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शुक्रवार, 21 जून 2013

त्रासदी - उत्तराखंडियों का क्या होगा..?

उत्तराखंड में आपदा में फंसे यात्रियों को निकालने के लिए राहत एवं बचाव कार्य जारी है...ये बात अलग है कि सुरक्षित स्थानों पर पहुंच रहे यात्रियों का अनुभव राहत एवं बचाव कार्य की चौंकाने वाली हकीकत सामने ला रहा है लेकिन फिर भी उम्मीद करते हैं कि सभी यात्री सकुशल अपने अपने घर पहुंच जाएं। (जरुर पढ़ें- ओ गंगा तुम, ओ गंगा बहती हो क्यों..?)
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद सरकार गति में आयी है और राहत एवं बचाव कार्य में अपेक्षाकृत तेजी दिखाई दे रही है लेकिन एक सवाल बार बार जेहन में उठ रहा है कि जब उत्तराखंड के उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग और चमोली जिले के अलग अलग क्षेत्रों में फंसे यात्रियों को सकुशल सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया जाएगा उसके बाद क्या होगा..?
जो लोग आपदा प्रभावित इलाकों के रहने वाले हैं...जिनकी घर-गृहस्थी पूरी तरह से तबाह हो चुकी है...जिनके पास सिर्फ शरीर के कपड़े छोड़कर और कुछ नहीं बचा है...जिनके घर के कमाने वाले अब उनसे बिछुड चुके हैं उनका क्या होगा..?
ये तो अभी मानसून की दस्तक मात्र थी...असली बरसात तो अभी बाकी है...ऐसे में कहां वे रहेंगे..? कैसे वे रहेंगे..? कैसे वे दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करेंगे..?
ऐसे तमाम सवाल हैं जो दिल को दुखा रहे हैं और लगातार उलझन में डाल रहे हैं...लेकिन शायद इसका जवाब न तो आपदा प्रभावितों के पास है और न ही उस सरकार के पास जिसने हर साल ऐसी ही आपदाओं से दो चार होने वाले इन लोगों की कभी सुध ली..!
जाहिर है सभी फंसे हुए लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने के बाद सरकार और प्रशासनिक मशीनरी सुस्त पड़ेगी और फिर से सरकार उसी पुराने ढर्रे पर लौट आएगी..! हालांकि मृतकों और घायलों के परिजनों के साथ ही अपना सबकुछ गंवा चुके लोगों को सरकारी मदद का ऐलान तो कर दिया गया है लेकिन ये मदद इनके लिए उसी तरह है जैसे ऊंट के मुंह में जीरा..!
अपनों को खो चुके लोगों की कमी तो ये राहत राशि कभी नहीं कर पाएगी लेकिन जिंदगी फिर से पटरी पर लौट सके इसका सिर्फ एक ही विकल्प है...सिर पर छत और जेब में पैसा..!
ऐसा नहीं है कि सरकार सिर्फ आर्थिक मदद देकर पल्ला झाड़ लेगी...बेघर हो चुके लोगों को पुनर्वासित करने के लिए भी सरकार काम करेगी लेकिन प्रभावितों का पुनर्वास कब तक हो पाएगा..?
उत्तराखंड में 2010 में आयी आपदा अगर आपको याद हो तो बताना चाहूंगा कि उस वक्त भी प्रदेश के अलग अलग जिलों में कुछ इस तरह का ही मंजर था। फर्क सिर्फ इतना था कि उस वक्त चार धाम यात्रा पर कुदरत का कहर इतना नहीं टूटा था और मौत का आंकड़ा भी इतना नहीं था लेकिन सैंकड़ों लोगों की घर-गृहस्थी आपदा भी भेंट चढ़ गयी थी। सरकार ने उस वक्त भी सभी प्रभावितों के राहत और पुनर्वास पर काम करते हुए सभी के पुनर्वास का दावा किया था लेकिन जमीनी हकीकत इससे इतर है...बीते दिनों एक टीवी चैनल पर आई एक रिपोर्ट ने इस सच्चाई पर से पर्द हटाते हुए दिखाया था कि आज भी कई परिवार ऐसे हैं जिन्हें राहत के नाम पर चंद सिक्के तो मिले लेकिन सिर पर छत आज तक नसीब नहीं हो पायी है...ये लोग आज भी टेंटों में जीवन बसर कर रहे हैं..!
वैसे भी राहत और पुनर्वास के नाम पर जारी कितना पैसा वास्तव में प्रभावितों तक पहुंच पाता है इस हकीकत से सभी वाकिफ हैं..!
ये ख़्याल तक मन में एक डर पैदा कर रहा है कि आपदा प्रभावित कैसे अपने आगे का जीवन बसर करेंगे..? क्योंकि सुस्ती के बाद सरकार की ये चुस्ती तभी तक है जब तक देशभर के यात्री उत्तराखंड में फंसे हैं..! जैसे ही सारे यात्रियों को सुरक्षित निकाल लिया जाएगा उसके बाद उत्तराखंड के आपदा प्रभावितों को दर्द साझा करने वाला कोई नहीं होगा..! (जरुर पढ़ें- उत्तराखंड के वो दिल्ली वाले मुख्यमंत्री..!)
वैसे भी उत्तराखंड सरकार के लिए तो पहाड़ के लोगों की दिक्कतें आम हैं...फिर चाहे सरकार भाजपा की रही हो या फिर कांग्रेस की उन्हें लगता है कि इन्हें तो हर साल बरसात में इस दर्द को बर्दाश्त करने की आदत है शायद इसलिए सब कुछ जानते हुए भी कि पहाड़ में मानसून का आगमन एक बड़ी विपदा का आगमन है सरकारें इससे निपटने के लिए न तो कोई प्रभावी कार्ययोजना तैयार की जाती है और न ही आपदा प्रबंधन के पर्याप्त इंतजामात किए जाते हैं..! नतीजा हर साल आसमानी आफत सैंकड़ों लोगों की जिंदगियां लील जाती है तो हजारों लोगों के सपनों को पानी में मिला देती है..! एक बार फिर वही स्थिति हैलोग आपदा का दर्द झेल रहे हैं लेकिन सवाल वहीं खड़ा है कि क्या इस बार टूटेगी सरकार की नींद..!


deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 19 जून 2013

ओ गंगा तुम, गंगा बहती हो क्यों..?

उत्तराखंड में कुदरत के इस कहर से हर कोई हैरान है...शासन-प्रशासन बेबस है...हर किसी के जुबान पर यही सवाल है कि आखिर ये तबाही क्यों..? तबाही का ये मंजर दर्दनाक और दिल को दहला देने वाला जरुर है लेकिन आज नहीं तो कल ये होना ही था..! कुदरत अपना हिसाब खुद बराबर करती है...उसे न तो जेसीबी मशीन की जरुरत है न ही किसी विस्फोटक की..! उसने तो एक झटके में सब तहस नहस कर दिया..!
आसमान से बादलों की गर्जना शुरु हुई तो जीवनदायनि ने रौद्र रुप धारण कर लिया...पहाड़ों का सीना दरकने लगा और जीवन देने वाली मौत देने पर अमादा हो गयी..! रास्ते में जो मिला सब बहा कर ले गयीक्या घर, क्या सड़कें, क्या पुल, क्या गाड़ियां, क्या पेड़, क्या इंसान, क्या जानवर! भागीरथी मानो सब कुछ बहा ले जाना चाहती थी..!
चारों तरफ हाहाकार मचा था...हर कोई ये जानना चाहता था कि आखिर कुदरत क्यों इतना रूठ गयी है कि सब कुछ तबाह कर देना चाहती है..! इसका जवाब को लेकर एक बड़ी बहस शुरु हो सकती है लेकिन इसका जवाब तबाही के इस मंजर में ही छिपा हुआ है। याद कीजिए उत्तराखंड राज्य निर्माण से पहले का वो समय जब गंगा अविरल बहती थी...उसे अतिक्रमण की दीवारों में कैद करके नहीं रखा गया था..! 200-200 फिट चौड़ी गंगा को 20-20 फिट की नहरों मे तब्दील नहीं किया गया था। गंगा अपने तट पर बसने वाले करोड़ों लोगों को जीवन देते हुए बिना रुके बहती थी..!
इंसान हो, वनस्पतियां हों या फिर जानवर गंगा सबके लिए जीवनदायिनि थी लेकिन बीते कुछ सालों में गंगा का स्वरुप बदलता चला गया। गंगा को कभी बांधों ने बांधा तो कभी गंगा किनारे अवैध अतिक्रमण के नाम पर बने होटल, रेस्टोरेंट और अवैध बस्तियों ने गंगा की पहचान को ही खत्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ी..! अतिक्रमण से भी मन नहीं भरा तो होटल, रेस्टोरेंट और अवैध बस्तियों का मल मूत्र भी गंगा में ही डाला जाने लगा..! गंगा धीरे-धीरे एक गंदे नाले में तब्दील होने लगी..!
निर्मल पावन गंगा की जगह भ्रष्टाचार की मैली गंगा बहने लगी और हर कोई भ्रष्टाचार की इस गंगा में डुबकी लगाकर अपने ऐशो आराम की हर वस्तु पा लेना चाहता था..!
गंगा घुट- घुट कर बहने पर मजबूर होने लगी तो पेड़ों की अवैध कटाई से हरे भरे वनों से आच्छादित खूबसूरत पहाड़ियां भी कंक्रीट के जंगलों में तेजी से तब्दील होने लगी..! गंगा अतिक्रमण की बेड़ियों से मुक्त होकर अविरल करोड़ो लोगों को जीवन देते हुए बहना चाहती थी लेकिन गंगा के इस दर्द को किसी ने नहीं समझा..! ऐसे में भागीरथी क्या करती..?
कई बार छोटी मोटी आपदाओं के जरिए कुदरत ने अपने निजि स्वार्थों के लिए प्रकृति से खिलवाड़ कर रहे लोगों को संदेश देने की कोशिश भी की लेकिन कुदरत के ये इशारे समझने में इंसान नाकाम रहा या यूं कहें कि किसी ने समझने की कोशिश ही नहीं की..!
नासमझ लोगों को समझाने के लिए कुदरत के पास शायद आखिर में यही एक रास्ता था देवभूमि को विकृत होने से रोकने का...देवभूमि को वापस उसके स्वरूप में लाने का...तो कुदरत ने अपना रास्ता खुद बना लिया..!
इसका ये मतलब कतई नहीं है कि पहाड़ों में विकास कार्य न किए जाएं...वहां के लोग बिजली, पानी और सड़क से महरूम रहें लेकिन प्रकृति से छेड़छाड किए बिना भी तो ये सब संभव है। प्रभावी कार्ययोजना के साथ...निजि स्वार्थों को त्याग कर भी तो पहाड़ों में विकास की गंगा बहायी जा सकती है। इस तरह पहाड़ की खूबसूरती भी बरकरार रहेगी और भागीरथी के प्रवाह को रोकने की भी जरुरत नहीं पड़ेगी लेकिन अफसोस ऐसा होता नहीं है..!
तबाही के इस भयावह मंजर के बाद भी शासन-प्रशसान के साथ ही स्थानीय लोग सबक लें तो भी भविष्य में ऐसी आपदाओं को रोका तो नहीं जा सकता लेकिन इससे होने वाले जान माल के नुकसान को कम जरुर किया जा सकता है। लेकिन सवाल फिर खड़ा होता है कि क्या ऐसा कभी हो पाएगा..?
आखिर में गंगा की हालत और तबाही के इस मंजर पर गंगा पर लिखी गयी ये पंक्तियां याद आ रही हैं।

विस्तार है अपार प्रजा दोनों पार
करे हाहाकार निःशब्द सदा
ओ गंगा तुम, गंगा बहती हो क्यों
नैतिकता नष्ट हुयी, मानवता भ्रष्ट हुयी
निर्लज्ज भाव से बहती हो क्यों
इतिहास की पुकार करे हुंकार
ओ गंगा की धार निर्बल जन को
सबल संग्रामी समग्र गामी बनाती नहीं हो क्यों
ओ गंगा तुम, गंगा बहती हो क्यों


deepaktiwari555@gmail.com

मंगलवार, 18 जून 2013

उत्तराखंड के वो दिल्ली वाले मुख्यमंत्री..!

सुना है...उत्तराखंड के दिल्ली वाले मुख्यमंत्री आजकल भारी टेंशन में हैं..! विजय बहुगुणा को जैसे तैसे मुख्यमंत्री की कुर्सी तो मिल गयी लेकिन करना क्या है..? ये कौन बताए..? ऐसे में देहरादून में हैलीपेड पर सीएम साहब का सरकारी चौपर फर्राटे भरने के लिए हरदम तैयार रहता है। क्या पता..? कब क्या पूछने दिल्ली जाना पड़ जाए..? अब हर फैसले खुद से तो ले नहीं सकते न..! साहब को दस जनपथ में ताल भी तो ठोंकनी होती है ताकि 10 जनपथ के चक्कर लगा लगाकर बड़ी मुश्किल से हाथ आई कुर्सी कहीं सरक न जाए..!
दरअसल ख़बर है कि लंबे चौड़े कद वाले सीएम साहब को छोटे प्रदेश की बड़ी कुर्सी संभालने में पसीने छूट रहे हैं..! जब कुर्सी मिली थी तो अपनी ही पार्टी के नेताओं ने विरोध में मोर्चा खोल दिया था...जैसे तैसे मामला ठंडा पड़ा तो बीते साल आपदा ने उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों का नक्शा ही बदल कर रख दिया..!
सरकार पर सवाल उठने लगे तो नए नवेले मुख्यमंत्री बने बहुगुणा ने आपदा प्रबंधन के पर्याप्त इंतजामात न होने पर इसका ठीकरा सूबे की पिछली भाजपा सरकार पर फोड़ दिया। यहां तक तो ठीक था लेकिन इसके बाद आपदा प्रभावितों के राहत और पुनर्वास पर जोर देने की बजाए सीएम साहब ने प्रभावितों को भजन कीर्तन करने की तक सलाह दे डाली थी..!  
एक बार फिर से उत्तराखंड आपदा की चपेट में हैं...बीते साल भाजपा सरकार पर आपदा प्रबंधन की तैयारी न होने का ठीकरा फोड़ने वाले सीएम साहब पशोपेश में हैं कि करें तो क्या..?
अपनी ही पार्टी के नेताओं और विधायकों की आपदा से पहले ही घिरे बहुगुणा के लिए दैवीय आपदा दोहरी मुसीबत लेकर आयी है..! अब तो बीते साल वाला बहाना भी नहीं चलेगा वरना ठीकरा पिछली भाजपा सरकार पर फोड़कर अपना पल्ला झाड़ लेते..!
भारी टेंशन में घिरे सीएम साहब की मुश्किल अब कैसे आसान हों..? एक सुपुत्र से बड़ी उम्मीद थी लेकिन उसने भी टिहरी उपचुनाव में कहीं का नहीं छोड़ा..! लेकिन सुना है कई विधाओं में माहिर सुपुत्र खूब खेल कर रहे हैं..! सुना तो यहां तक है कि साहब ने तो प्रदेश में कई जगह जमीन पर रहते हुए ही करोड़ों का खेल कर दिया..! राजनीति चले न चले जीवन की गाड़ी पूरे ठाठ से बिना रुके चले इसका पूरा इंतजाम तो कर ही लिया है..!  
दिल्ली की दौड़ लगाने को हरदम तैयार बैठे रहने वाले बहुगुणा अब दिल्ली जाने में भी घबरा रहे हैं..! दरअसल हरियाणा के हथिनी कुंड बैराज से पानी यमुना के रास्ते दिल्ली पहुंच गया है। यमुना खतरे के निशान से ऊपर बह रही है ऐसे में बाढ़ के मुहाने में बैठी दिल्ली में कोई क्यों आना चाहेगा भला..? हिमाचल प्रदेश में मंडी उपचुनाव के लिए प्रचार करने किन्नौर पहुंचे मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ये गलती कर ही चुके हैं और सांगला घाटी में फंसे हुए हैं..!
सुना है बहुगुणा बड़े चतुर हैं..! वे वीरभद्र सिंह जैसी गलती नहीं करेंगे..! सीएम हाउस में बैठकर दिल्ली आने जाने में हुई डेढ़ साल की थकान उतारेंगे और फिर जब इंद्र देव की कृपा कम होगी और गंगा- यमुना शांत हो जाएंगी तो फिर से दिल्ली चले जाएंगे..! लेकिन सीएम साहब दिल्ली यूं ही नहीं जाएंगे बकायदा उत्तराखंड के आपदा प्रभावितों के राहत और पुनर्वास के नाम पर करोड़ों का पैकेज मागेंगे और फिर मीडिया में बघारेंगे कि उन्हें आपदा प्रभावितों की बड़ी फिक्र है...इसके लिए पांच साल में पांच हजार बार भी दिल्ली के चक्कर लगाना पड़े तो खुशी से लगाउंगा..! जय उत्तराखंड।।



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रविवार, 16 जून 2013

गठबंधन - दोस्त बन गए दुश्मन..!

17 साल तक मजबूती से बंधी भाजपा और जद यू बंधन की गांठ आखिर खुल ही गयी। दोनों के रास्ते भले ही अलग अलग हो गए हों लेकिन दोनों की मंजिल एक ही है...किसी भी तरह से सत्ता को हासिल करना..! 17 साल पहले भी जब ये गांठ बंधी थी तब भी दोनों सत्ता पाने के लक्ष्य को लेकर साथ हो चले थे और आज जब ये गांठ खुल गयी है तो भी दोनों की निगाहें सत्ता पर ही हैं..!
वैसे भी राजनीति की यही रीत है...यहां न तो कोई स्थायी दुश्मन होता है और न ही स्थाई दोस्त..! जब..जहां...जो उपयोगी लगता है...वो दोस्त बन जाता है और जब इसी दोस्त से अपना नुकसान लगने लगता है तो दोस्ती को तोड़ने में देर नहीं की जाती...फिर भले ही ये दोस्ती 17 साल पुरानी क्यों न हो..?
भाजपा और जद यू की दोस्ती की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। सत्ता हासिल करने के लक्ष्य को लेकर 17 साल पहले दोनों ने हाथ मिलाया था। दोनों एक दूसरे के काम भी आए और समय समय पर आपसी समझौते के आधार पर दोनों ने सत्ता सुख भी भोगा...फिर चाहे वो केन्द्र का मामला हो या फिर बिहार का..!
दोस्ती में उतार चढ़ाव आते रहते हैं लेकिन खासकर मुसीबत में सच्चे दोस्त कभी साथ नहीं छोड़ते लेकिन अगर ये दोस्ती राजनीतिक हो और सत्ता सुख भोगने के लिए की गयी हो तो फिर इस दोस्ती को दुश्मनी में बदलने में देर नहीं लगती..!
जद यू और भाजपा की दोस्ती भी राजनीतिक थी ऐसे में देर सबेर इस दोस्ती को टूटना ही था। लंबे समय से केन्द्र की सत्ता से दूर भाजपा हर हाल में सत्ता पाने को आतुर है ऐसे में भाजपा को मोदी की बढ़ती लोकप्रियता इसका रास्ता दिखाई देने लगी तो भाजपा ने तमाम विरोधों के बाद भी मोदी की ताजपोशी 2014 की चुनाव अभियान समिति के चेयरमैन की कुर्सी पर कर दी।
मोदी को सांप्रदायिक मानने वाली जद यू को भाजपा का ये फैसला बिहार में उसके लिए नुकसान की चाबी लगा..! ऐसे में जद यू को भाजपा के साथ दोस्ती में एक खास वर्ग के वोटरों का उससे खिसक जाने का भय लगने लगा तो जद यू ने भाजपा से 17 साल पुरानी दोस्ती तोड़ दी..!
भाजपा और जद  दोनों में से किसी ने भी 17 साल पुरानी इस दोस्ती को कायम रखने की कोशिश नहीं की और दोनों ही अपनी – अपनी जिद पर अड़े रहे। मजे की बात तो ये है कि बंधन की गांठ खुलने पर दोनों अब एक दूसरे को दोषी ठहरा रहे हैं..!
राजनीति के इस रुप को भी समझिए जो नेता अब तक साथ मिलकर बिहार की जनता के हक की बात करते हुए अलग अलग मुद्दों पर एक स्वर में फैसले लेते थे अब उन्हीं नेताओं में एक-एक मुद्दे पर तकरार सुनाई देगी..! शुरुआत भाजपा ने नीतीश कुमार का इस्तीफा मांग कर और 18 जून को बिहार बंद के एलान के साथ कर ही दी है..!
बहरहाल अपने अपने राजनीतिक फायदे के लिए वोटबैंक की राजनीति के रास्ते पर दोनों दल भले ही चल दिए हों लेकिन इन्हें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि जो जनता इन्हें सत्ता तक पहुंचा सकती है...वही जनता इन्हें सत्ता से बेदखल भी कर सकती है..!


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शनिवार, 15 जून 2013

नीतीश तो 2002 से खा रहे हैं मरने की दवा..?

एनडीए से जद यू के अलग होने की संभावनाओं के बीच बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक शेर पढ़ते हुए अपने दिल की बात कुछ यूं कही...दुआ देते हैं जीने की, दवा देते हैं मरने की...नीतीश कुमार के इस शेर का मतलब तो आप समझ ही गए होंगे कि इस शेर में दुआ का क्या मतलब है और दवा के क्या मायने हैं।
जाहिर है भाजपा-जद यू गंठबंधन को न तोड़ने की भाजपा की मंशा को नीतिश ने दुआ में व्यक्त किया है तो गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को चुनाव अभियान समिति का चेयरमैन बनाने को नीतीश ने दवा के रुप में..! कुल मिलाकर नीतीश के तेवरों और इस शायराना अंदाज का साफ मतलब है कि नीतीश 2014 के लिए मोदी को भाजपा के संभावित पीएम पद के उम्मीदवार के रुप में किसी भी कीमत में स्वीकार नहीं करना चाहते हैं फिर चाहे इसके लिए जद यू और भाजपा का 17 साल पुराना साथ ही क्यों न छूट जाए..!
सेक्यूलरिज्म की बात करने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को मोदी 17 सालों तक सेक्यूलर नजर आते हैं लेकिन बात जब प्रधानमंत्री की कुर्सी की आती है तो यही मोदी नीतीश कुमार को सांप्रदायिक नजर आते हैं। सिर्फ सांप्रदायिक नजर आते तो ठीक था लेकिन यहां तो नीतीश को मोदी मरने की दवा लगने लगे हैं..!
ये वही नीतीश कुमार हैं जो 2002 में गुजरात में हुए दंगों के वक्त केन्द्र की तत्कालीन एनडीए सरकार में रेलमंत्री थे। दंगों की वजह से ही नीतीश मोदी को मरने की दवा कह रहे हैं लेकिन अगर वाकई में ऐसा है तो सवाल तो नीतीश पर उठता है कि आखिर क्यों नीतिश ने तब रेल मंत्री की कुर्सी से इस्तीफा देकर अपने रास्ते अलग कर लिए..?
ये छोड़िए इसके बाद क्यों उसी मोदी वाली भाजपा के साथ मिलकर बिहार में विधानसभा चुनाव भी लड़ा..? तब तक भी नीतीश को मोदी सांप्रदायिक नहीं दिखाई दिए..! नीतीश यहां ये तर्क भले ही दे सकते हैं कि वे समय समय पर मोदी का विरोध करते रहे हैं लेकिन इसके बाद भी तो नीतीश मोदी वाली पार्टी के साथ मिलकर ही बिहार में सरकार चला रहे हैं..!
अब मोदी वाली भाजपा में जब मोदी का कद बढ़ रहा है तो नीतीश कुमार एंड कंपनी के पेट में दर्द होने लगा है और वे मोदी के नाम पर भाजपा से गंठबंधन तोड़ने की तैयारी कर रहे हैं..!
नीतीश कुमार जी ये तब भी मोदी वाली ही भाजपा थी जब आप 2002 में एनडीए सरकार में रेल मंत्री थे...ये तब भी मोदी वाली ही भाजपा थी जब आपने बिहार में भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और ये अब भी मोदी वाली वही भाजपा है जिससे अब आप जीने की दुआ के साथ मरने की दवा खिलाने की बात कर गंठबंधन तोड़ने की बात कर रहे हैं..!
नीतीश जी शेर तो आपने आज पढ़ा लेकिन आपके ही अनुसार मरने की दवा तो आप 2002 से खा रहे हैं क्योंकि 2002 में शाद आपसे रेलमंत्री की कुर्सी का मोह नहीं छूट रहा था और उसके बाद बिहार में जद यू की सरकार बनाकर मुख्यमंत्री बनने का सपना आपको साकार करना था..!
सही मायने में राजनीति शायद इसी का नाम है...जब तक अपना फायदा है तब तक सब ठीक है...किसी से भी दोस्ती करने में परहेज नहीं है लेकिन जब अपना नुकसान लगने लगे या फिर सामने वाले आगे बढ़ने लगे तो उसकी टांग खींच दो..!
जद यू भी यही कर रही है...नीतीश को लगता है कि पीएम पद के उम्मीदवार के लिए मोदी के नाम पर सहमति जताने से बिहार का अल्पसंख्यक वोटर उनसे कट जाएगा तो भाजपा को लगता है मोदी की लोकप्रियता के नाम पर 2014 में उनकी नैया तर जाएगी..! लेकिन भाजपा और जद यू दोनों को ही ये नहीं भूलना चाहिए कि ख्वाब वे चाहे जितने बड़े देख लें लेकिन जनता के साथ के बिना ये साकार नहीं हो सकते... क्योंकि ये पब्लिक है...ये सब जानती है..!


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शुक्रवार, 14 जून 2013

नौ साल का वनडे मैच..!


आर्थिक सुधार कोई वन डे मैच नहीं है जिसमें हर गेंद पर विकेट गिरने या छक्का लगने की उम्मीद की जा सके..ये कहना है वित्त मंत्री पी चिदंबरम का। वैसे इसका आशय भी आप समझ ही गए होंगे कि चिदंबरम साहब कहना चाह रहे हैं कि आर्थिक सुधारों के लिए सरकार को और वक्त चाहिए। यूपीए सरकार को नौ साल हो गए हैं लेकिन बकौल चिदंबरम आर्थिक सुधारों के लिए ये नौ साल भी कम हैं..!
चिदंबरम की गणित को समझा जाए तो फिर आर्थिक सुधारों की दिशा में सरकार द्वारा उठाए गए कदमों के बेहतर नतीजे के लिए ये वक्त काफी नहीं है और यूपीए सरकार को कम से कम 50 साल शासन करने का मौका और दिया जाना चाहिए तब जाकर देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर आएगी..!
आर्थिक सुधारों के विषय में अपना सामान्य ज्ञान तो चिबंदरम के आगे कहीं टिकटा नहीं ऐसे में चलिए मान लेते हैं कि चिदंबरम साहब सही कह रहे हैं कि आर्थिक सुधार कोई वन डे मैच नहीं हैं लेकिन ये समझ नहीं आया कि फिर नौ साल तक यूपीए सरकार ने क्या काम किया..? अब जबकि सरकार का कार्यकाल सिर्फ एक साल बचा है तो चिदंबरम जनता को आर्थिक सुधार और वन डे मैच का गणित समझा रहे हैं..!
अरे चिदंबरम साहब आर्थिक सुधारों के संबंध में आपका सामान्य ज्ञान ज्यादा अच्छा होगा लेकिन वन डे मैच और 9 साल के यूपीए सरकार के कार्यकाल को देश की जनता आप से बेहतर ही समझ रही है।
नौ सालों में जब हर गेंद पर घोटालों और भ्रष्टाचार के रिकार्ड आपकी सरकार में शामिल लोग बना सकते हैं लेकिन देश की अर्थ व्यव्स्था को पटरी पर लाने के सवाल पर आप कहते हो कि आर्थिक सुधार कोई वनडे मैच नहीं है। चिदंबरम साहब सरकार में शामिल लोगों को ध्यान अगर घोटालों और भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं होता तो शायद अर्थ व्यवस्था की ये हालत ही नहीं होती..! लेकिन अगर सरकार को अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की चिंता होती तो फिर नेताओं की जेबें घोटालों और भ्रष्टाचार की कमाई से कैसे भरती..?
रुपए की लगातार गिरावट पर चिदंबरम ये कहते हुए खुद के साथ ही जनता को दिलासा दे रहे हैं कि ब्राजील, मैकेसिको और चिली जैसे देश भी खराब दौर से गुजर रहे हैं..! गजब है चिदंबरम साहब तुलना भी कर रहे हो तो ब्राजील, मेक्सिको और चिली से...कभी चीन और जापान की बात भी तो कर लिया करो..आप तो ये देखकर खुश होने में लगे हैं कि चिली, मैक्सिको और ब्राजील भी ख़राब दौर से गुजर रहे हैं..!
दोष आपका भी नहीं है चिदंबरम साहब, जब देश के प्रधानमंत्री देश वासियों का सामान्य ज्ञान ये कहकर बढ़ाते हैं कि पैसे पेड़ पर नहीं लगते तो फिर आपसे क्या उम्मीद की जा सकती है..!

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बुधवार, 12 जून 2013

तौलिया मास्टर और कांडा..!

आईपीएल के तौलिया माटर एस श्रीशांत तिहाड़ से बाहर आ गए हैं। बड़े खुश हैं श्रीशांत महाराज...जेल में श्रीशांत को कांडा गुरु जो मिल गए। कांडा से श्रीशांत इतने प्रभावित हैं कि कांडा की तारीफ करते नहीं थक रहे हैं। कांडा को तो जानते ही होंगे न आप...वही गोपाल कांडा...हरियाण का पूर्व मंत्री जो एयर होस्टेस गीतिका आत्महत्या केस में फिलहाल तिहाड़ जेल में बंद है..!
तौलिया मास्टर कह रहे हैं कि गोपाल कांडा ने जेल में उसका खूब हौसला बढ़ाया...टिप्स भी दिए कि कैसे बुरे वक्त में हिम्मत रखी जाती है। श्रीशांत ने कांडा की तारीफ तो कि लेकिन ये नहीं बताया कि कांडा ने उसे और क्या क्या गुरुमंत्र दिए हैं..? जैसे- कैसे लड़कियों का शोषण करो..? कैसे लड़कियों को ब्लैकमेल करो..? कैसे उन पर अत्याचार करो..? और उन्हें आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर दो..? (पढ़ें ख़बर - तिहाड़ में गोपाल कांडा ने दिए श्रीशांत को 'टिप्स')
अब श्रीशांत ने कितनी सीख ली ये तो श्रीशांत ही जानें लेकिन जिस तरह से जेल से जमानत पर बाहर आने पर श्रीशांत गोपाल कांडा की तारीफ करते नहीं अघा रहे थे उससे तो यही लगता है कि कांडा और श्रीशांत की तिहाड़ में आपस में खूब जमी..!
अरे तौलिया मास्टर अब तो शर्म करो..! और अगर तारीफ ही करनी थी तो किसी दूसरे की कर लेते...लेकिन लगता है कांडा के कारनामों से तुम ज्यादा ही प्रभावित दिखे..! खैर इसमें तुम्हारा भी दोष नहीं है...तिहाड़ में वैसे भी तुम्हें गोपाल कांडा जैसे लोगों के अलावा और मिलता भी कौन..?  
एक ठहरा राजनेता और दूसरा क्रिकेटर...दोनों के पास दौलत और शोहरत की कोई कमी नहीं थी..! लेकिन इनको ये रास नहीं आयी और अपनी अय्याशी के लिए एक ने अपनी ही कंपनी की एयर होस्टेस का जमकर शारीरिक और मानसिक शोषण कर उसे आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया तो दूसरे ने उस खेल को कलंकित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जिस खेल ने उसे दौलत और शोहरत के शिखर पर पहंचाया..!
ये छोड़िए इतना सब होने के बाद भी दोनों खुद को निर्दोष ठहरा रहे हैं और एक दूसरे की तारीफ में कसीदे गढ़ रहे हैं..! अब दोनों वाकई निर्दोष हैं तो भई कम से कम दोनों तिहाड़ जेल प्रबंधन को अपनी मेहमान नवाजी का मौका तो नहीं ही दे रहे होते..!  


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मंगलवार, 11 जून 2013

चिट्ठी में लिखे शब्द कैसे वापस लोगे आडवाणी जी..?

आडवाणी पीएम पद के उम्मीदवार की रेस में मोदी से न जीत पाए तो क्या..? ग्वालियर में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तारीफ, गोवा बैठक से पहले आडवाणी की बीमारी और फिर मोदी की चुनाव अभियान समिति के चेयरमैन पद पर ताजपोशी के बाद पार्टी के सभी पदों से आडवाणी के इस्तीफे की चिट्ठी ने इतना काम तो कर ही दिया है कि जिस मोदी के सहारे भाजपा 2014 में केन्द्र की सत्ता में 10 साल बाद वापसी का ख्वाब देख रही है, वो ख्वाब पूरा होना अब इतना आसान नहीं रहा जितना कि भाजपा के इस नाटकीय घटनाक्रम से पहले लग रहा था..!
आडवाणी की बीमारी तक तो भाजपा के लिए सब कुछ इतना नहीं बिगड़ा था लेकिन पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को लिखी आडवाणी के इस्तीफे की चिट्ठी ने भाजपा की साख पर ही बट्टा लगा दिया। आडवाणी ने जिस तरह से चिट्ठी में पार्टी की दिशा दशा को लेकर सवाल उठाए वो हैरान करने वाला था..! आडवाणी के इन सवालों ने न सिर्फ भाजपा के विरोधियों को भाजपा पर पूरी तरह से हावी होने का मौका दिया बल्कि 2014 को लेकर भाजपा की उम्मीदों पर भी कुठाराघात का काम किया..!  
मान मनौव्वल के बाद आडवाणी ने भले ही अपना इस्तीफा वापस ले लिया हो लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मिलकर भाजपा को शिखर में पहुंचाने वाले आडवाणी ने ही भाजपा को एक झटके में धरातल में लाने में कोई कसर नहीं छोड़ी..!
आडवाणी ने इस्तीफा तो वापस लिया लेकिन आडवाणी पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को लिखी चिट्ठी में लिखे अपने शब्दों रुपी उन बाणों को चाहकर भी वापस नहीं ले सकते जिन बाणों के निशाने पर उनकी अपनी ही पार्टी है..! और ये बाण 2014 में भाजपा को लहूलुहान भी कर सकते हैं..!
आडवाणी ने ये सब शायद इसलिए भी किया क्योंकि उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं था...इस सब से आडवाणी जैसे तैसे पीएम पद की उम्मीदवारी पा जाते तो ये आडवाणी का प्लस ही होता लेकिन आडवाणी की बीमारी और खासकर चिट्ठी से भाजपा और मोदी दोनों कुछ पाने से पहले ही बहुत कुछ खोने की स्थिति में आ गए हैं..!


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सोमवार, 10 जून 2013

वो तेरे नसीब की बारिशें, किसी और छत पे बरस गयीं...

लाल कृष्ण आडवाणी ने राजनाथ सिंह को लिखी इस्तीफे की अपनी चिट्ठी में न सिर्फ अपने दर्द को बयां किया बल्कि ये भी लिखा कि जिस पार्टी का ध्येय देश सेवा हुआ करता था वह पार्टी अब नेताओं के निजि हितों को पूरा करने का माध्यम बन गयी है।
ये बात जगजाहिर हो चुकी है कि आडवाणी को पार्टी का उनकी इच्छा के खिलाफ मोदी को चुनाव अभियान समिति का चेयरमैन बनाने के फैसले पर आपत्ति है लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आडवाणी खुलकर इस बात को क्यों नहीं कहते कि उन्हें पीएम पद के उम्मीदवार के तौर पर हो रही मोदी की ताजपोशी की तैयारी से दिक्कत है और वे खुद एक बार फिर से पीएम पद के उम्मीदवार बनना चाहते हैं..?
पार्टी में गिने चुने नेताओं को छोड़ दें तो कोई भी इस बात को कहने वाला नहीं है कि आडवाणी 2014 के लिए भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार हों..! आडवाणी मोदी के बढ़ते कद से तो नाराज़ हैं लेकिन खुद न तो इस बात को कह रहे है कि मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार न बनाया जाए और न ही ये कि पीएम पद की उम्मीदवार वे खुद बनना चाहते हैं..!
माना कि आडवाणी खुद पीएम पद का उम्मीदवार नहीं बनना चाहते तो फिर वे विकल्प सुझाएं न...वे क्यों नहीं अपनी दिल की पूरी बात कहते कि फलां नेता के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाए और फलां नेता को ही पीएम पद का उम्मीदवार बनाया जाए..?
जाहिर है आडवाणी कि खुद की इच्छा है कि वे पीएम पद के उम्मीदवार बनें और शायद इसलिए ही मोदी की चुनाव अभियान समिति के चेयरमैन पद पर ताजपोशी से आडवाणी को ये आभास हो गया है कि अब मोदी पीएम पद के उम्मीदवार की दौड़ में उनसे कहीं आगे निकल गए हैं..! ऐसे में आडवाणी ने पार्टी में उनकी एक न सुनी जाने पर पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा देकर पार्टी के काम काज के तरीके और औचित्य पर ही सवाल खड़ा कर दिया..!
राजनीति भी गजब है जिस पार्टी को खड़ा करने में आडवाणी ने अपना पूरा जीवन लगा दिया उस पार्टी की कार्यप्रणाली और दशा-दिशा पर अब आडवाणी खुद ही सवाल उठाने लगे हैं और खुद के साथ ही पार्टी की भी मिट्टी पलीत करने में लगी हैं।
आडवाणी जी ये कैसा आपका पार्टी प्रेम हैं...खुद के निजि हित पूरे होते नहीं दिखाई दे रहे तो पार्टी पर ही सवाल खड़ा कर दिया..! और बात कर रहे हैं कि पार्टी नेताओं के निजि हितों को पूरा करने का माध्यम बन गयी है।
जिस पार्टी के साथ आडवाणी ने अपना पूरा जीवन गुजार दिया उम्र के इस पड़ाव में आडवाणी उस पार्टी का दमन छोड़कर अलग पार्टी का गठन या किसी दूसरे दल में तो शामिल होंगे नहीं..! ताउम्र भाजपा के प्राथमिक सदस्य तो बने ही रहेंगे फिर भी अपनी पार्टी की मिट्टी पलीत करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं..!
यहां आडवाणी की बात पर गौर कीजिए...आडवाणी कहते हैं कि वे पार्टी के काम करने के तरीके और दशा दिशा से खुद को इसलिए नहीं जोड़ पा रहे हैं कि क्योंकि उन्हें लगता है कि भाजपा अब वो पार्टी नहीं रही जिसका ध्येय राष्ट्र व राष्ट्र के लोगों की सेवा हुआ करता ।  
आडवाणी जी आप राष्ट्र सेवा की बात कर रहे हैं तो क्या सिर्फ पार्टी में रहकर या पीएम की कुर्सी पाकर ही राष्ट्र व राष्ट्र के लोगों की सेवा की जा सकती है..? क्या जो लोग किसी न किसी पार्टी के महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हैं या पीएम जैसी कुर्सी पर बैठे हैं वे ही लोग राष्ट्र सेवा कर रहे हैं..?
जाहिर है राष्ट्र व राष्ट्र के लोगों की सेवा के लिए पार्टी या कुर्सी की जरुरत नहीं है बस सेवा करने का भाव दिल में होना चाहिए वरना जो लोग राजनीतिक दलों में बड़े पदों पर हैं या पीएम की कुर्सी पर बैठे हैं वे लोग कैसी देश सेवा कर रहे हैं ये तो देश बरसों से देखता आ रहा है..!
बहरहाल भाजपा में घमासान जारी है...लाल कृष्ण आडवाणी को इस्तीफा वापस लेने के लिए उन्हें मनाने की पूरी कोशिश की जा रही है ऐसे में देखना ये होगा कि आडवाणी के निजि हित पार्टी पर भारी पड़ेंगे या फिर आडवाणी भाजपा के लिए इतिहास हो जाएंगे। फिलहाल तो आडवाणी जी के लिए एक मशहूर शेर याद आ रही है-
वो तेरे नसीब की बारिशें, किसी और छत पर बरस गयीं
जो तुझे मिला उसे याद कर, जो न मिला उसे भूल जा


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रविवार, 9 जून 2013

शराब चीज ही ऐसी है न छोड़ी जाए

शराब चीज ही ऐसी है न छोड़ी जाए...पंकज उधास की गज़ल के ये बोल तो आपने सुने ही होंगे। मैंने भी आज से पहले इन बोलों को सिर्फ सुना ही था इसे साक्षात रुप में देखा नहीं था लेकिन रविवार को ये बोल मुझे बकायदा दौड़ते हुए दिखाई दिए। दरअसल मैं अपने एक मित्र के साथ दिल्ली के मयूर विहार फेज थ्री की मार्केट से गुजर रहा था। हमने देखा कि मार्केट के साथ ही लगे पार्क के सामने मदिरा की दुकान पर खूब रौनक थी।
मदिरा की दुकान के सामने पार्क में भी शराबियों की महफिल सजी हुई थी। इसी बीच दिल्ली पुलिस के दो जवान डंडा फटकारते हुए पार्क में दाखिल हुए तो पार्क में भगदड़ मच गयी। पुलिस कर्मियों के तेवर देखकर समझ में आ गया था कि उनका इरादा किसी को पकड़ने का नहीं था बस पार्क में मदिरा का सेवन कर रहे लोगों को खदेड़ना था। शायद ये पुलिसकर्मियों की रोज की एक्सरसाईज थी खैर जो भी हो लेकिन पार्क का नजारा बड़ा ही जबरदस्त था...शायद में इसे उस अंदाज में शब्दों में न बयां कर पाऊं...फिर भी कोशिश करता हूं।
दोनों पुलिस जवान अलग-अलग दिशा में शराबियों को डंडा फटकारते हुए खदेड़ने लगे। इसी बीच मेरी नजर एक युवक पर पड़ी जिसकी उम्र करीब 35 से 40 वर्ष रही होगी। जिस दिशा में हम आगे बढ़ रहे थे उसी दिशा में यह युवक पार्क के अंदर दौड़ रहा था और बार – बार पीछे मुड़ - मुड़ कर पुलिसवालों को देख रहा था। युवक के एक हाथ में डिस्पोजल गिलास में शराब थी तो दूसरे हाथ में पानी का पाउच। काफी आगे तक दौड़ने के बाद जब युवक को लगा कि अब पुलिसकर्मी उसके तरफ नहीं आ रहे हैं तो वह एक पल को रुका और फिर उसने चैन की सांस लेते हुए एक ही घूंट में पूरा गिलास खाली कर दिया और फिर शान से आगे बढ़ गया। हमारी केन्द्र में सिर्फ यह युवक था लेकिन पार्क में इधर उधर भाग रहे मदिरा प्रेमियों की हालत एक जैसी ही थी।
फिर से ये पंक्तियां दोहरा रहा हूं- शराब चीज ही ऐसी है न छोड़ी जाए...ये मेरे यार के जैसी है न छोड़ी जाए। वाकई में उस युवक को देखकर लग रहा था कि उसके लिए शराब के क्या मायने हैं..? उसके लिए शराब क्या चीज है..? जिस तरह वह शराब के गिलास को पकड़कर दौड़ रहा था उससे उस युवक का मदिरा प्रेम तो कम से कम जाहिर हो ही रहा था। अब लोग कहते हैं तो कहते रहें कि शराब बुरी चीज है...शराब पीना छोड़ दो। अब शराब की बोतल में लिखा हुआ होता है कि मदिरा सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है तो लिखा रहे लेकिन शराब पीने का आनंद उस युवक से बेहतर कौन समझा सकता है जो पुलिसकर्मियों से बचकर भाग रहा है लेकिन शराब का गिलास उसने नहीं छोड़ा और जैसे ही उसे मौका मिला एक ही सांस में पूरा गिलास खाली कर दिया और शान से अपने रास्ते चल दिया...जैसे वह कोई बड़ी जंग जीतकर आ रहा हो।

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