कुल पेज दृश्य

शनिवार, 27 सितंबर 2014

18 साल- देर आए दुरुस्त आए !

23 साल पहले 1991 में जब जयललिता तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनती हैं, तो ऐलान करती हैं कि वे बतौर मुख्यमंत्री सिर्फ एक रूपया वेतन लेंगी। अमूमन किसी राजनेता के मुंह से ऐसी बात कम ही सुनने को मिलती हैं, लेकिन जब जयललिता ने ये ऐलान किया तो, इस कदम की खूब तारीफ भी हुई थी। इससे जयललिता ने न सिर्फ खुद को ईमानदार राजनेता के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की बल्कि तमिलनाडु की जनता का दिल भी जीतने की कोशिश की। लेकिन किसने सोचा था कि एक रूपए महीने वेतन लेने वाली यही जयललिता 18 साल बाद आय से अधिक संपत्ति के मामले में दोषी करार दी जाएंगी।
1991 में मुख्यमंत्री बनने के बाद जयललिता ने तीन करोड़ की संपत्ति घोषित की थी, लेकिन उनके पांच साल के कार्यकाल में जयललिता के पास 66.65 करोड़ की संपत्ति हो गई। अब एक रूपए महीने के वेतन में 3 करोड़ से किसी की संपत्ति 66.65 करोड़ तो हो नहीं सकती। इसी आरोप में जयललिता के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई और 18 साल पहले दर्ज एफआईआर पर 27 सितंबर 2014 को बेंगलुरू की स्पेशल कोर्ट ने जयललिता को दोषी करार देते हुए 4 साल की सजा सुनाई और 100 करोड़ रूपए का जुर्माना भी लगाया। जयललिता के घर से छापे में छापे में 28 किलो सोना, 800 किलो चांदी, 10 हजार 500 साड़ियां, 91 घड़ियां और 750 जोड़ी जूते मिले थे। साथ ही उनके पास कई मकान, फार्म हाउस और चाय बागान होने की बात भी सामने आई थी।
अब जबकि जयललिता को सजा का ऐलान हो चुका है, तो तीसरी बार तमिलनाडु की सीएम बनी उनकी कुर्सी भी छिन चली गई है। जयललिता और उनके समर्थकों के लिए ये इसलिए दिल दहला देने वाला है, क्योंकि इसी जयललिता की एआईएडीएमके ने न सिर्फ 2011 में तमिलनाडु की 234 विधानसभा सीटों में से 150 सीटों पर जीत हासिल कर तमिलनाडु में सरकार बनाई बल्कि 2014 के आम चुनाव में तमिलनाडु की सभी 37 लोकसभा सीटों पर भी जीत हासिल की है।

आय से अधिक संपत्ति मामले में जेल की हवा खाने वाले जयललिता को खुद के किए की सजा मिलने से दिल को संतुष्टि जरूर मिली है, कि भ्रष्ट राजनेता का कद चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, न्यायपालिका के सामने उसका कोई बिसात नहीं है। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहते हुए जयललिता पर बेंगलुरू की स्पेशल कोर्ट का फैसला कम से कम न्यायपालिका पर आम आदमी के विश्वास को मजबूत करने का ही काम करता है। हालांकि एक टीस भी दिल में रह गई कि इस मामले को अंजाम तक पहुंचने में 18 साल का लंबा वक्त लग गया। इन 18 सालों में जयललिता दो बार तमिलनाडु की सीएम की कुर्सी पर विराजमान भी हुई। आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है, कि इस दौरान जयललिता ने सीएम की कुर्सी पर रहते क्या कुछ नहीं किया होगा। हो सकता है, न भी किया हो लेकिन इस पर यकीन कैसे किया जाए, क्योंकि पहली बार का अनुभव आंखे खोलने के लिए काफी है। बहरहाल इतना ही कहा जा सकता है कि 18 साल बाद ही सही, देर आए दुरुस्त आए। साथ ही ये उम्मीद भी करते हैं कि जनता की देश की अदालतों में लंबित केसों के निपटारे में तेजी आएगी और समय रहते दोषियों को उनके किए की सजा मिलेगी। 

deepaktiwari555@gmail.com

गुरुवार, 25 सितंबर 2014

महाराष्ट्र - दोस्त, दोस्त न रहा

दुश्मन का दुश्मन, दोस्त की कहावत को आपने सुनी ही होगी, महाराष्ट्र में 25 साल से भाजपा और शिवसेना तो 15 साल से कांग्रेस और एनसीपी गठबंधन इस कहावत को चरितार्थ कर भी रहे थे। लेकिन महाराष्ट्र के आगामी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा-शिवसेना और कांग्रेस-एनसीपी के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर चली आ रही तकरार एक ही दिन में एक ही घंटे के अंतराल में नतीजे तक पहुंच गई। नतीजा भी ऐसा कि 25 सालों से चली आ रही भाजपा-शिवसेना की राहें जुदा हो गईं तो 15 सालों का कांग्रेस और एनसीपी का साथ भी छूट गया। महाराष्ट्र की राजनीति में अच्छा खासा दखल रखने वाली चारों पार्टियों का अब कोई दोस्त नहीं है। सामने हैं तो सिर्फ चंद घंटे पहले साथ रहने वाले दोस्त से बने राजनीतिक दुश्मन, जिन्हें मात देकर ही वे महाराष्ट्र की सियासत का सरताज बन सकते हैं। आगामी विधानसभा चुनाव में महाराष्ट्र की सत्ता को अकेले दम पर हासिल करने का अति विश्वास शायद भाजपा, शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस चारों को ही है। शायद इसलिए ही चारों ने सियासी दोस्ती से बढ़कर सीटों को अहमियत दी और मनमाफिक सीट न मिलने पर एकला चलो की नीति अपनाने में जरा भी देर नहीं की।
चारों ही दलों को अपने सहयोगी से ज्यादा खुद पर भरोसा है, कि वे ज्यादा सीटों पर चुनाव जीत सकते हैं, शायद इसलिए ही वे ज्यादा से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ना चाहते थे। लेकिन सवाल ये उठता है कि जो महाराष्ट्र की राजनीति में अब तक नहीं हुआ क्या अब संभव हो पाएगा..?
क्या जो पार्टी, चाहे वो भाजपा हो, शिवसना हो, कांग्रेस हो या फिर एनसीपी अपने कोटे की सीटों में से भी आधिकतर सीटों पर जीत हासिल न कर पाई हों, वह सभी सीटों पर चुनाव लड़ते हुए अकेले दम पर सरकार बनाने की स्थिति में आ सकती हैं…? (पढ़ें- चरम पर तकरार लेकिन सपना महाराष्ट्र में सरकार !)
क्या जो जनता पहले गठबंधन के नाम पर सहयोगी पार्टी को वोट देने में पीछे नहीं हटती थी, वो एकला चलो की राह पर निकली इन पार्टी के उम्मीदवारों पर इतना भरोसा कर पाएंगी कि वे विधानसभा पहुंच जाएं..?
क्या गठबंधन के नाम पर एकजुट होने वाला वोटबैंक, एकला चलने पर सिर्फ एक ही तरफ झुकेगा, जैसे होता आया है या फिर नहीं..?
जीत के भरोसे पर याराना खत्म करना शायद आसान काम है, लेकिन उस भरोसे का भरोसा जनता को दिलाना और अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में आना इतना आसान काम नहीं है, लेकिन चारों ही प्रमुख दलों को लगता है कि वे जनता का भरोसा जीतने में कामयाब हो जाएंगे।
अकेले सभी 288 सीटों पर चुनाव लड़ते हुए भले ही ज्यादा सीटें जीतने की उम्मीदें पाल बैठे हैं, लेकिन चारों ही पार्टियां ये भूल रही हैं कि उऩ्होंने अपनी जीत की राह में एक और बीज को खुद ही बोया है, जो उनका महाराष्ट्र की सत्ता में काबिज होने के ख्वाब को चकनाचूर कर सकता है, जिसकी बहुत ज्यादा संभावना भी साफ दिखाई दे रही है।
बहरहाल महाराष्ट्र की राजनीति क्या करवट लेगी ये तो 19 अक्टूबर को महाराष्ट्र के चुनावी नतीजे आने के साथ ही साफ हो जाएगा लेकिन इस सब के आधार पर इतना अनुमान लगाना कठिन तो नहीं है, कि अगर महाराष्ट्र की जनता ने भावनाओं में बहकर अपने मताधिकार का प्रयोग किया तो उन्हें बहुत जल्द एक और चुनाव उनके स्वागत में तैयार बैठा मिलेगा, जिसके खर्च का बोझ भी जनता की ही जेब से निकलेगा। फिलहाल तो हम सभी दलों को शुभकामनाएं दे सकते हैं और महाराष्ट्र की जनता से ये उम्मीद कर सकते हैं कि वे बेहतर प्रत्याशियों को चुनेंगे और महाराष्ट्र में एक स्थिर सरकार के लिए वोट करेंगे।


deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 24 सितंबर 2014

मंगलयान- अभी तो ये शुरुआत है

दिन बुधवार का था और मन में अमंगल का डर था, लेकिन उससे भी ज्यादा बलवती थी, मंगल की उम्मीद। ये उम्मीद रंग भी लाई और बुधवार को सुबह आठ बजे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) का मार्स आर्बिटर मिशन यानि मंगलयान जैसे ही मंगल की कक्षा में दाखिल हुआ सब मंगल ही मंगल हो गया। अमंगल का डर पीछे छूट चुका था, और भारतीय वैज्ञानिकों की मेहनत ने भारत को दुनिया का सरताज बना दिया। पहले ही प्रयास में मंगल की कक्षा में मंगलयान का प्रवेश करने पर भारत विश्व बिरादरी के सामने क्यों न इतराता।
इतराए भी क्यों न, जिस मिशन को विश्व महाशक्ति अमेरीका और रूस जैसे देश तक अपने पहले प्रयास में नहीं साध पाए, उसे भारतीय वैज्ञानिकों ने साकार कर दिखाया। अमेरिका इस उपलब्धि को सात प्रयास में हासिल कर पाया तो एशिया के शक्तिशाली देश चीन और जापान के लिए इस उपलब्धि को हासिल करना अभी भी किसी सपने की तरह है। भारत की ये कामयाबी इसलिए भी अहम हो जाती है, क्योंकि मंगल के 51 मिशनों में से अब तक सिर्फ 21 ही कामयाब हो पाए हैं औऱ भारत से पहले इस कामयाबी को सिर्फ अमेरिका, रूस और यूरोप ही हासिल कर सके हैं। खास बात ये है कि भारत ने इस काम के लिए कुल 450 करोड़ रूपए खर्च किए जो कि अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के मंगलयान मावेन की लागत का करीब दसवां हिस्सा है।
भारत के वैज्ञानिकों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उनका कोई सानी नहीं है और वे चाहें तो असंभव को भी संभव कर सकते हैं। मार्स आर्बिट मिशन इसकी एक ताजा मिसाल है। भारतीय वैज्ञनिकों के इस कमाल के साथ ही 24 सितंबर 2014 की तारीख सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो चुकी है। पहले ही प्रयास में सफलता मिलने से न सिर्फ अंतरिक्ष में भारत का रूतबा बढ़ा है,  बल्कि इसने अंतरिक्ष में भारत की नई उम्मीदों को भी पंख लगाए हैं। जाहिर है, इस मिशन की सफलता से इसरो से भारतीयों की उम्मीदें और भी बढ़ गयी हैं। उम्मीद करते हैं कि पहले ही प्रयास में मंगलयान को मंगल की कक्षा में स्थापित करने में सफलता हासिल कर विश्व बिरादरी में अपना लोहा मनवाने वाले भारतीय वैज्ञानिक भविष्य में भी भारतवासियों को गर्व करने का मौका देंगे और सफलता की नई कहानियां लिखेंगे। मंगलयान मिशन के लिए इसरो की टीम को बधाई और भविष्य की चुनौतियों को पार करने के लिए ढ़ेरों शुभकामनाएं।

deepaktiwari555@gmail.com 

सोमवार, 22 सितंबर 2014

चरम पर तकरार लेकिन सपना महाराष्ट्र में सरकार !

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में भाजपा-शिवसेना और कांग्रेस-एनसीपी में सियासी गठजोड़ में सीटों के बंटवारे को लेकर रार थमने का नाम नहीं ले रही है। हैरत की बात है कि महाराष्ट्र में 288 विधानसभा सीटों के लिए मतदान 15 अक्टूबर को होना है और किस्मत का फैसला 19 अक्टूबर को होगा, लेकिन भाजपा-शिवसेना और सत्तधारी कांग्रेस-एनसीपी गंठबंधन के नेताओं की जिद और आचरण से तो ऐसा प्रतीत होता है, मानो जनादेश उनके पक्ष में आ चुका है। ये जीत का अति विश्वास है या फिर कुछ और ये तो भाजपा-शिवसेना और एनसीपी-कांग्रेस के नेता ही जानें, लेकिन सीटों के बंटवारे को लेकर किसी भी हद तक जाने को तैयार इन सियासी सूरमाओं को नहीं भूलना चाहिए कि महाराष्ट्र की जनता इस सियासी नौटंकी को बखूबी देख और समझ भी रही है। (जरूर पढ़ें - महाराष्ट्र - कायम रहेगा याराना !)
सीटों पर समझौता न होने की स्थिति में अकेले सभी 288 विधानसभा सीटों पर लड़ने और अपनी-अपनी जीत के प्रति आश्वस्त दिखाई दे रहे ये नेता दावा कर रहे हैं कि आगामी चुनाव में जीत का सेहरा उनके ही सिर बंधेगा लेकिन महाराष्ट्र का सियासी सफरनामा बताना है कि कौन कितने पानी में है। इस सब के लिए ज्यादा पीछे जाने की भी जरूरत नहीं है। सिर्फ 2009 के विधानसभा चुनाव के आंकड़ों पर नजर डालें तो समझ में आता है कि इनके दावों में कितना दम है।
2009 में साथ मिलकर चुनाव लड़ने पर भाजपा-शिवसेना गठबंधन में भाजपा ने 119 सीटों पर ताल ठोकी तो शिवसेना ने 160 सीटों पर अपने उम्मीदवार मैदान में उतारे। लेकिन भाजपा 119 में से महज 46 सीटों पर ही फतह हासिल कर पाई तो शिवसेना तो 160 सीटों में से सिर्फ 44 पर ही जीत दर्ज कर पाई। ये वो आईना है जो 2009 में जनता ने भाजपा और शिवसेना को दिखाया था। अब जरा नजर जीत की शेखी बघार रहे कांग्रेस और एनसीपी पर भी डाल लेते हैं। 2009 में कांग्रेस और एनसीपी ने मिलकर सरकार जरूर बनाई लेकिन चुनाव लड़ने वाली सीटों की संख्या की तुलना में जीतने वाली सीटों की संख्या का अंतर अच्छा खासा था। 170 सीटों पर लड़ते हुए कांग्रेस 82 सीटें जीत पाई तो 113 सीटों पर लड़ने वाली एनसीपी 62 सीटों पर। हालांकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि चुनाव लड़ने वाला कोई भी राजनीतिक दल सभी सीटों पर जीत दर्ज कर पाए लेकिन लड़ने और जीतने वाली सीटों में अंतर की संख्या जब ज्यादा हो तो समझ लेना चाहिए कि स्थितियां बहुत ज्यादा उनके पक्ष में नहीं रहीं। रहीं होती तो शायद ये अंतर अपेक्षाकृत कम होता। महज 10 से 15 सीटों के लिए ऐसे वक्त पर लड़ना, जब चुनाव की तारीखें सिर पर हों, तो इसे कहीं से समझदारी नहीं कहा जा सकता, फिर चाहे वो भाजपा-शिवसेना हों या फिर कांग्रेस-एनसीपी। 10-15 सीटों का झमेला छोड़ आपसी समझ से शायद ये अपने चुनावी कैंपेन पर ध्यान लगाते तो शायद जीतने वाली सीटों की संख्या बढ़ाने में कामयाब हो सकते थे, लेकिन चंद सीटों के लिए इस तरह लड़ना कहीं न कहीं अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मारने सरीखा है। जाहिर है मतभेद और मनभेद के बाद अलग – अलग चुनाव लड़ना न तो भाजपा-शिवसेना के लिए फायदेमंद हैं और न ही कांग्रेस – एनसीपी के लिए। वो भी ऐसे राज्य में जहां पर ये चारों ही राजनीतिक पार्टियां मतदाताओं के लिए नई नहीं हैं और अच्छी खासी पैठ भी रखती हैं। (जरूर पढ़ें - भाजपा - खुमारी अभी बाकी है !)
निश्चित तौर पर दोनों ही गठबंधनों का टूटना इन सियासी दलों के साथ ही महाराष्ट्र की जनता के लिए भी शुभ संकेत नहीं है। मतलब साफ है कि 288 सीटों वाली महाराष्ट्र विधानसभा में अलग – अलग लड़ने की स्थिति में पूर्ण बहुत पाना किसी भी दल के लिए लगभग नामुमकिन होगा। नतीजा त्रिशंकु विधानसभा होगी महाराष्ट्र की जनता को एक और चुनाव का सामना करना पड़ेगा, जिसका मतलब करोड़ों रूपए का बोझ किसी न किसी कर के रूप में जनता के सिर ही थोपा जाएगा।
दरअसल इस चुनाव में असल परीक्षा महाराष्ट्र की जनता की भी है कि वे किसी एक दल को चुनकर स्थाई सरकार का निर्माण करने की ओर कदम बढ़ाते हैं, या फिर अपने निजी हितों को साधने के लिए आपस में ही भिड़ने वाले इन सियासी दलों के नेताओं पर भरोसा करते हुए जाति और संप्रदाय के आधार पर वोट करते हुए महाराष्ट्र को एक और चुनाव की ओर धकेलती है। बहरहाल सीटों के बंटवारे को लेकर नूरा कुश्ती जारी है, देखना ये होगा कि ये नूरा कुश्ती कहां पर जाकर थमती है।


deepaktiwari555@gmail.com

शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

महाराष्ट्र - कायम रहेगा याराना !


हरियाणा की कहानी बीजेपी दोहराना तो महाराष्ट्र में भी चाहती थी, लेकिन शायद भाजपा नेताओं को समय रहते इस बात का भान हो गया कि महाराष्ट्र में शिवसेना से 25 साल पुराना याराना तोड़ कर अकेले दम पर कांग्रेस और एनसीपी के साथ ही शिवसेना का भी सामना करना, उसके महाराष्ट्र की सत्ता में काबिज होने के अरमानों पर पानी फेर सकता है। यही वजह है कि भाजपा ने साफ कर दिया है, कि वे शिवसेना के साथ अपनी 25 साल पुरानी दोस्ती में दरार आने के बावजूद उसे निभाएंगे और मिलकर आगामी विधानसभा चुनाव लड़ेंगे। भाजपा ये बात अच्छी तरह जानती है, कि शिवसेना से किनारा कर अकेले दम पर महाराष्ट्र की सत्ता में काबिज होना उसके बूते की बात नहीं है। ऐसे में भाजपा ने महाराष्ट्र में 15 साल से सत्ता में काबिज कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को सत्ता से बेदखल करने के लिए शिवसेना का दामन न छोड़ने का फैसला लिया है। हालांकि सीटों के बंटवारे की तकरार अभी जारी है, लेकिन अब भाजपा इस पर समझौता करने को तैयार दिखाई दे रही है। (पढ़ें - भाजपा - खुमारी अभी बाकी है !)
महाराष्ट्र का राजनीतिक इतिहास गवाह है कि महाराष्ट्र की सत्ता हासिल करने के लिए भाजपा ने अपने दम पर खूब कोशिश की लेकिन भाजपा खाली हाथ ही रही। 1995 में भाजपा ने शिवसेना के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। 1995 में 116 सीटों पर लड़ते हुए भाजपा ने 65 सीटों पर फतह हासिल की तो 169 सीटों पर लड़ने वाली शिवसेना ने 73 सीटों पर जीत दर्ज की। भाजपा की सरकार बनी और मनोहर जोशी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री। लेकिन 1999 के चुनाव में भाजपा और शिवसेना का जादू नहीं चला और 117 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली भाजपा सिर्फ 56 सीटें जीत पाई तो शिवसेना 161 सीटों में महज 69 सीटों पर फतह हासिल कर पाई।
1999 में 75 सीटें जीतने वाली कांग्रेस ने 58 सीटें जीतने वाली एनसीपी से गठबंधन कर महाराष्ट्र में सरकार बना ली। 2004 में भी भाजपा और शिवसेना मिलकर सत्ता हासिल नहीं कर पाए। 111 सीटों पर लड़ने वाली भाजपा की सीटों की संख्या 54 पर ही सीमित रही तो शिवसेना 163 सीटों में से 62 सीटें ही हासिल कर पाई। जबकि 69 सीटें जीतकर कांग्रेस ने 71 सीटें जीतने वाली एनसीपी के साथ मिलकर एक बार फिर से सरकार बनाई। 2009 में भाजपा-शिवसेना को उम्मीद थी कि वे कांग्रेस-एनसीपी का 10 साल पुराना शासन खत्म कर महाराष्ट्र की सत्ता में काबिज होंगे लेकिन भाजपा की सीटों की संख्या घटकर 46 ही रह गई, तो शिवसेना भी 44 सीटों पर आकर सिमट गई। 82 सीटें जितने वाली कांग्रेस ने 62 सीटों पर फतह हासिल करने वाली एनसीपी के साथ मिलकर तीसरी बार महाराष्ट्र में सरकार बनाई।
भाजपा और शिवसेना मिलकर चुनाव लड़े तो 1995 में महाराष्ट्र की सत्ता हासिल की और उसके बाद बहुमत के जादुई आंकड़े के करीब पहुंचे जरूर लेकिन सीटों की संख्या इतनी नहीं थी कि वे सरकार बना सके। जाहिर है दोनों अलग-अलग चुनाव लड़ते तो शायद ही 1995 में सरकार बना पाते या कहें कि सरकार बनाने के बारे में सोच भी सकते।
2014 के आम चुनाव में महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटों में भी भाजपा ने 23 तो शिवसेना ने 18 सीटों पर जीत हासिल की। दोनों ने मिलकर 48 में से 41 सीटें जीत ली तो जाहिर है विधानसभा चुनाव में भी जीत की उम्मीदें परवान चढ़ने लगी है। सीटों के बंटवारे के लिए इतना हंगामा यूं ही नहीं मचा है। जाहिर है, दोनों का मानना है कि जो ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ेगा, उसकी ही ज्यादा सीटें जीतने की संभावना है और उसका ही सीएम भी होगा, ऐसे में तकरार न हो, ये कैसे हो सकता है।
खैर, देर आए दुरुस्त आए, भाजपा और शिवसेना का गठबंधन न तोड़ने का फैसला दोनों की ही सेहत के लिए अच्छा ही रहेगा। इसका मतलब ये नहीं कि साथ मिलकर चुनाव लड़ने से भाजपा-शिवसेना गठबंधन महाराष्ट्र में सरकार बनाने में कामयाब हो जाएगी, क्योंकि बातें चाहे कोई कितनी ही कर ले लेकिन आखिरी फैसला तो महाराष्ट्र की ही जनता को करना है।


deepaktiwari555@gmail.com

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

भाजपा - खुमारी अभी बाकी है !

      
सफलता पाना तो हर कोई चाहता है, लेकिन सफलता हजम हर किसी को नहीं होती। 16 मई को आम चुनाव के नतीजों के बाद भाजपा का भी कुछ ऐसा ही हाल है। उम्मीद से ज्यादा मिलने की खुशी शायद भाजपा भी नहीं पचा पा रही है। उम्मीदें आसमान छू रही हैं, उस पर जीत की खुमारी ऐसी चढ़ी है कि उतरने का नाम ही नहीं ले रही हैं। हरियाणा और महाराष्ट्र का चुनाव सामने है और अलग अलग राज्यों की 33 विधानसभा उपचुनाव में जनता का मिजाज नजर आ चुका है। लेकिन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की मानें तो हरियाणा और महाराष्ट्र की जीत, उपचुनाव के नतीजों का दर्द भुला देगी। लेकिन सवाल फिर वहीं खड़ा है कि कहीं ये अति आत्मविश्वास तो नहीं, क्योंकि उपचुनाव से पहले भी तो एकतरफा जीत के दावे किए जा रहे थे, जिसे जनता ने आईना दिखा दिया।
हरियाणा में चंद सीटों पर सिमट जाया करने वाली भाजपा को इस बार लगने लगा है कि वो अपने दम पर विजय पताका फहराएगी और हरियाणा में उसकी सरकार बनेगी। इसके लिए उसने अपनी सहयोगी हरियाणा जनहित कांग्रेस से तक किनारा कर लिया क्योंकि हजकां गठबंधन की पुरानी शर्तों के अनुसार चलने की बात कह रही थी, जबकि जीत की खुमारी में डूबी भाजपा अपने हिसाब से हजकां को कंट्रोल करना चाहती थी। नतीजा गठबंधन का बंधन टूट गया।
दूसरे चुनावी राज्य महाराष्ट्र में भी भाजपा इसी राह पर चलती दिखाई दे रही है। हो सकता है भाजपा और शिवसेना में सीटों के बंटवारे पर आपसी सहमति बन भी जाए लेकिन फिलहाल की स्थितियां और चुनाव की तारीख के ऐलान के बाद तक सीटों के बंटवारे को लेकर तकरार साफ कर रही है कि महाराष्ट्र में भी भाजपा को अपने दम पर जीत का भरोसा है और वह इसके लिए अपनी 25 साल पुरानी सहयोगी शिवसेना से भी किनारा करने से गुरेज नहीं करने वाली। दरअसल 2009 में 119 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली भाजपा इस बार 135 सीटों पर चुनाव लड़ने पर अड़ी है, लेकिन 2009 में 169 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली शिवसेना को ये मंजूर नहीं है। सवाल ये है कि ये स्थितियां निर्मित क्यों हुई..?
जाहिर है, 2014 के आम चुनाव में मोदी लहर पर सवार भाजपा की प्रचंड जीत इसका आधार बनी हैं, भाजपा का मानना है कि आम चुनाव में उसने महाराष्ट्र में 23 सीटें जीती जबकि शिवसेना 18 सीटों पर ही जीत दर्ज कर पाई, ऐसे में उसका प्रदर्शन महाराष्ट्र में शिवसेना से बेहतर रहा। ऐसे में उसका दावा कहीं से भी गलत नहीं है। लेकिन असल सवाल ये भी है कि क्या मोदी का ये करिश्मा हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव  में भी काम करेगा या फिर हाल ही में हुए अलग अलग राज्यों की 33 विधानसभा सीटों के उपचुनाव के नतीजों का अक्स इसमें भी नजर आएगा..?
हरियाणा में भाजपा-हजकां गठबंधन का बिखरना और महाराष्ट्र में भी भाजपा-शिवसेना के रास्ते अलग होने का संकेत तो कम से कम इसी ओर ईशारा कर रहा है कि भाजपा अति आत्मविश्वास से लबरेज है और उपचुनाव के नतीजों से भी शायद भाजपा सबक लेने को तैयार नहीं है। शाह को अभी भी भरोसा है कि महाराष्ट्र और हरियाणा में कांग्रेस को परास्त कर भाजपा भारी बहुमत से सरकार बनाएगी और कांग्रेस मुक्त भारत के रास्ते पर आगे बढ़ेगी।
अति आत्मविश्वास से लबरेज ये वही भाजपा है, जो आम चुनाव से पहले एक भी लोकसभा सीट जीतने की संभावना रखने वाले छोटे से छोटे दल के साथ प्री पोल गठबंधन करने का कोई मौका नहीं छोड़ रही थी, लेकिन आम चुनाव में जीत के बाद उसे अपने साथियों का साथ छोड़ने से भी गुरेज नहीं है।
सपने देखना अच्छी बात है और उन्हें पूरा करने की कोशिश करना और भी अच्छी बात, लेकिन भाजपा को ये नहीं भूलना चाहिए कि बातें चाहे वो कितनी ही कर लें, आखिरी फैसला तो जनता को ही करना है। वैसे भी 19 अक्टूबर अब ज्यादा दूर नहीं है।


deepaktiwari555@gmail.com

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

खुशी जरूर मनाईये लेकिन…

वो अब कह रहे हैं कि ये चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़े गए थे और उन्हीं के आधार पर जनता ने वोट दिया और अपने नेता को चुना। जी हां मोदी और अमित शाह की भाजपा का उपचुनाव के नतीजों पर कुछ ऐसा ही कहना है। 33 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के जब नतीजे आए, जिनमें से 11 सीटें यूपी की भी थी तो 16 मई के चुनावी नतीजों पर इतराने वाले बीजेपी नेताओं की चेहरे सफेद पड़ चुके थे। अच्छे दिनों के वादों के साथ जिस मोदी लहर पर सवार होकर भाजपा केन्द की सत्ता में काबिज हुई थी, उसका असर फारिग होता दिखाई दिया।
यूपी में लोकसभा की 80 सीटों में से 71 सीटें जीतने वाली भाजपा उपचुनाव में अपनी सीटों को तक नहीं बचा पाई तो ऐसा ही कुछ हाल पीएम मोदी के गृहराज्य गुजरात में और आम चुनाव में मिशन 25 पूरा करने वाले राजस्थान में भी हुआ। उपचुनाव में भाजपा की जीत होती तो शायद भाजपा नेताओं के स्वर बदले हुए होते, वे मोदी सरकार के काम को फुल नंबर देते हुए इसे जनता का फैसला बताने में जरा सी भी देर नहीं करते लेकिन नतीजे मनमाफिक नहीं आए हैं तो भाजपा के स्वर भी बदले बदले से हैं।
16 मई से 16 सितंबर तक जनता का मिजाज इस तेजी से बदलेगी शायद ही किसी ने सोचा होगा लेकिन ये हुआ और इसका होना भाजपा के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है। वक्त है आत्ममंथन का, जीत की खुमारी से बाहर निकलने का, वर्ना जनता के मन को किसने पढ़ा है, हरियाणा और महाराष्ट्र में 15 अक्टूबर का चुनाव और 19 अक्टूबर के नतीजे भी ज्यादा दूर नहीं है। उसके बाद झारखंड और जम्मू-कश्मीर भी पीछे पीछे चल रहे हैं।
इस उपचुनाव के नतीजों ने भाजपा के चेहरे का रंग भले ही उड़ा दिया है, लेकिन कुछ चेहरों पर मुस्कान भी लौट आई है। शुरुआत करने के लिए यूपी से बेहतर जगह और क्या हो सकती है। तमाम मोर्चों पर विफल रहने के आरोपों से घिरे यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के चेहरे की मुस्कान को कैसे कोई भूल सकता है। अरसे बाद उपचुनाव के नतीजों ने अखिलेश को भी खिलखिलाने का मौका जो दे दिया।
ऐसा ही मुस्कान का इंतजार राजस्थान प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट को भी था, उनकी ये मुराद भी राजस्थान की 4 सीटों में से 3 सीट पर कांग्रेस की जीत के साथ पूरी हो गयी। हालांकि छोटी सी ही सही लेकिन खुशी भाजपा को भी मिली, पश्चिम बंगाल में आखिर बीजेपा का खाता खुल ही गया। भाजपाई इसकी खुशी भी मना रहे हैं, शायद भाजपा नेता भी बड़ी खुशी के चक्कर में छोटी खुशी को बेकार नहीं करना चाहते हैं। बढ़िया है, मनाईये खुशी...जरूर मनाईये, लेकिन ध्यान रखिए इस खुशी में इतना भी न डूब जाना कि 19 अक्टूबर को ये खुशी भी मयस्सर न हो सके।      


deepaktiwari555@gmail.com

शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

विधानसभा चुनाव- कौन होगा पास, कौन फेल ?

16 मई को जब आम चुनाव के नतीजे आए तो जिस मोदी मैजिक की चुनाव से पहले बात हो रही थी, वो चुनावी नतीजे के रूप में नजर आया। नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने तो लोगों की उम्मीदों को भी पंख लगे कि अब उनके अच्छे दिन आएंगे लेकिन एक के बाद एक महंगाई की डोज के तले लोगों की उम्मीदें दम तोड़ने लगी।
मोदी सरकार 100 दिन पूरे कर चुकी है, ऐसे में सरकार के कामकाज का हिसाब किताब मांगा जाने लगा है। मोदी सरकार अच्छे दिन के वादे पर अभी भी दमदारी से कायम रहते हुए वक्त मांग रही है, तो लोग असमंजस में है कि मोदी सरकार की बातों पर कितना विश्वास किया जाए। कुछ लोगों का भ्रम टूटने लगा है तो कुछ मानते हैं कि 100 दिन में हिसाब मांगना शायद जल्दबाजी होगी। लोगों का भ्रम कितना टूटा और कितने लोग सरकार को और समय देने के पक्ष में है, इसके लिए 15 अक्टूबर को होने वाले हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से बेहतर और क्या हो सकता है..?
हरियाणा और महाराष्ट्र के लिए चुनावी तारीख का ऐलान हो चुका है, ऐसे में चुनावी जंग में अपनी अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए राजनीतिक दलों ने भी कमर कस ली है। हरियाणा और महाराष्ट्र दोनों ही ऐसे राज्य हैं, जहां पर देश की दोनों बड़ी पार्टियों कांग्रेस और भाजपा के अलावा इनके सहयोगी भी खासा दम रखते हैं और सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं। महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ती रही है तो भाजपा-शिवसेना के साथ।  भाजपा और कांग्रेस दोनों के ही सहयोगी महाराष्ट्र में अच्छा दखल रखते हैं। वहीं हरियाणा में भाजपा और कांग्रेस के अलावा क्षेत्रीय दलों का बोलबाला दिखाई देता है। वैसे भी आगामी विधानसभा चुनाव में हरियाणा में राजनीतिक दलों की बाढ़ सी आई हुई है। जाहिर है दोनों ही राज्यों में चुनावी मुकाबला रोचक होनी की पूरी उम्मीद है।
हालांकि विधानसभा के चुनाव स्थानीय मुद्दे हावी रहेंगे लेकिन आम चुनाव में मोदी लहर के सहारे प्रचंड बहुमत से आने वाली मोदी सरकार के लिए दोनों ही राज्यों के विधानसभा चुनाव किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है, क्योंकि 19 अक्टूबर को आने वाले इस चुनाव के नतीजे काफी हद तक तय करेंगे कि मोदी सरकार 100 दिनों में चुनाव पूर्व किए अपने वादों पर कितना आगे बढ़ पाई है और अब भी मोदी लहर का कितना असर बाकी है..?
कसौटी पर कांग्रेस भी होगी, क्योंकि हरियाणा और महाराष्ट्र दोनों ही राज्यों में कांग्रेस की ही सरकार है। महाराष्ट्र में 15 सालों से कांग्रेस गठबंधन काबिज है तो हरियाणा में 10 सालों से। जाहिर है, आम चुनाव में करारी शिकस्त झेलने वाली कांग्रेस के लिए दोनों ही राज्यों में अपनी सत्ता बचाना आसान काम नहीं है। यकीनन, आम चुनाव में 44 सीटों पर सिमटने वाली कांग्रेस एक और हार के लिए तैयार नहीं होगी, लेकिन आम चुनाव में महाराष्ट्र और हरियाणा में कांग्रेस का घटा हुआ वोट प्रतिशत और तमाम ओपिनीयन पोल कांग्रेस की सांसे फुलाने के लिए काफी है।
महाराष्ट्र में जहां कांग्रेस सरकार के लिए भ्रष्टाचार के आरोपों पर जवाब देने के लिए कुछ नहीं है, तो हरियाणा में कांग्रेस का हाथ छोड़ने वाले दिग्गजों की फेरहिस्त खासी लंबी हो चुकी है। कुल मिलाकर फैसला जनता को करना है, लेकिन जनता के सामने भी बहुत ज्यादा विकल्प नहीं है, ऐसे में देखना ये होगा कि महाराष्ट्र और हरियाणा दोनों ही राज्यों में जनता आखिर किस पर भरोसा करती है, सत्ताधारी कांग्रेस पर या फिर मोदी के नाम पर दोनों ही राज्य में करिशमाई जीत के भरोसे बैठी भारतीय जनता पार्टी पर।

deepaktiwari555@gmail.com  

गुरुवार, 4 सितंबर 2014

डायरी खोलेगी राज !

सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा के निवास की विजिटर डायरी पर हंगामा तो ऐसा मचा है, जैसे रंजीत सिन्हा साहब ने कोई बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो। सिर्फ मुलाकात ही तो की है। डायरी में भी तो यही दर्ज है कि फलां-फलां साहब फलां-फलां तारीख को फलां-फलां बार सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा साहब से मिलने पहुंचे थे। इसमें कौन सी बड़ी बात हो गई। अब टूजी और कोल ब्लॉक आवंटन जैसे कई और जिन मामलों की जांच सीबीआई कर रही है, उनमें जांच के घेरे में आए लोग बचने के लिए किससे मिलेंगे..? जाहिर है सीबीआई डायरेक्टर से ही न..! और, वैसे भी टूजी और कोयला घोटाले कौन से बहुत बड़े घोटाले हैं। टूजी में सिर्फ एक लाख 76 हजार करोड़ की ही तो घोटाला हुआ जबकि कोयला घोटाला इससे जरा सा बड़ा एक लाख 86 हजार करोड़ का हुआ..!
अब इन छोट-मोटे घोटाले के आरोपी अगर हमारे सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा साहब से मिल भी लिए तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा। वैसे भी इस ख़बर के बाद से ही घबराए-घबराए से नजर आ रहे सिन्हा साहब साफ कर चुके हैं कि उन्होंने किसी को कोई फायदा नहीं पहुंचाया। लेकिन ये समझ नहीं आ रहा कि सिन्हा साहब इतने क्यों घबराए हुए हैं। एक तरफ वे कह रहे हैं कि उनके निवास पर मौजूद दो डायरी में इनमें से किसी भी आगंतुक का जिक्र नहीं है, लेकिन दूसरी तरफ वे इस डायरी को मीडिया में आने से रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगा रहे हैं। हालांकि ये बात अलग कि सर्वोच्च न्यायालय से भी उन्हें राहत नहीं मिली।
सिन्हा साहब जब आपके मुताबिक आपने कोई गुनाह नहीं किया है, किसी को फायदा नहीं पहुंचाया है तो फिर क्यों घबरा रहे हैं..? कहीं ये घबराहट इसलिए तो नहीं है कि इस डायरी की जितनी चर्चा होगी, उतने ही राज भी खुलेंगे..? अब डायरी के राज को आप और आपसे मिलने वालों से बेहतर और कौन समझ सकता है..? वैसे भी सीबीआई निदेशक बनने के बाद से ही आपकी कार्यप्रणाली पर सवाल कई बार उठे हैं।
कोलगेट की स्टेटस रिपोर्ट भी आप हंसी खुशी तत्कालीन कानून मंत्री अश्वनी कुमार के पास लेकर गए थे, जो आप सर्वोच्च न्यायालय में कबूल भी कर चुके हैं और आपके इस कृत्य की बदौलत न्यायालय ने सीबीआई को पिंजरे में बंद तोते की संज्ञा दी थी। आप इतने ही ईमादार होते तो सरकार के दबाव के बाद भी स्टेटस रिपोर्ट लेकर कानून मंत्री के पास जाने की बजाए इसका विरोध कर सकते थे। वैसे दोष आपका भी नहीं है, सीबीआई निदेशक की कुर्सी का मोह छोड़ना इतना आसान काम भी नहीं है। खैर अब मुलाकात करना कबूल ही लिया है तो अब छटपटाने से क्या फायदा..? हो सकता है, सिन्हा साहब ने किसी को फायदा न पहुंचाया हो लेकिन घर पर मुलाकात का फंडा समझ में नहीं आया। कोई बात नहीं सिन्हा साहब, आगे से ध्यान रखिएगा, वैसे आप ध्यान रखें न रखें, भविष्य में दूसरे लोग जरूर इसका ध्यान रखेंगे।


deepaktiwari555@mail.com

शनिवार, 30 अगस्त 2014

मांझी बिहार नहीं सिर्फ मखदमपुर के सीएम !

जीतन राम मांझी, ये बिहार के मुख्यमंत्री ही नहीं बल्कि बिहार में भाजपा के खिलाफ अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई के लिए पैदा हुए महागठबंधन के फिलहाल अघोषित तौर पर सबसे बड़े नेता हैं। आम चुनाव में करारी हार की जिम्मेदारी लेकर मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने वाले नीतिश कुमार के उत्तराधिकारी के रूप में सीएम की कुर्सी संभालने वाले मांझी को कौन समझाए कि वे सिर्फ जहानाबाद के मखदमपुर विधानसभा सीट के मुख्यमंत्री नहीं हैं, जहां से वे विधायक चुन कर आए हैं बल्कि वे पूरे प्रदेश के मुखिया हैं। बिहार का मुख्यमंत्री होने के नाते उनकी जिम्मेदारी है कि पूरे प्रदेश के विकास के लिए काम करें। पूरे प्रदेश के लोगों की समस्याओं का समाधान करें।
जाहिर है हर तरफ से निराश होने के बाद लोग मुख्यमंत्री से ही गुहार लगाते हैं, लेकिन लगता है कि मांझी को ये बात समझ में नहीं आती। ये इसलिए क्योंकि जहानाबाद के मखदमपुर के झमणबिगहा गांव के पास स्कूल में आयोजित सभा में बिजली कटौती के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों से वे कहते हैं कि आपके वोट से मैं चुनाव नहीं जीतता हूं और आप हमें वोट नहीं देते। दरअसल ये लोग सीएम मांझी को बिजली नहीं तो वोट नहीं कि तख्ती दिखाकर अपना विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, लेकिन सीएम साहब को उनका ये तरीका रास नहीं आया और मांझी अपना आपा खो बैठे।
मांझी साहब के ये तेवर अपनी समझ से तो बाहर हैं। मांझी साहब जनता तो आपसे ही सवाल पूछेगी न, अपनी समस्याएं लेकर आपके ही पास आएगी न, अब अपनी समस्याएं लेकर आपके राज्य की जनता पड़ोसी राज्य के मुख्यमंत्री से तो सवाल पूछेगी नहीं। ठीक है, आपको कुर्सी संभाले हुए सिर्फ तीन महीने ही हुए हैं, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आपकी जिम्मेदारी कम हो जाती है। वैसे इसमें दोष आपका भी नहीं है, जब आप खुद मंत्री रहते हुए अपने घर का बिजली का बिल घूस देकर कम कराने में यकीन रखते हैं तो फिर राज्य की जनता को आपसे ज्यादा उम्मीद होनी भी नहीं चाहिए।


deepaktiwari555@gmail.com 

मंगलवार, 19 अगस्त 2014

नंबर वन सीएम की हूटिंग !

नंबर वन हरियाणा, हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने तो कुछ ऐसी ही परिभाषा दी है, 5 साल के शासन के बाद हरियाणा को। ये बात अलग है कि हरियाणा के लोगों को ही शायद ये पता नहीं है कि उनका हरियाणा हुडडा के कार्यकाल में देश में नंबर वन राज्य हो गया है। लेकिन हुड्डा साहब लोगों को बताने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। हरियाणा में चुनाव की आहट के साथ ही अख़बार और टीवी पर हुड्डा सरकार के विज्ञापन को कम से कम यही बयां कर रहे हैं। जाहिर है इस पर करोड़ों रूपए पानी की तरह बहाया भी जा रहा है, लेकिन अगला चुनाव जीतना है तो हुड्डा साहब तो कुछ तो करना ही पड़ेगा। लेकिन हुड्डा साहब की ये दलील शायद हरियाणा वासियों को रास नहीं आ रही है।
रियाणा के कैथल में नशनल हाईवे प्रॉजेक्ट की आधारशिला रखने पहुंचे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ मंच पर मौजूद हरियाणा के मुख्यमंत्री हुड्डा की जब बोलने की बारी आई तो वहां मौजूद जनता ने हुड्डा की जमकर हूटिंग की। लोगों को हुड्डा को सुनना तक गवारा नहीं था और वे हुड्डा को हाथ हिलाकर बैठ जाने के ईशारे तक करने लगे। ये हुड्डा साहब के हरियाणा के ही लोग थे, जिस हरियाणा को हुड्डा साहब सरकारी विज्ञापनों के जरिए नंबर वन बनाने के दावे करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं, लेकिन हरियाणा को नंबर वन(जैसा की हुडडा दावा कर रहे हैं) बनाने वाले मुख्यमंत्री भूपेन्द्र हुड्डा तक को सुनने के लिए हरियाणा के ही लोग तैयार नहीं है।
सरेआम हूटिंग हो और मुख्यमंत्री हुड्डा को गुस्सा न आए, ऐसा कैसे हो सकता था। हुड्डा साहब को भी ये नागवार गुजरा और हुडडा साहब ने तो ये तक ऐलान कर दिया कि वे भविष्य में पीएम मोदी के साथ किसी रैली में नहीं जाएंगे। हुड्डा ने मोदी पर ये तक आरोप लगा डाला कि प्रधानमंत्री ने कार्यक्रम का राजनीतिकरण कर दिया।
कैथल में मोदी भ्रष्टाचार के खिलाफ जमकर बोले और भारत को भ्रष्टाचार की बीमारी से मुक्त कराने का वादा जनता से किया, साथ ही मोदी ने हरियाणा के समग्र विकास का वादा भी हरियाणा की जनता से किया। ऐसे में हुड्डा को इसमें राजनीतिकरण कहां से नजर आया, ये समझ से बाहर है, खैर सरेआम हूटिंग के बाद हुड्डा को कुछ तो बोलना ही था। वैसे भी हरियाणा में चुनावी सीजन अपने पूरे परवान पर है, ऐसे में हुड्डा क्यों न मोदी के खिलाफ कुछ न बोलते, यही सही।
बहरहाल कार्यक्रम के राजनीतिकरण का तो पता नहीं लेकिन आगामी चुनाव जीतने का मिशन लेकर चल रहे हुड्डा ने जनता के पैसे का विज्ञापनीकरण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रूपए सरकारी विज्ञापनों में उड़ा कर मुख्यमंत्री अपना व कांग्रेस सरकार का महिमामंडन करने में जी जान से जुटे हुए हैं।
खैर जो भी हो, लेकिन ये बात समझ में नहीं आती कि अगर सरकारें काम करती हैं, तो फिर ये सब जनता को बताने के लिए उसे करोड़ों रूपए विज्ञापनों में खर्च करने की जरूरत क्यों पड़ती हैं ? अच्छा होता कि ये करोड़ों रूपए भी विकास कार्यों में खर्च किया जाता।


deepakttiwari555@gmail.com

सोमवार, 18 अगस्त 2014

जय हो धोनी एंड कंपनी की !

भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी खुश तो बहुत होंगे, ओवल टेस्ट महज ढ़ाई दिन में जो खत्म हो गया। मैनचेस्टर में चौथे टेस्ट मैच में तीसरे ही दिन पारी और 54 रनों से करारी हार के बाद धोनी की खुशी देखने लायक थी। आखिर ओवल में पांचवे और अंतिम टेस्ट मैच से पहले भारतीय टीम को आराम के लिए दो दिन का अतिरिक्त समय जो मिल गया था। टीम ने इस समय का सदुपयोग करने का फायदा भी ओवल में पांचवे टेस्ट मैच में साफ नजर आया और भारत ने अपने शानदार प्रदर्शन से इस मैच को ढ़ाई दिन से ज्यादा नहीं चलने दिया।
खास बात तो ये रही कि भारतीय खिलाड़ियों ने इस मैच में अपना प्रदर्शन सुधारते हुए हार का अंतर पारी और 54 रनों से बढ़ाकर पारी और 244 रन कर दिया। इतना ही नहीं भारतीय टीम ने अपने प्रदर्शन के दम पर एक और रिकार्ड अपने नाम कर लिया। रिकार्ड 40 सालों में इंग्लैंड के हाथों सबसे बड़ी और शर्मनाक हार का। 1974 में अजीत वाडेकर की कप्तानी में इंग्लैंड के हाथों पारी और 285 रनों से हारने के बाद इस नए रिकार्ड को बनाने के लिए भारतीय खिलाड़ी इतने उतावले दिखाई दे रहे थे कि पूरी टीम महज 143 मिनट में ही ढ़ेर हो गई। जिस पिच पर अंग्रेजों ने पहली पारी में 486 रन ठोक डाले, उस पिच पर भारतीय टीम पहली पारी में 148 रनों पर ढ़ेर हो गई तो दूसरी पारी में सिर्फ 98 रन ही बना सके।
सिर्फ सीरीज के पहले और दूसरे टेस्ट मैच को छोड़ दिया जाए तो तीसरे, चौथे और पांचवे टेस्ट मैच में भारतीय खिलाड़ी अंग्रेजों के सामने घुटने टेकटे नजर आए। पहला टेस्ट मैच ड्रा कराने के बाद जब भारतीय टीम ने लार्डस में दूसरा टेस्ट मैच 95 रनों से जीता तो लगने लगा था कि शायद भारत सीरीज अपने नाम कर अंग्रेजों से पिछली दो सीरीज में मिली हार का बदला ले लेगा लेकिन लार्डस में जीत की खुमारी भारत पर भारी पड़ गयी और एक के बाद एक इंग्लैंड ने आखिरी के तीनों टेस्ट मैचों में भारत को करारी हार का स्वाद चखा कर सीरीज 3-1 से जीतकर भारत के सीरीज जीतने के सपने को चूर चूर कर दिया।
सीरीज में 1-0 की बढ़त लेने के बाद 3-1 से सीरीज को गंवा देना ये बताने के लिए काफी है कि लार्डस में मिली 28 साल बाद ऐतिहासिक जीत के बाद भारतीय खिलाड़ियों अति आत्मविश्वास से लबरेज थे, और यही अति आत्मविश्वास भारतीय टीम को ले डूबा। जबकि दूसरे टेस्ट मैच में लार्डस में हार झेलने के बाद कड़ी आलोचना झेलने वाले इंग्लैड के कप्तान एलिस्टर कुक ने न सिर्फ अगले मैच में निराशा से उबरते हुए टीम को शानदार जीत दिलाई बल्कि सीरीज में पिछड़ने के बाद भी सीरीज 3-1 से जीत ली।
सीरीज में इस परिणाम के बाद कहने में कोई हर्ज नहीं कि अंग्रेजों ने शानदार खेल का प्रदर्शन किया जबकि भारतीय खिलाड़ियों ने भारत को शर्मशार करने का कोई मौका नहीं छोड़ा। अपने हर अगले मैच में भारतीय खिलाड़ी हार के नए रिकार्ड बनाने के लिए उतावले दिखाई दे रहे थे।
बहरहाल देखना रोचक होगा कि भारतीय टीम इस करारी हार से कोई सबक लेकर 25 अगस्त से शुरु हो रही पांच वन डे मैचों की सीरीज और एक टी 20 मैच जीतकर अंग्रेजों से बदला ले पाएगी या फिर भारतीय क्रिकेट टीम का ये शर्मनाक प्रदर्शन जारी रहेगा। उम्मीद पर दुनिया कायम है, फिर ये तो क्रिकेट है, ये तो खेल ही अनिश्चितताओं का है।   


deepaktiwari555@gmail.com   

बुधवार, 13 अगस्त 2014

मुलायम पर कठोर हुई माया !

सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह तैयार हैं, बस लालू प्रसाद यादव बसपा सुप्रीमो मायावती का हाथ पकड़कर उनके पास ले आएं। बिहार में भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ जदयू से हाथ मिलाने के बाद राजद प्रमुख लालू ने माया- मुलायम से आह्वान किया था कि भाजपा को रोकने के लिए यूपी में वे भी हाथ मिला लें। मुलायम ने साथ आने के संकेत भी दिए लेकिन मायावती ने मुलायम को ठेंगा दिखा दिया।
मायावती ने मुलायम और लालू दोनों को खरी खोटी सुनाते हुए चुनाव में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी क्या किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन की संभावनाओं को खारिज कर दिया। (पढ़ें - बिहार सियासी दोस्ती के मायने ?)
आम चुनाव में यूपी में भाजपा ने सबसे बड़ी जीत हासिल करते हुए 42.3 फीसदी वोट पाए थे और प्रदेश की 80 में से 71 सीटों पर विजय हासिल की थी। यूपी में भाजपा को कड़ी चुनौती देने की बात करने वाली कांग्रेस सिर्फ 7.5 फीसदी वोट के साथ रायबरेली और अमेठी दो ही सीटें जीत पाई थी। वहीं सत्ताधारी समाजवादी पार्टी महज 22.2 फीसदी वोट के साथ 5 सीटें जीतने में ही सफल हो पाई तो बसपा 19.6 फीसदी वोट हासिल करने के बाद भी एक भी सीट जीतने में असफल रही थी।
प्रदेश में सत्तारूढ़ होने के बाद भी 5 सीटें जीतने वाली मुलायम की समाजवादी पार्टी को शायद ये एहसास हो गया है कि 2012 के विधानसभा चुनाव में 224 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत से सत्ता में आने के बाद आम चुनाव में करारी हार का ये सिलसिला उसे 2017 में होने वाले विधानसभा चुनावों में भी जारी रह सकता है और शायद इसलिए ही मुलायम बिहार में जदयू से हाथ मिलाने वाले लालू प्रसाद यादव की सलाह पर गंभीरता से विचार करते हुए दिखाई दिए और कह डाला कि लालू अगर माया को ले आएं तो वे यूपी में सपा मायावती के साथ हाथ मिलाने को तैयार हैं।
आम चुनाव में यूपी में आधी से अधिक सीटें जीतने का दावा कर तीसरे मोर्चे के सहारे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने का ख्वाब देखने वाले मुलायम का ख्वाब मोदी की आंधी में उड़ गया, ऐसे में अब मुलायम को शायद ये डर भी सता रहा है कि कहीं भविष्य में यूपी भी उनके हाथ से न निकल जाए।
वहीं यूपी में साथ आने की लालू की सलाह पर मुलायम के संकेतों पर आंखे तरेरने वाली मायावती ने साफ कर दिया है कि वो 2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव अपने दम पर लड़ेगी और सपा क्या किसी भी दल के साथ गंठबंधन नहीं करेगी। मायावती ने ये भी दावा किया कि 2017 में बसपा एक बार फिर से पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आएगी। मायावती के इस भरोसे के पीछे मायावती का क्या गणित है, ये तो मायावती ही बेहतर समझा सकती हैं।
लेकिन आम चुनाव में खाता खोलने में असफल रही बसपा की उम्मीद पार्टी को मिले 19.6 प्रतिशत वोटों से ज्यादा लगती है। मायावती को शायद लगता है कि आम चुनाव में सीट भले ही बसपा को एक भी नहीं मिली लेकिन पार्टी 19.6 प्रतिशत वोटों के साथ भाजपा और सपा के बाद तीसरे नंबर पर रही, ऐसे में विधानसभा चुनाव में उसका ये वोट प्रतिशत उसकी सीटों की संख्या में बदल सकता है। वैसे भी 2007 में किसने सोचा था कि बसपा 207 सीटें जीतकर बहुमत के साथ सत्ता में आएगी, शायद मायावती को एक बार फिर से 2007 की तरह बसपा की जीत का भरोसा है।        
बहरहाल माया के इंकार के बाद मुलायम के साथ ही लालू और नीतिश कुमार को भी झटका तोजरूर लगा होगा, जो भाजपा को रोकने के लिए फिलहाल किसी भी हद तक जाने को तैयार दिखाई दे रहे हैं, ऐसे में देखना रोचक होगा कि भविष्य में विभिन्न राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव और उपचुनाव में जनता भाजपा के खिलाफ इन दलों की गोलबंदी को किस तरह लेती है। सवाल ये भी कि क्या आगामी चुनावों में भी दिखेगा मोदी लहर का असर या फिर मोदी सरकार के दो महीने के काम के आधार पर जनता करेगी कोई फैसला ?


deepaktiwari555@gmail.com

मंगलवार, 12 अगस्त 2014

बिहार – सियासी दोस्ती के मायने ?

बिहार विधानसभा चुनाव में भले ही अभी एक साल से अधिक का वक्त बचा हो लेकिन बिहार में सत्ता की मलाई खाने के लिए जोर आजमाईश अभी से शुरू हो चुकी है। 2014 के आम चुनाव में करारी शिकस्त खाने वाली सत्ताधारी जदयू के साथ ही राजद और कांग्रेस नेताओं के सिर से मोदी लहर का भूत उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है। शायद यही वजह है कि मोदी लहर को चुनौती देने के लिए अब राजद, जदयू और कांग्रेस आगामी 21 अगस्त को 10 विधानसभा सीटों के होने वाले उपचुनाव से पहले साथ साथ आ गए हैं। कभी एक दूसरे के साथी रहे और फिर धुर विरोधी बने राजद के लालू प्रसाद यादव व जदयू के नीतिश कुमार अब गले में हाथ डाले दिखाई दे रहे हैं।
1993 में अलग अलग रास्ते जाने वाले लालू और नीतिश की राहें अब एक हो चली हैं। चुनावी मंच में दोनों एक दूसरे के गले में हाथ डालकर जनता को बताने की कोशिश कर रहे हैं कि उनकी जुगलबंदी सियासी फायदे के लिए नहीं है बल्कि वे भाजपा से देश को बचाना चाहते हैं और इसके लिए साथ आने के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है।
आम चुनाव में करारी शिकस्त झेलने के बाद लालू की राजद, नीतिश की जदयू और कांग्रेस के सामने बिहार मे अपना अस्तित्व बचाने का संकट खड़ा हो गया है। आम चुनाव में बिहार की 40 सीटों में से राजद जहां सिर्फ 4 सीटें जीत पायी थी, वहीं राज्य में सत्ताधारी जदयू सिर्फ 2 सीटों पर ही जीत हासिल कर पायी थी जब्कि कांग्रेस की सीटों की संख्या भी सिर्फ 2 पर आकर सिमट गयी। वहीं भाजपा गठबंधन ने 31 सीटों पर जीत हासिल की, जिसमें से भाजपा के खाते में 22 सीटें आई।  
लालू और नीतिश कह रहे हैं कि देश को बचाने के लिए वे साथ साथ आए हैं, लेकिन दोनों की बातों पर यकीन तो नहीं होता। दोनों का साथ आना, मिलकर चुनाव लड़ना अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाए रखने की कवायद नहीं है तो और क्या है ?
हाजीपुर की चुनावी रैली में तो दोनों गले मिलते दिखाई दिए लेकिन कौन जाने इनके मन में क्या है ?
लालू के राज को जंगलराज बताने वाली जदयू और नीतिश पर बिहार को बर्बाद करने का आरोप लगाने वाले लालू आज जब ऐसे वक्त पर गले मिल रहे हैं, जब दोनों की ही पार्टियों को आम चुनाव में जनता ने सिरे से नकार दिया तो कैसे कोई यकीन कर सकता है कि दोनों सिर्फ अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए ही साथ नहीं आए हैं  ?
सियासत में अपने फायदे के लिए दुश्मनों से हाथ मिलाने का राजनेताओं का पुराना शगल है। ऐसे में क्यों लालू औऱ नीतिश की बात पर यकीन किया जाए कि जो वह कह रहे हैं वही उनके मन में भी है ! (पढ़ें - बिहार दुश्मन का दुश्मन दोस्त !)
बिहार के मुख्यमंत्री मांझी के विधानसभा चुनाव में गठबंधन की जीत पर नीतिश को सीएम बनाए जाने की बात पर लालू का लाल चेहरा कैसे लाल हुआ था, ये तो आपको याद ही होगा !
आज लालू प्रसाद पूर्व मुख्यमंत्री नीतिश को अपना छोटा भाई बताते नहीं थक रहे हैं लेकिन तकरीबन 20 सालों तक यही छोटा भाई लालू का सबसे बड़ा सियासी दुश्मन हुआ करता था !
आज लालू देश बचाने की बात कर रहे हैं, लेकिन यह वही लालू हैं जो भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे हैं और चारा घोटाले के एक मामले में सीबाई की स्पेशल कोर्ट ने उन्हें पांच साल की सजा सुनाई है। फिलहाल लालू सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बाद जेल से बाहर हैं।  
कुल मिलाकर देखा जाए तो बिहार में लालू और नीतिश की जुगलबंदी तो इसी ओर ईशारा कर रही है कि दोनों कांग्रेस के साथ मिलकर अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं और दोनों की नजरें एक बार फिर से अगले साल बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव पर हैं। फिलहाल तो इनके सामने 21 अगस्त को 10 विधानसभा सीटों के लिए होने वाले उपचुनाव की चुनौती है, देखते हैं इनकी सियासी दोस्ती का जवाब जनता किस तरह देती है ?


deepaktiwari5555@gmail.com

सोमवार, 11 अगस्त 2014

भारत रत्न पर सियासत क्यों ?

भारत रत्न, भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, हर भारतीय इस सम्मान को पाना चाहेगा। लेकिन क्या हर भारतीय इसका हकदार है। जाहिर है नहीं, लेकिन भारत रत्न पर बीते कुछ सालों से हो रही सियासत के बीच अब ये सवाल उठने लगा है कि आखिर कौन वास्तव में इस सम्मान का हकदार है..?
क्या केन्द्र की सत्ता में काबिज होने वाली सरकारें अपने दल से जुड़े लोगों को या फिर अपने सियासी फायदे के लिए इस सर्वोच्च भारतीय नागरिक सम्मान का मखौल तो नहीं उड़ा रही..?
क्यों केन्द्र सरकारें इस सम्मान को रेवड़ियों की तरह बांटकर इस सम्मान का मजाक बना रही हैं..?
हैरानी तो उस वक्त होती है, जैसा कि अमूमन देखा गया है कि इस सम्मान के लिए अधिकतर लोगों को मरणोपरांत चुना गया। केन्द्र में सरकार चाहे किसी की भी रही हो क्यों सरकारों को उस शख्सियत की देश के लिए दिए गए योगदान की कीमत उनकी मौत के बाद आती है। जीते जी उन्हें कोई नहीं पूछता लेकिन प्राण निकल जाने के बाद उन्हें सम्मान देने की होड़ सी लग जाती है।
1954 में इस सम्मान की स्थापना के बाद से अब तक 11 लोगों को मरणोपरांत भारत रत्न के लायक समझा गया। लाल बहादुर शास्त्री, के कामराज, आचार्य विनोबा भावे, मरूदुरु गोपाला रामचंद्रन, डॉ. भीमराव अंबेडकर, राजीव गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, अरुणा आसफ अली, जयप्रकाश नारायण जैसी हस्तियों का देश के प्रति योगदान इनके जीवित रहते हुए तत्कालीन सरकारों की समझ से बाहर रहा लेकिन इनकी मौत के बाद सरकार ने इन्हें भारत रत्न के लायक समझा।
खास बात ये है कि इस सम्मान की स्थापना के वक्त इसमें मरणोपरांत किसी को इस सम्मान से नवाजने का प्रावधान नहीं था लेकिन 1955 में इस प्रावधान को भी इसमें जोड़ दिया गया। जिसके बाद से अब तक 11 लोगों को मरणोपरांत भारत रत्न प्रदान किया चुका है।
ख़बरों के मुताबिक अब एक बार फिर से भारत रत्न के लिए सरकारी कवायद शुरु हो गई है तो इस पर सियासत गर्माने लगी है। चर्चा में चल रहे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, हॉकी के जादूगर ध्यानचंद, दलित नेता काशीराम और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नाम बाहर आने के बाद अब कांग्रेस को लगता है कि इसमें और नामों को जोड़ा जाना चाहिए। हालांकि ये अलग बात है कि खुद सत्ता में रहते हुए कांग्रेस को इन महापुरुषों को भारत रत्न से नवाजने का कभी ख्याल नहीं आया। (पढ़ें - सचिन भारत रत्न तो ध्यानचंद और अटल क्यों नहीं..?)
मुद्दा ये नहीं है कि यूपीए सरकार में किसे इस सम्मान से नवाजा गया और एनडीए सरकार में किसे..?
मुद्दा ये है कि क्या भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान पर हो रही सियासत कितनी जायज है..?
ये एक ऐसा सम्मान है जिसे हर भारतीय पाना चाहेगा लेकिन जो लोग इस सम्मान के हकदार हैं, क्या उन्हें नजरअंदाज तो नहीं किया जा रहा और उनकी मौत के बाद उनको सम्मानित किया जा रहा है..?
सवाल ये भी है कि क्यों कुछ लोगों ने देश का प्रधानमंत्री रहते हुए खुद को तो इस सम्मान के लायक समझ लिया लेकिन कई वास्तविक हकदारों को जीते जी इस सम्मान के लायक नहीं समझा गया और मरणोपरांत उनका योगदान नजर आया।  जाहिर है बात जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी की ही हो रही है।
फरवरी 2014 में जब क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को इस सम्मान से नवाजा गया तो इसके पीछे की सियासत को आसानी से समझा जा सकता था। सियासत हर पार्टी कर रही है, भाजपा अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न दिए जाने की बात कहती रह गई लेकिन यूपीए सरकार ने नहीं दिया, अब मोदी सरकार इस दिशा में कदम बढ़ाती दिख रही है, तो दूसरे नामों को उछालकर कांग्रेस इस पर सियासत कर रही है।
बात भाजपा, कांग्रेस की या फिर अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न दिया जाए या न दिया जाए की नहीं है बल्कि इस पर हो रही सियासत की है और इस सियासत में हर कोई शामिल है। अच्छा होगा कि भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान पर कम से कम राजनीति न हो और कम से कम इस सम्मान का मान बना रहे।


deepaktiwari555@gmail.com

रविवार, 10 अगस्त 2014

बेनीवाल पर बवाल से हैरानी क्यों ?

गुजरात से मिजोरम तबादला और फिर अपमानजनक बर्खास्तगी, कभी नरेन्द्र दामोदर दास मोदी की नींद उड़ाने वाली कमला बेनीवाल ने ये सोचा भी नहीं होगा कि ताउम्र शान से राजनीति करने के बाद उम्र के इस पड़ाव में उन्हें अपमान का घूंट पीना पड़ेगा। बेनीवाल के साथ ही तमाम कांग्रेसी इसे भले ही बदले की राजनीति करार देते नहीं अघा रहे हों, लेकिन मोदी सरकार के इस फैसले से हैरानी जरा भी नहीं होती। जो काम 2004 में केन्द्र की सत्ता में आने पर कांग्रेसनीत यूपीए सरकार ने किया था, उसी नक्शेकदम पर अब मोदी सरकार भी चल रही है।
कांग्रेस के सवाल उठाने पर सरकार इसे नियमों के तहत लिया गया सही फैसला ठहराते हुए तमाम तर्क पेश कर रही हो लेकिन इस फैसले के पहले मोदी सरकार की क्या नीयत थी, इसे आसानी से समझा जा सकता है। गुजरात में तत्कालीन मोदी सरकार के फैसलों को रेड लाईन खींचने वाली कमला बेनीवाल ने शायद ही उस वक्त ये सोचा होगा कि जिस गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी के फैसलों को रेड लाईट दिखाकर वे कांग्रेस आलाकमान की आंखों का तारा बनने के साथ ही कांग्रेस को गुजरात की मोदी सरकार पर सवाल उठाने के मौके भी कांग्रेस को दे रही हैं, वही मोदी भविष्य में उन्हें उनके राजनीतिक जीवन के अब तक के सबसे कड़वे दिन दिखाने वाले हैं।
बेनीवाल क्या, शायद ही किसी वे ये कल्पना की होगी कि मोदी के नेतृत्व में भाजपा 2014 के आम चुनाव नें प्रचंड बहुमत से सत्ता में आएगी। लेकिन ऐसा हुआ और कमला बेनीवाल मोदी सरकार के रडार में ऐसी आईं कि उन्हें बुरी तरह अपमानित होकर राजभवन के ठाट त्याग कर घर लौटना पड़ा। जहां पर उनके किए कुछ कारनामों के लिए उन्हें और भी मुश्किल भरे दिनों से गुजरना पड़ सकता है।
शायद यही राजनीति है, कब, किसकी किस्तम का सितारा चमकने लगे, कोई नहीं जानता, न ही पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ये सोचा था कि कभी वे भारत के प्रधानमंत्री बनेंगे और न ही नरेन्द्र मोदी ने इस जीत ती उम्मीद भी कभी की होगी, जो उन्हें 2014 के आम चुनाव में मिली। ये तो सिर्फ दो ही ताजा उदाहरण हैं। राजनीति का इतिहास ऐसे तमाम उदाहरणों से भरा पड़ा है, जब सत्ता ने खुद कई लोगों के कदम चूमे तो कई लोग सत्ता के करीब पहुंचकर भी हाथ मलते रह गए। अब बेनिवाल के साथ ये हो रहा है तो अचरज की कोई बात नहीं है, आज मोदी सरकार यूपीए के वक्त नियुक्त राज्यपालों को रडार पर ले रही है, भविष्य में कभी एनडीए सरकार में नियुक्त राज्यपालों को हो सकता है फिर से ऐसे ही दिन देखने पड़े।


deepaktiwari555@gmail.com