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गुरुवार, 10 मई 2012

कैसे होगी नैया पार ?


कैसे होगी नैया पार ?

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा...जिनका नाम ही विजय है। कांग्रेस में मुख्यमंत्री की दौड़ में बहुगुणा ने विजय भी पायी...उसके बाद भले ही जमकर बवाल मचा...लेकिन समझौते की टेबल पर सब कुछ मैनेज कर लिया गया। अब भले ही अपनों के लिए बहुगुणा के पास कुछ नहीं बचा...लेकिन खुद कुर्सी पाना भी कम बड़ा काम नहीं था...वो भी ऐसे समय में जब इस कुर्सी के लिए दावेदार उनसे भी कद्दावर थे। बहुगुणा कुर्सी तो पा गए...लेकिन एक विजय अभी बाकी है...जिसने बहुगुणा की नींद उड़ा रखी है।  जी हां हम बात कर रहे हैं उपचुनाव की...जिसका सामना करना बहुगुणा के लिए अभी बाकी है...यानि की असली अग्निपरीक्षा से तो बहुगुणा को गुजरना अभी बाकी है। हालांकि बहुगुणा के सामने सबसे बड़ा सवाल फिलहाल ये है कि वो इस अग्निपरीक्षा पर कहां पर विजय प्राप्त करना चाहेंगे...हालांकि बहुगुणा खुद ही इस बात को कह चुके हैं कि 15 मई को ये इंतजार भी खत्म हो जाएगा...यानि बहुगुणा 15 मई को साफ कर देंगे कि किस सीट से वे विधायकी के लिए ताल ठोकेंगे। बहुगुणा के लिए ये फैसला लेना आसान काम नहीं है...क्योंकि प्रदेश कांग्रेस में जैसी परिस्थिति दिखाई दे रही हैं...उसके हिसाब से तो बहुगुणा को किसी विधायक से सीट खाली कराना ही भारी पड़ता दिखाई दे रहा है। वो भी ऐसी सीट जहां से बहुगुणा को सौ प्रतिशत अपनी विजय की उम्मीद हो। अंदरखाने कांग्रेस में इसको लेकर जोड़तोड़ चल भी रही है...लेकिन इसे सार्वजनिक चुनाव लड़ेने से ऐन पहले किया जाएगा...ताकि विरोधियों को सक्रिय होने का वक्त न मिले। बहुगुणा के लिए बड़ी मुश्किल ये भी है कि उनके सामने सबसे बड़े विरोधी पार्टी के अंदर ही हैं...और उनके आसपास ही हैं...और ये वही लोग हैं...जिन्हें दौड़ में बाहर कर बहुगुणा ने सीएम की कुर्सी हथिया ली थी। वो लोग भले ही सब कुछ ठीक होने की भले ही बात कर रहे हों...लेकिन उनके समर्थक कोई मौका नहीं छोड़ रहे है बहुगुणा की नींद उड़ाने का। बहुगुणा भी ये चीज अच्छी तरह जानते हैं लिहाजा वे अभी भी डैमेज कंट्रोल की मुहिम जारी रखे हुए हैं। अब विरोधी खेमे के विधायकों को लाल बत्ती देने का मामला हो या फिर उनकी मांगों पर दिल खोलकर घोषणाएं करने का...बहुगुणा कहीं नहीं चूक रहे हैं। बहुगुणा ये बात अच्छी तरह से जानते हैं कि डैमेज कंट्रोल में कहीं कोई कसर बाकी रह गयी तो इसका सीधा असर उनकी उस अग्निपरीक्षा पर पड़ेगा...जिससे होकर उन्हें अभी गुजरना है...और बहुगुणा को ये डर भी है कि दस जनपथ की कृपा से आयी ये कुर्सी कहीं छिटक न जाए। राजनीति में कुर्सी बड़ी चीज है...और जब राजनीतिक हालात उत्तराखंड के जैसे हों...तो कुर्सी का खेल बड़ा ही रोचक हो जाता है...कांग्रेस में चले कुर्सी के खेल में पहली बाजी तो विजय बहुगुणा ने मारी...लेकिन अब बहुगुणा खुद इस खेल के चक्रव्यूह में इस तरह फंस गए हैं कि उनके लिए इसे पार पाना आसान नहीं दिखाई दे रहा है।













दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com

शुक्रवार, 4 मई 2012

मेरी केदारनाथ यात्रा


मेरी केदारनाथ यात्रा

केदारनाथ धाम...भगवान शिव का 11वां ज्योतिर्लिंग...यह स्थित है उत्तराखंड के रूद्रप्रयाग जिले में...हर साल अक्षय तृतीया से भैया दूज तक श्रद्धालुओं के लिए केदारनाथ धाम के कपाट खुलते हैं...इस बार भी 28 अप्रेल को केदारनाथ धाम के कपाट श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिए गए...इस बार बाबा केदार ने श्रद्धालुओं का स्वागत भारी बर्फबारी के साथ किया...कुछ लोग भोले के दर्शन के साथ ही बर्फबारी का लुत्फ उठाते देखे गए तो बर्फबारी कुछ लोगों के लिए आफत बन गयी...कपाट खुलने के एक दिन पहले से शुरू हुई बर्फबारी और कड़ाके की ठंड ने पहले ही दिन चार लोगों को जान ले ली...वहीं अगले दो दिनों में दो और लोग केदारनाथ में मुक्ति पा गए...केदारनाथ धाम में श्रद्धालुओं की मौत ने कई सवाल खडे कर दिए हैं...क्या सिर्फ भारी बर्फबारी ही श्रद्धालुओं की मौत की वजह बनी या फिर कुछ औऱ ?...इस पर बात करेंगे आगे पहले बात करते हैं इस यात्रा की...केदारनाथ धाम के कपाट खुलने से एक दिन पहले मैं भी अपनी टीम के साथ केदारनाथ धाम के लिए रवाना हुआ था...ऋषिकेश से केदारनाथ यात्रा मार्ग की हालत देखकर अंदाजा हो गया था कि यात्रा बिल्कुल भी आसान होने वाली नहीं है...हर एक दो किलोमीटर में उधड़ी हुई सड़कें...सड़कों पर गिरे बड़े बड़े बोल्डर यात्रा मार्गों की हालत बयां कर रहे थे। ऋषिकेश से देवप्रयाग, श्रीनगर, रूद्रपयाग, अगस्तयमुनि, गुप्तकाशी, फाटा और सोनप्रयाग होते हुए हम गौरीकुंड पहुंचे।
गौरीकुंड से केदारनाथ तक की 14 किलोमीटर की कठिन यात्रा पैदल ही तय करनी पड़ती है...पैदल मार्ग कच्चा है औऱ पहाड़ों के बीच से होकर गुजरता है...जो इस यात्रा को औऱ मुश्किल बना देता है...हालांकि लोग खच्चर औऱ डोली में भी इस यात्रा को पूरा करते हैं। हालांकि फाटा से केदारनाथ तक हवाई सेवा भी उपलब्ध है...औऱ श्रद्धालु यहां फाटा पहुंचकर करीब 6 हजार रूपए में फाटा से केदारनाथ औऱ केदारनाथ से वापस फाटा की यात्रा कर सकते हैं। सुबह के आठ बज चुके थे...गौरीकुंड से हमने पैदल ही 14 किलोमीटर की यात्रा तय कर केदारनाथ पहुंचने का निर्णय लिया...पैदल यात्रा में श्रद्धालुओं का जोश देखते ही बनता था...श्रद्धालु बम बम भोले औऱ हर हर महादेव के जयकारों के साथ चढ़ाई चढ़ रहे थे...जैसे ही श्रद्धालुओं को थकान लगने लगती...वैसे ही हर हर महादेव का नारा श्रद्धालुओं में नया जोश भर देता। हमने भी पैदल यात्रा शुरू की...श्रद्धालुओं से बात करते हुए हम भी आगे बढ़ रहे थे...रास्ते के एक तरफ ऊंचे पहाड़ थे...तो दूसरी तरफ कल कल कर बह रही थी केदारनाथ से आ रही मंदाकिनी नदी। जैसे जैसे हम ऊंचाई पर पहुंच रहे थे...वैसे वैसे मौसम में ठंडक घुलती जा रही थी...मंदाकिनी ऊंचाई से किसी नहर की तरह दिखाई देने लगी थी। रास्ते में सामने बर्फ की सफेद चादर से ढ़के पहाड़ दिखाई दे रहे थे...जो बरबस ही अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे...बर्फ से ढ़के पहाड़ों को देखकर आनंद आ रहा था...मन कर रहा था कि जल्दी से इन सफेद पहाड़ों के बीच पहुंच जाएं...लेकिन अभी हम ढ़ाई किलोमीटर ही चढ़े थे...साढ़े ग्यारह किलोमीटर की चढ़ाई अभी बाकी थी...आपको बता दूं कि केदारनाथ भगवान का मंदिर सुमेरू पर्वत पर बर्फ से ढ़के पहाड़ों के बीच स्थित है। चारों तरफ के पहाड़ बर्फ की सफेद चादर से ढ़के रहते हैं जो केदारनाथ धाम के सौंदर्य को दोगुना कर देते हैं।
हम बिना रूके चले जा रहे थे...अभी हम चार किलोमीटर ही चढ़े थे कि तेज बरसात शुरू हो गयी...दरअसल पहाड़ों में मौसम का मिजाज कब बदल जाए कह नहीं सकते...पहाड़ी के नीचे चार लकड़ियों के सहारे खड़ी पौलीथीन की छतनुमा एक दुकान से हमने दो बरसाती खरीद ली...ताकि बरसात में भीग न जाएं...लेकिन 25-25 रूपए की इस कागज से भी पतली बरसाती कितनी देर बरसात का सामना कर पाती...ये बरसाती देखकर ही समझ में आ गयी थी...बहरहाल दूसरा कोई रास्ता नहीं था...लिहाजा हमने बरसाती पहनी औऱ चल पढ़े आगे...रास्ते में रंग बिरंगी बरसाती पहने श्रद्धालुओँ का जोश बरसात में भी कम नहीं हुआ था...श्रद्धालु भोले बाबा के जयकारे लगाते आगे बढ़ रहे थे। रास्ते में ऐसी ही कई दुकानों में कोई चाय बेच रहा था तो कोई मैगी...खाने के लिए दाल चावल औऱ पराठे भी रास्ते में उपलब्ध थे...ठंड के बीच कढ़ाई में तलते पकौड़े हर किसी को ललचा रहे थे।
यहां एक चीज बताना चाहूंगा...यहां पर आपको चाय पीनी है तो एक चाय के लिए आपको 15 रूपए चुकाने होंगे...इसी तरह एक मैगी के लिए आपको 35 से 40 रूपए और एक पराठे के लिए भी 25 से 30 रूपए चुकाने होंगे...जबकि एक प्लेट पकौड़े के लिए आपको 30 से 40 रूपए देने होंगे...और जैसे जैसे आप ऊपर चढ़ेंगे इनकी कीमत भी बढ़ती जाएगी...इसके पीछे दुकानदारों का तर्क है कि उन्हें सामान ऊपर ले जाने के लिए खच्चर वाले को 300 से 400 रूपए चुकाने होते हैं...ऐसे में इसका पैसा दुकानदार वहां आने वाले श्रद्धालुओं से वसूलते हैं। बहरहाल हमारा सफर जारी था...हम धीरे धीरे बूंदा बांदी के बीच आगे बढ़ रहे थे...अचनाक बरसात तेज हो गयी...ऐसे में करीब 8 किलोमीटर की चढ़ाई अभी बाकी थी...रास्ता कठिन था औऱ अंधेरा होने से पहले पहुंचना भी था...लिहाजा हमने एक खच्चर वाले को रोककर केदारनाथ तक खच्चर में ले जाने के पैसे पहुंचे...छह माह के लिए केदारनाथ के कपाट खुलते हैं...ऐसे में ये 6 माह इन खच्चर वालों के लिए पैसा कमाने का बढ़िया जरिया होता है...इसलिए जैसे श्रद्धालु मिलते हैं उससे वैसे ही पैसे की डिमांड करते हैं...बरसात हो रही थी...ऐसे में ये मौका खच्चर वाले कहां चूकने वाले थे...हमसे भी एक खच्चर के 900 रूपए मांग लिए...हमने तकाजा किया तो मामला 800 रूपए में तय हो गया...हमने 3200 रूपए में चार खच्चर कर लिए। यहां के खच्चर बरसात हो या बर्फबारी कपाट बंद होने तक यानि छह महीने तक बिना रूके चलते हैं...इसके बदले इनको खुराक भी बढ़िया मिलती है...औऱ एक दिन में करीब 500 से 800 रूपए की खुराक चट कर जाते हैं...औऱ इनको दिया जाता है इनका मनपसंद गुड़ औऱ चना। हम खच्चर पर सवार थे...बरसात हो रही थी...औऱ कहीं कहीं खच्चर के अगले पैर फिसलन खा रहे थे...ऐसे में मन ही मन डर भी लग रहा था कहीं खच्चर नीचे न गिरा दें...इसी डर के साथ आस पास के हरे भरे नजारों...औऱ सामने दिखाई दे रहे सफेद हिमालय को देखते हुए हम आगे बढ़े जा रहे थे....एक तरफ नीचे मंदाकिनी नदी भी बह रही थी...लेकिन हम इतनी चढ़ाई पर पहुंच चुके थे कि अब नदी नजर नहीं आ रही थी...बस बीच बीच में बह रहे पानी की आवाज़ कानों से टकरा जाती थी।

इसी बीच हमने अपनी आधी यात्रा पूरी कर ली थी...औऱ हम सात किलोमीटर की चढ़ाई कर पहुंच चुके थे रामबाड़ा....रामबाड़ा गौरीकुंड औऱ केदारनाथ की 14 किलोमीटर की यात्रा के बीच का पड़ाव है...यहां पर श्रद्धालु अपनी थकान मिटाने के साथ ही पेट पूजा भी करते हैं तो खच्चरों को उनकी मनपसंद खुराक गुड़ चना खिलाया जाता है। रामबाड़ा में हमने भी चाय औऱ मैगी खायी...चार चाय औऱ मैगी के लिए हमें 200 रूपए चुकाने पड़े। रामबाड़ा से खच्चर पर बैठकर आगे की यात्रा शुरू हुई...अभी सात किलोमीटर का सफर बाकी था...और मौसम औऱ ज्यादा खराब होने लगा था...करीब दो किलोमीटर औऱ चढ़े होंगे कि अचानक बरसात बर्फबारी में बदल गयी...बर्फबारी शुरू हुई तो मानो मन की मुराद पूरी हो गयी...बर्फबारी के बीच हम आगे बढ़ते जा रहे थे...जैसे जैसे हम आगे बढ़ रहे थे...बर्फबारी तेज होते जा रही थी...केदारनाथ अभी 3 किलोमीटर बाकी थी...औऱ बर्फबारी के साथ ही तेज हवाएं चलने लगी...ऐसे में जो बर्फबारी शुरु में रोमांचित कर रही थी...वही बर्फबारी अब आफत लगने लगी थी...पूरा रास्ता बर्फ से पट गया था...चारों तरफ के पहाड़ बर्फ की सफेद चादर से पूरी तरह ढ़क गए थे...चारों तरफ का नजारा रोमांचित कर रहा था...लेकिन ठंडक भी बढ़ती जा रही थी। बर्फबारी के बीच बर्फ से भरे रास्ते से होकर आखिर हम केदारनाथ पहुंच गये...कपाट अगले दिन खुलने थे...लिहाजा श्रद्धालु इस मौके को नहीं चूकना चाहते थे...हर कोई इसका गवाह बनना चाहता था...लिहाजा केदारनाथ में श्रद्धालुओं का हुजुम पहुंच चुका था...औऱ गौरीकुंड से श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला जारी था।

केदारनाथ पूरी तरह से बर्फ से ढ़क चुका था...लेकिन बर्फबारी रूकने का नाम नहीं ले रही थी...बर्फबारी से केदारनाथ में ऑक्सीजन की कमी महसूस होने लगी...ऐसे में जो लोग कमजोर थे...उनके लिए ये मुश्किल भरा समय था...कुछ ही देर में पता चला कि यही एक श्रद्धालु की मौत की वजह बन गयी..ताज्जुब उस वक्त हुआ जब पता चला कि केदारनाथ में श्रद्धालु को स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिल पायी...जिसके चलते आखिर में उसने दम तोड़ दिया...ऐसा नहीं है कि केदारनाथ में स्वास्थ्य सुविधा नहीं है...स्वास्थ्य सुविधा के लिए यहां पर एक अस्पताल भी है...लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यहां रोज पहुंचने वाले हजारों श्रद्धालुओं के लिए अस्पताल में सिर्फ एक डॉक्टर...एक फार्मसिस्ट और दो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हैं। ऐसे में श्रद्धालुओं को कितनी बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल पाती होंगी...इसका अंदाजा लगाया जा सकता है...औऱ यही शायद उस श्रद्धालु की मौत की वजह भी बना...जिसका अभी हम जिक्र कर रहे थे। हम भी क्या कर सकते थे...अंधेरा घिर आया था...औऱ बर्फबारी रूकने का नाम नहीं ले रही था...लिहाजा हम भी एक लॉज में पहुंच गए। वहां पता चला कि केदारनाथ में बिजली नहीं है...औऱ न ही पानी की व्यवस्था...और इस सब में करीब दस दिन औऱ लगने की बात कही गयी थी। क्या करते मोमबत्ती जलाकर कमरे में बैठे थे...कि बाहर श्रद्धालुओं का शोर सुनाई दे रहा था...दरअसल श्रद्धालुओं को रहने के लिए जगह नहीं मिल पा रही थी....मंदिर समिति के लोग पता नहीं कहां गायब हो गए थे...आपको बता दूं कि बद्रीनाथ औऱ केदारनाथ धाम का सारा जिम्मा श्री बद्री केदार मंदिर समिति देखती है...औऱ करोड़ों रूपए का चढ़ावा भी समिति के पास ही जाता है...लेकिन जब श्रद्धालुओं के लिए व्यवस्थाओं औऱ सुविधाओं की बात आती है तो मंदिर समिति सब कुछ शासन प्रशासन के जिम्मे डाल देती है। ऐसा ही कुछ वहां पर भी हुआ...केदारनाथ धाम की यात्रा शुरू हो गयी थी...लेकिन केदारनाथ में न तो बिजली की व्यवस्था थी...औऱ न ही पानी की...ये तो छोडिए भारी बर्फबारी के बीच श्रद्धालुओं के रहने के लिए तक कोई व्यवस्था नहीं थी...सुबह पता चला कि पूरी रात कई श्रद्धालुओं ने बर्फबारी के बीच मंदिर प्रांगण में गुजारी...अब ये रात उन्होंने कैसी गुजारी होगी...ये सोच कर भी बदन में एक सिहरन सी उठती है। सवा सात बजे मंदिर के कपाट खुलने थे...बर्फबारी थम चुकी थी औऱ हिमालय की चोटियां सुनहरी चमक बिखेर रही थी...ये नजारा मंत्रमुग्ध करने वाला था। कपाट खुलने का समय नजदीक आ रहा था...लिहाजा मंदिर में श्रद्धालुओं की लंबी कतार लग चुकी थी...हर किसो को बस केदारनाथ भगवान के कपाट खुलने का इंतजार था।
ठीक साढे सात बजे वैदिक मंत्रोचारण के बीच पूरे विधि विधान से सेना के बैंड बाजे की धुनों के बीच मंदिर के कपाट खुले तो वहां का नजारा मन को मोह लेने वाला था...चारों तरफ का वातावरण भोले की जयकारों से गुंजायमान हो रहा था। भोले के दर्शन कर जब मंदिर से बाहर निकले तो एक बार फिर से बर्फबारी शुरू हो चुकी थी...बर्फबारी मानो केदारनाथ भगवान के कपाट खुलने के लिए ही रूकी हो। बाहर पता चला कि रात को ठंड से तीन और लोगों की मौत हो गयी थी...और कई श्रद्धालु ऑक्सीजन की कमी के चलते गंभीर हालत में थे...एक महिला हमारे सामने ही गंभीर स्थिति में थी...हमने केदारनाथ भगवान के दर्शन तो कर लिए थे...लेकिन धरती के भगवान यानि डॉक्टर को जब तलाशा तो उनके दर्शन हमें नहीं हुए। बर्फबारी तेज हो रही थी...और श्रद्धालुओं की दिक्कत बढ़ती जा रही थी...लेकिन धरती के भगवान का कोई पता नहीं था...वो तो मानो अंतर्रधान होने की कसम खाएं बैठे हों...मंदिर समिति के लोगों से बात कि तो वे पूजा औऱ चढ़ावे की रसीद काटने में ही व्यस्त दिखाई दिए। काफी देर हो गयी थी...लेकिन डॉक्टर का कोई पता नहीं था...कुछ देर बाद देखा तो डॉक्टर साहब दिखाई दे दिए...लेकिन एक डॉक्टर कितने श्रद्धालुओं का ईलाज करता...जैसे तैसे उस श्रद्धालु को डॉक्टर ने ऑक्सीजन देकर राहत देने का प्रयास किया। लेकिन ऐसे श्रद्धालुओं की तादाद बढ़ती जा रही थी...लिहाजा डॉक्टर साहब श्रद्धालुओं को तुरंत वापस जाने की सलाह देते दिखाई दिए। हमने व्यवस्थाओं औऱ मेडिकल सुविधाओं को लेकर मंदिर समिति से फिर बात करने की कोशिश की तो वे सारा ठीकरा शासन प्रशासन के सिर फोड़ते हुए अपनी जिम्मेदारी से बचते नजर आए। अव्यवस्थाओं के चलते श्रद्धालु गुस्से से भरे हुए थे...लेकिन किसी को उनकी कोई फिक्र नहीं थी। दोपहर के करीब दो बज गए थे...बर्फबारी जारी थी...हम चल दिए दो किलोमीटर ऊपर पहाड़ी पर स्थित भैरव बाबा के दर्शन करने...कहते हैं बाबा भैरव के दर्शन किए बिना बाबा केदारनाथ की यात्रा अधूरी मानी जाती है...बाबा भैरव तक पहुंचने के लिए खड़ी पहाड़ी पर दो किलोमीटर पतले रास्ते पर पैदल चढ़ना पड़ता है। रास्ता कठिन था औऱ पहाड बर्फ से ढ़का हुआ था...बर्फ से होते हुए हम आखिर बाबा भैरव के दरबार में पहुंच गए...वहां से केदारनाथ का नजारा गज़ब का था...बर्फ से ढके मंदिर और घरों को देखर ऐसा लग रहा था जैसे कोई पेंटिंग हो।
बाबा भैरवनाथ के दर्शन कर हम चल पड़े वापस। शाम के करीब 4 बज गए थे...मौसम लगातार बिगड़ता जा रहा था...ऐसे में हमने वापस जाने का फैसला लिया...और चल पड़े गौरीकुंड को। रास्ता पूरी तरह बर्फ से ढ़का था...हम धीरे धीरे नीचे उतरने लगे...रामबाड़ा पहुंचते पहुंचते अंधेरा घिरने लगा था...रास्ते में रोशनी की कोई व्यवस्था नहीं थी...रास्ते के किनारे बिजली के पोल तो लगे थे...लेकिन बिजली का कोई पता नहीं था...अंधेरे में नीचे उतरना किसी खतरे से कम नहीं था...लेकिन जैसे तैसे हम रात करीब 9 बजे गौरीकुंड पहुंच ही गए। रात हमने गौरीकुंड में ही गुजारने का फैसला लिया। सुबह उठे तो खबर मिली की रात को दो औऱ श्रद्धालुओं की बर्फबारी के चलते मौत हो गयी...जिसमें से एक महिला की तो रास्ते में स्वास्थ्य खराब होने से मौत हुई...शायद रास्ते में स्वास्थ्य सुविधाएं होती तो उस महिला का जान बचायी जी सकती थी...लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं के हाल वहां पर कैसे हैं...ये आपको बता ही चुका हूं। खबर मिली कि दोपहर में कलेक्टर साहब पहुंचने वाले हैं...अब संडे का दिन था....कलेक्टर साहब ठहरे पता नहीं कब तक पहुंचते लिहाजा हमने इंतजार करने की बजाए देहरादून को रवाना होने का फैसला लिया...औऱ चल दिए देहरादून की ओर। हम श्रीनगर पहुंच चुके थे...तभी खबर मिली की कलेक्टर ने गौरीकुंड से केदारनाथ की यात्रा पर मौसम खराब होने के चलते रोक लगा दी है। कलेक्टर साहब ने यात्रा पर रोक तो लगा दी...लेकिन ये फैसले समय से ले लिया होता तो शायद 6 लोगों की जान नहीं जाती। केदारनाथ धाम में हर साल करोड़ों रूपए का चढ़ावा आता है...उसके बाद भी मंदिर में अव्यवस्थाएं पसरी नजर आयी...हम बात कर रहे थे कि जिन श्रद्धालुओं की केदारनाथ में मौत हुई थी...क्या वाकई में उनकी जान नहीं बच सकती थी। सवाल अभी भी खड़ा है...लेकिन जवाब शासन प्रशासन के किसी भी अधिकारी के पास नहीं है...वे मौसम को दोष देते हुए अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं। कपाट खुलने के पहले करीब 6 महीने का वक्त इनके पास था...तो ये क्या कर रहे थे...क्यों नहीं वहां पर बिजली...पानी...स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ ही श्रद्धालुओं के रहने के लिए इंतजामात किए गए। इसका जवाब सामने हैं...लेकिन जिम्मेदार लोगों के पास इसका जवाब शायद ही हो...इन्हें क्या मतलब किसी की जान जाए तो जाए...इनमें इनका कोई अपना नहीं है ना...ये क्या जानें किसी अपने को खोने का गम। केदारनाथ जाने का मौका मुझे तीन साल पहले भी मिला था...उस वक्त में अप्रेल की बजाए शायद जून के महीने में गया था...लेकिन तब भी हालात जुदा नहीं थे...बस फर्क इतना था कि उस समय बर्फबारी नहीं हो रही थी...लेकिन अव्यवस्थाएं तब भी पसरी पड़ी थी...यानि हालात में तीन साल बाद भी कोई सुधार नहीं आया है। इस बार की यात्रा का अनुभव आपके सामने हैं...कहते हैं न कि उम्मीद पर दुनिया कायम है...हमें भी यही उम्मीद है कि शायद अगली बार जब केदार बाबा का बुलावा आए तब स्थिति में कुछ सुधार देखने को मिलेगा...और केदारनाथ में इस बार जैसी अव्यवस्थाओं से देशभर से पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को कम से कम न जूझना पड़े...लेकिन सवाल वही है कि आखिर कब जागेंगे जिम्मेदार अधिकारी...कब जागेगी उत्तराखंड की सरकार।










दीपक तिवारी

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

फिर जरूरी हुए खंडूरी !


फिर जरूरी हुए खंडूरी !

खंडूरी हैं जरूरी के नारे से भाजपा ने विधानसभा चुनाव लड़ा...लेकिन कोटद्वार जहां से खंडूरी खुद मैदान में थे...वहां के लोगों ने खंडूरी को जरूरी नहीं समझा...और दिखा दिया भाजपा को आईना...लेकिन उम्मीदों के विपरीत प्रदेश में 31 सीटें जीतने वाली भाजपा का चेहरा खंडूरी भले ही चुनाव हार गए...लेकिन भाजपा को अभी भी उम्मीद है कि शायद खंडूरी के सहारे एक बार फिर से उसकी नैया पार लग जाएगी। कांग्रेस ने किसी विधायक की बजाए सांसद विजय बहुगुणा को सीएम की कुर्सी सौंपी...ऐसे में बहुगुणा को न सिर्फ विधायकी का उपचुनाव लड़ना है बलकि विजय भी होना है...तभी वे मुख्यमंत्री रह पाएंगे और प्रदेश में कायम रह पाएगी कांग्रेस की सरकार। कांग्रेस में चल रही गुटबाजी और भीतरघात से बहुगुणा के लिए उपचुनाव किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है...औऱ ये बात भाजपा भी अच्छी तरह जानती है...ऐसे में 31 सीटें के साथ कांग्रेस से एक कदम पीछे भाजपा इस जुगत में लगी है...और इस मौके को छक्के में बदलने की पूरी तैयारी में है। खंडूरी कोटद्वार से अप्रत्याशित तरीके से जब चुनाव हारे तो हर कोई हैरान था...खंडूरी के साथ ही भाजपा ने भी इस नतीजे के बारे में शायद सपने में भी नहीं सोचा होगा...और यही सीट आखिरी में निर्णायक साबित हुई और कांग्रेस भाजपा से एक सीट की बढत पर रही। खंडूरी की हार के बाद से प्रदेश में खंडूरी के प्रति एक साहनुभूति की लहर देखी गयी...और भाजपा इसका पूरा फायदा उठाने की फिराक में नजर आ रही है। खबर है कि बहुगुणा कहीं से भी उपचुनाव लड़े...भाजपा बहुगुणा के खिलाफ खंडूरी को मैदान में उतारने की तैयारी में है...औऱ आलाकमान ने खंडूरी को साफ भी कर दिया है कि उपचुनाव के मैदान में जंग उन्हें ही लड़नी है। हालांकि इस सवाल को लेकर पहले दिन से ही तल्ख तेवर दिखाने वाले खंडूरी भी अब ये कहने से गुरेज नहीं कर रहे है कि आलाकमान का जो भी निर्देश होगा उसका पालन करेंगे। बहुगुणा को कुर्सी तो मिल गयी...लेकिन बहुगुणा ये अच्छी तरह जानते हैं कि कुर्सी को संभाले रखना है तो उपचुनाव हर हाल में जीतना ही होगा...ऐसे में बहुगुणा भी फूंक फूंक कर कदम रख रहे हैं...और उपचुनाव कहां से लड़ना है...कैसे लड़ना है ताकि विजय हासिल हो...इसके लिए पूरा होमवर्क किया जा रहा है। ये बात तो बहुगुणा भी अच्छी तरह से जानते हैं कि अगर जल्दबाजी कर दी...तो कुर्सी तो जाएगी ही इज्जत का फालूदा होगा वो अलग। इसलिए उपचुनाव के हर सवाल को समय पर टाल जाते हैं। बहरहाल विधासभा चुनाव में कांग्रेस से एक कदम पीछे रह गयी भाजपा को अभी भी सत्ता की चाबी मिलने का पूरा भरोसा है...औऱ एक बार फिर से भरोसा है कि खंडूरी ही ये चाबी कांग्रेस के गढ़ में सेंध लगाकर हासिल कर सकते हैं...यानि कि एक बार फिर से जरूरी हैं खंडूरी...लेकिन एक बार फिर से वही सवाल उठ खड़ा हुआ है जो विधानसभा चुनाव से पहले सबके सामने था...क्या वकाई में जरूरी है खंडूरी...कोटद्वार की जनता ने तो सबको जवाब दे दिया था...लेकिन अब अगर खंडूरी मैदान में उतरते हैं...तो इसका जवाब क्या होगा...इसका इंतजार सभी को है।   

दीपक तिवारी

सोमवार, 23 अप्रैल 2012

राजनीति के विभीषण


राजनीति के विभीषण

विभीषण के नाम से तो आप सभी वाकिफ ही होंगे...सीता को रावण जब उठा कर ले गया था तो सीता की तलाश में जब हनुमान लंका में पहुंचे थे तो वे विभीषण ही थे जिन्होंने रावण की ताकत औऱ कमजोरियां को भगवान राम के सामने उजागर किया था...जो रावण के अंत की वजह बना था। इसी तरह कुछ विभीषण हर जगह होते हैं...लेकिन हम बात कर रहे हैं उत्तराखंड में राजनीति के विभीषणों की...दरअसल उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव के दौरान राज्य के दोनों प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस में भी सैंकडों ऐसे ही विभीषण थे जिन्होंने अपनी नेता भक्ति के लिए अपनी ही पार्टी का बेड़ा गर्क करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अब चुनाव का परिणाम आए हुए करीब डेढ़ महीने का वक्त गुज़र चुका है...राज्य में कांग्रेस की सरकार बन गयी है...तो दोनों ही पार्टियों भाजपा औऱ कांग्रेस ने ऐसे विभीषणों की पहचान कर उनको किनारे करने का काम शुरू कर दिया है। ये ऐसे विभीषण थे जिन्होंने चुनाव के दौरान अपनी अपनी पार्टी भक्ति को किनारे कर नेता भक्ति पर ज्यादा मेहनत की...कुछ अपने पसंदीदा नेता को विधायकी का टिकट न मिलने से नाराज़ थे तो कुछ खुद को टिकट न मिला तो बन गए विभीषण...इसका खामियाजा अधिकतर जगह उन नेताओं औऱ कार्यकर्ताओं ने भी भुगता औऱ सबसे ज्यादा भुगता उनकी पार्टी ने भी...क्योकि इन विभीषणों के चलते दोनों ही पार्टियों के करीब करीब आधा दर्जन से ज्यादा प्रत्याशियों को कहीं बहुत कं अतंर से तो कहीं पर बुरी हार का मुंह देखना पड़ा...ये हाल राज्य की दोनों की प्रमुख दल भाजपा औऱ कांग्रेस में लगभग एक जैसे ही थे। ऐसे में दोनों ही पार्टियों ने अब इन विभीषणों की पहचान का काम शुरू कर दिया है...भाजपा ने इस काम में बकायदा एक पूरी टीम लगा रखी है...जो विभीषणों को पहचानने के लिए तीसरी आंख का काम कर रही है। पहले चरण में तो भाजपा ने चार जिलों को पूरी कार्यकारिणी को ही भंग कर दिया है...जबकि भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का सवाल रही कोटद्वार सीट से खंडूरी के हारने पर भाजपा से कोटद्वार के ही अपने नेता औऱ पूर्व विधायक शैलेन्द्र रावत को नोटिस थमा दिया है...वहीं कांग्रेस ने भी चुनाव से लेकर सीएम के नाम की घोषणा तक विभीषण बने नेताओं को को अब सबक सिखाना शुरू कर दिया है...लेकिन कांग्रेस की ये कार्रवाई सिर्फ हवा हवाई ही दिखाई दे रही है...विभीषणों के सरदार हरीश रावत पर तो प्रदेश कांग्रेस हाथ डालने से कतराती दिखाई दे रही है जबकि सरदार के सिपहसालारों को जरूर नोटिस जारी कर कार्यकर्ताओं को संदेश देने की कोशिश कांग्रेस कर रही है। बहरहाल विभीषणों की पहचान का ये काम अभी दोनों पार्टियों ने शुरू ही किया है...आगे आगे देखते हैं होता है क्या।


दीपक तिवारी

रविवार, 22 अप्रैल 2012

एमपी नहीं मुख्यमंत्री कहो...



विजय बहुगुणा अब एमपी नहीं है मुख्यमंत्री बन गए हैं...खबरदार जो उनको एमपी बोला...उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार 20 अप्रेल को मुख्यमंत्री आवास पर बहुगुणा का जनता दरबार लगा...लोग अपनी फरियाद लेकर मुख्यमंत्री के पास पहुंचे थे...कुछ लोग ऐसे भी थे...जो बहुगुणा के एमपी रहते हुए की उनकी चिट्ठी लेकर पहुंचे थे...बहुगुणा साहब ने जब वो चिट्ठी देखी तो चुप रहे बिना नहीं रह सके...बोले अब मैं मुख्यमंत्री बन गया हूं...एमपी नहीं रहा।
बेशक कांग्रेस में चली सीएम की कुर्सी की जंग में बहुगुणा की विजय हुई...लेकिन एमपी साहब शायद ये भूल गए कि अभी तो विधायकी का चुनाव लड़ना है...और जैसे हालात प्रदेश कांग्रेस में है...उससे तो लगता नहीं कि बहुगुणा साहब आसानी से इस अग्निपरीक्षा को पास कर पाएंगे। बहरहाल हम बात कर रहे थे बहुगुणा के पहले जनता दरबार की...ये तो जनता दरबार का सिर्फ एक किस्सा था...मुख्यमंत्री का जनता दरबार था...वो भी प्रदेश के नए नए सीएम का तो लोगों को भी बड़ी उम्मीदें थी...हर कोई जनता दरबार में अपनी अर्जी इस उम्मीद से लेकर आया था कि शायद सीएम साहब उनकी तकलीफें कुछ कम करेंगे...लेकिन जनता दरबार में जनता को दो घंटे इंतजार कराने के बाद जब बहुगुणा पहुंचे तो बड़ी जल्दी में दिखाई दिए...मानो जनता दरबार बुलाकर सीएम साहब ने कोई बड़ी गलती कर दी हो।
कुछ जरूरतमंद नौकरी की आस में पहुंचे थे...तो कुछ आर्थिक सहायता की उम्मीद लेकर...लेकिन कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ का नारा देने वाले पार्टी से आने वाले बहुगुणा के पास न तो जरूरतमंदों के लिए नौकरी थी औऱ न ही आर्थिक सहायता देने के लिए कोई बजट। ये बात शायद आपको हज़म न हो लेकिन ये सौ प्रतिशत सच है...पौड़ी का रहने वाला रमेश सेलाकुइ में एक फैक्ट्री में काम के दौरान अपना एक हाथ गंवा बैठा था...जनता दरबार में बड़ी आस के साथ पहुंचे रमेश ने जब बहुगुणा को नौकरी की अर्जी दी तो बहुगुणा ने बिना उसका दर्द समझे...बिना उसकी परेशानी समझे दरखास्त लौटा दी...अरे बहुगुणा साहब नहीं देते नौकरी न सही...कम से कम उस गरीब का दर्द तो बांट लेते...वह तो आपको अपना मुख्यमंत्री समझ कर ही जनता दरबार में पहुंचा था...लेकिन आप अब एमपी नहीं रहे न...अब तो आप सीएम बन गए हैं...सीएम...अब आपको क्या मतलब किसी के दर्द से। लालढांग से आए एक औऱ शख्स की आर्थिक सहायता की अर्जी पर बहुगुणा साहब कहने से नहीं हिचकिचाए...इतना ही मिल सकता है...ज्यादा बज़ट नहीं होता हमारे पास...हां विधायकों के वेतन भत्ते बढ़ाने की बात जब आती है...तब बजट की कमी नहीं होती सरकार के पास...नहीं है तो बस जरूरतमंदों की सहायता के लिए बजट।
कुछ इसी तरह बहुगुणा साहब ने आधे घंटे में करीब डेढ़ सौ फरियादियों को निपटा दिया...यानि कि समय 30 मिनट औऱ फरियादी 150...एक फरियादी को दिए 12 सेकेंड...माना आपका वक्त कीमती है...लेकिन कोई 12 किलोमीटर से आया था तो कोई 120 किलोमीटर दूर से...कुछ तो चार सौ से पांच सौ किलोमीटर दूर से पहुंचे थे...लेकिन उन्हें नसीब हुए आपके सिर्फ 12 सेकेंड। किसी की मदद न करते न सही कम से कम इत्मिनान से उनकी समस्या ही सुन लेते शायद उनके चेहरे पर सकून तो देखने को मिलता...लेकिन जिस जल्दी में आप आए औऱ गए...उससे तो हर कोई आपके जनाने के बाद बस यही कहता नजर आया...बहुगुणा साहब सही कहा आपने अब आप एमपी नहीं रहे अब आप वाकई में मुख्यमंत्री बन गए हो। यही तो आप सुनना चाह रहे थे न कि अब मैं मुख्यमंत्री बन गया हूं...आपने तो एहसास भी करा दिया लोगों को...उनकी गलतफहमी दूर कर दी।

deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

लाख टके का सवाल !


लाख टके का सवाल !

कभी कभी अपनों से करीबियां भी भारी पड़ जाती है...जी हां प्रदेश के नए मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के अपनों के साथ तो यही होता दिख रहा है। बहुगुणा को जब मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली थी तो बहुगुणा के करीबी विधायक या कहें उनके अपने विधायक तो खुश थे...आखिर उनके नेता मुख्यमंत्री जो बन गए थे...लेकिन जिन्हें सबसे ज्यादा खुशी हुई थी...वे ही अब परेशान नजर आ रहे हैं...वजह साफ है...बहुगुणा मुख्यमंत्री तो बन गए लेकिन उन्हें विधायकी का चुनाव अभी जीतना बाकी है...यानि बाकी है बहुगुणा की असल अग्निपरीक्षा...लेकिन बहुगुणा के सामने सबसे बड़ा संकट ये है कि आखिर बहुगुणा चुनाव लड़ें तो कहां से...कौन विधायक बहुगुणा के लिए सीट खाली करेगा। खबरें तो यहां तक हैं कि कांग्रेस अपने किसी विधायक से सीट खाली कराने की बजाए भाजपा के किसी विधायक से सीट खाली कराने की फिराक में है...जैसा 2007 में भाजपा ने किया था...औऱ धूमाकोट से कांग्रेस विधायक टीपीएस रावत को लोकसभा सीट का लालच देकर उनसे सीट खाली करवाई थी। अगर कांग्रेस की ये रणनीति सफल होती है तो कांग्रेस भाजपा से अपना बदला भी पूरा कर लेगी। हालांकि ये काम कांग्रेस के लिए बिल्कुल भी आसान नहीं है...लेकिन फिर भी कांग्रेस कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। खबर तो यहां तक है कि कांग्रेस की नजरें सहसपुर विधानसभा सीट पर है...जहां से भाजपा के सहदेव पुंडीर विधायक हैं...औऱ सहदेव पुंडीर बहुगुणा के लिए सीट भी खाली कर सकते हैं। कांग्रेस की ये रणनीति अगर फेल हो जाती है तो फिर लाख टके का सवाल ये है कि आखिर बहुगुणा को कौन सिपहसालार अपने नेता के लिए विधायकी से इस्तीफा देगा। गंगोत्री से विधायक विजयपाल सजवाण, रायपुर से विधायक उमेश शर्मा काउ, प्रतापनगर से विधायक विक्रम सिंह नेगी, नरेन्द्रनगर से विधायक सुबोध उनियाल औऱ टिहरी से निर्दलीय विधायक दिनेश धनै मुख्यमंत्री बहुगुणा के बाहद करीबी माने जाते हैं...और अपने नेता के लिए खाली कर सकते हैं सीट। हालांकि बहुगुणा के पास अभी चुनाव लड़ने के लिए करीब चार महीने का वक्त है...लेकिन बहुगुणा इस इंतजार को जल्द खत्म करना चाहेंगे...इसके लिए बकायदा जोड़ तोड़ शुरू भी हो गयी है...लेकिन लाख टके का सवाल बरकरार है कि आखिर वो चुनाव लड़ेंगे कहां से...कौन करेगा बहुगुणा के लिए सीट खाली। बहुगुणा की निगाहें भी अपनों की तरफ ही है लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद से बहुगुणा अपनों के भी कुछ नहीं कर पाए...अपने मंत्रिमंडल में किसी अपने को जगह नहीं दिला पाए...ऐसे में उनके अपने भी उनसे कहीं न कहीं नाराज़ भी है। बहरहाल भाजपा में सेंध लगाने के साथ ही अपनों को सीट खाली कराने के लिए मनाने की जोड़तोड़ जारी है...देखते हैं कांग्रेस की जोड़तोड़ क्या रंग लाती है...भाजपा के गढ़ में लगेगी सेंध या फिर कांग्रेस के गढ़ में ही होगी जंग...सवाल लाख टके का है...लेकिन जो भी हो जंग तो रोमांचक होने की उम्मीद है।

दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com


मंत्री बनेंगे हरक ?



मंत्री बनेंगे हरक ?

हरक सिंह रावत उत्तराखंड कांग्रेस में एक ऐसा नाम जो नेता प्रतिपक्ष होने के नाते चुनाव से पहले से ही कांग्रेस में मुख्यमंत्री की बड़े दावेदार थे...लेकिन जब मुख्यमंत्री की कुर्सी न मिली तो हरक ने कर दी बगावत...ऐसे में हरक ने ऐलान कर दिया कि मुख्यमंत्री की कुर्सी न मिली न सही...लेकिन वे अब मंत्रीपद भी नहीं लेंगे...लेकिन फिर भी मंत्रीमंडल में एक कुर्सी खाली छोड़ दी गयी कि शायद देर सबेर हरक मान जाएंगे तो उन्हें कैबिनेट मंत्री बना दिया जाएगा...लेकिन हरक नहीं मानें...ऐसे में हरक को डिप्टी सीएम बनाने की चर्चाएं जोर पकड़ने लगी...लेकिन जब आलाकमान ने प्रदेश में डिप्टी सीएम के पद से साफ इंकार कर दिया तो हरक को लेकर फिर असमंजस कि स्थिति बन गयी...कि आखिर हरक को कैसे एडजस्ट किया जाए। दिल्ली में आज के घटनाक्रम से एक बार फिर से हरक सिंह के मंत्री बनने की संभावनाएं प्रबल होने लगी हैं। दरसअल दिल्ली में डेरा डाले बैठे हरक ने मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से आज सुबह उनके दिल्ली स्थित निवास में जाकर मुलाकात की...इस मुलाकात के तुरंत बाद बहुगुणा दस जनपथ पहुंचे...जहां पर उन्होंने सोनिया गांधी से मुलाकात की...जिसके बाद से ही ये चर्चाएं जोर पकडने लगी है कि बहुगुणा मंत्रिमंडल की खाली पड़ी कुर्सी शायद अब हरक सिंह को ही मिलेगी। पहले हरक की बहुगुणा से मुलाकात और फिर बहुगुणा का दस जनपथ पहुंचना ये साफ संकेत दे रहा है कि हरक सिंह को एडजस्ट करने की कवायद तेज हो गयी है...औऱ बहुत जल्द बहुगुणा आलाकमान के आदेश के बाद इसका ऐलान भी कर देंगे कि प्रदेश के 11वें कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत ही होंगे। देर से ही सही हरक सिंह रावत को भी शायद ये एहसास हो गया होगा कि अब जिद पर अड़ने से कुछ नहीं होने वाला...जब हरीश रावत की बगावत उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी न दिला पायी तो कैसे उनकी ये तमन्ना पूरी होती। ऐसे में धारी देवी की कसम खाकर मंत्री पद न लेने का ऐलान करने वाले हरक सिंह रावत को समझ में आ गया होगा कि बिना कुर्सी के पांच साल सेवा करना आसान काम नहीं है...लिहाजा खाली पड़ी मंत्री की कुर्सी ले ही ली जाए...औऱ धारी देवी से कसम तोड़ने की माफी मांग ली जाए। वैसे भी हरक सिंह रावत राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं...इतना तो समझते ही होंगे कि राजनीति में सही समय पर सही फैसला लेने से चूक गये तो बाद में पछतावे के अलावा हाथ कुछ नहीं लगता।

दीपक तिवारी
deepaktiwar555@gmail.com

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

कहीं देर न हो जाए...


कहीं देर न हो जाए...
मंगलवार को दिल्ली में राष्ट्रीय गंगा बेसिन प्राधिकरण की अहम बैठक हुई। बैठक की अध्यक्षता करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि हमारे पास समय कम है औऱ गंगा को बचाने के लिए त्वरित कदम उठाए जाने की जरूरत है...मनमोहन सिंह ने गंगा के संरक्षण को लेकर अपनी चिंता जाहिर करते हुए इस दिशा में तेजी से काम करने की बात भी कही...लेकिन प्रधानमंत्री के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि जब उन्हें गंगा नदी की इतनी ही चिंता थी...तो गंगा की सफाई के लिए 2009 में प्रधानमंत्री की ही अध्यक्षता में गठित गंगा बेसिन की बैठक सिर्फ दो ही बार क्यों हुई...औऱ 17 अप्रेल को भी बैठक इसलिए बुलाई गयी...क्योंकि गंगा की अविरलता के लिए पर्यावरणविद जीडी अग्रवाल ने हरिद्वार में अनशन शुरू कर दिया था...औऱ गंगा की अविरलता के साथ ही गंगा बेसिन की बैठक बुलाए जाने की भी वे मांग कर रहे थे...जब उन्होंने अऩशन नहीं तोड़ा तो तब प्रधानमंत्री ने 23 मार्च को अग्रवाल को आश्वासन दिया था कि 17 अप्रेल को गंगा बेसिन की बैठक बुलाई जाएगी...जिसके बाद ही जीडी ने अपना अनशन समाप्त किया था...यानि कि मंगलवार को हुई इस बैठक में प्रधानमंत्री भले ही गंगा की वर्तमान दशा पर चिंतित दिखाई दे रहे हों...लेकिन इस बैठक की वजह ये बिल्कुल भी नहीं है। 2009 में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में गंगा बेसिन का गठन हुआ तो गंगा भक्तों को उम्मीद जगी थी कि शायद अब गंगा की दुर्दाशा सुधरेगी...लेकिन गंगा बेसिन का गठन खानापूर्ति ही साबित हुआ...तीन सालों में इतने अहम मुद्दे पर सिर्फ दो बार प्रधानमंत्री को गंगा संरक्षण की याद आयी। बहरहाल बात करते हैं बैठक की...बैठक में पांच राज्यों उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्रियों ने शिरकत की...इसके साथ ही गंगा की अविरलता की मांग कर रहे प्रमुख संत भी बैठक में शामिल हुए। बैठक में सबसे अहम मुद्दा उत्तराखंड में गंगा पर बनी बिजली परियोजनाएं थी। गंगा भक्त चाहते हैं कि गंगा पर बनी परियोजनाएं तत्काल बंद कर दी जाएं...जबकि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा करोडों की लागत से निर्मित इन परियोजनाओं को जारी रखने के पक्ष में थे...बैठक में बहुगुणा ने जोरदार तरीके से परियोजनाओं के समर्थन में आवाज़ बुलंद भी की...लेकिन बैठक में मौजूद चार राज्यों के मुख्यमंत्री औऱ संत उनके इस कदम में खिलाफ थे। वहीं पर्यावरणविद जीडी अग्रवाल भी स्वास्थ्य खराब होने की वजह से बैठक में नहीं पहुंचे...ऐसे में बैठक में इस पर कोई फैसला नहीं हो पाया। गंगा की अगर बात करें तो जीवनदायिनी माने जाने वाली गंगा नदी 11 राज्यों की 40 प्रतिशत आबादी को पानी मुहैया कराती है...लेकिन देवी का दर्जा प्राप्त इस नदी में रोजाना 90 करोड़ लीटर दूषित पानी जाता है...जबकि गंगा की सफाई के लिए लगे सीवेज प्लांट रोजाना केवल एक अऱब दस करोड़ लीटर गंदे पानी के शोधन करने की स्थिति में है। गोमुख से गंगासागर तक गंगा लगातार मैली हो रही है...औऱ गंगा की सफाई के लिए ही 2009 में राष्ट्रीय गंगा बेसिन प्राधिकरण का गठन हुआ औऱ इसके गंगा की सफाई पर करोड़ों रूपये खर्च भी कर दिए गये...लेकिन गंगा इन तीन सालों में और ज्यादा मैली हो गयी...ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या सिर्फ गंगा की सफाई के नाम पर प्राधिकरण आदि का गठन करने से गंगा को उसके पुराने स्वरूप में लौटाया जा सकता है...क्या सिर्फ दिल्ली में साल में एक बार बंद कमरे में गंगा संरक्षण पर चिंता जाहिर करते ये काम किया जा सकता है...नहीं न...लेकिन ये बात हमारे प्रधानमंत्री औऱ उन जिम्मेदार लोगों को क्यों नहीं समझ आती जो गंगा की सफाई के इस अभियान से सीधे जुड़े हुए हैं...औऱ जिनके पास संसाधन भी है औऱ इसके लिए पैसों की कोई कमी भी नहीं है...कमी है तो बस ईच्छाशक्ति की। शायद इन लोगों को ये बात समझ भी आ जाए...लेकिन कहीं देर न हो जाए।

दीपक तिवारी
 deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 28 मार्च 2012

लॉयल्टी


लॉयल्टी

ज़माना जरूर बेईमानी का है...लेकिन बेईमाने के धंधे में भी लॉयलटी की ही कदर है...जो लॉयल नहीं है वो किसी काम के नहीं...फिर चाहे धंधा बेईमानी का हो...या फिर...राजनीति। कहते भी हैं कि लॉयल्टी में बड़ी ताकत होती है...अपने काम के प्रति हमेशा लॉयल रहो...जिसके लिए काम कर रहे हो...जिसके साथ काम कर रहे हो उसके लिए हमेशा लॉयल रहो...देर सबेर लॉयल्टी का ईनाम आपको जरूर मिलेगा...लेकिन ज़रा सोचो तब किसी पर क्या गुजरती होगी...जब लॉयल रहने के बाद आपको किनारे कर दिया जाए। आप भी सोच रहे होंगे कि आखिर ये लॉयल्टी का बात आखिर उठी क्यों है...दरअसल उत्तराखंड में चुनाव के नतीजे क्या आए...मानो कांग्रेस के विधायकों औऱ नेताओं ने दिखाना शुरू कर दिया कि वे अपने नेताओं के प्रति कितने लॉयल हैं। सवाल मुख्यमंत्री की कुर्सी का था...लेकिन कुर्सी एक थी औऱ दावेदार कई...ऐसे में दावेदारों में ही जंग छिड़ गयी कि पार्टी के लिए किसने कितनी सेवा की है...पार्टी के लिए कौन कितना लॉयल है। कसर तो किसी ने नहीं छोड़ी थी...चाहे हरीश रावत हों...विजय बहुगुणा हों...सतपाल महाराज हों...हरक सिंह रावत हों...इंदिरा हृद्येश हों या फिर यशपाल आर्य...लेकिन सबको चौंकाते हुए बाजी मार ले गये विजय बहुगुणा...औऱ मिल गयी मुख्यमंत्री की कुर्सी...ऐसे में दूसरे दावेदारों इसे कैसे बर्दाश्त करते...उनके समर्थक विधायकों को मिल गया मौका...अपने पसंदीदा नेता के लॉयल्टी टेस्ट में पास होने का...फिर उन्होंने देर कहां करनी थी...खोल दिया आलाकमान के फैसले के खिलाफ मोर्चा...आखिर ऐसे मौके बार – बार तो आते नहीं...यहां जो दौड़ में पीछे थे...उन्होंने तो आलाकमान के फैसले को ही नियति मान लिया...लेकिन जो दौड़ में आगे रहने के बाद पिछड़ गये थे...उन्होंने हार नहीं मानी औऱ अपना लिए बगावती तेवर। आलाकमान पर फैसला बदलने के लिए खूब जोर डाला...लेकिन जब लगा दाल नहीं गलने वाली तो समझौता का रास्ता तो था ही...कुर्सी न मिली न सही समझौते के बहाने कुछ तो हाथ लगेगा...सीधा मतलब है भागते भूत की लंगोटी ही सही। चुनाव में खंडित जनादेश मिला था...निर्दलीय, यूकेडी पी ऱऔ बसपा विधायकों के समर्थन की बैसाखी से सरकार खडी थी...तो दस जनपथ भी बेबस था...समझौते के बिंदुओं पर लगा दी मुहर। अब समझौते के बहाने हरीश रावत एंड कंपनी को तो मिल गयी सरकार में बड़ी हिस्सेदारी...लेकिन जो बहुगुणा के लॉयल रहे...पार्टी के लॉयल रहे वे रह गये खाली हाथ...यानि कि लॉयल्टी टेस्ट में पास होने के बाद भी उम्मीद के विपरित सौगात तो मिली नहीं दरकिनार कर दिए गये...यानि की लॉयल्टी...राजनीति से मात खा गयी...कहते भी हैं राजनीति में सब चलता है...सब कुछ होता है...या कहें कुछ भी हो सकता है...इसलिए जनाब जब राजनीति के मैदान में हो...तो हर चीज के लिए तैयार रहो...राजनीति में लॉयल्टी से कुछ नहीं होता...होता है तो सही समय पर सही फैसला लेने से...यानि मौका देखो के चौका मारो...यही राजनीति है...औऱ कुर्सी पानी है तो सिर्फ लॉयल्टी से काम नहीं चलने वाला।
दीपक तिवारी

सोमवार, 19 मार्च 2012

बहुगुणा की मुश्किल


टीम बहुगुणा
विजय बहुगुणा ने ऐलान तो कर दिया है कि मंगलवार को वे मंत्रीमंडल का गठन करेंगे...लेकिन कांग्रेस में मचे बवाल के बाद बहुगुणा के लिए ये काम हरगिज आसान नहीं होगा...ऐसे में कौन कौन शामिल होगा बहुगुणा की टीम में इसको लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। सीएम की कुर्सी की लड़ाई के बाद बहुगुणा के लिए ये काम सबसे बडी मुश्किल है...एक तरफ हरीश रावत समर्थक विधायक बगावत का झंडा बुलंद करके बैठे हैं और दूसरी तरफ हरक सिंह रावत की नाराजगी जग जाहिर हो चुकी है तो दोनों खेमों को बहुगुणा कैसे संतुष्ट कर पाएंगे। वहीं निर्दलियों औऱ यूकेडी पी औऱ बसपा की बैसाखियों के सहारे खडी बहुगुणा की सरकार के लिए उन्हें भी मंत्री पद से नवाजना एक मजबूरी है...तीन निर्दलीय, एक यूकेडी पी औऱ 3 बसपा के विधायकों में से अगर चार मंत्रीपद इधर चले जाते हैं तो बहुगुणा के पास सात मंत्री पद बचते हैं जिनमें उन्हें हरीश रावत खेमे को संतुष्ट करने के साथ ही पार्टी के वरिष्ठ विधायकों का भी ख्याल रखना है। ऐसे में मंत्रीमंडल की जो तस्वीर जो फिलहाल जेहन में उभर रही है वो कुछ ऐसी है।
डालते हैं एक नजर बहुगुणा के संभावित मंत्रीमंडल पर...
इंदिरा हृद्येश
अमृता रावत
सुरेन्द्र सिंह नेगी
यशपाल आर्य
प्रीतम सिंह
दिनेश अग्रवाल
दिनेश धनै (निर्दलीय)
हरीश दुर्गापाल (निर्दलीय)
मंत्री प्रसाद नैथानी (निर्दलीय)
प्रीतम सिंह पंवार (यूकेडी पी)
सुरेन्द्र राकेश (बसपा)
वहीं गोविंद कुंजवाल विधानसभा अध्यक्ष बनाए जा सकते हैं।
...ये वे कुछ नाम है जिन्हें सारे समीकरणों के बाद भी बहुगुणा किसी कीमत पर नकारने की स्थिति में नहीं होंगे...लेकिन इसके बाद भी कांग्रेस में मचा बवाल आसानी से शांत होने वाला नहीं है...बहरहाल बुहुगुणा जब अपनी टीम का जब ऐलान करेंगे तो तस्वीर साफ हो जाएगी कि कांग्रेस में थमा तूफान शांत होगा या फिर पार्टी औऱ बहुगुणा के लिए कोई नयी मुसीबत लेकर आएगा।
दीपक तिवारी

बुधवार, 14 मार्च 2012

कुर्सी बडी चीज है


कुर्सी बडी चीज है

बहुगुणा को मुख्यमंत्री की कुर्सी क्या मिली मानो प्रदेश कांग्रेस में भूचाल आ गया...राजनीती में कुर्सी बडी चीज है...ऐसे में कुर्सी की आस लगाए बैठे कांग्रेसियों से मानो उनका सब कुछ छीन लिया गया हो। कुर्सी के सबसे प्रबल दावेदार केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत औऱ उनके समर्थको विधायकों ने कुर्सी हाथ से निकलती देख बगावत कर दी। नतीजन देहरादून में शपथ ग्रहण समारोह में सिर्फ गिनती के ही विधायक पहुंचे...तो सरकार के भविष्य पर भी सवाल उठने लगे...हरीश रावत औऱ उनके समर्थकों के बगावती तेवरों को देख लगने लगा था कि कुर्सी की लडाई कांग्रेस को ले डूबेगी...लेकिन दिल्ली में आज के घटनाक्रम के बाद इसमें विराम लगता दिखाई दे रहा है। हरीश रावत आज संसद के बजट सत्र में नहीं पहुंचे...उनके समर्थक सांसद प्रदीप टम्टा भी संसद से नदारद रहे। माना जा रहा था कि हरीश रावत और उनके समर्थक विधायकों के बगावती तेवर औऱ उग्र हो सकते हैं...लेकिन दिल्ली में मौजूद कांग्रेसी सूत्रों की मानें तो हरीश रावत ने आज अपने सरकारी निवास पर समर्थक विधायकों औऱ सांसद प्रदीप टम्टा के साथ चर्चा के बाद नरम रूख अपनाने का फैसला लिया है। सूत्रों की मानें तो हरीश रावत आलाकमान के सामने शक्ति प्रदर्शन करना चाहते थे कि आलाकमान ने उनको कुर्सी ना सौंप गलत फैसला लिया है...औऱ भविष्य़ में उनको नजरअंदाज किया गया तो कम से कम उत्तराखंड में कांग्रेस के लिए भारी मुश्किलें खडी हो सकती हैं। हरीश रावत का ये भी कहना है कि बहुगुणा को सीएम बनाने से पहले आलाकमान ने उनसे कोई चर्चा नहीं की...जब्कि वे 40 सालों से उत्तराखंड की राजनीति में सक्रिय हैं। बहरहाल हरीश रावत पार्टी को अपनी शक्ति दिखाना चाहते थे...जो उन्होंने दिखा भी दिया...ऐसे में हरीश रावत के तेवर नरम पडने के बाद बहुगुणा के लिए ये जरूर राहत भरी खबर है...वहीं आलाकमान हरीश रावत को कैबिनेट मंत्री का ईनाम देती है या फिर हरीश रावत औऱ उनके समर्थकों को बगावत की सजा...ये तो वक्त ही बताएगा...फिलहाल मुख्यमंत्री बहुगुणा जरूर कह रहे होंगे...थैंक्यू हरीश रावत।

दीपक तिवारी

रेल का सपना


रेल का सपना
रेल बजट से उत्तराखंड वासियों को इस बार बडी उम्मीद थी...कि शायद इस बार बजट में रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी पहाड में रेल चढाने के लिए बजट में जरूर इसे शामिल करेगे...लोगों की ये उम्मीद बेवजह भी नहीं थी...इसके पीछे की एक बडी वजह थी...प्रदेश के पांचों सांसद औऱ सभी के सभी कांग्रेसी...और केन्द्र में सरकार भी कांग्रेस की...लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात...रेल मंत्री ने बजट में उत्तराखंड को दरककिनार कर दिया। हालांकि रेल बजट पेश करने से पहले दिनेश त्रिवेदी का कहना था कि बजट से पहले सभी सांसदों औऱ सभी प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों से सलाह मशवरा किया गया है...ताकि हर राज्य के लिए बजट में कुछ ना कुछ हो...लेकिन बजट पेश होने के बाद साफ हो गया कि रेल मंत्री की बातों में कितना दम था। बजट में उत्तराखंड के उपेक्षित रहने के पीछे बडी वजह प्रदेश के पांचों कांग्रेसी सांसद हरीश रावत, प्रदीप टम्टा, के सी सिंह बाबा, सतपाल महाराज और विजय बहुगुणा भी है...जाहिर है ये पांचों सांसद प्रदेश की जनता का आवाज़ को पुरजोर तरीके से रेल मंत्री के सामने नहीं रख पाए...जिस वजह से छुकछुक गाडी में सफर करना पहाड के लोगों के लिए एक सपने की तरह रह गया। खास बात यह है कि आजादी के बाद से भारतीय़ रेल ने लंबी छलांग लगायी...लेकिन उत्तराखंड में आज़ादी के बाद से एक किमी भी नई रेल लाईन नहीं बिछ पायी...इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड कितना उपेक्षित रहा है। हालांकि कुछ समय पहले रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने गौचर में ऋषिकेश से लेकर कर्णप्रयाग तक की प्रस्तावित रेल लाईन का शिलान्यास किया था...लेकिन ये प्रस्तावित रेल मार्ग जमीन के मसले को लेकर राजनीति की भेंट चढ गया...ऐसा ही कुछ हाल चंपावत – बागेश्वर रेल लाईन का भी हुआ जो सर्वे हो जाने के बाद भी अधर में लटकी हुई है। हालत ये है कि उत्तराखंड में रेल मैदान को छूती हुई ही निकल जाती है...औऱ पहाड के लिए रेल आज भी एक सपना बना हुआ है। जिन मैदानी इलाकों में रेल सेवा है भी वहां के लोग लंबे समय से देश के प्रमुख शहरों के लिए सीधी रेल सेवा की मांग कर रहे हैं...लेकिन उनकी ये आवाज दिल्ली पहुंचने से पहले ही दम तोड देती है। बहरहाल उत्तराखंड में अपनी महत्वकांक्षाओं को पूरा करने को लेकर प्रदेश के सांसद अपनी ही पार्टी के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद करते नहीं थकते...लेकिन प्रदेश के विकास के लिए प्रदेशवासियों के लिए उनके पास समय नहीं है...शायद यही वजह है कि रेल के नक्शे में उत्तराखंड का वजूद ना के बराबर है...औऱ पहाड पर रेल का चलना पहाड के लोगों के लिए किसी सपने से कम नहीं है। उम्मीद करते हैं कि शायद हमारे सांसद दिल्ली में अपनी आवाज प्रदेश की जनता के लिए बुलंद करेंगे ताकि पहाड का विकास हो यहां के लोगों को विकास हो...औऱ अगला रेल बजट उत्तराखंड के लिए खुशियों की सौगात लेकर आये।
दीपक तिवारी

बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

आपदा से कम नहीं सडक हादसे...



बाईक औऱ स्कूटर पर स्टंट करते युवा आपको कहीं ना कहीं जरूर दिख जाएंगे...स्टंट करने में भले ही इन युवाओं को खूब मजा आता हो...लेकिन ये नहीं जानते कि इनका ये मजा ना जाने कब इऩके लिए जीवन भर की सजा बन जाए। बाईक और स्कूटर पर खतरनाक स्टंट करते युवाओँ की टोली आये दिन किसी ना किसी हाईवे पर दिखाई दे जाती है...इन युवाओं को ना तो पुलिस का खौफ होता है...औऱ ना ही मौत का। सडक दुर्घटनाओं में 40 प्रतिशत लोगों की मौत टू व्हीलर औऱ ट्रक की वजह से होती है...जिसमें भी अधिकतर मौत सिर में चोट लगने की वजह से होती हैं...यानि की हेलमेट ना पहनने के कारण भी लाखों लोग हर साल बेमौत मारे जाते हैं। दुनिया भर में हर घंटे तकरीबन 40 लोग सड़क दुर्घटना में मारे जाते हैं जिनकी उम्र 25 साल से कम होती है। भारत में हर साल करीब अस्सी हजार से ज्यादा लोगों की मौत सडक दुर्घटना में होती है...करीब एक करोड से ज्यादा लोग गंभीर रूप से जख्मी होते हैं...और लगभग तीन लाख लोग हमेशा के लिए अपाहिज हो जाते हैं। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाईजेशन के मुताबिक पूरी दुनिया के मुकाबले, भारत सड़क दुर्घटनाओं में अव्वल है...2010 की ही अगर बात करें तो तकरीबन एक लाख 60 हजार लोग सड़क दुर्घटना में मारे गए थे। नेशनल क्राईम रिकार्ड ब्यूरो (एन.सी.आर.बी) की रिपोर्ट के मुताबिक आंध्र प्रदेश सड़क दुर्घटना में 12 प्रतिशत के साथ सबसे बड़ा भागीदार है। आंध्र प्रदेश के बाद दूसरे नंबर पर 11 प्रतिशत के साथ उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र है। दुनिया में भारत सडक दुर्घटनाओं में अव्वल है...भारत में इतनी मौतें शायद किसी बडी आपदा के आने से नहीं होती हैं जितनी मौत सडक दुर्घटनाओं में होती है। देखा जाए तो भारत में सडक दुर्घटनाएं आपदा का रूप ले चुकी हैं...और सडक पर चलते चलते आने वाली ये आपदा कब किसे मौत की नींद सुला दे कोई नहीं जानता। सडक पर आने वाली इस आपदा के शिकार लोगों में टू व्हीलर पर बिना हेलमेट के चलने वाले लोगों की संख्या कहीं ज्यादा है। ऐसा नहीं है कि हम इस आपदा से बच नहीं सकते...हम इस आपदा से बच सकते हैं अगर हम जरा सी सावधानी बरतें...टू व्हीलर चलाते समय हेलमेट पहनें तो काफी हद तक हम इस आपदा में होने वाली मौत के आंकडे को कम कर सकते हैं। आज की भागदौड भरी जिंदगी में जीवन का पहिया तेजी से दौड रहा है...फैसला आपके हाथ में है...कि आपको दौडते रहना है...या फिर किसी दिन अचानक रूक कर बिखर जाना है।

दीपक तिवारी