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गुरुवार, 12 जनवरी 2012

राजनीति


राजनीति 

पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर औऱ गोआ में चुनाव की सरगर्मियां अपने चरम पर हैं...सबकी निगाहें इन चुनाव में हैं। देश की राजनीति में दखल रखने वाले सबसे अहम प्रदेश उत्तर प्रदेश में अपना झंडा बुलंद करने के लिए सभी पार्टियों ने ऐडी चोटी का जोर लगा रखा है। 403 विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में एक बार फिर से महिलाओं के सहारे ही राजनीतिक पार्टियां सत्ता के गलियारों तक पहुंचने का ख्वाब देख रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में सबका सूपडा साफ करने वाली बसपा की कमान जहां एक महिला मायावती के हाथ में है। वहीं भाजपा उमा भारती के सहारे तो कांग्रेस रीता बहुगुणा जोशी के सहारे उत्तर प्रदेश में अपनी खोई जमीन वापस पाने की फिराक में हैं। हालांकि कांग्रेस के लिए राहुल गांधी ने अपनी पूरी ताकत इस चुनाव में झोंक दी है...लेकिन मुख्य भूमिका में कांग्रेस की प्रदेशाध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी ही हैं...दूसरी तरफ भाजपा ने मप्र की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के सहारे उत्तर प्रदेश में अपनी पूरी ताकत लगा दी है। कुल मिलाकर इस चुनाव के जरिए नारी शक्ति एक बार फिर से देश को अपनी ताकत का एहसास कराने को बेताब दिखाई दे रही है। हाल ही में पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों भी हम नहीं नकारा सकते। दोनों ही राज्यों में दबी कुचली व उपेक्षित माने जाने वाली नारी ने एक बार फिर से अपनी शक्ति का एहसास कराया...और अपनी विजयी पताका फहराते हुए राजनीति हल्कों में खलबली मचा दी। पश्चिम बंगाल में जहां 34 सालों से कायम वामपंथी सरकार को जनता ने नकार दिया...वहीं ऐसा ही कुछ तमिलनाडु में भी घटा औऱ करुणानिधी सरकार को भी जनता ने आइना दिखा दिया। पश्चिम बंगाल औऱ तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों में जीतने वाली दोनों पार्टियों तृणमूल कांग्रेस औऱ अन्ना द्रमुक की कमान महिला ममता बनर्जी औऱ जयललिता के हाथ में थी...जनता ने पुरूष की बजाए महिला नेतृत्व पर अपनी मुहर लगायी। जो देश में महिलाओं के लिहाज से एक सकून देने वाली खबर थी...और इससे निश्चित ही महिलाओं में नयी ऊर्जा का संचार भी हुआ है। राजनीति में महिलाओं ने समय समय पर अपनी शक्ति का एहसास सबको कराया है। बात भले ही सोनिया गांधी की करें जब सोनिया ने 20 साल पहले 21 मई 1991 को अपने पति व तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद देर से ही सही कांग्रेस की कमान संभाली और सबके भारी विरोध के बाद भी एक बार फिर से कांग्रेस को स्थयित्व प्रदान किया.....औऱ साबित कर दिया कि महिला की ताकत क्या होती है।
...और यही काम पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने वामपंथी सरकार को परास्त करके दिखा दिया। जिसके बाद ममता ने पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने का गौरव हासिल किया वहीं वह देश में 14वीं महिला मुख्यमंत्री भी बनीं.....वहीं दूसरी तरफ जयललिता ने दूसरी बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।
.....सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन के जरिए जनता में अपनी पैठ बना लेने वाली ममता बनर्जी की सादगी औऱ मेहनत का ही नतीजा था कि जनता ने वाममोर्चा को नकारते हुए ममता की तृणमूल कांग्रेस पर अपना भरोसा जताया...औऱ भारी बहुमत से विजयी बनाया...वहीं दूसरी बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने वाली जयललिता ने भी भ्रष्टाचार के समुद्र में गोते लगा रही द्रमुक सरकार के खिलाफ जनता का विश्वास जीतने में सफल रही।
...पश्चिम बंगाल औऱ तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के नतीजों के जरिए नारी ने भारत ही नहीं समूचे विश्व को अपनी शक्ति का एहसास करा दिया..जो काम इससे पहले दिल्ली में शीला दीक्षित औऱ उत्तर प्रदेश में मायावती कर चुकीं थी। पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु में जनता ने महिला नेतृत्व पर भरोसा दिखाकर राजनीति को अपनी बपौती समझने वाले राजनेताओं को करारा जवाब भी दिया है। एक बार फिर से सबसे बडे प्रदेश उत्तर प्रदेश में चुनावी बिसात बिछ चुकी है...औऱ नारी एक बार फिर से अपनी शक्ति दिखाने को बेताब है।

दीपक तिवारी

शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

किसका विकास...भारत का या इंडिया का


किसका विकास...भारत का या इंडिया का

ठंड को इतने करीब से कभी महसूस नहीं किया था...औऱ वो भी जन्मदिन के दिन...अपने घर नैनीताल जाने कि लिए दिल्ली से देहरादून पहुंचा तो मालूम चला कि काठगोदाम जाने वाली ट्रेन तो चार घंटा लेट है। जनवरी की सर्दी औऱ उस पर इंद्र देव की मेहरबानी...दोनों की जुगलबंदी ने देहरादून कि फिजाओं में बर्फ सी ठंडक घोल दी। घर जाना जरूरी था इसलिए अगले दिन जाने का फैसला मैं नहीं ले पाया। स्टेशन पर ही ट्रेन का इंतजार करने की ठानी...बैठने की जगह तलाशी तो वेटिंग रूम से लेकर प्लेटफार्म की कुर्सियों पर मुसाफिर कब्जा जमा चुके थे। ऐसे में कुछ देर प्लेटफॉर्म पर टहलते हुए कभी चाय की चुस्कियों के सहारे तो कभी गरीबों के काजू मूंगफली खाकर समय काटने का प्रयास किया। लेकिन कहते हैं ना कि इंतजार से बुरी कोई चीज ही नहीं वो भी ट्रेन का इंतजार भगवान ही बचाए...लेकिन मरता क्या न करता मजबूरी थी। टहलते  टहलते नजर प्लेटफॉर्म पर खाली हुई कुर्सी पर पडी तो तपाक से जाकर बैठ गया। ठंड से पहले भी सामना हुआ था...लेकिन इस तरह ठंड का सामना पहली बार हो रहा था। एक कंबल साथ में था तो उसे ओढकर बैठ गया...मेरे पास तो कम से कम ठंड से बचने के ले कंबल था उनी कपडे पहने हुए थे। लेकिन जनवरी की इस सर्द रात में हो रही बरसात के बीच प्लेटफार्म में मैंने कुछ ऐसे लोग भी देखे...ज्यादातर मजदूर किस्म के थे...जो सिर्फ एक पतली सी चादर में...औऱ कुछ तो सिर्फ फटी हुई स्वेटर में सिकुड कर सोने की कोशिश कर रहे थे...लेकिन मसूरी से आ रही बर्फीली हवाएं उन्हें कहां सोने देती...पहली बार तब मुझे एहसास हुआ कि हांड कंपाने वाली सर्दी क्या होती है...जिस सर्दी में हम लोग घरों में रजाईयों के अंदर दुबके होते हैं...ब्लोअर चलाकर आराम की नींद ले रहे होते हैं...ऐसे में फुटपाथ में सोने वाले गरीबों के लिए सर्द रात का एक एक पल गुजरना कितना भारी होता है। ऐसा नहीं है कि ये हाल सिर्फ किसी एक जगह का है...ये आपने भी शायद कई बार महसूस किया होगा...अपनी आंखों से देखा होगा...मेरे लिए भी ये चीज कोई नयी नहीं थी...लेकिन मुझे इसका असल एहसास तब हुआ जब सर्द रात का सामना मुझे करना पडा। हांड कंपाने वाली सर्दी में मेरे चार घंटे तो किसी तरह कट गये...लेकिन जिनके पास पहनने के लिए गर्म कपडे औऱ ओढने के लिए कंबल नहीं है...कैसे उनके लिए रात का हर एक पल रहता होगा...ये मुझे लगातार कचोटता रहा। एक औऱ सवाल इसके साथ ही परेशान करता रहा कि किस झूठी शान में हम लोग जिए जा रहे हैं...एक तरफ तो हम तरक्की की बात कर रहे हैं...वहीं दूसरी तरफ हमारे देश के 40 करोड से ज्यादा लोग गरीबी रेखा के नीचे रह रहे हैं...जिनके ना खाने का पता है ना रहने का...जीवन स्तर तो दूर की बात है। सरकार भले ही देश में गरीबों के पर्सेंट में कमी होने का दावा कर रही हो...लेकिन गरीबों की संख्या कम होनी की बजाए बढी है। इसकी एक वजह यह भी है कि गांवों से लोग शहरों की तरफ भाग रहे हैं...जिससे शहरी आबादी बढी तो है...लेकिन लोगों की आय नहीं बढी...औऱ इनमें लाखों ऐसे परिवार हैं जिन्हें दो जून की रोटी तक मयस्सर नहीं होती...औऱ ऐसे ही लोग रोज कमा कर खाते हैं...औऱ इसी तरह हांड कंपाने वाली सर्दी हो या झुलसा देने वाली गर्मी फुटपाथ या रेलवे स्टेशन पर इसी तरह अपनी जिंदगी गुजार देते हैं। हम भले ही कितनी तरक्की कर लें...विकासशील से विकसित देश हो जाएं...दुनिया हमारा लोहा माने...लेकिन उसकी असली खुशी तभी है...जब पंक्ति के आखिर में खडे लोगों का भी विकास हों...औऱ इस तरक्की का फायदा उनको मिले...वर्ना ये सब बेमानी है। उम्मीद करते हैं कि तरक्की भारत की हो हर भारतवासी की हो न कि इंडिया औऱ उसमें रहने वाले इंडियन की।

दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com

किसका विकास...भारत का या इंडिया का


किसका विकास...भारत का या इंडिया का

ठंड को इतने करीब से कभी महसूस नहीं किया था...औऱ वो भी जन्मदिन के दिन...अपने घर नैनीताल जाने कि लिए दिल्ली से देहरादून पहुंचा तो मालूम चला कि काठगोदाम जाने वाली ट्रेन तो चार घंटा लेट है। जनवरी की सर्दी औऱ उस पर इंद्र देव की मेहरबानी...दोनों की जुगलबंदी ने देहरादून कि फिजाओं में बर्फ सी ठंडक घोल दी। घर जाना जरूरी था इसलिए अगले दिन जाने का फैसला मैं नहीं ले पाया। स्टेशन पर ही ट्रेन का इंतजार करने की ठानी...बैठने की जगह तलाशी तो वेटिंग रूम से लेकर प्लेटफार्म की कुर्सियों पर मुसाफिर कब्जा जमा चुके थे। ऐसे में कुछ देर प्लेटफॉर्म पर टहलते हुए कभी चाय की चुस्कियों के सहारे तो कभी गरीबों के काजू मूंगफली खाकर समय काटने का प्रयास किया। लेकिन कहते हैं ना कि इंतजार से बुरी कोई चीज ही नहीं वो भी ट्रेन का इंतजार भगवान ही बचाए...लेकिन मरता क्या न करता मजबूरी थी। टहलते  टहलते नजर प्लेटफॉर्म पर खाली हुई कुर्सी पर पडी तो तपाक से जाकर बैठ गया। ठंड से पहले भी सामना हुआ था...लेकिन इस तरह ठंड का सामना पहली बार हो रहा था। एक कंबल साथ में था तो उसे ओढकर बैठ गया...मेरे पास तो कम से कम ठंड से बचने के ले कंबल था उनी कपडे पहने हुए थे। लेकिन जनवरी की इस सर्द रात में हो रही बरसात के बीच प्लेटफार्म में मैंने कुछ ऐसे लोग भी देखे...ज्यादातर मजदूर किस्म के थे...जो सिर्फ एक पतली सी चादर में...औऱ कुछ तो सिर्फ फटी हुई स्वेटर में सिकुड कर सोने की कोशिश कर रहे थे...लेकिन मसूरी से आ रही बर्फीली हवाएं उन्हें कहां सोने देती...पहली बार तब मुझे एहसास हुआ कि हांड कंपाने वाली सर्दी क्या होती है...जिस सर्दी में हम लोग घरों में रजाईयों के अंदर दुबके होते हैं...ब्लोअर चलाकर आराम की नींद ले रहे होते हैं...ऐसे में फुटपाथ में सोने वाले गरीबों के लिए सर्द रात का एक एक पल गुजरना कितना भारी होता है। ऐसा नहीं है कि ये हाल सिर्फ किसी एक जगह का है...ये आपने भी शायद कई बार महसूस किया होगा...अपनी आंखों से देखा होगा...मेरे लिए भी ये चीज कोई नयी नहीं थी...लेकिन मुझे इसका असल एहसास तब हुआ जब सर्द रात का सामना मुझे करना पडा। हांड कंपाने वाली सर्दी में मेरे चार घंटे तो किसी तरह कट गये...लेकिन जिनके पास पहनने के लिए गर्म कपडे औऱ ओढने के लिए कंबल नहीं है...कैसे उनके लिए रात का हर एक पल रहता होगा...ये मुझे लगातार कचोटता रहा। एक औऱ सवाल इसके साथ ही परेशान करता रहा कि किस झूठी शान में हम लोग जिए जा रहे हैं...एक तरफ तो हम तरक्की की बात कर रहे हैं...वहीं दूसरी तरफ हमारे देश के 40 करोड से ज्यादा लोग गरीबी रेखा के नीचे रह रहे हैं...जिनके ना खाने का पता है ना रहने का...जीवन स्तर तो दूर की बात है। सरकार भले ही देश में गरीबों के पर्सेंट में कमी होने का दावा कर रही हो...लेकिन गरीबों की संख्या कम होनी की बजाए बढी है। इसकी एक वजह यह भी है कि गांवों से लोग शहरों की तरफ भाग रहे हैं...जिससे शहरी आबादी बढी तो है...लेकिन लोगों की आय नहीं बढी...औऱ इनमें लाखों ऐसे परिवार हैं जिन्हें दो जून की रोटी तक मयस्सर नहीं होती...औऱ ऐसे ही लोग रोज कमा कर खाते हैं...औऱ इसी तरह हांड कंपाने वाली सर्दी हो या झुलसा देने वाली गर्मी फुटपाथ या रेलवे स्टेशन पर इसी तरह अपनी जिंदगी गुजार देते हैं। हम भले ही कितनी तरक्की कर लें...विकासशील से विकसित देश हो जाएं...दुनिया हमारा लोहा माने...लेकिन उसकी असली खुशी तभी है...जब पंक्ति के आखिर में खडे लोगों का भी विकास हों...औऱ इस तरक्की का फायदा उनको मिले...वर्ना ये सब बेमानी है। उम्मीद करते हैं कि तरक्की भारत की हो हर भारतवासी की हो न कि इंडिया औऱ उसमें रहने वाले इंडियन की।

दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

राजनीति के कुहासे में गुम हुआ लोकपाल


राजनीति के कुहासे में गुम हुआ लोकपाल


भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल के समर्थन में अन्ना हजारे की मुहिम को मिले जनसमर्थन के बाद  केन्द्र की यूपीए सरकार ने शीतकालीन सत्र में लोकपाल बिल पेश तो कर दिया...लेकिन सरकार का ये बिल उसी के लिए गले की हड्डी बन गया। सरकार ने विपक्ष के भारी विरोध के बाद भी लोकसभा में बहुमत के चलते बिल तो पास करा लिया...लेकिन सरकार राज्यसभा में बिल को पास कराने में ना सिर्फ नाकाम साबित हुई बल्कि रात बारह बजे तक चली बहस के बाद भी सरकार सदन में वोटिंग से ऐन वक्त पर पीछे हट गयी...जिससे लोकपाल बिल राजनीति के कोहरे में खोकर रह गया। सरकार के इस कदम से जहां लोकपाल को लेकर सरकार पर पहले से ही हावी विपक्ष को सरकार के खिलाफ हल्ला बोलने का एक औऱ मौका मिल गया...वहीं सरकार बिल पास न होने का ठीकरा विपक्षी दलों पर फोडती नजर आयी। पक्ष और विपक्ष भले ही लोकपाल के अधर में लटक जाने के लिए एक दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हों...लेकिन मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि करोडों देशवासियों की भावनाओं से जुडा 2011 का सबसे बडा मुद्दा साल के आखिरी महीने के आखिरी सप्ताह में देश का सबसे बड़ा तमाशा बनकर रह गया। इसे तमाशा नहीं तो औऱ क्या कहा जाएगा...कि जिस बिल के समर्थन में अन्ना हजारे ने ताल ठोकी थी...जिसे देशभर में व्यापक जनसमर्थन मिला...जिस बिल ने सरकार की चूलें हिला कर रख दी...वही बिल साल के आखिरी सप्ताह में अपने अंजाम तक पहुंचते – पहुंचते दम तोड गया। एक बार फिर जहां भ्रष्टाचार से त्रस्त लोगों के चेहरे पर निराशा के भाव हैं...वहीं भ्रष्टाचारियों के चेहरे खिले हुए हैं। सवाल बहुत सीधा सा है कि जिस सरकारी लोकपाल का शुरू से ही विरोध हो रहा था...इस सब को जानते हुए भी सरकार ने उसी बिल को संसद में पेश किया...औऱ जैसा कि अनुमान था लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल भाजपा सहित विपक्षी पार्टियों ने बिल का खुलकर विरोध कर इसमें संशोधन की मांग की। हमारे कुछ नेता तो बिल से इतने भयभीत थे कि बिल के पक्ष में ही नहीं थे...संशोधन तो दूर की बात है। हालांकि सरकार ने बहुमत में होने के चलते लोकसभा में तो बिल पास करा लिया...लेकिन राज्यसभा में बहुमत में न होने से सरकार को विपक्ष का भारी विरोध झेलने के बाद अपने पैर पीछे खींचने पडे। जिससे बिल एक बार फिर से अधर में लटक गया...औऱ भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुई लडाई भी राजनीति के कुहासे में खो गयी। रही सही कसर टीम अन्ना के आंदोलन से अचानक कदम पीछे खींचने से पूरी हो गयी...हालांकि टीम अन्ना ने पांचों राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में जनवरी – फरवरी में होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस औऱ बिल का विरोध करने वाले दूसरे राजनैतिक दलों के खिलाफ प्रचार कर अपना आंदोलन जारी रखने की बात कही है। बहरहाल लोकपाल को लेकर छाया कुहासा फिलहाल जल्द छंटने के कोई आसार नहीं है...ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव में टीम अन्ना की ये मुहिम कितना रंग लाती है...ये तो चुनाव में भ्रष्टाचार से सबसे ज्यादा त्रस्त मतदाता ही तय करेंगे। उम्मीद करते हैं देश के सबसे जरूरी मुद्दे पर सरकार औऱ राजनैतिक दलों के सुपरहिट तमाशे का फल जनता उन्हें जरूर देगी...औऱ ईमानदार औऱ स्वच्छ छवि वाले नेता के हाथों में देश का भविष्य होगा...औऱ भष्टाचारियों को मुंह की खानी पडेगी।

दीपक तिवारी
8800994612 

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

लोकपाल से नहीं...खुद से खत्म होगा भ्रष्टाचार


लोकपाल से नहीं...खुद से खत्म होगा भ्रष्टाचार
 

अन्ना कहते हैं कि सशक्त लोकपाल से भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी...भ्रष्टाचारी सलाखों के पीछे होंगे...जबकि संसद में सरकार द्वारा पेश लोकपाल कमजोर है औऱ इसमें भ्रष्टाचारियों के बच निकलने का रास्ता है। सरकार कहती है संसद में पेश लोकपाल को सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद तैयार किया गया है...औऱ ये भ्रष्टाचार पर लगाम कसने में कारगर साबित होगा...वहीं मुख्य विपक्षी दल भाजपा समेत दूसरी पार्टियां अपने – अपने तर्क देकर संसद में पेश लोकपाल का विरोध कर रहे हैं...लेकिन इस बीच जनमानस के मन में क्या चल रहा है...वो क्या चाहता है...इसका इल्म किसी को नहीं है...लोगों के मन में अभी भी इसको लेकर संशय बरकरार है...कुछ लोग सोचते हैं कि सशक्त लोकपाल बन जाने से भ्रष्टाचार एकदम से खत्म हो जाएगा...जबकि कुछ लोग मानते हैं कि सशक्त लोकपाल आने के बाद भी भ्रष्टाचार पर बहुत ज्यादा लगाम नहीं लग पाएगी। कुल मिलाकर देखा जाए तो चाहे अन्ना जैसा चाहते हैं वैसा लोकपाल आए या फिर सरकारी लोकपाल...आमजन को इससे बहुत ज्यादा सरोकार नहीं है...इसमें कोई दो राय नहीं कि लोकपाल के समर्थन में अन्ना कि मुहिम को देशभर में व्यापक जनसमर्थन मिला...लेकिन सवाल ये भी उठता है कि महज़ लोकपाल बिल पास हो जाने भऱ से भ्रष्टाचार हिंदुस्तान से खत्म हो जाएगा...भ्रष्टाचारी सलाखों के पीछे पहुंच जाएंगे...इसका जवाब देना आपके लिए भी हो सकता है थोडा मुश्किल हो...लेकिन अगर मुझसे इसका जवाब पूछा जाए तो मेरा जवाब होगा...नहीं। निश्चित तौर पर हर कोई चाहता है कि भ्रष्टाचार रूपी रावण का दहन हो...औऱ भ्रष्टाचारियों को सजा मिले...हर कोई चाहता है कि सरकारी दफ्तर में बिना रिश्वत दिए उसका काम हो जाए...अपने किसी काम के लिए सरकारी दफ्तर में उसे अपनी चप्पलें न घिसनी पडे...लेकिन यहां पर मुझे ये कहने में बिल्कुल भी हिचक नहीं होगी कि जिस भ्रष्टाचार से वह निजात पाना चाहता है...असल में उसकी सबसे बडी वजह भी तो वही है...क्योंकि जब आप सरकारी दफ्तर में अपने किसी काम के लिए जाते हैं तो आप चाहते हैं कि आपका काम आसानी से हो जाए...जल्दी हो जाए...इसके लिए आपको ज्यादा परेशानी न उठाना पडे...औऱ वह आप ही तो हैं जो इसके लिए सामने बैठे कर्मचारी – अधिकारी से जल्दी काम करवाने के तरीके पूछते हैं और मिठाई के नाम पर लेनदेन की बात करते हैं। जब तक जनमानस खुद नहीं ठान लेगा कि वह अपने काम को पूरी ईमानदारी से करेगा औऱ अपने किसी काम के लिए किसी भी तरह के भ्रष्टाचार का सहारा नहीं लेगा...किसी सरकारी कर्मचारी – अधिकारी को रिश्वत नहीं देगा...तब तक एक प्रतिशत भ्रष्टाचार भी देश से कम नहीं होने वाला...फिर चाहे अन्ना का लोकपाल आए या फिर सरकारी लोकपाल...तस्वीर नहीं बदलने वाली। अरे साहब भ्रष्टाचार के खिलाफ महज शुरूआत तो कीजिए...बदलाव आएगा...किसी लोकपाल का इंतजार मत कीजिए...ये कोई जादू कि छडी नहीं है जो किसी पर चले औऱ वह ईमानदार हो जाए...और वैसे भी जिन लोगों के कंधे पर लोकपाल के माध्यम से भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई का जिम्मा रहेगा वे भी तो इंसान ही है...हो सकता है कहीं उनका ईमान भी डगमगा जाए...जैसा कहते हैं ना – अगर गल ही रूलाती है...तो राहें भी दिखाती है...मनुज गलती का पुतला है...जो अक्सर हो ही जाती है...। अब तक जो गलतियां हुई उन्हें पीछे छोडो...औऱ भ्रष्टाचार औऱ भ्रष्टाचारियों के खिलाफ आवाज बुलंद करो...निश्चित तौर पर तस्वीर बदलेगी...एक कदम तो आगे बढ़ाईये।

दीपक तिवारी
8800994612

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

लोकपाल का डर

लोकपाल का डर



लोकपाल को लेकर हो हल्ला मचा है...सडक से लेकर संसद तक एक ही चर्चा है...अखबार से लेकर टीवी तक एक ही खबर छायी हुई है...लोकपाल...अन्ना कहते हैं कि सशक्त लोकपाल आए...प्रधानमंत्री औऱ सीबीआई इसके दायरे में रहें...आम आदमी का सबसे ज्यादा पाला पडने वाले ग्रुप सी औऱ डी के कर्मचारी इसके दायरे में रहें...अन्ना का इसके पीछे तर्क है कि यह सब लोकपाल में होगा तो भ्रष्टाचार औऱ भ्रष्टाचारियों पर काफी हद तक लगाम लग सकेगी...अब लोकपाल बिल पास होने के बाद इसका कितना असर होगा ये तो समय ही बताएगा...लेकिन लोकपाल के जिन्न ने देश की राजनीति में भूचाल जरूर ला दिया है...एक अनजाना सा खौफ हमारे देश के राजनेताओँ पर छाया हुआ है...देश की राजनीति में खासा दखल रखने वाले दो बडे राज्य यूपी औऱ बिहार के कद्दावर नेता मुलायम सिंह औऱ लालू प्रसाद यादव ने तो इसके खिलाफ संसद में ही आवाज बुलंद कर दी है...मुलायम सिंह कहते हैं कि लोकपाल बिल पास हो गया तो एक मामूली सा दारोगा भी उन्हें जेल भेज देगा...कलेक्टर औऱ एसपी उनकी इज्जत नहीं करेंगे...यहां लालू भी मुलायम सिंह का समर्थन करते दिखे...हम कहते हैं...अरे साहब ऐसा काम ही क्यों करते हो कि कोई दारोगा आपको जेल भेजे...कलेक्टर और एसपी आपकी इज्जत न करें...कहीं न कहीं आपके मन में चोर है इसलिए शायद आप लोकपाल के खिलाफ आवाज़ बुलंद कर रहे हैं...इतने ही ईमानदार आप होते तो एक सशक्त लोकपाल का समर्थन नहीं करते...।
ये तो रही बात यूपी औऱ बिहार के दो महानुभावों कि...बात अगर करें हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी की...क्या वाकई में हमारे देश के प्रधानमंत्री ईमानदार हैं...किसी भी तरह के भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं हैं...अरे साहब हम तो कहते हैं कि अगर वाकई में ईमानदार हो...ईमानदारी से देश सेवा कर रहे हो तो फिर डर काहे का...ले आओ न सशक्त लोकपाल...खैर कसूर आपका भी नहीं है...आपकी भी मजबूरी है...आपका तो खुद बुरा हाल है...कहते हैं ना...मुझे दुनिया वालो शराबी न समझो...मैं पीता नहीं हूं पिलायी गयी है...आपको पिलाने वाला तो कोई औऱ ही है...।
केन्द्रीय कैबिनेट की मंजूरी के बाद सरकार लोकपाल बिल को संसद में पेश करने जा रही है...इसके लिए संसद का सत्र भी 29 दिसंबर तक बढाया गया है...सरकार के लोकपाल को लेकर जहां टीम अन्ना ने आंखे तरेर रखी हैं...वहीं मुख्य विपक्षी दल भाजपा समेत अन्य पार्टियों ने भी इसको लेकर कमर कस ली है...औऱ संसद में इस पर जमकर तकरार होने के आसार हैं...।
अब लोकपाल की इस लडाई में जीत किसकी होती है ये तो समय ही बताएगा...लेकिन निश्चित तौर पर लोकपाल का भय़ बिल के पास होने से पहले ही भ्रष्टाचारियों पर दिखाई देने लगा है...उम्मीद करते हैं कि एक सशक्त लोकपाल आए औऱ भ्रष्टाचार में नित नये रिकार्ड बनाते हिंदुस्तान की तस्वीर बदले।


दीपक तिवारी
08800994612
deepaktiwari555@gmail.com

रविवार, 23 अक्टूबर 2011

जूतम - पैजार


जूतम - पैजार


पिछले कुछ समय से जूते का चलन बढता जा रहा है....फर्क सिर्फ इतना है कि पहले जूता सिर्फ पैर में नजर आता था.....लेकिन अब जूता हाथों में हथियार के रूप में नजर आता है...इसका पहला फायदा तो ये है कि आसानी से आप जूते को कडी से कडी सुरक्षा वाली जगह पर ले जा सकते हैं...और मौका मिलने पर भरी सभा में सामने वाले की ईज्जत उतार सकते हैं...औऱ इससे सामने वाले को ऐसी चोट लगती है....कि शायद ही सामने वाले इसका दर्द कभी भूल पाये।
जूता मारने की परंपरा तो बरसों से रही है...कभी चोरी करते पकडे गये किसी चोर को जुतिआया जाता रहा है...तो कभी मनचलों की जूतम- पैजार होती आयी है...लेकिन सबसे पहले जूता रूपी अस्त्र तब सुर्खियों में आया जब ईराक में जॉर्ज बुश पर चला था जूता। पत्रकार मुंतज़र-अल-जैदी ने सबके सामने एक के बाद दो जूते दे मारे थे बुश पर लेकिन किस्मत अच्छी थी कि बच गए बुश।
इसके बाद हिंदुस्तान में भी पत्रकार मुंतज़र-अल-जैदी का फार्मूला खूब हिट हुआ औऱ जूता बन गया नया हथियार...इसके पहले शिकार बने हमारे गृहमंत्री पी चिदंबरम...फिर बारी थी बरसों से पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी की...हथियार रूपी जूते का ये सिलसिला यहीं नहीं रूका समय – समय पर इसका भरपूर उपयोग होता रहा...कभी कांग्रेस नेता जनार्दन द्रिवेदी तो कभी सांसद नवीन जिंदल पर...हाल ही में टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल इसके ताजा – ताजा शिकार बने हैं...ज्यादातर मामलों में जूता मारने वालों को इसके शिकार नेताओं ने माफ कर बडप्पन दिखाने का प्रयास किया...लेकिन इसका दर्द शायद ही उनके दिल से कभी जाए...।
लेकिन कुल मिलाकर पैरों की शान बढाने वाला जूता जाने कब किसके सिर का ताज बन जाए...कहना मुश्किल है। कभी दूसरों को अपने जूते की नोंक में रखने वाले नेताओं के लिए इसी जूते का भय सताने लगा है।  
एक कहावत आपने भी शायद सुनी होगी कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते...ये बात अब शायद आमजनता को भी समझ आ गयी है...इसलिए भ्रष्ट नेताओं को सबक सिखाने लोगों ने लातों का ना सही जूते का इस्तेमाल बेधडक शुरू कर दिया है...शायद जूतम – पैजार के डर से ही सही भ्रष्ट नेताओं को थोडी अक्ल आ जाए।




दीपक तिवारी
deepaktiwari@khabarbharti.com
08800994612

बुधवार, 14 सितंबर 2011

हिंदी हैं हम वतन से....

हिंदुस्तान में हिंदी की दुर्दशा देखते हुए 1947 से पहले का अग्रेजों भारत छोडो का नारा याद आता हैकैसे अंग्रेजों को आखिर भारत को छोड कर जाना पडा थालगता है अब फिर से जरूरत है ऐसे ही एक नारे की...अंग्रेजी भारत छोडोलेकिन हिंदुस्तान में ऐसा संभव नहीं दिखता क्योंकि यहां हर सरकारी कार्यालय में हिंदी दिवस तो मनाया जाता है...लेकिन इसके लिए आदेश अंग्रेजी मे जारी किय़े जाते हैं
हमारे देश के प्रधानमंत्री औऱ सर्वोच्च पद पर बैठे लोग हिंदी बोलने में अपनी तौहीन समझते हैं...तो क्या इन्हें हक है हिंदुस्तान में सर्वोच्च पदों पर आसीन होने का...
मेरा कहने का मतलब य़े नहीं कि आप अंग्रेजी को पूर्णत: विसर्जित कर दें...बल्कि अपने अधिक से अधिक काम हिंदी में करने की आदत डालें...शायद हम आम हिंदुस्तानी हिंदी का कुछ मान बचा पाएं...हमारे देश के प्रधानमंत्री को तो शायद शर्म आती है हिंदी बोलने में...आपने सुना है कभी उन्हें हिंदी बोलते हुए...
?
इसी उम्मीद में कि ये पंक्तियां वाकई में सार्थक हों...हिंदी हैं हम...हिंदी हैं हम वतन से हिंदोस्तान हमारा...आप सभी को हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं...जय हिंदुस्तान....जय हिंदी

दीपक तिवारी


गुरुवार, 8 सितंबर 2011

एक औऱ धमाका....



एक के बाद एक धमाके होते हैं...लोग मरते हैं...हर बार हमारे प्रधानमंत्री औऱ गृहमंत्री कहते हैं कि हम इसका मुंहतोड जवाब देंगे...हमारे सब्र की परीक्षा मत लो कहते हैं...लेकिन इस सब में अपनों को खो चुके लोगों का दर्द किसी को दिखायी नहीं देता...किसी ने अपना बेटा खोया...किसी ने पिता...किसी ने भाई तो किसी ने अपनी मां व बहन...समय के साथ घाव भरते हैं...लेकिन फिर एक दिन एक औऱ धमाका होता है...औऱ फिर वही हालात...लेकिन किसे फिक्र है इस सब की...उनमें इनका कोई अपना नहीं है ना....

ऐसे हालातों में तो हर चेहरे को देखने पर उस पर ये पंक्तियां लिखी मिलती हैं.....


कब तक आंख रोएगी...कहां तक किसी का गम होगा...

मेरे जैसा तो कोई न...कोई यहां रोज कम होगा...

बुधवार, 24 अगस्त 2011

लोकपाल औऱ जनलोकपाल


लोकपाल औऱ जनलोकपाल

समाजसेवी अन्ना हजारे औऱ उनकी टीम ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल फूंकते हुए जनलोकपाल बिल का मसौदा तैयार कर इसे लागू करने को लेकर अपना आंदोलन शुरू किया...इसकी शुरूआत अन्ना एंड टीम ने अप्रेल 2011 में जंतर मंतर से की थी...जिसके बाद सरकार ने स्टैंडिंग कमेटी का गठन किया...जिसमें अन्ना एंड टीम भी शामिल थी...लेकिन यहां पर भी बात नहीं बनी...औऱ सरकार ने अन्ना एंड टीम की सिफारिशों को दरकिनार करते हुए सरकारी लोकपाल बिल ड्राफ्ट किया। जिसके विरोध में 16 अगस्त से शुरू हुआ अन्ना का आंदोलन किस तरह जनांदोलन बन गया...इसे बताने की जरूरत नहीं है। इसी बीच अरूणा रॉय ने भी एक बिल ड्राफ्ट किया।

एक नजर सरकारी लोकपाल, जनलोकपाल औऱ अरूणा रॉय के लोकपाल पर....

सरकारी लोकपाल
जनलोकपाल
अरूणा रॉय लोकपाल
सरकारी लोकपाल के पास भ्रष्टाचार के मामलों पर खुद या आम लोगों की शिकायत पर सीधे कार्रवाई शुरू करने का अधिकार नहीं होगा।
प्रस्तावित जनलोकपाल बिल के तहत लोकपाल खुद किसी भी मामले की जाँच शुरू करने का अधिकार रखता है।
राष्ट्रीय भ्रष्टाचार निवारण लोकपाल- इसके दायरे में प्रधानमंत्री को कुछ शर्तो के साथ लाया जाए. प्रधानमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला चलाने का फैसला लोकपाल की पूर्ण पीठ करे और सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ अनुमोदन करे. सांसद और वरिष्ठ मंत्री लोकपाल के दायरे में रहें.
सरकारी विधेयक में लोकपाल केवल परामर्शदात्री संस्था बन कर रह जाएगी।
जनलोकपाल सशक्त संस्था होगी।
पृथक न्यायपालिका लोकपाल- न्यायपालिका के लिए अलग से.

सरकारी विधेयक में लोकपाल के पास पुलिस शक्ति नहीं होगी।
जनलोकपाल न केवल प्राथमिकी दर्ज करा पाएगा बल्कि उसके पास पुलिस फोर्स भी होगी।
केंद्रीय सतर्कता लोकपाल- दूसरी व तीसरी श्रेणी के अफसरों के भ्रष्टाचार के लिए सतर्कता आयोग को ही और अधिक ताकतवर बनाया जाए.

सरकारी विधेयक में लोकपाल का अधिकार क्षेत्र सांसद, मंत्री और प्रधानमंत्री तक सीमित रहेगा।
जनलोकपाल के दायरे में प्रधानमत्री समेत नेता, अधिकारी, न्यायाधीश सभी आएँगे।
लोकरक्षक कानून लोकपाल- भ्रष्टाचार की शिकायत करने वाले लोगों की सुरक्षा मुहैया कराने के लिए.
लोकपाल में तीन सदस्य होंगे जो सभी सेवानिवृत्त न्यायाधीश होंगे।
जनलोकपाल में 10 सदस्य होंगे और इसका एक अध्यक्ष होगा। चार की कानूनी पृष्टभूमि होगी। बाक़ी का चयन किसी भी क्षेत्र से होगा।
शिकायत निवारण लोकपाल-जन शिकायतों के जल्द निपटारे लिए है.
सरकार द्वारा प्रस्तावित लोकपाल को नियुक्त करने वाली समिति में उपराष्ट्रपति। प्रधानमंत्री, दोनो सदनों के नेता, दोनों सदनों के विपक्ष के नेता, कानून और गृहमंत्री होंगे।
प्रस्तावित जनलोकपाल बिल में न्यायिक क्षेत्र के लोग, मुख्य चुनाव आयुक्त, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, भारतीय मूल के नोबेल और मैगासेसे पुरस्कार के विजेता चयन करेंगे।


सरकारी लोकपाल विधेयक में दोषी को छह से सात महीने की सजा हो सकती है और घोटाले के धन को वापिस लेने का कोई प्रावधान नहीं है।

जनलोकपाल बिल में कम से कम पाँच साल और अधिकतम उम्र कैद की सजा हो सकती है। साथ ही दोषियों से घोटाले के धन की भरपाई का भी प्रावधान है।



राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करती...जिस कानून को आजादी के वक्त अस्तित्व में आ जाना चाहिए था...उसका इंतजार 1969 से हो रहा है। अब जाकर इस कानून के लिए गंभीरता दिख रही है...उसमें भी सरकार गेंद अपने पाले में रखना चाहती है। सरकार चाहती है कि प्रधानमंत्री औऱ न्यायपालिका को इसके दायरे से बाहर रखा जाए...लेकिन अन्ना एंड टीम के जनलोकपाल में प्रधानमंत्री औऱ न्यायपालिका दोनों को इसके दायरे में लाने की बात कही गयी है...यही बात अरूणा रॉय ने भी अपने बिल में कही है। मेरा मानना है कि हिंदुस्तान में भ्रष्टाचार सारी सीमाएं पार कर चुका है...औऱ आम जनता इसे बुरी तरह त्रस्त है...इसलिए जब अन्ना हजारे ने जनलोकपाल के लिए लड़ाई का शंखनाद किया तो देशवासियों ने इसे हाथों हाथ लिया...औऱ देशभर में हर वर्ग औऱ आयु के लोग तिरंगा हाथ में लेकर अपने – अपने तरीके से इसका समर्थन कर रहे हैं। लोग भले ही इसे भीड का नाम दे रहे हैं...लेकिन ये भीड नहीं भ्रष्टाचार औऱ भ्रष्टाचारियों के खिलाफ वो जनाक्रोश है...जो लंबे समय से किसी शांत ज्वालामुखी की तरह फटने का इंतजार कर रहा था...अगर सरकार झुकती है...जिसके आसार भी नजर आ रहे हैं...औऱ जनलोकपाल को पूरी तरह से सरकार स्वीकार कर संसद में पेश भी करती है...औऱ ये पारित होकर कानून बनता है तो भी मुझे नहीं लगता कि भ्रष्टाचार पर पूरी तरह अंकुश लग पाएगा...या भ्रष्टाचारी इससे तौबा कर लेंगे...क्योंकि जब तक आम लोग पूरी तरह इसका विरोध नहीं करेंगे...औऱ ठान लेंगे कि वे अपने किसी काम के लिए रिश्वत नहीं देगे...भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं देंगे...तब तक इस समस्या का कोई समाधान नहीं निकलेगा। इसलिए जरूरत है हर किसी को अपने अंदर वो इच्छाशक्ति पैदा करे कि भ्रष्टाचार अपना सिर ही न उठा सके। जनलोकपाल कानून बन भी जाता है तो ये तभी सार्थक होगा...जब देश के हर एक नागरिक इसकी ताकत को समझे...औऱ जिस दिन वे ये समझ जाएंगे...उस दिन एक हद भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकेगा।  


दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com



मैं भी अन्ना...तू भी अन्ना...अब तो सारा देश है अन्ना...




मैं भी अन्ना...तू भी अन्ना...अब तो सारा देश है अन्ना...
हाथ में लेकर तिरंगा...हर कोई लगता है अन्ना...
जनलोकपाल से डरने वाले भागो...जहां जाओगे पाओगे अन्ना...
मैं भी अन्ना...तू भी अन्ना...अब तो सारा देश है अन्ना...
निकल पड़े हैं लेकर तिरंगा...अब नहीं है हमें रूकना...
बनकर अन्ना बढ रहे हैं आगे...जनलोकपाल को लागू करवाने...
मैं भी अन्ना...तू भी अन्ना...अब तो सारा देश है अन्ना...
चाहे मारो लाठी-गोली...चाहे भेजो हमको जेल...
आगे बढ़कर अपना हक छीनेंगे...भ्रष्टाचारियों को नहीं छोड़ेंगे...
मैं भी अन्ना...तू भी अन्ना...अब तो सारा देश है अन्ना...