मौका देंगे लेकिन उम्मीद करते हैं कि मनमोहन सिंह यूपीए टू के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार और घोटालों पर एक शब्द भी नहीं बोलेंगे..!
माननीय प्रधानमंत्री जी उत्तराखंड में आई भीषण प्राकृतिक आपदा पर दुख जताते हुए इससे उबरने में उत्तराखंड राज्य सरकार की हर संभव मदद करने का ठोस आश्वासन देंगे और त्रासदी के वक्त दिल्ली के चक्कर लगाने वाले उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की पीठ जरुर ठोकेंगे..! लेकिन उम्मीद करते हैं कि प्रधानमंत्री जी भीषण त्रासदी से निपटने में नाकाम बहुगुणा सरकार के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोलेंगे..!
माननीय मनमोहन सिंह अपने भाषण में सीमा पर पाकिस्तानी सैनिकों के हमले में शहीद हुए सैनिकों के प्रति दुख प्रकट करेंगे लेकिन उम्मीद करते हैं कि भारत की नाक में दम करने वाले अपने धूर्त पड़ोसी के खिलाफ लाल किले का प्राचीर से एक भी शब्द नहीं बोलेंगे..! हां, नवाज शरीफ की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए पाक प्रधानमंत्री को लंच या डिनर पर जरुर आमंत्रित करेंगे..!
पीएम साहब अपने भाषण में मंदी से निपटने और देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए हर संभव कदम उठाने की बात तो करेंगे और देश की जनता का सामान्य ज्ञान ये कहकर बढ़ाएंगे कि पैसे पेड़ पर नहीं लगते लेकिन उम्मीद करते हैं कि मनमोहन सिंह साहब सुरसा के मुहं की तरह मुंह फाड़ती महंगाई पर अपनी चुप्पी नहीं तोड़ेंगे..! और न ही ये बताएंगे कि पैसे पेड़ पर नहीं लगते तो फिर कहां लगते हैं..? (जरुर पढ़ें- ठीक कहा प्रधानमंत्री जी...पैसे पेड़ पर नहीं लगते)।
आखिर में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह साहब यूपीए सरकार को महंगाई के बोझ तले दबी और भूख और कुपोषण से मर रही देश की जनता की सबसे फिक्रमंद सरकार होने का तमगा खुद देंगे और जनता से एक बार फिर से 2014 में कांग्रेस पर भरोसा करने की अपील करेंगे लेकिन उम्मीद करते हैं कि मनमोहन सिंह यूपीए सरकार की नाकामी पर एक भी शब्द नहीं बोलेंगे और देश के सुरक्षा हालात, आर्थिक हालात के साथ ही भ्रष्टाचार और घोटालों के फेरहिस्त की तुलना पिछली सरकारों से करके अपने आंकड़ों को कम दिखाने की कोशिश नहीं करेंगे..!
अंत में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सभी भारतवासियों को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं देने के साथ ये वादा करेंगे कि चाहे कुछ भी हो जाए मैं 26 जनवरी 2014 से पहले अपना मौन नहीं तोडूंगा..! जय हिंद !!


deepaktiwari555@gmail.com