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गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

आईपीएल- बाप बड़ा न भैया...सबसे बड़ा रूपैया..!


एक कहावत है- बाप बड़ा न भैया...सबसे बड़ा रुपैया। सुनी तो आपने भी होगी और आज के समय में जब हर कोई पैसे के पीछे भाग रहा है तो ये कहावत कई मौकों पर चरितार्थ भी होती दिखाई देती है। आईपीएल में तो ये कहावत खूब चरितार्थ हो रही है। आईपीएल मैच के दौरान अलग – अलग फ्रेंचायजी मालिक की टीमों में खेल रहे एक ही देश के खिलाड़ी मैदान में ही एक दूसरे से भिड़ते नजर आ रहे हैं और नौबत गाली – गलौज और हाथापाई तक आ रही है। ये वही खिलाड़ी हैं जो हैं तो एक ही देश के और अंतर्राष्ट्रीय मैचों में एक दूसरे का हौसला बढ़ाते दिखाई देते हैं लेकिन आईपीएल में कहानी कुछ और ही नजर आ रही है।
11 अप्रेल को आईपीएल 6 में भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला। दुर्भाग्य से आपस में भिड़ने वाले दोनों खिलाड़ी भारत के ही थे और अपनी – अपनी टीम का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। बॉलिवुड में किंग खान के नाम से मशहूर शाहरुख खान की टीम कोलकाता नाईटराइडर्स और उद्योग जगत में किंग ऑफ गुड टाइम्स के नाम से मशहूर विजय माल्या की टीम रॉयल चैलेंजर्स बैंगलौर आमने – सामने थी। मुकाबला कांटे का था। कोलकाता ने पहले बल्लेबाजी करते हुए बंगलौर के सामने जीत के लिए 155 रनों का लक्ष्य रखा। कोलकाता की ओर से कप्तान  गंभीर ने सबसे ज्यादा 59 रन बनाए। बंगलौर के लिए 20 ओवर में 155 का लक्ष्य आसान नहीं था तो बहुत ज्यादा मुश्किल भी नहीं था वो भी तब जब विरोधी टीम में टी-20 के किंग क्रिस गेल मौजूद हों। हुआ भी कुछ ऐसा ही जब मयंक अग्रवाल के रूप में पहला विकेट गिरने के बाद बंगलौर के कप्तान विराट कोहली ने गेल के साथ मिलकर कोलकाता की धज्जियां उड़ानी शुरु कर दी। कोलकाता के कप्तान गंभीर के माथे पर बल साफ दिखाई दे रहे थे तो बंगलौर के कप्तान कोहली कुछ ज्यादा ही जोश में दिखाई दे रहे थे और हर गेंद को बाउंड्री के बाहर पहुंचाने को बेताब दिखाई दे रहे थे। ऐसी ही एक कोशिश में कोहली बालाजी की गेंद में मोर्गन को कैच थमा बैठे। परेशान गंभीर का चेहरा खिल उठा तो कोहली की खीज साफ दिखाई दी। गंभीर और कोहली के बीच इशारों इशारों में शुरु हुई तकरार गाली – गलौज तक पहुंच गयी। साथी खिलाड़ियों ने दोनों को अलग कर स्थिति को संभाला लेकिन तब तक ये शर्मनाक वाक्या घट चुका था। गेल के 50 गेदों में 9 छक्कों की मदद से बनाए धमाकेदार 85 रनों की बदौलत मैच भले ही विराट कोहली की टीम बंगलौर ने जीत लिया हो और गंभीर की टीम कोलकाता को मात मिली हो लेकिन यहां हार हुई तो खेल भावना की जिसकी दोनों ही टीमों के कप्तानों ने मैदान में धज्जियां उड़ा दी और दिखा दिया कि पैसे के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं..!
मैच के बाद भले ही दोनों ने इसे मैदान के अंदर की बात बताकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की लेकिन ये वाक्या अपने आप में कई सवाल खड़े कर गया..! आईपीएल में टी-20 का रोमांच जरूर है लेकिन विशुद्ध रूप से ये सिर्फ पैसों का खेल है। जिसकी शुरुआत खिलाड़ियों की बिक्री के साथ शुरु होती है। फ्रेंचायजी मालिक अपने पसंदीदा खिलाड़ी पर दिल खोलकर पैसा लुटाते हैं और बदले में खिलाड़ी पर दबाव होता है हर मैच में टीम को जीत दिलाने के साथ ही आईपीएल जिताने का..! जाहिर है जो फ्रेंचायजी मालिक करोड़ों खर्च कर एक-एक खिलाड़ी को खरीद रहा है वो इन खिलाड़ियों से आईपीएल को झोली में लाने की उम्मीद तो पालेगा ही..!
पैसे के इस खेल में खिलाड़ी पर अच्छे प्रदर्शन के साथ ही टीम को जिताने का किस तरह का दबाव रहता है इसका ताजा उदाहरण कोलकाता और बंगलौर के मैच में हुई दोनों टीम के कप्तानों गंभीर और कोहली की शर्मनाक भिड़ंत है। ये शर्मनाक इसलिए है क्योंकि ये दोनों ही खिलाड़ी एक ही देश के हैं और अंतर्राष्ट्रीय मैचों में विरोधियों के खिलाफ एक ही टीम में खेलते हुए एक दूसरे का हौसला बढ़ाते हैं लेकिन पैसे के खेल आईपीएल ने इन्हें एक – दूसरे का दुश्मन बना दिया..!
जाहिर है पैसा खिलाड़ियों के सिर चढ़कर बोल रहा है और इसके लिए वे कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं..! क्या फर्क पड़ता है कि ये अंतर्राष्ट्रीय मैचों में विरोधियों के खिलाफ एक ही देश के लिए एक ही टीम से खेलते हैं..! पैसे के लिए तो ये कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं..!

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बुधवार, 10 अप्रैल 2013

1984 दंगे- इंसाफ अभी बाकी है..!


29 साल का वक्त छोटा नहीं होता। 29 साल में लोगों की जिंदगियां बदल जाती है। 29 साल में एक बच्चा व्यसक हो जाता है। वो स्कूल से निकलकर अपने रोजगार में जुट जाता है तो अपनी जीवन संगिनी के साथ एक नये जीवन की शुरुआत कर लेता है। उसकी जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं और वो एक जिम्मेदार व्यक्ति बन जाता है लेकिन 29 सालों में कुछ लोगों के लिए कुछ भी नहीं बदला।
उनके चेहरे पर झुर्रियां जरूर उभर आयीं लेकिन चेहरे की झुर्रियां भी उनके दर्द को छुपा नहीं पायी। 29 साल से इंसाफ की उम्मीद में जीवन का एक – एक पल अपनों को खोने के गम में काटने वाले 1984 के सिख विरोधी दंगों में मारे गए लोगों के परिजनों के चेहरों को देखकर तो ऐसा ही लगता है। दंगो में कांग्रेसी नेता जगदीश टाईटलर की भूमिका की जांच कर रही जिस सीबीआई पर लोगों को भरोसा था कि उनके न्याय की लड़ाई में सीबीआई उनका साथ देगी उसी सीबीआई ने जगदीश टाईटलर को क्लीन चिट देते हुए अदालत में मामले को बंद करने की अर्जी दे दी।
लेकिन अदालत ने न्याय की आस में जिंदा लोगों को निराश नहीं किया और सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को खारिज करते हुए दोबारा से मामले की जांच के आदेश देते हुए कांग्रेसी नेता टाईटलर के खिलाफ केस चलाने के आदेश दे दिया। लोगों के चेहरे में न्याय की उम्मीद की खुशी जरूर थी लेकिन मन में ये सवाल भी था कि 29 साल बाद फिर से टाईटलर के खिलाफ केस चलेगा तो उन्हें इंसाफ कब मिलेगा..?  कितना और वक्त इंसाफ मिलने में लगेगा..?
सवाल ये भी है कि जिस सीबीआई ने टाईटलर को क्लीन चिट देते हुए अदालत में केस बंद करने की अर्जी दे दी वही सीबीआई अब फिर से जांच करेगी तो कैसे ये जांच निष्पक्ष होगी..?
अदालत के फैसले से ये न्याय व्वस्था पर एक बार फिर से विश्वास तो मजबूत हुआ है लेकिन सवाल भी कई खड़े हुए हैं। जाहिर है सीबीआई ने अपना काम पूरी ईमानदारी से नहीं किया जिस वजह से टाईटलर बचते रहे और आखिरकार कोर्ट ने क्लोजर रिपोर्ट को खारिज कर दिया..!
1984 में सिख विरोधी दंगों के वक्त टाईटलर की उम्र 40 साल थी। 29 साल बाद जब अदालत ने सीबीआई की अर्जी खारिज करते हुए टाईटलर के खिलाफ दोबारा से केस चलाने का आदेश दिया है तो अब टाईटलर की उम्र 69 वर्ष है। टाईटलर इन 29 वर्षों में कई बार केन्द्रीय मंत्री भी रहे और टाईटलर ने बड़े ही आराम से इस वक्त को काटा लेकिन इसके उल्ट इंसाफ की आस लगाए बैठे दंगों के पीड़ितों के लिए ये 29 वर्ष किसी सजा से कम नहीं थे। अब फिर से सीबीआई मामले की जांच करेगी तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितना और वक्त सीबीआई मामले की दोबारा जांच में लेगी..? हो सकता है शायद तब तक टाईटलर की उम्र 80 से 85 वर्ष हो जाए या ऐसा भी हो सकता है कि इस लंबे वक्त में टाईटलर की स्वाभाविक मौत हो जाए..!
इंसाफ की आस लगाए बैठे पीड़ित जो इन 29 सालों में जैसे तैसे अपनी लड़ाई लड़ते रहेहो सकता है कि वे इंसाफ की आस में वे दम तोड़ दें..!  जगदीश टाईटलर के साथ ही पीड़ितों की उम्र का तकाजा तो कम से कम इसी ओर ईशारा कर रहा है कि शायद ही जीते जी टाईटलर को सजा और पीड़ितों को इंसाफ मिले..!
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये खड़ा होता है कि लंबी और जटिल कानूनी प्रक्रिया के बाद अगर टाईटलर को सजा होती भी है तो क्या वाकई में ये पीड़ितों के साथ इंसाफ होगा..?
टाईटलर के केस के बहाने एक बार फिर से क्या भारतीय अदालतों में सालों से लंबित पड़े उन आधा करोड़ मामलों पर सोचने का वक्त नहीं है कि क्यों न लंबित मामलों के निपटारे के लिए विशेष कदम उठाएं जाएं..? (पढ़ें- चौटाला केस- भ्रष्टाचारियों के लिए सबक)। हालांकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ ही चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने भी इस पर चिंता जाहिर की है लेकिन सवाल फिर उठता है कि क्या ये चिंता सालों से न्याय की आस लगाए बैठे लाखों लोगों के लिए एक उम्मीद की किरण लेकर आएगी..?

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शनिवार, 6 अप्रैल 2013

खुश तो बहुत होंगे आडवाणी आज..!


खुश तो बहुत होंगे आडवाणी आज...आखिर भाजपा नेता विजय गोयल ने आडवाणी को खुशी की वजह जो दे दी। जो बात आडवाणी चाहकर भी अपने मुंह से नहीं कह सकते थे वो बात भाजपा के स्थापना दिवस के मौके पर विजय गोयल ने कह दी। पीएम इन वेटिंग का तमगा आडवाणी को यूं ही नहीं मिला..! इसके पीछे की कहानी से कौन नहीं वाकिफ है..? अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में उप प्रधानमंत्री बनने के बाद से लेकर बीते आम चुनाव तक प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने की आडवाणी की प्रबल इच्छा थी लेकिन जनता जनार्दन ने एनडीए को सत्ता में वापस न लाकर आडवाणी का पीएम इन वेटिंग के टिकट को कन्फर्म करने में कोई दरियादिली नहीं दिखाई। नतीजा आडवाणी पीएम इन वेटिंग ही रह गए..! (जरूर पढ़ें- पीएम इन वेटिंग...बड़ी आत्म संतुष्टि)
2014 में सत्ता में आने का ख़्वाब संज़ों रही भाजपा में पीएम की उम्मीदवारी के लिए मोदी की प्रबल दावेदारी के बीच जिस तरह से दिल्ली भाजपा प्रदेश अध्यक्ष विजय गोयल ने भाजपा के स्थापना दिवस समारोह में आडवाणी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की बात कह डाली वो 85 साल के आडवाणी के लिए खुशी की वजह नहीं तो और क्या है..? (जरूर पढ़ें- क्या सच बोल रहे हैं आडवाणी ?)
गोयल भले ही बाद में अपनी बात पर ये कहकर सफाई देते दिखाई दिए कि वे पीएम का उम्मीदवार घोषित करने वाले कौन होते हैं लेकिन गोयल का जुबानी तीर तो मंच से चल ही चुका था वो भी तब जब मंच में भाजपा के तमाम कद्दावर नेताओं के साथ ही लाल कृष्ण आडवाणी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी मौजूद थे। वैसे भी नेता चाहे वे किसी भी दल के क्यों न हों उनका अपने बयान से पलटना ठीक उसी तरह है जैसे खुजली होने पर खुजलाना। अब गोयल भी पलट गए तो क्या लेकिन बात निकली है तो फिर दूर तलक जाएगी ही..!
खैर गोयल के बयान के बाद चर्चा का दौर भी शुरु हो ही गया है लेकिन खुद आडवाणी भी इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि गोयल का ये बयान उन्हें पलभर की खुशी से ज्यादा और कुछ नहीं दे सकता है..! पीएम के लिए वेटिंग कन्फर्म करना तो दूर की कौड़ी है..! भाजपा में मोदी का लगातार बढ़ता कद और लोकप्रियता के साथ ही भाजपा के वर्तमान हालात को कम से कम इसी ओर इशारा कर रहे हैं..! (जरूर पढ़ें- भाजपा से क्यों हुआ मोहभंग..?)
लेकिन राजनीति में नेता की किस्मत कब उसे अर्श से फर्श पर और फर्श से अर्श पर पहुंचा दे कहा नहीं जा सकता...अब पीवी नरसिंह राव, एचडी देवगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल के साथ ही मनमोहन सिंह ने क्या कभी सोचा होगा कि वे देश के प्रधानमंत्री बनेंगे..? लेकिन इतिहास हमारे सामने है। आडवाणी तो कम से कम प्रधानमंत्री के लिए वेटिंग की कतार में तो लंबे वक्त तक रहे ही हैं और एक बार फिर गोयल ने आडवाणी के नाम को हवा दे ही दी है..! (जरूर पढ़ें- मोदी बनाम राहुल- किसका चमकेगा सितारा..?)
आडवाणी की खुशी के लिए ही सही उम्र के इस पड़ाव में किसी ने तो उनके नाम का झंडा बुलंद किया। वैसे भी खुश होने का मौका कम ही लोगों को मिलता है अब आडवाणी को प्रधानमंत्री की कुर्सी की बड़ी खुशी न मिली तो क्या हुआ इसका एहसास खुश होने के लिए काफी है...कहते भी हैं न कि बड़ी खुशी के चक्कर में नन्ही न कर बेकार”…इसलिए आडवाणी जी पीएम की दावेदारी के एहसास से ही काम चलाइए वैसे भी इस बात की क्या गारंटी है कि 2014 में जनता जनार्दन एनडीए को सरकार बनाने का मौका देगी ही..!

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शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

मोदी बनाम राहुल- किसका चमकेगा सितारा..?


2014 के आम चुनाव से देश के दो बड़े राजनीतिक दलों में चर्चा चुनाव जीतने की नहीं है बल्कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा इसको लेकर ज्यादा है। कांग्रेसी एकमत से राहुल गांधी को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाना चाहते हैं...मनमोहन सिंह तो राहुल गांधी के लिए कुर्सी छोड़ने को तैयार बैठे हैं..! लेकिन कांग्रेस के युवराज हैं कि मानने को तैयार ही नहीं हैं। अलग-अलग मंचों पर राहुल गांधी के बयानों से तो कम से कम यही लगता है। पीएम की उम्मीदवारी के चाटुकारिता भरे सवाल पर कभी वे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को फटकार लगाते हैं तो कभी पीएम के सवाल को फिजूल बताते हैं। (जरूर पढ़ें- विजय बहुगुणा कैसे बने मुख्यमंत्री ?)
उपाध्यक्ष की कुर्सी सौंपने के बाद सोनिया गांधी ने भले ही राहुल को अघोषित तौर पर पीएम प्रोजेक्ट करने के संकेत दिए हों लेकिन राहुल की तेवर देखकर तो ऐसा लगता है कि वे फिलहाल कांग्रेस के लिए बतौर पॉलीटिक्ल एक्टिविस्ट ही काम करते रहना चाहते हैं। कुल मिलाकर राहुल का बार-बार पीएम की कुर्सी के सवाल पर इससे मुहं मोड़ना अपने आप में कई सवाल खड़े करता है..? जाहिर है ये वेवजह तो नहीं हो सकता तो फिर इसके पीछे कहीं राहुल गांधी का वो डर तो नहीं जो उन्हें अंदर ही अंदर पीएम की कुर्सी के सवाल पर इससे दूरी बनाए रखने की ही सलाह देता है। (जरूर पढ़ें- राहुल गांधी का डर !)
एक तरफ कांग्रेस के युवराज राहुल जहां पीएम की कुर्सी की राह में चुनाव जीतने की स्थिति में भी पार्टी की तरफ से कोई रोड़ा न होने पर भी कुर्सी से दूरी बनाए रखना चाहते हैं वहीं दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी ही पार्टी में पीएम पद पर उनकी उम्मीदवारी के विरोध में स्वर के बाद भी गुजरात का कर्ज उतारने के बाद अब देश का कर्ज उतारने की हुंकार भरते हैं। भाजपा ने 2014 के लिए भले ही नरेन्द्र मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार घोषित न किया हो लेकिन संसदीय बोर्ड में मोदी की एंट्री सारी कहानी खुद बयां कर रही है।
तीसरी बार गुजरात के मुख्यमंत्री का ताज पहनने वाले नरेन्द्र मोदी के पास जहां खोने के लिए कुछ भी नहीं है वहीं कांग्रेस युवराज राहुल गांधी के लिए 2014 का आम चुनाव किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है..! (जरूर पढ़ें- अगला पीएम कौनराहुल, मोदी या..?)
2014 में अगर एनडीए की सरकार बनने की स्थिति आती है तो नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की भी संभावना भी प्रबल है..! जाहिर है मोदी किसी राज्य के मुख्यमंत्री से देश के प्रधानमंत्री बनते हैं तो मोदी का कद बढ़ेगा ही लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है तो मोदी के पास खोने के लिए तो कुछ है नहीं...बाकी गुजरात तो रहेगा ही मोदी के पास ..!
वहीं दूसरी तरफ यूपीए की सरकार बनने की स्थिति आती है तो राहुल के पास  पाने के लिए पीएम की कुर्सी भी नहीं है क्योंकि वो तो वैसे भी अघोषित तौर पर राहुल गांधी के पास है ही..! हां बड़ा सियासी फायदा राहुल गांधी को ये होगा कि 2014 में कांग्रेस की जीत राहुल गांधी का बायोडाटा जरूर सुधार देगी..!
लेकिन अगर कांग्रेस की हार होती है तो राहुल गांधी के करियर पर एक और सियासी शिकस्त का दाग लगेगा जो शायद राहुल गांधी कभी नहीं चाहेंगे इसलिए ही वे पीएम की उम्मीदवारी पर फिलहाल बात नहीं कर रहे हैं क्योंकि पीएम की उम्मीदवारी के साथ चुनाव लड़ने पर शिकस्त मिलने का मतलब है कि हार का दाग कुछ ज्यादा ही गहरा नजर आएगा..!
2014 के चुनावी नतीजे सिर्फ देश की ही तकदीर तय नहीं करेंगे बल्कि गुजरात के बाद देश की जनता पर जादू चलाने की कोशिश कर रहे नरेन्द्र मोदी के साथ ही देश की दशा – दिशा बदलने की बात करने वाले कांग्रेस युवराज राहुल गांधी के सियासी भविष्य का भी फैसला करेंगे..! हम तो नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी को शुभकामनाएं ही दे सकते हैं बाकी फैसला तो देश की आवाम के ही हाथ में है।

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बुधवार, 3 अप्रैल 2013

केजरीवाल- छलावा या आम आदमी का संघर्ष..?


राजनीति के दलदल में उतरकर जनता के लिए सत्ता का रास्ता तैयार करने की बात करने वाले आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल लिया है और बकौल आम आदमी पार्टी उन्हें जनता का भरपूर साथ मिल रहा है लेकिन ये साथ वास्तव में दिखाई नहीं दे रहा है। केजरीवाल को लेकर लोगों के मत भी अलग- अलग है और कुछ लोग राजनीति में उतरकर राजनीति की गंदगी को साफ करने के केजरीवाल के फैसले को सही मानते है तो कुछ लोग इसे सिर्फ स्वार्थ की राजनीति करार देते हैं ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या वाकई में केजरीवाल का राजनीति में उतरने का फैसला व्यक्तिगत स्वार्थों को साधने का एक जरिया है या फिर वाकई में केजरीवाल जिस मिशन की बात कर रहे हैं उस पर विश्वास किया जा सकता है..?
अन्ना हजारे से अलग होने के बाद राजनीतिक दल गठन के केजरीवाल के फैसले से कहीं न कहीं लोगों का विश्वास टूटा है और लोगों को भ्रष्ट तंत्र में सुधार की जो गुंजाईश दिखाई देने लगी थी कहीं न कहीं वो धुंधली हुई है और शायद यही वजह है कि जो जनसहयोग केजरीवाल के अन्ना से अलग होने से पहले इस तरह के अनशन में या आंदोलन में दिखाई देता था वो अब कहीं नजर नहीं आता है।
राजनीतिक दलों और राजनेताओं के झूठे वादे और व्यक्तिगत स्वार्थों की राजनीति से कहीं न कहीं लोग इस कदर त्रस्त हैं कि शायद वे अब राजनीति के रास्ते इस गंदगी को साफ करने के केजरीवाल के फैसले को पचा नहीं पा रहे हैं और केजरीवाल एंड कपनी को भी उसी नजर से देखने लगे हैं जिस नजर से वे मौजूदा राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को देखते हैं।
लेकिन केजरीवाल के राजनीतिक दल गठन से पहले की भूमिका और इससे पहले उनके कार्यों को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते ऐसे में ये कहना फिलहाल जल्दबाजी होगा कि अरविंद केजरीवाल भी दूसरे राजनेताओं की तरह व्यक्तिगत स्वार्थ की राजनीति कर रहे हैं और सत्ता में पहुंचकर अपने हित साधना चाहते हैं। जो लोग ऐसे कह रहे हैं अगर वाकई में उनकी बातों में दम है तो इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि केजरीवाल अगर ऐसा कुछ कर रहे हैं तो वो ज्यादा दिन तक जनता को बेवकूफ नहीं बना सकते..!  
जहां तक केजरीवाल को अन्ना से अलग होने के बाद पहले जितना जनसमर्थन न मिलने की बात है तो इसके पीछे कहीं न कहीं अन्ना के आंदोलन के बिखरने को हम एक वजह के रूप में देख सकते हैं क्योंकि उस वक्त टीम अन्ना से देश की जनता की उम्मीदें बहुत ज्यादा बढ़ गयी थी जिसका प्रमाण आंदोलन में शामिल होने वाला लोगों का भारी जनसमूह था लेकिन आंदोलन का एकाएक खत्म होना और केजरीवाल का राजनीतिक दल गठन का फैसला करना लोगों की उम्मीदों पर एक कुठाराघात की तरह था जिसका असर अब केजरीवाल के आंदोलन में साफ दिखाई देने लगा है जहां पहले जितना जनसमर्थन नहीं दिखाई देता..!  
दरअसल इसके पीछे राजनीति के प्रति लोगों की बन चुकी वो मानसिकता भी है जो लोगों को ये सोचने पर मजबूर करती है कि कोई भी आंदोलन एक राजनीतिक हथकंडा है और लोगों का एक वर्ग कहीं न कहीं ये मानने लगा है कि अरविंद केजरीवाल का आंदोलन भी सिर्फ एक राजनीतिक हंथकंडा है जिसका खामियाजा केजरीवाल के आंदोलन और संघर्ष को भुगतना पड़ रहा है और राजनीतिक दल गठन से पहले केजरीवाल की जो छवि लोगों के जेहन में थी राजनीति शब्द जुड़ने के साथ ही वो छवि भी अब राजनैतिक हो गयी लगती है..!
निश्चित तौर पर राजनीति में उतरने का अधिकार हर व्यक्ति को है और अगर अरविंद ने ऐसा किया है तो इसे हम पूरी तरह गलत नहीं ठहरा सकते हैं। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि राजनीति के दलदल में में खुद को डूबने से बचाना केजरीवाल एंड कंपनी के लिए आसान काम नहीं होगा..?
हो सकता है केजरीवाल खुद को इस दलदल में डूबने से बचा भी लें लेकिन आम आदमी पार्टी से जुड़े उनके आस पास रहने वाले लोग क्या खुद को डूबने से बचा पाएंगे..? जाहिर है अगर उनके आस पास के लोग इस दलदल में डूबते हैं तो उस वक्त सवाल केजरीवाल पर ही उठेंगे और केजरीवाल के लिए इन सवालों का सामना करना आसान नहीं होगा।
अलग – अलग लोगों की दलीलें भी अलग- अलग हैं और हम सिर्फ इन दलीलों के आधार पर ही सरकारी अधिकारी से समाजसेवी और समाजसेवी से राजनेता बने अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी से मुंह नहीं मोड़ सकते कि केजरीवाल का संघर्ष देश की जनता के साथ छलावा है क्योंकि केजरीवाल भी ये बात अच्छी तरह समझते हैं कि अगर उनकी नीयत में अगर खोट है तो वो ज्यादा दिन तक देश की जनता को नहीं छल सकते।
बहरहाल चुनाव में असल तस्वीर पर से पर्दा जनता को ही हटाना है और चुनावी नतीजे ये साफ कर देंगे कि जिस आम आदमी के सहारे अरविंद केजरीवाल भ्रष्टतंत्र को बदलने की लड़ाई लड़ रहे हैं उस आम आदमी के दिल में केजरीवाल जगह बना पाए हैं या नहीं..?

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मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

अगला पीएम कौन…राहुल, मोदी या..?


राजनीति में सत्ता की डगर आसान नहीं होती। हो भी कैसे ये रास्ता जनता के दिलों के साथ ही विरोधियों के दरवाजे से भी होकर गुजरता है। जनता का दिल को कहीं न कहीं पसीज भी जाता है लेकिन अपने विरोधी को चारों खाने चित करने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं..!
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने अपनी टीम का ऐलान क्या किया विरोधियों ने यहां भी घेराबंदी का कोई मौका नहीं छोड़ा। कांग्रेसी इसे 2014 में भाजपा की लुटिया डुबोने वाली टीम करार दे रहे हैं तो दूसरे विरोधी भी निशाना साधने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। हालांकि भाजपा नेता भले ही इस सब से इत्तेफाक न रखते हों लेकिन ये कारनामा करने में वे भी पीछे नहीं रहे जब कांग्रेस ने राहुल गांधी को उपाध्यक्ष बनाकर कांग्रेस में दूसरी नंबर की पोजिशन दी उस वक्त भाजपा भी कुछ ऐसा ही राग अलाप रही थी जो कि अब कांग्रेसी नेता अलाप रहे हैं..!
सही मायने में शायद यही राजनीति है कि राजनीतिक दल और उनके नेता खुद को मजबूत करने की बजाए अपने विरोधियों को कमजोर करने में अपना पूरी ताकत लगाते हैं..! वे खुद की उपलब्धियों की बजाए विरोधियों की कमजोरियों और नाकामियों को हथियार बनाते हैं..! और इसी के बल पर सत्ता हासिल करने का ख्वाब देखते हैं..!
राहुल गांधी की ताजपोशी के वक्त ये काम भाजपा नेताओं ने किया तो राजनाथ सिंह की नई टीम के एलान और संसदीय बोर्ड में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की एंट्री पर अब कांग्रेसी इस काम को कर रहे हैं। लेकिन सवाल ये है कि क्या संसदीय बोर्ड में नरेन्द्र मोदी की एंट्री के बाद वाकई में 2014 में मुकाबला राहुल गांधी बनाम नरेन्द्र मोदी होगा..? क्या एनडीए की सरकार बनने की स्थिति में प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए मोदी की राह भी उतनी ही आसान है जितनी कि यूपीए में राहुल गांधी की..?
राहुल गांधी भले ही पीएम की कुर्सी की दावेदारी से इंकार करते रहे हों लेकिन कांग्रेसी नेताओं का चाटुकारिता के बहाने ही सही लेकिन बार – बार ये कहना कि राहुल गांधी की कांग्रेस की सरकार बनने की स्थिति में प्रधानमंत्री बनेंगे कहीं न कहीं जाहिर करता है कि 2014 से ऐन पहले राहुल गांधी को उपाध्यक्ष बनाकर कांग्रेस में नंबर दो की कुर्सी पर काबिज करना कहीं न कहीं इसका एक संकेत है..! इसमें कोई दो राय भी नहीं कि अगर 2014 में यूपीए की सरकार बनने की स्थिति आती है तो पीएम की कुर्सी के लिए राहुल के नाम पर कांग्रेस में आपत्ति करने की हिम्मत शायद ही किसी नेता में होगी..!
वहीं भाजपा की अगर बात करें तो गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की लगातार बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए ही शायद भाजपा ने मोदी को संसदीय बोर्ड में शामिल कर कहीं न कहीं मोदी के नेतृत्व में 2014 का आम चुनाव लड़ने के संकेत दिए हैं..! लेकिन मोदी के नाम पर पार्टी के अंदर ही नेताओं का एकजुट न होना और गंठबंधन के सहयोगियों का मोदी के नाम पर आंखे तरेरना मोदी की राह में रोड़े अटकाता भी दिखाई दे रहा है..! भाजपा भले ही चुनाव मोदी के नेतृत्व में लड़ने का फैसला कर ले लेकिन भविष्य में अगर एनडीए की सरकार बनने की स्थिति बनती है तो उस वक्त पीएम की कुर्सी को लेकर घमासान मचना तय है।
कोई कुछ भी कहे लेकिन 2014 की रणभेरी में राहुल गांधी बनाम नरेन्द्र मोदी के बीच मुकाबले की पटकथा लिखी जा चुकी है और अपनी – अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए सियासी जोर आजमाईश शुरु हो चुकी है।
जीत का सेहरा किसके सिर सजेगा ये तो जनता जनार्दन को तय करना है लेकिन पीएम की कुर्सी पर बैठने का ख्वाब तो राहुल और मोदी के अलावा भी कई पाले बैठे हैं..! ऐसे में देखना ये होगा कि 2014 में फिर किसी मनमोहन सिंह की किस्मत उसे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाती है या फिर भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी की तरह कुछ लोगों के ख्वाब भी पीएम इन वेटिंग की खिड़की पर ही दम तोड़ देंगे..!

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शनिवार, 30 मार्च 2013

भागो मुलायम...CBI आई..!


मुलायम सिंह को सीबीआई का बड़ा डर है। डर भी इस कदर की आए दिन सीबीआई के खौफ के किस्से सुनाते फिरते हैं। कहते हैं कि केन्द्र की कांग्रेस सरकार डराकर समर्थन लेती है और समर्थन न देने पर सीबीआई का डर दिखाती है। मुलायम ये भी कहते हैं कि कांग्रेस ने ही उनके पीछे सीबीआई को लगा दिया और ऐसा ही कुछ कांग्रेस ने डीएमके के साथ भी किया।
मुलायम यहीं नहीं रुकते वे केन्द्र सरकार पर जमकर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाते हैं। कहते हैं कि केन्द्र सरकार भ्रष्टाचार के सागर में गोते लगा रही है। कोयला घोटाले,किसानों के कर्ज माफी घोटाले औऱ हेलिकॉप्टर सरीखे घोटालों के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराते हुए जमकर कोसते हैं लेकिन इसके बाद भी कांग्रेस को समर्थन जारी रखते हैं। (पढ़ें- सीबीआई जिंदाबाद..!)
हालांकि इसके पीछे भी मुलायम अजीब से तर्क देते हैं। एक तरफ आडवाणी की तारीफ करते हैं और दूसरी तरफ भाजपा की ओर ईशारा करते हुए मुलायम कहते हैं कि वे सांप्रदायिक ताकतों को सत्ता में आने से रोकने के लिए ही केन्द्र सरकार को समर्थन दे रहे हैं। मुलायम सिंह की बातों को अगर गंभीरता से लिया जाए तो मुलायम की बातें मुलायम पर ही कई सवाल खड़े करती है। मसलन मुलायम समर्थन न देने पर सीबीआई का डर दिखाने का आरोप कांग्रेस पर लगाते हैं और कांग्रेस को समर्थन जारी रखते हैं...इसका मतलब मुलायम सीबीआई से डरे हुए हैं और जानते हैं कि समर्थन वापस लिया तो सीबीआई उनके पीछे लगा दी जाएगी और कहीं सीबीआई के जाल में वे न फंस जाएं। आय़ से अधिक संपत्ति का मामला तो वैसे भी मुलायम सिंह की कमजोर कड़ी है..!
मुलायम का केन्द्र सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाना और उसके बाद भी समर्थन देना जारी रखना क्या ये साबित करने के लिए काफी नहीं है कि मुलायम भी केन्द्र सरकार में हो रहे भ्रष्टाचार को अपना समर्थन दे रहे हैं..?
मुलायम भले ही लाख सफाई दें कि वे सांप्रदायिक ताकतों को सत्ता में आने से रोकने के लिए कांग्रेस को समर्थन देना जारी रख रहे हैं लेकिन उनकी ये दलील गले तो नहीं उतरती।
अब मुलायम ऐसा क्यों करते हैं ये तो मुलायम ही जानें लेकिन सीबीआई का खौफ किस कदर मुलायम पर हावी है ये आए दिन मुलायम की केन्द्र सरकार के खिलाफ बयानबाजी जाहिर करती है और इसके बाद भी समर्थन जारी रखने की बात करना इस पर मुहर भी लगाती है। (पढ़ें- सीबीआई- फिर काम आया ब्रह्मास्त्र..!)
मुलायम ये कभी नहीं चाहेंगे कि उम्र के इस पड़ाव में केन्द्र सरकार से समर्थन वापस लेकर पंगा लें और बदले में अपना बुढ़ापा खराब करें..! जाहिर है मुलायम कि नजरें 2014 पर हैं और वे तीसरे मोर्चे के मुखिया के तौर पर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने का ख्वाब भी संजो रहे हैं ऐसे में अगर सीबीआई पीछे पड़ गयी तो मुलायम का तीसरे मोर्चे के सहारे पीएम की कुर्सी पर बैठने का ख्वाब अधूरा रह जाएगा..! यही वजह है कि मुलायम सिंह कांग्रेस के खिलाफ भड़ास तो खूब निकाल रहे हैं लेकिन समर्थन वापस लेने का दम मुलायम चाह कर भी नहीं दिखा पा रहे हैं..!
सही मायने में शायद यही राजनीति है...बोलो कुछ, करो कुछ और दिखाओ कुछ और...मुलायम सिंह भी तो कुछ ऐसा ही कर रहे हैं..! लेकिन देखना ये होगा कि क्या यूपी की जनता मुलायम के इस रूप को समझ पाएगी और 2014 में साईकिल को पंचर कर मुलायम की पार्टी को सबक सिखाएगी या फिर 2012 में हुए यूपी के विधानसभा चुनाव की तरह आम चुनाव में भी साईकिल पर मुहर लगाएगी..!

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गुरुवार, 28 मार्च 2013

महान हैं आसाराम जैसे संत..!


संत का नाम लेते ही मन में एक ऐसी छवि उत्पन्न होती है जो सांसारिक सुख-सुविधाओं से कोसों दूर हो। उसका आचरण ऐसा हो कि लोग उसे अपने जीवन में अपनाएं। उसका रहन सहन ऐसा हो कि लोग उसकी मिसाल दे। वो सिर्फ लोगों को उपदेश ही न दे बल्कि अपनी कही बातों को अपने जीवन में भी आत्मसात करे। वह लोगों को सतमार्ग में चलने की और बुराइयों से दूर रहने की सीख दे।
लेकिन क्या आज के समय में वाकई ऐसे लोग हैं..? क्या आज के समय में ऐसे लोग हैं जो संत कहलाने लायक हैं..? जिनका हमें आंख मूंद कर अनुसरण करना चाहिए..? अगर आप इसका जवाब हां में देने की सोच रहे हैं तो पहले आसाराम बापू के बारे में अपना सामान्य ज्ञान अपडेट कर लीजिए।
आसाराम बापू...नाम तो सुना ही होगा आपने...कभी टीवी पर प्रवचन देते भी सुना होगा। मन को मोह लेनी वाली बड़ी अच्छी और मधुर बातें करते हैं आसाराम बापू। लेकिन क्या वाकई में यही आसाराम बापू का वास्तविक चरित्र है..? क्या आसाराम बापू अपनी कही बातों को अपने जीवन में आत्मसात करते हैं..? वैसे तो दिल्ली गैंगरेप के मसले पर आसाराम बापू की बेतुकी टिप्पणी ही काफी थी उनके चरित्र को जानने के लिए लेकिन बापू के बोल  यहीं नहीं थमे। (जरूर पढ़ें- दिल्ली गैंगरेप- "राम राम" आसाराम)
होली पर आसाराम खूब पानी बहाते हैं लेकिन पानी की बर्बादी आसाराम को गलत नहीं लगती..! वे कहते हैं कि पानी किसी के बाप का नहीं है...जब पानी किसी के बाप का नहीं है तो फिर आपके बाप का भी नहीं है न महाराज..! (पढ़ें- भगवान से है यारी, बारिश करवा दूंगा: आसाराम)
आसाराम कहते हैं वे जब चाहें बारिश करवा सकते हैं...तो करवा दो न महाराज बड़ी कृपा होगी आपकी इस देश पर..! कम से कम हिंदुस्तान को आप जैसे संत होने का फायदा तो मिलेगा..! आज तक तो सिर्फ अंधविश्वास ही मिला है..!  कम से कम सूखे से परेशान  किसान आत्महत्या तो नहीं करेंगे..!
खुद को संत कहते हैं लेकिन आसाराम का अभिमान देखिए...इनका आचरण देखिए..! धर्म के नाम पर लोगों की आंखों में अंधविश्वास की पट्टी बांधकर अपना धंधा चलाना कोई इनसे सीखे..! बात सिर्फ आसाराम बापू की ही नहीं है...हिंदुस्तान में ऐसे संतों की फेरहिस्त कभी न खत्म होने जितनी लंबी है।
वैसे दोष आसाराम या इनके जैसे दूसरे संतों का भी नहीं है...जब अंधविश्वास में डूबे लोग आंख मूंदकर ऐसे संतों की जय जयकार करेंगे तो ऐसा ही होगा। क्यों न ये खुद को भगवान समझेंगे..? क्यों न ये भगवान को अपना यार कहेंगे..? क्यों न ये कहेंगे की मैं जब चाहूं...जहां चाहूं बारिश करवा सकता हूं..!
ये अच्छी तरह जानते हैं कि इनके अंध भक्त इनकी हर बात पर आंख मूंदकर यकीन कर लेंगे और ये उन्हें मूर्ख बनाते रहेंगे..! और  ये सब उस वक्त तक चलता रहेगा जब तक कि इनके अंध भक्तों के आंखों से अंधविश्वास की पट्टी नहीं खुलेगी और ये लोग ऐसे लोगों को भगवान का दर्जा देना बंद नहीं करेंगे..! लेकिन हिंदुस्तान में ऐसा कभी होगा इसकी उम्मीद कम ही है..!

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“राज” नीति- जम्मू कश्मीर से तमिलनाडु तक


कौन कहता है कि नेता जनता के लिए नहीं लड़ते..? उनकी हक की आवाज़ नहीं उठाते..? उनके लिए लड़ाई नहीं लड़ते..? उन्हें जनता की चिंता नहीं है..? नेताओं को जनता की चिंता भी है और वे उनके हक की आवाज़ भी उठाते हैं बशर्ते इसमें उनका भी तो कुछ फायदा होना चाहिए। नेताओं को वैसे भी जनता से क्या चाहिए एक अदद वोट। इस एक वोट के लिए तो हमारे नेतागण किसी भी हद तक जा सकते हैं..! वोटों को साधने का कोई मौका ये नेता नहीं छोड़ते चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े..!
हिंदुस्तान की राजनीति कुछ ऐसे ही चलती है। बरसों से यही तो होता आ रहा है। अलग – अलग राज्यों की भाषा, संस्कृति अलग- अलग है लेकिन नेताओं का चरित्र बिल्कुल एक  जैसा है..! उत्तर से लेकर दक्षिण तक की हालिया राजनीतिक हलचलें इस तस्वीर की धुंधलाहट को और साफ करती है। शुरुआत वर्तमान में सबसे चर्चित दक्षिणी राज्य तमिलनाडु से करते हैं। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता को चेन्नई में आईपीएल मैचों में श्रीलंकाई खिलाड़ियों के खेलने पर एतराज है। इतना ही नहीं वे भारत सरकार से श्रीलंका से मैत्रीपूर्ण संबंध खत्म करने तक की वकालत करती हैं। उन्हें श्रीलंका को भारत का मित्र देश कहने में तक आपत्ति है। जयललिता तो जयललिता द्रमुक प्रमुख करुणानिधि को ही देख लिजिए।
श्रीलंकाई तमिलों के लिए केन्द्र सरकार से समर्थन तक वापस लेने से पीछे नहीं हटे। आखिर क्यों..? श्रीलंका के तमिलों के हितों की रक्षा के बहाने खुद को तमिलों का सबसे बड़ा हितैषी जो साबित करना है तभी तो तमिलनाडु में तमिलों की सहानुभूति हासिल कर पाएंगे..!
जयललिता के तेवर देखकर तो ऐसा लगता है कि जैसे तमिलनाडु में रहने वाले तमिलों को कोई दुख तकलीफ है ही नहीं..! जैसे तमिलनाडु में न तो तमिलों के मानवाधिकारों का हनन होता है और न ही तमिलों के साथ किसी तरह की ज्यादती..!
मैडम जी अच्छा लगा सुनकर कि आपको श्रीलंकाई तमिलों की चिंता है लेकिन पहले अपने राज्य के हालात तो सुधार लें...उनकी सुध तो ले लें...फिर करना श्रीलंकाई तमिलों की चिंता..!
जयललिता जी राष्ट्रीय अपराध नियंत्रण ब्यूरो(एनसीआरबी) के आंकड़े कहते हैं कि 2011 में देश में अपराधों के मामले में उत्तर प्रदेश(33.4 %) के बाद दूसरा नंबर तमिलनाडु (11.5 %) का है। आपको अपने घर को आग से बचाने की चिंता नहीं है लेकिन दूसरे के घर की आग की भभक आपको परेशान कर रही है।
वोटों के लिए हमारे एक और राज्य बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी आजकल कुछ ज्यादा ही सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। उन्हें बिहार को हर हाल में विशेष राज्य का दर्जा जो दिलवाना है। कभी बिहार में तो कभी दिल्ली में बिहार के लोगों के नाम पर उनके हक की बात करते दिखाई दे रहे हैं। इस बहाने बिहार की जनता का हितैषी कहलाने का तमगा भी हासिल कर लेंगे ताकि आम चुनाव में भी बिहार की जनता इनकी पार्टी के उम्मीदवारों को जिता कर संसद पहुंचाए..!
इन सब से दो कदम आगे हैं जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अबदुल्ला। साहब जिस देश में रहते हैं...जिस देश की खाते हैं उसके खिलाफ बोलने में नहीं हिचकते..! मानवता की दुहाई देकर देश के दुश्मनों की पैरवी करने का कोई मौका नहीं चूकते..! अफजल गुरु की फांसी के बाद उमर की प्रतिक्रिया को याद ही होगी आप सभी को। उमर की प्रतिक्रिया से तो ऐसा लग रहा था मानो अफजल को फांसी देकर सरकार ने बड़ी गलती कर दी..!
इन साहब को भी सिर्फ वोट ही दिखाई देते हैं। सीमा पार से आकर भारतीय सैनिकों का सिर कलम करने वाले या देश की संसद पर हमला करने वाले इन्हें नहीं दिखाई देते..! इन्हें तो कश्मीर में जवानों का हथियार लेकर चलने में तक आपत्ति है..! इनका बस चले तो आतंकी अगर जवानों पर हमला करें तो ये जवानों को मुकाबला करने के लिए लाठी पकड़ा दें..! हाल ही में सीआरपीएफ जवानों पर आतंकियों ने जब हमला किया तो क्या ऐसा नहीं हुआ था..?
ये कहानी सिर्फ तमिलनाडु, बिहार या जम्मू-कश्मीर की ही कहानी नहीं है...सभी राज्यों में कुछ ऐसा ही हो रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि हर राज्य में ये काम करने वाले सत्ताधारी दल के नेता अलग – अलग हैं...उनकी पार्टी अलग है लेकिन सबके तीर का निशाना एक ही है...वोटबैंक..! आखिर सत्ता की चाबी हासिल करने का यही तो सबसे सटीक तरीका जो लगता है इन्हें..!
विडंबना देखिए फैसला तो जनता को ही करना होता है लेकिन हमारे देश की जनता बड़ी भोली है...हर बार नेताओं की मीठी बातों पर इनके झूठे वादों पर एतबार कर लेती है...और इन्हें सौंप देती है सत्ता की चाबी...लेकिन बड़ा सवाल तो ये है कि आखिर कब तक..? क्या जनता समझ पाएगी इन नेताओं का चरित्र..?

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बुधवार, 27 मार्च 2013

किराए के समर्थकों से चाटुकारिता का तड़का..!


बात ज्यादा दिन पुरानी नहीं है जब मैं शिरडी जाने के लिए ग्वालियर रेलवे स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार कर रहा था कि अचानक स्टेशन परिसर में भारतीय जनता पार्टी का झंडा थामे एक हुजूम दाखिल हुआ। कुछ के हाथों में फूलों के हार थे तो कुछ के हाथों बंदूकों से तने थे। ग्वालियर - चंबल अंचल में जिसके पास जितनी बंदूकें उसे उतना बड़ा और ताकतवर समझा जाता है लिहाजा बंदूक थामे लोगों की तादाद भी फूल और झंडा लिए लोगों से कम नहीं थी।  
ये नजारा देख इतना तो समझ आ गया था कि भाजपा का कोई कद्दावर नेता ट्रेन से ग्वालियर पहुंचने वाला है और उसके स्वागत में ही स्थानीय नेता कार्यकर्ताओं की भीड़ के सहारे अपना शक्ति प्रदर्शन के साथ ही चाटुकारिता का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते थे।
जिज्ञासा हुई कि आखिर कौन भाजपा नेता यहां पहुंचने वाला है जिसके स्वागत मे ये लोग पलकें पावड़ें बिछाए बैठे हैं..? भाजपा का झंडा थामे एक व्यक्ति से पूछा तो वो तपाक से बोला उमा दीदी आ रही हैं और हम उन्हीं के स्वागत के लिए यहां आए हुए हैं। दरअसल भाजपा की फायर ब्रांड नेत्री और मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती दिल्ली से ग्वालियर पहुंच रही थी। रेलवे स्टेशन भाजपा कार्यकर्ताओं और भाजपा के झंडे थामे कार्यकर्ताओं से भाजपामय दिखाई दे रहा था और सभी लोग बेसब्री से ट्रेन का इंतजार करते दिखाई दे रहे थे।
इसी बीच मेरी नज़र कार्यकर्ताओं की भीड़ में सबसे पीछे भाजपा का झंडा थामे कुछ लोगों पर पड़ी तो बड़ी हैरानी हुई। संख्या में ये लोग करीब दो दर्जन से अधिक होंगे। कपड़ों से और इनके चेहरे देख इतना तो समझ आ रहा था कि ये लोग रिक्शा या रेहड़ी चलाने वाले, मजदूरी करने वाले या फिर रेलवे स्टेशन में पल्लेदारी करने वाले लोग थे। समझते देर न लगी कि उमा भारती का स्वागत करने पहुंचे स्थानीय नेताओं ने ज्यादा से ज्यादा कार्यकर्ताओं की भीड़ जुटाने के लिए चाटुकारिता की सारी हदें पार करते हुए रिक्शा चालकों, मजदूरों और पल्लेदारों के हाथों में तक झंडा थमाने से गुरेज नहीं किया।
हालांकि राजनीति में ये कोई नई बात नहीं है क्योंकि हमारे देश में आमतौर पर चुनावी रैलियों में इस तरह के नजारे आम हैं। नेताओं की सभा में भीड़ जुटाने के लिए पैसे देकर इसी तरह लोगों को बुलाया जाता है और यहां भी कुछ ऐसा ही हुआ था..!
मध्य प्रदेश में इसी साल नवंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं ऐसे में टिकट की होड़ अभी से शुरु हो गयी है। टिकट की चाह रखने वाले नेता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को उनके आगमन पर ज्यादा से ज्यादा कार्यकर्ताओं की भीड़ जुटाकर शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं और इसी बहाने टिकट के लिए अपनी दावेदारी मजबूत करने में लगे हुए हैं।
उमा भारती की भाजपा में वापसी होने के बाद मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण में उमा भारती की महत्वपूर्ण भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता लिहाजा उमा भारती के स्वागत में भी टिकट की चाह लगाए बैठे उमा समर्थक स्थानीय नेताओं ने उमा के स्वागत के बहाने कार्यकर्ताओं की भीड़ के साथ शक्ति प्रदर्शन का कोई मौका नहीं छोड़ा।
विडंबना देखिए किराए के समर्थकों के साथ शक्ति प्रदर्शन करने वाले ऐसे नेताओं को न सिर्फ चुनाव में टिकट मिल जाता है बल्कि ये लोग विधानसभा और संसद तक भी पहुंच जाते हैं..!
ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर क्यों सब कुछ जानते हुए भी जनता ऐसे नेताओं को चुनकर विधानसभा और संसद तक भेज देती है..!  क्या ऐसे नेताओं को चुनना जनता की मजबूरी है या फिर चुनाव में विकल्पविहीन जनता को नेताओं की पूरी जमात में कोई फर्क  ही नजर नहीं आता और इसका फायदा ऐसा नेताओं को मिलता है..?
जाहिर है सिर्फ बेहतर विकल्प न होना ही इसकी वजह नहीं है बल्कि कहीं न कहीं योग्य प्रत्याशी की बजाए पार्टी को वोट देने की प्रवृत्ति भी इसके लिए जिम्मेदार है। जब तक जनता राजनीतिक दलों के मोहपाश से खुद को मुक्त करके चुनाव मैदान में खड़े योग्य प्रत्याशी का चुनाव नहीं करेगी चाहे वो किसी भी दल से क्यों न हो तब तक ऐसे चाटुकार नेता ही संसद और विधानसभा में पहुंचते रहेंगे जिन्हें न तो अपने देश और प्रदेश की फिक्र है और न ही जनता से कोई सरोकार। (जरूर पढ़ें- आम आदमी जाए भाड़ में..!)।
उम्मीद करते हैं कि जनता पर छाया राजनीतिक दलों का मोहपाश टूटेगा और जनता आगामी विधानसभा और आम चुनाव में योग्य प्रत्याशियों को चुनकर विधानसभा और संसद में भेजेगी और देश और जनता को जूते की नोंक पर रखने खुद का विकास को सर्वोपरी रखने वाले चाटुकार नेताओं को सबक सिखाएगी।

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सोमवार, 25 मार्च 2013

तो 35 साल हो बालिग होने की उम्र..!


फिल्मी पर्दे से असल जीवन में तक खलनायक साबित हुए संजय दत्त की सजा माफ करने के लिए एक मुहिम छिड़ी है। मुहिम का झंडा मायानगरी से लेकर नेतानगरी तक बुलंद है। हर किसी को संजय दत्त निर्दोष नजर आ रहे हैं। मुहिम को देखकर ऐसा लगता है कि मानो ये मुहिम किसी अपराधी की सजा माफ करने के लिए न होकर किसी देशभक्त को न्याय दिलाने के लिए चल रही हो। बड़बोलेपन के लिए मशहूर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को तो संजय दत्त निर्दोष होने के साथ ही नासमझ भी नजर आते हैं।
दिग्गी बाबू कहते हैं कि जिस वक्त संजय दत्त के घर से पुलिस ने हथियार बरमद किए थे उस वक्त संजय दत्त नासमझ थे और नासमझी में संजय दत्त ने ये गलती कर दी। दिग्विजय सिंह को संजय दत्त के इस अपराध के पीछे उनकी नादान उम्र का दोष नजर आता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि दिग्विजय जिस नादान उम्र की बात कर रहे हैं वो उस वक्त 33 साल थी और बकौल दिग्विजय सिंह इस उम्र में संजय दत्त नासमझ थे। (पढ़ें- संजय दत्त- मेकिंग ऑफ रियल खलनायक..!)
अगर दिग्विजय सिंह की बात मान लें कि 33 साल की उम्र में कोई व्यक्ति नासमझ या नादान होता है तो फिर तो दिग्विजय सिंह को एक कदम और आगे बढ़ाकर केन्द्र सरकार से बालिग होने की उम्र 35 साल करने की अपील करनी चाहिए क्योंकि अभी तो हमारे देश में बालिग होने की उम्र 18 साल है।
जब 33 साल के व्यक्ति को इतनी समझ नहीं है कि अंडरवर्ल्ड के संपर्क में रहना, फोन पर अपराधियों से बात करना और अपने घर में अवैध हथियार रखना गैरकानूनी है तो फिर 18 साल से 33 साल के बीच के युवा को कितनी समझ होगी..! (पढ़ें- 'मासूम' मुन्ना ब्लास्ट के बाद भी करते थे 'भाई' से बात)
फिर तो दिग्विजय सिंह को सरकार से ये भी मांग करनी चाहिए कि 33 साल से कम उम्र के उन सभी अपराधियों को माफ कर दिया जाए जिन्हें अदालत सजा सुना चुकी है लेकिन दिग्विजय सिंह ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि 33 साल तक की उम्र के सभी अपराधी कांग्रेसी रहे सुनील दत्त की औलाद जो नहीं हैं..!
कांग्रेस ने भले ही दिग्विजय सिंह के इस बयान से पल्ला झाड़ लिया हो लेकिन कांग्रेस में दिग्विजय सिंह वही बोलते हैं जो आलाकमान चाहता है..! भले ही बाद में दिग्विजय के बयान से कांग्रेस पीछा छुड़ाने का प्रयास करती दिखाई देती है लेकिन विवादित मुद्दों पर दिग्विजय का बयान तब तक मीडिया की सुर्खियां बटोर चुका होता है। मुझे तो ऐसा एक भी मौका याद नहीं आता जब दिग्विजय सिंह के बड़बोलेपन पर कांग्रेस आलाकमान ने सख्ती दिखाते हुए दिग्विजय सिंह के खिलाफ कोई कार्रवाई की हो।
जाहिर है ये दिग्विजय के बड़बोलेपन को कांग्रेस आलाकमान का मौन समर्थन नहीं तो और क्या है..? खैर सरकार के फैसलों पर विपक्ष की घेराबंदी पर तो दिग्विजय की बोली समझ में आती है लेकिन एक अपराधी के लिए माफी की अपील क्या दर्शाती है..? वो भी तब जब देश का सर्वोच्च न्यायालय अपराध साबित होने पर संजय दत्त को 5 साल कारावास की सजा सुना चुका है वो भी इस टिप्पणी के साथ कि संजय दत्त के अपराध की प्रकृति काफी गंभीर थी जो माफी लायक नहीं है। (पढ़ें- संजय दत्त निर्दोष हैं..!)
बहरहाल संजय दत्त की सजा माफी को लेकर मुहिम जारी है...कोई राष्ट्रपति को चिट्ठी लिख रहा है तो कोई राज्यपाल से मुलाकात कर रहा है लेकिन विभिन्न अपराधों में जेल में बंद लाखों अपराधी जिन्हें अदालत सजा सुना चुकी है उन तक अगर ये खबर पहुंच रही होगी तो एक सवाल उनके जेहन में भी जरूर उठ रहा होगा कि काश मैं भी एक फिल्म स्टार होता तो मेरे लिए भी कोई आवाज उठाता...मेरे अपराध को भी कोई नादानी कहता और एक दिन मेरे भी सारे गुनाह माफ होते और अपने परिवार के साथ मैं भी खुली हवा में  सांस ले पाता..!

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