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शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

आतंकी हमले- अब कहानियों को हकीकत में बदलने का वक्त है मोदी जी

लोकतंत्र के उत्सव में खलल डालने के लिए आतंकियों के नापाक मंसूबे बयां करने के लिए काफी है कि उनकी बौखलाहट किस कदर उबाल मार रही है। कश्मीर में एक के बाद एक चार आतंकी हमले जम्मू कश्मीर के विधानसभा चुनावों में खलल डालने की नापाक कोशिश से ज्यादा और कुछ नहीं है। पहले दो चरण में 25 नवंबर और दो दिसंबर को जम्मू कश्मीर में बंपर मतदान के बाद आतंक के आकाओं की बौखलाहट किसी रूप में तो सामने आनी ही थी। ऐसे में आतंकी हमलों के जरिए कश्मीर के वाशिंदों में खौफ पैदा करने के लिए एक के बाद हमले कर आतंकियों ने अपने मंसूबे जाहिर कर दिए हैं कि वे कश्मीर में किसी भी हाल में शांतिपूर्व चुनाव नहीं चाहते हैं। जांबाज सुरक्षाकर्मियों ने भले ही 6 आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया हो, लेकिन इस हमले में 11 सुरक्षाकर्मी भी शहीद हो गए। दिल्ली में बैठकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर गृहमंत्री राजनाथ सिंह और रक्षा मंत्री मनोहर पारिकर तक भले ही आतंकियों को करारा जवाब देने की बात कर रहे हों, लेकिन सवाल ये उठता है कि 12 घंटे में चार आतंकी हमलों के बाद क्या अब भी सिर्फ बातों से ही काम चलेगा ? वो कहते भी हैं कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते हैं, ऐसे में सवाल ये भी उठता है कि इनसे कैसे निबटा जाए ?
जाहिर है जब तक आतंकियों के पनाह देने वालों को ये एहसास नहीं होगा कि उनको इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है, तब तक आतंक के आका सुरक्षित ठिकानों में बैठकर आत्मघाती हमलावरों के जरिए भारत की शांति को भंग करने की नाकाम कोशिश में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे ! इसलिए अब जरूरी है कि देश के दुश्मनों को करारा जवाब दिया जाए।
अब जरूरत है कि आतंकियों तो खत्म करने की कहानियां सुनाकर सत्ता का रास्ता आसान करने वाली भारतीय जनता पार्टी अब सत्ता में है, तो इन कहानियों को हकीकत में बदले। हमारे प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री अब सिर्फ बातें न करें बल्कि आतंक के आकाओं में मौत का वो खौफ पैदा करें कि वे भारत की तरफ आंख उठाने से पहले हजार बार सोचे ! आतंक के पनाहगारों को ये एहसास हो कि भारत के इरादे फौलादी हैं और भारत की तोपों में भी इतना बारूद है कि वो उनका नामो निशान मिटा सकते हैं !   
अमेरिका ने पाकिस्तान में घुसकर ओसामा बिन लादेन की कहानी का अंत कर एक उदाहरण दुनिया के सामने पेश किया था कि वो अपनी धरती को खून से लाल करने वालों को किसी सूरत में नहीं बख्शेगा ! लेकिन सवाल ये है कि क्या मोदी सरकार ये साहस जुटा पाएगी ?


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गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

जनता परिवार- डर के आगे ही जीत है !

डर के आगे ही जीत है, आम चुनाव के बाद कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में कमल खिलने के बाद मुलायम सिंह, लालू, नीतिश और देवीगौड़ा समेत तमाम उन नेताओं ने ये मान ही लिया लगता है। मुलायम के दिल्ली दरबार में हुई बैठक में हाथों में हाथ डालकर जिस तरह ये नेता बैठे थे, उससे तो यही लगता है कि ये मान चुके हैं कि अकेले दम पर ये केन्द्र के बाद एक एक कर राज्यों में खिलते कमल को रोक नहीं सकते !
सत्ता की महत्वकांक्षा मुलायम से लेकर लालू, नीतिश, देवीगौड़ा समेत तमाम इन नेताओं में थी, शायद इसलिए ही इनकी राहें समय के साथ या यूं कहें कि मौका मिलने के साथ साथ अलग होती गईं। सत्ता का सुख लगभग सबने अपने अपने हिस्से का भोगा भी, लेकिन मोदी की आंधी में इनके राजनीतिक भविष्य का दिया अब टिमटिमाने लगा है, इसका एहसास भी इनको जल्दी ही हो गया इसलिए ही अब आगे के लड़ाई अकेले अकेले लड़ने की ताकत शायद इनमें नहीं बची है !
करीब साल भर बाद बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं, तो ढ़ाई साल बाद यूपी का नंबर है, जाहिर है राजनीति की तेजी से बदलती तस्वीर ने इन राजनीतिक सूरमाओं को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर कैसे अपनी राजनीतिक जमीन को खिसकने से बचाया जा सके। मोदी के खिलाफ साथ मिलकर लड़ने के अलावा शायद इनके पास कोई दूसरा रास्ता बचा भी नहीं था। साथ आने के ऐलान भी इन्होंने कर ही दिया है, लेकिन इनका ये समाजवादी जनता परिवार का फार्मूला जनता को कितना भाएगा ये तो चुनावी नतीजे ही तय करेंगे!
सबसे अहम सवाल तो ये है कि क्या साथ मिलकर भाजपा को रोकने का सपना देखने वाले इन राजनीतिक सूरमाओं की व्यक्तिगत महत्वकांक्षाएं एक बार फिर से इनके आड़े नहीं आएंगी ?
क्या किसी एक को ये अपना सर्वोच्च नेता मान पाएंगे और मान पाएंगे तो क्या वर्तमान में कैमरे के सामने दिखाई दे रही इनकी एकजुटता लंबे समय तक या सत्ता के करीब पहुंचने पर कायम रह पाएगी ?
जाहिर है, जिन नेताओं की राहें सत्ता की महत्वकांक्षा के लिए अलग हुई हों, उनका फिर से अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए साथ आना तो समझ में आता है, लेकिन फिर से इनकी राहें जुदा नहीं होंगी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता !
बहरहाल इन नेताओं की जुगलबंदी भविष्य में क्या गुल खिलाएगी, ये तो वक्त ही बताएगा, लेकिन कल तक एक दूसरे को फूटी आंख न सुहाने वाले नेताओं का साथ आना ये बताने के लिए काफी है कि मोदी की आंधी के आगे इनका डर अब धीरे धीरे बढ़ने लगा है, साथ ही इन नेताओं का ये विश्वास भी कि डर के आगे ही जीत है और इस जीत के लिए जरूरी है राजनीतिक मोर्चाबंदी की जिसकी कवायद इन्होंने शुरु कर दी है !


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बुधवार, 3 दिसंबर 2014

भोपाल गैस त्रासदी- 30 साल बाद भी नहीं मिला इंसाफ !

दुनिया के नक्शे पर झीलों की नगरी भोपाल किसी पहचान की मोहताज नहीं है, लेकिन अफसोस ये पहचान ऐसी है, जिसके बारे में सोचकर आज भी रूह कांप उठती है। दुनिया की सबसे भीषण रसायनिक त्रासदी का गवाह बना झीलों का शहर 2-3 दिसंबर 1983 की सर्द रात को पलभर में ही श्मशान में तब्दील हो गया। यूनियन कार्बाईड कारखाने से निकली जहरीली गैस मिथाइल आईसो-सायनाईट ने पलभर में ही हजारों जिंदगियां लील ली। हजारों लोगों को गहरी नींद में ही मौत ने अपने आगोश में ले लिया तो कुछ जान बचाकर बदहवाश से भागे जा रहे थे। किसी को नहीं पता था कि किस दिशा में भागकर अपनी जान बचानी है, लेकिन हर कोई इस घुटन, बेचैनी से दूर भाग जाना चाहता था, जिनकी किस्मत अच्छी थी वो तो बच गए लेकिन अफसोस हर कोई इतना खुशकिस्मत नहीं था।
किस्मत तो इस गैस के प्रभाव में आकर जीवित बचने वालों की भी इतनी अच्छी नहीं थी, क्योंकि उनकी सांसें भले ही न थमी हो लेकिन वे कई तरह की गंभीर बीमारियों का शिकार हो गए। उनके लिए जिंदा रहना किसी श्राप की तरह हो गया था। कुछ ने कुछ सालों के अंतराल में दम तोड़ दिया तो कुछ आज भी इसका दंश झेल रहे हैं। सब कुछ यहीं थम जाता तो ठीक था लेकिन भोपाल की तीसरी पीढ़ी पर भी इसका असर देखा जा रहा है, जो ये बयां करने के लिए काफी है कि 2-3 दिसंबर की रात इस जहरीली गैस ने मौत का कैसा तांडव मचाया होगा।
भोपाल से मेरा तो सीधा तौर पर कोई ताल्लुक नहीं था, बचपन में स्कूली किताबों में भोपाल गैस त्रासदी की याद में बने स्मारक की तस्वीर जेहन में बसी हुई थी। 2008 में जब भोपाल में काम करने का मौका मिला तो स्कूली किताब में छपी वो स्मारक की तस्वीर आंखों के सामने थी। गैस पीड़ित बस्तियां और उसमें बसे लोगों के हालात बताने के लिए काफी थे कि 24 सालों में भोपाल गैस त्रासदी पीड़ितों को उनका हक नहीं मिल पाया था। सरकारी इमदाद में हालांकि कोई कमी नहीं थी, लेकिन वास्तविक हकदार खाली हाथ थे। कुछ ऐसी ही स्थिति गैस पीड़ितों के लिए बनाए गए अस्पतालों की भी थी। अस्पताल की इमारतें तो बुलंद थी लेकिन सुविधाओं और दवाओं के नाम पर कुछ नहीं था।  
पीड़ा तब और भी बढ़ जाती है, जब इस त्रासदी का सबसे बड़ा गुनहगार, हजारों मौत का जिम्मेदार वारेन एंडरसन को सरकार उसके जीते जी सजा दिलाना तो दूर उसे गिरफ्तार तक नहीं कर पाई। ख़बरें तो ये भी थी कि तत्कालीन राज्य और केन्द्र सरकार ने ही उसे भोपाल से निकालकर सुरक्षित विदेश पहुंचाने में पूरी मदद की !
भोपाल की इस भीषण रसायनिक त्रासदी अब तीस वर्ष पूरे कर चुकी है, तो एक बार फिर से गैस पीड़ितों के जख्म हरे हो गए हैं। इस बार ये जख्म इसलिए भी ज्यादा तकलीफ दे रहे हैं क्योंकि इस त्रासदी का गुनहगार बिना सजा पाए ही आराम से अपनी हिस्से की जंदगी जी कर इस दुनिया को छोड़ चुका है, इसके साथ ही अधूरी रह गई है, गैस पीड़ितों के इंसाफ की लड़ाई !

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रविवार, 23 नवंबर 2014

सही कहा, लोग जल रहे हैं !

आपके पूज्य समाजवादी पिताजी मुलायम सिंह के शाही जन्मदिन का जश्न देखकर लोग जल रहे हैं, सही पहचाना आपने अखिलेश जी ! सही पहचाना, लोग जल रहे हैं ! यूपी में जिन गरीबों के पास दो वक्त की रोटी के लिए पैसे नहीं है, वे अगर 70 फिट लंबा केक कटते देखेंगे तो जलेंगे ही न ! जिस साईकिल पर सवार करके यूपी की जनता ने आपको सत्ता तक पहंचाया, उस जनता के पास साईकिल भी नहीं है, और नेताजी 70 लाख की बग्घी में रामपुर में सवारी कर रहे हैं तो लोग जलेंगे ही न !
आपने गलत तो कुछ नहीं कहा, लेकिन आपका भाव शायद अलग था। भाव ये कि आपके विरोधी जल रहे हैं, लेकिन असल में जल विरोधी नहीं रह हैं ! जल रही है तो यूपी की गरीब जनता, जिनको समाजवादी सरकार से बड़ी उम्मीदें थी ! लेकिन जब उम्मीदों के दिए अहंकार की आंधी में बुझ जाते हैं, तो कुछ तो जलेगा ही ! खुद को समाजवादी कहलाने वाले लोग ही जब समजवाद की खाई को पाटने की बजाए और चौड़ी करने में तुल जाएं तो क्या कर सकते हैं ! लेकिन आपको शायद इससे कोई फर्क नहीं पड़ता!
जन्मदिन मनाना कोई गलत नहीं ! सादगी से जन्मदिन मना लेते और इस शाही इंतजाम में खर्च अनुमानित करोड़ों रूपए को गरीब जनता की मुश्किलें दूर करने में खर्च कर लेते तो शायद जन्मदिन पर जनता का असली आशीर्वाद आपको मिलता  ! लेकिन आपको शायद इस बात का एहसास हो चुका है कि अब आपके दिन ऐशो आराम वाले दिन भी जल्द ही लदने वाले हैं, ऐसे में आप जनता की परवाह क्यों करने लगे भला !
जनता ने आपको सत्ता दी इस भरोसे के साथ कि आप उनकी चिंता करेंगे, उनकी बुरे दिनों को अच्छे दिनों में बदलने की तरफ कदम बढ़ाएंगे, उनकी समस्याओं के समाधान की तरफ कदम बढ़ा कर कम से कम उन्हें मूलभूत सुविधाएं तो मुहैया कराएंगे ! लेकिन अफसोस ये होता नहीं दिख रहा है !
जन्मदिन के आयोजन की ये फुर्ती अगर सरकारी योजनाओं को जल्द से जल्द पूरा करने में दिखाई गई होती तो शायद यूपी की तस्वीर कुछ और होती ! इस बात को तो आप नकार भी नहीं सकते, खुद नेताजी ये कह चुके हैं कि काम की रफ्तार बहुत सुस्त है, मतलब साफ है सरकार की सुस्ती कम होने का नाम नहीं ले रही ! बहरहाल उम्मीद पर दुनिया कायम है, और उम्मीद करते हैं, कि शायद अब आपकी नींद खुलेगी और जनता की उम्मीदें पूरी होंगी !


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सोमवार, 17 नवंबर 2014

लैपटॉप ने तोड़ा पीएम बनने का सपना !

बोला था बेटा, लैपटॉप न बांटों, लेकिन हमारी सुनता कौन है ? देख लिया नतीज इस ससुरे लैपटॉप ने ऐसी फिल्म दिखाई की यूपी में तो बत्ती गुल हो ही गई, साथ ही प्रधानमंत्री बनने का सपना भी धरा का धरा रह गया। अब क्या फर्क रह गया हममें और लाल कृष्ण आडवाणी में, हम भी आडवाणी की तरह पीएम इन वेटिंग ही रह गए !
सोचा था यूपी में तो अपनी सरकार है ही, आम चुनाव में अपने बूते इतनी सीटें ले आएंगे कि तीसरे मोर्चे के चौधरी बनकर पीएम की कुर्सी के लिए मोल भाव कर सकें, लेकिन लैपटॉप क्या बांटे, इन लैपटॉप ने तो बंटाधार ही कर दिया ! जिस लैपटॉप के सहारे यूपी फतह कर पीएम बनाने का सपना अखिलेश ने देखा था, उस यूपी को इसी लैपटॉप के सहारे मोदी ने फतह कर पीएम की कुर्सी हासिल कर ली ! चुनाव के दौरान इस लैपटॉप पर मोदी की फोटो और भाषण देखकर लोगों ने कमल के फूल का बटन दबा दिया और हमारी साईकिल 5 कदम चलकर ही पंचर हो गई !
जी हां बात नेता जी की हो रही है, समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की। जिनका पीएम न बन पाने का दर्द आम चुनाव के 6 महीने के बाद जुबां पर आया।
लखनऊ में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महिला सम्मेलन में जब नेता जी के बोलने की बारी आई, तो नेता जी ने पहले तो अखिलेश सरकार की योजनाओं और कार्यों का खूब बखान किया, लेकिन मुफ्त लैपटॉप योजना से कैसे समाजवादी पार्टी की बजाए नरेन्द्र मोदी ने इसका फायदा उठाया ये बताना भी मुलायम सिंह नहीं भूले ! ये बात गौर करने वाली है कि लैपटॉप की महिमा समझने में मुलायम सिंह को 6 महीने क्यों लग गए ?
नेता जी आम चुनाव के नतीजे आने के 6 महीने बाद भी यूपी में समाजवादी पार्टी की हार को पचा नहीं पाए हैं, शायद इसलिए ही नेता जी हार के नए नए कारणों को खोजने में लगे हैं ! लेकिन नेता जी जरा इस सवाल का जवाब देंगे कि जिस यूपी में आपके गृहक्षेत्र इटावा को छोड़कर लोगों को बिजली बमुश्किल मिल पाती हो, वहां पर कैसे लोग लैपटॉप को चार्ज ही कर पाते होंगे, उसमें मोदी के भाषण सुनना तो दूर की बात है !
नेताजी कहीं ये 2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की संभावित हार का डर तो अभी से आपको नहीं सता रहा ! 2012 में प्रचंड बहुमत पाने वाली समाजवादी पार्टी का आम चुनाव में हश्र देखकर चिंता होना लाजिमी भी है। शायद इसलिए ही आप लालू यादव, नीतिश कुमार और दूसरी पार्टी के नेताओं के साथ मिलकर जनता परिवार को फिर से जिंदा करने की कोशिशों में भी जुटे हुए हैं, ताकि कहीं मोदी फिर से आपकी सरकार की किसी योजना को इस्तेमाल आपके खिलाफ करके यूपी में सत्ता परिवर्तन करा दें ! बहरहाल 2017 में कौन यूपी में जीत का परचम लहराएगा ये तो वक्त की बताएगा लेकिन लगता है, नेता जी की रातों की नींद अभी से हराम हो गई है !

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शनिवार, 15 नवंबर 2014

छत्तीसगढ़िया, सबसे बढ़िया !



छत्तीसगढ़िया, सबसे बढ़िया, छत्तीसगढ़ की रमन सरकार का कुछ ऐसा ही विज्ञापन टीवी पर खूब दिखाई दे रहा है। बताया जा रहा है कि छत्तीसगढ़िया सबसे बढ़िया क्यों हैं? रमन सिंह सरकार के विकास कार्यों की झलक के जरिए छत्तीसगढ़ के लोगों की खुशहाली की तस्वीरों को खूब दिखाया जा रहा है। छत्तीसगढ़ वाले किस हाल में हैं, इसे उनसे बेहतर और कौन समझ सकता है? लेकिन छत्तीसगढ़िया असल में कितने बढ़िया है, छत्तीसगढ़ की रमन सरकार कितना बढ़िया काम कर रही है, इसका ताजा उदाहरण है, बिलासपुर का नसबंदी कांड, जिसने 15 महिलाओं की जान ले ली!
वाकई में रमन सिंह जी छत्तीसगढ़ बहुत बढ़िया है, इतना बढ़िया कि यहां सरकारी दवाओं से मरीजों को जिंदगी नहीं सीधे मौत मिलती है। बिना किसी तकलीफ के सीधे मोक्ष प्राप्त होता है! अब इतनी अच्छी और कारगार दवाएं तो सबसे बढ़िया छत्तीसगढ़िया में ही मिल सकती हैं न! इतना बढ़िया कि मां के दुनिया से विदा हो जाने के बाद उसके दुधमुंहे बच्चे को कोई देखने वाला नहीं है! उसके पास भूख से बिलखने के आलावा कोई चारा नहीं है! उसके पास मां का आंचल नहीं है!
क्या हाल हो रहा होगा उन दुधमुंहे बच्चों का या जो बच्चे अभी अपनी मां की ऊंगली पकडकर बमुश्किल चलना ही सीख पाए थे। सोच कर ही रूह कांप उठती है! लेकिन आपके लिए तो छत्तीसगढ़िया सबसे बढ़िया है!
आप इसका बखान करने से भी नहीं चूक रहे हैं, लाखों रूपया इस पर आपने जरूर फूंक ही दिया होगा! इसका आधी रकम भी राज्य के किसी पिछले गांव में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने में खर्च करते, जानलेवा दवाओं की जगह जिंदगी देने वाली दवाओं को खरीदने में खर्च करते तो शायद आज ये दिन नहीं देखना पड़ता!
दुधमुंहे बच्चों के सिर से उनकी मां का आंचल नहीं छिनता! लेकिन आपकी सरकार को तो इसकी शायद आदत सी हो गई है। पहले आंखों की रोशनी लौटाने के नाम आपके होनहार चिकित्सकों ने लोगों की जिंदगी में अंधेरे भर दिया!
याद तो होगा ही शायद आपको, शायद न भी हो, क्योंकि रोशनी आपके किसी अपने की आंखों की नहीं गई थी! गई होती तो शायद एक बार फिर से ऐसी ही लापरवाही का नमूना देखने को नहीं मिलता !
अब इसकी परतें उधड़ रही हैं, तो ऐसी ऐसी सच्चाई सामने आ रही कि पैरों तले जमीन ही खिसक जाए!
शुरआती जांच में दवाओं में चूहा मारने वाले कैमिकल का पाया जाना! दो साल पहले ब्लैकलिस्ट कर दी गई दवा बनाने वाले कंपनी से अब भी दवाएं खरीदना! टारगेट पूरा करने के लिए निर्दोष लोगों की जान से खिलवाड़ करना! और न जाने क्या क्या? अभी तो इस पूरी घटना का पोस्टमार्टम होना बाकी है! और न जाने क्या क्या काला सच सामने आने की पूरी उम्मीद है!
सीएम साहब कार्रवाई करने की बात कर रहे हैं! लेकिन रमन सिंह साहब को कौन समझाए कि कार्रवाई करने से, एक दो डॉक्टरों को सस्पेंड करने से, उनके खिलाफ एफआईआर करने से अपनी मां तो खो चुके बच्चों को उनकी मां वापस नहीं मिल जाएगी! जब आप ही के राज्य में बालौद में लोगों की आंखों की रोशनी चली गई थी, उस वक्त भी आप जाग जाते और ऐसे कैंपों को टारगेट पूरा करने का जरिया न बनने देते और ये कैंप बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं से लैस होते तो शायद कोई बच्चा अपनी मां के इंतजार में सारी रात रो रोकर काटने को मजबूर न होता!
क्या ऐसे ही होता है छत्तीसगढ़िया सबसे बढ़िया रमन सिंह जी ? क्या ऐसे ही होता है?
  
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शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

सत्ता, शरद पवार और झाड़ू !

अपने पूरे परिवार के साथ राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी प्रमुख शरद पवार ने हाथ में झाड़ू लेकर स्वच्छ भारत अभियान में हिस्सा लिया तो अच्छा लगा कि एक अच्छे मकसद के लिए शुरु की गई इस मुहिम में शरद पवार राजनीति से ऊपर उठकर भागीदार बने। ऑस्ट्रेलिया से प्रधानमंत्री मोदी ने भी शरद पवार के इस कदम की सराहना करते हुए ट्विट कर दिया। लेकिन शरद पवार एंड फैमिली के स्वच्छ भारत अभियान में जुड़ने के पीछे का असल मकसद क्या है ? ये सवाल शरद पवार के हाथ में झाड़ू देखने के बाद से लगातार जेहन में उमड़ घुमड़ रहा है।
शरद पवार की नीयत पर शक शायद नहीं होता, लेकिन शरद पवार एंड फैमिली के स्वच्छता अभियान में जुड़ने की टाईमिंग यह सोचने पर मजबूर करती है ! शरद पवार एंड फैमिली ने हाथ में झाड़ू उस वक्त उठाया, जब भाजपा शिवसेना से बात न बनने के बाद खुशी खुशी एऩसीपी के समर्थन से महाराष्ट्र सदन में विश्वास मत हासिल करने में जरा भी नहीं हिचकिचाई !  
केन्द्र में यूपीए सरकार में भागीदार एनसीपी आम चुनाव में यूपीए की करारी हार के बाद सत्ता सुख खो चुकी थी। बचा था, महाराष्ट्र लेकिन वहां पर भी कांग्रेस से अलग होकर अकेले दम पर सरकार बनाने के सपना देख रही एनसीपी का सपना चकनाचूर हो गया। ऐसे में सत्ता का सुख न भी भोगा जाए तो कैसे सत्ताधारियों के करीब रहा जाए, उनसे दोस्ती बढ़ाई जाए, इसका रास्ता एनसीपी ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के पूरे नतीजे आने से पहले ही ढ़ूंढ़ लिया था। भाजपा को स्पष्ट बहुमत तक न पहुंचते देख एनसीपी ने भाजपा को बिना शर्त बाहर से समर्थन का ऐलान कर दिया।
हालांकि भाजपा ने शिवसेना का विकल्प खुला रखा था, लेकिन जब बात नहीं बनी तो आखिर एनसीपी की मदद से ही भाजपा सरकार ने महाराष्ट्र विधानसभा में विश्वास मत हासिल कर लिया।
एनसीपी का ये दांव काम कर गया तो उसका हौसला बढ़ना लाजिमी था, ऐसे में एनसीपी को भी एहसास हो गया कि सत्ताधारियों से नजदीकीयां बढ़ाने का उसका कदम व्यर्थ नहीं जा रहा है। महाराष्ट्र में भाजपा सरकार बनवाने के बाद नजदीकीयां बढ़ाने का इससे अच्छा मौका क्या हो सकता था, कि हाथ में झाड़ू लेकर स्वच्छ भारत अभियान का झंडा बुलंद किया जाए और प्रधानमंत्री की नजरों में आया जाए। हुआ भी ऐसा ही और पीएम मोदी ने ऑस्ट्रेलिया से ही शरद पवार के झाड़ू उठाने के तस्वीरें सामने आने के कुछ ही देर बाद शरद पवार की तारीफ में ट्विट कर डाला।
शरद पवार की सत्ता से नजदीकी बढ़ाने को लेकर उनकी बेचैनी समझी जा सकती है, लेकिन महाराष्ट्र में एनसीपी को पानी पी पी कर कोसने वाली भाजपा का एनसीपी क सहयोग से सरकार बनाना समझ से परे है। रणनीति भाजपा और एनसीपी की जो भी हो, लेकिन अपने – अपने फायदे की राजनीति में जनता से किए वादों को भूल जाना का दस्तूर बदस्तूर जारी है।
फिलहाल तो सबकी नजरें इस पर हैं कि शरद पवार की पावर से महाराष्ट्र में सरकार गठित करने वाली भाजपा का एनसीपी के लिए भविष्य में क्या रूख रहता है और शरद पवार भाजपा को और कैसे कैसे सहयोग और समर्थन देते हैं। कुल मिलाकर कहा जाए तो भाजपा और एनसीपी की नजदीकियां जैसे जैसे बढ़ेंगी वैसे वैसे सवाल की फेरहिस्त भी लंबी होती जाएगी, जिसका जवाब देना भाजपा और एनसीपी दोनों के लिए ही आसान नहीं होगा !


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गुरुवार, 13 नवंबर 2014

“Justice Delayed is Justice Denied”

हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दंभ भरते हैं, लेकिन एक सच ये भी है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में इंसाफ की लड़ाई इससे भी बड़ी औऱ मुश्किल है ! गुजरते वक्त के साथ तस्वीरें यकीनन धुंधली पड़ चुकी थी, लेकिन 39 वर्ष बाद देश के तत्कालीन रेलमंत्री एल एन मिश्रा हत्याकांड पर फैसला आने की ख़बर के साथ धुंधली पड़ चुकी यादों को ताजा करने की कवायद शुरु होती है। साथ ही एक बार फिर से ये सवाल जेहन में उठता है, कि आखिर क्यों इंसाफ की लड़ाई दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में इंसाफ की लड़ाई इतनी लंबी हो जाती है, कि अक्सर लोग इंसाफ की इस लड़ाई से लड़ते लड़ते ही हार मान लेते हैं, लेकिन उन्हें इंसाफ नहीं मिलता ! इंसाफ मिलता भी है तो इतनी देर से कि कई बार उसका कोई मतलब ही नहीं रह जाता !  अंग्रेजी की ये कहावत “Justice Delayed is Justice Denied” यहां पर एकदम सटीक बैठती है।
दो जनवरी 1975 को देश के तत्कालीन रेलमंत्री एन एन मिश्रा की बिहार के समस्तीपुर-मुजफ्फरपुर (बिहार) ब्राड गेज रेल लाईन के उदघाटन के मौके पर समस्तीपुर में बम धमाके में हुई मौत के बाद भी नवंबर 2014 तक इश हत्याकांड नें फैसला न आना इसकी ताजा मिसाल है। 39 वर्ष बाद जैसे तैसे फैसले की तारीख करीब आती भी है, तो अदालत ये कहते हुए फैसले की तारीख आगे बढ़ाकर 8 दिसंबर कर देती है कि फैसला अभी तैयार नहीं है !    
इंतजार 8 दिसंबर का है कि आखिर इस हाई प्रोफाईल हत्याकांड में 39 वर्ष बाद ही सही अदालत क्या फैसला सुनाती है ?  39 वर्ष के लंबे इंतजार को देखते हुए तो अब 8 दिसंबर को लेकर भी संशय है कि फैसला 8 दिसंबर को आ ही जाएगा !
कहते हैं देर आए दुरुस्त आए लेकिन इंसाफ अगर इतनी देर से आए, तो इसे दुरुस्त कैसे कहा जा सकता है ? इसको समझने के लिए इस हत्याकांड के मुख्य आरोपी के जीवनकाल को समझना होगा ! रंजन जो जो अन्य लोगों के साथ इस हत्याकांड का आरोपी है, उसकी उम्र इस हत्याकाडं के वक्त जनवरी 1975 को महज 24 वर्ष थी। घटना को 39 वर्ष बीत चुके हैं और रंजन की उम्र अभी करीब 63 वर्ष है। इस हत्याकांड के एक आरोपी की इस दौरान मौत भी हो चुकी है। इसी तरह दूसरे आरोपियों भी उम्र के अंतिम पड़ाव पर हैं। ठीक इसी तरह इंसाफ की आस लगाए बैठे तत्कालीन रेल मंत्री एल एन मिश्रा के परिजन भी लगभग इसी स्थिति में होंगे! हो सकता है कि 39 वर्ष बाद अब 8 दिसंबर को अदालत आरोपियों को दोषी करार देते हुए सजा सुना भी दे। लेकिन सवाल है कि क्या वाकई में इंसाफ की आस लगाए बैठे लोगों को इंसाफ मिल पाया ! बात सिर्फ तत्कालीन रेल मंत्री एल एन मिश्रा हत्याकांड की ही नहीं है, शिक्षक भर्ती घोटाले में हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला को भी उस मामले में 13 वर्ष बाद सजा हुई। ऐसे कई मामले हैं, जो देश की विभिन्न अदालतों में सालों से लंबित हैं !
देश की सर्वोच्च अदालत की ही अगर बात करें तो एक आंकड़े के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या 60 हजार के करीब है, तो देशभर के विभिन्न उच्च न्यायालयों में वर्ष 2011 तक लंबित मामलों की संख्या करीब 43 लाख 22 हजार थी अंदाजा लगाया जा सकता है कि देशभर की निचली अदालतों में लंबित मामलों की संख्या कितनी होगी?
हालांकि इसके पीछे की बड़ी वजह विभिन्न अदालतों में बड़ी संख्या में जजों के रिक्त पदों का होना भी है, लेकिन वजह चाहे जो भी इंसाफ देर से मिला तो यही कहा जाएगा- “Justice Delayed is Justice Denied”.


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बुधवार, 12 नवंबर 2014

भाजपा सरकार और नैचुरली करप्ट पार्टी !

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के साथ साझा रूप से सरकार चला रही एनसीपी को नैचुरली करप्ट पार्टी का तमगा देकर जमकर निशाना साधा और लोगों से वोट की अपील की थी। प्रधानमंत्री मोदी ने तो अपने चुनावी भाषण में एनसीपी के चुनाव चिन्ह को लेकर भी जमकर तंज भी कसे थे कि कैसे एनसीपी की घड़ी की सुई पहले दिन से सिर्फ 10 बजकर 10 मिनट पर ही अटकी हुई है। 19 अक्टूबर को जब चनाव के नतीजे आए तो महाराष्ट्र में सबसे बड़े दल के रूप में उभरने वाली भाजपा के पास खुश होने की वाजिब वजह थी लेकिन एक मुश्किल ये थी कि भाजपा बहुमत के जादुई आंकड़े से कुछ कदम दूर ही रह गई।
शिव सेना के साथ आने के लिए विकल्प खुले थे, लेकिन भाजपा और शिवसेना दोनों की तरफ से शर्तों का पहाड़ सामने खड़ा था। बयानों के लंबे दौर के बीच विधानसभा में विश्वास मत हासिल करने की तारीख आ गई, लेकिन भाजपा और शिव सेना में बात नहीं बन पाई। आखिरकार विश्वास मत से कुछ घंटे पहले शिव सेना ने लंबी जद्दोजहद के बाद ऐलान कर दिया कि वह विपक्ष में बैठेगी।
भाजपा के लिए ये चिंता की बात इसलिए भी नहीं थी, क्योंकि एनसीपी चुनावी नतीजे के दिन ही भाजपा को बाहर से समर्थन देने का ऐलान कर चुकी थी। शायद यही वजह थी कि भाजपा ने शिवसेना की नाराजगी को सिर्फ नाराजगी के तौर पर ही लिया।
भाजपा ने भले ही जैसे तैसे विश्वास मत हासिल कर तो लिया लेकिन राह भाजपी की अब भी आसान नहीं है। एनसीपी भले ही सरकार में शामिल न हो रही हो, लेकिन एनसीपी के समर्थन से भाजपा के विश्वास मत हासिल करने से सवाल भाजपा पर भी खड़े होने लगे हैं !
सवाल उठने लाजिमी भी हैं, जाहिर है जिस पार्टी के कुशासन और भ्रष्टाचार की कहानियां सुनाकर, सुशसान के सपने दिखाकर, भाजपा ने जनता से वोट मांगे, उस पार्टी के सहयोग से सरकार बनाना कितना सही है !
सवाल ये भी है कि क्या सिर्फ सत्ता सुख भोगने के लिए अपनी पुरानी सहयोगी के साथ न होने के बावजूद भाजपा एनसीपी का सहारा ले रही है, जो हमेशा से उसके निशाने पर रही है ?
एनसीपी के सहारे से विश्वास मत हासिल करके सिर्फ सवाल ही नहीं उठे हैं, बल्कि सरकार के भविष्य पर भी हमेशा संकट के बाद मंडराते रहेंगे। जो एनसीपी बिना किसी शर्त अपनी कट्टर राजनीतिक दुश्मन पार्टी को सरकार बनाने के लिए समर्थन दे सकती है, क्या गारंटी है कि वह सरकार से किसी भी वक्त समर्थन वापस नहीं लेगी ?
क्या गारंटी है कि इसके बदले में वह भाजपा सरकार को पर्दे के पीछे ब्लैकमेल नहीं करेगी ?
सवालों की फेरहिस्त काफी लंबी है, लेकिन जवाब शायद भाजपा के पास नहीं है। जो जवाब है, कि हमने किसी से समर्थन नहीं मांगा है, वो गले नहीं उतर रहा !
बहरहाल जवाब तो भाजपा को आज नहीं तो कल देना ही पड़ेगा, लेकिन फिलहाल तो शिवसेना और कांग्रेस दोनों मिलकर फडनवीस सरकार के विश्वास मत पर ही अविश्वास जताकर उसे घेरने की तैयारी में जुट गए हैं, ऐसे में देखना ये होगा कि सदन के भीतर अपनी पुरानी सहयोगी के हमले से भाजपा किस तरह अपना बचाव करती है, और भाजपा के लिए फिलहाल संजीवनी साबित हो रही एनसीपी से कब तक फडनवीस सरकार को ऑक्सीजन मिलती है।  


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सोमवार, 10 नवंबर 2014

पहले सीना चौड़ा था, अब कैसे झुकाएं सिर ?

शिवसेना को महाराष्ट्र की सत्ता में आने का भरोसा तो पूरा था, लेकिन जब जनादेश नहीं मिला तो शिवसेना कर भी क्या सकती थी। हालांकि पुरानी साथी भाजपा से हाथ मिलाने का रास्ता अभी भी खुला है। भाजपा को कुछ शर्तों के साथ ही सही इस पर कोई ऐतराज नहीं है, लेकिन शिवसेना असमंजस में है कि आखिर करे तो क्या करे ?
राजनीति में सत्ता की चाहत तो हर किसी को होती है। शिवसेना के साथ भी कुछ ऐसा ही है, लेकिन जनादेश शिवसेना के पक्ष में नहीं आया तो भी उसके पास अपने पुराने सहयोगी के साथ हाथ मिलाकर सत्ता सुख भोगने का पूरा मौका है। लेकिन असमंजस में डूबी शिवसेना को नहीं सूझ रहा कि किस राह चला जाए। सत्ता के लिए भाजपा की शर्तों को मानते हुए फिर से हाथ मिला लिया जाए या फिर मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाते हुए अगले चुनाव का इंतजार करे ?
रास्ते दो ही हैं, लेकिन फिर भी फैसला लेने में शिवसेना हिचकिचा रही है, ये जाहिर करता है कि वो सत्ता में सहयोगी रहने का मौका नहीं गंवाना चाहती, वैसे भी  क्या गारंटी है कि पांच साल इंतजार करने के बाद सत्ता मिलेगी ही ?
ऐसे में कभी सामना संपादकीय के जरिए तो कभी अपने नेताओं के बयानों के जरिए भाजपा को विपक्ष में बैठने का भय दिखाकर अपनी शर्तें मनवाने की पूरी कोशिश भी शिवसेना कर रही है। लेकिन महाराष्ट्र में छोटे भाई से बड़ा भाई बनने का मौका पाने वाली भाजपा चाहती है कि शिवसेना साथ आए, उसे कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन बड़े भाई के तौर पर नहीं छोटे भाई की भूमिका में। भाजपा का स्टैंड कुछ हद तक साफ दिखाई देता है, लेकिन शिवसेना का रूख समझ से परे है, या कहें कि सत्ता में भागीदारी निभाना तो शिवसेना चाहती है। लेकिन सीना चौड़ा करके साथ छोड़ने वाली शिवसेना के सामने मुश्किल है कि आखिर सिर झुकाएं तो कैसे ?
शायद इसलिए ही शिवसेना कभी 48 घंटे का तो कभी 24 घंटे का अल्टीमेटम देकर दिखाना चाह रही है, कि वे सत्ता में भागीदार बनना चाहते हैं, लेकिन भाजपा उनकी कुछ शर्तों को तो माने ! शिवसना ने भले ही विधानसभा सचिव को चिट्ठी लिखकर नेता विपक्ष के पद के लिए दावेदारी पेश करके न झुकने के संकेत दिए हैं, लेकिब जब इसके साथ ही भाजपा के साथ बातचीत का विकल्प भी खुला रखा, जो ईशारा करता है कि सत्ता की चाहत दिल से दूर जाती नहीं दिख रही है !
भाजपा और शिवसेना की तकरार और शिवसेना का न करना इंकार, एक बार फिर साबित करता है कि राजनीति में सत्ता पाने का मौका कोई नहीं छोड़ना चाहता फिर चाहे वह शिवसेना हो या फिर कोई और पार्टी।
बहरहाल शिवसेना का 48 घंटे का ताजा अल्टीमेटम भी जल्द ही समाप्त हो जाएगा, ऐसे में देखना रोचक होगा कि इसके बाद शिवसेना कोई फैसला ले पाती है, या फिर से भाजपा को किसी ऐसे ही अल्टीमेटम के जरिए अपनी बात मनवाने की एक और कोशिश करेगी।  
हां, एक बात तो साफ झलक रही है, कि भाजपा फिलहाल शिवसेना के आगे न झुकने का मानस बना चुकी है !


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