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गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

132 चिराग बुझे, पाकिस्तान नहीं संभला !

पेशावर में जो हुआ, उसके बाद किसी का भी खून खौलना लाजिमी है, पाकिस्तान का भी खून खौला और पाकिस्तान ने भी आतंकियों के सफाए की कसम खाई। पाकिस्तान के खैबर के कबीलाई इलाकों में तिराह घाटी में तालिबान के ठिकानों पर 57 आतंकवादियों को मौत के घाट उतारने की ख़बर भी आई। ये ख़बर 132 मासूमों के माता पिता के दर्द पर तो मरहम नहीं लगा सकती, लेकिन पाक का ये कदम आतंकियों की पनाहगाह बने रहने के आरोपों को कुछ हद तक धोने की तरफ एक बढ़ता हुआ कदम जरूर था। हालांकि ये कदम कितने आगे बढ़ेगा इस पर शक बरकरार था !
शक बरकरार था और कुछ ही घंटों में ये साबित भी हो गया जब पाकिस्तान से एक और ख़बर आई। पेशावर में तालिबान की कायराना करतूत के बाद आतंकियों का खात्मा करने का दम भरने वाले पाकिस्तान से इस ख़बर का आना हैरान करने वाला था। साथ ही पाकिस्तान की बातों पर भरोसा करने का भरोसा तोड़ने वाला भी ! (पढ़ें-एक हाथ में पेंसिल, एक में बंदूक !)
ख़बर ये कि भारत में आतंक फैलाने के आरोपी जकीउर्रहमान लखवी को पाकिस्तान की एक अदालत ने जमानत दे दी है। लश्कर तैयबा का कमांडर लखवी मुंबई हमलों के उन सात आरोपियों में से एक है, जिन पर पाकिस्तान में मुंबई हमलों का केस चल रहा है। लखवी के अलावा अब्दुल वाजिद, मजहर इकबाल, सादिक, शाहिद जमील रियाज, जमील अहमद और यूनस अंजुम को 2009 में गिरफ्तार किया गया था। इन सब पर मुंबई में 2008 में हुए आतंकी हमलों की साजिश रचने का आरोप है। इन हमलों में 166 लोग मारे गए थे जबकि 300 से ज्यादा घायल हुए थे।
आतंकियों के खात्मे की बात करना और 166 लोगों की मौत के आरोपी, जिसके पुख्ता सबूत भारत ने पाकिस्तान को दिए हैं, उसे पाकिस्तान में जमानत मिल जाना वाकई में हैरान करता है। आतंकवाद का दंश झेलने के बाद भी पाकिस्तान का ये रवैया बताने के लिए काफी है कि आतंकियों को समाप्त करने की पाकिस्तान का संदेश सिर्फ और सिर्फ पेशावर में तालिबान के कायराना एक्शन का रिएक्शन भर है ! ऐसा लगता है, पाक में चीजें फिर से पहले जैसी हो जाएंगी और आतंकियों के लिए पाकिस्तान की धरती एक महफूज ठिकाने की ही तरह बना रहेगा !
हाफिज सईद, मुंबई हमले का मास्टरमाईंड से बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है, भारत पेशावर का शोक मना रहा है और वो पाकिस्तान के लोगों के दिल में भारत के खिलाफ ज़हर भर रहा है, भारत को खत्म करने की बात कर रहा है ! लेकिन पाकिस्तान खामोश है, उसे हाफिज़ सईद पाकिस्तान की सम्मानित शख्सियत में से एक है !
ये दोहरा रवैया ही तो है, जो पाकिस्तान को आतंक के मामले में हर बार बेनकाब करता रहा है, लेकिन इस बार लगा था कि शायद पाकिस्तान संभल जाएगा !
वो समझ जाएगा कि जिस राह में वह चल रहा है, वो उसके पैरों को ही लहूलुहान करेगी ! जिस हथियारों की फसल को वो बो रहा है, या बोए जाते देख रहा है, वो उसकी धरती पर ही खून की नदियां बहा देगी !
जिस आतंक की फैक्ट्री को वो अपनी आंखों के सामने फलने फूलने दे रहा है, वो उसका ही घर जला देगी
132 घरों के बुझे हुए चिराग तो फिर कभी रोशन नहीं हो सकते लेकिन लगा था कि खुद की लगाई आतंक की आग में जल रहे पाकिस्तान में इन मासूमों की दर्दनाक मौत के बाद शायद उम्मीदों के दिए जलेंगे और पाकिस्तान आतंक के अंत की लड़ाई के ऐलान को अंजाम तक पहुंचाएगा लेकिन जकीउर्रहमान लखवी की जमानत की ख़बर और हाफिज सईद के जहरीले बोल के बाद उम्मीदों के ये दिए भी अब टिमटिमाने लगे हैं !
उम्मीद तो यही करते हैं कि आतंक की आंधी में उम्मीदों के ये दिए सदा जलते रहेंगे और पाकिस्तान के पेशावर में क्या पूरी दुनिया में किसी घर का चिराग आतंकी हमलों में नहीं बुझेगा !


deepaktiwari555@gmail.com

मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

एक हाथ में पेंसिल, एक में बंदूक !

वो मासूम थे, उनके हाथों में पेंसिल थी। लेकिन उन्हें क्या पता था कि पेंसिल हाथ में थामे उनका सामना बंदूकों से होगा। उन्हें नहीं मालूम था कि मौत क्या होती है, लेकिन, वे मौत के आगोश में समा गए ! जो बच गए वो जान गए बंदूक क्या होती है, मौत कैसे आती है ? उन्हें ये भी समझ आ गया होगा कि कायर किसे कहते हैं ?
कायर उसे कहते हैं, जो पेंसिल हाथ में थामे मासूम बच्चों पर गोलियों की बौछार करता है !
कायर उसे कहते हैं, जो मासूमों के शरीर को गोलियों से छलनी करके अपनी ताकत का एहसास करना चाहता है !
कायर उसे कहते हैं, जो मासूमों को मौत के घाट उतारकर बताना चाहता है कि उसका मकसद क्या है !
कायर तहरीक ए तालीबान को कहते हैं, जो 132 मासूमों का खून बहाने के बाद ये शान से कहता है कि ये हमला उसने किया है !
क्या कसूर था उन 132 मासूमों का ? इसका जवाब पूरी दुनिया मांग रही है, लेकिन तहरीक ए तालिबान इस मातम का जश्न मना रहा है !
पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की बातें जरूर करता है, लेकिन दुनिया जानती है कि आतंकियों का सबसे बड़ा पनाहगाह भी पाकिस्तान ही तो है। शायद ही कभी पाकिस्तान ने सोचा होगा कि पेशावर एक ऐसी दर्दनाक त्रासदी का दंश झेलेगा, जिसे भुला पाना पाकिस्तान के लिए आसान नहीं होगा !
132 मासूमों की मौत को तो भुलाया नहीं जा सकता, लेकिन सवाल अब ये उठता है कि क्या अब पाकिस्तान की नींद टूटेगी ? जाहिर है पाकिस्तान अपनी धरती से आतंकी गतिविधियों को संचालित न होने दे ! आतंकियों के लिए नरम रूख अपनाना छोड़ दे ! आतंकियों की पनाहगाह न बने तो भविष्य में तो कम से कम किसी ऐसी दुखद घटना से बचा जा सकता है ! आतंकियों ने इस कायराना हरकत के बाद बता दिया है कि ये उनकी फितरत में है, वे किसी पर भी गोली चला सकते हैं, किसी पर भी बम फेंक सकते हैं, फिर चाहे सामने 5 साल का कोई मासूम ही क्यों न खड़ा है ! स्कूल में बच्चों को चुन चुन कर मौत के घाट उतारना और क्या था ?  
उम्मीद तो यही करते हैं कि भविष्य में अब एक भी शख्स आतंकवाद का शिकार न बने, लेकिन सवाल फिर वहीं खड़ा है कि क्या कभी ऐसा होगा ? निगाहें एक बार फिर से पाकिस्तान की तरफ है कि क्या अब पाकिस्तान का रवैया बदलेगा ?

deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

16 दिसंबर, महिला सुरक्षा और ऊबर!

 
16 दिसंबर 2012 की तारीख को शायद ही देशवासी कभी भूल पाएंगे। 16 दिसंबर के बाद महिला सुरक्षा को लेकर एक नई बहस छिड़ी थी और महिलाओं की सुरक्षा के लिए कड़े कानून भी बने थे। उस वक्त लगा था कि शायद अब अपराधियों में कानून का खौफ रहेगा और महिलाएं खुद को सुरक्षित महसूस करेंगी, लेकिन कानून बदलने के बाद देश की राजधानी दिल्ली में हालात नहीं बदले !
अमेरिकी कंपनी ऊबर की कैब में महिला से रेप की ताजा घटना ने महिला सुरक्षा के सवाल को और गहरा दिया है। हैरानी तो उस वक्त होती है जब ये हकीकत सामने आती है कि अमेरिका की प्रतिष्ठित कैब सर्विस देने वाली कंपनी ऊबर ने भारत में गंभीर लापरवाही बरती। रेप करने वाले आरोपी ड्राईवर शिव सिंह यादव का पुलिस वैरिफिकेशन तक नहीं करवाया गया था, जबकि शिव सिंह पर पहले से ही बलात्कार का मामला दर्ज था !
ऊबर कैब सर्विस को भले ही इस घटना के बाद दिल्ली – एनसीआर में तत्काल बैन कर दिया गया हो, लेकिन इससे न पीड़ित लड़की का दर्द कम होने वाला और न ही ये गारंटी मिलती है कि भविष्य में फिर ऐसी घटनाएं नहीं होंगी। पीड़ित ने जो भोगा उसे वो जीवन भर चाह कर भी नहीं भुला पाएगी लेकिन उबर कंपनी के अधिकारी लापहरवाह नहीं होते तो शायद इस घटना को होने से रोका जा सकता था।
महिला सुरक्षा पर बहस फिर से जोर पकड़ने लगी है लेकिन सबसे अहम सवाल यह भी है कि देश की राजधानी में एक कंपनी अपनी कैब सर्विस को चलाती है लेकिन दिल्ली – एनसीआर में कहां से वह कंपनी संचालित हो रही है, कहां पर कंपनी का दफ्तर है कोई नहीं जानता..?
आप चाहकर भी कंपनी के दफ्तर का पता नहीं जान सकते..? कंपनी की वेबसाईट में तक कंपनी का न ही कोई पता है और न ही कोई संपर्क नंबर। सबसे अहम बात ये कि परिवहन विभाग को तक ये जानकारी नहीं है कि कंपनी का दफ्तर या मुख्यालय कहां पर स्थित है! इस घटना के बाद जब दिल्ली पुलिस ने कंपनी के दफ्तर पहुंचना चाहा तो ये दिल्ली पुलिस के लिए टेढ़ी खार साबित हुआ। दिल्ली पुलिस को पहले कंपनी का ऐप अपने मोबाईल पर डाउनलोड करना पड़ा और एक कैब बुक करवानी पड़ी, जिसके बाद वे कैब ड्राईवर के जरिए ऊबर कंपनी के दफ्तर पहुंच पाई !
सवाल बड़ा है कि जब एक कैब सर्विस देने वाली कंपनी के बारे में दिल्ली में कोई नहीं जानता तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजधानी में कहां कहां पता नहीं क्या क्या चल रहा होगा ? जिसकी जानकारी न तो पुलिस के पास है और न ही प्रशासन के पास ! आसानी से समझा जा सकता है कि कितनी सुरक्षित है राजधानी ! कितनी सुरक्षित है राजधानी में महिलाएं !

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रविवार, 7 दिसंबर 2014

मोदी, आदर्श गांव और योजना आयोग !

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सासंद आदर्श ग्राम योजना की शुरुआत एक सार्थक कदम लगा, लेकिन उस पर भी राजनीति भारी है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को योजना में फंड की चिंता है तो भाजपा से बौखलाई पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी चाहती हैं कि इस योजना से टीएमसी सांसद दूर रहें। ममता नहीं चाहती कि उनकी पार्टी के सांसद इस योजना के तहत अपने संसदीय क्षेत्र में एक गांव को गोद लें और उसे आदर्श ग्राम बनाएं !
राजनीतिक कारक कितने भारी हैं, इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि जब योजना आयोग के पुनर्गठन को लेकर सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को प्रधानमंत्री मोदी ने अहम बैठक के लिए दिल्ली बुलाते हैं, तो  पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी और जम्म कश्मीर के सीएम उमर अब्दुल्ला बैठक में नहीं पहुंचते हैं। अब ममता और उमर बैठक में न आ पाने का कारण चाहे जो भी गिनाएं लेकिन ये जग जाहिर है कि दोनों की अनुपस्थिति के पीछे सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक कारण है।  
ममता जी , उमर साहब, राजनीति अपनी जगह है, आप राजनीति करो, जाहिर है सत्ता के लिए ! माफ किजिए ! देश सेवा के लिए, जनता की सेवा के लिए ही तो आप राजनीति में आए हैं। लेकिन एक अच्छी पहल को सिर्फ राजनीतिक कारणों से नजरअंदाज करना या उसका विरोध करना कहां तक जायज है। जब राहुल और सोनिया के साथ ही मुलायम सिंह ने तक अपने संसदीय क्षेत्र में एक गांव को आदर्श ग्राम बनाने के लिए चुना तो अच्छा लगा। लेकिन इसके बाद राहुल का फंड के बाने इस पर सवाल उठाना समझ नहीं आया !
एक सांसद की जिम्मेदारी है कि वह अपने संसदीय क्षेत्र की जनता की दुख-तकलीफों की चिंता करे, गांव से लेकर शहरों के विकास के लिए काम करे, सांसद निधि को सही जगह खर्च करे लेकिन अकसर देखने को मिलता है कि पांच साल का कार्यकाल निकल जाता है और अधिकतर सांसद महोदय तो अपनी आधी भी सांसद निधि को खर्च नहीं कर पाते। खर्च कर पाना तो दूर चुनाव जीतने के बाद अपने पूरे संसदीय क्षेत्र में तक नहीं जाते !
इन्हें एक गांव को आदर्श गांव बनाने के लिए काम करना तक जायज नहीं है। कायदे से तो पूरे संसदीय क्षेत्र को आदर्श संसदीय क्षेत्र बनाने के लिए सांसदों को काम करना चाहिए, लेकिन हमारे अति व्यस्त सांसदों के पास जनता के लिए इतना समय कहां है !
आप गांवों को गोद नहीं लेते हैं, आप प्रधानमंत्री की बैठक में नहीं पहुंचते हैं, क्या ये सही है ? वो भी सिर्फ इसलिए कि आपको ऐसा लगता है कि इससे आपके राजनीतिक हित आहत हो रहे हैं !
आप अच्छी योजनाओं को आगे बढ़ाएंगे, राजनीति में अपने व्यक्तिगत हितों को त्याग कर, व्यक्तिगत राग-द्वेष को पीछे छोड़कर काम करेंगे तो आपका मान कम नहीं होगा, बल्कि आपका मान बढ़ेगा ! आपको जनता वे इसलिए चुना है ताकि आप जनता के प्रतिनिधि के रूप में ऐसे फैसले लें जिससे समाज और देश का विकास हो ! उम्मीद करते हैं कि जनसेवा में आपके व्यकिगत हित या राग द्वेष आड़े नहीं आएगा और आप समाज और देश के लिए काम करेंगे  वरना समय किसका रहा है। समय बदलते देर नहीं लगती, बस जनता को चुनाव तक का ही तो इंतजार करना है !

deepaktiwari555@gmail.com