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गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

132 चिराग बुझे, पाकिस्तान नहीं संभला !

पेशावर में जो हुआ, उसके बाद किसी का भी खून खौलना लाजिमी है, पाकिस्तान का भी खून खौला और पाकिस्तान ने भी आतंकियों के सफाए की कसम खाई। पाकिस्तान के खैबर के कबीलाई इलाकों में तिराह घाटी में तालिबान के ठिकानों पर 57 आतंकवादियों को मौत के घाट उतारने की ख़बर भी आई। ये ख़बर 132 मासूमों के माता – पिता के दर्द पर तो मरहम नहीं लगा सकती, लेकिन पाक का ये कदम आतंकियों की पनाहगाह बने रहने के आरोपों को कुछ हद तक धोने की तरफ एक बढ़ता हुआ कदम जरूर था। हालांकि ये कदम कितने आगे बढ़ेगा इस पर शक बरकरार था !
शक बरकरार था और कुछ ही घंटों में ये साबित भी हो गया जब पाकिस्तान से एक और ख़बर आई। पेशावर में तालिबान की कायराना करतूत के बाद आतंकियों का खात्मा करने का दम भरने वाले पाकिस्तान से इस ख़बर का आना हैरान करने वाला था। साथ ही पाकिस्तान की बातों पर भरोसा करने का भरोसा तोड़ने वाला भी ! (पढ़ें-एक हाथ में पेंसिल, एक में बंदूक !)
ख़बर ये कि भारत में आतंक फैलाने के आरोपी जकीउर्रहमान लखवी को पाकिस्तान की एक अदालत ने जमानत दे दी है। लश्कर ए तैयबा का कमांडर लखवी मुंबई हमलों के उन सात आरोपियों में से एक है, जिन पर पाकिस्तान में मुंबई हमलों का केस चल रहा है। लखवी के अलावा अब्दुल वाजिद, मजहर इकबाल, सादिक, शाहिद जमील रियाज, जमील अहमद और यूनस अंजुम को 2009 में गिरफ्तार किया गया था। इन सब पर मुंबई में 2008 में हुए आतंकी हमलों की साजिश रचने का आरोप है। इन हमलों में 166 लोग मारे गए थे जबकि 300 से ज्यादा घायल हुए थे।
आतंकियों के खात्मे की बात करना और 166 लोगों की मौत के आरोपी, जिसके पुख्ता सबूत भारत ने पाकिस्तान को दिए हैं, उसे पाकिस्तान में जमानत मिल जाना वाकई में हैरान करता है। आतंकवाद का दंश झेलने के बाद भी पाकिस्तान का ये रवैया बताने के लिए काफी है कि आतंकियों को समाप्त करने की पाकिस्तान का संदेश सिर्फ और सिर्फ पेशावर में तालिबान के कायराना एक्शन का रिएक्शन भर है ! ऐसा लगता है, पाक में चीजें फिर से पहले जैसी हो जाएंगी और आतंकियों के लिए पाकिस्तान की धरती एक महफूज ठिकाने की ही तरह बना रहेगा !
हाफिज सईद, मुंबई हमले का मास्टरमाईंड से बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है, भारत पेशावर का शोक मना रहा है और वो पाकिस्तान के लोगों के दिल में भारत के खिलाफ ज़हर भर रहा है, भारत को खत्म करने की बात कर रहा है ! लेकिन पाकिस्तान खामोश है, उसे हाफिज़ सईद पाकिस्तान की सम्मानित शख्सियत में से एक है !
ये दोहरा रवैया ही तो है, जो पाकिस्तान को आतंक के मामले में हर बार बेनकाब करता रहा है, लेकिन इस बार लगा था कि शायद पाकिस्तान संभल जाएगा !
वो समझ जाएगा कि जिस राह में वह चल रहा है, वो उसके पैरों को ही लहूलुहान करेगी ! जिस हथियारों की फसल को वो बो रहा है, या बोए जाते देख रहा है, वो उसकी धरती पर ही खून की नदियां बहा देगी !
जिस आतंक की फैक्ट्री को वो अपनी आंखों के सामने फलने फूलने दे रहा है, वो उसका ही घर जला देगी ! 
132 घरों के बुझे हुए चिराग तो फिर कभी रोशन नहीं हो सकते लेकिन लगा था कि खुद की लगाई आतंक की आग में जल रहे पाकिस्तान में इन मासूमों की दर्दनाक मौत के बाद शायद उम्मीदों के दिए जलेंगे और पाकिस्तान आतंक के अंत की लड़ाई के ऐलान को अंजाम तक पहुंचाएगा लेकिन जकीउर्रहमान लखवी की जमानत की ख़बर और हाफिज सईद के जहरीले बोल के बाद उम्मीदों के ये दिए भी अब टिमटिमाने लगे हैं !
उम्मीद तो यही करते हैं कि आतंक की आंधी में उम्मीदों के ये दिए सदा जलते रहेंगे और पाकिस्तान के पेशावर में क्या पूरी दुनिया में किसी घर का चिराग आतंकी हमलों में नहीं बुझेगा !


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मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

एक हाथ में पेंसिल, एक में बंदूक !

वो मासूम थे, उनके हाथों में पेंसिल थी। लेकिन उन्हें क्या पता था कि पेंसिल हाथ में थामे उनका सामना बंदूकों से होगा। उन्हें नहीं मालूम था कि मौत क्या होती है, लेकिन, वे मौत के आगोश में समा गए ! जो बच गए वो जान गए बंदूक क्या होती है, मौत कैसे आती है ? उन्हें ये भी समझ आ गया होगा कि कायर किसे कहते हैं ?
कायर उसे कहते हैं, जो पेंसिल हाथ में थामे मासूम बच्चों पर गोलियों की बौछार करता है !
कायर उसे कहते हैं, जो मासूमों के शरीर को गोलियों से छलनी करके अपनी ताकत का एहसास करना चाहता है !
कायर उसे कहते हैं, जो मासूमों को मौत के घाट उतारकर बताना चाहता है कि उसका मकसद क्या है !
कायर तहरीक ए तालीबान को कहते हैं, जो 132 मासूमों का खून बहाने के बाद ये शान से कहता है कि ये हमला उसने किया है !
क्या कसूर था उन 132 मासूमों का ? इसका जवाब पूरी दुनिया मांग रही है, लेकिन तहरीक ए तालिबान इस मातम का जश्न मना रहा है !
पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की बातें जरूर करता है, लेकिन दुनिया जानती है कि आतंकियों का सबसे बड़ा पनाहगाह भी पाकिस्तान ही तो है। शायद ही कभी पाकिस्तान ने सोचा होगा कि पेशावर एक ऐसी दर्दनाक त्रासदी का दंश झेलेगा, जिसे भुला पाना पाकिस्तान के लिए आसान नहीं होगा !
132 मासूमों की मौत को तो भुलाया नहीं जा सकता, लेकिन सवाल अब ये उठता है कि क्या अब पाकिस्तान की नींद टूटेगी ? जाहिर है पाकिस्तान अपनी धरती से आतंकी गतिविधियों को संचालित न होने दे ! आतंकियों के लिए नरम रूख अपनाना छोड़ दे ! आतंकियों की पनाहगाह न बने तो भविष्य में तो कम से कम किसी ऐसी दुखद घटना से बचा जा सकता है ! आतंकियों ने इस कायराना हरकत के बाद बता दिया है कि ये उनकी फितरत में है, वे किसी पर भी गोली चला सकते हैं, किसी पर भी बम फेंक सकते हैं, फिर चाहे सामने 5 साल का कोई मासूम ही क्यों न खड़ा है ! स्कूल में बच्चों को चुन चुन कर मौत के घाट उतारना और क्या था ?  
उम्मीद तो यही करते हैं कि भविष्य में अब एक भी शख्स आतंकवाद का शिकार न बने, लेकिन सवाल फिर वहीं खड़ा है कि क्या कभी ऐसा होगा ? निगाहें एक बार फिर से पाकिस्तान की तरफ है कि क्या अब पाकिस्तान का रवैया बदलेगा ?

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बुधवार, 10 दिसंबर 2014

16 दिसंबर, महिला सुरक्षा और ऊबर!

 
16 दिसंबर 2012 की तारीख को शायद ही देशवासी कभी भूल पाएंगे। 16 दिसंबर के बाद महिला सुरक्षा को लेकर एक नई बहस छिड़ी थी और महिलाओं की सुरक्षा के लिए कड़े कानून भी बने थे। उस वक्त लगा था कि शायद अब अपराधियों में कानून का खौफ रहेगा और महिलाएं खुद को सुरक्षित महसूस करेंगी, लेकिन कानून बदलने के बाद देश की राजधानी दिल्ली में हालात नहीं बदले !
अमेरिकी कंपनी ऊबर की कैब में महिला से रेप की ताजा घटना ने महिला सुरक्षा के सवाल को और गहरा दिया है। हैरानी तो उस वक्त होती है जब ये हकीकत सामने आती है कि अमेरिका की प्रतिष्ठित कैब सर्विस देने वाली कंपनी ऊबर ने भारत में गंभीर लापरवाही बरती। रेप करने वाले आरोपी ड्राईवर शिव सिंह यादव का पुलिस वैरिफिकेशन तक नहीं करवाया गया था, जबकि शिव सिंह पर पहले से ही बलात्कार का मामला दर्ज था !
ऊबर कैब सर्विस को भले ही इस घटना के बाद दिल्ली – एनसीआर में तत्काल बैन कर दिया गया हो, लेकिन इससे न पीड़ित लड़की का दर्द कम होने वाला और न ही ये गारंटी मिलती है कि भविष्य में फिर ऐसी घटनाएं नहीं होंगी। पीड़ित ने जो भोगा उसे वो जीवन भर चाह कर भी नहीं भुला पाएगी लेकिन उबर कंपनी के अधिकारी लापहरवाह नहीं होते तो शायद इस घटना को होने से रोका जा सकता था।
महिला सुरक्षा पर बहस फिर से जोर पकड़ने लगी है लेकिन सबसे अहम सवाल यह भी है कि देश की राजधानी में एक कंपनी अपनी कैब सर्विस को चलाती है लेकिन दिल्ली – एनसीआर में कहां से वह कंपनी संचालित हो रही है, कहां पर कंपनी का दफ्तर है कोई नहीं जानता..?
आप चाहकर भी कंपनी के दफ्तर का पता नहीं जान सकते..? कंपनी की वेबसाईट में तक कंपनी का न ही कोई पता है और न ही कोई संपर्क नंबर। सबसे अहम बात ये कि परिवहन विभाग को तक ये जानकारी नहीं है कि कंपनी का दफ्तर या मुख्यालय कहां पर स्थित है! इस घटना के बाद जब दिल्ली पुलिस ने कंपनी के दफ्तर पहुंचना चाहा तो ये दिल्ली पुलिस के लिए टेढ़ी खार साबित हुआ। दिल्ली पुलिस को पहले कंपनी का ऐप अपने मोबाईल पर डाउनलोड करना पड़ा और एक कैब बुक करवानी पड़ी, जिसके बाद वे कैब ड्राईवर के जरिए ऊबर कंपनी के दफ्तर पहुंच पाई !
सवाल बड़ा है कि जब एक कैब सर्विस देने वाली कंपनी के बारे में दिल्ली में कोई नहीं जानता तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजधानी में कहां कहां पता नहीं क्या क्या चल रहा होगा ? जिसकी जानकारी न तो पुलिस के पास है और न ही प्रशासन के पास ! आसानी से समझा जा सकता है कि कितनी सुरक्षित है राजधानी ! कितनी सुरक्षित है राजधानी में महिलाएं !

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रविवार, 7 दिसंबर 2014

मोदी, आदर्श गांव और योजना आयोग !

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सासंद आदर्श ग्राम योजना की शुरुआत एक सार्थक कदम लगा, लेकिन उस पर भी राजनीति भारी है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को योजना में फंड की चिंता है तो भाजपा से बौखलाई पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी चाहती हैं कि इस योजना से टीएमसी सांसद दूर रहें। ममता नहीं चाहती कि उनकी पार्टी के सांसद इस योजना के तहत अपने संसदीय क्षेत्र में एक गांव को गोद लें और उसे आदर्श ग्राम बनाएं !
राजनीतिक कारक कितने भारी हैं, इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि जब योजना आयोग के पुनर्गठन को लेकर सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को प्रधानमंत्री मोदी ने अहम बैठक के लिए दिल्ली बुलाते हैं, तो  पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी और जम्म कश्मीर के सीएम उमर अब्दुल्ला बैठक में नहीं पहुंचते हैं। अब ममता और उमर बैठक में न आ पाने का कारण चाहे जो भी गिनाएं लेकिन ये जग जाहिर है कि दोनों की अनुपस्थिति के पीछे सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक कारण है।  
ममता जी , उमर साहब, राजनीति अपनी जगह है, आप राजनीति करो, जाहिर है सत्ता के लिए ! माफ किजिए ! देश सेवा के लिए, जनता की सेवा के लिए ही तो आप राजनीति में आए हैं। लेकिन एक अच्छी पहल को सिर्फ राजनीतिक कारणों से नजरअंदाज करना या उसका विरोध करना कहां तक जायज है। जब राहुल और सोनिया के साथ ही मुलायम सिंह ने तक अपने संसदीय क्षेत्र में एक गांव को आदर्श ग्राम बनाने के लिए चुना तो अच्छा लगा। लेकिन इसके बाद राहुल का फंड के बाने इस पर सवाल उठाना समझ नहीं आया !
एक सांसद की जिम्मेदारी है कि वह अपने संसदीय क्षेत्र की जनता की दुख-तकलीफों की चिंता करे, गांव से लेकर शहरों के विकास के लिए काम करे, सांसद निधि को सही जगह खर्च करे लेकिन अकसर देखने को मिलता है कि पांच साल का कार्यकाल निकल जाता है और अधिकतर सांसद महोदय तो अपनी आधी भी सांसद निधि को खर्च नहीं कर पाते। खर्च कर पाना तो दूर चुनाव जीतने के बाद अपने पूरे संसदीय क्षेत्र में तक नहीं जाते !
इन्हें एक गांव को आदर्श गांव बनाने के लिए काम करना तक जायज नहीं है। कायदे से तो पूरे संसदीय क्षेत्र को आदर्श संसदीय क्षेत्र बनाने के लिए सांसदों को काम करना चाहिए, लेकिन हमारे अति व्यस्त सांसदों के पास जनता के लिए इतना समय कहां है !
आप गांवों को गोद नहीं लेते हैं, आप प्रधानमंत्री की बैठक में नहीं पहुंचते हैं, क्या ये सही है ? वो भी सिर्फ इसलिए कि आपको ऐसा लगता है कि इससे आपके राजनीतिक हित आहत हो रहे हैं !
आप अच्छी योजनाओं को आगे बढ़ाएंगे, राजनीति में अपने व्यक्तिगत हितों को त्याग कर, व्यक्तिगत राग-द्वेष को पीछे छोड़कर काम करेंगे तो आपका मान कम नहीं होगा, बल्कि आपका मान बढ़ेगा ! आपको जनता वे इसलिए चुना है ताकि आप जनता के प्रतिनिधि के रूप में ऐसे फैसले लें जिससे समाज और देश का विकास हो ! उम्मीद करते हैं कि जनसेवा में आपके व्यकिगत हित या राग द्वेष आड़े नहीं आएगा और आप समाज और देश के लिए काम करेंगे  वरना समय किसका रहा है। समय बदलते देर नहीं लगती, बस जनता को चुनाव तक का ही तो इंतजार करना है !

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शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

आतंकी हमले- अब कहानियों को हकीकत में बदलने का वक्त है मोदी जी

लोकतंत्र के उत्सव में खलल डालने के लिए आतंकियों के नापाक मंसूबे बयां करने के लिए काफी है कि उनकी बौखलाहट किस कदर उबाल मार रही है। कश्मीर में एक के बाद एक चार आतंकी हमले जम्मू कश्मीर के विधानसभा चुनावों में खलल डालने की नापाक कोशिश से ज्यादा और कुछ नहीं है। पहले दो चरण में 25 नवंबर और दो दिसंबर को जम्मू कश्मीर में बंपर मतदान के बाद आतंक के आकाओं की बौखलाहट किसी रूप में तो सामने आनी ही थी। ऐसे में आतंकी हमलों के जरिए कश्मीर के वाशिंदों में खौफ पैदा करने के लिए एक के बाद हमले कर आतंकियों ने अपने मंसूबे जाहिर कर दिए हैं कि वे कश्मीर में किसी भी हाल में शांतिपूर्व चुनाव नहीं चाहते हैं। जांबाज सुरक्षाकर्मियों ने भले ही 6 आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया हो, लेकिन इस हमले में 11 सुरक्षाकर्मी भी शहीद हो गए। दिल्ली में बैठकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर गृहमंत्री राजनाथ सिंह और रक्षा मंत्री मनोहर पारिकर तक भले ही आतंकियों को करारा जवाब देने की बात कर रहे हों, लेकिन सवाल ये उठता है कि 12 घंटे में चार आतंकी हमलों के बाद क्या अब भी सिर्फ बातों से ही काम चलेगा ? वो कहते भी हैं कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते हैं, ऐसे में सवाल ये भी उठता है कि इनसे कैसे निबटा जाए ?
जाहिर है जब तक आतंकियों के पनाह देने वालों को ये एहसास नहीं होगा कि उनको इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है, तब तक आतंक के आका सुरक्षित ठिकानों में बैठकर आत्मघाती हमलावरों के जरिए भारत की शांति को भंग करने की नाकाम कोशिश में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे ! इसलिए अब जरूरी है कि देश के दुश्मनों को करारा जवाब दिया जाए।
अब जरूरत है कि आतंकियों तो खत्म करने की कहानियां सुनाकर सत्ता का रास्ता आसान करने वाली भारतीय जनता पार्टी अब सत्ता में है, तो इन कहानियों को हकीकत में बदले। हमारे प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री अब सिर्फ बातें न करें बल्कि आतंक के आकाओं में मौत का वो खौफ पैदा करें कि वे भारत की तरफ आंख उठाने से पहले हजार बार सोचे ! आतंक के पनाहगारों को ये एहसास हो कि भारत के इरादे फौलादी हैं और भारत की तोपों में भी इतना बारूद है कि वो उनका नामो निशान मिटा सकते हैं !   
अमेरिका ने पाकिस्तान में घुसकर ओसामा बिन लादेन की कहानी का अंत कर एक उदाहरण दुनिया के सामने पेश किया था कि वो अपनी धरती को खून से लाल करने वालों को किसी सूरत में नहीं बख्शेगा ! लेकिन सवाल ये है कि क्या मोदी सरकार ये साहस जुटा पाएगी ?


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गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

जनता परिवार- डर के आगे ही जीत है !

डर के आगे ही जीत है, आम चुनाव के बाद कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में कमल खिलने के बाद मुलायम सिंह, लालू, नीतिश और देवीगौड़ा समेत तमाम उन नेताओं ने ये मान ही लिया लगता है। मुलायम के दिल्ली दरबार में हुई बैठक में हाथों में हाथ डालकर जिस तरह ये नेता बैठे थे, उससे तो यही लगता है कि ये मान चुके हैं कि अकेले दम पर ये केन्द्र के बाद एक एक कर राज्यों में खिलते कमल को रोक नहीं सकते !
सत्ता की महत्वकांक्षा मुलायम से लेकर लालू, नीतिश, देवीगौड़ा समेत तमाम इन नेताओं में थी, शायद इसलिए ही इनकी राहें समय के साथ या यूं कहें कि मौका मिलने के साथ साथ अलग होती गईं। सत्ता का सुख लगभग सबने अपने अपने हिस्से का भोगा भी, लेकिन मोदी की आंधी में इनके राजनीतिक भविष्य का दिया अब टिमटिमाने लगा है, इसका एहसास भी इनको जल्दी ही हो गया इसलिए ही अब आगे के लड़ाई अकेले अकेले लड़ने की ताकत शायद इनमें नहीं बची है !
करीब साल भर बाद बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं, तो ढ़ाई साल बाद यूपी का नंबर है, जाहिर है राजनीति की तेजी से बदलती तस्वीर ने इन राजनीतिक सूरमाओं को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर कैसे अपनी राजनीतिक जमीन को खिसकने से बचाया जा सके। मोदी के खिलाफ साथ मिलकर लड़ने के अलावा शायद इनके पास कोई दूसरा रास्ता बचा भी नहीं था। साथ आने के ऐलान भी इन्होंने कर ही दिया है, लेकिन इनका ये समाजवादी जनता परिवार का फार्मूला जनता को कितना भाएगा ये तो चुनावी नतीजे ही तय करेंगे!
सबसे अहम सवाल तो ये है कि क्या साथ मिलकर भाजपा को रोकने का सपना देखने वाले इन राजनीतिक सूरमाओं की व्यक्तिगत महत्वकांक्षाएं एक बार फिर से इनके आड़े नहीं आएंगी ?
क्या किसी एक को ये अपना सर्वोच्च नेता मान पाएंगे और मान पाएंगे तो क्या वर्तमान में कैमरे के सामने दिखाई दे रही इनकी एकजुटता लंबे समय तक या सत्ता के करीब पहुंचने पर कायम रह पाएगी ?
जाहिर है, जिन नेताओं की राहें सत्ता की महत्वकांक्षा के लिए अलग हुई हों, उनका फिर से अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए साथ आना तो समझ में आता है, लेकिन फिर से इनकी राहें जुदा नहीं होंगी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता !
बहरहाल इन नेताओं की जुगलबंदी भविष्य में क्या गुल खिलाएगी, ये तो वक्त ही बताएगा, लेकिन कल तक एक दूसरे को फूटी आंख न सुहाने वाले नेताओं का साथ आना ये बताने के लिए काफी है कि मोदी की आंधी के आगे इनका डर अब धीरे धीरे बढ़ने लगा है, साथ ही इन नेताओं का ये विश्वास भी कि डर के आगे ही जीत है और इस जीत के लिए जरूरी है राजनीतिक मोर्चाबंदी की जिसकी कवायद इन्होंने शुरु कर दी है !


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बुधवार, 3 दिसंबर 2014

भोपाल गैस त्रासदी- 30 साल बाद भी नहीं मिला इंसाफ !

दुनिया के नक्शे पर झीलों की नगरी भोपाल किसी पहचान की मोहताज नहीं है, लेकिन अफसोस ये पहचान ऐसी है, जिसके बारे में सोचकर आज भी रूह कांप उठती है। दुनिया की सबसे भीषण रसायनिक त्रासदी का गवाह बना झीलों का शहर 2-3 दिसंबर 1983 की सर्द रात को पलभर में ही श्मशान में तब्दील हो गया। यूनियन कार्बाईड कारखाने से निकली जहरीली गैस मिथाइल आईसो-सायनाईट ने पलभर में ही हजारों जिंदगियां लील ली। हजारों लोगों को गहरी नींद में ही मौत ने अपने आगोश में ले लिया तो कुछ जान बचाकर बदहवाश से भागे जा रहे थे। किसी को नहीं पता था कि किस दिशा में भागकर अपनी जान बचानी है, लेकिन हर कोई इस घुटन, बेचैनी से दूर भाग जाना चाहता था, जिनकी किस्मत अच्छी थी वो तो बच गए लेकिन अफसोस हर कोई इतना खुशकिस्मत नहीं था।
किस्मत तो इस गैस के प्रभाव में आकर जीवित बचने वालों की भी इतनी अच्छी नहीं थी, क्योंकि उनकी सांसें भले ही न थमी हो लेकिन वे कई तरह की गंभीर बीमारियों का शिकार हो गए। उनके लिए जिंदा रहना किसी श्राप की तरह हो गया था। कुछ ने कुछ सालों के अंतराल में दम तोड़ दिया तो कुछ आज भी इसका दंश झेल रहे हैं। सब कुछ यहीं थम जाता तो ठीक था लेकिन भोपाल की तीसरी पीढ़ी पर भी इसका असर देखा जा रहा है, जो ये बयां करने के लिए काफी है कि 2-3 दिसंबर की रात इस जहरीली गैस ने मौत का कैसा तांडव मचाया होगा।
भोपाल से मेरा तो सीधा तौर पर कोई ताल्लुक नहीं था, बचपन में स्कूली किताबों में भोपाल गैस त्रासदी की याद में बने स्मारक की तस्वीर जेहन में बसी हुई थी। 2008 में जब भोपाल में काम करने का मौका मिला तो स्कूली किताब में छपी वो स्मारक की तस्वीर आंखों के सामने थी। गैस पीड़ित बस्तियां और उसमें बसे लोगों के हालात बताने के लिए काफी थे कि 24 सालों में भोपाल गैस त्रासदी पीड़ितों को उनका हक नहीं मिल पाया था। सरकारी इमदाद में हालांकि कोई कमी नहीं थी, लेकिन वास्तविक हकदार खाली हाथ थे। कुछ ऐसी ही स्थिति गैस पीड़ितों के लिए बनाए गए अस्पतालों की भी थी। अस्पताल की इमारतें तो बुलंद थी लेकिन सुविधाओं और दवाओं के नाम पर कुछ नहीं था।  
पीड़ा तब और भी बढ़ जाती है, जब इस त्रासदी का सबसे बड़ा गुनहगार, हजारों मौत का जिम्मेदार वारेन एंडरसन को सरकार उसके जीते जी सजा दिलाना तो दूर उसे गिरफ्तार तक नहीं कर पाई। ख़बरें तो ये भी थी कि तत्कालीन राज्य और केन्द्र सरकार ने ही उसे भोपाल से निकालकर सुरक्षित विदेश पहुंचाने में पूरी मदद की !
भोपाल की इस भीषण रसायनिक त्रासदी अब तीस वर्ष पूरे कर चुकी है, तो एक बार फिर से गैस पीड़ितों के जख्म हरे हो गए हैं। इस बार ये जख्म इसलिए भी ज्यादा तकलीफ दे रहे हैं क्योंकि इस त्रासदी का गुनहगार बिना सजा पाए ही आराम से अपनी हिस्से की जंदगी जी कर इस दुनिया को छोड़ चुका है, इसके साथ ही अधूरी रह गई है, गैस पीड़ितों के इंसाफ की लड़ाई !

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रविवार, 23 नवंबर 2014

सही कहा, लोग जल रहे हैं !

आपके पूज्य समाजवादी पिताजी मुलायम सिंह के शाही जन्मदिन का जश्न देखकर लोग जल रहे हैं, सही पहचाना आपने अखिलेश जी ! सही पहचाना, लोग जल रहे हैं ! यूपी में जिन गरीबों के पास दो वक्त की रोटी के लिए पैसे नहीं है, वे अगर 70 फिट लंबा केक कटते देखेंगे तो जलेंगे ही न ! जिस साईकिल पर सवार करके यूपी की जनता ने आपको सत्ता तक पहंचाया, उस जनता के पास साईकिल भी नहीं है, और नेताजी 70 लाख की बग्घी में रामपुर में सवारी कर रहे हैं तो लोग जलेंगे ही न !
आपने गलत तो कुछ नहीं कहा, लेकिन आपका भाव शायद अलग था। भाव ये कि आपके विरोधी जल रहे हैं, लेकिन असल में जल विरोधी नहीं रह हैं ! जल रही है तो यूपी की गरीब जनता, जिनको समाजवादी सरकार से बड़ी उम्मीदें थी ! लेकिन जब उम्मीदों के दिए अहंकार की आंधी में बुझ जाते हैं, तो कुछ तो जलेगा ही ! खुद को समाजवादी कहलाने वाले लोग ही जब समजवाद की खाई को पाटने की बजाए और चौड़ी करने में तुल जाएं तो क्या कर सकते हैं ! लेकिन आपको शायद इससे कोई फर्क नहीं पड़ता!
जन्मदिन मनाना कोई गलत नहीं ! सादगी से जन्मदिन मना लेते और इस शाही इंतजाम में खर्च अनुमानित करोड़ों रूपए को गरीब जनता की मुश्किलें दूर करने में खर्च कर लेते तो शायद जन्मदिन पर जनता का असली आशीर्वाद आपको मिलता  ! लेकिन आपको शायद इस बात का एहसास हो चुका है कि अब आपके दिन ऐशो आराम वाले दिन भी जल्द ही लदने वाले हैं, ऐसे में आप जनता की परवाह क्यों करने लगे भला !
जनता ने आपको सत्ता दी इस भरोसे के साथ कि आप उनकी चिंता करेंगे, उनकी बुरे दिनों को अच्छे दिनों में बदलने की तरफ कदम बढ़ाएंगे, उनकी समस्याओं के समाधान की तरफ कदम बढ़ा कर कम से कम उन्हें मूलभूत सुविधाएं तो मुहैया कराएंगे ! लेकिन अफसोस ये होता नहीं दिख रहा है !
जन्मदिन के आयोजन की ये फुर्ती अगर सरकारी योजनाओं को जल्द से जल्द पूरा करने में दिखाई गई होती तो शायद यूपी की तस्वीर कुछ और होती ! इस बात को तो आप नकार भी नहीं सकते, खुद नेताजी ये कह चुके हैं कि काम की रफ्तार बहुत सुस्त है, मतलब साफ है सरकार की सुस्ती कम होने का नाम नहीं ले रही ! बहरहाल उम्मीद पर दुनिया कायम है, और उम्मीद करते हैं, कि शायद अब आपकी नींद खुलेगी और जनता की उम्मीदें पूरी होंगी !


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