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सोमवार, 3 नवंबर 2014

शरीफ पर विश्वास, मोदी पर अविश्वास…बधाई हो बुखारी साहब !

सैयद अहमद बुखारी, जामा मस्जिद के शाही इमाम, ऐसा लगने लगा है कि बुखारी साहब भारत के मुसलमानों के सबसे बड़े प्रतिनिधि है। दरअसल मेरा ये सामान्य ज्ञान बढ़ाया है, खुद बुखारी साहब ने। दरअसल बुखारी साहब ने 19 साल के अपने छोटे बेटे शाबान बुखारी को अपना वारिस घोषित किया है। 22 नवंबर को दस्तारबंदी की रस्म के साथ उन्हें नायाब इमाम घोषित किया जाएगा। दिल्ली में होने वाले इस समारोह में देश-विदेश से हजारों धार्मिक गुरू भी शिरकत करने वाले हैं।
इस समारोह के लिए इमाम साहब ने पाकिस्तान के वजीरे आज़म नवाज़ शरीफ को भी न्योता भेजा है, लेकिन बुखारी साहब ने अपने देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को न्योता नहीं दिया है।
ये बात हैरान तो करती है, कि देश की राजधानी दिल्ली में होने वाले इस समारोह में पड़ोसी देश पाकिस्तान के वजीरे आज़म को तो बुलावा भेजा गया है, जिस देश की नापाक हरकतों के चलते दोनों देशों के दोस्ताना रिश्तों में पैदा हुई दरार खाई के रूप में तब्दील होती जा रही है। लेकिन इमाम साहब ने अपने देश के प्रधानमंत्री को बुलाना जरूरी नहीं समझा।
इससे भी ज्यादा हैरान करता है, बुखारी साहब का इसके पीछे दिया जा रहा तर्क, जो कम से कम मेरे गले तो नहीं उतरता और शायद करोड़ों देशवासियों के गले भी नहीं उतर रहा होगा, हां, हो सकता है कि इमाम साहब की बात से इत्तेफाक रखने वाले भी लोग जरूर होंगे।
दरअसल इमाम साहब का कहना है कि देश का मुसलमान अभी भी नरेन्द्र मोदी से नहीं जुड़ पाए हैं, मुसलमानों मे मोदी के प्रति अब तक विश्वास नहीं जग पाया है। बुखारी ये भी कहते हैं कि  मुसलमानों में विश्वास जगाने के लिए मोदी को आगे आना चाहिए।
बुखारी की इस बात से एक और चीज झलकती है, कि बुखारी ही इस देश के मुसलमानों के सच्चे हितैषी हैं, और बुखारी ही भारत के मुसलमानों के एकमात्र प्रतिनिधि हैं, जिन्होंने मोदी को न बुलाने का फैसला भी मुसलमानों की तरफ से अकेले ही कर लिया ! बुखारी को भारत के कितने मुसलमान अपना सच्चा प्रतिनिधि मानते हैं, ये तो इस देश के मुसलमान ही बता सकते हैं, लेकिन बुखारी के दावे से तो ऐसा प्रतीत होता है कि वे ही भारत के मुसलमानों के सर्वमान्य प्रतिनिधि हैं और मुसलमानों ने अपने हक के सभी फैसले लेने का अधिकार भी इमाम साहब को सौंप रखा है ! पता नहीं, लेकिन बुखारी साहब को सुनकर तो कुछ ऐसा ही आभास होता है !
बड़ी अजीब बात है, बकौल बुखारी साहब, पीएम मोदी इस देश के मुसलमानों से नहीं जुड़ पाए हैं, तो उन्हें नहीं न्योता भेजा, लेकिन बुखारी साहब जरा ये बताने का कष्ट करेंगे कि क्या पाक प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ से भारत का मुसलमान दिल से जुड़ा हुआ है ..?
क्या नवाज़ शरीफ के प्रति भारत के मुसलमानों के मन में विश्वास जगा हुआ है कि शरीफ उनके सच्चे हितैषी है..?
क्या पाक के वजीरे आज़म नवाज़ शरीफ की नापाक हरकतों भारत के मुसलमानों के हक में हैं..?
अपने बेटे की दस्तारबंदी की रस्म में मोदी को न बुलाने के पीछे के बुखारी के तर्कों को सुनकर तो कम से कम ऐसा ही लगता है !
सवालों की फेरहिस्त तो काफी लंबी है, जिसका सटीक जवाब शायद ही बुखारी साहब दे पाएं, लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुने हुए प्रधानमंत्री पर बुखारी साहब का अविश्वास समझ से परे है। अविश्वास सिर्फ बुखारी साहब का व्यक्तिगत होता तो समझ में आता, लेकिन बुखारी साहब ने तो भारत के सभी मुसलमानों का स्वयंभू प्रतिनिधि बनकर इसका ऐलान कर दिया ! खैर बुखारी साहब इसमें खुश हैं, तो अच्छा है, लेकिन बुखारी साहब आप इस बात को नहीं नकार सकते कि नरेन्द्र मोदी इस देश के प्रधानमंत्री हैं, भविष्य का तो पता नहीं लेकिन जनादेश के रूप में जनता का विश्वास जीतकर ही वे यहां तक पहुंचे हैं, अब इस जनादेश में भी आपको हिंदु – मुसलमान का फर्क दिखाई दे रहा है, तो इसमें कोई क्या कर सकता है ! फिलहाल तो अपने छोटे बेटे शाबान बुखारी की दस्तारबंदी के लिए आपको अग्रिम शुभकामनाएं !


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रविवार, 2 नवंबर 2014

राबर्ट वाड्रा और शनिवार की रात !

किसी ने सही कहा है कि जब वक्त और हालात आपके अनुकूल न हो, तो शांत रहने में ही भलाई है, वरना नुकसान अपना ही होता है। अब देश की सबसे बड़ी पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा को ही देख लिजिए। शनिवार की रात शायद ही वाड्रा साहब कभी भूल पाएंगे। जमीन सौदों पर मीडिया से बात करने से बचने वाले राबर्ट वाड्रा ने जब मुंह खोला और अपना आपा खोया तो, वो भी उस वक्त जब वक्त और हालात दोनों उनके पक्ष में नहीं थे। केन्द्र में यूपीए सरकार का बोरिया बिस्तर बंध चुका था, तो हरियाणा में भी कांग्रेस सरकार सत्ता से बेदखल हो चुकी थी। इतना ही नहीं हरियाणा के नव नियुक्त सीएम ने तो हरियाणा में जमीन सौदों पर जांच की बात से तक इंकार नहीं किया है।
इसी सवाल पर वाड्रा खुद तो शायद सीरीयस नहीं थे, लेकिन सवाल पूछने वाले न्यूज एजेंसी एएनआई के संवाददाता से उल्टा सवाल करने लगे- “Are you Serious”, वो भी एक बार नहीं चार- चार बार !  पत्रकार तो सीरियस ही था, तभी वाड्रा साहब से इतना सीरियस सवाल किया, लेकिन वाड्रा साहब को शायद ऐसा नहीं लगा, तभी तो जवाब देने की बजाए वो कुछ ऐसा कर बैठे, जो उन्हें क्या किसी को शोभा नहीं देता !
सवाल नहीं पसंद था, तो तरीके तो कई थे, जवाब न देने के, लेकिन वाड्रा साहब का शायद ये पसंदीदा तरीका था जवाब देने का। राबर्ट वाड्रा को शायद इस बात का एहसास हो चुका था, कि वो कुछ ज्यादा ही बोल और कर गए, ऐसे में इस शर्मनाक हरकत पर वाड्रा की सफाई भी चंद घंटों में आ गई। लेकिन सफाई में जो कहा गया, उस पर कैमरे में कैद वाड्रा की हरकत देखने के बाद कोई स्कूली बच्चा भी यकीन न करे !  वाड्रा साहब अपनी सफाई में कहते नजर आए कि उन्हें लगा कि कोई निजी फोटोग्राफर उनसे सवाल कर रहा है। लेकिन वाड्रा साहब को कौन समझाए कि उनकी ये हरकत पूरा हिंदुस्तान देख चुका था।
समय शायद कुछ ज्यादा ही खराब था वाड्रा कि, क्योंकि जिस जमीन सौदे के सवाल पर वाड्रा बिफर पड़े थे, उस सौदे पर ही कैग ने भी अपनी रिपोर्ट में सवाल उठा दिए कि हरियाणा सरकार की सहमति के चलते रॉबर्ट वाड्रा ने कानूनों से खिलवाड़ करते हुए जमीन सौदे में 44 करोड़ रुपए कमाए। रिपोर्ट में कहा गया है, कि वाड्रा ने खरीदी गई जमीन को जल्दी ही बेचकर जो मुनाफा लिया, हरियाणा सरकार ने वाड्रा से उसे भी वसूलने की कोशिश नहीं की। मतलब साफ है कि हुड्डा सरकार भी वाड्रा के आगे नतमस्तक थी, अब हुड्डा सरकार नतमस्तक क्यों थी, ये लिखने की शायद जरूरत नहीं है !
बहरहाल वक्त और हालात अनुकूल न होने पर क्या बोलना चाहिए, क्या नहीं, क्या करना चाहिए, क्या नहीं, अब तो शायद राबर्ट वाड्रा अच्छी तरह समझ ही गए होंगे !

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बुधवार, 29 अक्टूबर 2014

"पावर" के लिए बेचैन पवार !

गजब है भाई, ऐसे बेचैनी देखी है कभी, हालांकि राजनीति में कुछ भी संभव है, लेकिन महाराष्ट्र में चुनावी नतीजों के बाद से ही एनसीपी का भाजपा के प्रति बढ़ता प्रेम निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। ध्यान रहे कि ये वही एनसीपी है, जो चुनावी नतीजों से पहले भाजपा की धुर विरोधी हुआ करती थी, लेकिन जनता का फैसला क्या आया, शरद पवार साहब के तो सुर ही बदल गए।
महाराष्ट्र की 288 विधानसभा सीटों के पूरे नतीजे आने से पहले ही साफ हो चुकी चुनावी तस्वीर को भांपकर पहले तो एनसीपी ने खुद की भाजपा को बिना शर्त समर्थन देने का ऐलान कर दिया। वजह बताई, महाराष्ट्र में स्थाई सरकार के गठन में अपनी भूमिका निभाना, लेकिन पवार साहब ये भूल गए कि इसकी असल वजह क्या हो सकती है, जो अब तक फूटी आंख न सुहाने वाली भाजपा को सरकार बनाने के लिए आप बिना शर्त समर्थन को तैयार हो गए, वो भी बिन मांगे। अब जब एनसीपी को लगा कि भाजपा अपनी पुरानी सहयोगी शिवसेना के साथ जाना ज्यादा पसंद करेगी और शिवसेना का रूख भी भाजपा के लिए नरम पड़ने लगा है, तो शरद पवार साहब ने नया दांव खेल दिया। ऐलान कर दिया कि सदन में बहुमत साबित करने के लिए वोटिंग की नौबत आती है, तो एनसीपी विधायक बॉयकॉट कर देंगे और वोटिंग में हिस्सा नहीं लेंगे। मंशा शायद यही थी कि भाजपा को ये संदेश चला जाए कि शिवसेना के दबाव में जाने से भाजपा बचे और बहुमत साबित करने के संकट से उसे एनसीपी निकाल लेगी। अब एनसीपी अपने इस भाजपा प्रेम के पीछे की उस वजह से भले ही इंकार कर रही हो, जिसकी चर्चा सियासी गलियारों में तैर रही है, कि एनसीपी भाजपा के साथ खड़े होकर बदले में भाजपा से चाहती है, कि पिछली सरकार में हुए भ्रष्टाचार और घोटालों की जांच भाजपा सरकार न कराए।
राजनीतिज्ञ वो भी शरद पवार जैसा, जाहिर है बिना किसी वजह के तो भाजपा को समर्थन देने के लिए ललायित नहीं हो रहे होंगे, वजह चर्चाओं में भी है, और इस वजह से आसानी से इंकार भी नहीं किया जा सकता। बहरहाल एनसीपी भाजपा को ऑफर पर ऑफर दिए जा रही है, और भाजपा ने भी शिवसेना के साथ कोई बात नहीं बन पाई है, यानि की भाजपा ने विकल्प खुले रखे हैं। ऐसे में देखना रोचक होगा कि आखिर भाजपा सरकार बनाने के लिए क्या रास्ता अख्तियार करना पसंद करेगी। अपनी पुरानी सहयोगी शिवसेना के समर्थन से सरकार बनाएगी, जिसकी संभावना ज्यादा प्रबल है, या फिर एनसीपी के लुभावने ऑफरों पर गौर करेगी ! बहरहाल देवेन्द्र फडनवीस के रूप में मुख्यमंत्री के नाम का तो ऐलान हो गया है, और उम्मीद है कि जल्द ही सरकार गठन का फार्मूला भी सबके सामने आ जाएगा कि आखिर भाजपा किसे अपने साथ लेकर चलती है। 


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सोमवार, 27 अक्टूबर 2014

काला धन और चंदे का खेल !

काले धन के मुद्दे पर पहले सुर्खियां और फिर वोट तो मोदी जी ने खूब बटोरे लेकिन जब बारी विदेशी बैंक में जमा भारतीयों के काले धन को वापस लाने की बात आई  तो काला धन वापस लाना तो छोड़िए, काला धन जमा करने वालों के नाम का खुलासा करने में भी खोदा पहाड़ निकली चुहिया वाली कहावत चरितार्थ होती दिखाई दी।  
सरकार ने सर्वोच्च न्यायलय में हलफनामा दाखिल कर नाम भी बताए तो सिर्फ तीन कारोबारियों के। डाबर समूह के प्रदीप बर्मन, गोवा की खनन कारोबारी राधा टिम्बलू और राजकोट के सर्राफ व्यापारी पंकज चमनलाल लोढ़िया के नाम सबूत के साथ सरकार ने दिए हैं। हालांकि इनमें से प्रदीप बर्मन ने अपने खाते को वैध बताते हुए सभी प्रकार के टैक्स चुकाए जाने का दावा किया है तो पंकज लोढ़िया ने तो स्विस बैंक में खाता होने की बात से ही साफ इंकार किया है। अब इनके दावों पर यकीन किया जाए तो लंबी जद्दोजहद के बाद सरकार ने जो तीन नाम सार्वजनिक किए हैं, वो मोदी सरकार के जमकर किरकिरी भी करा सकते हैं।
वैसे असल मुद्दा सार्वजनिक किए गए नामों की संख्या को लेकर है, जो सरकार के पूर्व में किए गए वादे के अनुसार कम से कम 136 तो होनी ही चाहिए थी, लेकिन सामने आए सिर्फ तीन नाम। अब इसके मोदी सरकार की क्या मंशा है, ये तो वे ही बेहतर समझ सकते हैं, लेकिन नाम न बताने से पहले भी सवालों के घेरे में आई मोदी सरकार की मुश्किलें नाम बताने के बाद अब और भी ज्यादा बढ़ गई हैं।
पहले नाम न बताने को लेकर सरकार विपक्षियों के निशाने पर थी, अब नाम बता दिए तो सिर्फ तीन ही नाम क्यों का सवाल मोदी सरकार से जवाब मांग रहा है। जाहिर है खाताधारकों की फेरहिस्त लंबी है, लेकिन सिर्फ तीन कारोबारियों के नाम ही क्यों का जवाब हर कोई जानना चाहता है।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्मस की रिपोर्ट ने इन तीन नामों का भाजपा और कांग्रेस दोनों से जुड़ा एक और खुलासा कर भाजपा और कांग्रेस दोनों की नींद और उड़ा दी है। एडीआर की रिपोर्ट कहती है कि कालाधन रखने वाली गोवा के कारोबारी राधा टिंबलू की कंपनी टिंबलू प्राईवेट लिमिटेड ने वित्तीय वर्ष 2004 -2005 और 2011-2012 में भाजपा और कांग्रेस को एक करोड़ 83 लाख रूपए का चंदा भी दिया था। इसमें से बड़ी राशि भाजपा के खाते में आई जिसने टिंबलू प्राईवेट लिमिटेड से एक करोड़ 18 लाख रूपए का चंदा लिया तो कांग्रेस ने 65 लाख रूपए का चंदा लिया। वहीं राजकोट के सर्राफ पंकज लोढ़िया ने भी भाजपा को 2011-12 में 51 हजार रूपए का चंदा दिया था।
जाहिर है कालेधन के मुद्दे को जोरशोर से उठाने वाली भाजपा और तीन नाम सार्वजनिक करने वाली मोदी सरकार की मुश्किल इस खुलासे के बाद अब और बढ़ गई है। टैक्स चोरी कर विदेशी बैंकों में कालाधन रखने वालों से चंदा लेने पर सवाल उठने लाजिमी है, मजे की बात तो ये है कि कालेधन के मुद्दे पर विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस पर सवाल उठाने वाली भाजपा और अब विपक्ष में रहते हुए भाजपा पर सवाल उठा रही कांग्रेस दोनों ही अब एक जैसी स्थिति में है।
चंदे की रकम का बड़ा हिस्सा भले ही भाजपा के खाते में आया हो लेकिन कम ही सही चंदा कांग्रेस ने भी बटोरा है। ऐसे में कालेधन के मुद्दे के बाद एक दूसरे पर निशाना साधकर सियासी फायदा बटोरने वाली देश की दोनों बड़ी पार्टियां अब खुद सवालों के घेरे में हैं।
जाहिर है चंदा देने वालों के दोनों ही पार्टियों से अपने अपने व्यवसायिक स्वार्थ रहे होंगे, और इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि चंदे की एवज में सत्ताधारी दल से इन्होंने भरपूर फायदा भी उठाया होगा या उठाने की तैयारी में होंगी ! अब चाहे सफाई कोई कितनी ही दे, लेकिन काला धन रखने वालों से चंदा लेने के बाद दोनों ही पार्टियों पर भरोसा करना मुश्किल है। खासकर सत्ताधारी भाजपा पर जो कालेधन को वापस लाने और सभी अवैध खाताधारकों के नामों को उजागर करने का दावा कर रही है। वैसे भी नाम उन्हीं के उजागर हुए हैं, जिनसे लिया गया चंदा इन पार्टियों को मिलने वाली चंदे की रकम का बहुत छोटा सा हिस्सा है। ऐसे ही ये राजनीतिक दल चुनावों में पानी की तरह पैसा नहीं बहाते !


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रविवार, 26 अक्टूबर 2014

लहर, असर और दिल्ली का डर !

आम चुनाव के मुकाबले कम ही सही, लेकिन मोदी लहर का असर महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजों पर भी दिखाई तो दिया लेकिन इसके बाद भी झारखंड और जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव के साथ दिल्ली में विधानसभा चुनाव का ऐलान न होना हैरान जरूर करता है।
सवाल कई हैं, लेकिन जवाब शायद भाजपा के पास नहीं है। या कहें, कि जवाब तो है, लेकिन उसे कहने का साहस भाजपा नेताओं के पास नहीं है। दिल्ली में विधानसभा चुनाव कराने की बजाए खाली पड़ी तीन सीटों पर उपचुनाव कराने का ऐलान करना सवालों की फेरहिस्त को और लंबी कर देता है।
आम चुनाव के बाद 10 राज्यों की 33 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजे भाजपा के पक्ष में नहीं आए तो मोदी लहर के हवा होने की हवा चलने लगी थी। लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव में भाजपा की धमाकेदार जीत ने दीवाली पर भाजपा की खुशी को दोगुना कर दिया। साथ ही मोदी लहर के हवा होने की बातें करने वाले विरोधियों पर निशाना साधने का मौका भी भाजपा नेताओं को मिल गया। लेकिन इसके बाद भी दिल्ली में चुनाव का ऐलान न होना साफ करता है कि दिल्ली को लेकर भाजपा के मन में डर अभी भी कायम है। भाजपा को शायद डर है कि दिल्ली की सत्ता हासिल करने की राह में आम आदमी पार्टी उसके लिए रोड़ा बन सकती है। शायद इसलिए ही दिल्ली में विधानसभा चुनाव कराने की बजाए खाली पड़ी 3 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव कराना भाजपा को ज्यादा बेहतर विकल्प लगा !
उपचुनाव के नतीजे दिल्ली की जनता के मिजाज़ को भी बता देंगे। किस्मत से मिजाज़ भाजपा के पक्ष में रहा तो कुछ दिनों में या महीनों में दिल्ली में विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया जाएगा और नतीजे मनमाफिक न आए तो फिर दिल्ली में राष्ट्रपति शासन तो लगा ही हुआ है। जैसे चल रहा है, चलने दिया जाए ! कम से कम दिल्ली की हार के कलंक से तो कुछ दिनों या महीनों तक बचा ही जा सकता है। इस दौरान जोड़ – तोड़ कर सरकार बनाने का वक्त तो रहेगा ही ! पता नहीं, लेकिन झारखंड और जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव के ऐलान के साथ दिल्ली में विधानसभा चुनाव की बजाए तीन सीटों पर उपचुनाव के ऐलान के बाद से ही मन में कुछ ऐसे ही सवाल उठ रहे हैं।
बहरहाल आम चुनाव के बाद महाराष्ट्र और हरियाणा तो भाजपा ने फतह कर लिया है, लेकिन झारखंड और जम्मू – कश्मीर विधानसभा चुनाव के साथ ही दिल्ली की तीन विधानसभा सीटों पर उपचुनाव भी भाजपा के लिए किसी बड़ी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा। फैसला जनता को ही करना है, ऐसे में देखना रोचक होगा कि इन चुनाव में लहर कितना असर दिखाती है।


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रविवार, 19 अक्टूबर 2014

कायम है मोदी मैजिक !

हरियाणा और महाराष्ट्र में राजनीतिक जमीन तलाशने वाली भाजपा को न सिर्फ इस चुनाव में जमीन मिली बल्कि इस जमीन में कमल भी खूब खिले। हरियाणा की मिट्टी तो भाजपा को इतनी भायी की 2005 में दो और 2009 में सिर्फ चार सीटें जीतने वाली भाजपा ने 47 सीटों पर जीत हासिल करते हुए अपने दम पर बहुमत हासिल कर लिया। आम चुनाव के बाद विधानसभा उपचुनाव में भाजपा की हार पर लहर का असर कम होने की बात करने वालों को भी इसका जवाब मिल ही गया कि लहर अभी कायम है। नतीजों के बाद को इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि जनता में मोदी का प्रभाव अभी कायम है और चुनाव के दौरान मोगी का ताबड़तोड रैलियों ने इस लहर को बनाए रखा।
हालांकि महाराष्ट्र में बहुमत के जादुई आंकड़े से भाजपा 23 सीटें दूर रह गयी लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा का पिछले रिकार्ड के हिसाब से ये भाजपा के लिए बड़ी उपलब्धि है, वो भी तब जब चुनाव से ऐन पहले उसकी अहम सहयोगी शिवसेना और भाजपा की राहें जुदा हो गयी थी। चुनावी नतीजों के बाद तस्वीर आईने की तरफ साफ हो गयी है, तो अब महाराष्ट्र में जद्दोजहद इस बात की है कि बहुमत के जादुई आंकड़े से 23 कदम दूर भाजपा सरकार कैसे बनाएगी..? 123 सीटें जीतकर महाराष्ट्र में सबसे बड़ी पार्टी का तमगा हासिल करने वाली भाजपा की चुनाव से पहले की अकड़ कायम है, तो अपनी अपनी जीत का दम भरने वाली एनसीपी और शिवसेना की अकड़ कमजोर होने लगी है।
पूर्ण नतीजों से पहले एनसीपी का भाजपा को सरकार बनाने के लिए समर्थन की बात कहना, ये बताने के लिए काफी है। शिवसेना का भाजपा के लिए नरम पड़ता रूख भी सारी कहानी बयां कर रहा है। शिवसेना का भाजपा के लिए नरम रूख तो समझ में आता है, लेकिन एनसीपी की भाजपा को समर्थन देने के लिए बेकरारी बताने के लिए काफी है कि सत्ता में रहने या सत्ता के करीब रहने के लिए एनसीपी किसी भी हद तक जाने को तैयार है। एनसीपी को शायद जनता के सरोकार से कोई लेना देना नहीं है, वो चाहती है तो बस सत्ता में रहना। पहले कांग्रेस के साथ मिलकर सत्ता का सुख भोगा और चुनाव के दौरान भाजपा को खूब कोसा लेकिन जब जनता ने आईना दिखा दिया तो, अब भाजपा के साथ जाने से भी इन्हें कोई गुरेज नहीं है।
भाजपा किसके साथ मिलकर सरकार बनाएगी इस पर से पर्दा भी जल्द हट जाएगा। एनसीपी और शिवसेना दोनों ही विकल्प भाजपा के सामने हैं, एनसीपी बिना शर्त सरकार को बाहर से समर्थन देने को आतुर दिखाई दे रही है, तो शिवसेना ने एक बार फिर से हाथ मिलाने से इंकार नहीं किया है। बहरहाल देखना ये होगा कि भाजपा शिवसेना के साथ सरकार बनाती है तो किन शर्तों पर और एनसीपी के समर्थन से सरकार बनाती है तो किस मुंह से..?  जाहिर है सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद भी दुविधा में भाजपा ही है कि आखिर किसके साथ मिलकर सरकार बनाए..? एनसीपी को चुनाव से पहले कोसने वाली  भाजपा एनसीपी के साथ जाए तो कैसे जाए और शिवसेना के साथ जाए तो शर्तों का अंबार सामने खड़ा होगा।   

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शनिवार, 18 अक्टूबर 2014

आएंगे नतीजे, बेनकाब होंगे चेहरे !

महाराष्ट्र और हरियाणा में धड़कनें तेज होंगी, उन सब की, दांव पर लगी है जिनकी किस्मत, आखिर जनता का फैसला बस आने ही वाला है। महाराष्ट्र और हरियाणा, दो ऐसे राज्य जहां की राजनीति दूसरे राज्यों से कई मायने में अलग है। देश की दो बड़ी राजनीतिक पार्टियां कांग्रेस और भाजपा के अलावा इन दोनों राज्यों में क्षेत्रीय दल भी खासा वजूद रखते हैं। जाहिर है ऐसे में इनके बिना सरकार बना पाना किसी भी दल के लिए आसान नहीं होगा। हालांकि एक्जिट पोल के नतीजे हाल ही में हुए विधानसभा उपचुनाव के बाद भाजपा को खुश होने का मौका दिया है, लेकिन सवाल ये है कि क्या ये खुशी 19 अक्टूबर को भी कायम रह पाएगी..?
चुनाव से पहले दोनों ही राज्यों की राजनीतिक गतिविधियों हर किसी के लिए चौंकाने वाली थी। दोनों ही राज्यों में सत्ता पर नजरें गढ़ाए बैठी भाजपा ने हरियाणा में अपनी सहयोगी हरियाणा जनहित कांग्रेस को भाव नहीं दिया तो हजकां ने भाजपा पर आम चुनाव की जीत की खुमारी होने का आरोप लगाते हुए अपने रास्ते अलग कर लिए। महाराष्ट्र में भी सीटों की लड़ाई ने 25 साल पुराने भाजपा-शिवसेना गठबंधन के बंधन की गांठें खोल दी। महाराष्ट्र में कुछ ऐसी ही कहानी सत्तारूढ़ एनसीपी-कांग्रेस की भी रही। सीटों के बंटवारे ने इनकी राहें भी अलग कर दी। जाहिर है सीटों के बंटवारे पर राहें अलग करने वाली सभी पार्टियों को अपनी अपनी जीत का पूरा भरोसा है, लेकिन गठबंधन की गांठें खुलने का किसे कितना नफा – नुकासन होगा, इसका फैसला जनता की अदालत में हो चुका है।
वैसे एक्जिट पोल के बाद नतीजों की संभावित तस्वीर सामने आने के बाद असल नतीजों से पहले चुनाव से पहले राहें अलग करने वाले भी बैचेन हैं, जाहिर है खुद की जीत पर भरोसा करने वालों पर अगर जनता भरोसा नहीं करती है तो इनकी संभावित असहज होने वाली स्थिति को आसानी से समझा जा सकता है। ऐसे में सत्ता के लिए पांच साल का इंतजार कौन करना चाहेगा भला..? जनता का भरोसा न सही, लेकिन अपने पुराने सहयोगियों से फिर से हाथ मिलाकर सत्ता सुख भोगने का मौका शायद ही ये छोड़ पाएंगे !
बहरहाल महाराष्ट्र और हरियाणा का सरताज कौन बनेगा..? किसका अंहकार टूटेगा और कौन सत्ता सुख भोगेगा..? कौन सत्ता के लिए फिर से हाथ मिलाने को आतुर दिखेगा..? इसका इंतजार भी बस अब खत्म होने ही वाला है।  जीते चाहे कोई भी, लेकिन नतीजों के बाद सरकार बनाने की प्रक्रिया के दौरान कई दिग्गजों के चेहरे के पीछे के चेहरे जरूर बेनकाब होंगे !


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शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

रेप करिए लेकिन चुनाव के बाद !

रेप करिए, दूसरों की मां- बहिन की इज्जत को तार तार करिए, लेकिन चुनाव लड़ने के बाद, बस थोड़ा सब्र कीजिए, चुनाव हो जाने दीजिए, बस चुनाव तक शांत रहिए..! ये सब सिर्फ चुनाव लड़ने के बाद होगा, गलती से चुनाव जीत गए तो न जाने ये नेतागण और क्या क्या करेंगे..? महाराष्ट्र की सत्ता में काबिज होने का ख्वाब देख रही एनसीपी नेता और महाराष्ट्र के पूर्व गृहमंत्री आर आर पाटिल न सिर्फ ऐसा सोचते हैं बल्कि दूसरे नेताओं को सलाह देने से भी पीछे नहीं हट रहे हैं। महाराष्ट्र के सांगली में एक चुनावी सभा में आर आर पाटिल कुछ ऐसा ही कहते पाए गए। पाटिल ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा, 'एमएनएस उम्मीदवार सुधाकर खाड़े के समर्थक मेरे पास आए और अपना समर्थन देने की बात कही। मैंने उनसे पूछा कि आप ऐसा क्यों कर रहे हो, तो उन्होंने बताया कि उनका उम्मीदवार रेप के मामले में जेल में बंद है।'
इस पर पाटिल ने जवाब दिया कि, 'यदि सुधाकर खाड़े चुनाव लड़ना चाहते थे, यदि वह विधायक बनना चाहते थे, तो उन्हें चुनाव के बाद रेप करना चाहिए था।' पढ़ें- पाटिल का बेशर्म बयान, 'तो चुनाव बाद कर लेते रेप'
हालांकि विवाद के बाद पाटिल माफी मांगते हुए नजर आए और कहने लगे कि उन्होंने ये टिप्पणी मजाक में की थी। गजब है पाटिल साहब, पहले कुछ भी बोला, फिर माफी मांग लो, बढ़िया है पाटिल साहब बढ़िया है। नेताओं से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है, लेकिन एक ऐसा व्यक्ति से जो महाराष्ट्र का गृह मंत्री रह चुका हो, जिसके कंधे पर राज्य की महिलाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी हो, वो अगर ऐसा बोलता है तो दुख होता है। लेकिन पाटिल साहब का क्या, उनका तो मानना है, पहले चुनाव लड़ लो, फिर करो जो मर्जी करना है।
अगर आपको याद हो तो, ये वही पाटिल साहब हैं, जो 2008 में मुंबई में हुए आतंकी हमले के वक्त महाराष्ट्र के गृहमंत्री थे। उस वक्त भी पाटिल साहब के कुछ ऐसे ही बोल थे। आतंकी हमले पर ये अपने प्रदेश की जनता के प्रति कितने संजीदा थे, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उस वक्त आतंकी हमले पर इनका कहना था कि आतंकवादी तो पांच हजार लोगों को मारने की योजना बनाकर आए थे,  हमने कितने कम लोगों को मरने दिया। इतने बड़े शहर में एकाध हादसा तो हो ही जाता है‘’
ऐसे हैं एनसीपी हमारे पाटिल साहब, जो एक बार फिर से महाराष्ट्र की जनता की पता नहीं कैसी कैसी सेवा करने का ख्वाब पाले बैठे हैं। शायद फिर से चुनाव जीत भी जाएं पाटिल साहब, क्योंकि ऐसा ही तो होता आया है चुनाव में। कर्म देखकर नहीं जाति देखकर जो वोट करने की परंपरा जो अभी भी कायम है। वैसे भी पाटिल साहब ने चुनाव से पहले तो कुछ नहीं किया, शायद चुनाव जीतकर ही कुछ करके दिखाएं। उम्मीद तो यही करते हैं कि अब शायद जनता पाटिल जैसे नेताओं को सबक सिखाएगी, लेकिन क्या वाकई में ऐसा होगा..?


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गुरुवार, 9 अक्टूबर 2014

ओम, जया और जेल

ओम प्रकाश चौटाला और जयललिता, एक हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री हैं तो दूसरी तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री। दोनों भ्रष्टाचार के आरोप में दोषी ठहराए जाने के बाद जेल की हवा खा रहे हैं। लेकिन इसके बाद भी लगता है, उन्हें कानून का कोई खौफ है और न ही उनके मन में न्यायपालिका के लिए कोई सम्मान। ओम प्रकाश चौटाला साहब तो बीमारी का बहाना कर अदालत से जमानत पर बाहर हैं और अपनी पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल के लिए जमकर चुनाव प्रचार कर रहे हैं, तो तमिलनाडु में जयललिता की रिहाई के लिए उनकी पार्टी के कार्यकर्ता कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं। उन्हें अदालत के आदेश तक की परवाह नहीं है, या कहें कि जयललिता की अंधभक्ति में वे दोषी ठहराए जाने के बाद जेल में बंद जयललिता को रिहा करने जैसी बेतुकी बातें कर रहे हैं। उनके लिए कानून से बढ़कर उनकी अम्मा है और अम्मा की रिहाई के लिए वे किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।  
हरियाणा विधानसभा चुनाव में चौटाला जमकर चुनावी प्रचार में मशगूल हैं।  बीमारी के बहाने जमानत पाने वाले चौटाला को रोकने की शायद किसी में हिम्मत नहीं है। ख़बर सबको है, सीबीआई से लेकर चुनाव आयोग तक लेकिन चौटाला की हिमाकत के आगे सब बेबस से दिखाई पड़ रहे हैं। अदालत के नोटिस के बाद भी चौटाला पर कोई असर नहीं है, वे बेधड़क रोज चुनावी रैलियों को संबोधित कर रहे हैं, इनेलो प्रत्यशियों के लिए वोट मांग रहे हैं। हालांकि देर से ही सही लेकिन सीबीआई की आंखें खुली और सीबीआई की अर्जी के बाद अब कोर्ट ने चौटाला को कोर्ट में हाजिर होने का आदेश दिया है।
वैसे अब चौटाला जेल चले भी जाते हैं तो क्या..? चौटाला ने अपना काम तो कर दिया। जातिवाद की राजनीति के केन्द्र हरियाणा में चौटाला ने इस दौरान चुनाव प्रचार में कोई कसर नहीं छोड़ी और अब चौटाला के फिर से जेल जाने पर भी चौटाला को इसका फायदा चुनाव में सहानुभूति के रूप में भी मिल सकता है। हरियाणा में अब तक भी तो यही होता आया है।
वहीं दूसरी तरफ जयललिता हैं, जो मुख्यमंत्री रहते हुए गिरफ्तार होने वाली शायद पहली राजनेता हैं। लेकिन जयललिता समर्थकों के लिए अदालत के फैसले का कोई असर नहीं है।
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में जनता के चुने प्रतिनिधि का न्यायपालिका के प्रति असम्मान साबित करने के लिए काफी है कि हिंदुस्तान में ऐसे राजनेताओं का सिर्फ एक ही ध्येय है, वो है अपना उद्धार करना, जनता से उन्हें कोई सरोकार नहीं है। होता तो शायद ओम प्रकाश चौटाला और जयललिता आज जेल की हवा न खा रहे होते। वैसे भी ये सिर्फ भारत में ही संभव है, जहां पर भ्रष्टाचारी को सजा मिलने में 18 साल लग जाते हैं और उसके बाद भी वो खुलेआम न्यायपालिका का मखौल उड़ाता है, लेकिन इससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात तो ये है कि ऐसे राजनेताओं और उनकी पार्टी के नाम पर जनता वोट देने से पीछे नहीं हटती। ये तस्वीर बदल सकती है, और इसे सिर्फ जनता ही बदल सकती है, वो भी अपने वोट की ताकत के बल पर, लेकिन क्या ऐसा कभी होगा..? उम्मीद तो यही करते हैं कि हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से ही इसका शुभारंभ हो।   


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शनिवार, 27 सितंबर 2014

18 साल- देर आए दुरुस्त आए !

23 साल पहले 1991 में जब जयललिता तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनती हैं, तो ऐलान करती हैं कि वे बतौर मुख्यमंत्री सिर्फ एक रूपया वेतन लेंगी। अमूमन किसी राजनेता के मुंह से ऐसी बात कम ही सुनने को मिलती हैं, लेकिन जब जयललिता ने ये ऐलान किया तो, इस कदम की खूब तारीफ भी हुई थी। इससे जयललिता ने न सिर्फ खुद को ईमानदार राजनेता के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की बल्कि तमिलनाडु की जनता का दिल भी जीतने की कोशिश की। लेकिन किसने सोचा था कि एक रूपए महीने वेतन लेने वाली यही जयललिता 18 साल बाद आय से अधिक संपत्ति के मामले में दोषी करार दी जाएंगी।
1991 में मुख्यमंत्री बनने के बाद जयललिता ने तीन करोड़ की संपत्ति घोषित की थी, लेकिन उनके पांच साल के कार्यकाल में जयललिता के पास 66.65 करोड़ की संपत्ति हो गई। अब एक रूपए महीने के वेतन में 3 करोड़ से किसी की संपत्ति 66.65 करोड़ तो हो नहीं सकती। इसी आरोप में जयललिता के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई और 18 साल पहले दर्ज एफआईआर पर 27 सितंबर 2014 को बेंगलुरू की स्पेशल कोर्ट ने जयललिता को दोषी करार देते हुए 4 साल की सजा सुनाई और 100 करोड़ रूपए का जुर्माना भी लगाया। जयललिता के घर से छापे में छापे में 28 किलो सोना, 800 किलो चांदी, 10 हजार 500 साड़ियां, 91 घड़ियां और 750 जोड़ी जूते मिले थे। साथ ही उनके पास कई मकान, फार्म हाउस और चाय बागान होने की बात भी सामने आई थी।
अब जबकि जयललिता को सजा का ऐलान हो चुका है, तो तीसरी बार तमिलनाडु की सीएम बनी उनकी कुर्सी भी छिन चली गई है। जयललिता और उनके समर्थकों के लिए ये इसलिए दिल दहला देने वाला है, क्योंकि इसी जयललिता की एआईएडीएमके ने न सिर्फ 2011 में तमिलनाडु की 234 विधानसभा सीटों में से 150 सीटों पर जीत हासिल कर तमिलनाडु में सरकार बनाई बल्कि 2014 के आम चुनाव में तमिलनाडु की सभी 37 लोकसभा सीटों पर भी जीत हासिल की है।

आय से अधिक संपत्ति मामले में जेल की हवा खाने वाले जयललिता को खुद के किए की सजा मिलने से दिल को संतुष्टि जरूर मिली है, कि भ्रष्ट राजनेता का कद चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, न्यायपालिका के सामने उसका कोई बिसात नहीं है। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहते हुए जयललिता पर बेंगलुरू की स्पेशल कोर्ट का फैसला कम से कम न्यायपालिका पर आम आदमी के विश्वास को मजबूत करने का ही काम करता है। हालांकि एक टीस भी दिल में रह गई कि इस मामले को अंजाम तक पहुंचने में 18 साल का लंबा वक्त लग गया। इन 18 सालों में जयललिता दो बार तमिलनाडु की सीएम की कुर्सी पर विराजमान भी हुई। आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है, कि इस दौरान जयललिता ने सीएम की कुर्सी पर रहते क्या कुछ नहीं किया होगा। हो सकता है, न भी किया हो लेकिन इस पर यकीन कैसे किया जाए, क्योंकि पहली बार का अनुभव आंखे खोलने के लिए काफी है। बहरहाल इतना ही कहा जा सकता है कि 18 साल बाद ही सही, देर आए दुरुस्त आए। साथ ही ये उम्मीद भी करते हैं कि जनता की देश की अदालतों में लंबित केसों के निपटारे में तेजी आएगी और समय रहते दोषियों को उनके किए की सजा मिलेगी। 

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गुरुवार, 25 सितंबर 2014

महाराष्ट्र - दोस्त, दोस्त न रहा

दुश्मन का दुश्मन, दोस्त की कहावत को आपने सुनी ही होगी, महाराष्ट्र में 25 साल से भाजपा और शिवसेना तो 15 साल से कांग्रेस और एनसीपी गठबंधन इस कहावत को चरितार्थ कर भी रहे थे। लेकिन महाराष्ट्र के आगामी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा-शिवसेना और कांग्रेस-एनसीपी के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर चली आ रही तकरार एक ही दिन में एक ही घंटे के अंतराल में नतीजे तक पहुंच गई। नतीजा भी ऐसा कि 25 सालों से चली आ रही भाजपा-शिवसेना की राहें जुदा हो गईं तो 15 सालों का कांग्रेस और एनसीपी का साथ भी छूट गया। महाराष्ट्र की राजनीति में अच्छा खासा दखल रखने वाली चारों पार्टियों का अब कोई दोस्त नहीं है। सामने हैं तो सिर्फ चंद घंटे पहले साथ रहने वाले दोस्त से बने राजनीतिक दुश्मन, जिन्हें मात देकर ही वे महाराष्ट्र की सियासत का सरताज बन सकते हैं। आगामी विधानसभा चुनाव में महाराष्ट्र की सत्ता को अकेले दम पर हासिल करने का अति विश्वास शायद भाजपा, शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस चारों को ही है। शायद इसलिए ही चारों ने सियासी दोस्ती से बढ़कर सीटों को अहमियत दी और मनमाफिक सीट न मिलने पर एकला चलो की नीति अपनाने में जरा भी देर नहीं की।
चारों ही दलों को अपने सहयोगी से ज्यादा खुद पर भरोसा है, कि वे ज्यादा सीटों पर चुनाव जीत सकते हैं, शायद इसलिए ही वे ज्यादा से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ना चाहते थे। लेकिन सवाल ये उठता है कि जो महाराष्ट्र की राजनीति में अब तक नहीं हुआ क्या अब संभव हो पाएगा..?
क्या जो पार्टी, चाहे वो भाजपा हो, शिवसना हो, कांग्रेस हो या फिर एनसीपी अपने कोटे की सीटों में से भी आधिकतर सीटों पर जीत हासिल न कर पाई हों, वह सभी सीटों पर चुनाव लड़ते हुए अकेले दम पर सरकार बनाने की स्थिति में आ सकती हैं…? (पढ़ें- चरम पर तकरार लेकिन सपना महाराष्ट्र में सरकार !)
क्या जो जनता पहले गठबंधन के नाम पर सहयोगी पार्टी को वोट देने में पीछे नहीं हटती थी, वो एकला चलो की राह पर निकली इन पार्टी के उम्मीदवारों पर इतना भरोसा कर पाएंगी कि वे विधानसभा पहुंच जाएं..?
क्या गठबंधन के नाम पर एकजुट होने वाला वोटबैंक, एकला चलने पर सिर्फ एक ही तरफ झुकेगा, जैसे होता आया है या फिर नहीं..?
जीत के भरोसे पर याराना खत्म करना शायद आसान काम है, लेकिन उस भरोसे का भरोसा जनता को दिलाना और अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में आना इतना आसान काम नहीं है, लेकिन चारों ही प्रमुख दलों को लगता है कि वे जनता का भरोसा जीतने में कामयाब हो जाएंगे।
अकेले सभी 288 सीटों पर चुनाव लड़ते हुए भले ही ज्यादा सीटें जीतने की उम्मीदें पाल बैठे हैं, लेकिन चारों ही पार्टियां ये भूल रही हैं कि उऩ्होंने अपनी जीत की राह में एक और बीज को खुद ही बोया है, जो उनका महाराष्ट्र की सत्ता में काबिज होने के ख्वाब को चकनाचूर कर सकता है, जिसकी बहुत ज्यादा संभावना भी साफ दिखाई दे रही है।
बहरहाल महाराष्ट्र की राजनीति क्या करवट लेगी ये तो 19 अक्टूबर को महाराष्ट्र के चुनावी नतीजे आने के साथ ही साफ हो जाएगा लेकिन इस सब के आधार पर इतना अनुमान लगाना कठिन तो नहीं है, कि अगर महाराष्ट्र की जनता ने भावनाओं में बहकर अपने मताधिकार का प्रयोग किया तो उन्हें बहुत जल्द एक और चुनाव उनके स्वागत में तैयार बैठा मिलेगा, जिसके खर्च का बोझ भी जनता की ही जेब से निकलेगा। फिलहाल तो हम सभी दलों को शुभकामनाएं दे सकते हैं और महाराष्ट्र की जनता से ये उम्मीद कर सकते हैं कि वे बेहतर प्रत्याशियों को चुनेंगे और महाराष्ट्र में एक स्थिर सरकार के लिए वोट करेंगे।


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बुधवार, 24 सितंबर 2014

मंगलयान- अभी तो ये शुरुआत है

दिन बुधवार का था और मन में अमंगल का डर था, लेकिन उससे भी ज्यादा बलवती थी, मंगल की उम्मीद। ये उम्मीद रंग भी लाई और बुधवार को सुबह आठ बजे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) का मार्स आर्बिटर मिशन यानि मंगलयान जैसे ही मंगल की कक्षा में दाखिल हुआ सब मंगल ही मंगल हो गया। अमंगल का डर पीछे छूट चुका था, और भारतीय वैज्ञानिकों की मेहनत ने भारत को दुनिया का सरताज बना दिया। पहले ही प्रयास में मंगल की कक्षा में मंगलयान का प्रवेश करने पर भारत विश्व बिरादरी के सामने क्यों न इतराता।
इतराए भी क्यों न, जिस मिशन को विश्व महाशक्ति अमेरीका और रूस जैसे देश तक अपने पहले प्रयास में नहीं साध पाए, उसे भारतीय वैज्ञानिकों ने साकार कर दिखाया। अमेरिका इस उपलब्धि को सात प्रयास में हासिल कर पाया तो एशिया के शक्तिशाली देश चीन और जापान के लिए इस उपलब्धि को हासिल करना अभी भी किसी सपने की तरह है। भारत की ये कामयाबी इसलिए भी अहम हो जाती है, क्योंकि मंगल के 51 मिशनों में से अब तक सिर्फ 21 ही कामयाब हो पाए हैं औऱ भारत से पहले इस कामयाबी को सिर्फ अमेरिका, रूस और यूरोप ही हासिल कर सके हैं। खास बात ये है कि भारत ने इस काम के लिए कुल 450 करोड़ रूपए खर्च किए जो कि अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के मंगलयान मावेन की लागत का करीब दसवां हिस्सा है।
भारत के वैज्ञानिकों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उनका कोई सानी नहीं है और वे चाहें तो असंभव को भी संभव कर सकते हैं। मार्स आर्बिट मिशन इसकी एक ताजा मिसाल है। भारतीय वैज्ञनिकों के इस कमाल के साथ ही 24 सितंबर 2014 की तारीख सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो चुकी है। पहले ही प्रयास में सफलता मिलने से न सिर्फ अंतरिक्ष में भारत का रूतबा बढ़ा है,  बल्कि इसने अंतरिक्ष में भारत की नई उम्मीदों को भी पंख लगाए हैं। जाहिर है, इस मिशन की सफलता से इसरो से भारतीयों की उम्मीदें और भी बढ़ गयी हैं। उम्मीद करते हैं कि पहले ही प्रयास में मंगलयान को मंगल की कक्षा में स्थापित करने में सफलता हासिल कर विश्व बिरादरी में अपना लोहा मनवाने वाले भारतीय वैज्ञानिक भविष्य में भी भारतवासियों को गर्व करने का मौका देंगे और सफलता की नई कहानियां लिखेंगे। मंगलयान मिशन के लिए इसरो की टीम को बधाई और भविष्य की चुनौतियों को पार करने के लिए ढ़ेरों शुभकामनाएं।

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सोमवार, 22 सितंबर 2014

चरम पर तकरार लेकिन सपना महाराष्ट्र में सरकार !

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में भाजपा-शिवसेना और कांग्रेस-एनसीपी में सियासी गठजोड़ में सीटों के बंटवारे को लेकर रार थमने का नाम नहीं ले रही है। हैरत की बात है कि महाराष्ट्र में 288 विधानसभा सीटों के लिए मतदान 15 अक्टूबर को होना है और किस्मत का फैसला 19 अक्टूबर को होगा, लेकिन भाजपा-शिवसेना और सत्तधारी कांग्रेस-एनसीपी गंठबंधन के नेताओं की जिद और आचरण से तो ऐसा प्रतीत होता है, मानो जनादेश उनके पक्ष में आ चुका है। ये जीत का अति विश्वास है या फिर कुछ और ये तो भाजपा-शिवसेना और एनसीपी-कांग्रेस के नेता ही जानें, लेकिन सीटों के बंटवारे को लेकर किसी भी हद तक जाने को तैयार इन सियासी सूरमाओं को नहीं भूलना चाहिए कि महाराष्ट्र की जनता इस सियासी नौटंकी को बखूबी देख और समझ भी रही है। (जरूर पढ़ें - महाराष्ट्र - कायम रहेगा याराना !)
सीटों पर समझौता न होने की स्थिति में अकेले सभी 288 विधानसभा सीटों पर लड़ने और अपनी-अपनी जीत के प्रति आश्वस्त दिखाई दे रहे ये नेता दावा कर रहे हैं कि आगामी चुनाव में जीत का सेहरा उनके ही सिर बंधेगा लेकिन महाराष्ट्र का सियासी सफरनामा बताना है कि कौन कितने पानी में है। इस सब के लिए ज्यादा पीछे जाने की भी जरूरत नहीं है। सिर्फ 2009 के विधानसभा चुनाव के आंकड़ों पर नजर डालें तो समझ में आता है कि इनके दावों में कितना दम है।
2009 में साथ मिलकर चुनाव लड़ने पर भाजपा-शिवसेना गठबंधन में भाजपा ने 119 सीटों पर ताल ठोकी तो शिवसेना ने 160 सीटों पर अपने उम्मीदवार मैदान में उतारे। लेकिन भाजपा 119 में से महज 46 सीटों पर ही फतह हासिल कर पाई तो शिवसेना तो 160 सीटों में से सिर्फ 44 पर ही जीत दर्ज कर पाई। ये वो आईना है जो 2009 में जनता ने भाजपा और शिवसेना को दिखाया था। अब जरा नजर जीत की शेखी बघार रहे कांग्रेस और एनसीपी पर भी डाल लेते हैं। 2009 में कांग्रेस और एनसीपी ने मिलकर सरकार जरूर बनाई लेकिन चुनाव लड़ने वाली सीटों की संख्या की तुलना में जीतने वाली सीटों की संख्या का अंतर अच्छा खासा था। 170 सीटों पर लड़ते हुए कांग्रेस 82 सीटें जीत पाई तो 113 सीटों पर लड़ने वाली एनसीपी 62 सीटों पर। हालांकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि चुनाव लड़ने वाला कोई भी राजनीतिक दल सभी सीटों पर जीत दर्ज कर पाए लेकिन लड़ने और जीतने वाली सीटों में अंतर की संख्या जब ज्यादा हो तो समझ लेना चाहिए कि स्थितियां बहुत ज्यादा उनके पक्ष में नहीं रहीं। रहीं होती तो शायद ये अंतर अपेक्षाकृत कम होता। महज 10 से 15 सीटों के लिए ऐसे वक्त पर लड़ना, जब चुनाव की तारीखें सिर पर हों, तो इसे कहीं से समझदारी नहीं कहा जा सकता, फिर चाहे वो भाजपा-शिवसेना हों या फिर कांग्रेस-एनसीपी। 10-15 सीटों का झमेला छोड़ आपसी समझ से शायद ये अपने चुनावी कैंपेन पर ध्यान लगाते तो शायद जीतने वाली सीटों की संख्या बढ़ाने में कामयाब हो सकते थे, लेकिन चंद सीटों के लिए इस तरह लड़ना कहीं न कहीं अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मारने सरीखा है। जाहिर है मतभेद और मनभेद के बाद अलग – अलग चुनाव लड़ना न तो भाजपा-शिवसेना के लिए फायदेमंद हैं और न ही कांग्रेस – एनसीपी के लिए। वो भी ऐसे राज्य में जहां पर ये चारों ही राजनीतिक पार्टियां मतदाताओं के लिए नई नहीं हैं और अच्छी खासी पैठ भी रखती हैं। (जरूर पढ़ें - भाजपा - खुमारी अभी बाकी है !)
निश्चित तौर पर दोनों ही गठबंधनों का टूटना इन सियासी दलों के साथ ही महाराष्ट्र की जनता के लिए भी शुभ संकेत नहीं है। मतलब साफ है कि 288 सीटों वाली महाराष्ट्र विधानसभा में अलग – अलग लड़ने की स्थिति में पूर्ण बहुत पाना किसी भी दल के लिए लगभग नामुमकिन होगा। नतीजा त्रिशंकु विधानसभा होगी महाराष्ट्र की जनता को एक और चुनाव का सामना करना पड़ेगा, जिसका मतलब करोड़ों रूपए का बोझ किसी न किसी कर के रूप में जनता के सिर ही थोपा जाएगा।
दरअसल इस चुनाव में असल परीक्षा महाराष्ट्र की जनता की भी है कि वे किसी एक दल को चुनकर स्थाई सरकार का निर्माण करने की ओर कदम बढ़ाते हैं, या फिर अपने निजी हितों को साधने के लिए आपस में ही भिड़ने वाले इन सियासी दलों के नेताओं पर भरोसा करते हुए जाति और संप्रदाय के आधार पर वोट करते हुए महाराष्ट्र को एक और चुनाव की ओर धकेलती है। बहरहाल सीटों के बंटवारे को लेकर नूरा कुश्ती जारी है, देखना ये होगा कि ये नूरा कुश्ती कहां पर जाकर थमती है।


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शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

महाराष्ट्र - कायम रहेगा याराना !


हरियाणा की कहानी बीजेपी दोहराना तो महाराष्ट्र में भी चाहती थी, लेकिन शायद भाजपा नेताओं को समय रहते इस बात का भान हो गया कि महाराष्ट्र में शिवसेना से 25 साल पुराना याराना तोड़ कर अकेले दम पर कांग्रेस और एनसीपी के साथ ही शिवसेना का भी सामना करना, उसके महाराष्ट्र की सत्ता में काबिज होने के अरमानों पर पानी फेर सकता है। यही वजह है कि भाजपा ने साफ कर दिया है, कि वे शिवसेना के साथ अपनी 25 साल पुरानी दोस्ती में दरार आने के बावजूद उसे निभाएंगे और मिलकर आगामी विधानसभा चुनाव लड़ेंगे। भाजपा ये बात अच्छी तरह जानती है, कि शिवसेना से किनारा कर अकेले दम पर महाराष्ट्र की सत्ता में काबिज होना उसके बूते की बात नहीं है। ऐसे में भाजपा ने महाराष्ट्र में 15 साल से सत्ता में काबिज कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को सत्ता से बेदखल करने के लिए शिवसेना का दामन न छोड़ने का फैसला लिया है। हालांकि सीटों के बंटवारे की तकरार अभी जारी है, लेकिन अब भाजपा इस पर समझौता करने को तैयार दिखाई दे रही है। (पढ़ें - भाजपा - खुमारी अभी बाकी है !)
महाराष्ट्र का राजनीतिक इतिहास गवाह है कि महाराष्ट्र की सत्ता हासिल करने के लिए भाजपा ने अपने दम पर खूब कोशिश की लेकिन भाजपा खाली हाथ ही रही। 1995 में भाजपा ने शिवसेना के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। 1995 में 116 सीटों पर लड़ते हुए भाजपा ने 65 सीटों पर फतह हासिल की तो 169 सीटों पर लड़ने वाली शिवसेना ने 73 सीटों पर जीत दर्ज की। भाजपा की सरकार बनी और मनोहर जोशी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री। लेकिन 1999 के चुनाव में भाजपा और शिवसेना का जादू नहीं चला और 117 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली भाजपा सिर्फ 56 सीटें जीत पाई तो शिवसेना 161 सीटों में महज 69 सीटों पर फतह हासिल कर पाई।
1999 में 75 सीटें जीतने वाली कांग्रेस ने 58 सीटें जीतने वाली एनसीपी से गठबंधन कर महाराष्ट्र में सरकार बना ली। 2004 में भी भाजपा और शिवसेना मिलकर सत्ता हासिल नहीं कर पाए। 111 सीटों पर लड़ने वाली भाजपा की सीटों की संख्या 54 पर ही सीमित रही तो शिवसेना 163 सीटों में से 62 सीटें ही हासिल कर पाई। जबकि 69 सीटें जीतकर कांग्रेस ने 71 सीटें जीतने वाली एनसीपी के साथ मिलकर एक बार फिर से सरकार बनाई। 2009 में भाजपा-शिवसेना को उम्मीद थी कि वे कांग्रेस-एनसीपी का 10 साल पुराना शासन खत्म कर महाराष्ट्र की सत्ता में काबिज होंगे लेकिन भाजपा की सीटों की संख्या घटकर 46 ही रह गई, तो शिवसेना भी 44 सीटों पर आकर सिमट गई। 82 सीटें जितने वाली कांग्रेस ने 62 सीटों पर फतह हासिल करने वाली एनसीपी के साथ मिलकर तीसरी बार महाराष्ट्र में सरकार बनाई।
भाजपा और शिवसेना मिलकर चुनाव लड़े तो 1995 में महाराष्ट्र की सत्ता हासिल की और उसके बाद बहुमत के जादुई आंकड़े के करीब पहुंचे जरूर लेकिन सीटों की संख्या इतनी नहीं थी कि वे सरकार बना सके। जाहिर है दोनों अलग-अलग चुनाव लड़ते तो शायद ही 1995 में सरकार बना पाते या कहें कि सरकार बनाने के बारे में सोच भी सकते।
2014 के आम चुनाव में महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटों में भी भाजपा ने 23 तो शिवसेना ने 18 सीटों पर जीत हासिल की। दोनों ने मिलकर 48 में से 41 सीटें जीत ली तो जाहिर है विधानसभा चुनाव में भी जीत की उम्मीदें परवान चढ़ने लगी है। सीटों के बंटवारे के लिए इतना हंगामा यूं ही नहीं मचा है। जाहिर है, दोनों का मानना है कि जो ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ेगा, उसकी ही ज्यादा सीटें जीतने की संभावना है और उसका ही सीएम भी होगा, ऐसे में तकरार न हो, ये कैसे हो सकता है।
खैर, देर आए दुरुस्त आए, भाजपा और शिवसेना का गठबंधन न तोड़ने का फैसला दोनों की ही सेहत के लिए अच्छा ही रहेगा। इसका मतलब ये नहीं कि साथ मिलकर चुनाव लड़ने से भाजपा-शिवसेना गठबंधन महाराष्ट्र में सरकार बनाने में कामयाब हो जाएगी, क्योंकि बातें चाहे कोई कितनी ही कर ले लेकिन आखिरी फैसला तो महाराष्ट्र की ही जनता को करना है।


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गुरुवार, 18 सितंबर 2014

भाजपा - खुमारी अभी बाकी है !

      
सफलता पाना तो हर कोई चाहता है, लेकिन सफलता हजम हर किसी को नहीं होती। 16 मई को आम चुनाव के नतीजों के बाद भाजपा का भी कुछ ऐसा ही हाल है। उम्मीद से ज्यादा मिलने की खुशी शायद भाजपा भी नहीं पचा पा रही है। उम्मीदें आसमान छू रही हैं, उस पर जीत की खुमारी ऐसी चढ़ी है कि उतरने का नाम ही नहीं ले रही हैं। हरियाणा और महाराष्ट्र का चुनाव सामने है और अलग अलग राज्यों की 33 विधानसभा उपचुनाव में जनता का मिजाज नजर आ चुका है। लेकिन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की मानें तो हरियाणा और महाराष्ट्र की जीत, उपचुनाव के नतीजों का दर्द भुला देगी। लेकिन सवाल फिर वहीं खड़ा है कि कहीं ये अति आत्मविश्वास तो नहीं, क्योंकि उपचुनाव से पहले भी तो एकतरफा जीत के दावे किए जा रहे थे, जिसे जनता ने आईना दिखा दिया।
हरियाणा में चंद सीटों पर सिमट जाया करने वाली भाजपा को इस बार लगने लगा है कि वो अपने दम पर विजय पताका फहराएगी और हरियाणा में उसकी सरकार बनेगी। इसके लिए उसने अपनी सहयोगी हरियाणा जनहित कांग्रेस से तक किनारा कर लिया क्योंकि हजकां गठबंधन की पुरानी शर्तों के अनुसार चलने की बात कह रही थी, जबकि जीत की खुमारी में डूबी भाजपा अपने हिसाब से हजकां को कंट्रोल करना चाहती थी। नतीजा गठबंधन का बंधन टूट गया।
दूसरे चुनावी राज्य महाराष्ट्र में भी भाजपा इसी राह पर चलती दिखाई दे रही है। हो सकता है भाजपा और शिवसेना में सीटों के बंटवारे पर आपसी सहमति बन भी जाए लेकिन फिलहाल की स्थितियां और चुनाव की तारीख के ऐलान के बाद तक सीटों के बंटवारे को लेकर तकरार साफ कर रही है कि महाराष्ट्र में भी भाजपा को अपने दम पर जीत का भरोसा है और वह इसके लिए अपनी 25 साल पुरानी सहयोगी शिवसेना से भी किनारा करने से गुरेज नहीं करने वाली। दरअसल 2009 में 119 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली भाजपा इस बार 135 सीटों पर चुनाव लड़ने पर अड़ी है, लेकिन 2009 में 169 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली शिवसेना को ये मंजूर नहीं है। सवाल ये है कि ये स्थितियां निर्मित क्यों हुई..?
जाहिर है, 2014 के आम चुनाव में मोदी लहर पर सवार भाजपा की प्रचंड जीत इसका आधार बनी हैं, भाजपा का मानना है कि आम चुनाव में उसने महाराष्ट्र में 23 सीटें जीती जबकि शिवसेना 18 सीटों पर ही जीत दर्ज कर पाई, ऐसे में उसका प्रदर्शन महाराष्ट्र में शिवसेना से बेहतर रहा। ऐसे में उसका दावा कहीं से भी गलत नहीं है। लेकिन असल सवाल ये भी है कि क्या मोदी का ये करिश्मा हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव  में भी काम करेगा या फिर हाल ही में हुए अलग अलग राज्यों की 33 विधानसभा सीटों के उपचुनाव के नतीजों का अक्स इसमें भी नजर आएगा..?
हरियाणा में भाजपा-हजकां गठबंधन का बिखरना और महाराष्ट्र में भी भाजपा-शिवसेना के रास्ते अलग होने का संकेत तो कम से कम इसी ओर ईशारा कर रहा है कि भाजपा अति आत्मविश्वास से लबरेज है और उपचुनाव के नतीजों से भी शायद भाजपा सबक लेने को तैयार नहीं है। शाह को अभी भी भरोसा है कि महाराष्ट्र और हरियाणा में कांग्रेस को परास्त कर भाजपा भारी बहुमत से सरकार बनाएगी और कांग्रेस मुक्त भारत के रास्ते पर आगे बढ़ेगी।
अति आत्मविश्वास से लबरेज ये वही भाजपा है, जो आम चुनाव से पहले एक भी लोकसभा सीट जीतने की संभावना रखने वाले छोटे से छोटे दल के साथ प्री पोल गठबंधन करने का कोई मौका नहीं छोड़ रही थी, लेकिन आम चुनाव में जीत के बाद उसे अपने साथियों का साथ छोड़ने से भी गुरेज नहीं है।
सपने देखना अच्छी बात है और उन्हें पूरा करने की कोशिश करना और भी अच्छी बात, लेकिन भाजपा को ये नहीं भूलना चाहिए कि बातें चाहे वो कितनी ही कर लें, आखिरी फैसला तो जनता को ही करना है। वैसे भी 19 अक्टूबर अब ज्यादा दूर नहीं है।


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मंगलवार, 16 सितंबर 2014

खुशी जरूर मनाईये लेकिन…

वो अब कह रहे हैं कि ये चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़े गए थे और उन्हीं के आधार पर जनता ने वोट दिया और अपने नेता को चुना। जी हां मोदी और अमित शाह की भाजपा का उपचुनाव के नतीजों पर कुछ ऐसा ही कहना है। 33 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के जब नतीजे आए, जिनमें से 11 सीटें यूपी की भी थी तो 16 मई के चुनावी नतीजों पर इतराने वाले बीजेपी नेताओं की चेहरे सफेद पड़ चुके थे। अच्छे दिनों के वादों के साथ जिस मोदी लहर पर सवार होकर भाजपा केन्द की सत्ता में काबिज हुई थी, उसका असर फारिग होता दिखाई दिया।
यूपी में लोकसभा की 80 सीटों में से 71 सीटें जीतने वाली भाजपा उपचुनाव में अपनी सीटों को तक नहीं बचा पाई तो ऐसा ही कुछ हाल पीएम मोदी के गृहराज्य गुजरात में और आम चुनाव में मिशन 25 पूरा करने वाले राजस्थान में भी हुआ। उपचुनाव में भाजपा की जीत होती तो शायद भाजपा नेताओं के स्वर बदले हुए होते, वे मोदी सरकार के काम को फुल नंबर देते हुए इसे जनता का फैसला बताने में जरा सी भी देर नहीं करते लेकिन नतीजे मनमाफिक नहीं आए हैं तो भाजपा के स्वर भी बदले बदले से हैं।
16 मई से 16 सितंबर तक जनता का मिजाज इस तेजी से बदलेगी शायद ही किसी ने सोचा होगा लेकिन ये हुआ और इसका होना भाजपा के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है। वक्त है आत्ममंथन का, जीत की खुमारी से बाहर निकलने का, वर्ना जनता के मन को किसने पढ़ा है, हरियाणा और महाराष्ट्र में 15 अक्टूबर का चुनाव और 19 अक्टूबर के नतीजे भी ज्यादा दूर नहीं है। उसके बाद झारखंड और जम्मू-कश्मीर भी पीछे पीछे चल रहे हैं।
इस उपचुनाव के नतीजों ने भाजपा के चेहरे का रंग भले ही उड़ा दिया है, लेकिन कुछ चेहरों पर मुस्कान भी लौट आई है। शुरुआत करने के लिए यूपी से बेहतर जगह और क्या हो सकती है। तमाम मोर्चों पर विफल रहने के आरोपों से घिरे यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के चेहरे की मुस्कान को कैसे कोई भूल सकता है। अरसे बाद उपचुनाव के नतीजों ने अखिलेश को भी खिलखिलाने का मौका जो दे दिया।
ऐसा ही मुस्कान का इंतजार राजस्थान प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट को भी था, उनकी ये मुराद भी राजस्थान की 4 सीटों में से 3 सीट पर कांग्रेस की जीत के साथ पूरी हो गयी। हालांकि छोटी सी ही सही लेकिन खुशी भाजपा को भी मिली, पश्चिम बंगाल में आखिर बीजेपा का खाता खुल ही गया। भाजपाई इसकी खुशी भी मना रहे हैं, शायद भाजपा नेता भी बड़ी खुशी के चक्कर में छोटी खुशी को बेकार नहीं करना चाहते हैं। बढ़िया है, मनाईये खुशी...जरूर मनाईये, लेकिन ध्यान रखिए इस खुशी में इतना भी न डूब जाना कि 19 अक्टूबर को ये खुशी भी मयस्सर न हो सके।      


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