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गुरुवार, 11 जुलाई 2013

और नेतानगरी में छाया मातम..!

हमारे देश के नेताओं पर लगता है अदालत की महादशा शुरु हो गयी है। पहले सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक इतिहास वाले दागी नेताओं पर लगाम कसने की ओर कदम बढ़ाते हुए फैसला दिया कि किसी भी मामले में दो या दो साल से ज्यादा की सजा होने पर सांसद और विधायक की सदस्यता खुद ब खुद समाप्त हो जाएगी तो यूपी हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश में जातीय आधारित रैलियों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाकर उन राजनीतिक दलों की नींद उड़ा दी है जो जाति के नाम पर लोगों को बांटकर सत्तासीन होने का ख़्वाब देख रहे थे..!
नेतागण इस सदमे से उबरे भी नहीं थे कि सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के उस फैसले पर अपनी मुहर लगा दी जिसमें पटना हाईकोर्ट ने जेल में जाते ही चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी यानि कि कोई भी व्यक्ति अब जेल जाने के बाद चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो जाएगा।
चुनाव करीब आते ही सत्ता पर नजरें गढ़ाए बैठे जिन नेताओं के चेहरे पर खुशी दिखाई देती थी वो सर्वोच्च न्यायलय और यूपी और पटना उच्च न्यायलय के फैसले के बाद अब अब काफूर होती दिखाई दे रही है..! नेता हैरान हैं...परेशान हैं कि करें तो क्या करें..?
अदालत के फैसले के सामने नेता न तो खुलकर कुछ बोल पा रहे हैं और न ही इसका विरोध कर पा रहे हैं..!
कुछ अदालत के आदेश को पढ़ने के बाद ही कुछ कहने की बात कर रहे हैं तो कुछ बेमन से अदालत के फैसले का स्वागत करते दिखाई दे रहे हैं..! (पढ़ें- नेता जी, दाग अच्छे हैं..!)
संसद और राज्य विधानसभाओं में जनता से जुड़े मुद्दों पर मुंह फेरने वाले और अपने हक के सवाल पर, अपने वेतन भत्तों को बढ़ाने के नाम पर एकजुट होने वाले अधिकतर नेताओं को सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद अब अपना भविष्य अंधकारमय नजर आने लगा है, क्योंकि हमारे अधिकतर माननीय अपनी सफेद पोशाक के पीछे हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण, बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों के साथ ही भ्रष्टाचार और घोटालों की कालिख को समेटे हुए हैं..!
ये छोड़िए, ये लोग तो लोगों को उनकी जाति के आधार पर बांटकर राज करने में भी गुरेज नहीं करते। देश के सबसे बड़े प्रदेश यूपी में तो जातीय समीकरण को अपने अपने पक्ष में फिट करने के लिए राजनीतिक दल क्या कुछ नहीं करते..? दलितों के नाम पर राज करने वाले बसपा सुप्रीमो मायावती भी ब्राह्मण सम्मेलन का आयोजन करती हैं तो समाजवादी पार्टी जिसका नाम ही समाजवाद है खास वोटों को अपने पक्ष में करने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ती..! ऐसा ही हाल राज्य में भाजपा और कांग्रेस के साथ ही दूसरे राजनीतिक दलों का भी है..! लेकिन जातीय रैलियों पर रोक के इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के फैसले के बाद अब सबकी सिट्टी पिट्टी गुम है। अब राजनीतिक दल मुश्किल में हैं कि करें तो क्या करें..? कैसे किसी खास जाति के मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए कोई नया रास्ता तैयार करें..?
बहरहाल अदालत के फैसले से नेतानगरी में भले ही मातम छाया हुआ है पर नेताओं की कारगुजारियों से अजीज आ चुकी देश की जनता में अदालत के इन फैसलों से खुशी की लहर है लेकिन इसका असली मजा तो तब है जब देश की जनता अपने वोट की कीमत को समझे और चुनावों में भी ऐसे नेताओं को सबक सिखाए..!


deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 10 जुलाई 2013

नेता जी, दाग अच्छे हैं..!

अधिकतर मामलों में सबूतों के अभाव में नेताओं को कोर्ट से राहत मिलते तो कई बार देखा था लेकिन पहली बार सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से नेताओं की नींद उड़ते देखी है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय का फैसला होने के कारण चाहकर भी नेता इस फैसले के खिलाफ कुछ नहीं बोल सकते लेकिन जिन नेताओं पर छोटा या बड़ा कोई भी मामला अदालत में लंबित है उनके दिल का दर्द उनसे बेहतर और कौन समझ सकता है..?
हमारे देश में आपराधिक रिकार्ड वाले नेताओं की फेरहिस्त काफी लंबी है। हत्या, हत्या का प्रयास, लूट, अपहरण के साथ भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोपों से घिरे नेताओं की संख्या काफी ज्यादा है औऱ हैरत की बात तो ये है कि इसके बाद भी या तो वे विधायक हैं या फिर सांसद..! सबसे बड़ी बात तो ये कि इनके लिए विधानसभा और लोकसभा चुनाव में टिकट पाना कोई मुश्किल काम नहीं है। चुनाव में ईमानदार और स्वच्छ छवि के नेताओं को टिकट देने का दावा करने वाले हमारे देश के लगभग सभी छोटे बड़े राजनीतिक दल आपराधिक इतिहास वाले नेताओं को अपनी पार्टी का उम्मीदवार बनाने में जरा भी नहीं हिचकते..!
ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला कि किसी भी मामले में दो या दो से अधिक वर्ष की सजा होने पर सांसद और विधायक की सदस्यता रद्द हो जाएगी और वे चुनाव भी नहीं लड़ पाएंगे अपने आप में एक ऐतिहासिक फैसला है। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से न सिर्फ राजनीति में आपराधिक इतिहास वाले नेताओं की घुसपैठ पर रोक लगेगी बल्कि किसी भी अपराध को करने या उसमें किसी भी तरह से शामिल होने से पहले नेता सौ बार सोचेंगे..!
अभी तक किसी भी मामले पर सजा होने पर नेतागण जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8(4) को सुरक्षा कवच बनाकर फैसले के खिलाफ अपील लंबित होने पर अपने पद पर बने रहते थे लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस सुरक्ष कवच को ही खत्म कर दिया है जिसके बाद दो या दो साल से ज्यादा की सजा होने पर सांसद और विधायक की सदस्यता रद्द हो जाएगी।   
आपराधिक इतिहास वाले नेताओं की देश के छोटे बड़े सभी राजनीतिक दलों में कितनी पैठ है इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि मई 2009 की नेशनल इलेक्शन वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक 15वीं लोकसभा में 150 दागी सांसद हैं जिनमें से 73 के खिलाफ गंभीर आरोप हैं।
वहीं राज्यों की बात करें तो www.myneta.info के मुताबिक दागी विधायकों के मामले में झारखंड देश में सबसे अव्वल है, जहां पर कुल विधायकों में से 72 फीसदी (55 विधायक) विधायकों के खिलाफ कोई न कोई आपराधिक मामला चल रहा है। 55 में से भी 24 विधायकों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं।
बिहार इस सूची में दूसरे नंबर पर है जहां पर 58 फीसदी (140 विधायक) विधायक दागी हैं जिनमें से भी 84 विधायकों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं।
महाराष्ट्र इस फेरहिस्त में 51 फीसदी (146 विधायक) विधायकों के साथ तीसरे नंबर है जिनमें से 56 विधायकों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं।
विधायकों की संख्या के साथ चौथे नंबर पर उत्तर प्रदेश विराजमान है, जहां दागी विधायकों का प्रतिशत 47(189 विधायक) है, जिसमें से 98 विधायकों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं।
अन्य राज्यों में भी हालात कुछ जुदा नहीं है और बड़ी संख्या में दागी विधायक राज्य की विधानसभाओं की शोभा बढ़ा रहे हैं। सिर्फ मणिपुर ही इकलौता ऐसा राज्य है जहां पर किसी भी विधायक के खिलाफ कोई भी आपराधिक मामला नहीं है और सभी 60 विधायक बेदाग हैं।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद जाहिर है, ऐसे नेताओं के माथे पर बल पड़ना लाजिमी है। कोर्ट ने अपने फैसले से न सिर्फ देश की संसद और विधानसभाओं को साफ करने की ओर कदम उठाया है बल्कि कोर्ट का ये फैसले उन नेताओं और राजनीतिक दलों के मुंह पर एक करारा तमाचा है जो ये सोचते हैं कि पैसे और बाहुबल के आधार पर चुनाव जीतकर वे संसद या विधानसभा में आसानी से पहुंच जाएंगे और अपनी मनमानी करेंगे..!
देश के सर्वोच्च न्यायालय की अगर बात करें तो सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों की संख्या 60 हजार के करीब है जबकि वर्ष 2011 तक देश की विभिन्न उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या करीब 43 लाख 22 हजार से अधिक हैं। इससे देश के विभिन्न अदालतों में लंबित मामलों की संख्या का अंदाजा लगाया जा सकता है। (पढ़ें- इंसाफ- मौत के बाद..!)
ऐसे में अब उम्मीद है कि दागी सांसदों और विधायकों के संबंध में सर्वोच्च न्यायलय के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद देश की विभिन्न अदालतों में लंबित मामलों के तेजी से निपटारे को लेकर भी सर्वोच्च न्यायालय कोई सकारात्मक कदम उठाए ताकि अदालत का ये ऐतिहासिक फैसला जल्द सार्थक हो और देश की संसद और राज्य विधानसभाओं से दागी नेताओं का पत्ता साफ हो।

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मंगलवार, 9 जुलाई 2013

लोकार्पण करने वाले खुद पहुंच गए हवालात

नाम- राघवजी, उम्र-79 वर्ष, चेहरे पर सादगी लेकिन कर्म ऐसे कि शर्म भी शर्म से आंखें चुराने पर मजबूर हो जाए..! मोटे चश्मे के पीछे से झांकती शैतान निगाहें पता नहीं कब से बंद कमरे में अपनी हवस की भूख को शांत कर कितनों का जीवन नर्क करने पर तुली हुई थी..! जाने कितने वर्षों से अपने परिवार के साथ ही लोगों की आखों में राघव जी धूल झोंक कर एक सज्जन पुरुष का जीवन जीने का ढोंग रच रहे थे लेकिन राघवजी की ये करतूत तीसरी आंख से नहीं बच पाई और तीसरी आंख ने वो राज खोला कि सारी सज्जनता, सारी नैतिकता धरी की धरी रह गयी और 79 वर्ष की अवस्था में राघवजी का जो घिनौना चेहरा सामने आया वो किसी को भी शर्म से पानी पानी करने के लिए काफी है..!  (पढ़ें- ये हैं राजनीति के मर्यादा पुरुष..!)
कहते हैं इंसान को अपने कर्मों का फल जीते जी ही भगुतना पड़ता है..! उम्र के इस पड़ाव में राघवजी की गिरफ्तारी कम से कम इस विश्वास को तो और दृढ़ करती ही है। वक्त कैसे बदलता है, इसका इससे बढ़िया उदाहरण और क्या हो सकता है कि जिस हबीबगंज थाने का लोकार्पण राघवजी ने किया था उसी थाने में न सिर्फ राघवजी के खिलाफ एफआईआर लिखी गई बल्कि हबीबगंज थाना पुलिस ने ही राघवजी को हवालात तक भी पहुंचा दिया।
भोपाल में पत्रकारिता के दैरान चार साल पहले मैं खुद हबीबगंज थाने के लोकार्पण समारोह में मौजूद था जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और राघवजी ने थाने का लोकार्पाण किया लेकिन मैं क्या वहां मौजूद किसी शख्स ने विशेषकर राघवजी ने ये नहीं सोचा होगा कि भविष्य में वक्त ऐसी करवट लेगा कि हबीबगंज थाने में ही उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज होगी और जो हबीबगंज थाना पुलिस उनको मंत्री रहते हुए सलाम ठोक रही थी वही पुलिस उनको गिरफ्तार करेगी। 
ये भी वक्त का ही तकाजा है कि जिस राघवजी के साथ इस घटनाक्रम से पहले तक उनकी पार्टी कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रहती थी उसने भी राघवजी के कुकर्म की सीडी सामने आने के बाद राघवजी से किनारा कर लिया है।
आखिर चाल, चरित्र और चेहरे की बात करने वाली भारतीय जनता पार्टी के चेहरे पर उनके ही वयोवृद्ध नेता कालिख पोत दें तो सवाल उठने लाजिमी ही हैं..! ऐसे में भाजपा ने राघवजी से किनारा करने में जरा सी भी देर नहीं की लेकिन जो राघव जी कई दशकों से भाजपा के साथ जुड़े हुए थे उनसे एक झटके में किनारा करने से भाजपा का दामन तो साफ होगा नहीं..! और न ही वे सवाल शांत होंगे जो राघवजी की कुकर्म कथा ने भाजपा पर भी खड़े किए हैं..!
वैसे भी चुनाव की देहरी पर खड़े मध्य प्रदेश की सत्ता से 10 वर्षों से दूर कांग्रेस हर हाल में सत्ता हासिल करना चाहती है ऐसे में राघवजी की कुकर्म कथा तो कांग्रेस के लिए चुनाव में किसी संजीवनी से कम नहीं है और कांग्रेस ने भी इसको भुनाने की पूरी तैयारी कर ली है जबकि भाजपा के पास राघवजी की इस कुकर्म कथा पर उठ रहे सवालों का कोई जवाब नहीं है..!

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रविवार, 7 जुलाई 2013

अब और बर्दाश्त (नहीं) करेंगे..!

बोधगया के महाबोधी मंदिर पर आतंकी हमले के बाद हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं कि ऐसे हमले बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे..! आतंकी एक के बाद एक आतंकी हमले को अंजाम देते जाते हैं और हमारी सरकार के मुखिया हर बार ये कहते हैं कि देश में आतंकी हमले बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी। समझ में नहीं आता कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए आखिर इस बर्दाश्त की सीमा कहां तक है..?
मनमोहन सिंह बर्दाश्त न करने की बात तो हर बार कहते हैं लेकिन प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद से ही वे सिर्फ बर्दाश्त ही कर रहे हैं और कुछ नहीं..! देश के दुश्मन भी इस बात को अच्छी तरह समझ गए हैं कि भारत सिर्फ बर्दाश्त ही कर सकता है और कुछ करने का दम भारत में नहीं है..! शायद यही वजह है कि आतंकियों के हौसले बुलंद हैं और वे एक के बाद एक कभी मुंबई में तो कभी पुणे में, कभी बंगलुरु में तो कभी बिहार में आतंकी हमलों को अंजाम देकर निर्दोष भारतीयों को मौत के घाट उतार रहे हैं..!
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मजबूरी तो पूरा देश समझता है कि आखिर क्यों वे हर चीज बर्दाश्त न करने की बात तो कहते हैं लेकिन फिर भी चुपचाप बर्दाश्त करते रहते हैं..! वैसे भी प्रधानमंत्री की कुर्सी ऐसे ही थोड़े न मिल जाती है...उसके लिए तो बर्दाश्त करने की क्षमता होनी चाहिए..! जो कि मनमोहन सिंह में कूट कूट कर भरी हुई है..! लेकिन मनमोहन सिंह को कौन समझाए कि उनको पीएम की कुर्सी दिलाने वाली उनकी ये अनोखी काबिलियत देश पर भारी पड़ी रही है और आए दिन निर्दोष भारतीयों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा रहा है..!
हैरानी तो उस वक्त होती है जब इस तरह के आतंकी हमले होने की सूचना दिल्ली पुलिस के जरिए बिहार सरकार को पहले ही मिल जाती है लेकिन इसके बाद भी आतंकी बिहार के बोधगया में स्थित महाबोधी मंदिर में एक नहीं, दो नहीं पूरे एक दर्जन से ज्यादा बम आसानी से प्लांट कर अपने नापाक मंसूबों में कामयाब हो जाते हैं..! अंदाजा लगाया जा सकता है कि लोगों की सुरक्षा को लेकर सरकार कितनी गंभीर है..?
ये छोड़िए राज्य के डीजीपी अभयानंद महाबोधी मंदिर पर हुए धमाके की पूर्व सूचना के सवाल पर कहते हैं कि हर घटना से कुछ न कुछ सिखने को मिलता है..! सुन लिजिए ये कहना है राज्य के पुलिस प्रमुख का जिनका सोचना है कि कुछ सीखने के लिए ऐसी घटनाएं होना जरुरी है..! अब जनाब विस्फोट नहीं होंगे तो फिर बिहार पुलिस सबक कैसे लेगी..?
जब देश के प्रधानमंत्री कहते हैं बर्दाश्त (नहीं) करेंगे, बिहार के मुख्यमंत्री आतंकी हमले की सूचना के बाद भी मंदिर की सुरक्षा को लेकर कोई कारगर कदम नहीं उठाते और बिहार के ही पुलिस प्रमुख विस्फोट के बाद कहते हैं कि ऐसी घटनांओं से ही तो पुलिस कुछ सीखेगी..! फिर क्यों न आतंकी बेखौफ होकर एक के बाद धमाकों से भारत को दहलाते रहें..! जब हमारे प्रधानमंत्री बर्दाश्त न करके भी बर्दाश्त कर सकते हैं तो फिर आतंकी क्यों बर्दाश्त करें..? लेकिन असल सवाल तो ये है कि देश की जनता अपनी जान की कीमत पर आखिर कब तक ये सब बर्दाश्त करेगी..?


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शनिवार, 6 जुलाई 2013

ये हैं राजनीति के मर्यादा पुरुष..!

मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार में वित्त मंत्री राघवजी और यूपी के औरेया के सपा जिलाध्यक्ष और श्रम प्रवर्तन विभाग के चेयरमैन रामबाबू यादव के कारनामों को सुनकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नारायण दत्त तिवारी की याद आ गयी। रामबाबू यादव एनडी तिवारी की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं तो राघव जी ने वो कर दिया जो शायद तिवारी जी नहीं कर पाए..!
79 वर्ष के राघव जी शिवराज कैबेनिट के सबसे वरिष्ठ सदस्य थे और वित्त मंत्रालय की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे थे। 2008 से 2010 तक भोपाल में पत्रकारिता के दौरान कई मौकों पर राघव जी से सामना हुआ। वो राघव जी जो बिना सहारे के ठीक से चल भी नहीं सकते। चश्मा लगाने के बाद भी पढ़ने में उन्हें दिक्कत होती थी..!
राघव जी की नौकर के साथ अपाकृतिक कृत्य की ख़बर सुनी तो राघव जी की पूरी काया जेहन में ताजा हो गयी। शुरु में तो यकीन नहीं हुआ लेकिन जब इसकी रिकार्डिंग होने की बात सामने आयी तो फिर क्या कह सकते हैं..! कहते भी हैं न कि कैमरा झूठ नहीं बोलता..!
क्या राघव जी 79 साल में जो कमाया था वो नवाबों के शौक में गंवा दिया..! वैसे भी तो भोपाल नवाबों का ही शहर है..! हालांकि राघवी जी कह रहे हैं कि ये उनके खिलाफ राजनीतिक साजिश है लेकिन सीडी बनाने का दावा करने वाला भी भाजपा का ही नेता है वो भी राघव जी के गृहक्षेत्र विदिशा का। ऐसे में राघव जी के लिए अपनों की ही घेराबंदी से पाक साफ निकल पाना आसान नहीं होगा..! वैसे भी मध्य प्रदेश में सत्ता पाने को बेकरार कांग्रेस के लिए आगामी विधानसभा चुनाव में भुनाने के लिए इससे अच्छा मुद्दा और क्या हो सकता है..?
समाजवादी पार्टी से ताल्लुक रखने वाले 71 वर्ष के रामबाबू यादव के बारे में तो ज्यादा नहीं जानता लेकिन उनकी ही पार्टी की एक महिला मधु पांडे के साथ उनकी एक ऑडियो रिकार्डिंग ने उनके चर्चे भी बढ़ा दिए हैं। साहब को चूजे(कम उम्र की लड़कियों) का शौक है। खुद के पांव कब्र में लटक रहे हैं और लड़कियां चाहिए 18 से 20 साल की..! अब इनके शौक को क्या कहें..?
लगता है ये साहब एनडी तिवारी से कोई गुप्त फार्मूला लेकर आए हैं तभी तो 71 की उम्र में 18-20 साल की लड़कियों का शौक चढ़ा है..! माफ करना चौधरी साहब कम से कम इतना ही ख्याल कर लेते कि आपके पोते पोती की उम्र भी इतनी ही होगी..!
राघवजी और रामबाबू याद दोनों व्यक्ति भले ही अलग अलग हैं, दोनों की पार्टी भले ही अलग अलग हैं लेकिन कौम एक ही है...वही कौम जिससे एनडी तिवारी भी आते हैं..! दूसरों को मर्यादित आचरण की सीख देने वाले और खुद को पाक साफ बताने वाले इस कौम वाले निजी जीवन में कितने मर्यादित हैं और कैसी नीयत वाले हैं, ये सबके सामने है..?  समझ नहीं आता कि ये लोग अपने परिवार संग कैसे रहते हैं..? कैसे अपने बीवी बच्चों से नज़रें मिलाते हैं..?


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मंगलवार, 2 जुलाई 2013

आपके घर पर कोई अतिक्रमण कर ले तो..?


आपके घर पर अगर कोई अतिक्रमण कर ले तो कैसे लगेगा..? आपकी कार पार्किंग की जगह कोई और अपनी गाड़ी पार्क कर ले तो कैसा लगेगा..?
जाहिर है बहुत गुस्सा आएगा लेकिन ऐसे में आप क्या करेंगे..? प्यार से समझाने के बाद भी जब अतिक्रमणकारी नहीं मानेगा तो फिर आप क्या करेंगे..?
कुछ समझ आया कि केदारनाथ में ऐसा क्यों हुआ..?
समझ आया कि क्यों भागीरथी, मंदाकिनी, अलकनंदा, पिंडर और दूसरी नदियां क्यों अपने साथ सब कुछ बहा कर ले गई..!
जिस तरह आपके घर में कोई जबरन घुसकर कब्जा कर ले और बाहर जाने का नाम न ले ठीक उसी तरह पहाड़ों में नदियों में स्वार्थी, लालची लोगों ने कब्जा करने की कोशिश की..! पहाड़ों का सीना छलनी कर दिया तो नदियों की धारा को रोकने का प्रयास किया..! नतीजा सबके सामने है। जिस तरह हम अपने घर में किसी के अतिक्रमण को बर्दाश्त नहीं कर सकते ठीक उसी तरह नदियों और पहाड़ों ने भी ऐसा ही किया..!
और तो और हिमालय की गोद में बसे भगवान शिव के पावन धाम केदारनाथ को भी नहीं छोड़ा। मंदाकिनी के किनारों पर खड़े कर दिए दो-तीन मंजिले होटल, धर्मशाला और लॉज...सजा ली प्रसाद की थाली और फूलों की दुकान। किसलिए..? सिर्फ अपने निजि स्वार्थ के लिए..! पैसा कमाने के लिए..! तो क्यों न होती तबाही..? केदार बाबा क्यों अपने धाम में अतिक्रमण बर्दाश्त करते..? क्यों केदारनाथ की शांति भंग करने वालों को सबक नहीं सिखाते..?
जिम्मेदार लोगों (शसन-प्रशासन) ने अपनी जिम्मेदारी ठीक ढंग से निभाई होती तो शायद हालात इतने बुरे नहीं होते लेकिन जिम्मेदार लोगों की जेबें गरम हो रही थी तो उन्होंने आंख मूंद कर गहरी नींद में सो जाना ही बेहतर समझा। जिम्मेदार लोग सो रहे थे और पहाड़ों का सीना छलनी हो रहा था...नदियों की धारा को जंजीरों में बांधा जा रहा था। पहाड़ खोखले हो चुके थे, हरियाली मुरझा चुकी थी और नदियां नालों में बदल चुकी थी तो फिर आप ही बताओ कि क्यों न होता विनाश..? क्यों न गिरते पहाड़..? क्यों न रौद्र रुप धारण करती भागीरथी, अलकनंदा, मंदाकिनी, पिंडर और दूसरी नदियां..?
अब रोते रहो कुदरत के कहर का राग अलापते हुए कुदरत ने तो अपना हिसाब बराबर कर लिया..!

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सोमवार, 1 जुलाई 2013

उत्तराखंड त्रासदी- लाशों पर बहुगुणा की कमेंट्री..!

उत्तराखंड में आई भीषण त्रासदी से निपटने में नाकाम रहने के साथ ही मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने एक बार फिर से ये साबित कर दिया कि आखिर क्यों वे उत्तराखंड के लिए एक राजनीतिक त्रासदी की तरह हैं। 16 जून को केदारनाथ में आए मौत के सैलाब के बाद से ही बहुगुणा सरकार एक तमाशबीन की तरह सिर्फ मौत का तमाशा ही देखती रही..! सरकार का आपदा प्रबंधन फेल हो चुका था और सरकार हर मोर्चे पर नाकाम साबित हो रही थी। विजय बहुगुणा का दरअसल पता ही नहीं था कि इस भीषण त्रासदी से आखिर निपटा कैसे जाए..? (पढ़ें - बहुगुणा का सीएम बनना भी एक त्रासदी..!)
त्रासदी के बाद से ही विजय बहुगुणा सुबह, दोपहर और शाम तीनों वक्त मीडिया के आगे एक बेबस मुख्यमंत्री की तरह दिखाई दे रहे थे और कर रहे थे तो सिर्फ त्रासदी में हुई मौत के आंकड़ों की कमेंट्री..! बहुगुणा सरकार के पास न कोई एक्शन प्लान था और न ही प्रभावितों की मदद करने का जज्बा...वो तो भला हो भारतीय सेना के जाबांज जवानों का जिन्होंने खुद को मौत के मुंह में झोंक कर लाखों लोगों को मौतौ के मुंह से निकालकर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया।
सेना काम कर रही थी और बहुगुणा लाशों की गिनती की कमेंट्री..! बहुगुणा को लगा कि सरकार की छीछालेदर हो रही है तो करोड़ों में मीडिया को मैनेज कर समाचार चैनलों में कमेंट्री करने लगे। बताने लगे कि कुदरत के कहर के आगे सरकार बेबस है..!
दिल्ली में शीश नवाने के बाद उत्तराखंड के वो दिल्ली वाले मुख्यमंत्री आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने पहुंचे तो आपदा प्रभावितों से साफ कह दिया कि दो महीने आप अपनी सुरक्षा खुद करो...सरकार कुछ नहीं कर सकती..! कहने का अंदाज भी ऐसा था कि मानो साल के 10 महीने बहुगुणा सरकार उत्तराखंड की आवाम का पूरा ख्याल रखती हो..!  हवाई जहाज में बैठकर आपदा प्रभावित क्षेत्रों में पहुंचने वाले मुख्यमंत्री आपदा प्रभावितों को संबल देने की बजाए...मदद का आश्वासन देने की बजाए जब ऐसा कहे कि अपनी सुरक्षा स्वंय करो तो सोचिए क्या बीती होगी उन हजारों आपदा प्रभावितों पर जो मुख्यमंत्री का हवाई जहाज जमीन पर उतरने से पहले उसे इस आस में टकटकी लगाए देख रहे थे कि ये जमीन पर उतरेगा तो उनकी आधी परेशानियां तो ऐसे ही दूर हो जाएंगी लेकिन अफसोस उनके सपने उस रहनुमा ने ही तोड़ दिए जिससे उन्हें सबसे ज्यादा आस थी..!
देहरादून लौटकर मीडिया में शेखी बघारते हैं कि आपदा प्रभावितों को राशन पानी मुहैया कराया जा रहा है जबकि जमीनी हकीकत तो ये है की उत्तराखंड के कई आपदा प्रभावित गांवों से भुखमरी और खाने के लिए खून खराबे की ख़बरें सामने आ रही हैं..! जिन गांव वालों ने अपने घर के राशन पानी से बाहरी प्रदेश से चार धाम यात्रा पर आए लोगों का पेट भरा वे खुद दाने दाने को मोहताज हो रहे हैं लेकिन बकौल बहुगुणा सरकार राहत सामग्री लोगों तक पहुंच रही है..!
देशभर से प्रभावितों के लिए मदद के नाम पर करोड़ों की राशि के साथ ही भारी मात्रा में राहत सामग्री पहुंच रही है लेकिन सरकार इसका सही प्रबंधन करने में भी नाकाम साबित हो रही है। पैसे राहत कोष में जमा हो रहा है...राहत सामग्री गोदामों में या फिर खड़े ट्रकों में खराब हो रही है लेकिन मुख्यमंत्री साहब को ये पता ही नहीं कि इसका इस्तेमाल कैसे किया जाए..? (पढ़ें- वाह बहुगुणा ! हजारों मर गए, अब याद आया कर्तव्य..!)
बेहतर होगा कि अब भी वक्त रहते लाशों की गिनती की बजाए किसी तरह त्रासदी में जिंदा बचे लोगों को लाश में तब्दील होने से रोकने के लिए बहुगुणा साहब अपनी कमेंट्री बंद करें और राहत एवं पुनर्वास में पूरी ताकत लगा दें ताकि काल की तरह आपदा प्रभावितों के सिर पर खड़े बरसात के दो महीनों में देवभूमि में और लाशों के ढ़ेर न लगें..!

deepaktiwari555@gmail.com

रविवार, 30 जून 2013

बहुगुणा का सीएम बनना भी एक त्रासदी..!

उत्तराखंड विजय बहुगुणा के मुख्यमंत्री बनने की भीषण त्रासदी से सही से उबरा भी नहीं था कि एक और त्रासदी ने उत्तराखंड समेत पूरे देश को झकझोर के रख दिया। आधिकारिक रुप से त्रासदी में मौतों का आंकड़ा सैंकड़ों में है लेकिन कड़वा सच ये है कि चार धाम यात्रा पर उत्तराखंड पहुंचे हजारों लोगों का कुछ पता नहीं कि वे कहां गए..?
आपदा प्रबंधन को लेकर त्रासदी के बाद उत्तराखंड सरकार की पोल सबके सामने खुल ही चुकी है। ऐसे में अब त्रासदी के 48 घंटे पहले मौसम विभाग की सरकार को चेतावनी देने की ख़बर के बाद हर कोई हैरान है कि आखिर समय रहते सरकार की नींद क्यों नहीं खुली..? आखिर क्यों सरकार पहाड़ी इलाकों खासकर केदारनाथ में भारी बारिश की चेतावनी के बाद भी सोती रही..? क्यों नहीं एहतियात बरतते हुए लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने की कोई कोशिश सरकार की तरफ से की गई..?
समय रहते अगर सरकार ने मौसम विभाग की चेतावनी की गंभीरता से लेते हुए तत्परता दिखाते हुए आवश्यक कदम उठाए होते तो केदारनाथ की तबाही न सही लेकिन हजारों लोगों को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सकता था..!
लेकिन ऐसा नहीं हुआ और नतीजा सबके सामने है...एक बार फिर से शासन – प्रशासन की अनदेखी और लापरवाही का भयावह परिणाम हजारों लोगों को भगुतना पड़ा..!
हद तो तब हो गयी जब जैसे तैसे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने विजय बहुगुणा साहब को ये कहते सुना कि सरकार की तरफ से कोई लापरवाही नहीं बरती गयी..! गजब करते हो बहुगुणा साहब अगर लापरवाही नहीं बरती गयी तो फिर त्रासदी के 48 घंटे पहले भारी बरसात और मौसम के बिगडने की चेतावनी के बाद भी आखिर क्यों सरकार सोती रही..? अगर लापरवाही नहीं बरती गयी तो फिर क्यों मौत का सैलाब अपने साथ हजारों जिंदगियों का बहा कर ले गया..? (पढ़ें- वाह बहुगुणा ! हजारों मर गए, अब याद आया कर्तव्य..!)
हैरानी की हात ये भी है कि बहुगुणा साहब ये भी कहते सुनाई दे रहे हैं कि त्रासदी में कितने लोग मारे गए इसका पता कभी नहीं चल पाएगा..! साथ ही बहुगुणा ने विधानसभा अध्यक्ष गोविंद कुंजवाल के उस बयान को भी गलत ठहराया जिसमें कुंजवाल ने एक दिन पहले ही त्रासदी में करीब 10 हजार से ज्यादा मौतें होने का अंदेशा जताया था। बहुगुणा भले ही कुंजवाल की बात को नकार रहे हों लेकिन इस बातसे इंकार नहीं किया जा सकता कि चार धाम यात्रा सीजन का पीक समय होने के कारण करीब 20 से 25 हजार श्रद्धालु त्रासदी के वक्त गौरीकुंड, रामबाड़ा और केदारनाथ में मौजूद थे।
गौरीकुंड, रामबाड़ा और केदारनाथ तीनों ही स्थान पूरी तरह से तबाह हो गए हैं और इसमें रामबाड़ा जो यात्रा का सबसे अहम पड़ा था उसका तो नामो निशान ही मिट गया है। तीनों ही स्थानों में हर वक्त श्रद्धालुओं की तादाद 5000 से 10000 के बीच रहती थी ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि मौत का वास्तविक आंकड़ा कहां तक पहुंच सकता है..! (जरुर पढ़ें- 15 हजार तक पहुंच सकता है मौत का आंकड़ा..!!!)
हालांकि अधिकतर लोगों के 10-10 फिट मलबे के नीचे दब जाने से और मंदाकिनी में बह जाने से भले ही हजारों लापता लोगों के शव कभी न मिल पाएं लेकिन देश भर के सभी राज्यों के लोगों से चारधाम यात्रा पर निकले उनके परिजनों का डाटा तैयार कर त्रासदी के बाद  लापता लोगों की वास्तविक संख्या का तो पता चल ही सकता है..!
सुना तो यहां तक है कि उत्तराखंड के वो दिल्ली वाले मुख्यमंत्री..! बहुगुणा साहब का ज्यादा ध्यान प्रभावितों तक मदद पहुंचाने की बजाए मीडिया को मैनेज करने की तरफ है और इसके लिए बतौर सूचना विभाग के आला अधिकारी दिन रात एक किए हुए हैं..! वहीं सुनने में ये भी आ रहा है कि बहुगुणा साहब को जैसे तैसे उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनाने में अहम किरदार निभान वाली उनकी बहन रीता बहुगुणा जोशी इस कार्य में भी अहम भूमिका में हैं..!
बहुगुणा की इस कवायद का असर दिखने भी लगा है और त्रासदी के तुरंत बाद जो बड़े बड़े चैनल बहुगुणा सरकार की बखिया उधेड़ने में लगे थे अब उनके तेवर नरम पड़ने लगे हैं। यहां तक कि सभी प्रमुख समाचार चैनलों में बहुगुणा साहब का 15 से 20 मिनट का साक्षात्कार भी चला जिसमें बहुगुणा कुदरत के कहर के आगे सरकार की बेबसी की कहानी सुनाते हुए नजर आए कुदरत के आगे किसी का बस न चलने की बात कहते हुए खुद को व सरकार को बचाते हुए दिखाई दिए।
ये उत्तराखंड का दुर्भाग्य ही है कि जिस भीषण त्रासदी के वक्त प्रदेश के मुख्यमंत्री को सरकार में शामिल सभी लोगों को साथ लेकर ज्यादा से ज्यादा आपदा प्रभावितों को दर्द बांटकर उनके राहत एवं पुनर्वास में पूरी ताकत के साथ जुट जाना चाहिए था वह मुख्यमंत्री सरकार की नाकामियों को छिपाने के साथ ही मीडिया मैनेजमेंट कर अपनी कुर्सी बचाने की जुगत में लगा हुआ है..! (जरुर पढ़ें- उतराखंड आपदा - एक कौम ऐसी भी..!)


गुरुवार, 27 जून 2013

उतराखंड आपदा - एक कौम ऐसी भी..!

उत्तराखंड में कुदरती आफत में सेना की राहत के बीच एक कौम ऐसी भी है जिसके लिए मानवीय संवेदनाएं कोई मायने नहीं रखती। उनके लिए आपदा भी एक पर्यटन सीजन की तरह है जिसमें वे अपना चेहरा चमकाने का कोई मौका नहीं छोड़ते..!
उत्तराखंड में भीषण त्रासदी के बाद से बीते कुछ दिनों में कुछ ऐसा हुआ जो किसी का भी सिर शर्म से झुकाने के लिए काफी है लेकिन खुद को जनता के कर्णधार बताने वाले इस कौम के लोगों को शर्म नहीं आती..! ये विपदा में घिरे इंसानों के हालातों पर भी अपनी नेतागिरी चमकाने का कोई मौका नहीं छोड़ते और लाशों पर भी अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने से गुरेज नहीं करते..!
शुरुआत जैसे तैसे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने विजय बहुगुणा से ही करें तो याद आता है कि किस तरह आपदा के बाद मुख्यमंत्री महोदय देहरादून से रुद्रप्रयाग पहुंचने के बाद वहां से सीधे दिल्ली के लिए उड़ गए। जिस बहुगुणा को लोगों को अपने चौपर से उतरकर लोगों के बीच जाकर उनका हौसला बढ़ाना था वो चाटुकारिता की सारी हदें पार करते हुए प्रभावितों को उनके हाल पर छोड़कर अपने आकाओं के पास दिल्ली के लिए उड़ गए..!
लौट कर वापस आए तो अपने आकाओं के साथ जिनके चक्कर में कई घंटे तक राहत एवं बचाव कार्य रोकना पड़ा...वजह बताई गई सुरक्षा..! लेकिन इस बात का जवाब किसी के पास नहीं था कि मौत के मुंह में फंसे करीब 80 हजार लोगों की जिंदगी की क्या कोई कीमत नहीं है..?
हवाई सैर को तरसने वाले उत्तराखंड सरकार के मंत्रियों, विधायकों के लिए तो मानो आपदा ने उनकी मन की मुराद पूरी कर दी। दे दनादन एक के बाद एक आपदा प्रभावित क्षेत्रों के दौरे के नाम पर मननीय खूब हवाई सैर कर रहे हैं। सरकार के एक कद्दावर मंत्री हरक सिंह रावत ने तो आपदा राहत सामग्री ले जाने की तैयारी में हैलिपेड में खड़े एक हेलिकॉप्टर से अपनी हवाई सैर के लिए राहत सामग्री तक उतरवा दी। अब इनके दौरों से आपदा प्रभावितों को कितना फायदा हुआ..? आपदा में फंसे कितने लोगों की जान इन्होंने बचाई ये  जगजाहिर है..!
अक्सर चर्चाओं में रहने वाले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी साहब का उत्तराखंड दौरा बहुगुणा सरकार के साथ ही केन्द्र सरकार को भी खल गया तो उन्होंने  किसी भी वीआईपी को आपदा प्रभावित क्षेत्रों में जाने पर रोक लगाने का आदेश जारी कर दिया लेकिन मजबूत पीआर वाले सीएम साहब ने 15 हजार गुजरातियों को बचाकर अपने साथ ले जाने का दावा कर सबकी नींद उड़ा दी...ये बात अलग है कि अब उस पर पार्टी की तरफ से सफाई पेश करने का दौर शुरु हो चुका है..!
अपने नेता के लिए अपने ही आदेश को पलटने वाले केन्द्रीय गृहंमंत्री सुशील कुमार शिंदे और बहुगुणा फिर विवादों में घिरे जब राहुल गांधी को तो उत्तराखंड के आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने की ईजाजत दे दी गयी जबकि दूसरे नेताओं को नहीं..!
ये छोड़िए अपदा के बीच अचानक से राहत सामग्री के ट्रकों को हरी झंडी दिखाते हुए दिल्ली में अपनी मां सोनिया गांधी के साथ प्रकट हुए राहुल गांधी ने जिन ट्रकों को प्रभावितों की मदद के लिए रवाना किया था उनके पहिए ऋषिकेश में जाकर थम गए...ख़बर है कि ट्रकों में आगे बढ़ने के लिए न तो डीजल है और न ही ट्रक ड्राईवरों के पास खाने के लिए पैसे..! अब इन ट्रकों को राहुल के उत्तराखंड दौरे की भूमिका तैयार करने के लिए और फोटो खिंचवाने के लिए रवाना किया गया था या फिर वास्तव में मदद का जज्बा था ये तो कांग्रेसी ही बेहतर जानते होंगे..! मैं तो कहता हूं कि एक बार इन ट्रकों का तिरपाल हटाकर भी देख लेना चाहिए कि ट्रकों में वाकई में राहत सामग्री है भी कि नहीं..!
वहीं उत्तराखंड पहुंचने में जिन राज्यों के मुख्यमंत्री पीछे रह गए वे धड़ाधड़ उत्तराखंड पहुंचने लगे और अपने अपने राज्यों के लोगों के बीच उनके रहनुमा बनने की कोई कसर नहीं छोड़ी।
देहरादून के जौलीग्रांट एयरपोर्ट पर आंध्र प्रदेश से कांग्रेस सांसद हनुमंत राव और टीडीपी सांसद रमेश राठौड़ की हरकतों ने तो शर्म को भी शर्म से पानी पानी कर दिया। वोटबैंक की राजनीति के लिए...खुद को आंध्र के लोगों का हिमायती दिखाने के लिए आपस में ही गुत्थम गुत्था हो गए।
भीषण आपदा के बीच लोगों को जान के लाले पड़े हुए थे...लोग भूख- प्यास से दम तोड़ रहे थे लेकिन नेता इसमें भी अपना अपना वोटबैंक तलाश रहे थे। ये सब पूरे देश की जनता के सामने हुआ लेकिन अफसोस इसके बाद भी ये नेता फिर से विधानसभा और संसद तक पहुंचेंगे..! हर बार यही तो होता आया है...क्या हम उम्मीद कर सकते हैं कि अब जागेगी देश की जनता..? और ऐसे नेताओं को सबक सिखाएगी..!

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मंगलवार, 25 जून 2013

वाह बहुगुणा ! हजारों मर गए, अब याद आया कर्तव्य..!

उत्तराखंड की बहुगुणा सरकार प्रदेश में आपदा प्रबंधन को लेकर कितनी तैयार थी इसकी पोल रुद्रप्रयाग, चमोली, उत्तरकाशी, और पिथौरागढ़ जिले में तबाही के बाद सबके सामने खुल ही चुकी है। शुक्र है सेना के जवानों का जिन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए हजारों लोगों को मौत के मुंह से निकालकर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। कैग की रिपोर्ट पहले ही आपदा प्रबंधन की जमीनी हकीकत को बेपर्दा कर चुकी है कि किस तरह 2007 में स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट ऑथोरिटी की आज तक कोई बैठक ही नहीं हुई है। ये छोडिए इस ऑथोरिटी ने आपदा से निपटने के लिए न कोई नियम कानून बनाए और न ही कोई दिशा निर्देश जारी किए। ऐसे में अब उत्तराखंड के राज्यपाल अजीज कुरैशी ने भी आपदा प्रबंधन के मोर्चें पर फेल बताया है। राज्यपाल ने कहा है कि उत्तराखंड की चार धाम यात्रा अव्यवस्थाओं से भरी पड़ी थी और आपदा आने पर इसके प्रबंधन की सरकार की कोई तैयारी नहीं थी।
राज्यपाल का चार धाम यात्रा की तैयारी और आपदा प्रबंधन को लेकर सरकार पर सवाल खड़ा करना अपने आप में बड़ी बात है। ये सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं क्योंकि बीते साल मई माह में उत्तराखंड का राज्यपाल नियुक्त होने के बाद अजीज कुरैशी ने सड़क मार्ग से बदरीनाथ धाम की यात्रा की थी। बदरीनाथ की यात्रा से लौटने के बाद राजभवन में राज्यपाल अजीज कुरैशी के आधे घंटे के साक्षात्कार के दौरान मैंने जब राज्यपाल से चार धाम यात्रा को लेकर सवाल किए तो राज्यपाल अजीज कुरैशी ने चार धाम यात्रा मार्ग में अव्यवस्थाओं को लेकर सरकार के खिलाफ खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर की थी। इतना ही नहीं राज्यपाल ने चारों धामों के लिए डेवलेपमेंट ऑथोरिटी बनाए जाने की भी वकालत की थी। इसके लिए राज्य सरकार को पत्र लिखकर निर्देशित भी किया था लेकिन बहुगुणा सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। (जरुर पढ़ें- उत्तराखंड के वो दिल्ली वाले मुख्यमंत्री..!)
आपदा प्रबंधन के मोर्चे पर पूरी तरह फेल होने के बाद भी राज्य के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा साहब को शर्म नहीं है..! बहुगुणा सरकार अखबारों और समाचार चैनलों में आपदा राहत कार्य के दौरान हजारों लोगों को बचाने का दावा करने वाले बड़े बड़े विज्ञापनों के जरिए वाहवाही लूटने में लगी है लेकिन सरकार के किसी नुमाईंदे के पास इस बात का जवाब नहीं है कि आखिर क्यों समय रहते आपदा प्रबंधन को लेकर सरकार ने कोई कदम क्यों नहीं उठाया..?
अखबारों औऱ टीवी चैनलों में लाखों रुपए के इन विज्ञापनों के जरिए विजय बहुगुणा के नाम से एक संदेश जारी किया गया है। संदेश हैं – प्रत्येक जीवन अमूल्य है- उसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है- विजय बहुगुणा, मुख्यमंत्री उत्तराखंड।
मुख्यमंत्री साहब से सवाल करना चाहूंगा कि आपके इस कर्तव्य की याद आपको हजारों लोगों की मौत के बाद ही क्यों आई..?  हर साल उत्तराखंड में हजारों लोग आपदा की भेंट चढ़ते हैं लेकिन तब सरकार को...आपको अपना कर्तव्य याद क्यों नहीं आता..?
माना आप पिछले साल ही जैसे तैसे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने हैं (जरुर पढ़ें- विजय बहुगुणा कैसे बने मुख्यमंत्री ?) लेकिन आपके कुर्सी संभालने के बाद बीते साल उत्तरकाशी में आपदा ने सैंकड़ों लोगों को लील लिया था लेकिन तब भी आपको अपने इस कर्तव्य की याद नहीं आयी जिसे आप आज लाखों रुपए खर्च कर अखबारों और टीवी चैनलों में विज्ञापन के जरिए लोगों को बता रहे हैं कि आपका कर्तव्य क्या है..?
बीते साल तो आपदा प्रबंधन का खामियों का ठीकरा आपने पिछली भाजपा सरकार पर फोड़ दिया था लेकिन अब क्यों आपके पास कोई जवाब नहीं है..? सेना के जवान अपनी जान को जोखिम में डालकर लोगों की जान बचा रहे हैं और आप अखबारों में टीवी चैनलों को विज्ञापन जारी कर अपना चेहरा चमका रहे हैं। बहुगुणा साहब अखबारों, समाचार चैनलों में विज्ञापन के बजाए इस पैसे का इस्तेमाल आपदा प्रभावितों को राहत पहुंचाने में करते तो शायद आपदा पीड़ितों का दर्द कुछ कम होता लेकिन आपके लिए तो सरकारी पैसे से विज्ञापन जारी कर अपनी फोटो छपवाकर सरकार की छवि को सुधारने की ज्यादा चिंता है लेकिन ये मत भूलिए बहुगुण साहब की जनता को अब आप इतनी आसानी से नहीं बरगला सकते।


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सोमवार, 24 जून 2013

जिंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर

जिंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर, जान देने की रुत रोज आती नहीं...ये पंक्तियां मानो भारतीय सैनिकों के लिए ही रची गयी। सीमा पर दुश्मन को मुंह तोड़ जवाब देना हो या फिर देश के भीतर आयी कोई भीषण आपदा या विपदा सहारा सिर्फ और सिर्फ भारत के वीर सैनिकों का ही है। भारत के वीर जवानों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वे विपरित परिस्थितियों में भी किसी भी मुश्किल हालात का सामना कर सकते हैं। फिर चाहे सीमा पर दुश्मन की गोलियों का जवाब देना हो या फिर उत्तराखंड जैसे किसी राज्य में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे आपदा में फंसे हजारों लोगों को खतरों से भरे दुर्गम पहाड़ी इलाकों से सुरक्षित स्थान पर पहुंचाना हो।
उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग और चमोली के दुर्गम पहाड़ी इलाकों में जहां एक तरफ पहाड़ों से मौत के रुप में पत्थर और विशालकाय बोल्डर बरस रहे हों और दूसरी तरफ पूरे उफान पर नदियों में मौत बह रही हो...ऐसे रास्तों से आपदा में फंसे हजारों लोगों को सुरक्षित निकालना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है लेकिन भारतीय सेना के वीर जवानों ने अपनी जान की परवाह किए बगैर दिन रात एक करके हजारों लोगों की जिंदगी की उम्मीद को जिंदा रखा।
राहत एवं बचाव कार्य में लगे सभी जवानों का जोश और जज्बा देखने लायक है। खुद को मौत के मुंह में झोंक पर दूसरे की जान बचाना कोई इनसे सीखे।
अपने कंधों पर खतरों से भरे रास्ते पर उन श्रद्धालुओं को उठाकर पहाड़ों पर चढ़ना...जहां पर एक गलत कदम उन्हें पूरे उफान पर मौत के रुप में बहती नदियों में झोंक सकता है...वाकई में रोंगटे खड़े कर देता है लेकिन सेना के इन वीर जवानों के चेहरे पर इसके बाद भी कोई शिकन नहीं है। एक श्रद्धालु को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाकर वे दूसरे श्रद्धालु की जान बचाने में जी जान से जुट जाते हैं।
आईटीबीपी की आठवीं बटालियन के कमांडिग ऑफिसर जी एस चौहान कहते हैं कि आपदा के बाद कई जवानों ने तो पहले से स्वीकृत अपनी छुट्टियों पर जाने से खुद ही मना कर दिया और जो जवान छुट्टी पर थे भी वे लोग भी आपदा के बाद मुश्किल में फंसे लोगों की मदद करने के लिए वापस आ गए। सलाम है ऐसे वीर जवानों को।
तस्वीर का एक पहलू और देखिए एक तरफ ये जवान हैं जो अपनी जान जोखिम में डालकर लोगों की जान बचा रहे हैं और दूसरी तरफ हैं उत्तराखंड के वो दिल्ली वाले मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा जो आपदा के बाद आपदाग्रस्त क्षेत्रों में कैंप कर प्रभावितों का हौसला बढ़ाने की बजाए अपने उडनखटोले को दिल्ली की ओर मोड़ लेते हैं और जब वापस आते भी हैं तो देहरादून में बैठकर सुबह शाम प्रेस कांफ्रेंस कर इस आपदा को प्रकृति का कहर बताते हुए अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाडने का कोई मौका नहीं छोड़ते..! वैसे भी जिस व्यक्ति ने पहाड़ को, पहाड़ के लोगों की पीड़ा को कभी समझा ही नहीं उससे और क्या उम्मीद की जा सकती है..?

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