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शनिवार, 9 जून 2012

कौन बजाएगा सितार ?


कौन बजाएगा सितार ?

विजय बहुगुणा के मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही सबसे बड़ा सवाल ये था कि बहुगुणा चुनाव कहां से लडेंगे। मुख्यमंत्री जहां पर भी जाते पत्रकारों के सवालों की बौछार के बीच सबसे अहम सवाल ये भी होता कि मुख्यमंत्री जी आप चुनाव कहां से लड़ेंगे। इसी बीच एक नाटकीय घटनाक्रम के तहत सितारगंज से भाजपा विधायक किरण मंडल ने इस्तीफा देकर भाजपा में खलबली मचा दी। बहुगुणा की तारीफ करने वाले मंडल के इस्तीफे के बाद मुख्यमंत्री ने भी सितारगंज जाकर वहां करोड़ों की घोषणाएं कर उनका दिल जीतने की पूरी कोशिश की। जिसके बाद से ही ये कयास लगाए जा रहे थे कि बहुगुणा सितारगंज से ही ताल ठोकेंगे। आखिरकार सितारगंज उपचुनाव की तारीख घोषित होने के बाद बहुगुणा ने भी अपने पत्ते खोलते हुए ऐलान कर दिया कि वे सितारगंज से ही चुनाव लड़ेंगे। बहगुणा ने 13 जून को नामांकन भरने का भी ऐलान किया है। मुख्यमंत्री ने तो चुनाव लडने का ऐलान कर दिया...लेकिन भाजपा ने इस पर अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं...हालांकि खबरें हैं कि भाजपा सितारगंज उपचुनाव में खंडूरी या कोश्यारी में से किसी एक को मैदान में उतार सकती है। बहरहाल सितारगंज उपचुनाव कांग्रेस के साथ ही भाजपा के लिए भी प्रतिष्ठा का सवाल है। बहुगुणा के लिए तो ये चुनाव उनकी किस्मत तय करेगी कि वे मुख्यमंत्री बने रहेंगे या नहीं...जबकि भाजपा हर हाल में न सिर्फ अपनी खोई हुई सीट को वापस हासिल करने को पूरी ताकत लगाएगी...बल्कि बहुगुणा की हार में प्रदेश में सरकार बनाने की गुंजाईश भी तलाशेगी। बहरहाल चुनाव की बिगुल बज चुका है और 08 जुलाई को प्रत्याशियों की किस्मत ईवीएम में कैद हो जाएगी...हालांकि वक्त अभी काफी है...ऐसे में भाजपा और कांग्रेस दोनों में से कोई भी मिशन सितारगंज फतह में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहेगा।













दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 6 जून 2012

टॉयलेट में 35 लाख !


टॉयलेट में 35 लाख !

हिंदुस्तान में दो भारत बसते हैं इसका एहसास एक बार फिर से हो गया...जब आरटीआई एक्टिविस्ट सुभाष कुमार अग्रवाल की आरटीआई ने योजना आयोग का बड़ा खुलासा कर दिया। आरटीआई में जानकारी भी ऐसी सामने आयी...जिस पर यकीन करना मुश्किल था...लेकिन ये जानकारी खुद योजना आयोग से आयी थी...तो फिर कैसे भरोसा नहीं होता। मामला दरअसल ये है कि योजना आयोग ने दिल्ली स्थित मुख्यालय योजना भवन में दो टॉयलेट पर 35 लाख रूपये खर्च कर डाले...जिसमें से 5 लाख 19 हजार रूपये दोनों टॉयलेट में एक्सेस कंट्रोल सिस्टम लगवाने में खर्च कर दिए गए। इसके लिए बकायदा योजना आयोग के 60 अफसरों को एक्सेस कार्ड भी जारी कर दिए...ताकि इन अफसरों के अलावा कोई दूसरा व्यक्ति टॉयलेट का इस्तेमाल न कर सके। एक्सेस कार्ड ने 1947 के पहले की वो याद ताजा कर दी...जब अधिकतर चीजों को यहां तक की पक्की सड़क को भी सिर्फ गोरे ही इस्तेमाल करते थे...और भारतीयों को उन चीजों के इस्तेमाल की इजाज़त नहीं थी...यानि एक बार फिर से ऐसा लगने लगा कि वे दिन वापस आ गए हैं...बस फर्क इतना है कि तब राज करने वाले गोरे थे...अब अपने ही लोग हैं। बहरहाल हम बात कर रहे थे 35 लाख के टॉयलेट की...ज्यादा दिन नहीं हुए हैं जब प्रधानमंत्री ने देश के वर्तमान आर्थिक हालात का हवाला देते हुए खर्चों में कमी करने की बात कही थी...औऱ अधिकारियों को भी ऐसी ही हिदायत दी थी। ऐसे समय में योजना आयोग का ये कारनामा अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। हैरत की बात तो ये भी है कि आरटीआई में मिली जानकारी कहती है कि आयोग के तीन और टॉयलेटों को इसी तर्ज पर अपग्रेड किया जाना है...यानि कि अभी इसी तरह टॉयलेट पर लाखों रूपए और खर्च किए जाने हैं। योजना आयोग का ये कारनामा ये बताने के लिए काफी है कि आखिर शुरूआत में...मैं क्यों हिंदुस्तान में दो भारत बसने की बात कर रहा था...एक भारत वो है जहां पर गरीब और पिछड़े लोग रहते हैं...जिनके पास शौचालय तो बहुत दूर की बात है...रहने को छत तक नहीं है...और एक भारत है...नहीं नहीं भारत नहीं...एक इंडिया है...जहां पर योजना आयोग के जैसे अधिकारी 35 लाख रूपए का टॉयलेट इस्तेमाल करते हैं। ऐसा नहीं है कि योजना आयोग पहली बार ऐसी किसी घटना के चलते चर्चा में आया हो...इससे पहले भी रोजाना 28 रूपए से ज्यादा खर्च कने वाले को गरीब न मानने वाले आयोग की अनोखी रिपोर्ट गरीबों का उपहास उड़ाती दिखी थी। बीते साल मई से अक्टूबर के बीच योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया का विदेश दौरा भी ऐसी ही कुछ कहानी बयां कर रहा था...जब आरटीआई से मिली जानकारी से पता चला कि विदेश दौरे पर अहलूवालिया का एक दिन का खर्च 2 लाख रूपए से भी ज्यादा था। बहरहाल बात 35 लाख के टॉयलेट की हो रही है...ऐसे में इस पर अहलूवालिया साहब का कहना है कि हमारे देश में ज्यादातर सरकारी इमारतों के साथ ही वहां के टॉयलेट की हालत बहुत खराब है...और योजना आयोग का टॉयलेट बेहतर हो रहा है तो इसमें हर्ज ही क्या है...वे ये भी कहते हैं कि आयोग के दफ्तर में वीवीआईपी के साथ ही विदेशी प्रतिनिधि भी आते हैं...इसलिए भी टॉयलेट पर इतना पैसा खर्च किया गया है। इनकी दलीलें मुझे तो समझ के परे लगती हैं...लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि काश ये पैसा जरूरतमंदों पर खर्च हुआ होता तो औऱ कुछ नहीं तो कम से कम लाखों लोगों को खासकर महिलाओं को खुले में शौच के लिए नहीं जाना पड़ता।













दीपक तिवारी

सोमवार, 4 जून 2012

रामदेव – गडकरी मुलाकात कितनी सियासी !



रामदेव – गडकरी मुलाकात कितनी सियासी !

मिशन 2014 की तैयारी में जुटी भाजपा को अब बाबा रामदेव का ही सहारा...कालेधन और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भाजपा का समर्थन लेने भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के घर पहुंचे बाबा रामदेव को समर्थन देने का ऐलान कर गडकरी ने तो ये जता ही दिया है कि भाजपा के मिशन 2014 में रामदेव और उनके आंदोलन की भूमिका अहम होगी। गडकरी जिस अंदाज में रामदेव से मिले उससे भी ये अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि भाजपा अब रामदेव की शरण में आ गयी है। अब भले ही गडकरी साहब कालेधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ रामदेव के आंदोलन को समर्थन देने की बात कह रहे हों...लेकिन दिल्ली में गडकरी के आवास पर हुई इस मुलाकात के कई सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। रामदेव बाबा को भी सफाई देने की जरूरत पड़ रही है...बाबा कहते हैं...ये राजनीति नहीं है...ये देश का सवाल है...इसलिए हम भाजपा ही नहीं सभी राजनीतिक दलों से समर्थन मांग रहे हैं। अब बाबा कितनी ही सफाई दें लेकिन हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से पहले बाबा रामदेव के उस बयान को कैसे भुलाया जा सकता है जिसमें रामदेव ने लोगों से खुले शब्दों में भाजपा को वोट देने की अपील की थी। बाबा काला धन भारत में वापस लाने के साथ ही देश की प्रतिष्ठा और विकास की बात करते हैं...तो भाजपा भी अब उनके साथ खड़े होने का दम भर रही है...भाजपा की निगाहें मिशन 2014 पर हैं...और रामदेव एंड कंपनी की सीढ़ी के सहारे भाजपा अपने मिशन को पूरा करने में जुट गयी है...ऐसे में देखना ये होगा कि भाजपा के मिशन 2014 में रामदेव भाजपा की नैया पार लगाने में कितने सफल होते हैं।











दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com

शनिवार, 2 जून 2012

साढ़े पांच रूपये महंगा हुआ पेट्रोल !

साढ़े पांच रूपये महंगा हुआ पेट्रोल !

23 मई को पेट्रोल की कीमत में साढ़े सात रूपये का ईजाफा होता है...तो खूब हो हल्ला मचता है...मानव स्वभाव भी है कि किसी भी चीज का असर हमारे दिमाग में 24 से 48 घंटे तक रहता है। यहां भी ऐसा ही हुआ था...अगले ही दिन राजनीतिक दलों के साथ आम लोग भी सड़कों में उतर आए और पेट्रोल की कीमतों में हुई साढ़े सात रूपये की बेतहाशा बढ़ोतरी को वापस लेने की मांग उठी...लेकिन जैसे जैसे समय बीतता गया...ये गुस्सा कम होता गया। 31 मई को एनडीए के भारत बंद ने एक बार फिर से लोगों को इसकी याद दिला दी। इसकी याद भी उसके अगले ही दिन धुंधली पड़ गयी...ऐसे में पेट्रोल की कीमतों पर भारी दबाव झेल रही केन्द्र सरकार के दबाव का असर कहें या फिर कच्चे तेल की कीमतों में कमी होना...तेल कंपनियों ने पेट्रोल 2 रूपये सस्ता करने का ऐलान कर दिया। साढ़े सात रूपये की बढ़ोतरी के बाद दो रूपये की कमी ऊंट के मुंह में जीरे के समान है...लेकिन लोग ये सोच कर खुश हैं कि पेट्रोल सस्ता हो गया है। ये तेल कंपनियों का सोचा समझा एजेंडा था कि पहले पेट्रेल की कीमत में जरूरत से ज्यादा ईजाफा कर दो और फिर उसमें मामूली कटौती कर दो या फिर वाकई में कच्चे तेल की कीमत का असर है...ये तो बहस का मुद्दा है। लेकिन अगर वाकई में दो रूपये की कटौती कच्चे तेल की कीमतों में कमी का असर है तो इससे पहले जब कच्चे तेल की कीमत में आयी थी...तो तब तेल कंपनियों ने क्यों नहीं पेट्रोल की कीमतें कम की थी। इसका सीधा मतलब ये निकलता है कि पहले कीमतों में मोटा ईजाफा कर दो...औऱ जब इस पर लोग हो हल्ला मचाने लगे तो मलहम के नाम पर अपने ऐजेंडे के तहत कीमतों में मामूली कटौती कर दो...ताकि लोग बढ़ी हुई कीमत को आसानी स्वीकार कर लें...औऱ इस पर हो हल्ला न मचे...जो कि इस बार तेल कंपनियों ने किया है। बहरहाल सरकार भले ही इस सब का दोष तेल कंपनियों के सिर मढ़ रही हो...लेकिन पर्दे की पीछे की सच्चाई किसी से छिपी नहीं है। ऐसा नहीं है कि पेट्रोल की कीमत में बढ़ोतरी के कुछ दिन उसमें कमी करने का ये खेल पहली बार खेला गया है...जब – जब पेट्रोल की कीमतें बढ़ी हैं...तब - तब ये सब होता आया है...पहले और इस बार में फर्क सिर्फ इतना है कि इससे पहले पेट्रोल के दामों में ईजाफा इस हद तक कभी नहीं हुआ था। दो रूपये की कटौती होने के बाद पेट्रोल साढ़े पांच रूपये अभी भी महंगा है...जो भी बीते कई सालों के हिसाब से अच्छी खासी बढ़ोतरी है। लोग हर बार मान जाते हैं...और चीजों को भूल जाते हैं...शायद यही चीज तेल कंपनियों और हमारी सरकार की ताकत बन जाती है...और महंगाई बढ़ने का सिलसिला कभी नहीं रूकता। हालांकि समय – समय पर हुए चुनाव में जनता ने ऐसे लोगों को अपनी ताकत का एहसास कर उन्हें सत्ता से बेदखल कर आईना भी दिखाया है...लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या सरकार में बैठे लोगों की ये जिम्मेदारी नहीं बनती कि आमजन से जुड़े मुद्दों पर राजनीति से ऊपर उठकर काम किया जाए।








दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com

शुक्रवार, 1 जून 2012

बहगुणा का गुणा - भाग


  बहगुणा का गुणा - भाग

सियासत की गुणा भाग कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुए विजय बहुगुणा ये अच्छी तरह जानते हैं कि उनकी असली अग्निपरीक्षा यानि कि उपचुनाव जीतना अभी बाकी है...तभी वे राजनीतिक औऱ संवैधानिक रूप से इस कुर्सी पर बने रह पाएंगे। ऐसे में उपचुनाव से पहले बहुगुणा उपचुनाव में अपनी विजय सुनिश्चित करने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। इसकी बानगी पहले हरिद्वार में और उसके बाद विधानसभा के बजट सत्र में देखने को मिली जब बहुगुणा ने भीषण गर्मी में बिजली कटौती की मार झेल रहे प्रदेशवासियों को बिजली कटौती से निजात दिलाने का ऐलान किया था...और 24 घंटे बिजली सप्लाई की बात कही थी...लेकिन अगले ही दिन मुख्यमंत्री की इस घोषणा की हवा तब निकल गई जब राजधानी में ही तीन घंटे तक बत्ती गुल हो गयी। ये पहली बार नहीं हुआ...इसके बाद लगातार बत्ती गुल होने का सिलसिला जारी है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब प्रदेश की राजधानी में मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद बिजली का ये हाल है तो प्रदेश के दूसरे हिस्सों में हालात क्या होंगे। यूपीसीएल की वेबसाइट कहती है कि हरिद्वार औऱ ऊधम सिंह नगर के ग्रामीण इलाकों में 6 घंटा 10 मिनट तक बिजली कटौती हो रही है तो कोटद्वार, नैनीताल और मसूरी को छोड़कर प्रदेश के सभी पहाड़ी इलाकों में दो – दो घंटे तक बिजली कटौती हो रही है। ये हाल तब है जब कि ऊर्जा विभाग खुद मुख्यमंत्री के पास है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या मुख्यमंत्री को प्रदेश में ऊर्जा की वास्तविक आपूर्ति और खपत के बारे में जानकारी नहीं है...या फिर सिर्फ वाहवाही लूटने के लिए बहुगुणा साहब खुले मंचों से ये ऐसी घोषणा कर रहे हैं। यूपीसीएल की वेबसाईट ये भी कहती है कि प्रदेश में ऊर्जा की उपलब्धता 33.63 मिलियन यूनिट है जब्कि खपत 35.53 मिलियन यूनिट है..औऱ वर्तमान में प्रदेश में 1.90 मिलियन यूनिट की रोस्टिंग यानि की कटौती की जा रही है। मुख्यमंत्री के जेहन में भले ही उपचुनाव का जिन्न घूम रहा हो...और बहुगुणा किसी भी सूरत में उपचुनाव में विजय हासिल करना चाहते हों...लेकिन भीषण गर्मी में बिजली की गुणा – भाग मुख्यमंत्री के लिए उपचुनाव विजय की डगर मुश्किल बना सकती है। शायद उत्तराखंड के नए नवेले सीएम साहब को ये नहीं पता कि उनके श्रीमुख से निकला एक – एक शब्द जहां किरण मंडल मामले में पहले से ही खार खाए बैठी भाजपा को उपचुनाव के लिए नया मुद्दा दे रहा है वहीं बहुगुणा की उपचुनाव विजय की उम्मीदों पर भी ग्रहण लगा सकता है।












दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com

शनिवार, 26 मई 2012

राम, गंगा और भाजपा का मिशन 2014


राम, गंगा और भाजपा का मिशन 2014


राम के बाद गंगा का सहारा…जी हां राम के बाद अब भाजपा गंगा मैया की शरण में आ गयी है…निर्मल गंगा को लेकर उमा भारती के नेतृत्व में भाजपा बड़ा आंदोलन करेगी…मुंबई में 25 मई को राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में जहां 2014 के लोकसभा चुनाव की तैयारियों और रणनीति को लेकर चर्चा हुई वहीं 2014 को ध्यान में रखते हुए भाजपा राम के बाद गंगा की शरण में आ गयी है। गंगा को लेकर पहले भी अभियान छेड़ने वाली भाजपा का फायरब्रांड नेता उमा भारती ने कार्यकारिणी की बैठक में पवित्र गंगा की सुरक्षा और प्रदूषण मुक्ति नाम से प्रस्ताव पेश किया। प्रस्ताव में गंगा की दुर्दशा और गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए अब तक के अभियानों की विफलता का भी जिक्र किया…साथ ही गंगा की अविरल धारा के लिए जनजागरण अभियान शुरू करने का भी संकल्प लिया गया। भाजपा का आरोप है कि गंगा को राष्ट्रीय नदी का दर्जा दिए जाने के बाद भी गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए। उमा भारती के कहने पर बैठक में मौजूद सभी नेताओं को गंगा की रक्षा का संकल्प भी लिया। निर्मल गंगा के लिए भाजपा बड़ा आंदोलन करेगी…जिसके लिए भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने एक कमेटी के गठन का भी ऐलान किया। इसके साथ ही आंदोलन की कमान भी उमा भारती को सौंपी गयी है। भाजपा भले ही अपना प्रस्तावित आंदोलन अविरल गंगा और स्वच्छ गंगा के नाम पर होने की बात कर रही हो…लेकिन यहां भी भाजपा ने एक तीर से दो निशाने साधने की कोशिश की है। भाजपा ने ये एजेंडे दरअसल मिशन 2014 ध्यान में रखकर तैयार किया है ताकि राम के बाद अब गंगा के नाम पर लोगों को साधा जाए…और उनकी धार्मिक आस्था को जगाकर एक बार फिर राम की तरह गंगा के नाम पर वोट बटोरे जाएं। गोमुख से लेकर गंगासागर तक गंगा 25 सौ 25 किलोमीटर की यात्रा तय करते हुए पांच राज्यों उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के गुजरती है…औऱ करीब 40 करोड लोग गंगा के तट पर रहते हैं…यानि की देश की आबादी का करीब तीसरा हिस्से का तो गंगा से सीधे जुड़ाव है…और बाकी लोग आस्था से तो गंगा से जुड़े ही हुए हैं…यानि की राम के बाद अब गंगा के सहारे भाजपा अपने मिशन 2014 को सफल बनाने की कोशिश कर रही है। बहरहाल राम के बाद गंगा की शरण में आयी भाजपा का आंदोलन गंगा को प्रदूषण से कितनी मुक्ति दिला पाता है और गंगा मैया की कितनी कृपा होती है ये तो समय ही बताएगा लेकिन एक बार फिर से धर्म के नाम पर भाजपा ने सत्ता का चाबी हासिल करने की पूरी तैयारी कर ली है।












दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com

शुक्रवार, 25 मई 2012

भाजपा…संविधान और गडकरी


भाजपासंविधान और गडकरी
नितिन गडकरी जब तीन साल पहले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के रूप में ताजपोशी हुई थी तो हर कोई हैरान था। अध्यक्ष बनने से पहले राष्ट्रीय राजनीति के नए नवेले चेहरे गडकरी को कुर्सी मिली तो भाजपा ही नहीं बल्कि गैर भाजपाई दलों के नेताओं के साथ ही आम लोगों के लिए भी गडकरी उत्सुक्ता का विषय बन गए थे। भाजपा में बड़े बड़े दिग्गज़ों की जगह गडकरी को जब कुर्सी मिली थी तो इतना तो साफ हो ही गया था कि गड़करी भाजपा के शीर्ष नेताओं की नहीं बल्कि संघ की पसंद थेऔर संघ की पसंद होने के नाते गडकरी की ताजपोशी के विरोध करने की हिम्मत भी दूसरे भाजपाई नहीं उठा सके थे। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गड़करी की अध्यक्ष पद पर ताजपोशी को दिसंबर 2012 में तीन साल पूरे हो जाएंगेऔर भाजपा के संविधान के अनुसार राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यकाल तीन साल का होता हैसाथ ही भाजपा का संविधान भी कहता है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर एक ही व्यक्ति की ताजपोशी दो बार लगातार नहीं हो सकतीलेकिन नितिन गड़करी इसके बाद भी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहेंगे। जी हां 24 मई को मुंबई में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भाजपा ने अपने संविधान में इस संबंध में संशोधन कर दिया है जिससे एक ही व्यक्ति के दो बार लगातार राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर ताजपोशी का रास्ता साफ हो गया है। राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष ने संविधान में संशोधन का प्रस्ताव रखाजिसका अनुमोदन पूर्व अध्यक्ष वैंकेयानायडू ने कियाजिसे कार्यकारिणी ने हरी झंडी दे दी हैलेकिन अभी इस पर भाजपा की राष्ट्रीय परिषद की मुहर लगनी बाकी है। दरअसल संघ 2014 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर पार्टी अध्यक्ष बदलने के मूड में नहीं थाजिसके चलते ही नौ महीने बाद हुई भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में सबसे पहले गड़करी को लगातार दूसरी बार अध्यक्ष बनाने के लिए पार्टी के संविधान में संशोधन किया गया। खबर तो यहां तक है कि अनुशासित पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में संविधान में संशोधन को लेकर विरोध के स्वर भी उठे। भाजपा नेता संघप्रिय गौतम और जेके जैन ने प्रस्ताव पर चर्चा कराने की भी मांग कीलेकिन इनकी बात को दरकिनार कर कार्यकारिणी ने प्रस्ताव को हरी झंडी दिखा दीजिसका मतलब साफ है कि दिसंबर 2012 में गड़करी का कार्यकाल समाप्त होने के बाद दोबारा से उनकी ताजपोशी तय हो गयी है। गड़करी की दूसरी पारी का मतलब साफ है कि भाजपा 2014 का लोकसभा चुनाव गड़करी की अगुवाई में ही लड़ेगीलेकिन देखने वाली बात ये होगी कि क्या 2014 के लोकसभा चुनाव में गड़करी अपना कमाल दिखाकर भाजपा को केन्द्र की सत्ता में वापस लौटाने में कामयाब हो पाएंगे या नहीं।

दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 23 मई 2012

पेट्रोल की साढ़े साती...


पेट्रोल की साढ़े साती...

22 मई को यूपीए सरकार ने तीन साल पूरे किए...दिल्ली में भव्य भोज का भी आयोजन किया...अक्सर खामोश रहने वाले हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी यूपीए 2 के तीन साल पूरे होने पर दमदारी से कहा कि अब कड़े फैसले लेने का वक्त आ गया है...और हैरत की बात तो ये है कि अक्सर अपने वादों को पूरा न करने वाली सरकार के मुखिया ने अगले ही दिन अपनी कही बात पर मुहर लगा दी। पेट्रोल के दाम में साढ़े सात रुपये का ईजाफा हो गया। अब भले ही सरकार इसके पीछे तेल कंपनियों के घाटे के साथ ही कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का तर्क दे लेकिन सच्चाई किसी से छुपी नहीं है। लोगों को उम्मीद थी की सरकार के तीन साल पूरे होने पर शायद सरकार आम लोगो को महंगाई से निजात दिलाने के लिए कारगर कदम उठाएगी...सरकार ने त्वरित कदम भी उठाए लेकिन ये महंगाई की मार से पहले से ही जूझ रहे लोगों के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं था। यूपीए सरकार के तीन साल पूरे होने पर हमारे रिमोट संचालित प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सरकार की तारीफों के पुल बांधते नजर आ रहे थे...औऱ विश्व के खराब आर्थिक हालातों के बाद भी भारत की तेज आर्थिक रफ्तार का श्रेय लेने से भी नहीं चूके। लेकिन प्रधानमंत्री ये भूल गए कि ये उनकी सरकार की गलत नीतियों का नतीजा है कि भारत में महंगाई अपने चरम पर है...और उसके लिए वे और उनकी सरकार के वे लोग भी कम जिम्मेदार नहीं है। कड़े फैसले लेने के मनमोहन सिंह के बयान के बाद लगा था कि शायद अब उनकी सरकार के भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ और देश के बाहर जमा काले धन को लेकर उनकी सरकार कड़े फैसले लेगी...लेकिन 24 घंटे के अंदर ही पैट्रोल के दाम बढ़ने की खबर के साथ ही साफ हो गया कि उनकी बातों में कितना दम था...औऱ उनका ईशारा कौन से कड़े फैसले लेने की ओर था। पेट्रोल के दामों में बढ़ोतरी की अगर बात करें तो फरवरी 2010 से 15 बार पेट्रोल के दामों में बढ़ोतरी हुई है। साढ़े सात रुपये की ताजा बढ़ोतरी के बाद भी तेल कंपनियां डेढ़ रूपए प्रति लीटर नुकसान की बात कह रही है...यानि की आने वाले दिनों में भी पेट्रोल के दामों में बढ़ोतरी होने की बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। पेट्रोल की कीमतों में ईजाफे की खबर के बाद से ही आम लोगों में जबरदस्त गुस्सा है। वहीं मुख्य विपक्षी दल भाजपा के साथ ही यूपीए के सहयोगियों ने भी पेट्रोल के दामों में इतनी बढ़ी बढ़ोतरी का विरोध करते हुए सरकार से रोल बैक की मांग की है। पेट्रोल के दामों में लगी आग जैसे जैसे आम लोगों तक फैल रही है...वैसे वैसे लोगों के गुस्से का ज्वालामुखी धधक रहा है...ऐसे में सरकार ने इस ज्वालामुखी को ठंडा करने के लिए कारगर कदम नहीं उठाए तो ये 2014 में यूपीए 2 की हैट्रिक के सपने पर पानी जरूर फेर देगा। बहरहाल पेट्रोल के दामों में बढ़ोतरी के बाद से इस पर बवाल मचना तय है...और देशभर से आ रही खबरें भी कुछ इसी ओर ईशारा कर रही हैं...ऐसे में सरकार पेट्रोल की इन बढ़ी हुई कीमतों पर आम जनता के हित में कोई फैसला लेती है या फिर तेल कंपनियों के दबाव के आगे घुटने टेक देती है ये आने वाले कुछ दिनों में साफ हो जाएगा। वहीं उत्तराखंड सरकार ने पेट्रोल की बढ़ी हुई कीमतों पर 25 प्रतिशत वैट न लेने का फैसला लेकर प्रदेशवासियों को राहत देने की कोशिश की है...इससे प्रदेश में पेट्रोल की कीमतों में एक रुपये 87 पैसे की कमी तो आएगी...लेकिन ये राहत पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे लोगों के लिए ऊंट के मुंह में जीरे के समान लगती है।

दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com

गुरुवार, 17 मई 2012

सेनापति


सेनापति

कांग्रेस में सेनापति यानि मुख्यमंत्री की लड़ाई में तो बाजी विजय बहुगुणा ने मारी...लेकिन भाजपा को सेनापति यानि नेता प्रतिपक्ष चुनने में पसीना आ गया है। सरकार बने दो माह से ज्यादा का वक्त हो गया है...लेकिन लगता है भाजपा अभी भी सत्ता में लौटने का ख़्वाब संजोए बैठी है। भाजपा को उम्मीद है कि बहुगुणा विधायकी का चुनाव आसानी से नहीं जीत पाएंगे...और ऐसे में अगर वे उपचुनाव में बहुगुणा को पटखनी देने में कामयाब हो जाती है तो एक बार फिर से सत्ता में लौटने का रास्ता खुल सकता है। शायद यही वजह है कि भाजपा ने अभी तक नेता प्रतिपक्ष पर अपने पत्ते नहीं खोले हैं...जाहिर है कि अगर ऐसी परिस्थिति बनती है तो भाजपा में भी कांग्रेस की तरह मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए दावेदारों की फेरहिस्त लंबी हो जाएगी...और उसमें एक नाम नेता प्रतिपक्ष का भी जुड़ जाएगा। उपचुनाव को लेकर बहुगुणा ने अभी तक भले ही अपनी चुप्पी न तोड़ी हो...लेकिन सदन में सामने वाली खाली कुर्सी पर बहुगुणा भी चुटकी लेने से नहीं चूक रहे हैं। 28 मई से विधानसभा का बजट सत्र शुरू होने जा रहा है...जो 8 जून तक चलेगा...ऐसे में बिना सेनापति की भाजपा सेना कैसे फ्रंटफुट पर आकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलेगी वो भी ऐसे समय में जब इस बार अधिकतर भाजपा विधायक पहली बार चुन कर आए है। बहरहाल बजट सत्र में अभी करीब डेढ़ सप्ताह से ज्यादा का वक्त है...बहगुणा भी सार्वजनिक मंचों से उपचुनाव पर जल्द चुप्पी तोड़ने की बात कह चुके हैं...लेकिन भाजपा सदन में सेनापति को लेकर अपने पत्ते खोलने को तैयार नहीं हैं...यानि भाजपा का पूरा ध्यान आगामी सत्र की बजाए उस उपचुनाव पर है...जो बैकफुट पर खड़ी भाजपा को सत्ता की लड़ाई में फ्रंटफुट पर ला सकता है।  













दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com


गुरुवार, 10 मई 2012

कैसे होगी नैया पार ?


कैसे होगी नैया पार ?

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा...जिनका नाम ही विजय है। कांग्रेस में मुख्यमंत्री की दौड़ में बहुगुणा ने विजय भी पायी...उसके बाद भले ही जमकर बवाल मचा...लेकिन समझौते की टेबल पर सब कुछ मैनेज कर लिया गया। अब भले ही अपनों के लिए बहुगुणा के पास कुछ नहीं बचा...लेकिन खुद कुर्सी पाना भी कम बड़ा काम नहीं था...वो भी ऐसे समय में जब इस कुर्सी के लिए दावेदार उनसे भी कद्दावर थे। बहुगुणा कुर्सी तो पा गए...लेकिन एक विजय अभी बाकी है...जिसने बहुगुणा की नींद उड़ा रखी है।  जी हां हम बात कर रहे हैं उपचुनाव की...जिसका सामना करना बहुगुणा के लिए अभी बाकी है...यानि की असली अग्निपरीक्षा से तो बहुगुणा को गुजरना अभी बाकी है। हालांकि बहुगुणा के सामने सबसे बड़ा सवाल फिलहाल ये है कि वो इस अग्निपरीक्षा पर कहां पर विजय प्राप्त करना चाहेंगे...हालांकि बहुगुणा खुद ही इस बात को कह चुके हैं कि 15 मई को ये इंतजार भी खत्म हो जाएगा...यानि बहुगुणा 15 मई को साफ कर देंगे कि किस सीट से वे विधायकी के लिए ताल ठोकेंगे। बहुगुणा के लिए ये फैसला लेना आसान काम नहीं है...क्योंकि प्रदेश कांग्रेस में जैसी परिस्थिति दिखाई दे रही हैं...उसके हिसाब से तो बहुगुणा को किसी विधायक से सीट खाली कराना ही भारी पड़ता दिखाई दे रहा है। वो भी ऐसी सीट जहां से बहुगुणा को सौ प्रतिशत अपनी विजय की उम्मीद हो। अंदरखाने कांग्रेस में इसको लेकर जोड़तोड़ चल भी रही है...लेकिन इसे सार्वजनिक चुनाव लड़ेने से ऐन पहले किया जाएगा...ताकि विरोधियों को सक्रिय होने का वक्त न मिले। बहुगुणा के लिए बड़ी मुश्किल ये भी है कि उनके सामने सबसे बड़े विरोधी पार्टी के अंदर ही हैं...और उनके आसपास ही हैं...और ये वही लोग हैं...जिन्हें दौड़ में बाहर कर बहुगुणा ने सीएम की कुर्सी हथिया ली थी। वो लोग भले ही सब कुछ ठीक होने की भले ही बात कर रहे हों...लेकिन उनके समर्थक कोई मौका नहीं छोड़ रहे है बहुगुणा की नींद उड़ाने का। बहुगुणा भी ये चीज अच्छी तरह जानते हैं लिहाजा वे अभी भी डैमेज कंट्रोल की मुहिम जारी रखे हुए हैं। अब विरोधी खेमे के विधायकों को लाल बत्ती देने का मामला हो या फिर उनकी मांगों पर दिल खोलकर घोषणाएं करने का...बहुगुणा कहीं नहीं चूक रहे हैं। बहुगुणा ये बात अच्छी तरह से जानते हैं कि डैमेज कंट्रोल में कहीं कोई कसर बाकी रह गयी तो इसका सीधा असर उनकी उस अग्निपरीक्षा पर पड़ेगा...जिससे होकर उन्हें अभी गुजरना है...और बहुगुणा को ये डर भी है कि दस जनपथ की कृपा से आयी ये कुर्सी कहीं छिटक न जाए। राजनीति में कुर्सी बड़ी चीज है...और जब राजनीतिक हालात उत्तराखंड के जैसे हों...तो कुर्सी का खेल बड़ा ही रोचक हो जाता है...कांग्रेस में चले कुर्सी के खेल में पहली बाजी तो विजय बहुगुणा ने मारी...लेकिन अब बहुगुणा खुद इस खेल के चक्रव्यूह में इस तरह फंस गए हैं कि उनके लिए इसे पार पाना आसान नहीं दिखाई दे रहा है।













दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com

शुक्रवार, 4 मई 2012

मेरी केदारनाथ यात्रा


मेरी केदारनाथ यात्रा

केदारनाथ धाम...भगवान शिव का 11वां ज्योतिर्लिंग...यह स्थित है उत्तराखंड के रूद्रप्रयाग जिले में...हर साल अक्षय तृतीया से भैया दूज तक श्रद्धालुओं के लिए केदारनाथ धाम के कपाट खुलते हैं...इस बार भी 28 अप्रेल को केदारनाथ धाम के कपाट श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिए गए...इस बार बाबा केदार ने श्रद्धालुओं का स्वागत भारी बर्फबारी के साथ किया...कुछ लोग भोले के दर्शन के साथ ही बर्फबारी का लुत्फ उठाते देखे गए तो बर्फबारी कुछ लोगों के लिए आफत बन गयी...कपाट खुलने के एक दिन पहले से शुरू हुई बर्फबारी और कड़ाके की ठंड ने पहले ही दिन चार लोगों को जान ले ली...वहीं अगले दो दिनों में दो और लोग केदारनाथ में मुक्ति पा गए...केदारनाथ धाम में श्रद्धालुओं की मौत ने कई सवाल खडे कर दिए हैं...क्या सिर्फ भारी बर्फबारी ही श्रद्धालुओं की मौत की वजह बनी या फिर कुछ औऱ ?...इस पर बात करेंगे आगे पहले बात करते हैं इस यात्रा की...केदारनाथ धाम के कपाट खुलने से एक दिन पहले मैं भी अपनी टीम के साथ केदारनाथ धाम के लिए रवाना हुआ था...ऋषिकेश से केदारनाथ यात्रा मार्ग की हालत देखकर अंदाजा हो गया था कि यात्रा बिल्कुल भी आसान होने वाली नहीं है...हर एक दो किलोमीटर में उधड़ी हुई सड़कें...सड़कों पर गिरे बड़े बड़े बोल्डर यात्रा मार्गों की हालत बयां कर रहे थे। ऋषिकेश से देवप्रयाग, श्रीनगर, रूद्रपयाग, अगस्तयमुनि, गुप्तकाशी, फाटा और सोनप्रयाग होते हुए हम गौरीकुंड पहुंचे।
गौरीकुंड से केदारनाथ तक की 14 किलोमीटर की कठिन यात्रा पैदल ही तय करनी पड़ती है...पैदल मार्ग कच्चा है औऱ पहाड़ों के बीच से होकर गुजरता है...जो इस यात्रा को औऱ मुश्किल बना देता है...हालांकि लोग खच्चर औऱ डोली में भी इस यात्रा को पूरा करते हैं। हालांकि फाटा से केदारनाथ तक हवाई सेवा भी उपलब्ध है...औऱ श्रद्धालु यहां फाटा पहुंचकर करीब 6 हजार रूपए में फाटा से केदारनाथ औऱ केदारनाथ से वापस फाटा की यात्रा कर सकते हैं। सुबह के आठ बज चुके थे...गौरीकुंड से हमने पैदल ही 14 किलोमीटर की यात्रा तय कर केदारनाथ पहुंचने का निर्णय लिया...पैदल यात्रा में श्रद्धालुओं का जोश देखते ही बनता था...श्रद्धालु बम बम भोले औऱ हर हर महादेव के जयकारों के साथ चढ़ाई चढ़ रहे थे...जैसे ही श्रद्धालुओं को थकान लगने लगती...वैसे ही हर हर महादेव का नारा श्रद्धालुओं में नया जोश भर देता। हमने भी पैदल यात्रा शुरू की...श्रद्धालुओं से बात करते हुए हम भी आगे बढ़ रहे थे...रास्ते के एक तरफ ऊंचे पहाड़ थे...तो दूसरी तरफ कल कल कर बह रही थी केदारनाथ से आ रही मंदाकिनी नदी। जैसे जैसे हम ऊंचाई पर पहुंच रहे थे...वैसे वैसे मौसम में ठंडक घुलती जा रही थी...मंदाकिनी ऊंचाई से किसी नहर की तरह दिखाई देने लगी थी। रास्ते में सामने बर्फ की सफेद चादर से ढ़के पहाड़ दिखाई दे रहे थे...जो बरबस ही अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे...बर्फ से ढ़के पहाड़ों को देखकर आनंद आ रहा था...मन कर रहा था कि जल्दी से इन सफेद पहाड़ों के बीच पहुंच जाएं...लेकिन अभी हम ढ़ाई किलोमीटर ही चढ़े थे...साढ़े ग्यारह किलोमीटर की चढ़ाई अभी बाकी थी...आपको बता दूं कि केदारनाथ भगवान का मंदिर सुमेरू पर्वत पर बर्फ से ढ़के पहाड़ों के बीच स्थित है। चारों तरफ के पहाड़ बर्फ की सफेद चादर से ढ़के रहते हैं जो केदारनाथ धाम के सौंदर्य को दोगुना कर देते हैं।
हम बिना रूके चले जा रहे थे...अभी हम चार किलोमीटर ही चढ़े थे कि तेज बरसात शुरू हो गयी...दरअसल पहाड़ों में मौसम का मिजाज कब बदल जाए कह नहीं सकते...पहाड़ी के नीचे चार लकड़ियों के सहारे खड़ी पौलीथीन की छतनुमा एक दुकान से हमने दो बरसाती खरीद ली...ताकि बरसात में भीग न जाएं...लेकिन 25-25 रूपए की इस कागज से भी पतली बरसाती कितनी देर बरसात का सामना कर पाती...ये बरसाती देखकर ही समझ में आ गयी थी...बहरहाल दूसरा कोई रास्ता नहीं था...लिहाजा हमने बरसाती पहनी औऱ चल पढ़े आगे...रास्ते में रंग बिरंगी बरसाती पहने श्रद्धालुओँ का जोश बरसात में भी कम नहीं हुआ था...श्रद्धालु भोले बाबा के जयकारे लगाते आगे बढ़ रहे थे। रास्ते में ऐसी ही कई दुकानों में कोई चाय बेच रहा था तो कोई मैगी...खाने के लिए दाल चावल औऱ पराठे भी रास्ते में उपलब्ध थे...ठंड के बीच कढ़ाई में तलते पकौड़े हर किसी को ललचा रहे थे।
यहां एक चीज बताना चाहूंगा...यहां पर आपको चाय पीनी है तो एक चाय के लिए आपको 15 रूपए चुकाने होंगे...इसी तरह एक मैगी के लिए आपको 35 से 40 रूपए और एक पराठे के लिए भी 25 से 30 रूपए चुकाने होंगे...जबकि एक प्लेट पकौड़े के लिए आपको 30 से 40 रूपए देने होंगे...और जैसे जैसे आप ऊपर चढ़ेंगे इनकी कीमत भी बढ़ती जाएगी...इसके पीछे दुकानदारों का तर्क है कि उन्हें सामान ऊपर ले जाने के लिए खच्चर वाले को 300 से 400 रूपए चुकाने होते हैं...ऐसे में इसका पैसा दुकानदार वहां आने वाले श्रद्धालुओं से वसूलते हैं। बहरहाल हमारा सफर जारी था...हम धीरे धीरे बूंदा बांदी के बीच आगे बढ़ रहे थे...अचनाक बरसात तेज हो गयी...ऐसे में करीब 8 किलोमीटर की चढ़ाई अभी बाकी थी...रास्ता कठिन था औऱ अंधेरा होने से पहले पहुंचना भी था...लिहाजा हमने एक खच्चर वाले को रोककर केदारनाथ तक खच्चर में ले जाने के पैसे पहुंचे...छह माह के लिए केदारनाथ के कपाट खुलते हैं...ऐसे में ये 6 माह इन खच्चर वालों के लिए पैसा कमाने का बढ़िया जरिया होता है...इसलिए जैसे श्रद्धालु मिलते हैं उससे वैसे ही पैसे की डिमांड करते हैं...बरसात हो रही थी...ऐसे में ये मौका खच्चर वाले कहां चूकने वाले थे...हमसे भी एक खच्चर के 900 रूपए मांग लिए...हमने तकाजा किया तो मामला 800 रूपए में तय हो गया...हमने 3200 रूपए में चार खच्चर कर लिए। यहां के खच्चर बरसात हो या बर्फबारी कपाट बंद होने तक यानि छह महीने तक बिना रूके चलते हैं...इसके बदले इनको खुराक भी बढ़िया मिलती है...औऱ एक दिन में करीब 500 से 800 रूपए की खुराक चट कर जाते हैं...औऱ इनको दिया जाता है इनका मनपसंद गुड़ औऱ चना। हम खच्चर पर सवार थे...बरसात हो रही थी...औऱ कहीं कहीं खच्चर के अगले पैर फिसलन खा रहे थे...ऐसे में मन ही मन डर भी लग रहा था कहीं खच्चर नीचे न गिरा दें...इसी डर के साथ आस पास के हरे भरे नजारों...औऱ सामने दिखाई दे रहे सफेद हिमालय को देखते हुए हम आगे बढ़े जा रहे थे....एक तरफ नीचे मंदाकिनी नदी भी बह रही थी...लेकिन हम इतनी चढ़ाई पर पहुंच चुके थे कि अब नदी नजर नहीं आ रही थी...बस बीच बीच में बह रहे पानी की आवाज़ कानों से टकरा जाती थी।

इसी बीच हमने अपनी आधी यात्रा पूरी कर ली थी...औऱ हम सात किलोमीटर की चढ़ाई कर पहुंच चुके थे रामबाड़ा....रामबाड़ा गौरीकुंड औऱ केदारनाथ की 14 किलोमीटर की यात्रा के बीच का पड़ाव है...यहां पर श्रद्धालु अपनी थकान मिटाने के साथ ही पेट पूजा भी करते हैं तो खच्चरों को उनकी मनपसंद खुराक गुड़ चना खिलाया जाता है। रामबाड़ा में हमने भी चाय औऱ मैगी खायी...चार चाय औऱ मैगी के लिए हमें 200 रूपए चुकाने पड़े। रामबाड़ा से खच्चर पर बैठकर आगे की यात्रा शुरू हुई...अभी सात किलोमीटर का सफर बाकी था...और मौसम औऱ ज्यादा खराब होने लगा था...करीब दो किलोमीटर औऱ चढ़े होंगे कि अचानक बरसात बर्फबारी में बदल गयी...बर्फबारी शुरू हुई तो मानो मन की मुराद पूरी हो गयी...बर्फबारी के बीच हम आगे बढ़ते जा रहे थे...जैसे जैसे हम आगे बढ़ रहे थे...बर्फबारी तेज होते जा रही थी...केदारनाथ अभी 3 किलोमीटर बाकी थी...औऱ बर्फबारी के साथ ही तेज हवाएं चलने लगी...ऐसे में जो बर्फबारी शुरु में रोमांचित कर रही थी...वही बर्फबारी अब आफत लगने लगी थी...पूरा रास्ता बर्फ से पट गया था...चारों तरफ के पहाड़ बर्फ की सफेद चादर से पूरी तरह ढ़क गए थे...चारों तरफ का नजारा रोमांचित कर रहा था...लेकिन ठंडक भी बढ़ती जा रही थी। बर्फबारी के बीच बर्फ से भरे रास्ते से होकर आखिर हम केदारनाथ पहुंच गये...कपाट अगले दिन खुलने थे...लिहाजा श्रद्धालु इस मौके को नहीं चूकना चाहते थे...हर कोई इसका गवाह बनना चाहता था...लिहाजा केदारनाथ में श्रद्धालुओं का हुजुम पहुंच चुका था...औऱ गौरीकुंड से श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला जारी था।

केदारनाथ पूरी तरह से बर्फ से ढ़क चुका था...लेकिन बर्फबारी रूकने का नाम नहीं ले रही थी...बर्फबारी से केदारनाथ में ऑक्सीजन की कमी महसूस होने लगी...ऐसे में जो लोग कमजोर थे...उनके लिए ये मुश्किल भरा समय था...कुछ ही देर में पता चला कि यही एक श्रद्धालु की मौत की वजह बन गयी..ताज्जुब उस वक्त हुआ जब पता चला कि केदारनाथ में श्रद्धालु को स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिल पायी...जिसके चलते आखिर में उसने दम तोड़ दिया...ऐसा नहीं है कि केदारनाथ में स्वास्थ्य सुविधा नहीं है...स्वास्थ्य सुविधा के लिए यहां पर एक अस्पताल भी है...लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यहां रोज पहुंचने वाले हजारों श्रद्धालुओं के लिए अस्पताल में सिर्फ एक डॉक्टर...एक फार्मसिस्ट और दो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हैं। ऐसे में श्रद्धालुओं को कितनी बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल पाती होंगी...इसका अंदाजा लगाया जा सकता है...औऱ यही शायद उस श्रद्धालु की मौत की वजह भी बना...जिसका अभी हम जिक्र कर रहे थे। हम भी क्या कर सकते थे...अंधेरा घिर आया था...औऱ बर्फबारी रूकने का नाम नहीं ले रही था...लिहाजा हम भी एक लॉज में पहुंच गए। वहां पता चला कि केदारनाथ में बिजली नहीं है...औऱ न ही पानी की व्यवस्था...और इस सब में करीब दस दिन औऱ लगने की बात कही गयी थी। क्या करते मोमबत्ती जलाकर कमरे में बैठे थे...कि बाहर श्रद्धालुओं का शोर सुनाई दे रहा था...दरअसल श्रद्धालुओं को रहने के लिए जगह नहीं मिल पा रही थी....मंदिर समिति के लोग पता नहीं कहां गायब हो गए थे...आपको बता दूं कि बद्रीनाथ औऱ केदारनाथ धाम का सारा जिम्मा श्री बद्री केदार मंदिर समिति देखती है...औऱ करोड़ों रूपए का चढ़ावा भी समिति के पास ही जाता है...लेकिन जब श्रद्धालुओं के लिए व्यवस्थाओं औऱ सुविधाओं की बात आती है तो मंदिर समिति सब कुछ शासन प्रशासन के जिम्मे डाल देती है। ऐसा ही कुछ वहां पर भी हुआ...केदारनाथ धाम की यात्रा शुरू हो गयी थी...लेकिन केदारनाथ में न तो बिजली की व्यवस्था थी...औऱ न ही पानी की...ये तो छोडिए भारी बर्फबारी के बीच श्रद्धालुओं के रहने के लिए तक कोई व्यवस्था नहीं थी...सुबह पता चला कि पूरी रात कई श्रद्धालुओं ने बर्फबारी के बीच मंदिर प्रांगण में गुजारी...अब ये रात उन्होंने कैसी गुजारी होगी...ये सोच कर भी बदन में एक सिहरन सी उठती है। सवा सात बजे मंदिर के कपाट खुलने थे...बर्फबारी थम चुकी थी औऱ हिमालय की चोटियां सुनहरी चमक बिखेर रही थी...ये नजारा मंत्रमुग्ध करने वाला था। कपाट खुलने का समय नजदीक आ रहा था...लिहाजा मंदिर में श्रद्धालुओं की लंबी कतार लग चुकी थी...हर किसो को बस केदारनाथ भगवान के कपाट खुलने का इंतजार था।
ठीक साढे सात बजे वैदिक मंत्रोचारण के बीच पूरे विधि विधान से सेना के बैंड बाजे की धुनों के बीच मंदिर के कपाट खुले तो वहां का नजारा मन को मोह लेने वाला था...चारों तरफ का वातावरण भोले की जयकारों से गुंजायमान हो रहा था। भोले के दर्शन कर जब मंदिर से बाहर निकले तो एक बार फिर से बर्फबारी शुरू हो चुकी थी...बर्फबारी मानो केदारनाथ भगवान के कपाट खुलने के लिए ही रूकी हो। बाहर पता चला कि रात को ठंड से तीन और लोगों की मौत हो गयी थी...और कई श्रद्धालु ऑक्सीजन की कमी के चलते गंभीर हालत में थे...एक महिला हमारे सामने ही गंभीर स्थिति में थी...हमने केदारनाथ भगवान के दर्शन तो कर लिए थे...लेकिन धरती के भगवान यानि डॉक्टर को जब तलाशा तो उनके दर्शन हमें नहीं हुए। बर्फबारी तेज हो रही थी...और श्रद्धालुओं की दिक्कत बढ़ती जा रही थी...लेकिन धरती के भगवान का कोई पता नहीं था...वो तो मानो अंतर्रधान होने की कसम खाएं बैठे हों...मंदिर समिति के लोगों से बात कि तो वे पूजा औऱ चढ़ावे की रसीद काटने में ही व्यस्त दिखाई दिए। काफी देर हो गयी थी...लेकिन डॉक्टर का कोई पता नहीं था...कुछ देर बाद देखा तो डॉक्टर साहब दिखाई दे दिए...लेकिन एक डॉक्टर कितने श्रद्धालुओं का ईलाज करता...जैसे तैसे उस श्रद्धालु को डॉक्टर ने ऑक्सीजन देकर राहत देने का प्रयास किया। लेकिन ऐसे श्रद्धालुओं की तादाद बढ़ती जा रही थी...लिहाजा डॉक्टर साहब श्रद्धालुओं को तुरंत वापस जाने की सलाह देते दिखाई दिए। हमने व्यवस्थाओं औऱ मेडिकल सुविधाओं को लेकर मंदिर समिति से फिर बात करने की कोशिश की तो वे सारा ठीकरा शासन प्रशासन के सिर फोड़ते हुए अपनी जिम्मेदारी से बचते नजर आए। अव्यवस्थाओं के चलते श्रद्धालु गुस्से से भरे हुए थे...लेकिन किसी को उनकी कोई फिक्र नहीं थी। दोपहर के करीब दो बज गए थे...बर्फबारी जारी थी...हम चल दिए दो किलोमीटर ऊपर पहाड़ी पर स्थित भैरव बाबा के दर्शन करने...कहते हैं बाबा भैरव के दर्शन किए बिना बाबा केदारनाथ की यात्रा अधूरी मानी जाती है...बाबा भैरव तक पहुंचने के लिए खड़ी पहाड़ी पर दो किलोमीटर पतले रास्ते पर पैदल चढ़ना पड़ता है। रास्ता कठिन था औऱ पहाड बर्फ से ढ़का हुआ था...बर्फ से होते हुए हम आखिर बाबा भैरव के दरबार में पहुंच गए...वहां से केदारनाथ का नजारा गज़ब का था...बर्फ से ढके मंदिर और घरों को देखर ऐसा लग रहा था जैसे कोई पेंटिंग हो।
बाबा भैरवनाथ के दर्शन कर हम चल पड़े वापस। शाम के करीब 4 बज गए थे...मौसम लगातार बिगड़ता जा रहा था...ऐसे में हमने वापस जाने का फैसला लिया...और चल पड़े गौरीकुंड को। रास्ता पूरी तरह बर्फ से ढ़का था...हम धीरे धीरे नीचे उतरने लगे...रामबाड़ा पहुंचते पहुंचते अंधेरा घिरने लगा था...रास्ते में रोशनी की कोई व्यवस्था नहीं थी...रास्ते के किनारे बिजली के पोल तो लगे थे...लेकिन बिजली का कोई पता नहीं था...अंधेरे में नीचे उतरना किसी खतरे से कम नहीं था...लेकिन जैसे तैसे हम रात करीब 9 बजे गौरीकुंड पहुंच ही गए। रात हमने गौरीकुंड में ही गुजारने का फैसला लिया। सुबह उठे तो खबर मिली की रात को दो औऱ श्रद्धालुओं की बर्फबारी के चलते मौत हो गयी...जिसमें से एक महिला की तो रास्ते में स्वास्थ्य खराब होने से मौत हुई...शायद रास्ते में स्वास्थ्य सुविधाएं होती तो उस महिला का जान बचायी जी सकती थी...लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं के हाल वहां पर कैसे हैं...ये आपको बता ही चुका हूं। खबर मिली कि दोपहर में कलेक्टर साहब पहुंचने वाले हैं...अब संडे का दिन था....कलेक्टर साहब ठहरे पता नहीं कब तक पहुंचते लिहाजा हमने इंतजार करने की बजाए देहरादून को रवाना होने का फैसला लिया...औऱ चल दिए देहरादून की ओर। हम श्रीनगर पहुंच चुके थे...तभी खबर मिली की कलेक्टर ने गौरीकुंड से केदारनाथ की यात्रा पर मौसम खराब होने के चलते रोक लगा दी है। कलेक्टर साहब ने यात्रा पर रोक तो लगा दी...लेकिन ये फैसले समय से ले लिया होता तो शायद 6 लोगों की जान नहीं जाती। केदारनाथ धाम में हर साल करोड़ों रूपए का चढ़ावा आता है...उसके बाद भी मंदिर में अव्यवस्थाएं पसरी नजर आयी...हम बात कर रहे थे कि जिन श्रद्धालुओं की केदारनाथ में मौत हुई थी...क्या वाकई में उनकी जान नहीं बच सकती थी। सवाल अभी भी खड़ा है...लेकिन जवाब शासन प्रशासन के किसी भी अधिकारी के पास नहीं है...वे मौसम को दोष देते हुए अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं। कपाट खुलने के पहले करीब 6 महीने का वक्त इनके पास था...तो ये क्या कर रहे थे...क्यों नहीं वहां पर बिजली...पानी...स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ ही श्रद्धालुओं के रहने के लिए इंतजामात किए गए। इसका जवाब सामने हैं...लेकिन जिम्मेदार लोगों के पास इसका जवाब शायद ही हो...इन्हें क्या मतलब किसी की जान जाए तो जाए...इनमें इनका कोई अपना नहीं है ना...ये क्या जानें किसी अपने को खोने का गम। केदारनाथ जाने का मौका मुझे तीन साल पहले भी मिला था...उस वक्त में अप्रेल की बजाए शायद जून के महीने में गया था...लेकिन तब भी हालात जुदा नहीं थे...बस फर्क इतना था कि उस समय बर्फबारी नहीं हो रही थी...लेकिन अव्यवस्थाएं तब भी पसरी पड़ी थी...यानि हालात में तीन साल बाद भी कोई सुधार नहीं आया है। इस बार की यात्रा का अनुभव आपके सामने हैं...कहते हैं न कि उम्मीद पर दुनिया कायम है...हमें भी यही उम्मीद है कि शायद अगली बार जब केदार बाबा का बुलावा आए तब स्थिति में कुछ सुधार देखने को मिलेगा...और केदारनाथ में इस बार जैसी अव्यवस्थाओं से देशभर से पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को कम से कम न जूझना पड़े...लेकिन सवाल वही है कि आखिर कब जागेंगे जिम्मेदार अधिकारी...कब जागेगी उत्तराखंड की सरकार।










दीपक तिवारी

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

फिर जरूरी हुए खंडूरी !


फिर जरूरी हुए खंडूरी !

खंडूरी हैं जरूरी के नारे से भाजपा ने विधानसभा चुनाव लड़ा...लेकिन कोटद्वार जहां से खंडूरी खुद मैदान में थे...वहां के लोगों ने खंडूरी को जरूरी नहीं समझा...और दिखा दिया भाजपा को आईना...लेकिन उम्मीदों के विपरीत प्रदेश में 31 सीटें जीतने वाली भाजपा का चेहरा खंडूरी भले ही चुनाव हार गए...लेकिन भाजपा को अभी भी उम्मीद है कि शायद खंडूरी के सहारे एक बार फिर से उसकी नैया पार लग जाएगी। कांग्रेस ने किसी विधायक की बजाए सांसद विजय बहुगुणा को सीएम की कुर्सी सौंपी...ऐसे में बहुगुणा को न सिर्फ विधायकी का उपचुनाव लड़ना है बलकि विजय भी होना है...तभी वे मुख्यमंत्री रह पाएंगे और प्रदेश में कायम रह पाएगी कांग्रेस की सरकार। कांग्रेस में चल रही गुटबाजी और भीतरघात से बहुगुणा के लिए उपचुनाव किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है...औऱ ये बात भाजपा भी अच्छी तरह जानती है...ऐसे में 31 सीटें के साथ कांग्रेस से एक कदम पीछे भाजपा इस जुगत में लगी है...और इस मौके को छक्के में बदलने की पूरी तैयारी में है। खंडूरी कोटद्वार से अप्रत्याशित तरीके से जब चुनाव हारे तो हर कोई हैरान था...खंडूरी के साथ ही भाजपा ने भी इस नतीजे के बारे में शायद सपने में भी नहीं सोचा होगा...और यही सीट आखिरी में निर्णायक साबित हुई और कांग्रेस भाजपा से एक सीट की बढत पर रही। खंडूरी की हार के बाद से प्रदेश में खंडूरी के प्रति एक साहनुभूति की लहर देखी गयी...और भाजपा इसका पूरा फायदा उठाने की फिराक में नजर आ रही है। खबर है कि बहुगुणा कहीं से भी उपचुनाव लड़े...भाजपा बहुगुणा के खिलाफ खंडूरी को मैदान में उतारने की तैयारी में है...औऱ आलाकमान ने खंडूरी को साफ भी कर दिया है कि उपचुनाव के मैदान में जंग उन्हें ही लड़नी है। हालांकि इस सवाल को लेकर पहले दिन से ही तल्ख तेवर दिखाने वाले खंडूरी भी अब ये कहने से गुरेज नहीं कर रहे है कि आलाकमान का जो भी निर्देश होगा उसका पालन करेंगे। बहुगुणा को कुर्सी तो मिल गयी...लेकिन बहुगुणा ये अच्छी तरह जानते हैं कि कुर्सी को संभाले रखना है तो उपचुनाव हर हाल में जीतना ही होगा...ऐसे में बहुगुणा भी फूंक फूंक कर कदम रख रहे हैं...और उपचुनाव कहां से लड़ना है...कैसे लड़ना है ताकि विजय हासिल हो...इसके लिए पूरा होमवर्क किया जा रहा है। ये बात तो बहुगुणा भी अच्छी तरह से जानते हैं कि अगर जल्दबाजी कर दी...तो कुर्सी तो जाएगी ही इज्जत का फालूदा होगा वो अलग। इसलिए उपचुनाव के हर सवाल को समय पर टाल जाते हैं। बहरहाल विधासभा चुनाव में कांग्रेस से एक कदम पीछे रह गयी भाजपा को अभी भी सत्ता की चाबी मिलने का पूरा भरोसा है...औऱ एक बार फिर से भरोसा है कि खंडूरी ही ये चाबी कांग्रेस के गढ़ में सेंध लगाकर हासिल कर सकते हैं...यानि कि एक बार फिर से जरूरी हैं खंडूरी...लेकिन एक बार फिर से वही सवाल उठ खड़ा हुआ है जो विधानसभा चुनाव से पहले सबके सामने था...क्या वकाई में जरूरी है खंडूरी...कोटद्वार की जनता ने तो सबको जवाब दे दिया था...लेकिन अब अगर खंडूरी मैदान में उतरते हैं...तो इसका जवाब क्या होगा...इसका इंतजार सभी को है।   

दीपक तिवारी

सोमवार, 23 अप्रैल 2012

राजनीति के विभीषण


राजनीति के विभीषण

विभीषण के नाम से तो आप सभी वाकिफ ही होंगे...सीता को रावण जब उठा कर ले गया था तो सीता की तलाश में जब हनुमान लंका में पहुंचे थे तो वे विभीषण ही थे जिन्होंने रावण की ताकत औऱ कमजोरियां को भगवान राम के सामने उजागर किया था...जो रावण के अंत की वजह बना था। इसी तरह कुछ विभीषण हर जगह होते हैं...लेकिन हम बात कर रहे हैं उत्तराखंड में राजनीति के विभीषणों की...दरअसल उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव के दौरान राज्य के दोनों प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस में भी सैंकडों ऐसे ही विभीषण थे जिन्होंने अपनी नेता भक्ति के लिए अपनी ही पार्टी का बेड़ा गर्क करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अब चुनाव का परिणाम आए हुए करीब डेढ़ महीने का वक्त गुज़र चुका है...राज्य में कांग्रेस की सरकार बन गयी है...तो दोनों ही पार्टियों भाजपा औऱ कांग्रेस ने ऐसे विभीषणों की पहचान कर उनको किनारे करने का काम शुरू कर दिया है। ये ऐसे विभीषण थे जिन्होंने चुनाव के दौरान अपनी अपनी पार्टी भक्ति को किनारे कर नेता भक्ति पर ज्यादा मेहनत की...कुछ अपने पसंदीदा नेता को विधायकी का टिकट न मिलने से नाराज़ थे तो कुछ खुद को टिकट न मिला तो बन गए विभीषण...इसका खामियाजा अधिकतर जगह उन नेताओं औऱ कार्यकर्ताओं ने भी भुगता औऱ सबसे ज्यादा भुगता उनकी पार्टी ने भी...क्योकि इन विभीषणों के चलते दोनों ही पार्टियों के करीब करीब आधा दर्जन से ज्यादा प्रत्याशियों को कहीं बहुत कं अतंर से तो कहीं पर बुरी हार का मुंह देखना पड़ा...ये हाल राज्य की दोनों की प्रमुख दल भाजपा औऱ कांग्रेस में लगभग एक जैसे ही थे। ऐसे में दोनों ही पार्टियों ने अब इन विभीषणों की पहचान का काम शुरू कर दिया है...भाजपा ने इस काम में बकायदा एक पूरी टीम लगा रखी है...जो विभीषणों को पहचानने के लिए तीसरी आंख का काम कर रही है। पहले चरण में तो भाजपा ने चार जिलों को पूरी कार्यकारिणी को ही भंग कर दिया है...जबकि भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का सवाल रही कोटद्वार सीट से खंडूरी के हारने पर भाजपा से कोटद्वार के ही अपने नेता औऱ पूर्व विधायक शैलेन्द्र रावत को नोटिस थमा दिया है...वहीं कांग्रेस ने भी चुनाव से लेकर सीएम के नाम की घोषणा तक विभीषण बने नेताओं को को अब सबक सिखाना शुरू कर दिया है...लेकिन कांग्रेस की ये कार्रवाई सिर्फ हवा हवाई ही दिखाई दे रही है...विभीषणों के सरदार हरीश रावत पर तो प्रदेश कांग्रेस हाथ डालने से कतराती दिखाई दे रही है जबकि सरदार के सिपहसालारों को जरूर नोटिस जारी कर कार्यकर्ताओं को संदेश देने की कोशिश कांग्रेस कर रही है। बहरहाल विभीषणों की पहचान का ये काम अभी दोनों पार्टियों ने शुरू ही किया है...आगे आगे देखते हैं होता है क्या।


दीपक तिवारी