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मंगलवार, 28 मई 2013

बधाई...हो रहा भारत निर्माण..!

टीवी पर आजकल यूपीए सरकार की उपलब्धियों से भरा हुआ एक विज्ञापन खूब नजर आ रहा है। विज्ञापन का शीर्षक है हो रहा भारत निर्माण शुरु में तो ये विज्ञापन एनडीए सरकार के इंडिया शाइनिंग नारे की याद दिला रहा था और लगने लगा था कि ये इंडिया शाइनिंग पार्ट 2 है..! लेकिन जैसे ही ये ख़बर पढ़ी की चीन ने भारतीय सीमा में 5 किलोमीटर तक सड़क का निर्माण कर लिया है तो उसके बाद यूपीए सरकार के हो रहा भारत निर्माण नारे की सच्चाई समझ में आने लगी..!   
भारत सरकार का हो रहा भारत निर्माण का नारा वास्तविक रुप में भारत – चीन सीमा पर आकार लेता दिखाई दे रहा है...जहां भारतीय सैनिकों का पैदल पहुंचना मुश्किल था वहां सड़क का निर्माण हो गया है..!
अरे भई यूपीए सरकार के कार्यकाल में भारत चीन सीमा के सुदूरवर्ती इलाके में तक सड़क का निर्माण हो गयाये क्या यूपीए सरकार की कोई छोटी मोटी उपलब्धि है..?
अब सड़क का निर्माण भारत की जगह चीन ने किया तो क्या हुआ..? सड़क बनी तो भारतीय इलाके में ही है..! (जरुर पढ़ें- और कितने थप्पड़ खाओगे..?)
आज सड़क बनी है...निकट भविष्य में चीनी सेना के बंकर और छोटा मोटा चीनी बाजार भी बन जाएगा..! वैसे भी देखा जाए तो इसका फायदा तो भारत को ही होगा न...सीमावर्ती गांवों में रहने वाले भारत के लोगों को अपनी सभी रोजमर्रा की जरुरतों का सामान सस्ती दरों पर आसानी से चीनी बाजार से मिल पाएगा और कभी कभार सामान लाने के बहाने वे बिना वीजा के विदेश(चीन) की सैर भी कर आएंगे..!
चीनी उत्पादों को वैसे तो कामचलाऊ कहा जाता है लेकिन भारत सरकार को लगता है चीनी सामान पर कुछ ज्यादा ही भरोसा है। तभी तो भारत ने लद्दाक की चुमार पोस्ट पर अपने बंकर को खुद तोड़ दिया ताकि चीन वहां पर मजबूत और टिकाऊ बंकर का निर्माण कर सके..! (जरुर पढ़ें- क्यों बेबस है भारत..?)
अब ये भी समझ आने लगा है कि भारत चीन के प्रधानमंत्री ली केकियांग के स्वागत को इतना उत्सुक क्यों था..? अरे भई चीनी प्रधानमंत्री ली केकियांग अपने साथ भारतीय सीमा के अंदर 5 किलोमीटर तक सड़क ले आए तो भारत सरकार क्यों न ली केकियांग के स्वागत को बेचैन रहती..? आखिर भारत का सड़क निर्माण का खर्च जो बच गया..!
देश के लिए नेताओं के त्याग की भी दाद देनी पड़ेगी...अगर सीमावर्ती इलाके में सड़क का निर्माण भारत करता तो जाहिर है इसमें भी भ्रष्टाचार होता और कई लोगों की जेब गर्म होती लेकिन यहां पर सरकार में शामिल लोगों ने अपनी कमाई की फिक्र न करते हुए चीन को सड़क का निर्माण करने दिया..!
मैं तो कहता हूं कि भारत में भ्रष्टाचार को खत्म करने का एक ही तरीका है...जिस तरह भारत ने चीन को अपनी सीमा में 5 किलोमीटर तक सड़क का निर्माण करने देने के बाद उसे भारत निर्माण का नाम दिया ठीक इसी तरह दूसरे काम भी चीन को सौंप देने चाहिए। इससे यूपीए सरकार का हो रहा भारत निर्माण का नारा भी सार्थक हो जाएगा और भ्रष्टाचार भी नहीं होगा..! बोलो यूपीए सरकार की जय..!!!

deepaktiwari555@gmail.com

रविवार, 26 मई 2013

नक्सली हमले- आखिर कब तक..?

आमतौर पर मीडिया की सुर्खियों से गायब रहने वाला छत्तीसगढ़ एक बार फिर से सुर्खियों में है। छत्तीसगढ़ के सुर्खियों में रहने की वजह एक बार फिर से नक्सली ही हैं जिन्होंने घात लगाकर किए हमले में छ्त्तीसगढ़ कांग्रेस के अधिकतर दिग्गज नेताओं की हत्या कर छत्तीसगढ़ पीसीसी को वीरान कर कर दिया है। किसी भी राजनीतिक दल के नेताओं पर शायद ये नक्सलियों का सबसे बड़ा हमला है लेकिन राजनीतिक दलों से इतर नक्सली इससे भी बड़े हमले कर सरकार का अपनी ताकत का एहसास पहले भी करा चुके हैं।
तीन साल पहले अप्रेल 2010 में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के 76 जवानों की हत्या कर नक्सलियों ने राज्य व केन्द्र सरकार की नींद उड़ा दी थी। सवाल मुंह बाएं खड़ा था कि जब नक्सली 76 हथियारबंद जवानों को घेर कर मौत के घाट उतार सकते हैं तो नक्सली क्या नहीं कर सकते..?
इसी तरह बीते साल अप्रेल 2012 में सुकमा कलेक्टर एलैक्स पॉल मेनन का अपहरण कर भी नक्सलियों ने सरकार को खुली चुनौती दी थी। कलेक्टर मेनन तो आखिर रिहा हो गए लेकिन एक कलेक्टर का अपहरण अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया। जब एक कलेक्टर ही सुरक्षित नहीं है तो आम आदमी की सुरक्षा की क्या गारंटी है..?
छत्तीसगढ़ में अमूमन रोज नक्सली कभी गोलीबारी कर तो कभी बारुदी सुरंग से विस्फोट कर जवानों को निशाना बनाते रहे हैं। ये ख़बरें सिर्फ स्थानीय अख़बारों के पन्नों तक सिमट कर रह जाती हैं क्योंकि इन हमलों में एक या दो जवान ही शहीद होते हैं लेकिन जब तीन साल पहले दंतेवाड़ा में 76 सीआरपीएफ जवान शहीद होते हैं या फिर कांग्रेस के काफिले पर हमला होता है जिसमें दिग्गज कांग्रेसी नेताओं समेत करीब दो दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हो जाती है तो ये ख़बरें छत्तीसगढ़ से दिल्ली तक भी पहुंचती हैं।
नक्सलियों के बड़े हमलों के बाद छत्तीसगढ़ से दिल्ली तक हंगामा मचता है। नकस्लियों के हमलों पर बहस का दौर शुरु हो जाता है लेकिन कुछ दिनों बाद शांति पसर जाती है और ऐसे ही एक बड़े हमले पर छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली तक इसकी गूंज सुनाई देती है..!
हालांकि ऐसा नहीं है कि कार्रवाई एक तरफ से ही होती है। सर्चिंग के दौरान या मुठभेड़ के दौरान आए दिए एक आद नक्सली के मारे जाने की खबर भी आती है और इस दौरान निर्दोष आदिवासियों की हत्या का आरोप भी जवानों पर लगता है जैसे हाल ही में बीजापुर के एड़समेटा गांव में तीन बच्चों समेत आठ लोगों की हत्या का आरोप जवानों पर लगा था लेकिन सवाल यहां भी खड़ा होता है कि आखिर क्यों नक्सल प्रभावित इलाकों में हमेशा अघोषित जंग के हालात बने रहते हैं..?
जिस तरह से नक्सलियों ने जवानों और आदिवासियों के बाद अब नेताओं को अपने निशाने में लिया है उससे ये साफ जाहिर होता है कि नक्सली खुद को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं मानते और लोकतांत्रिक सरकार से इतर अपनी एक समानांतर सरकार चलाना चाहते हैं या कहें कि चला रहे हैं। अपने बाहुल्य वाले इलाकों में वे विकास कार्य नहीं चाहते क्योंकि उन्हें डर है कि अगर सड़क का निर्माण हो गया या उस इलाके में पक्के स्कूल या सरकारी इमारतें बन गयी तो सुरक्षाबल उसका इस्तेमाल उनके खिलाफ कर सकते हैं।
सरकार नक्सलियों से हथियार डालकर बातचीत का रास्ता अपनाने की बात करती है लेकिन इसके बाद भी आए दिन छोटी मोटी नक्सली हमलों के बीच दंतेवाड़ा या सुकमा जैसे बड़े नक्सली हमले सामने आते रहते हैं जो साफ ईशारा करते हैं कि नक्सली कभी हथियार नहीं डालने वाले लेकिन इसके बाद भी स्वामी अग्निवेश टाइप लोग कहते हैं कि नक्सलियों ने दंतेवाड़ा में 76 जवानों की हत्या की तो क्या हुआ…जवानों ने भी तो निर्दोष आदिवासियों को नक्सली बताकर उनकी हत्या की थी..! मतलब तो ये हुआ कि अग्निवेश नक्सलियों द्वारा जवानों की हत्या को जस्टिफाई करने की कोशिश कर रहे हैं और अघोषित तौर पर नक्सलियों का समर्थन कर रहे हैं..!
एक तरफ भारत पहले ही अपने पड़ोसी पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और ड्रैगन के दोहरे खतरे से जूझ रहा है ऊपर से देश के अंदर विभिन्न राज्यों में नक्सली इससे भी बड़ा खतरा बनकर ऊभर रहे हैं लेकिन हमारी सरकार हर चीज का हल शांति प्रक्रिया से निकालना चाहती है। गांधी जी के अहिंसा के सिद्धांतों पर चल रही हमारी सरकारों को कौन समझाए कि नक्सली शांति वार्ता से नहीं मानने वाले..!
नक्सली भी इस देश की ही नागरिक हैं लेकिन अगर वे हथियार की भाषा ही बोलना और समझना चाहते हैं तो क्यों न उनकी भाषा में उनसे बात की जाए..? क्या हमारी सरकार इतनी सक्षम नहीं है कि नक्सल बाहुल्य इलाकों में अभियान चलाकर नक्सलियों को हथियार डालने पर मजबूर कर दिया जाए। जाहिर है हमारी सरकार भी सक्षम है और सुरक्षाबल भी लेकिन फिर सवाल खड़ा हो जाता है कि ये फैसला ले कौन..?
केन्द्र और राज्य सरकारों के साथ ही सभी राजनीतिक दलों को मिलकर ये फैसला लेना होगा कि वे अब और नक्सली हमले नहीं सहेंगे और समर्पण या बातचीत के रास्ते से न मानने पर नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए एक दृढ़ निर्णय लेना ही होगा वर्ना एक अंतराल के बाद फिर से दंतेवाड़ा या फिर सुकमा जैसी घटनाएं हमारे सामने आती रहेंगी।

deepaktiwari555@gmail.com

शनिवार, 25 मई 2013

ये गर्मी बड़ी बेशर्म है













ये गर्मी भी बड़ी बेशर्म है
सुबह 6 बजे भी हवाएं गर्म हैं
पसीने से बदन तर बतर है
चारों तरफ गर्म हवाओं का असर है
ये गर्मी भी बड़ी बेशर्म है
नहाने जाओ तो नलके का पानी गर्म है
अब तो किसी को मटके का पानी देने में भी शर्म है
आसमान से बरस रही आग के बीच
एसी से निकलता ताप चरम पर है
ये गर्मी भी बड़ी बेशर्म है
झुलसती गर्मी में मजदूरी कैसे न करें
बच्चों को पालना भी तो धर्म है
तन पर कपड़ा क्यों न डालें
मौसम को नहीं तो क्या हमें तो शर्म है
ये गर्मी भी बड़ी बेशर्म है
रात के 12 बजे भी हवाएं गर्म है
नींद कैसे आए बिस्तर भी तो गर्म है
पंखे कूलर भी बंद हो गए
अब तो लगता है बिजली भी बेशर्म है
ये गर्मी भी बड़ी बेशर्म है

© deepaktiwari555@gmail.com

शुक्रवार, 24 मई 2013

ट्रैफिक जाम- जिम्मेदार कौन..?


सूर्य देवता अपने पूरे शबाब पर हैं। देश भर में आसमान से आग बरस रही है। दिल्ली – एनसीआर भी इससे अछूता नहीं है। पारा 50 डिग्री को छूने को बेताब है। आसमान से बरसती आग के बीच सड़कों पर एसी गाड़ियों से निकलती गर्मी वातावरण को और भी तपा रही है। सोचिए ऐसे में किसी रेड लाइट पर आपको भीषण जाम का सामना करना पड़े तो क्या हालत होगी..?
नोएडा में सुबह के करीब 10 बजे घर से दफ्तर के लिए निकलते वक्त बस हर रोज यही दुआ करता हूं कि ऐसी भीषण गर्मी में किसी ट्रैफिक सिग्नल पर रेड लाइट से मुलाकात न हो और ट्रैफिक जाम से तो कभी भी नहीं..! बस रोज सारे सिग्नल हरे मिले ताकि बिना किसी परेशानी के दफ्तर पहुंच जाऊं लेकिन शायद ही ऐसी कभी हुआ और भविष्य में होने की उम्मीद नजर आती है। घर से दफ्तर के बीच में सात ट्रैफिक सिग्नलों से सामना होता है। कुछ एक सिग्नल तो आराम से पार हो जाते हैं लेकिन दो-तीन ट्रैफिक सिग्नलों को पार करने में पसीने छूट जाते हैं। कई-कई बार तो तीसरी या चौथी बार सिग्नल ग्रीन होने पर चौराहा पार करने का नंबर आता है।  
24 मई 2013, शुक्रवार का दिन था सूर्य देवता पूरे शबाब पर थे...अख़बार और टीवी सुबह से ही दिन का तापमान 46 डिग्री को पार करने की भविष्यवाणी कर लोगों को डरा रहे थे लेकिन नौकरीपेशा लोगों को दफ्तर तो जाना ही था। इसी तरह व्यापारियों को अपनी दुकानें खोलनी थी तो रिक्शे वाले को भी दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना ही था...मरते क्या न करते भीषम गर्मी में भी सड़कों पर अपने – अपने काम को निकले लोगों की वही भीड़ थी। आसमान से बरसती आग और एसी गाडियों से निकलती गर्मी के बीच रेड लाइट पर 15 सेकंड भी रुकने की हिम्मत नहीं हो रही थी ऐसे में दफ्तर के रास्ते में पड़ने वाली तीन अलग अलग चौराहों पर अकदम अलग तस्वीर देखने को मिली जिसे आपके साथ साझा कर रहा हूं।
पहली तस्वीर- एक चौराहे पर ट्रैफिक सिग्नल ठीक से काम कर रहे थे लेकिन दफ्तर जाने का वक्त होने के चलते अत्याधिक ट्रैफिक दबाव के कारण तीसरी या चौथी बार में चौराहा पार करने का नंबर आया। इस दौरान करीब 250 सेकेंड झुलसाने वाली धूप का सामना करना पड़ा। कार में बैठे लोग तो एसी चलाकर ठंडक का मजा ले रहे थे लेकिन बाहर दोपहिया वाहन या फिर बस, ऑटो या रिक्शे में बैठे लोगों के लिए एसी कार सवारों का मजा किसी सजा से कम नहीं था।
दूसरी तस्वीर- एक व्यस्त चौराहे पर गाड़ियों की लंबी कतार...ट्रैफिक सिग्नल खराब था लिहाजा भीषण गर्मी में ट्रैफिक पुलिस का एक जवान बिना किसी छांव के सूरज की गर्मी और चारों तरफ से गाड़ियों से निकलती गर्मी के बीच ट्रैफिक व्यवस्था को मुस्तैदी से संभाले हुए था।
अंदाजा लगाया जा सकता है कि सुबह दस बज के वक्त 40 डिग्री से ऊपर तापमान में कैसे ये जवान चौराहे पर अपनी ड्यूटी कर रहा था और ट्रैफिक व्यवस्था को बिगड़ने नहीं दे रहा था..? उसके खड़े होने के लिए न तो कोई शेड ही था और न ही एक पल के लिए छांव में जाने का मौका क्योंकि अगर वह एक पल के लिए भी वहां से हटे तो फिर दफ्तर जाने की जल्दी में रेड लाइट पर खड़े लोग ट्रैफिक का क्या हाल करेंगे..!
हालांकि ये उस ट्रैफिक जवान की ड्यूटी का हिस्सा है कि उसे ट्रैफिक व्यवस्था को बिगड़ने नहीं देना है लेकिन इतनी भीषण गर्मी में ट्रैफिक पुलिस के जवान का हौसला काबिले तारीफ था क्योंकि इतनी शिद्दत और ईमानदारी से पुलिसकर्मियों को काम करते हुए देखने की आदत नहीं है न..!
इस सब के बाद भी दफ्तर पहुंचने की जल्दबाजी में लोग ट्रैफिक नियमों को तोड़ने से बाज नहीं आ रहे थे और अपने साथ ही दूसरे की जान को भी खतरे में डाल रहे थे।    
तीसरी तस्वीर- फिर से एक व्यस्त चौराहा...टैफिक सिग्नल खराब हैं...ट्रैफिक को नियंत्रित करने के लिए यातायात पुलिस का कोई भी जवान मौजूद नहीं है...सोचिए कैसा नजारा होगा। चौराहे पर भीषण जाम...वजह पहले निकलने के चक्कर में चारों दिशाओं से आ रही गाड़ियां एक दूसरे का रास्ता रोक कर खड़ी थी। कोई भी न तो पीछे हटने को तैयार था और न ही सामने आ रही गाड़ी को जाने देने के लिए जगह देने को तैयार...हर कोई एक दूसरे को कोस रहा था लेकिन खुद की गलती का एहसास किसी को नहीं था। नतीजा जाम लगातार बढ़ता ही जा रहा था। बाईक पर करीब आधा घंटा मुझे भी जाम में फंसे हो गया था...आसमान से बरसती आग और एसी गाड़ियों की गर्मी झुलसा रही थी। झुलसाने वाली गर्मी में हालत ऐसी थी जिसे शायद ही मैं शब्दों में बयां कर पाऊं..! मेरा क्या शायद हर किसी का यही हाल था लेकिन क्या करते चारों तरफ से गाड़ियों से घिर चुका था न तो आगे जाने की जगह थी न पीछे जाने का रास्ता। इसी बीच सायरन बजाती हुई एक पीसीआर वैन आई और उसमें से उतरे पुलिसकर्मियों ने जैसे तैसे जाम खुलवाया। जाम खुलवाया शब्द पढ़ने में तो शायद एक सेकेंड लगा होगा लेकिन इस जाम को खुलवाने में कितना समय लगा होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है..!
ये तीन तस्वीरें ये बयां करने के लिए काफी हैं कि जिस ट्रैफिक जाम से हम घबराते हैं...उसके लिए कहीं न कहीं किसी न किसी रुप में हम खुद ही जिम्मेदार हैं। घर से निकलते वक्त सारी रेड लाइट के हरे हो जाने की तो हम कामना करते हैं लेकिन मौका मिलने पर ट्रैफिक सिग्नल को तोड़े में हम देर नहीं करते..! क्या ट्रैफिक को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी सिर्फ यातायात पुलिस की ही है..?
जाहिर है सड़क पर चल रहे हर व्यक्ति की भी ये उतनी ही जिम्मेदारी है जितनी की यातायात पुलिस की लेकिन जाम में फंसने पर हम यातायात पुलिस के जवान के न होने पर हम उसे गरियाने में तो देर नहीं करते लेकिन खुद नियमों को तोड़ते हुए चले जाते हैं..!
अगर हम सब इस जिम्मेदारी को समझें तो सड़क पर अपनी आधी से ज्यादा दिक्कतों को हम खुद ही आसान कर सकते हैं लेकिन क्या ये कार्य इतना आसान है..? यकीन मानिए अगर आसान नहीं है तो इतना मुश्किल भी नहीं है कि हम यातायात नियमों को पालन ही न कर सकें..! कोशिश तो करके देखिए...एक दिन शायद अपने गंतव्य पर थोड़ी देरी से पहुंचेंगे...दो दिन देरी से पहुंचेंगे लेकिन इसका दीर्घकालिक असर दिखेगा लेकिन याद रखिए अपने साथ ही हमें दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करते हुए चलना होगा।   

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गुरुवार, 23 मई 2013

अब मेरे राजदां और भी हैं..!


यूपीए सरकार के 9 साल पूरे हो गए लेकिन बकौल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह गिलास अभी खाली है। यूपीए 1 के बाद यूपीए 2 का कार्यकाल खत्म होने में महज 12 माह का वक्त बचा है लेकिन गिलास भरने में अभी वक्त लगेग। ये बात अलग है कि सरकार में शामिल सभी लोगों के घर के गिलास, कटोरे, चम्मच तक सब भर गए हैं..!
मौनी सम्मान से नवाजे जा चुके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह न सिर्फ बोले ल्कि एक शेर पढ़ना भी नहीं भूले...जो कुछ इस तरह था...'गए दिन कि तन्हा था मैं अंजुमन में, यहां अब मेरे राज़दां और भी हैं। सितारों से आगे जहां और भी हैं (जरुर पढ़ें- UPA सरकार के 9 साल (व्यंग्य)
मनमोहन सिंह ने शेर एकदम सटीक चुना...वाकई में अब मनमोहन तन्हा कहां है,  भ्रष्टाचार और घोटालों में उनके साथ उनके अधिकतर मंत्रीमंडलीय सहयोगी भी तो साथ में हैं...और अभी तो एक साल का वक्त बचा है...जो पीछे रह गए हैं...वे भी साथ आ ही जाएंगे..!
बकौल मनमोहन और सोनिया ये जश्न का वक्त है। सोनिया गांधी तो ये भी कहती हैं कि यह बताने का वक्त है कि हमने नौ साल में क्या किया है। सोनिया चैलेंज करती हैं और कहती हैं कि क्या कोई हम पर सवाल उठा सकता है..? गजब का कॉन्फिडेंस है भई..!
सोनिया गांधी सरकार में पारदर्शिता होने और जवाबदेही तय होने की बात करती हैं...यहां भी सोनिया ने कौन सा गलत कहा..! पारदर्शिता को इतनी है कि कोयला घोटाले पर सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट में कानून मंत्री अश्विनि कुमार बदलाव कर देते हैं..! पारदर्शिता यहीं खत्म नहीं हो जाती...रेलवे मंत्रालय में तो गजब की पारदर्शिता है...एक-एक कुर्सी के दाम तय हैं वो भी पूरी पारदर्शिता के साथ..!
जवाबदेही का तो जवाब नहीं...देश से जुड़े अहम मसलों पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मौन साध लेते हैं तो भ्रष्टाचार और घोटालों से घिरे मंत्री कहते हैं उन्होंने कुछ गलत नहीं किया है...फिर वे क्यों इस्तीफा दें..? अगर प्रधानमंत्री का मौन सही है और मंत्रियों के तर्क सही हैं तो फिर हजारों करोड़ों के घोटाला कैसे हो रहे हैं इसका जवाब किसी के पास नहीं है..?
बहरहाल सरकार के पास 12 माह का वक्त अभी बाकी हैऐसे में देखना रोचक होगा कि 9 साल से भरने के इंतजार में रखे खाली गिलास को मनमोहन सिंह और उनकी टीम अब भर पाएगी या फिर ये 12 महीने मनमोहन सिंह और उनकी टीम 9 साल के जश्न की खुमारी उतारने में ही गुजार देगी..!

deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 22 मई 2013

UPA सरकार के 9 साल (व्यंग्य)


दिन- बुधवार
तारीख- 22 मई 2013
स्थान- प्रधानमंत्री निवास,
      7 रेसकोर्स रोड, नई दिल्ली

शाम के सात बज चुके हैं लेकिन दिल्ली की आबोहवा में अभी भी तपिश महसूस हो रही है। चिपचिपी गर्मी में 7 रेसकोर्स रोड के बाहर सुरक्षाकर्मी पूरी मुस्तैदी के साथ तैनात हैं। हर आने जाने वाले पर खास नजर रखी जा रही है। 7 रेसकोर्स रोड पर लाल बत्ती लगी गाडियों के साथ ही लग्जरी वाहनों की आमद होने लगी है। चमचमाती गाड़ियों में से सफेद लिबास पहने यूपीए सरकार के मंत्री और कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के नेता बाहर निकल रहे हैं। मंत्रियों और नेताओं के लिबास की सफेद चमक भी ऐसी की आंखें भी चौंधियां रही हैं..!
इस सफेदी के पीछे की चमक के बीच भी नेताओं के दामन पर लगे दाग बाहर झांकते दिखाई दे रहे हैं लेकिन नेताओं और मंत्रियों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उनकी मानें तो दाग तो चंद्रमा पर भी है और वैसे भी ये दाग इसलिए हैं ताकि यूपीए सरकार को किसी की नजर न लगे..!
7 रेस कोर्स रोड के अंदर का नजारा एकदम उलट है...एसी की ठंडक रुह को सुकून पहुंचा रही है...चिपचिपी गर्मी का तो नामोनिशान तक नहीं है। नेतानगरी के दिग्गजों का मजमा लगने लगा है। यूपीए सरकार के लगभग सभी मंत्री और यूपीए के घटक दलों के नेताओं की पूरी जमात 7 रेसकोर्स रोड पर जुट गयी है। इसी बीच कुछ खुसर पुसर सी होती है जो किसी खास के आने का संकेत समझ में आती ही और सभी मंत्री-नेता सावधान की मुद्रा में एक कतार में खड़े हो जाते हैं..!
सबकी निगाहें एक तरफ हो रही हलचल पर ठहर जाती हैं और तभी यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का आगमन होता है। कतारबद्ध खड़े कुछ मंत्रीगण और नेतागण हाथ जोड़कर तो कुछ झुककर सोनिया-मनमोहन का अभिवादन करते हैं..!
दरअसल ये मौका है यूपीए सरकार के 9 साल पूरा होने का...आज ही के दिन 9 साल पहले 22 मई 2004 को मनमोहन सिंह ने पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। इसके बाद 22 मई 2009 में मनमोहन सिंह ने दोबारा प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। इऩ 9 सालों का यूपीए सरकार का रिपोर्ट कार्ड कुछ ही देर में मनमोहन सिंह पेश करेंगे और 2014 के आम चुनाव से पहले ये मनमोहन सिंह का आखिरी रिपोर्ट कार्ड होगा..!
मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी मंच पर पहुंच चुके हैं और रिपोर्ट कार्ड पेश करने की तैयारी है..! रिपोर्ट कार्ड पेश करने से पहले यूपीए सरकार की 9 साल की उपलब्धियों को प्रोजेक्टर के माध्यम से सामने लगे पर्दे पर दिखाया जा रहा है..!
तालियों की गड़गड़ाहट के बीच स्लाइड शो शुरु होता है..!

पहली स्लाइड- 2 जी घोटाला
दूसरी स्लाइड- कॉमनवेल्थ खेल घोटाला
तीसरी स्लाइड- कोयला घोटाला
चौथी स्लाइड- एस बैंड स्पैक्ट्रम घोटाला
पांचवी स्लाइड-एयरसेल – मैक्सिम समझौता
छठी स्लाइड- कैश फॉर वोट घूस कांड
सातवीं स्लाइड- मनरेगा घोटाला
आठवीं स्लाइड- सलमान खुर्शीद ट्रस्ट घोटाला
नौवीं स्लाइड- वीवीआईपी हैलिकॉप्टर घोटाला
...हर स्लाइड के साथ तालियों की गड़गड़ाहट भी बढ़ती ही जा रही है..!
दसवीं स्लाइड- सीबीआई-कानून मंत्री कांड
ग्यारवहीं स्लाइड- रेल घूस कांड
बारहवीं स्लाइड- भारतीय सैनिकों का सिर कलम करने पर सरकार की चुप्पी
तेरवहीं स्लाइड- चीनी सैनिकों के लद्दाक में कब्जे पर सरकार की चुप्पी

ये क्या..? अचानक पर्दे पर लिखा आता है – Overload…Try again..!

स्लाइड शो बंद हो जाता है। पूछने पर जवाब मिलता है कि Overload होने की वजह से स्लाइड शो बंद हो गया..!
इसके बाद स्लाइड शो में दर्शायी गयी यूपीए सरकार की सभी उपलब्धियों के लिए मंत्रियों और नेताओं को मंच पर बुलाकर सोनिया गांधी सम्मानित करती हैं साथ ही पवन बंसल टाइप कुछ लोगों को सोनिया मन लगाकर काम न करने पर फटकार भी लगाती हैं और सभी लोगों को यूपीए सरकार के बचे हुए एक साल के कार्यकाल में उपलब्धियों की किताब को पूरा करने की निर्देश देती हैं..!
इसी बीच स्लाइड शो चला रहे व्यक्ति को भी सोनिया फटकार लगाती हैं और अगली बार पूरी तैयारी से इससे बढ़िया स्लाइड शो तैयार करने का निर्देश भी देती हैं ताकि सारी उपलब्धियों को लोग जान सकें..!
सम्मान समारोह के बाद सोनिया गांधी मनमोहन सिंह को रिपोर्ट कार्ड जारी करने को कहती हैं तो मनमोहन सिंह रंगीन कागज में लिपटे रिपोर्ट कार्ड का अनावरण करते हैं और इसी के साथ तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हॉल गूंजने लगता है..! सभी को रिपोर्ट कार्ड की एक – एक कॉपी दी जाती हैं..! रिपोर्ट कार्ड खोलने पर यूपीए सरकार की तारीफों के पुल के साथ ही सरकार के कार्यों का खूब बखान देखने को मिलता है...जो कुछ इस तरह है..!

1 मनरेगा स्कीम का विस्तार
2 रिटेल मे एफडीआई
3 डॉयरेक्ट कैश ट्रांस्फर स्कीम
4 मुफ्त शिक्षा का अधिकार
5 लोकपाल बिल
6 भूमि अधिग्रहण बिल
7 खाद्य सुरक्षा बिल

इसके साथ ही रिपोर्ट कार्ड में महत्वपूर्ण मुद्दों पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चुप्पी का भी खासतौर पर जिक्र किया गया है और भविष्य में भी इसी तरह का आचरण करने की उम्मीद जतायी गयी है..!
यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी आखिर में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को महत्वपूर्ण मुद्दों पर उनकी चुप्पी के लिए विशेष मौनी सम्मान से नवाजती हैं..!
इसके बाद सभी लोग डिनर के लिए चले जाते हैं..!
कुछ देर बाद सभी लोग डिनर करके अपने-अपने घर के लिए प्रस्थान कर चुके हैं..!
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह वीवीआईपी अतिथि कक्ष से बाहर निकलते हुए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को रिपोर्ट कार्ड की एक कॉपी देते हुए सोनिया और राहुल को बाहर छोड़ने के लिए आते हैं..!
10 जनपथ को जा रही गाड़ी में सोनिया संग राहुल पिछली सीट पर बैठे हैं। रिपोर्ट कार्ड की कॉपी का उपलब्धियों भरा पृष्ठ खोलते ही राहुल गांधी के होश उड़ जाते हैं..! राहुल अपनी मां सोनिया का हाथ जोर से हिलाते हुए कहते हैं...मॉम...मॉम...बड़ी गलती हो गयी..! लगता है रिपोर्ट कार्ड गलत छप गया है..! स्लाइड शो में जो दिखाया गया था वो तो इसमें कुछ है ही नहीं..!
सोनिया ठहाका मारकर हंसती हैं...और राहुल के सिर पर प्यार से हाथ फेरकर मन ही मन सोच रही हैं...ये लड़का कब बड़ा होगा..???

deepaktiwari555@gmail.com

मंगलवार, 21 मई 2013

भारत निर्माण या..?


आम चुनाव से पहले एक बार फिर से जनता को भ्रष्टाचार और घोटालों के अंधकार में भविष्य के सुनहरे सपने दिखाने का काम शुरु हो गया है। सही मायने में कहा जाए तो एक और इंडिया शाइनिंग की शुरुआत हो चुकी है और इस पर 180 करोड़ की भारी भरकम राशि खर्च की जाएगी..! फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार नाम इंडिया शाइनिंग की जगह भारत निर्माण रखा गया है। फिल्म के निर्माता और निर्देशक भी बदल गए हैं...पहले ये ख्वाब 2004 के आम चुनाव से पहले एनडीए सरकार ने दिखाया था तो अब यूपीए सरकार दिखा रही है। नाम बदल गया, निर्माता- निर्देशक बदल गए लेकिन किरदार नहीं बदले..! किरदार के रुप में देश की जनता पहले भी थी और अब भी है..! (पढ़ें ख़बर - छवि चमकाने के लिए विज्ञापनों पर 180 करोड़ खर्च करेगी सरकार)
कुल मिलाकर जनता के पैसे से जनता को ही एक ऐसी फिल्म दिखाई जाएगी जिसमें देश की जनता को उसके बदहाल हाल से उल्ट खुशहाल दिखाया जाएगा..!
असल जीवन से उल्ट फिल्मों के किरदार के रुप में खुद को देखकर भले ही देश की जनता को पलभर के लिए खुशी और सुकून की अनुभूति हो लेकिन  ये खुशी रेगिस्तान में नज़र आने वाली उस मरीचिका की तरह है जो दूर से तो रेगिस्तान में पानी होने का एहसास कराती है लेकिन करीब पहुंचने पर महज एक छलावा साबित होती है..!
जनता के भाग्य विधाता सरकार चलाने वाले कहते हैं कि उनके कार्यकाल में देश ने तरक्की की है..! नए आयामों को छुआ है और जनता की समस्याओं को दूर करने का हर संभव प्रयास किया है लेकिन ये समझ नहीं आता कि अगर वाकई में ये भाग्य विधाता सही फरमा रहे हैं और इन्होंने ईमानदारी से काम किया है तो इस चीज का ढ़िंढ़ोरा पीट पीट कर समाचार चैनलों और अख़बारों में विज्ञापनों के रुप में जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपए फूंक कर दिखावा करने की क्या जरुरत है..?
अगर सरकार ने काम किया है तो वह दिखना चाहिए न...लोग खुद इस बात को कहें कि हां काम हुआ है..उनकी समस्याओं को निराकरण हुआ है..! लेकिन हो तो इसका उल्ट रहा है काम की चर्चा तो कम रहती है लेकिन भ्रष्टाचार और घोटालों की चर्चाएं ज्यादा रहती हैं। शायद यही सत्ताधारी दलों की परेशानी की वजह भी है कि कहीं भ्रष्टाचार और घोटालों की चर्चा की गूंज उनकी कुर्सी न हिला दे..!
शायद यही वजह भी है कि अपनी उपलब्धियों को बढ़ा चढ़ाकर दिखाने के लिए इंडिया शाइनिंग और भारत निर्माण सरीखे अभियान शुरु किए जाते हैं और इन पर करोड़ों रुपया पानी की तरह बहा दिया जाता है। इंडिया शाइनिंग पर तत्कालीन एनडीए सरकार ने करीब 150 करोड़ रुपए उड़ाए थे तो भारत निर्माण पर अब यूपीए सरकार करीब 180 करोड़ रुपए बहाने की तैयारी में है।
यूपीए सरकार ने इससे पहले साल 2009 में भी जनता को लुभाने के लिए ऐसी ही मरीचिका तैयार करने में करीब 35 करोड़ रुपए उड़ाए थे..!
यूपीए सरकार के अभी तक के 9 साल के कार्यकाल में अब भारत निर्माण नहीं हुआ तो क्या हुआ..? सरकार के कुछ खास लोगों का निर्माण तो हुआ जिसमें ए राजा, सुरेश कलमाड़ी, पवन बंसल, अश्विनी कुमार, सलमान खुर्शीद और खुद मनमोहन सिंह समेत और न जान कितने नेता-मंत्री शामिल हैं..!
अब अपने इन नेताओं-मंत्रियों के व्यक्तिगत निर्माण को ही यूपीए सरकार भारत निर्माण का नाम दे रही है...अरे भई...दे भी क्यों न..? आखिर ये  सब भी तो भारत के ही वासी हैं और इनका निर्माण हुआ न...भारत निर्माण..!
इसी भारत निर्माण को अख़बारों में सरकार की तारीफों से भरे विज्ञापनों और बुद्धु बक्से के सहारे देश की जनता को बुद्धु बनाने का काम भी फिर से शुरु हो गया है लेकिन देखना ये होगा कि क्या बुद्धु बक्से के जरिए जनता को बुद्धु बनाने की यूपीए की कोशिश रंग लाएगी या फिर 2004 के एनडीए सरकार के इंडिया शाइनिंग नारे की तरह यूपीए सरकार के भारत निर्माण अभियान की भी हवा निकल जाएगी..!

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शनिवार, 18 मई 2013

पाकिस्तान- सत्ता में परिवर्तन हुआ...सोच में नहीं..!


पाकिस्तान में नवाज शरीफ के तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने को लेकर ये चर्चा फिर से जोर पकड़ने लगी है कि क्या भारत-पाकिस्तान के संबंधों पर इसका सकारात्मक असर पड़ेगा..? अगर हां तो क्या भारत – पाकिस्तान के आपसी संबंधों में मधुरता आएगी..? और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या पाकिस्तान में दिनों दिन मजबूत हो रहा तालिबान क्या ऐसा होने देगा..?
सवाल तमाम है जिसका जवाब ढूंढने पर अलग अलग वर्गों की राय भी भिन्न – भिन्न है। भारत में ही एक वर्ग को नवाज शरीफ के प्रधानमंत्री बनने पर इसे भारत – पाकिस्तान के रिश्तों में मिठास घुलती नजर आ रही है तो ऐसा वर्ग भी है जो ये मानता है कि पाकिस्तान में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर कोई भी विराजमान हो जाए लेकिन पाकिस्तान की नीयत में कोई बदलाव नहीं होने वाला..!
आज नवाज शरीफ भले ही पाकिस्तान के पीएम बनने की ओऱ बढ़ रहे हैं लेकिन 1999 में जब भारत पाकिस्तान के बीच कारगिल की जंग हुई थी तो उस वक्त भी नवाज शरीफ ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री थे। कारगिल युद्ध पर नवाज शरीफ का कहना था कि उन्हें जानकारी ही नहीं है कि पाक सेना ने भारत के साथ युद्ध छेड़ दिया है। लेकिन क्या ऐसा हो सकता है कि किसी देश की सेना पड़ोसी देश के साथ जंग का ऐलान कर चुकी है और उस देश के प्रधानमंत्री को इसकी ख़बर तक नही हो..? जाहिर है नवाज शरीफ का ये सफेद झूठ था कि उन्हें युद्ध की भनक तक नहीं थी..!
ऐसे में तीसरी बार पाकीस्तान के पीएम की कुर्सी पर विराजमान होते दिखाई दे रहे नवाज शरीफ से भारत के साथ संबंध सुधारने की नयी पहल करने की उम्मीद करना बेमानी ही होगी..! पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन जरुर हुआ है लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि भारत के प्रति पाकिस्तान की सोच में भी परिवर्तन हुआ है..!
ऐसे में एक नयी निर्वाचित सरकार के मुखिया से जो पहले भी भारत की पीठ में छुरा घोंपने में माहिर रहा है उससे इस दिशा में कोई सकारात्मक उम्मीद करना कहीं से भी तर्कसंगत नहीं लगता..! पाकिस्तान एक ऐसा पड़ोसी है जो अपने दुख से नहीं पडोसी के सुख से ज्यादा दुखी है। उसे अपने देश की दम तोड़ती अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी, भूखमरी और मजबूत होते तालिबान की चिंता नहीं है बल्कि उसे भारत के सुख और शांति से ज्यादा दिक्कत है..! वो सिर्फ इसी उलझन में डूबा रहता है कि कैसे भारत परेशान हो न कि ये कि कैसे उनकी आवाम की समस्याओं का निदान हो..! इसका ताजा उदाहरण भारत में संसद पर हमले के आरोपी अफजल की फांसी है..! आपको याद ही होगा कि अफजल की फांसी पर पाकिस्तानी संसद ने निंदा प्रस्ताव पेश किया था।
कवाहत है कि दूध का जला छांछ भी फूंक फूंक कर पीता है लेकिन भारत के प्रधानमंत्री तो एक नहीं कई बार दूध से जलने के बाद भी एक बार फिर से गर्म दूध बिना फूंक मारे पीने के लिए उतावले दिखाई दे रहे हैं..! मनमोहन सिंह पहले ही मानकर बैठे हुए हैं कि नवाज शरीफ की अगुवाई वाला पाकिस्तान अब भारत के खिलाफ न तो जहर उगलेगा और न ही भारत की पीठ पर फिर से छुरा घोंपेगा..! मनमोहन सिंह साहब का उतावलापन देखिए पाकिस्तान के आम चुनाव की मतगणना समाप्त होने  पहले ही नवाज शरीफ को बधाई देते हुए भारत आने का न्यौता दे दिया..! मनमोहन सिंह का ये न्यौता हर कदम पर भारत को धोखा देने वाले पाकिस्तान के प्रति भारत का उदार रवैया तो दर्शाता है लेकिन इस बात को कैसे भुलाया जा सकता है कि हर कदम पर भारत की इस उदारता का फायदा पाकिस्तान ने उठाया है और भारत को सिर्फ दर्द ही दिया है।
एक पल के लिए ये मान भी लिया जाए कि नवाज शरीफ की नीयत में कोई खोट नहीं है और वे भारत के साथ बेहतर संबंध कायम करना चाहते हैं लेकिन क्या पाकिस्तान के कट्टरपंथी गुट नवाज शरीफ की इस कोशिश को सफल होने देंगे...जाहिर है बिल्कुल नहीं..! नवाज शरीफ को पहले अपने देश में कट्टरपंथियों पर लगाम कसनी होगी जो पाकिस्तान के हालात को देखते हुए आसान तो बिल्कुल भी नहीं लगता..!
जब तक पाकिस्तान की सोच में बदलाव नहीं आएगा और पाक की नीयत पाक नहीं होगी तब तक नवाज शरीफ क्या कोई भी शख्स पाकिस्तान का प्रधानमंत्री क्यों न बन जाए...भारत को अपने इस पडोसी से सतर्क रहना होगा वर्ना हर बार की तरह पाक भारत का दोस्ती का हाथ तो तुरंत थाम लेगा लेकिन अपनी आदत से बाज नहीं आएगा और मौका मिलते ही भारत की पीठ में छुरा घोंपने में देर नहीं करेगा..!

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