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शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

सत्ता, शरद पवार और झाड़ू !

अपने पूरे परिवार के साथ राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी प्रमुख शरद पवार ने हाथ में झाड़ू लेकर स्वच्छ भारत अभियान में हिस्सा लिया तो अच्छा लगा कि एक अच्छे मकसद के लिए शुरु की गई इस मुहिम में शरद पवार राजनीति से ऊपर उठकर भागीदार बने। ऑस्ट्रेलिया से प्रधानमंत्री मोदी ने भी शरद पवार के इस कदम की सराहना करते हुए ट्विट कर दिया। लेकिन शरद पवार एंड फैमिली के स्वच्छ भारत अभियान में जुड़ने के पीछे का असल मकसद क्या है ? ये सवाल शरद पवार के हाथ में झाड़ू देखने के बाद से लगातार जेहन में उमड़ घुमड़ रहा है।
शरद पवार की नीयत पर शक शायद नहीं होता, लेकिन शरद पवार एंड फैमिली के स्वच्छता अभियान में जुड़ने की टाईमिंग यह सोचने पर मजबूर करती है ! शरद पवार एंड फैमिली ने हाथ में झाड़ू उस वक्त उठाया, जब भाजपा शिवसेना से बात न बनने के बाद खुशी खुशी एऩसीपी के समर्थन से महाराष्ट्र सदन में विश्वास मत हासिल करने में जरा भी नहीं हिचकिचाई !  
केन्द्र में यूपीए सरकार में भागीदार एनसीपी आम चुनाव में यूपीए की करारी हार के बाद सत्ता सुख खो चुकी थी। बचा था, महाराष्ट्र लेकिन वहां पर भी कांग्रेस से अलग होकर अकेले दम पर सरकार बनाने के सपना देख रही एनसीपी का सपना चकनाचूर हो गया। ऐसे में सत्ता का सुख न भी भोगा जाए तो कैसे सत्ताधारियों के करीब रहा जाए, उनसे दोस्ती बढ़ाई जाए, इसका रास्ता एनसीपी ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के पूरे नतीजे आने से पहले ही ढ़ूंढ़ लिया था। भाजपा को स्पष्ट बहुमत तक न पहुंचते देख एनसीपी ने भाजपा को बिना शर्त बाहर से समर्थन का ऐलान कर दिया।
हालांकि भाजपा ने शिवसेना का विकल्प खुला रखा था, लेकिन जब बात नहीं बनी तो आखिर एनसीपी की मदद से ही भाजपा सरकार ने महाराष्ट्र विधानसभा में विश्वास मत हासिल कर लिया।
एनसीपी का ये दांव काम कर गया तो उसका हौसला बढ़ना लाजिमी था, ऐसे में एनसीपी को भी एहसास हो गया कि सत्ताधारियों से नजदीकीयां बढ़ाने का उसका कदम व्यर्थ नहीं जा रहा है। महाराष्ट्र में भाजपा सरकार बनवाने के बाद नजदीकीयां बढ़ाने का इससे अच्छा मौका क्या हो सकता था, कि हाथ में झाड़ू लेकर स्वच्छ भारत अभियान का झंडा बुलंद किया जाए और प्रधानमंत्री की नजरों में आया जाए। हुआ भी ऐसा ही और पीएम मोदी ने ऑस्ट्रेलिया से ही शरद पवार के झाड़ू उठाने के तस्वीरें सामने आने के कुछ ही देर बाद शरद पवार की तारीफ में ट्विट कर डाला।
शरद पवार की सत्ता से नजदीकी बढ़ाने को लेकर उनकी बेचैनी समझी जा सकती है, लेकिन महाराष्ट्र में एनसीपी को पानी पी पी कर कोसने वाली भाजपा का एनसीपी क सहयोग से सरकार बनाना समझ से परे है। रणनीति भाजपा और एनसीपी की जो भी हो, लेकिन अपने – अपने फायदे की राजनीति में जनता से किए वादों को भूल जाना का दस्तूर बदस्तूर जारी है।
फिलहाल तो सबकी नजरें इस पर हैं कि शरद पवार की पावर से महाराष्ट्र में सरकार गठित करने वाली भाजपा का एनसीपी के लिए भविष्य में क्या रूख रहता है और शरद पवार भाजपा को और कैसे कैसे सहयोग और समर्थन देते हैं। कुल मिलाकर कहा जाए तो भाजपा और एनसीपी की नजदीकियां जैसे जैसे बढ़ेंगी वैसे वैसे सवाल की फेरहिस्त भी लंबी होती जाएगी, जिसका जवाब देना भाजपा और एनसीपी दोनों के लिए ही आसान नहीं होगा !


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गुरुवार, 13 नवंबर 2014

“Justice Delayed is Justice Denied”

हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दंभ भरते हैं, लेकिन एक सच ये भी है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में इंसाफ की लड़ाई इससे भी बड़ी औऱ मुश्किल है ! गुजरते वक्त के साथ तस्वीरें यकीनन धुंधली पड़ चुकी थी, लेकिन 39 वर्ष बाद देश के तत्कालीन रेलमंत्री एल एन मिश्रा हत्याकांड पर फैसला आने की ख़बर के साथ धुंधली पड़ चुकी यादों को ताजा करने की कवायद शुरु होती है। साथ ही एक बार फिर से ये सवाल जेहन में उठता है, कि आखिर क्यों इंसाफ की लड़ाई दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में इंसाफ की लड़ाई इतनी लंबी हो जाती है, कि अक्सर लोग इंसाफ की इस लड़ाई से लड़ते लड़ते ही हार मान लेते हैं, लेकिन उन्हें इंसाफ नहीं मिलता ! इंसाफ मिलता भी है तो इतनी देर से कि कई बार उसका कोई मतलब ही नहीं रह जाता !  अंग्रेजी की ये कहावत “Justice Delayed is Justice Denied” यहां पर एकदम सटीक बैठती है।
दो जनवरी 1975 को देश के तत्कालीन रेलमंत्री एन एन मिश्रा की बिहार के समस्तीपुर-मुजफ्फरपुर (बिहार) ब्राड गेज रेल लाईन के उदघाटन के मौके पर समस्तीपुर में बम धमाके में हुई मौत के बाद भी नवंबर 2014 तक इश हत्याकांड नें फैसला न आना इसकी ताजा मिसाल है। 39 वर्ष बाद जैसे तैसे फैसले की तारीख करीब आती भी है, तो अदालत ये कहते हुए फैसले की तारीख आगे बढ़ाकर 8 दिसंबर कर देती है कि फैसला अभी तैयार नहीं है !    
इंतजार 8 दिसंबर का है कि आखिर इस हाई प्रोफाईल हत्याकांड में 39 वर्ष बाद ही सही अदालत क्या फैसला सुनाती है ?  39 वर्ष के लंबे इंतजार को देखते हुए तो अब 8 दिसंबर को लेकर भी संशय है कि फैसला 8 दिसंबर को आ ही जाएगा !
कहते हैं देर आए दुरुस्त आए लेकिन इंसाफ अगर इतनी देर से आए, तो इसे दुरुस्त कैसे कहा जा सकता है ? इसको समझने के लिए इस हत्याकांड के मुख्य आरोपी के जीवनकाल को समझना होगा ! रंजन जो जो अन्य लोगों के साथ इस हत्याकांड का आरोपी है, उसकी उम्र इस हत्याकाडं के वक्त जनवरी 1975 को महज 24 वर्ष थी। घटना को 39 वर्ष बीत चुके हैं और रंजन की उम्र अभी करीब 63 वर्ष है। इस हत्याकांड के एक आरोपी की इस दौरान मौत भी हो चुकी है। इसी तरह दूसरे आरोपियों भी उम्र के अंतिम पड़ाव पर हैं। ठीक इसी तरह इंसाफ की आस लगाए बैठे तत्कालीन रेल मंत्री एल एन मिश्रा के परिजन भी लगभग इसी स्थिति में होंगे! हो सकता है कि 39 वर्ष बाद अब 8 दिसंबर को अदालत आरोपियों को दोषी करार देते हुए सजा सुना भी दे। लेकिन सवाल है कि क्या वाकई में इंसाफ की आस लगाए बैठे लोगों को इंसाफ मिल पाया ! बात सिर्फ तत्कालीन रेल मंत्री एल एन मिश्रा हत्याकांड की ही नहीं है, शिक्षक भर्ती घोटाले में हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला को भी उस मामले में 13 वर्ष बाद सजा हुई। ऐसे कई मामले हैं, जो देश की विभिन्न अदालतों में सालों से लंबित हैं !
देश की सर्वोच्च अदालत की ही अगर बात करें तो एक आंकड़े के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या 60 हजार के करीब है, तो देशभर के विभिन्न उच्च न्यायालयों में वर्ष 2011 तक लंबित मामलों की संख्या करीब 43 लाख 22 हजार थी अंदाजा लगाया जा सकता है कि देशभर की निचली अदालतों में लंबित मामलों की संख्या कितनी होगी?
हालांकि इसके पीछे की बड़ी वजह विभिन्न अदालतों में बड़ी संख्या में जजों के रिक्त पदों का होना भी है, लेकिन वजह चाहे जो भी इंसाफ देर से मिला तो यही कहा जाएगा- “Justice Delayed is Justice Denied”.


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बुधवार, 12 नवंबर 2014

भाजपा सरकार और नैचुरली करप्ट पार्टी !

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के साथ साझा रूप से सरकार चला रही एनसीपी को नैचुरली करप्ट पार्टी का तमगा देकर जमकर निशाना साधा और लोगों से वोट की अपील की थी। प्रधानमंत्री मोदी ने तो अपने चुनावी भाषण में एनसीपी के चुनाव चिन्ह को लेकर भी जमकर तंज भी कसे थे कि कैसे एनसीपी की घड़ी की सुई पहले दिन से सिर्फ 10 बजकर 10 मिनट पर ही अटकी हुई है। 19 अक्टूबर को जब चनाव के नतीजे आए तो महाराष्ट्र में सबसे बड़े दल के रूप में उभरने वाली भाजपा के पास खुश होने की वाजिब वजह थी लेकिन एक मुश्किल ये थी कि भाजपा बहुमत के जादुई आंकड़े से कुछ कदम दूर ही रह गई।
शिव सेना के साथ आने के लिए विकल्प खुले थे, लेकिन भाजपा और शिवसेना दोनों की तरफ से शर्तों का पहाड़ सामने खड़ा था। बयानों के लंबे दौर के बीच विधानसभा में विश्वास मत हासिल करने की तारीख आ गई, लेकिन भाजपा और शिव सेना में बात नहीं बन पाई। आखिरकार विश्वास मत से कुछ घंटे पहले शिव सेना ने लंबी जद्दोजहद के बाद ऐलान कर दिया कि वह विपक्ष में बैठेगी।
भाजपा के लिए ये चिंता की बात इसलिए भी नहीं थी, क्योंकि एनसीपी चुनावी नतीजे के दिन ही भाजपा को बाहर से समर्थन देने का ऐलान कर चुकी थी। शायद यही वजह थी कि भाजपा ने शिवसेना की नाराजगी को सिर्फ नाराजगी के तौर पर ही लिया।
भाजपा ने भले ही जैसे तैसे विश्वास मत हासिल कर तो लिया लेकिन राह भाजपी की अब भी आसान नहीं है। एनसीपी भले ही सरकार में शामिल न हो रही हो, लेकिन एनसीपी के समर्थन से भाजपा के विश्वास मत हासिल करने से सवाल भाजपा पर भी खड़े होने लगे हैं !
सवाल उठने लाजिमी भी हैं, जाहिर है जिस पार्टी के कुशासन और भ्रष्टाचार की कहानियां सुनाकर, सुशसान के सपने दिखाकर, भाजपा ने जनता से वोट मांगे, उस पार्टी के सहयोग से सरकार बनाना कितना सही है !
सवाल ये भी है कि क्या सिर्फ सत्ता सुख भोगने के लिए अपनी पुरानी सहयोगी के साथ न होने के बावजूद भाजपा एनसीपी का सहारा ले रही है, जो हमेशा से उसके निशाने पर रही है ?
एनसीपी के सहारे से विश्वास मत हासिल करके सिर्फ सवाल ही नहीं उठे हैं, बल्कि सरकार के भविष्य पर भी हमेशा संकट के बाद मंडराते रहेंगे। जो एनसीपी बिना किसी शर्त अपनी कट्टर राजनीतिक दुश्मन पार्टी को सरकार बनाने के लिए समर्थन दे सकती है, क्या गारंटी है कि वह सरकार से किसी भी वक्त समर्थन वापस नहीं लेगी ?
क्या गारंटी है कि इसके बदले में वह भाजपा सरकार को पर्दे के पीछे ब्लैकमेल नहीं करेगी ?
सवालों की फेरहिस्त काफी लंबी है, लेकिन जवाब शायद भाजपा के पास नहीं है। जो जवाब है, कि हमने किसी से समर्थन नहीं मांगा है, वो गले नहीं उतर रहा !
बहरहाल जवाब तो भाजपा को आज नहीं तो कल देना ही पड़ेगा, लेकिन फिलहाल तो शिवसेना और कांग्रेस दोनों मिलकर फडनवीस सरकार के विश्वास मत पर ही अविश्वास जताकर उसे घेरने की तैयारी में जुट गए हैं, ऐसे में देखना ये होगा कि सदन के भीतर अपनी पुरानी सहयोगी के हमले से भाजपा किस तरह अपना बचाव करती है, और भाजपा के लिए फिलहाल संजीवनी साबित हो रही एनसीपी से कब तक फडनवीस सरकार को ऑक्सीजन मिलती है।  


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सोमवार, 10 नवंबर 2014

पहले सीना चौड़ा था, अब कैसे झुकाएं सिर ?

शिवसेना को महाराष्ट्र की सत्ता में आने का भरोसा तो पूरा था, लेकिन जब जनादेश नहीं मिला तो शिवसेना कर भी क्या सकती थी। हालांकि पुरानी साथी भाजपा से हाथ मिलाने का रास्ता अभी भी खुला है। भाजपा को कुछ शर्तों के साथ ही सही इस पर कोई ऐतराज नहीं है, लेकिन शिवसेना असमंजस में है कि आखिर करे तो क्या करे ?
राजनीति में सत्ता की चाहत तो हर किसी को होती है। शिवसेना के साथ भी कुछ ऐसा ही है, लेकिन जनादेश शिवसेना के पक्ष में नहीं आया तो भी उसके पास अपने पुराने सहयोगी के साथ हाथ मिलाकर सत्ता सुख भोगने का पूरा मौका है। लेकिन असमंजस में डूबी शिवसेना को नहीं सूझ रहा कि किस राह चला जाए। सत्ता के लिए भाजपा की शर्तों को मानते हुए फिर से हाथ मिला लिया जाए या फिर मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाते हुए अगले चुनाव का इंतजार करे ?
रास्ते दो ही हैं, लेकिन फिर भी फैसला लेने में शिवसेना हिचकिचा रही है, ये जाहिर करता है कि वो सत्ता में सहयोगी रहने का मौका नहीं गंवाना चाहती, वैसे भी  क्या गारंटी है कि पांच साल इंतजार करने के बाद सत्ता मिलेगी ही ?
ऐसे में कभी सामना संपादकीय के जरिए तो कभी अपने नेताओं के बयानों के जरिए भाजपा को विपक्ष में बैठने का भय दिखाकर अपनी शर्तें मनवाने की पूरी कोशिश भी शिवसेना कर रही है। लेकिन महाराष्ट्र में छोटे भाई से बड़ा भाई बनने का मौका पाने वाली भाजपा चाहती है कि शिवसेना साथ आए, उसे कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन बड़े भाई के तौर पर नहीं छोटे भाई की भूमिका में। भाजपा का स्टैंड कुछ हद तक साफ दिखाई देता है, लेकिन शिवसेना का रूख समझ से परे है, या कहें कि सत्ता में भागीदारी निभाना तो शिवसेना चाहती है। लेकिन सीना चौड़ा करके साथ छोड़ने वाली शिवसेना के सामने मुश्किल है कि आखिर सिर झुकाएं तो कैसे ?
शायद इसलिए ही शिवसेना कभी 48 घंटे का तो कभी 24 घंटे का अल्टीमेटम देकर दिखाना चाह रही है, कि वे सत्ता में भागीदार बनना चाहते हैं, लेकिन भाजपा उनकी कुछ शर्तों को तो माने ! शिवसना ने भले ही विधानसभा सचिव को चिट्ठी लिखकर नेता विपक्ष के पद के लिए दावेदारी पेश करके न झुकने के संकेत दिए हैं, लेकिब जब इसके साथ ही भाजपा के साथ बातचीत का विकल्प भी खुला रखा, जो ईशारा करता है कि सत्ता की चाहत दिल से दूर जाती नहीं दिख रही है !
भाजपा और शिवसेना की तकरार और शिवसेना का न करना इंकार, एक बार फिर साबित करता है कि राजनीति में सत्ता पाने का मौका कोई नहीं छोड़ना चाहता फिर चाहे वह शिवसेना हो या फिर कोई और पार्टी।
बहरहाल शिवसेना का 48 घंटे का ताजा अल्टीमेटम भी जल्द ही समाप्त हो जाएगा, ऐसे में देखना रोचक होगा कि इसके बाद शिवसेना कोई फैसला ले पाती है, या फिर से भाजपा को किसी ऐसे ही अल्टीमेटम के जरिए अपनी बात मनवाने की एक और कोशिश करेगी।  
हां, एक बात तो साफ झलक रही है, कि भाजपा फिलहाल शिवसेना के आगे न झुकने का मानस बना चुकी है !


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रविवार, 9 नवंबर 2014

कैबिनेट विस्तार और राजनीति के रंग !



राजनीति के रंग भी निराले होते हैं, मोदी सरकार के पहले कैबिनेट विस्तार के कैनवास में उभरती राजनीतिक तस्वीरों में भी कुछ ऐसे ही रंग दिखाई दिए। एक रंग था, भाजपा और शिवसेना की अहं की लड़ाई का। प्रधानमंत्री मोदी चाहते थे कि कैबिनेट विस्तार के कैनवास में शिवसेना के रंगों की चमक भी दिखाई दे, लेकिन आखिरी वक्त तक हां, न...हां, न की ख़बरों के बीच आखिर शिवसेना वाली तस्वीर ब्लैक एंड व्हाईट ही रह गई। उद्धव ठाकरे ने मुंबई से फ्लाईट पकड़कर दिल्ली पहुंचे अनिल देसाई को एयरपोर्ट से ही वापस बुला लिया। लेकिन शिवसेना नेता सुरेश प्रभु के कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ लेने से शिवसेना की तस्वीर का एक छोटा सा हिस्सा रंगीन होता दिखाई दिया, लेकिन सुरेश प्रभु के भाजपा की सदस्य़ता ले लेने से शिवसेना की बजाए भाजपा के हिस्से की एक और तस्वीर भगवा रंग में रंग गई। शिवसेना के लिए भाजपा की राजनीतिक शर्तों का तो पता नहीं, लेकिन महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिवसेना की स्थिति के बाद भी शिवसेना को बहुत कुछ हासिल था और सहज हासिल था, लेकिन शायद ये शिवसेना के मराठी मन को नहीं भाया !
एक और तस्वीर थी, जो 2014 के आम चुनाव के साथ भगवा रंग में रंगने लगी था, ये तस्वीर थी, बिहार के पाटलीपुत्र से भाजपा सांसद रामकृपाल सिंह की, जो बिहार में लालू प्रसाद यादव की बेटी मीसा भारती को धूल चटाकर दिल्ली तक पहुंचे थे। कभी राजद में रहते हुए लालू प्रसाद यादव के सबसे करीबी नेता रहे रामकृपाल ने भी कहां सोचा था कि 2014 में केन्द्र सरकार में वह मंत्री बनेंगे, लेकिन राजद का दामन छोड़ भाजपा का कमल थामने वाले रामकृपाल ने न सिर्फ कमल पर सवार होकर जीत दर्ज की बल्कि मोदी सरकार के पहले ही विस्तार में रामकृपाल मंत्री की कुर्सी भी पा गए।
एक तस्वीर और नजर आई, कभी हरियाणा कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे चौधरी बिरेन्द्र सिंह की। हरियाणा में विधानसभा चुनाव से पहले अपनी ही पार्टी कांग्रेस के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के खिलाफ बगावत का झंड़ा बुलंद कर भाजपा का दामन थामने वाले चौधरी बिरेन्द्र सिंह की किस्मत भी चमकती दिखाई दी। कांग्रेस में थे, तो कोई पूछने वाला नहीं बचा था, लेकिन विधानसभा चुनाव में भाजपा में आने वाले चौधरी का फैसला बिरेन्द्र सिंह की चौधराहट कायम रखने वाला रहा। चौधराहट भी मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री की, जो भाजपा के कई दिग्गजों को नसीब नहीं हुई।
बहरहाल राजनीति के कैनवास में रंगीन तस्वीरों का सपना तो हर राजनेता का होता है, लेकिन किस्मत शायद हर किसी पर मेहरबान नहीं होती, या कहें कि सही वक्त पर सही फैसला लेने में अक्सर राजनेता चूक कर जाते हैं। अब रामकृपाल सिंह राजद की टिमटिमाती लालटेन न छोड़ते और चौधरी बिरेन्द्र सिंह कांग्रेस का पंजा न छोड़ते तो दोनों आज कहां होते, इसे समझना जरा भी मुश्किल नहीं है।
बात करें शिवसेना की तो वक्त की नज़ाकत के हिसाब से सब कुछ सहज और सुलभ होने के बाद भी शिवसेना का ये फैसला शिवसेना के भविष्य के हिसाब से कितना सही साबित होगा इसे भी समझना मुश्किल नहीं है। लेकिन अपने फायदे की राजनीति के समय में शिवसेना क्या इसको समझ पाएगी, ये तो वक्त ही बताएगा !

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गुरुवार, 6 नवंबर 2014

जब तस्वीर ने किया कचरा !

स्वच्छता किसे नहीं पसंद, कौन गंदगी के ढ़ेर में रहना चाहेगा..? कुछ लोगों को सफाई के लिए कहने की जरूरत नहीं होती और वे साफ-सफाई का पूरा ख्याल रखते हैं, लेकिन ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं हैं, जो गंदगी में ही रहना पसंद करते हैं और कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो अपने घर को तो साफ रखना पसंद करते हैं, लेकिन घर के बाहर सड़क पर चलते हुए और दूसरे सार्वजनिक स्थानों पर कचरा फैलाने से बाज नहीं आते। ऐसे लोग के प्रकार भी अलग अलग होते हैं, जिनकी व्याख्या में एक पूरी किताब लिखी जा सकती है।
महात्मा गांधी जी के स्वच्छ भारत के सपने को साकार करने के लिए देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छता अभियान की शुरुआत खुद हाथ में झाड़ू लेकर की तो ,ये एक सुखद अनुभूति थी। लगने लगा था कि शायद देशवासी भी इससे प्रेरणा लेंगे और हाथ में झाड़ू लेकर सड़क पर भले ही न निकलें लेकिन कम से कम सार्वजनिक स्थानों पर कचरा नहीं करेंगे और स्वच्छ भारत भियान का हिस्सा बनेंगे, लेकिन अफसोस बड़ी संख्या उन लोगों की है, जिनके लिए स्वच्छता का कोई मतलब नहीं है, शायद आपने भी ऐसे लोगों को अपने आस पास जरूर देखा होगा। हालांकि एक सुखद एहसास ये भी है कि, बड़ी संख्या उन लोगों की भी है, जिनका मानस बदला है, और वे लोग अब हाथ में झाड़ू लेकर भले ही न निकले हों, लेकिन वे सार्वजनिक स्थानों पर कूड़ा फेंकने की बजाए अब कूड़ेदान का इस्तेमाल करने लगे हैं। मैंने अपने घर से लेकर दफ्तर तक इसकी एक झलक देखी है, इसको महसूस किया है। शायद आप में से बहुत से लोगों ने भी इस परिवर्तन को महसूस किया होगा।
बात स्वच्छता अभियान की है तो इसका एक और पहलू है, जो दर्शाता है कि स्वच्छता को लेकर एक जमात का क्या रवैया है..? ये जमात है, हमारे देश के नेताओं की, जिनकी कथनी और करनी का फर्क जग जाहिर है। दरअसल बात दिल्ली के इस्लामिक कल्चरल सेंटर के बाहर की है, तारीख 5 नवंबर 2014 की है, जब दिल्ली भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और कभी आम आदमी पार्टी की नेता रहीं शाजिया इल्मी स्वच्छता अभियान में हिस्सा लेने यहां पर पहुंची। दोनों ही नेताओं ने हाथ में झाड़ू लेकर सफाई की तो देखने में बड़ा अच्छा लगा, सफाई करते हुए इनकी तस्वीरें तो और भी सुंदर थी। लेकिन एक तस्वीर ने इस सफाई पर कचरा फेर दिया !
पीएम मोदी के हाथ में झाड़ू उठाने के बाद स्वच्छता अभियान के बहाने हाथ में झाड़ू लेकर सफाई करने की हमारे नेताओं में भी होड़ सी लग गयी। रोज अखबार और टीवी में कोई न कोई नेता या अफसर हाथ में झाड़ू लेकर दिखाई देने लगा। तस्वीरें सतीश उपाध्याय और शाजिया इल्मी की भी छपी और दिखाई दी, लेकिन इन तस्वीरों के साथ कुछ और तस्वीरें भी थी, जो काफी कुछ बोल रही थी। ये तस्वीरें बताने के लिए काफी थी कि किस तरह अख़बार और टीवी में कचरा साफ करने के बहाने अपना चेहरा चमकाने के लिए ये ढ़ोंग रचा गया। हालांकि पोल खुलने के बाद सफाई सतीश उपाध्याय और शाजिया इल्मी दोनों की आई की उन्हें तो अभियान में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया गया था, लेकिन इस पर यकीन होता नहीं !
तस्वीरें पोल खोल रही थी कि किस तरह पहले से साफ जगह पर कचरा फैलाया गया। उसके बाद ये लोग हाथ में झाड़ू लेकर और चेहरे पर मुस्कराहट के साथ पहुंच गए तस्वीर खिंचाने, माफ कीजिए सफाई करने ! ये वही सतीश उपाध्याय हैं, जो दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने का सपना भी देख रहे हैं, अब चुनाव तक किसी न किसी बहाने अखबार और टीवी की सुर्खियां भी तो बने रहना है, फिर कचरा फैलाकर उसे साफ ही करने का ढ़ोंग क्यों न रचा जाए ! लगे रहो नेता जी, लगे रहो, आपमें मुख्यमंत्री बनने के पूरे गुण हैं !


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सोमवार, 3 नवंबर 2014

शरीफ पर विश्वास, मोदी पर अविश्वास…बधाई हो बुखारी साहब !

सैयद अहमद बुखारी, जामा मस्जिद के शाही इमाम, ऐसा लगने लगा है कि बुखारी साहब भारत के मुसलमानों के सबसे बड़े प्रतिनिधि है। दरअसल मेरा ये सामान्य ज्ञान बढ़ाया है, खुद बुखारी साहब ने। दरअसल बुखारी साहब ने 19 साल के अपने छोटे बेटे शाबान बुखारी को अपना वारिस घोषित किया है। 22 नवंबर को दस्तारबंदी की रस्म के साथ उन्हें नायाब इमाम घोषित किया जाएगा। दिल्ली में होने वाले इस समारोह में देश-विदेश से हजारों धार्मिक गुरू भी शिरकत करने वाले हैं।
इस समारोह के लिए इमाम साहब ने पाकिस्तान के वजीरे आज़म नवाज़ शरीफ को भी न्योता भेजा है, लेकिन बुखारी साहब ने अपने देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को न्योता नहीं दिया है।
ये बात हैरान तो करती है, कि देश की राजधानी दिल्ली में होने वाले इस समारोह में पड़ोसी देश पाकिस्तान के वजीरे आज़म को तो बुलावा भेजा गया है, जिस देश की नापाक हरकतों के चलते दोनों देशों के दोस्ताना रिश्तों में पैदा हुई दरार खाई के रूप में तब्दील होती जा रही है। लेकिन इमाम साहब ने अपने देश के प्रधानमंत्री को बुलाना जरूरी नहीं समझा।
इससे भी ज्यादा हैरान करता है, बुखारी साहब का इसके पीछे दिया जा रहा तर्क, जो कम से कम मेरे गले तो नहीं उतरता और शायद करोड़ों देशवासियों के गले भी नहीं उतर रहा होगा, हां, हो सकता है कि इमाम साहब की बात से इत्तेफाक रखने वाले भी लोग जरूर होंगे।
दरअसल इमाम साहब का कहना है कि देश का मुसलमान अभी भी नरेन्द्र मोदी से नहीं जुड़ पाए हैं, मुसलमानों मे मोदी के प्रति अब तक विश्वास नहीं जग पाया है। बुखारी ये भी कहते हैं कि  मुसलमानों में विश्वास जगाने के लिए मोदी को आगे आना चाहिए।
बुखारी की इस बात से एक और चीज झलकती है, कि बुखारी ही इस देश के मुसलमानों के सच्चे हितैषी हैं, और बुखारी ही भारत के मुसलमानों के एकमात्र प्रतिनिधि हैं, जिन्होंने मोदी को न बुलाने का फैसला भी मुसलमानों की तरफ से अकेले ही कर लिया ! बुखारी को भारत के कितने मुसलमान अपना सच्चा प्रतिनिधि मानते हैं, ये तो इस देश के मुसलमान ही बता सकते हैं, लेकिन बुखारी के दावे से तो ऐसा प्रतीत होता है कि वे ही भारत के मुसलमानों के सर्वमान्य प्रतिनिधि हैं और मुसलमानों ने अपने हक के सभी फैसले लेने का अधिकार भी इमाम साहब को सौंप रखा है ! पता नहीं, लेकिन बुखारी साहब को सुनकर तो कुछ ऐसा ही आभास होता है !
बड़ी अजीब बात है, बकौल बुखारी साहब, पीएम मोदी इस देश के मुसलमानों से नहीं जुड़ पाए हैं, तो उन्हें नहीं न्योता भेजा, लेकिन बुखारी साहब जरा ये बताने का कष्ट करेंगे कि क्या पाक प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ से भारत का मुसलमान दिल से जुड़ा हुआ है ..?
क्या नवाज़ शरीफ के प्रति भारत के मुसलमानों के मन में विश्वास जगा हुआ है कि शरीफ उनके सच्चे हितैषी है..?
क्या पाक के वजीरे आज़म नवाज़ शरीफ की नापाक हरकतों भारत के मुसलमानों के हक में हैं..?
अपने बेटे की दस्तारबंदी की रस्म में मोदी को न बुलाने के पीछे के बुखारी के तर्कों को सुनकर तो कम से कम ऐसा ही लगता है !
सवालों की फेरहिस्त तो काफी लंबी है, जिसका सटीक जवाब शायद ही बुखारी साहब दे पाएं, लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुने हुए प्रधानमंत्री पर बुखारी साहब का अविश्वास समझ से परे है। अविश्वास सिर्फ बुखारी साहब का व्यक्तिगत होता तो समझ में आता, लेकिन बुखारी साहब ने तो भारत के सभी मुसलमानों का स्वयंभू प्रतिनिधि बनकर इसका ऐलान कर दिया ! खैर बुखारी साहब इसमें खुश हैं, तो अच्छा है, लेकिन बुखारी साहब आप इस बात को नहीं नकार सकते कि नरेन्द्र मोदी इस देश के प्रधानमंत्री हैं, भविष्य का तो पता नहीं लेकिन जनादेश के रूप में जनता का विश्वास जीतकर ही वे यहां तक पहुंचे हैं, अब इस जनादेश में भी आपको हिंदु – मुसलमान का फर्क दिखाई दे रहा है, तो इसमें कोई क्या कर सकता है ! फिलहाल तो अपने छोटे बेटे शाबान बुखारी की दस्तारबंदी के लिए आपको अग्रिम शुभकामनाएं !


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रविवार, 2 नवंबर 2014

राबर्ट वाड्रा और शनिवार की रात !

किसी ने सही कहा है कि जब वक्त और हालात आपके अनुकूल न हो, तो शांत रहने में ही भलाई है, वरना नुकसान अपना ही होता है। अब देश की सबसे बड़ी पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा को ही देख लिजिए। शनिवार की रात शायद ही वाड्रा साहब कभी भूल पाएंगे। जमीन सौदों पर मीडिया से बात करने से बचने वाले राबर्ट वाड्रा ने जब मुंह खोला और अपना आपा खोया तो, वो भी उस वक्त जब वक्त और हालात दोनों उनके पक्ष में नहीं थे। केन्द्र में यूपीए सरकार का बोरिया बिस्तर बंध चुका था, तो हरियाणा में भी कांग्रेस सरकार सत्ता से बेदखल हो चुकी थी। इतना ही नहीं हरियाणा के नव नियुक्त सीएम ने तो हरियाणा में जमीन सौदों पर जांच की बात से तक इंकार नहीं किया है।
इसी सवाल पर वाड्रा खुद तो शायद सीरीयस नहीं थे, लेकिन सवाल पूछने वाले न्यूज एजेंसी एएनआई के संवाददाता से उल्टा सवाल करने लगे- “Are you Serious”, वो भी एक बार नहीं चार- चार बार !  पत्रकार तो सीरियस ही था, तभी वाड्रा साहब से इतना सीरियस सवाल किया, लेकिन वाड्रा साहब को शायद ऐसा नहीं लगा, तभी तो जवाब देने की बजाए वो कुछ ऐसा कर बैठे, जो उन्हें क्या किसी को शोभा नहीं देता !
सवाल नहीं पसंद था, तो तरीके तो कई थे, जवाब न देने के, लेकिन वाड्रा साहब का शायद ये पसंदीदा तरीका था जवाब देने का। राबर्ट वाड्रा को शायद इस बात का एहसास हो चुका था, कि वो कुछ ज्यादा ही बोल और कर गए, ऐसे में इस शर्मनाक हरकत पर वाड्रा की सफाई भी चंद घंटों में आ गई। लेकिन सफाई में जो कहा गया, उस पर कैमरे में कैद वाड्रा की हरकत देखने के बाद कोई स्कूली बच्चा भी यकीन न करे !  वाड्रा साहब अपनी सफाई में कहते नजर आए कि उन्हें लगा कि कोई निजी फोटोग्राफर उनसे सवाल कर रहा है। लेकिन वाड्रा साहब को कौन समझाए कि उनकी ये हरकत पूरा हिंदुस्तान देख चुका था।
समय शायद कुछ ज्यादा ही खराब था वाड्रा कि, क्योंकि जिस जमीन सौदे के सवाल पर वाड्रा बिफर पड़े थे, उस सौदे पर ही कैग ने भी अपनी रिपोर्ट में सवाल उठा दिए कि हरियाणा सरकार की सहमति के चलते रॉबर्ट वाड्रा ने कानूनों से खिलवाड़ करते हुए जमीन सौदे में 44 करोड़ रुपए कमाए। रिपोर्ट में कहा गया है, कि वाड्रा ने खरीदी गई जमीन को जल्दी ही बेचकर जो मुनाफा लिया, हरियाणा सरकार ने वाड्रा से उसे भी वसूलने की कोशिश नहीं की। मतलब साफ है कि हुड्डा सरकार भी वाड्रा के आगे नतमस्तक थी, अब हुड्डा सरकार नतमस्तक क्यों थी, ये लिखने की शायद जरूरत नहीं है !
बहरहाल वक्त और हालात अनुकूल न होने पर क्या बोलना चाहिए, क्या नहीं, क्या करना चाहिए, क्या नहीं, अब तो शायद राबर्ट वाड्रा अच्छी तरह समझ ही गए होंगे !

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बुधवार, 29 अक्टूबर 2014

"पावर" के लिए बेचैन पवार !

गजब है भाई, ऐसे बेचैनी देखी है कभी, हालांकि राजनीति में कुछ भी संभव है, लेकिन महाराष्ट्र में चुनावी नतीजों के बाद से ही एनसीपी का भाजपा के प्रति बढ़ता प्रेम निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। ध्यान रहे कि ये वही एनसीपी है, जो चुनावी नतीजों से पहले भाजपा की धुर विरोधी हुआ करती थी, लेकिन जनता का फैसला क्या आया, शरद पवार साहब के तो सुर ही बदल गए।
महाराष्ट्र की 288 विधानसभा सीटों के पूरे नतीजे आने से पहले ही साफ हो चुकी चुनावी तस्वीर को भांपकर पहले तो एनसीपी ने खुद की भाजपा को बिना शर्त समर्थन देने का ऐलान कर दिया। वजह बताई, महाराष्ट्र में स्थाई सरकार के गठन में अपनी भूमिका निभाना, लेकिन पवार साहब ये भूल गए कि इसकी असल वजह क्या हो सकती है, जो अब तक फूटी आंख न सुहाने वाली भाजपा को सरकार बनाने के लिए आप बिना शर्त समर्थन को तैयार हो गए, वो भी बिन मांगे। अब जब एनसीपी को लगा कि भाजपा अपनी पुरानी सहयोगी शिवसेना के साथ जाना ज्यादा पसंद करेगी और शिवसेना का रूख भी भाजपा के लिए नरम पड़ने लगा है, तो शरद पवार साहब ने नया दांव खेल दिया। ऐलान कर दिया कि सदन में बहुमत साबित करने के लिए वोटिंग की नौबत आती है, तो एनसीपी विधायक बॉयकॉट कर देंगे और वोटिंग में हिस्सा नहीं लेंगे। मंशा शायद यही थी कि भाजपा को ये संदेश चला जाए कि शिवसेना के दबाव में जाने से भाजपा बचे और बहुमत साबित करने के संकट से उसे एनसीपी निकाल लेगी। अब एनसीपी अपने इस भाजपा प्रेम के पीछे की उस वजह से भले ही इंकार कर रही हो, जिसकी चर्चा सियासी गलियारों में तैर रही है, कि एनसीपी भाजपा के साथ खड़े होकर बदले में भाजपा से चाहती है, कि पिछली सरकार में हुए भ्रष्टाचार और घोटालों की जांच भाजपा सरकार न कराए।
राजनीतिज्ञ वो भी शरद पवार जैसा, जाहिर है बिना किसी वजह के तो भाजपा को समर्थन देने के लिए ललायित नहीं हो रहे होंगे, वजह चर्चाओं में भी है, और इस वजह से आसानी से इंकार भी नहीं किया जा सकता। बहरहाल एनसीपी भाजपा को ऑफर पर ऑफर दिए जा रही है, और भाजपा ने भी शिवसेना के साथ कोई बात नहीं बन पाई है, यानि की भाजपा ने विकल्प खुले रखे हैं। ऐसे में देखना रोचक होगा कि आखिर भाजपा सरकार बनाने के लिए क्या रास्ता अख्तियार करना पसंद करेगी। अपनी पुरानी सहयोगी शिवसेना के समर्थन से सरकार बनाएगी, जिसकी संभावना ज्यादा प्रबल है, या फिर एनसीपी के लुभावने ऑफरों पर गौर करेगी ! बहरहाल देवेन्द्र फडनवीस के रूप में मुख्यमंत्री के नाम का तो ऐलान हो गया है, और उम्मीद है कि जल्द ही सरकार गठन का फार्मूला भी सबके सामने आ जाएगा कि आखिर भाजपा किसे अपने साथ लेकर चलती है। 


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सोमवार, 27 अक्टूबर 2014

काला धन और चंदे का खेल !

काले धन के मुद्दे पर पहले सुर्खियां और फिर वोट तो मोदी जी ने खूब बटोरे लेकिन जब बारी विदेशी बैंक में जमा भारतीयों के काले धन को वापस लाने की बात आई  तो काला धन वापस लाना तो छोड़िए, काला धन जमा करने वालों के नाम का खुलासा करने में भी खोदा पहाड़ निकली चुहिया वाली कहावत चरितार्थ होती दिखाई दी।  
सरकार ने सर्वोच्च न्यायलय में हलफनामा दाखिल कर नाम भी बताए तो सिर्फ तीन कारोबारियों के। डाबर समूह के प्रदीप बर्मन, गोवा की खनन कारोबारी राधा टिम्बलू और राजकोट के सर्राफ व्यापारी पंकज चमनलाल लोढ़िया के नाम सबूत के साथ सरकार ने दिए हैं। हालांकि इनमें से प्रदीप बर्मन ने अपने खाते को वैध बताते हुए सभी प्रकार के टैक्स चुकाए जाने का दावा किया है तो पंकज लोढ़िया ने तो स्विस बैंक में खाता होने की बात से ही साफ इंकार किया है। अब इनके दावों पर यकीन किया जाए तो लंबी जद्दोजहद के बाद सरकार ने जो तीन नाम सार्वजनिक किए हैं, वो मोदी सरकार के जमकर किरकिरी भी करा सकते हैं।
वैसे असल मुद्दा सार्वजनिक किए गए नामों की संख्या को लेकर है, जो सरकार के पूर्व में किए गए वादे के अनुसार कम से कम 136 तो होनी ही चाहिए थी, लेकिन सामने आए सिर्फ तीन नाम। अब इसके मोदी सरकार की क्या मंशा है, ये तो वे ही बेहतर समझ सकते हैं, लेकिन नाम न बताने से पहले भी सवालों के घेरे में आई मोदी सरकार की मुश्किलें नाम बताने के बाद अब और भी ज्यादा बढ़ गई हैं।
पहले नाम न बताने को लेकर सरकार विपक्षियों के निशाने पर थी, अब नाम बता दिए तो सिर्फ तीन ही नाम क्यों का सवाल मोदी सरकार से जवाब मांग रहा है। जाहिर है खाताधारकों की फेरहिस्त लंबी है, लेकिन सिर्फ तीन कारोबारियों के नाम ही क्यों का जवाब हर कोई जानना चाहता है।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्मस की रिपोर्ट ने इन तीन नामों का भाजपा और कांग्रेस दोनों से जुड़ा एक और खुलासा कर भाजपा और कांग्रेस दोनों की नींद और उड़ा दी है। एडीआर की रिपोर्ट कहती है कि कालाधन रखने वाली गोवा के कारोबारी राधा टिंबलू की कंपनी टिंबलू प्राईवेट लिमिटेड ने वित्तीय वर्ष 2004 -2005 और 2011-2012 में भाजपा और कांग्रेस को एक करोड़ 83 लाख रूपए का चंदा भी दिया था। इसमें से बड़ी राशि भाजपा के खाते में आई जिसने टिंबलू प्राईवेट लिमिटेड से एक करोड़ 18 लाख रूपए का चंदा लिया तो कांग्रेस ने 65 लाख रूपए का चंदा लिया। वहीं राजकोट के सर्राफ पंकज लोढ़िया ने भी भाजपा को 2011-12 में 51 हजार रूपए का चंदा दिया था।
जाहिर है कालेधन के मुद्दे को जोरशोर से उठाने वाली भाजपा और तीन नाम सार्वजनिक करने वाली मोदी सरकार की मुश्किल इस खुलासे के बाद अब और बढ़ गई है। टैक्स चोरी कर विदेशी बैंकों में कालाधन रखने वालों से चंदा लेने पर सवाल उठने लाजिमी है, मजे की बात तो ये है कि कालेधन के मुद्दे पर विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस पर सवाल उठाने वाली भाजपा और अब विपक्ष में रहते हुए भाजपा पर सवाल उठा रही कांग्रेस दोनों ही अब एक जैसी स्थिति में है।
चंदे की रकम का बड़ा हिस्सा भले ही भाजपा के खाते में आया हो लेकिन कम ही सही चंदा कांग्रेस ने भी बटोरा है। ऐसे में कालेधन के मुद्दे के बाद एक दूसरे पर निशाना साधकर सियासी फायदा बटोरने वाली देश की दोनों बड़ी पार्टियां अब खुद सवालों के घेरे में हैं।
जाहिर है चंदा देने वालों के दोनों ही पार्टियों से अपने अपने व्यवसायिक स्वार्थ रहे होंगे, और इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि चंदे की एवज में सत्ताधारी दल से इन्होंने भरपूर फायदा भी उठाया होगा या उठाने की तैयारी में होंगी ! अब चाहे सफाई कोई कितनी ही दे, लेकिन काला धन रखने वालों से चंदा लेने के बाद दोनों ही पार्टियों पर भरोसा करना मुश्किल है। खासकर सत्ताधारी भाजपा पर जो कालेधन को वापस लाने और सभी अवैध खाताधारकों के नामों को उजागर करने का दावा कर रही है। वैसे भी नाम उन्हीं के उजागर हुए हैं, जिनसे लिया गया चंदा इन पार्टियों को मिलने वाली चंदे की रकम का बहुत छोटा सा हिस्सा है। ऐसे ही ये राजनीतिक दल चुनावों में पानी की तरह पैसा नहीं बहाते !


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रविवार, 26 अक्टूबर 2014

लहर, असर और दिल्ली का डर !

आम चुनाव के मुकाबले कम ही सही, लेकिन मोदी लहर का असर महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजों पर भी दिखाई तो दिया लेकिन इसके बाद भी झारखंड और जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव के साथ दिल्ली में विधानसभा चुनाव का ऐलान न होना हैरान जरूर करता है।
सवाल कई हैं, लेकिन जवाब शायद भाजपा के पास नहीं है। या कहें, कि जवाब तो है, लेकिन उसे कहने का साहस भाजपा नेताओं के पास नहीं है। दिल्ली में विधानसभा चुनाव कराने की बजाए खाली पड़ी तीन सीटों पर उपचुनाव कराने का ऐलान करना सवालों की फेरहिस्त को और लंबी कर देता है।
आम चुनाव के बाद 10 राज्यों की 33 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजे भाजपा के पक्ष में नहीं आए तो मोदी लहर के हवा होने की हवा चलने लगी थी। लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव में भाजपा की धमाकेदार जीत ने दीवाली पर भाजपा की खुशी को दोगुना कर दिया। साथ ही मोदी लहर के हवा होने की बातें करने वाले विरोधियों पर निशाना साधने का मौका भी भाजपा नेताओं को मिल गया। लेकिन इसके बाद भी दिल्ली में चुनाव का ऐलान न होना साफ करता है कि दिल्ली को लेकर भाजपा के मन में डर अभी भी कायम है। भाजपा को शायद डर है कि दिल्ली की सत्ता हासिल करने की राह में आम आदमी पार्टी उसके लिए रोड़ा बन सकती है। शायद इसलिए ही दिल्ली में विधानसभा चुनाव कराने की बजाए खाली पड़ी 3 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव कराना भाजपा को ज्यादा बेहतर विकल्प लगा !
उपचुनाव के नतीजे दिल्ली की जनता के मिजाज़ को भी बता देंगे। किस्मत से मिजाज़ भाजपा के पक्ष में रहा तो कुछ दिनों में या महीनों में दिल्ली में विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया जाएगा और नतीजे मनमाफिक न आए तो फिर दिल्ली में राष्ट्रपति शासन तो लगा ही हुआ है। जैसे चल रहा है, चलने दिया जाए ! कम से कम दिल्ली की हार के कलंक से तो कुछ दिनों या महीनों तक बचा ही जा सकता है। इस दौरान जोड़ – तोड़ कर सरकार बनाने का वक्त तो रहेगा ही ! पता नहीं, लेकिन झारखंड और जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव के ऐलान के साथ दिल्ली में विधानसभा चुनाव की बजाए तीन सीटों पर उपचुनाव के ऐलान के बाद से ही मन में कुछ ऐसे ही सवाल उठ रहे हैं।
बहरहाल आम चुनाव के बाद महाराष्ट्र और हरियाणा तो भाजपा ने फतह कर लिया है, लेकिन झारखंड और जम्मू – कश्मीर विधानसभा चुनाव के साथ ही दिल्ली की तीन विधानसभा सीटों पर उपचुनाव भी भाजपा के लिए किसी बड़ी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा। फैसला जनता को ही करना है, ऐसे में देखना रोचक होगा कि इन चुनाव में लहर कितना असर दिखाती है।


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रविवार, 19 अक्टूबर 2014

कायम है मोदी मैजिक !

हरियाणा और महाराष्ट्र में राजनीतिक जमीन तलाशने वाली भाजपा को न सिर्फ इस चुनाव में जमीन मिली बल्कि इस जमीन में कमल भी खूब खिले। हरियाणा की मिट्टी तो भाजपा को इतनी भायी की 2005 में दो और 2009 में सिर्फ चार सीटें जीतने वाली भाजपा ने 47 सीटों पर जीत हासिल करते हुए अपने दम पर बहुमत हासिल कर लिया। आम चुनाव के बाद विधानसभा उपचुनाव में भाजपा की हार पर लहर का असर कम होने की बात करने वालों को भी इसका जवाब मिल ही गया कि लहर अभी कायम है। नतीजों के बाद को इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि जनता में मोदी का प्रभाव अभी कायम है और चुनाव के दौरान मोगी का ताबड़तोड रैलियों ने इस लहर को बनाए रखा।
हालांकि महाराष्ट्र में बहुमत के जादुई आंकड़े से भाजपा 23 सीटें दूर रह गयी लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा का पिछले रिकार्ड के हिसाब से ये भाजपा के लिए बड़ी उपलब्धि है, वो भी तब जब चुनाव से ऐन पहले उसकी अहम सहयोगी शिवसेना और भाजपा की राहें जुदा हो गयी थी। चुनावी नतीजों के बाद तस्वीर आईने की तरफ साफ हो गयी है, तो अब महाराष्ट्र में जद्दोजहद इस बात की है कि बहुमत के जादुई आंकड़े से 23 कदम दूर भाजपा सरकार कैसे बनाएगी..? 123 सीटें जीतकर महाराष्ट्र में सबसे बड़ी पार्टी का तमगा हासिल करने वाली भाजपा की चुनाव से पहले की अकड़ कायम है, तो अपनी अपनी जीत का दम भरने वाली एनसीपी और शिवसेना की अकड़ कमजोर होने लगी है।
पूर्ण नतीजों से पहले एनसीपी का भाजपा को सरकार बनाने के लिए समर्थन की बात कहना, ये बताने के लिए काफी है। शिवसेना का भाजपा के लिए नरम पड़ता रूख भी सारी कहानी बयां कर रहा है। शिवसेना का भाजपा के लिए नरम रूख तो समझ में आता है, लेकिन एनसीपी की भाजपा को समर्थन देने के लिए बेकरारी बताने के लिए काफी है कि सत्ता में रहने या सत्ता के करीब रहने के लिए एनसीपी किसी भी हद तक जाने को तैयार है। एनसीपी को शायद जनता के सरोकार से कोई लेना देना नहीं है, वो चाहती है तो बस सत्ता में रहना। पहले कांग्रेस के साथ मिलकर सत्ता का सुख भोगा और चुनाव के दौरान भाजपा को खूब कोसा लेकिन जब जनता ने आईना दिखा दिया तो, अब भाजपा के साथ जाने से भी इन्हें कोई गुरेज नहीं है।
भाजपा किसके साथ मिलकर सरकार बनाएगी इस पर से पर्दा भी जल्द हट जाएगा। एनसीपी और शिवसेना दोनों ही विकल्प भाजपा के सामने हैं, एनसीपी बिना शर्त सरकार को बाहर से समर्थन देने को आतुर दिखाई दे रही है, तो शिवसेना ने एक बार फिर से हाथ मिलाने से इंकार नहीं किया है। बहरहाल देखना ये होगा कि भाजपा शिवसेना के साथ सरकार बनाती है तो किन शर्तों पर और एनसीपी के समर्थन से सरकार बनाती है तो किस मुंह से..?  जाहिर है सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद भी दुविधा में भाजपा ही है कि आखिर किसके साथ मिलकर सरकार बनाए..? एनसीपी को चुनाव से पहले कोसने वाली  भाजपा एनसीपी के साथ जाए तो कैसे जाए और शिवसेना के साथ जाए तो शर्तों का अंबार सामने खड़ा होगा।   

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