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शनिवार, 27 अप्रैल 2013

ये हंसी ठहाके में न बदल जाए..!

विपक्ष के हंगामे के चलते संसद की कार्यवाही ठप होने पर हमारे देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी की चुप्पी टूटती है। मनमोहन सिहं कहते हैं कि सदन की कार्यवाही ठप करके हम लोकतांत्रिक व्यवस्था का मजाक बना रहे हैं। मनमोहन सिंह आगे कहते हैं कि पूरा विश्व हम पर हंस रहा है। चीन के साथ संबंधों पर भी मनमोहन सिंह की चुप्पी टूटती है और वे कहते हैं कि भारत इस मसले को तूल नहीं देना चाहता।
दो अलग अलग मुद्दों पर प्रधानमंत्री के बयान को समझने की जरूरत है लेकिन देशवासियों को नहीं खुद हमारी देश की सरकार को...बल्कि खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को..!
प्रधानमंत्री जी कम से कम मैं तो आपकी पहली बात से पूरी तरह सहमत हूं कि दुनिया हम पर हंस रही है..! लेकिन दुनिया सदन में हंगामे के चलते नहीं हंस रही बल्कि आपके नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के फैसलों और देश की सुरक्षा से जुड़े अहम मुद्दों पर सरकार के लचर रवैये पर हंस रही है..!  दुनिया तक जब आपके ये बयान पहुंचेगा कि भारत सरकार के प्रधानमंत्री कहते हैं कि हम चीन के मसले को तूल नहीं देना चाहते तो शायद ये हंसी ठहाकों में बदल जाए..!
चीन हमारी सीमा में 19 किलोमीटर तक दाखिल हो जाता है। चीनी सैनिक हमारी जमीन में तंबू गाढ़कर हमें ही मुंह चिढ़ा रहे हैं और आप कहते हैं कि हम मसले को तूल नहीं देना चाहते। आप क्या उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब चीन की  घुसपैठ चीन सीमा से लगे हमारे क्षेत्र में कब्जे तक पहुंच जाएगी और चीन उस पर आपना आधिपत्य जताने लगेगा..? वो तो चीन अभी भी कर रहा है..!  खैर आपसे तो तब भी मसले को तूल न देने जैसे बयान की ही उम्मीद है..! जब आप पाकिस्तानी सैनिकों की हमारी सीमा में घुसकर हमारे सैनिकों के सिर कलम करने की घटना पर मसले को तूल देने की बजाए जयपुर में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को शाही डिनर कराने में विश्वास रखते हैं तो आपसे अब चीन के मसले पर क्या उम्मीद की जा सकती है..?
रही बात संसद में विपक्ष के हंगामे की तो निश्चित तौर पर ये भी एक गंभीर विषय है। संसद में जहां पर एक घंटे की कार्यवाही में लाखों रुपए खर्च होते हैं वहां अहम मुद्दों पर, जनता से जुड़े मुद्दों पर बहस होनी चाहिए। सदन की कार्यवाही को लेकर प्रधानमंत्री होने के नाते आपकी चिंता जायज भी है लेकिन देश सुरक्षा से जुड़े मुद्दे पर आपका उसे तूल न देने की बात करना समझ से परे है..!
आखिर कब तक आप धैर्य रखेंगे...कभी पाक की नापाक हरकतों पर तो कभी चीन के आंखे तरेरने पर..! मनमोहन सिंह जी याद रखिए सबसे पहले सीधे पेड़ों को ही काटा जाता है इसलिए दुनिया को भारत का इतना सीधापन न दिखाएं कि कभी पाकिस्तान तो कभी चीन हम पर आरी चलाने की हिम्मत करे..!

deepaktiwari555@gmail.com

सोमवार, 22 अप्रैल 2013

लो, फिर बोले गृहमंत्री शिंदे..!


दिल्ली में पांच साल की मासूम से दरिंदगी पर संसद में गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे को सुनकर सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव का बयान याद आ गया। ज्यादा दिन पुरानी बात नहीं है जब उत्तर प्रदेश में पुलिस अधिकारी की हत्या के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती ने राज्य में बढ़ती आपराधिक वारदातों के लिए जब सपा सरकार को कठघरे में खड़ा किया था तो मुलायम सिंह यादव का जवाब कुछ यूं था...सूप बोले तो बोले, छलनी भी बोले जिसमें बहत्तर छेद। मायावती की सरकार के कई मंत्री और विधायक रेप, भ्रष्टाचार जैसे मामलों में जेल की सजा काट रहे हैं, ऐसे में उन्हें सपा सरकार के बारे में बोलने का कोई हक नहीं है। मुलायम का बयान ये दर्शा रहा था कि वे राज्य में हो रही आपराधिक घटनाओं को जायज ठहरा रहे थे..! (जरूर पढ़ें- छलनी भी बोले जिसमें 72 छेद..!)।
5 साल की मासूम से दरिंदगी और दिल्ली में रेप की बढ़ती घटनाओं पर संसद में गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे का बयान भी कुछ ऐसा ही था..! शिंदे बोले कि रेप की घटनाएं दूसरे राज्यों में भी होती हैं। अब शिंदे के इस शर्मनाक बोल के क्या मतलब निकालें जाएं..? शिंदे के बयान से तो ये लगता है कि जैसे वे देश के गृहमंत्री न होकर सिर्फ दिल्ली के गृहमंत्री हैं और राजधानी के अलावा दूसरे राज्यों में क्या हो रहा है उससे इन्हें कोई मतलब नहीं है..! शिंदे का बयान क्या ये भी नहीं दर्शाता कि देश के दूसरे राज्यों में भी तो बलात्कार की घटनाएं हो रही हैं तो दिल्ली में भी बलात्कार हो रहे हैं तो क्या गलत है..?
मेरे कुछ मित्रों को मुझसे इस बात की शिकायत रहती है कि मैं बेवजह शिंद के खिलाफ कलम घिसता हूं..! अब इऩ मित्रों से सवाल है कि जब आपके प्रिय गृहमंत्री 5 साल की मासूम से दरिंदगी पर महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा की बजाए इसकी तुलना दूसरे राज्यों में हो रही रेप की घटनाओं से कर रहे हैं तो इसे क्या कहा जाए..? देश के गृहमंत्री से जब लोग महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने की उम्मीद लगाए बैठे हैं तब गृहमंत्री साहब दूसरे राज्यों में रेप की घटनाओं का जिक्र कर जिम्मेदारी से अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहे हों तो इसे क्या कहा जाए..? (जरूर पढ़ें- क्यों पड़े हो शिंदे के पीछे..?)
खैर छोड़िए शिंदे के प्रेमियों को हर बार की तरह यहां भी शिंदे के बोल अनमोल ही लग रहे होंगे। शिंदे के प्रति उनके इस अगाध प्रेम की वजह तो वे ही जानते होंगे लेकिन क्या हम देश के गृहमंत्री से इस तरह के बेतुके और शर्मनाक बयान की उम्मीद कर सकते हैं..!
गृहमंत्री की कुर्सी पर आसीन होने के बाद से ही शिंदे अपने अनमोल वचनों की वजह से ज्यादा चर्चा में रहे हैं..! संसद में मुंबई हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद को श्री और मिस्टर कहकर संबोधित करने का मामला हो या फिर संसद में महाराष्ट्र के भंडारा की रेप पीड़ित तीनों सगी बहनों का नाम लेकर उनकी पहचान जाहिर करने का मामला...शिंदे की जुबान लगातार फिसलती रही। बफोर्स घोटाले की तरह कोयला घोटाले को भूल जाने के शिंदे के बोल हों या फिर हैदराबाद धमाकों पर शिंदे का बयान...शिंदे खुद के साथ ही अपने पद और गरिमा का भी मखौल उड़ाते रहे..!
एक बार फिर से उऩके अनमोल बोलों ने उनकी सोच पर सवालिया निशान लगा दिया है और फिर से ये सोचने को मजबूर कर दिया है कि क्या शिंदे गृहमंत्री की कुर्सी पर बैठने लायक हैं..?

deepaktiwari555@gmail.com

अंबानी को सुरक्षा आम आदमी को क्यों नहीं..?


सुबह के अखबार में एक तरफ दिल्ली में 5 साल की मासूम के साथ दरिंदगी के बाद महिलाओं की सुरक्षा के लिए कड़े कदम उठाए जाने की जरूरत पर बल देते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का बयान था तो दूसरी तरफ अरबपति कारोबारी रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी को सरकार का जेड श्रेणी की सुरक्षा मुहैया कराने का सरकार के फैसले की खबर।
विडंबना देखिए महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा के लिए सरकार और कड़े कदम उठाए जाने की बात करती है...वो भी तब जब 16 दिसंबर के बाद एक पांच साल की मासूम का जीवन नर्क हो जाता है और वीआईपी सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद भी अरबपति कारोबारी को जेड श्रेणी की सुरक्षा मुहैया कराने का फैसला ले लेती है..!
ये जाहिर करता है कि सरकार को देश की आवाम की सुरक्षा की चिंता नहीं है...महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा की चिंता नहीं है लेकिन अरबपति कारोबारियों की सुरक्षा की खूब चिंता है..! वीआईपी सुरक्षा के लिए सीआरपीएफ जवानों को तुरंत तैनात होने का आदेश दे दिया जाता है। हो हल्ला मचने पर सरकार भले ही बचाव में आते हुए सुरक्षा का खर्च मुकेश अंबानी के द्वारा उठाए जाने की दलील देकर चारों तरफ हो रही किरकिरी से बचने की कोशिश करती है लेकिन इसके बाद भी जेड श्रेणी सुरक्षा के तहत 28 हथियारबंद जवान तो 24 घंटे अंबानी के साथ तैनात रहने के सवाल पर कुछ नहीं बोलती..!
इसका मतलब तो यही निकलता है कि अंबानी ने सुरक्षा के खर्च उठाने की पेशकश करके सरकार से सीआरपीएफ के उन 28 जवानों को खरीद लिया है जो अब हरदम उनकी सुरक्षा में नात रहेंगे..! सरकार की सोच देखिए वे सीना चौड़ा करके कहते हैं कि अंबानी सुरक्षा का खर्च खुद उठा रहे हैं तो जेड श्रेणी सुरक्षा देने में क्या हर्ज है..!
क्या एक अरबपति कारोबारी अगर सुरक्षा का खर्च खुद उठा सकता है तो अपने ही खर्च पर निजि सुरक्षाकर्मियों को सुरक्षा के लिए नहीं रख सकता लेकिन ऐसा नहीं है..! सरकार को भी सुरक्षा के लिए अपने 28 सशस्त्र जवानों को अंबानी के साथ व्यस्त रखने में कोई आपत्ति नहीं है..! आखिर क्यों..? इसका जवाब सरकार के किसी नुमाइंदे के पास नहीं है..!
महिलाएं और बच्चियां असुरक्षित रहें तो रहें...लेकिन अंबानी की सुरक्षा में 28 सशस्त्र जवानों को तैनात करना सरकार के लिए ज्यादा जरूरी है..! बात सिर्फ महिलाओं और बच्चियों की ही नहीं है। देशभर में अपराधों का ग्राफ लगातार चढ़ रहा है। किसी घटना के बाद पुलिस बल की कमी का बहाना पुलिस विभाग के आला अफसरों के साथ ही सरकार के नुमाइंदों की जुबान के पहले शब्द हैं लेकिन वीआईपी सुरक्षा देने के अपने फैसले का सरकार खुलकर बचाव करने से पीछे नहीं हटती..! इन पर तो सर्वोच्च न्यायालय के नोटिस का भी कोई असर नहीं होता है। कोर्ट वीआईपी सुरक्षा के औचित्य पर सवाल खड़ा करता है और सरकार इसके बाद भी मुकेश अंबानी जैसे अरबपति कारोबारी को जेड श्रेणी की सुरक्षा मुहैया कराने के फैसले लेने में नहीं हिचकती..!
पूरे देश की छोड़िए राजधानी दिल्ली की ही अगर बात करें तो यहां पर वाईआपी सुरक्षा में आठ हजार से ज्यादा पुलिसकर्मी तैनात है जब्कि आपराधिक वारदातों की तफ्तीश के लिए सिर्फ 3400 पुलिसकर्मी ही हैं। वीआईपी सुरक्षा में होने वाला खर्च सुनेंगे तो शायद आपके पैरों तले जमीन खिसक जाए..! वीआईपी सुरक्षा में सरकार सालाना करीब साढ़े तीन सौ करोड़ से ज्यादा रूपए खर्च कर देती है...जिसमें से राष्ट्रपति भवन की सुरक्षा का खर्च करीब 40 करोड़ है।
वैसे भी सरकार अरबपति कारोबारियों के हितों की रक्षा नहीं करेगी..उनको सुरक्षा मुहैया नहीं करेगी तो किसे कराएगी..?
आम चुनाव करीब है...चुनाव लड़ने के लिए राजनीतिक दलों को पैसा भी तो चाहिए..! अरबपति कारोबारी कम से कम पार्टी फंड में करोड़ों रूपया तो दे देंगे...एक आम आदमी तो नेताओं के लिए ये कर नहीं सकता..! फिर क्यों करे सरकार आम आदमी की सुरक्षा की चिंता..? क्यों न मुहैया कराए मुकेश अंबानी जैसे अरबति कारोबारियों को जेड श्रेणी की सुरक्षा..?

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रविवार, 21 अप्रैल 2013

क्या इनका काम सिर्फ निंदा करना है..?


महिलाओं और बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाओं का ग्राफ आसमान छू रहा है...हर घंटे बलात्कार की एक नयी घटना सामने आ रही है..! विकृत मानसिकता के लोग दरिंदगी की हदें पार करते हुए अपनी हवस की भूख मिटाने के लिए महिलाओं और बच्चियों की जिंदगी को नर्क बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। अपराधियों पर लगाम कसने के लिए तैनात पुलिस अपनी फरियाद लेकर थाने पहुंचने वालों के साथ ही अपराधियों जैसा सलूक करती है तो सरकार में बैठे जनता के नुमाइंदे हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं..!
अति होने पर जनाआक्रोश फूटता है तो सरकार की भी नींद टूटती है। पुलिस को दोषियों को पकड़ने का अल्टीमेटम दिया जाता है और पीड़ित को दुत्कारने वाली पुलिस हरकत में आते हुए अपराधियों को गिरफ्तार करने में पूरी ताकत लगा देती है लेकिन ये तब होता है जब 16 दिसंबर जैसी या फिर 5 साल की मासूम के साथ बलात्कार और दरिंदगी की घटना सामने आती है। (जरूर पढ़ें- सिर्फ तारीख बदली...तस्वीर नहीं...!)
ऐसी ही किसी दरिंदगी के बाद हमारे माननीय राष्ट्रपति का मन आहत हो जाता है..! वे घटना पर दुख प्रकट करते हुए घटना की निंदा करते हैं..! अक्सर मौन रहने वाले हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी दुखी हो जाते हैं...वे भी घटना की निंदा करते हैं..! महिलाओं की सुरक्षा के लिए अभी बहुत काम किए जाने की बात करते हैं...संवेदनशील होने की बात करते हैं..! लेकिन कब..? इसका जवाब किसी के पास नहीं है..?
वजह साफ है समय गुजरने के साथ लोग अपनी रोजी रोटी के जुगाड़ में जुट जाते हैं तो सरकार भी सब भूलकर चैन की नींद सो जाती है..! फिर ऐसी ही किसी दरिंदगी पर जब लोगों का खून खौल उठता है तो फिर से घटना की निंदा की जाती है...महिला सुरक्षा की बड़ी बड़ी बातें की जाती हैं...दोषियों को हर हाल में सख्त सजा दिलाने के साथ ही पीड़ित को इंसाफ दिलाने की बातें की जाती हैं लेकिन नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात..!
क्या हमारे माननीय 16 दिसंबर जैसी या फिर 5 साल की मासूम के साथ दरिंदगी जैसे किसी घटना के घटित होने के बाद सिर्फ इसकी निंदा करने के लिए ही हैं..?  क्या महिलाओं और बच्चियों को सुरक्षित वातावरण देना इनकी जिम्मेदारी नहीं है..?  जाहिर है सरकार में शामिल लोग अगर चाहें तो दोषियों को तय समय सीमा के अंदर सजा दिलाने के लिए कड़े कानून बनाने की दिशा में काम कर सकते हैं ताकि अपराधियों को जल्द से जल्द उसके अंजाम तक पहुंचाने का रास्ता साफ किया जा सके लेकिन कड़े कानून बनाने की जब बात आती है तो उसके लिए कमेटियां गठित कर दी जाती हैं...आयोग बनाए जाते हैं और उनकी रिपोर्ट का इंतजार किया जाता है। रिपोर्ट आती भी है तो उसके बिंदुओं को लेकर कैबिनेट में मतभेद उभर कर सामने आते हैं..!
एंटी रेप लॉ जैसा कोई नया कानून सामने आता है तो उसमें भी ऐसे दरिंदों को फांसी की सजा देने के लिए शर्तें रख दी जाती हैं..! अब नये एंटी रेप लॉ को ही देख लें...इसकी धारा-376 ए में प्रावधान है कि रेप किए जाने के कारण अगर लड़की की मौत हो जाए या फिर उसे ऐसा जख्म हो जाए कि वह लंबे समय तक के लिए विजिटेटिव स्टेट(निष्क्रिय) में पहुंच जाए तो ऐसे मामले में कम से कम 20 साल कैद जबकि ज्यादा से ज्यादा उम्रकैद अथवा फांसी तक हो सकती है। मतलब साफ है कि ऐसे दरिंदों को मौत की सजा के लिए भी या तो लड़की का रेप के बाद मरना जरूरी है या फिर विजिटेटिव स्टेट में पहुंचना..!
ऐसा हो भी जाता है तो लंबी कानूनी प्रक्रिया के चलते अदालत में ये मामले सालों तक लंबित रहेंगे। माना आरोपी को फांसी की सजा हो भी जाती है तो राष्ट्रपति के पास दया याचिका डालने का भी तो अवसर है..! ये छोड़िए इनके मानवाधिकारों की बात करने वालों की भी लंबी फौज है...जो इनको जेल में जरा सी तकलीफ होने पर उनके मानव अधिकारों की बात करते हैं लेकिन उसके मानवाधिकार का क्या जो ऐसे दरिंदों की हवस की शिकार बनीं..?
कुल मिलाकर ऐसे दरिंदे किसी मासूम को दर्द भरी मौत देने या फिर उसकी जिंदगी नर्क से भी बदतर बनाने के बाद भी जिंदा रहेंगे लेकिन जरा सोचिए उसका क्या जिसकी जिंदगी नर्क से भी बदतर हो गयी या फिर जिसने अपनी बेटी, बहन या फिर अपने किसी जिगर के टुकड़े को तड़प तड़प कर मरते देखा है..?
विडंबना देखिए 16 दिसंबर 2012 की घटना हुई तो एंटी रेप लॉ वजूद में आता है...दिल्ली में 5 साल की मासूम के साथ दरिंदगी होती है तो प्रधानमंत्री कहते हैं कि महिला सुरक्षा के लिए बहुत काम किया जाना बाकी है। सवाल ये उठता है प्रधानमंत्री जी कि क्या अब इस बहुत कुछ को अमल में लाने के लिए एक और घटना का इंतजार किया जा रहा है..? (जरूर पढ़ें- बलात्कार- 1971 से लगातार..!)
खैर छोड़िए कहां तक सवाल करेंगे..? किससे सवाल करेंगे..? सवालों की फेरहिस्त तो काफी लंबी है लेकिन अफसोस जवाब किसी के पास नहीं है...क्योंकि किसी घटना के घटित होने के बाद इनका मन आहत हो जाता है...ये घटना की निंदा करते हैं और बहुत जल्द पीड़ित के दर्द को भूल जाते हैं..!

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मोदी से बेहतर सुषमा..!


एनडीए से प्रधानमंत्री के संभावित उम्मीदवार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी जितनी तेजी से राष्ट्रीय पटल पर उभरे उतनी ही तेजी से मोदी के विरोधियों की संख्या भी बढ़ी है। एनडीए के अहम घटक जदयू के साथ ही भाजपा में ही मोदी विरोधियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जो 2014 में मोदी के पीएम बनने के सपने को चकनाचूर भी कर सकता है..! ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या भाजपा के पास पीएम की उम्मीदवारी के लिए मोदी से बेहतर विकल्प नहीं है या फिर मोदी के बढ़ते कद के आगे राष्ट्रीय राजनीति में सालों से सक्रिय भाजपा के दूसरे नेताओं को कद बौना प्रतीत हो रहा है..!
जाहिर है भाजपा में ऐसे नेताओं की जमात काफी लंबी है जो राष्ट्रीय राजनीति में मोदी से बड़ा कद रखते हैं..! पीएम की उम्मीदवारी को लेकर एनडीए के घटक दलों के साथ ही भाजपा में मोदी के बढ़ते विरोध के बाद पीएम की उम्मीदवारी को लेकर सुषमा स्वराज का नाम तेजी से उठने लगा है..! लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या सुषमा स्वराज के नाम को एनडीए के घटक दलों के साथ ही भाजपा में सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया जाएगा..? इसमें कोई दो राय नहीं 25 सालों से राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय सुषमा स्वराज को एक प्रखर नेता के साथ ही बेहतरीन वक्ता के रूप में जाना जाता है। सुषमा हमेशा से ही एक निर्विवाद नेता रही हैं...ऐसे में सुषमा को पीएम पद का उम्मीदवार बनाया जाता है तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सुषमा के नाम पर भाजपा के साथ ही एनडीए में सर्वसम्मति बनने के संभावना मोदी के अपेक्षा ज्यादा प्रबल होगी। लाल कृष्ण आडवाणी की पसंदीदा नेता होने का फायदा भी सुषमा स्वराज को मिल सकता है जबकि मोदी के केस में ऐसा नहीं है..! (जरूर पढ़ें- खुश तो बहुत होंगे आडवाणी आज..!)
नरेन्द्र मोदी भी निश्चित तौर पर एक बेहतरीन वक्ता हैं और उनकी भाषण शैली के कायल लोगों की कमी नहीं है लेकिन हिंदुओं के पुरोधा होने का ठप्पा नरेन्द्र मोदी के सांप्रदायिक नेता होने की छवि से बाहर नहीं निकाल पा रहा है और शायद यही नरेन्द्र मोदी और पीएम की कुर्सी के बीच में सबसे बड़ा रोड़ा है..! एनडीए से गठबंधन तोड़ने की धमकी देने वाली जद यू नेता भी मोदी को सांप्रदायिक बताते हुए पीएम पद के लिए मोदी की उम्मीदवारी के खिलाफ विरोध का झंडा लेकर खड़े हैं..! (जरूर पढ़ें- मोदी के खिलाफ क्यों हैं नीतीश..?)
ऐसे में इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि आगामी आम चुनाव में सांप्रदायिक होने का दंश झेल रहे मोदी को इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है..!
ऐसी स्थिति में मोदी के बाद भाजपा में पीएम की उम्मीदवारी की सबसे प्रबल नेता सुषमा स्वराज का नाम आगे आता है तो निर्विवाद छवि की नेता होने के साथ ही महिला होने के नाते सुषमा स्वराज की दावेदारी को कमजोर तौर पर आंककर नहीं देखा जा सकता। ऐसे में सवाल ये है कि क्या सुषमा स्वराज पीएम की कुर्सी के लिए मोदी से बेहतर उम्मीदवार हो सकती हैं..?
जाहिर है सुषमा की निर्विवाद नेता की छवि के साथ ही सुषमा की आक्रमक और लाजवाब भाषण शैली के कायल लोगों की कमी नहीं है और सबसे बड़ी बात ये कि सुषमा पर मोदी के तरह सांप्रदायिक नेता होने का आरोप कभी भी नहीं लगा हैजो सुषमा को हर वर्ग के मतदाताओं में मोदी की अपेक्षा स्वीकार्य बना सकता है..! लेकिन इसके बाद भी भाजपा में प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी के तौर पर सुषमा की अपेक्षा मोदी को अहमियत दी जा रही है और सुषमा को कहीं न कहीं नजरअंदाज किया जा रहा है जो इस ओर साफ ईशारा कर रहा है कि भाजपा एक बार फिर से हिंदुत्व के सहारे केन्द्र की सत्ता में वापसी करने का मन बना चुकी है और भाजपा को लगता है कि नरेन्द्र मोदी की हिंदुओं के पुरोधा की छवि ही उसकी नैया पार लगा सकती है...फिर चाहे इसकी कीमत उसे एनडीए के कुनबे के बिखरने के रूप में ही क्यों न चुकानी पड़े..! लेकिन भाजपा शायद इस बात को भूल रही है कि उसका ये कदम उसे एक वर्ग के करीब लाकर उसके वोट तो दिलवा सकता है लेकिन पार्टी को दूसरे वर्ग की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है..! (जरूर पढ़ें- अगला पीएम कौनराहुल, मोदी या..?)
राजनीति में कब क्या हो जाए कहा नहीं जा सकता..? विरोध के बाद भी भाजपा में आज मोदी की गूंज है...हो सकता है कल तस्वीर बदल जाए..! नितिन गडकरी का चैप्टर तो याद ही होगा आपको...दोबारा अध्यक्ष बनाने के लिए भाजपा के संविधान में तक संशोधन कर दिया गया लेकिन किसने सोचा था कि पार्टी के अगले अध्यक्ष राजनाथ सिंह होंगे..!

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शनिवार, 20 अप्रैल 2013

सिर्फ तारीख बदली...तस्वीर नहीं...!


तारीख बदल गयी...मौसम भी बदल गया लेकिन नहीं बदले तो हालात...नहीं बदली तो लोगों की सोच और नहीं बदली दिल्ली की तस्वीर...नहीं बदली देश की तस्वीर..! 16 दिसंबर 2012 की वो तारीख आज भी नहीं भूलती...! उस दिन को याद करते हुए आंखें आज भी डबडबा जाती हैं...शब्द आसूंओं में डूब जाते हैं..! आंसुओं से तरबतर घटना के बाद के वो दिन भले ही एक हंसती खेलती जिंदगी को इस क्रूर दुनिया से बहुत बहुत दूर लेकर चले गए हों लेकिन अपने पीछे कई सवाल भी खड़े करके चले गए..? (जरूर पढ़ें- क्या लड़की होना उसका कसूर था ?)
सड़कों पर देश का गुस्सा और कुछ भी कर गुजरने को तैयार बैठे युवाओं के आक्रोश के बाद नींद से जागी सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए बड़े बड़े वादे औऱ दावे करते हुए भले ही कड़े कदम उठाने की कवायद शुरु कर दी हो लेकिन इन वादों और दावों का सच एक बार फिर से छलावा साबित हुआ..! (जरूर पढ़ें- दिल्ली गैंगरेप- यार ये लड़की ही ऐसी होगी !)
दो दिन पहले ही दिलदार दिल्ली का खिताब हासिल कर इतराने वाली दिल्ली एक बार फिर से सबको शर्मशार कर गयी। नवरात्र में एक तरफ घर-घर में कन्याओं के पैर धोए जा रहे थे...कन्याओं का पूजन किया जा रहा था दूसरी तरफ दिल्ली के गांधीनगर में विकृत मानसिकता एक पांच साल की मासूम की जिंदगी को रौंद रहा था..!  विकृत मानसिकता ने एक बार फिर से दिखा दिया कि उनके लिए उनकी हवस की भूख के आगे कोई मायने नहीं रखता फिर चाहे वह पांच साल की मासूम हो या फिर कोई और..? (जरूर पढ़ें- पहले पूछी उम्र...फिर किया बलात्कार..!)
उनके लिए घर- परिवार, रिश्ते नाते, समाज कुछ भी मायने नहीं रखते उनके लिए मायने रखती है तो किसी भी कीमत पर अपनी हवस की भूख को शांत करना..!
विकृत मानसिकता का कोई ईलाज नहीं है लेकिन दिल्ली पुलिस को क्या हो गया..? क्या उनकी सोच भी इतनी विकृत हो गयी है कि वे 16 दिसंबर की दिल दहला देने वाले घटना के बाद भी किसी मासूम के गुम होने पर उसे तलाश करना तो दूर एफआईआर तक दर्ज नहीं करते हैं..?  अलग-अलग मामलों में पीड़ित के परिजनों की एफाईआर दर्ज न करने के लिए तो पुलिस पहले ही बदनाम है..! यहां तक तो समझ में भी आता है लेकिन 5 साल की मासूम के साथ बल्ताकार और हैवानियत का पता चलने के बाद आरोपी को गिरफ्तार करने की बजाए पीड़ित के परिजनों को दो हजार रूपए की पेशकश करके चुप होने की बात करना क्या दर्शाता है..? जाहिर है दिल्ली पुलिस की ये हरकतें किसी विकृत मानसिकता वाले व्यक्ति से अलग तो नहीं है..! फर्क सिर्फ इतना है कि एक हैवानियत की सारी हदें पार करते हुए मासूम की जिंदगी को नर्क से भी बदतर बना देता है और दूसरा उसका साथ देता है..! (जरूर पढ़ें- अबोध कन्याओं से यौन अपराध क्यों..?)
16 दिसंबर 2013 के बाद भी न रुकने वाली हैवानियत भरी बलात्कार की घटनाएं और अब पांच साल की मासूम के साथ दरिंदगी ये साबित करने के लिए काफी है कि महिलाएं और बच्चियां न तो तब सुरक्षित थी और न ही अब..! (जरूर पढ़ें- बलात्कार- 1971 से लगातार..!)
माना हम विकृत मानसिकता को नहीं बदल सकते...ऐसे लोगों की सोच को नहीं बदल सकते लेकिन ऐसा तो नहीं कि इस तरह की घटनाओं को कम भी नहीं किया जा सकता..? एक भी बच्ची को ऐसे लोगों की हवस का शिकार बनने से नहीं रोका जा सकता..? शिकायत मिलने पर पुलिस की सख्ती और त्वरित कार्रवाई के बाद दोषियों के मामले के निपटारे के लिए फास्ट ट्रेक कोर्ट की स्थापना और तय समय सीमा के अंदर दोषियों को मौत की सजा क्या ऐसे लोगों के मन में खौफ पैदा नहीं करेगा..? जाहिर है ऐसी घटनाओं को पूरी तरह नहीं भी रोका जा सकता तो इन में कमी तो आ सकती है लेकिन ऐसा तब होगा न जब की पुलिस शिकायत मिलने पर त्वरित कार्रवाई करे और फास्ट ट्रेक कोर्ट दोषियों को मौत की सजा सुनाए..!
एक बार फिर से महिला सुरक्षा को लेकर बहस शुरु हो गयी है और दोषियों को मौत की सजा देने की वकालत भी होने लगी है लेकिन एक सुलगता सवाल जेहन में बार-बार उठ रहा है कि क्या अब बदलेगी दिल्ली पुलिस..? क्या अब बदलेगी दिल्ली की तस्वीर..? क्या अब बदलेगी देश की तस्वीर..? क्या अब सुरक्षित रहेंगी महिलाएं और बच्चियां..? या फिर कुछ दिनों या महीनों बाद फिर से आएगी एक ऐसी ही दर्द भरी तारीख..! जिसका एहसास भर ही डरा देता है।

deepaktiwari555@gmail.com

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

IPL और IPL का फर्क...!


भारत में IPL के रोमांच के बीच आयी वर्ल्ड बैंक की एक ताजा रिपोर्ट ने IPL को एक नयी परिभाषा दे दी है। ये रिपोर्ट एक बार फिर से भारत के उस सच को उजागर कर रही है जिसे स्वीकार करने में हमारी देश की सरकार में शामिल जिम्मेदार लोग कतराते रहे हैं..!
वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट- गरीबों की स्थिति: कहां है गरीब, कहां है सबसे गरीबकहती है कि दुनिया में 1.2 अरब लोग अभी भी बेहद गरीबी के हालत में हैं। रिपोर्ट ये भी कहती है कि दुनिया के गरीबों में से एक तिहाई गरीब भारत में हैं जो रोजाना 1.25 डॉलर यानि कि करीब 65 रुपए से कम में अपना गुजारा करते हैं।  
भारत के योजना आयोग के लिए ये रिपोर्ट बकवास हो सकती है क्योंकि योजना आयोग के लिए तो गरीबी की परिभाषा कुछ अलग ही है। योजना आयोग का गरीबी का वो आंकलन को याद ही होगा आपको जिसमें योजना आयोग के मुताबिक शहर में रोजाना 32 रूपए खर्च करने वाले और गांव में 26 रुपए खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है। योजना आयोग के आंकलन को देखें और वर्ल्ड बैंस की इस रिपोर्ट को देखें तो फिर योजना आयोग के हिसाब से भारत में कोई शख्स गरीब है ही नहीं..! ये बात अलग है कि इसी योजना आयोग के दफ्तर में 35 लाख रुपए टॉयलेट के निर्माण में खर्च कर दिए जाते हैं..!
योजना आयोग ही नहीं दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का वो बयान भी यहां पर याद आता है जिसमें वे कहती हैं कि 5 लोगों के परिवार के एक महीने के खाने के खर्च के लिए 600 रुपए काफी हैं..! लेकिन देश की राजधानी दिल्ली में हर हफ्ते भूख से एक व्यक्ति क्यों दम तोड़ता है उसकी जवाब शायद शीला दीक्षित के पास नहीं है..? (जरूर पढ़ें- शीला जी दिल्ली में भूख से क्यों होती है मौत ?)  
आप भी सोच रहे होंगे कि पूरा देश Indian Premier League का लुत्फ उठा रहा है और ये पड़ गए गरीबों और भूखों की चर्चा में..! वैसे भी जब पैसों की बरसात वाले खेल Indian Premier League में पैसों के साथ ही छक्कों की बरसात हो रही हो तो गरीबों और भूखों की Indian Poor League पर कौन चर्चा करना चाहेगा..?
लेकिन जनाब IPL के इन तीन शब्दों में से भी सिर्फ एक शब्द का फर्क तो देखते जाइऐ...एक तरफ Indian Premier League का खूब प्रमोशन हो रहा है। करोड़ों रूपए पानी की तरह बहाए जा रहे हैंलोगों के पास पीने के लिए पानी नहीं है लेकिन पिच को तैयार करने के लिए पानी बरसाया जा रहा है दूसरी तरफ भारत में निवास करने वाली विश्व की एक तिहाई आबादी यानि कि Indian Poor League की चिंता किसी को नहीं है..! जब बारी इन पर बात करने की आती है...इनके प्रमोशन की आती है तो योजना आयोग का सिर के ऊपर से निकल जाने वाला आंकलन और नेताओं के श्रीमुख से दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की तरह सिर्फ बेतुके बोल ही सुनाई देते हैं जो Indian Poor League का उत्थान नहीं सिर्फ उपहास उड़ाती है..!
हैरत की बात तो ये है कि चुनाव के वक्त पर हमारे देश के राजनेताओं को Indian Poor League की खूब याद आती है। नेताओं पर Indian Poor League का ऐसा खुमार चढ़ता है कि चुनाव में राजनेता Indian Poor League के दरवाजे पर दस्तक देकर इनके उत्थान की बड़ी बड़ी बातें और वादें इनसे करते हैं लेकिन चुनाव जीत जाने के बाद Indian Poor League को मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराने और इनके बेहतर जीवन स्तर की बात आने पर ये इन्हें गरीब मानने से ही इंकार कर देते है..! इनको सस्ता  भोजन मुहैया कराने के साथ ही इनके उत्थान के नाम पर जो योजनाएं संचालित की भी जाती हैं उनमें भी भ्रष्ट नेताओं और भ्रष्ट अधिकारियों का गठजोड़ इनके हक पर डाका मारने का कोई मौका नहीं छोड़ता..!
है न बड़ा फर्क IPL (Indian Premier League) और IPL (Indian Poor League) में लेकिन बेहतर होता जब ये फर्क हमारी देश के नेताओं को नजर आता जो Indian Poor League के उत्थान के नाम पर सत्ता की चाबी तो हासिल कर लेते हैं लेकिन बारी जब वोट का कर्ज उतारने की आती है तो इनका उपहास उड़ाते हैं..!

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गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

क्यों मोदी के खिलाफ हैं नीतीश..?


2014 में एनडीए की सरकार बनने का तो कुछ पता नहीं लेकिन प्रधानमंत्री की कुर्सी को लेकर तकरार चरम पर पहुंच गयी है। एनडीए का कुनबा बिखरने को है लेकिन पीएम की कुर्सी को लेकर रार में कोई कमी नहीं है..! यहां तक तो ठीक था लेकिन अब गड़े मुर्दे उखाड़कर एक दूसरे के सिर आरोप मढ़ने का खेल शुरु हो गया है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी भाजपा की तरफ से संभावित पीएम के उम्मीदवार हैं लेकिन एनडीए का 17 साल पुराने घटक दल जनता दल यूनाइटेड को भाजपा की तरफ से पीएम की उम्मीदवारी के लिए एक धर्मनिरपेक्ष चेहरा चाहिए क्योंकि जद यू मोदी को 2002 के गुजरात दंगों की वजह से सांप्रदायिक मानती है..!
जद यू को मोदी के मुस्लिम टोपी न पहनने पर भी ऐतराज है और जदयू ने फिलहाल साफ कर दिया है कि मोदी उनको बिल्कुल भी मंजूर नहीं है। भाजपा के कुछ नेताओं को मोदी के खिलाफ जदयू नेताओं की बयानबाजी रास नहीं आ रही है ऐसे में भाजपा ने नीतिश कुमार को ही गुजरात दंगों के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया। भाजपा नेता कहते हैं कि नीतीश कुमार तत्कालीन रेल मंत्री थी ऐसे में रेल मंत्री गोधरा में हुए साबरमती ट्रेन अग्निकांड रोक देते तो गुजरात दंगे नहीं होते।
नीतीश कहां चुप रहने वाले थे वे पलटवार करते हुए कहते हैं कि उन्होंने साबरमती ट्रेन अग्निकांड की रिपोर्ट संसद में पेश की थी और दंगे रोकने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की थी न की उनकी।
कुल मिलाकर भाजपा और जदयू के बीच तकरार लगातार बढ़ती ही जा रही है जो साफ इशारा कर रही है कि निकट भविष्य में एनडीए के कुनबे में जदयू के दिखाई देने की उम्मीद कम ही है..! (जरूर पढ़ें- नरेन्द्र मोदी-नीतिश कुमार...क्यों है तकरार ?)
मोदी को सांप्रदायिक बताने वाले बिहार के मुख्यमंत्री और जदयू नेता नीतीश कुमार की एक बात समझ में नहीं आती..? नीतीश कहते हैं कि वे ऐसे नेता का नाम भाजपा से पीएम की उम्मीदवारी के लिए स्वीकार करेंगे जो जरूर पड़ने पर टोपी भी पहने और तिलक लगाने से भी जिसे कोई ऐतराज न हो..!
नीतीश को अगर मोदी सांप्रदायिक लगते हैं तो फिर 2002 में एनडीए सरकार में रेल मंत्री रहे नीतीश कुमार ने गुजरात में दंगों के बाद क्यों खुद की पार्टी को एनडीए से अलग नहीं किया..? उस वक्त क्यों नीतीश ने रेल मंत्री की कुर्सी से इस्तीफा देकर अपने रास्ते अलग कर लिए..?
क्यों नीतीश कुमार ने उसके बाद बिहार में भाजपा के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा और अपनी सरकार बनाने के लिए भाजपा का समर्थन लिया..?
जाहिर है 2002 में नीतीश रेल मंत्री की कुर्सी का मोह नहीं छोड़ पाए और उसके बाद बिहार में सत्ता के मोह में नीतीश बंधे रहे और भाजपा के साथ मिलकर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठकर सरकार चलाते रहे..!
2002 से 2012 तक जिस नीतीश को मोदी सांप्रदायिक नहीं दिखाई दिए वो मोदी अब अचानक से नीतीश की आंख की किरकिरी बन गए हैं..! नीतीश को जब लगा कि उनकी ही तरह एक राज्य का मुख्यमंत्री पीएम की कुर्सी की दौड़ में शामिल होने की ओर बढ़ रहा है तो नीतीश को 10 साल पुराने 2002 के गुजरात दंगों की भी याद आ गयी..!
जाहिर है पीएम की कुर्सी की महत्वकांक्षा तो नीतीश भी रखते होंगे ऐसे में कैसे नीतीश जिस मोदी को वे खुद के बराबर के कद का नेता मानते हैं उन्हें पीएम की कुर्सी की दौड़ में इतनी आसानी से आगे निकल जाने देंगे..! (जरूर पढ़ें- मोदी, नीतीश और शिवराज..!)
राजनीति में कुछ भी संभव है ऐसे में इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि जदयू का मोदी का विरोध करना सिर्फ जदयू का ही विरोध है या फिर इसके पीछे कुछ भाजपा के ऐसे नेता है जो जदयू के सहारे मोदी के नाम पर विरोध की लकीर को लंबी करना चाहते हैं ताकि मोदी पीएम की उम्मीदवारी की दौड़ से बाहर हो जाएं और एनडीए की सरकार बनने की स्थिति में पीएम की कुर्सी के लिए वे दावेदारी कर सकें..!
बहरहाल तकरार अपने चरम पर है ऐसे में ये देखना रोचक होगा कि 17 साल पुरानी भाजपा और जदयू की दोस्ती टूटने से एनडीए का कुनबा बिखरेगा या फिर जदयू की 17 साल पुरानी दोस्ती की खातिर भाजपा मोदी के पीएम की कुर्सी के अरमानों पर पानी फेर देगी..!

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बुधवार, 17 अप्रैल 2013

असरदार ब्लॉग@Makemytrip.com

ख़बर का असर तो आपने सुना और देखा होगा लेकिन क्या बलॉग का असर सुना है। मेरे साथ तो कुछ ऐसा ही हुआ। Makemytrip.com का अपना एक कटु बस यात्रा का अनुभव कल आप सभी लोगों के साथ साझा किया था। (जरूर पढ़ें- अनुभव@Makemytrip.com)। रवि मिश्रा जी ने नवभारत टाइम्स के मेरे ब्लॉग को अपने ट्विटर अकाउंट पर Share किया था जिस पर Makemytrip.com की Customer Care Team की भी नजरें पड़ गयी और मेरा ये अनुभव Makemytrip.com के लोगों तक  तक भी पहुंच गया। आज शाम 3 बजकर 54 मिनट पर Makemytrip.com से किन्हीं सलमान अहमद का फोन आया था और उन्होंने मुझसे पूरी घटना की जानकारी ली और अपने स्तर पर भी इसकी जांच कराने की बात कही।

4 बजकर 20 मिनट पर फिर से सलमान अहमद साहब का फोन आता है और मुझे हुई असुविधा के लिए Makemytrip.com की तरफ से माफी मांगते हुए यात्रा का पूरा पैसा रिफंड करने की बात कहते हैं। साथ ही संबंधित बस ऑपरेटर International Tourist Centre को तत्काल Blacklist किए जाने की भी मुझे जानकारी दी। ऐसा नहीं है कि यात्रा का अनुभव या इसकी शिकायत मैंने Makemytrip.com से नहीं की थी लेकिन ईमेल और फोन से फीडबैक देने के बाद Makemytrip.com से कोई जवाब नहीं मिला।
खैर ब्लॉग के माध्यम से देर से ही सही Makemytrip.com की सकारात्मक प्रतिक्रिया आयी तो अच्छा लगा। लेकिन Makemytrip.com किसी शिकायत के आने से पहले ही यात्री सुविधाओं से कोई समझौता न करते हुए पहले ही बेहतर सर्विस देने वाले बस ऑपरेटर्स से समझौता करता तो ज्यादा अच्छा लगता।
फिलहाल तो Makemytrip.com का सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया। उम्मीद करता हूं कि भविष्य में किसी का मेरी तरह इस कटु अनुभव से सामना न हो। 

deepaktiwari555@gmail.com


काश मैं भी संजय दत्त होता..!



फिल्म अभिनेता संजय दत्त के लिए राहत भरी खबर है...अरे भई सुप्रीम कोर्ट से सरेंडर करने के लिए चार सप्ताह की मोहलत जो मिल गई है। पांच साल की सजा के बचे हुए साढ़े तीन साल के लिए जेल में सजा काटनी थी...ऐसे में चार सप्ताह की मोहलत के बहाने साढ़े तीन साल की एडवांस कमाई करने का मौका जो मिल गया..! संजय दत्त ने भी तो यही दलील दी थी कि बॉलिवुड का 278 करोड़ रूपया उनकी फिल्मों में लगा है लिहाजा फिल्मों को पूरा करने के लिए उन्हें 6 माह की मोहलत दी जाए। हालांकि कोर्ट ने संजय दत्त को 6 माह की तो नहीं लेकिन एक माह की मोहलत तो दे ही दी है। (जरूर पढ़ें- तो 35 साल हो बालिग होने की उम्र..!)
एक दिन पहले ही कोर्ट ने जैबुनिस्सा अनवर काजी की अर्जी खारिज कर दी लेकिन संजय दत्त को 4 सप्ताह की मोहलत दे दी। हालांकि संजय को मोहलत मिलने की उम्मीद कम ही जतायी जा रही थी लेकिन कोर्ट का फैसला सबके सामने है। वैसे ये सिर्फ हिंदुस्तान में ही हो सकता है कि एक व्यक्ति को उसकी व्यवसायिक जिम्मेदारियां पूरी करने के लिए सरेंडर करने के लिए 4 सप्ताह की मोहलत दे दी जाती है जबकि अलग-अलग मामलों में सजा पाए लोगों को एक घंटे की भी मोहलत नहीं दी जाती..!
हिंदुस्तान में विभिन्न अपराधों में जेल में बंद अपराधियों की भी व्यवसायिक जिम्मेदारियां होती होंगी..? व्यवसायिक न सही पारिवारिक जिम्मेदारियां तो होंगी ही..? कईयों की हालत तो ऐसी होती है कि उनके घर में परिवार के मुखिया के या किसी कमाऊ सदस्य के जेल जाने पर परिवार के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो जाता है..! बच्चों की स्कूल की फीस जमा करने की कोई व्यवस्था नहीं होती है..! जवान हो रही लड़की की शादी के इंतजाम के लिए पैसा उनके पास नहीं होता है लेकिन किसी को अपनी इन जिम्मेदारियों को पूरा करने की मोहलत नहीं मिलती है..!
संजय दत्त व्यवसायिक जिम्मेदारियों का हवाला देते हैं। बॉलिवुड की 278 करोड़ की फिल्मों का काम अधूरा रहने की दलील देते हैं और उन्हें पैसा कमाने के लिए 4 सप्ताह की मोहलत मिल जाती है। एक तरह से देखें तो साढ़े तीन साल जेल में रहते हुए भी संजय दत्त की फिल्में रीलीज हो रही होंगी..! वे अपनी फिल्मों से जेल में रहते हुए भी पैसा कमा रहे होंगे और जेल से निकलने के बाद उनके पास कम से कम पैसे की तो कोई कमी नहीं होगी..! लेकिन लाखों लोग जो जेल में बंद रहते हैं तो उनके परिवार की क्या हालत होती होगी इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है..! वे भी आज यही सोच रहे होंगे कि काश हम भी संजय दत्त की तरह फिल्म अभिनेता होते..बड़े आदमी होते तो हमें भी अपनी व्यवसायिक या पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करने की मोहलत मिल जाती..! वे सोच रहे होंगे कि हमारे लिए भी कोई जस्टिस काटजू राष्ट्रपति के पास हमारी सजा माफ करने की अपील करते..! लेकिन अफसोस ये लाखों लोग न तो संजय दत्त हैं और न ही जस्टिस काटजू जैसे कोई सज्जन उनकी सजा माफी के लिए राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखने वाले हैं..! (जरूर पढ़ें- संजय दत्त निर्दोष हैं..!)
मैं न तो संजय दत्त को सरेंडर करने की मोहलत दिए जाने के समर्थन में हूं और न ही जेल में बंद लाखों अपराधियों के लिए मेरे मन में कोई नरम भाव है लेकिन एक ही देश में कानून के अलग-अलग रूप कम से कम मुझे तो समझ में नहीं आते..! कानून सबके लिए समान होना चाहिए फिर चाहे वो कोई फिल्म अभिनेता संजय दत्त हो...कोई राजनेता हो...कोई उद्योगपति हो या फिर कोई दूसरा अपराधी..!

deepaktiwari555@gmail.com