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गुरुवार, 18 सितंबर 2014

भाजपा - खुमारी अभी बाकी है !

      
सफलता पाना तो हर कोई चाहता है, लेकिन सफलता हजम हर किसी को नहीं होती। 16 मई को आम चुनाव के नतीजों के बाद भाजपा का भी कुछ ऐसा ही हाल है। उम्मीद से ज्यादा मिलने की खुशी शायद भाजपा भी नहीं पचा पा रही है। उम्मीदें आसमान छू रही हैं, उस पर जीत की खुमारी ऐसी चढ़ी है कि उतरने का नाम ही नहीं ले रही हैं। हरियाणा और महाराष्ट्र का चुनाव सामने है और अलग अलग राज्यों की 33 विधानसभा उपचुनाव में जनता का मिजाज नजर आ चुका है। लेकिन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की मानें तो हरियाणा और महाराष्ट्र की जीत, उपचुनाव के नतीजों का दर्द भुला देगी। लेकिन सवाल फिर वहीं खड़ा है कि कहीं ये अति आत्मविश्वास तो नहीं, क्योंकि उपचुनाव से पहले भी तो एकतरफा जीत के दावे किए जा रहे थे, जिसे जनता ने आईना दिखा दिया।
हरियाणा में चंद सीटों पर सिमट जाया करने वाली भाजपा को इस बार लगने लगा है कि वो अपने दम पर विजय पताका फहराएगी और हरियाणा में उसकी सरकार बनेगी। इसके लिए उसने अपनी सहयोगी हरियाणा जनहित कांग्रेस से तक किनारा कर लिया क्योंकि हजकां गठबंधन की पुरानी शर्तों के अनुसार चलने की बात कह रही थी, जबकि जीत की खुमारी में डूबी भाजपा अपने हिसाब से हजकां को कंट्रोल करना चाहती थी। नतीजा गठबंधन का बंधन टूट गया।
दूसरे चुनावी राज्य महाराष्ट्र में भी भाजपा इसी राह पर चलती दिखाई दे रही है। हो सकता है भाजपा और शिवसेना में सीटों के बंटवारे पर आपसी सहमति बन भी जाए लेकिन फिलहाल की स्थितियां और चुनाव की तारीख के ऐलान के बाद तक सीटों के बंटवारे को लेकर तकरार साफ कर रही है कि महाराष्ट्र में भी भाजपा को अपने दम पर जीत का भरोसा है और वह इसके लिए अपनी 25 साल पुरानी सहयोगी शिवसेना से भी किनारा करने से गुरेज नहीं करने वाली। दरअसल 2009 में 119 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली भाजपा इस बार 135 सीटों पर चुनाव लड़ने पर अड़ी है, लेकिन 2009 में 169 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली शिवसेना को ये मंजूर नहीं है। सवाल ये है कि ये स्थितियां निर्मित क्यों हुई..?
जाहिर है, 2014 के आम चुनाव में मोदी लहर पर सवार भाजपा की प्रचंड जीत इसका आधार बनी हैं, भाजपा का मानना है कि आम चुनाव में उसने महाराष्ट्र में 23 सीटें जीती जबकि शिवसेना 18 सीटों पर ही जीत दर्ज कर पाई, ऐसे में उसका प्रदर्शन महाराष्ट्र में शिवसेना से बेहतर रहा। ऐसे में उसका दावा कहीं से भी गलत नहीं है। लेकिन असल सवाल ये भी है कि क्या मोदी का ये करिश्मा हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव  में भी काम करेगा या फिर हाल ही में हुए अलग अलग राज्यों की 33 विधानसभा सीटों के उपचुनाव के नतीजों का अक्स इसमें भी नजर आएगा..?
हरियाणा में भाजपा-हजकां गठबंधन का बिखरना और महाराष्ट्र में भी भाजपा-शिवसेना के रास्ते अलग होने का संकेत तो कम से कम इसी ओर ईशारा कर रहा है कि भाजपा अति आत्मविश्वास से लबरेज है और उपचुनाव के नतीजों से भी शायद भाजपा सबक लेने को तैयार नहीं है। शाह को अभी भी भरोसा है कि महाराष्ट्र और हरियाणा में कांग्रेस को परास्त कर भाजपा भारी बहुमत से सरकार बनाएगी और कांग्रेस मुक्त भारत के रास्ते पर आगे बढ़ेगी।
अति आत्मविश्वास से लबरेज ये वही भाजपा है, जो आम चुनाव से पहले एक भी लोकसभा सीट जीतने की संभावना रखने वाले छोटे से छोटे दल के साथ प्री पोल गठबंधन करने का कोई मौका नहीं छोड़ रही थी, लेकिन आम चुनाव में जीत के बाद उसे अपने साथियों का साथ छोड़ने से भी गुरेज नहीं है।
सपने देखना अच्छी बात है और उन्हें पूरा करने की कोशिश करना और भी अच्छी बात, लेकिन भाजपा को ये नहीं भूलना चाहिए कि बातें चाहे वो कितनी ही कर लें, आखिरी फैसला तो जनता को ही करना है। वैसे भी 19 अक्टूबर अब ज्यादा दूर नहीं है।


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मंगलवार, 16 सितंबर 2014

खुशी जरूर मनाईये लेकिन…

वो अब कह रहे हैं कि ये चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़े गए थे और उन्हीं के आधार पर जनता ने वोट दिया और अपने नेता को चुना। जी हां मोदी और अमित शाह की भाजपा का उपचुनाव के नतीजों पर कुछ ऐसा ही कहना है। 33 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के जब नतीजे आए, जिनमें से 11 सीटें यूपी की भी थी तो 16 मई के चुनावी नतीजों पर इतराने वाले बीजेपी नेताओं की चेहरे सफेद पड़ चुके थे। अच्छे दिनों के वादों के साथ जिस मोदी लहर पर सवार होकर भाजपा केन्द की सत्ता में काबिज हुई थी, उसका असर फारिग होता दिखाई दिया।
यूपी में लोकसभा की 80 सीटों में से 71 सीटें जीतने वाली भाजपा उपचुनाव में अपनी सीटों को तक नहीं बचा पाई तो ऐसा ही कुछ हाल पीएम मोदी के गृहराज्य गुजरात में और आम चुनाव में मिशन 25 पूरा करने वाले राजस्थान में भी हुआ। उपचुनाव में भाजपा की जीत होती तो शायद भाजपा नेताओं के स्वर बदले हुए होते, वे मोदी सरकार के काम को फुल नंबर देते हुए इसे जनता का फैसला बताने में जरा सी भी देर नहीं करते लेकिन नतीजे मनमाफिक नहीं आए हैं तो भाजपा के स्वर भी बदले बदले से हैं।
16 मई से 16 सितंबर तक जनता का मिजाज इस तेजी से बदलेगी शायद ही किसी ने सोचा होगा लेकिन ये हुआ और इसका होना भाजपा के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है। वक्त है आत्ममंथन का, जीत की खुमारी से बाहर निकलने का, वर्ना जनता के मन को किसने पढ़ा है, हरियाणा और महाराष्ट्र में 15 अक्टूबर का चुनाव और 19 अक्टूबर के नतीजे भी ज्यादा दूर नहीं है। उसके बाद झारखंड और जम्मू-कश्मीर भी पीछे पीछे चल रहे हैं।
इस उपचुनाव के नतीजों ने भाजपा के चेहरे का रंग भले ही उड़ा दिया है, लेकिन कुछ चेहरों पर मुस्कान भी लौट आई है। शुरुआत करने के लिए यूपी से बेहतर जगह और क्या हो सकती है। तमाम मोर्चों पर विफल रहने के आरोपों से घिरे यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के चेहरे की मुस्कान को कैसे कोई भूल सकता है। अरसे बाद उपचुनाव के नतीजों ने अखिलेश को भी खिलखिलाने का मौका जो दे दिया।
ऐसा ही मुस्कान का इंतजार राजस्थान प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट को भी था, उनकी ये मुराद भी राजस्थान की 4 सीटों में से 3 सीट पर कांग्रेस की जीत के साथ पूरी हो गयी। हालांकि छोटी सी ही सही लेकिन खुशी भाजपा को भी मिली, पश्चिम बंगाल में आखिर बीजेपा का खाता खुल ही गया। भाजपाई इसकी खुशी भी मना रहे हैं, शायद भाजपा नेता भी बड़ी खुशी के चक्कर में छोटी खुशी को बेकार नहीं करना चाहते हैं। बढ़िया है, मनाईये खुशी...जरूर मनाईये, लेकिन ध्यान रखिए इस खुशी में इतना भी न डूब जाना कि 19 अक्टूबर को ये खुशी भी मयस्सर न हो सके।      


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शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

विधानसभा चुनाव- कौन होगा पास, कौन फेल ?

16 मई को जब आम चुनाव के नतीजे आए तो जिस मोदी मैजिक की चुनाव से पहले बात हो रही थी, वो चुनावी नतीजे के रूप में नजर आया। नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने तो लोगों की उम्मीदों को भी पंख लगे कि अब उनके अच्छे दिन आएंगे लेकिन एक के बाद एक महंगाई की डोज के तले लोगों की उम्मीदें दम तोड़ने लगी।
मोदी सरकार 100 दिन पूरे कर चुकी है, ऐसे में सरकार के कामकाज का हिसाब किताब मांगा जाने लगा है। मोदी सरकार अच्छे दिन के वादे पर अभी भी दमदारी से कायम रहते हुए वक्त मांग रही है, तो लोग असमंजस में है कि मोदी सरकार की बातों पर कितना विश्वास किया जाए। कुछ लोगों का भ्रम टूटने लगा है तो कुछ मानते हैं कि 100 दिन में हिसाब मांगना शायद जल्दबाजी होगी। लोगों का भ्रम कितना टूटा और कितने लोग सरकार को और समय देने के पक्ष में है, इसके लिए 15 अक्टूबर को होने वाले हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से बेहतर और क्या हो सकता है..?
हरियाणा और महाराष्ट्र के लिए चुनावी तारीख का ऐलान हो चुका है, ऐसे में चुनावी जंग में अपनी अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए राजनीतिक दलों ने भी कमर कस ली है। हरियाणा और महाराष्ट्र दोनों ही ऐसे राज्य हैं, जहां पर देश की दोनों बड़ी पार्टियों कांग्रेस और भाजपा के अलावा इनके सहयोगी भी खासा दम रखते हैं और सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं। महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ती रही है तो भाजपा-शिवसेना के साथ।  भाजपा और कांग्रेस दोनों के ही सहयोगी महाराष्ट्र में अच्छा दखल रखते हैं। वहीं हरियाणा में भाजपा और कांग्रेस के अलावा क्षेत्रीय दलों का बोलबाला दिखाई देता है। वैसे भी आगामी विधानसभा चुनाव में हरियाणा में राजनीतिक दलों की बाढ़ सी आई हुई है। जाहिर है दोनों ही राज्यों में चुनावी मुकाबला रोचक होनी की पूरी उम्मीद है।
हालांकि विधानसभा के चुनाव स्थानीय मुद्दे हावी रहेंगे लेकिन आम चुनाव में मोदी लहर के सहारे प्रचंड बहुमत से आने वाली मोदी सरकार के लिए दोनों ही राज्यों के विधानसभा चुनाव किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है, क्योंकि 19 अक्टूबर को आने वाले इस चुनाव के नतीजे काफी हद तक तय करेंगे कि मोदी सरकार 100 दिनों में चुनाव पूर्व किए अपने वादों पर कितना आगे बढ़ पाई है और अब भी मोदी लहर का कितना असर बाकी है..?
कसौटी पर कांग्रेस भी होगी, क्योंकि हरियाणा और महाराष्ट्र दोनों ही राज्यों में कांग्रेस की ही सरकार है। महाराष्ट्र में 15 सालों से कांग्रेस गठबंधन काबिज है तो हरियाणा में 10 सालों से। जाहिर है, आम चुनाव में करारी शिकस्त झेलने वाली कांग्रेस के लिए दोनों ही राज्यों में अपनी सत्ता बचाना आसान काम नहीं है। यकीनन, आम चुनाव में 44 सीटों पर सिमटने वाली कांग्रेस एक और हार के लिए तैयार नहीं होगी, लेकिन आम चुनाव में महाराष्ट्र और हरियाणा में कांग्रेस का घटा हुआ वोट प्रतिशत और तमाम ओपिनीयन पोल कांग्रेस की सांसे फुलाने के लिए काफी है।
महाराष्ट्र में जहां कांग्रेस सरकार के लिए भ्रष्टाचार के आरोपों पर जवाब देने के लिए कुछ नहीं है, तो हरियाणा में कांग्रेस का हाथ छोड़ने वाले दिग्गजों की फेरहिस्त खासी लंबी हो चुकी है। कुल मिलाकर फैसला जनता को करना है, लेकिन जनता के सामने भी बहुत ज्यादा विकल्प नहीं है, ऐसे में देखना ये होगा कि महाराष्ट्र और हरियाणा दोनों ही राज्यों में जनता आखिर किस पर भरोसा करती है, सत्ताधारी कांग्रेस पर या फिर मोदी के नाम पर दोनों ही राज्य में करिशमाई जीत के भरोसे बैठी भारतीय जनता पार्टी पर।

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गुरुवार, 4 सितंबर 2014

डायरी खोलेगी राज !

सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा के निवास की विजिटर डायरी पर हंगामा तो ऐसा मचा है, जैसे रंजीत सिन्हा साहब ने कोई बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो। सिर्फ मुलाकात ही तो की है। डायरी में भी तो यही दर्ज है कि फलां-फलां साहब फलां-फलां तारीख को फलां-फलां बार सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा साहब से मिलने पहुंचे थे। इसमें कौन सी बड़ी बात हो गई। अब टूजी और कोल ब्लॉक आवंटन जैसे कई और जिन मामलों की जांच सीबीआई कर रही है, उनमें जांच के घेरे में आए लोग बचने के लिए किससे मिलेंगे..? जाहिर है सीबीआई डायरेक्टर से ही न..! और, वैसे भी टूजी और कोयला घोटाले कौन से बहुत बड़े घोटाले हैं। टूजी में सिर्फ एक लाख 76 हजार करोड़ की ही तो घोटाला हुआ जबकि कोयला घोटाला इससे जरा सा बड़ा एक लाख 86 हजार करोड़ का हुआ..!
अब इन छोट-मोटे घोटाले के आरोपी अगर हमारे सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा साहब से मिल भी लिए तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा। वैसे भी इस ख़बर के बाद से ही घबराए-घबराए से नजर आ रहे सिन्हा साहब साफ कर चुके हैं कि उन्होंने किसी को कोई फायदा नहीं पहुंचाया। लेकिन ये समझ नहीं आ रहा कि सिन्हा साहब इतने क्यों घबराए हुए हैं। एक तरफ वे कह रहे हैं कि उनके निवास पर मौजूद दो डायरी में इनमें से किसी भी आगंतुक का जिक्र नहीं है, लेकिन दूसरी तरफ वे इस डायरी को मीडिया में आने से रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगा रहे हैं। हालांकि ये बात अलग कि सर्वोच्च न्यायालय से भी उन्हें राहत नहीं मिली।
सिन्हा साहब जब आपके मुताबिक आपने कोई गुनाह नहीं किया है, किसी को फायदा नहीं पहुंचाया है तो फिर क्यों घबरा रहे हैं..? कहीं ये घबराहट इसलिए तो नहीं है कि इस डायरी की जितनी चर्चा होगी, उतने ही राज भी खुलेंगे..? अब डायरी के राज को आप और आपसे मिलने वालों से बेहतर और कौन समझ सकता है..? वैसे भी सीबीआई निदेशक बनने के बाद से ही आपकी कार्यप्रणाली पर सवाल कई बार उठे हैं।
कोलगेट की स्टेटस रिपोर्ट भी आप हंसी खुशी तत्कालीन कानून मंत्री अश्वनी कुमार के पास लेकर गए थे, जो आप सर्वोच्च न्यायालय में कबूल भी कर चुके हैं और आपके इस कृत्य की बदौलत न्यायालय ने सीबीआई को पिंजरे में बंद तोते की संज्ञा दी थी। आप इतने ही ईमादार होते तो सरकार के दबाव के बाद भी स्टेटस रिपोर्ट लेकर कानून मंत्री के पास जाने की बजाए इसका विरोध कर सकते थे। वैसे दोष आपका भी नहीं है, सीबीआई निदेशक की कुर्सी का मोह छोड़ना इतना आसान काम भी नहीं है। खैर अब मुलाकात करना कबूल ही लिया है तो अब छटपटाने से क्या फायदा..? हो सकता है, सिन्हा साहब ने किसी को फायदा न पहुंचाया हो लेकिन घर पर मुलाकात का फंडा समझ में नहीं आया। कोई बात नहीं सिन्हा साहब, आगे से ध्यान रखिएगा, वैसे आप ध्यान रखें न रखें, भविष्य में दूसरे लोग जरूर इसका ध्यान रखेंगे।


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शनिवार, 30 अगस्त 2014

मांझी बिहार नहीं सिर्फ मखदमपुर के सीएम !

जीतन राम मांझी, ये बिहार के मुख्यमंत्री ही नहीं बल्कि बिहार में भाजपा के खिलाफ अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई के लिए पैदा हुए महागठबंधन के फिलहाल अघोषित तौर पर सबसे बड़े नेता हैं। आम चुनाव में करारी हार की जिम्मेदारी लेकर मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने वाले नीतिश कुमार के उत्तराधिकारी के रूप में सीएम की कुर्सी संभालने वाले मांझी को कौन समझाए कि वे सिर्फ जहानाबाद के मखदमपुर विधानसभा सीट के मुख्यमंत्री नहीं हैं, जहां से वे विधायक चुन कर आए हैं बल्कि वे पूरे प्रदेश के मुखिया हैं। बिहार का मुख्यमंत्री होने के नाते उनकी जिम्मेदारी है कि पूरे प्रदेश के विकास के लिए काम करें। पूरे प्रदेश के लोगों की समस्याओं का समाधान करें।
जाहिर है हर तरफ से निराश होने के बाद लोग मुख्यमंत्री से ही गुहार लगाते हैं, लेकिन लगता है कि मांझी को ये बात समझ में नहीं आती। ये इसलिए क्योंकि जहानाबाद के मखदमपुर के झमणबिगहा गांव के पास स्कूल में आयोजित सभा में बिजली कटौती के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों से वे कहते हैं कि आपके वोट से मैं चुनाव नहीं जीतता हूं और आप हमें वोट नहीं देते। दरअसल ये लोग सीएम मांझी को बिजली नहीं तो वोट नहीं कि तख्ती दिखाकर अपना विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, लेकिन सीएम साहब को उनका ये तरीका रास नहीं आया और मांझी अपना आपा खो बैठे।
मांझी साहब के ये तेवर अपनी समझ से तो बाहर हैं। मांझी साहब जनता तो आपसे ही सवाल पूछेगी न, अपनी समस्याएं लेकर आपके ही पास आएगी न, अब अपनी समस्याएं लेकर आपके राज्य की जनता पड़ोसी राज्य के मुख्यमंत्री से तो सवाल पूछेगी नहीं। ठीक है, आपको कुर्सी संभाले हुए सिर्फ तीन महीने ही हुए हैं, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आपकी जिम्मेदारी कम हो जाती है। वैसे इसमें दोष आपका भी नहीं है, जब आप खुद मंत्री रहते हुए अपने घर का बिजली का बिल घूस देकर कम कराने में यकीन रखते हैं तो फिर राज्य की जनता को आपसे ज्यादा उम्मीद होनी भी नहीं चाहिए।


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मंगलवार, 19 अगस्त 2014

नंबर वन सीएम की हूटिंग !

नंबर वन हरियाणा, हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने तो कुछ ऐसी ही परिभाषा दी है, 5 साल के शासन के बाद हरियाणा को। ये बात अलग है कि हरियाणा के लोगों को ही शायद ये पता नहीं है कि उनका हरियाणा हुडडा के कार्यकाल में देश में नंबर वन राज्य हो गया है। लेकिन हुड्डा साहब लोगों को बताने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। हरियाणा में चुनाव की आहट के साथ ही अख़बार और टीवी पर हुड्डा सरकार के विज्ञापन को कम से कम यही बयां कर रहे हैं। जाहिर है इस पर करोड़ों रूपए पानी की तरह बहाया भी जा रहा है, लेकिन अगला चुनाव जीतना है तो हुड्डा साहब तो कुछ तो करना ही पड़ेगा। लेकिन हुड्डा साहब की ये दलील शायद हरियाणा वासियों को रास नहीं आ रही है।
रियाणा के कैथल में नशनल हाईवे प्रॉजेक्ट की आधारशिला रखने पहुंचे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ मंच पर मौजूद हरियाणा के मुख्यमंत्री हुड्डा की जब बोलने की बारी आई तो वहां मौजूद जनता ने हुड्डा की जमकर हूटिंग की। लोगों को हुड्डा को सुनना तक गवारा नहीं था और वे हुड्डा को हाथ हिलाकर बैठ जाने के ईशारे तक करने लगे। ये हुड्डा साहब के हरियाणा के ही लोग थे, जिस हरियाणा को हुड्डा साहब सरकारी विज्ञापनों के जरिए नंबर वन बनाने के दावे करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं, लेकिन हरियाणा को नंबर वन(जैसा की हुडडा दावा कर रहे हैं) बनाने वाले मुख्यमंत्री भूपेन्द्र हुड्डा तक को सुनने के लिए हरियाणा के ही लोग तैयार नहीं है।
सरेआम हूटिंग हो और मुख्यमंत्री हुड्डा को गुस्सा न आए, ऐसा कैसे हो सकता था। हुड्डा साहब को भी ये नागवार गुजरा और हुडडा साहब ने तो ये तक ऐलान कर दिया कि वे भविष्य में पीएम मोदी के साथ किसी रैली में नहीं जाएंगे। हुड्डा ने मोदी पर ये तक आरोप लगा डाला कि प्रधानमंत्री ने कार्यक्रम का राजनीतिकरण कर दिया।
कैथल में मोदी भ्रष्टाचार के खिलाफ जमकर बोले और भारत को भ्रष्टाचार की बीमारी से मुक्त कराने का वादा जनता से किया, साथ ही मोदी ने हरियाणा के समग्र विकास का वादा भी हरियाणा की जनता से किया। ऐसे में हुड्डा को इसमें राजनीतिकरण कहां से नजर आया, ये समझ से बाहर है, खैर सरेआम हूटिंग के बाद हुड्डा को कुछ तो बोलना ही था। वैसे भी हरियाणा में चुनावी सीजन अपने पूरे परवान पर है, ऐसे में हुड्डा क्यों न मोदी के खिलाफ कुछ न बोलते, यही सही।
बहरहाल कार्यक्रम के राजनीतिकरण का तो पता नहीं लेकिन आगामी चुनाव जीतने का मिशन लेकर चल रहे हुड्डा ने जनता के पैसे का विज्ञापनीकरण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रूपए सरकारी विज्ञापनों में उड़ा कर मुख्यमंत्री अपना व कांग्रेस सरकार का महिमामंडन करने में जी जान से जुटे हुए हैं।
खैर जो भी हो, लेकिन ये बात समझ में नहीं आती कि अगर सरकारें काम करती हैं, तो फिर ये सब जनता को बताने के लिए उसे करोड़ों रूपए विज्ञापनों में खर्च करने की जरूरत क्यों पड़ती हैं ? अच्छा होता कि ये करोड़ों रूपए भी विकास कार्यों में खर्च किया जाता।


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सोमवार, 18 अगस्त 2014

जय हो धोनी एंड कंपनी की !

भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी खुश तो बहुत होंगे, ओवल टेस्ट महज ढ़ाई दिन में जो खत्म हो गया। मैनचेस्टर में चौथे टेस्ट मैच में तीसरे ही दिन पारी और 54 रनों से करारी हार के बाद धोनी की खुशी देखने लायक थी। आखिर ओवल में पांचवे और अंतिम टेस्ट मैच से पहले भारतीय टीम को आराम के लिए दो दिन का अतिरिक्त समय जो मिल गया था। टीम ने इस समय का सदुपयोग करने का फायदा भी ओवल में पांचवे टेस्ट मैच में साफ नजर आया और भारत ने अपने शानदार प्रदर्शन से इस मैच को ढ़ाई दिन से ज्यादा नहीं चलने दिया।
खास बात तो ये रही कि भारतीय खिलाड़ियों ने इस मैच में अपना प्रदर्शन सुधारते हुए हार का अंतर पारी और 54 रनों से बढ़ाकर पारी और 244 रन कर दिया। इतना ही नहीं भारतीय टीम ने अपने प्रदर्शन के दम पर एक और रिकार्ड अपने नाम कर लिया। रिकार्ड 40 सालों में इंग्लैंड के हाथों सबसे बड़ी और शर्मनाक हार का। 1974 में अजीत वाडेकर की कप्तानी में इंग्लैंड के हाथों पारी और 285 रनों से हारने के बाद इस नए रिकार्ड को बनाने के लिए भारतीय खिलाड़ी इतने उतावले दिखाई दे रहे थे कि पूरी टीम महज 143 मिनट में ही ढ़ेर हो गई। जिस पिच पर अंग्रेजों ने पहली पारी में 486 रन ठोक डाले, उस पिच पर भारतीय टीम पहली पारी में 148 रनों पर ढ़ेर हो गई तो दूसरी पारी में सिर्फ 98 रन ही बना सके।
सिर्फ सीरीज के पहले और दूसरे टेस्ट मैच को छोड़ दिया जाए तो तीसरे, चौथे और पांचवे टेस्ट मैच में भारतीय खिलाड़ी अंग्रेजों के सामने घुटने टेकटे नजर आए। पहला टेस्ट मैच ड्रा कराने के बाद जब भारतीय टीम ने लार्डस में दूसरा टेस्ट मैच 95 रनों से जीता तो लगने लगा था कि शायद भारत सीरीज अपने नाम कर अंग्रेजों से पिछली दो सीरीज में मिली हार का बदला ले लेगा लेकिन लार्डस में जीत की खुमारी भारत पर भारी पड़ गयी और एक के बाद एक इंग्लैंड ने आखिरी के तीनों टेस्ट मैचों में भारत को करारी हार का स्वाद चखा कर सीरीज 3-1 से जीतकर भारत के सीरीज जीतने के सपने को चूर चूर कर दिया।
सीरीज में 1-0 की बढ़त लेने के बाद 3-1 से सीरीज को गंवा देना ये बताने के लिए काफी है कि लार्डस में मिली 28 साल बाद ऐतिहासिक जीत के बाद भारतीय खिलाड़ियों अति आत्मविश्वास से लबरेज थे, और यही अति आत्मविश्वास भारतीय टीम को ले डूबा। जबकि दूसरे टेस्ट मैच में लार्डस में हार झेलने के बाद कड़ी आलोचना झेलने वाले इंग्लैड के कप्तान एलिस्टर कुक ने न सिर्फ अगले मैच में निराशा से उबरते हुए टीम को शानदार जीत दिलाई बल्कि सीरीज में पिछड़ने के बाद भी सीरीज 3-1 से जीत ली।
सीरीज में इस परिणाम के बाद कहने में कोई हर्ज नहीं कि अंग्रेजों ने शानदार खेल का प्रदर्शन किया जबकि भारतीय खिलाड़ियों ने भारत को शर्मशार करने का कोई मौका नहीं छोड़ा। अपने हर अगले मैच में भारतीय खिलाड़ी हार के नए रिकार्ड बनाने के लिए उतावले दिखाई दे रहे थे।
बहरहाल देखना रोचक होगा कि भारतीय टीम इस करारी हार से कोई सबक लेकर 25 अगस्त से शुरु हो रही पांच वन डे मैचों की सीरीज और एक टी 20 मैच जीतकर अंग्रेजों से बदला ले पाएगी या फिर भारतीय क्रिकेट टीम का ये शर्मनाक प्रदर्शन जारी रहेगा। उम्मीद पर दुनिया कायम है, फिर ये तो क्रिकेट है, ये तो खेल ही अनिश्चितताओं का है।   


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बुधवार, 13 अगस्त 2014

मुलायम पर कठोर हुई माया !

सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह तैयार हैं, बस लालू प्रसाद यादव बसपा सुप्रीमो मायावती का हाथ पकड़कर उनके पास ले आएं। बिहार में भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ जदयू से हाथ मिलाने के बाद राजद प्रमुख लालू ने माया- मुलायम से आह्वान किया था कि भाजपा को रोकने के लिए यूपी में वे भी हाथ मिला लें। मुलायम ने साथ आने के संकेत भी दिए लेकिन मायावती ने मुलायम को ठेंगा दिखा दिया।
मायावती ने मुलायम और लालू दोनों को खरी खोटी सुनाते हुए चुनाव में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी क्या किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन की संभावनाओं को खारिज कर दिया। (पढ़ें - बिहार सियासी दोस्ती के मायने ?)
आम चुनाव में यूपी में भाजपा ने सबसे बड़ी जीत हासिल करते हुए 42.3 फीसदी वोट पाए थे और प्रदेश की 80 में से 71 सीटों पर विजय हासिल की थी। यूपी में भाजपा को कड़ी चुनौती देने की बात करने वाली कांग्रेस सिर्फ 7.5 फीसदी वोट के साथ रायबरेली और अमेठी दो ही सीटें जीत पाई थी। वहीं सत्ताधारी समाजवादी पार्टी महज 22.2 फीसदी वोट के साथ 5 सीटें जीतने में ही सफल हो पाई तो बसपा 19.6 फीसदी वोट हासिल करने के बाद भी एक भी सीट जीतने में असफल रही थी।
प्रदेश में सत्तारूढ़ होने के बाद भी 5 सीटें जीतने वाली मुलायम की समाजवादी पार्टी को शायद ये एहसास हो गया है कि 2012 के विधानसभा चुनाव में 224 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत से सत्ता में आने के बाद आम चुनाव में करारी हार का ये सिलसिला उसे 2017 में होने वाले विधानसभा चुनावों में भी जारी रह सकता है और शायद इसलिए ही मुलायम बिहार में जदयू से हाथ मिलाने वाले लालू प्रसाद यादव की सलाह पर गंभीरता से विचार करते हुए दिखाई दिए और कह डाला कि लालू अगर माया को ले आएं तो वे यूपी में सपा मायावती के साथ हाथ मिलाने को तैयार हैं।
आम चुनाव में यूपी में आधी से अधिक सीटें जीतने का दावा कर तीसरे मोर्चे के सहारे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने का ख्वाब देखने वाले मुलायम का ख्वाब मोदी की आंधी में उड़ गया, ऐसे में अब मुलायम को शायद ये डर भी सता रहा है कि कहीं भविष्य में यूपी भी उनके हाथ से न निकल जाए।
वहीं यूपी में साथ आने की लालू की सलाह पर मुलायम के संकेतों पर आंखे तरेरने वाली मायावती ने साफ कर दिया है कि वो 2017 में होने वाले विधानसभा चुनाव अपने दम पर लड़ेगी और सपा क्या किसी भी दल के साथ गंठबंधन नहीं करेगी। मायावती ने ये भी दावा किया कि 2017 में बसपा एक बार फिर से पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आएगी। मायावती के इस भरोसे के पीछे मायावती का क्या गणित है, ये तो मायावती ही बेहतर समझा सकती हैं।
लेकिन आम चुनाव में खाता खोलने में असफल रही बसपा की उम्मीद पार्टी को मिले 19.6 प्रतिशत वोटों से ज्यादा लगती है। मायावती को शायद लगता है कि आम चुनाव में सीट भले ही बसपा को एक भी नहीं मिली लेकिन पार्टी 19.6 प्रतिशत वोटों के साथ भाजपा और सपा के बाद तीसरे नंबर पर रही, ऐसे में विधानसभा चुनाव में उसका ये वोट प्रतिशत उसकी सीटों की संख्या में बदल सकता है। वैसे भी 2007 में किसने सोचा था कि बसपा 207 सीटें जीतकर बहुमत के साथ सत्ता में आएगी, शायद मायावती को एक बार फिर से 2007 की तरह बसपा की जीत का भरोसा है।        
बहरहाल माया के इंकार के बाद मुलायम के साथ ही लालू और नीतिश कुमार को भी झटका तोजरूर लगा होगा, जो भाजपा को रोकने के लिए फिलहाल किसी भी हद तक जाने को तैयार दिखाई दे रहे हैं, ऐसे में देखना रोचक होगा कि भविष्य में विभिन्न राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव और उपचुनाव में जनता भाजपा के खिलाफ इन दलों की गोलबंदी को किस तरह लेती है। सवाल ये भी कि क्या आगामी चुनावों में भी दिखेगा मोदी लहर का असर या फिर मोदी सरकार के दो महीने के काम के आधार पर जनता करेगी कोई फैसला ?


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मंगलवार, 12 अगस्त 2014

बिहार – सियासी दोस्ती के मायने ?

बिहार विधानसभा चुनाव में भले ही अभी एक साल से अधिक का वक्त बचा हो लेकिन बिहार में सत्ता की मलाई खाने के लिए जोर आजमाईश अभी से शुरू हो चुकी है। 2014 के आम चुनाव में करारी शिकस्त खाने वाली सत्ताधारी जदयू के साथ ही राजद और कांग्रेस नेताओं के सिर से मोदी लहर का भूत उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है। शायद यही वजह है कि मोदी लहर को चुनौती देने के लिए अब राजद, जदयू और कांग्रेस आगामी 21 अगस्त को 10 विधानसभा सीटों के होने वाले उपचुनाव से पहले साथ साथ आ गए हैं। कभी एक दूसरे के साथी रहे और फिर धुर विरोधी बने राजद के लालू प्रसाद यादव व जदयू के नीतिश कुमार अब गले में हाथ डाले दिखाई दे रहे हैं।
1993 में अलग अलग रास्ते जाने वाले लालू और नीतिश की राहें अब एक हो चली हैं। चुनावी मंच में दोनों एक दूसरे के गले में हाथ डालकर जनता को बताने की कोशिश कर रहे हैं कि उनकी जुगलबंदी सियासी फायदे के लिए नहीं है बल्कि वे भाजपा से देश को बचाना चाहते हैं और इसके लिए साथ आने के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है।
आम चुनाव में करारी शिकस्त झेलने के बाद लालू की राजद, नीतिश की जदयू और कांग्रेस के सामने बिहार मे अपना अस्तित्व बचाने का संकट खड़ा हो गया है। आम चुनाव में बिहार की 40 सीटों में से राजद जहां सिर्फ 4 सीटें जीत पायी थी, वहीं राज्य में सत्ताधारी जदयू सिर्फ 2 सीटों पर ही जीत हासिल कर पायी थी जब्कि कांग्रेस की सीटों की संख्या भी सिर्फ 2 पर आकर सिमट गयी। वहीं भाजपा गठबंधन ने 31 सीटों पर जीत हासिल की, जिसमें से भाजपा के खाते में 22 सीटें आई।  
लालू और नीतिश कह रहे हैं कि देश को बचाने के लिए वे साथ साथ आए हैं, लेकिन दोनों की बातों पर यकीन तो नहीं होता। दोनों का साथ आना, मिलकर चुनाव लड़ना अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाए रखने की कवायद नहीं है तो और क्या है ?
हाजीपुर की चुनावी रैली में तो दोनों गले मिलते दिखाई दिए लेकिन कौन जाने इनके मन में क्या है ?
लालू के राज को जंगलराज बताने वाली जदयू और नीतिश पर बिहार को बर्बाद करने का आरोप लगाने वाले लालू आज जब ऐसे वक्त पर गले मिल रहे हैं, जब दोनों की ही पार्टियों को आम चुनाव में जनता ने सिरे से नकार दिया तो कैसे कोई यकीन कर सकता है कि दोनों सिर्फ अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए ही साथ नहीं आए हैं  ?
सियासत में अपने फायदे के लिए दुश्मनों से हाथ मिलाने का राजनेताओं का पुराना शगल है। ऐसे में क्यों लालू औऱ नीतिश की बात पर यकीन किया जाए कि जो वह कह रहे हैं वही उनके मन में भी है ! (पढ़ें - बिहार दुश्मन का दुश्मन दोस्त !)
बिहार के मुख्यमंत्री मांझी के विधानसभा चुनाव में गठबंधन की जीत पर नीतिश को सीएम बनाए जाने की बात पर लालू का लाल चेहरा कैसे लाल हुआ था, ये तो आपको याद ही होगा !
आज लालू प्रसाद पूर्व मुख्यमंत्री नीतिश को अपना छोटा भाई बताते नहीं थक रहे हैं लेकिन तकरीबन 20 सालों तक यही छोटा भाई लालू का सबसे बड़ा सियासी दुश्मन हुआ करता था !
आज लालू देश बचाने की बात कर रहे हैं, लेकिन यह वही लालू हैं जो भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे हैं और चारा घोटाले के एक मामले में सीबाई की स्पेशल कोर्ट ने उन्हें पांच साल की सजा सुनाई है। फिलहाल लालू सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बाद जेल से बाहर हैं।  
कुल मिलाकर देखा जाए तो बिहार में लालू और नीतिश की जुगलबंदी तो इसी ओर ईशारा कर रही है कि दोनों कांग्रेस के साथ मिलकर अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं और दोनों की नजरें एक बार फिर से अगले साल बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव पर हैं। फिलहाल तो इनके सामने 21 अगस्त को 10 विधानसभा सीटों के लिए होने वाले उपचुनाव की चुनौती है, देखते हैं इनकी सियासी दोस्ती का जवाब जनता किस तरह देती है ?


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सोमवार, 11 अगस्त 2014

भारत रत्न पर सियासत क्यों ?

भारत रत्न, भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, हर भारतीय इस सम्मान को पाना चाहेगा। लेकिन क्या हर भारतीय इसका हकदार है। जाहिर है नहीं, लेकिन भारत रत्न पर बीते कुछ सालों से हो रही सियासत के बीच अब ये सवाल उठने लगा है कि आखिर कौन वास्तव में इस सम्मान का हकदार है..?
क्या केन्द्र की सत्ता में काबिज होने वाली सरकारें अपने दल से जुड़े लोगों को या फिर अपने सियासी फायदे के लिए इस सर्वोच्च भारतीय नागरिक सम्मान का मखौल तो नहीं उड़ा रही..?
क्यों केन्द्र सरकारें इस सम्मान को रेवड़ियों की तरह बांटकर इस सम्मान का मजाक बना रही हैं..?
हैरानी तो उस वक्त होती है, जैसा कि अमूमन देखा गया है कि इस सम्मान के लिए अधिकतर लोगों को मरणोपरांत चुना गया। केन्द्र में सरकार चाहे किसी की भी रही हो क्यों सरकारों को उस शख्सियत की देश के लिए दिए गए योगदान की कीमत उनकी मौत के बाद आती है। जीते जी उन्हें कोई नहीं पूछता लेकिन प्राण निकल जाने के बाद उन्हें सम्मान देने की होड़ सी लग जाती है।
1954 में इस सम्मान की स्थापना के बाद से अब तक 11 लोगों को मरणोपरांत भारत रत्न के लायक समझा गया। लाल बहादुर शास्त्री, के कामराज, आचार्य विनोबा भावे, मरूदुरु गोपाला रामचंद्रन, डॉ. भीमराव अंबेडकर, राजीव गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, अरुणा आसफ अली, जयप्रकाश नारायण जैसी हस्तियों का देश के प्रति योगदान इनके जीवित रहते हुए तत्कालीन सरकारों की समझ से बाहर रहा लेकिन इनकी मौत के बाद सरकार ने इन्हें भारत रत्न के लायक समझा।
खास बात ये है कि इस सम्मान की स्थापना के वक्त इसमें मरणोपरांत किसी को इस सम्मान से नवाजने का प्रावधान नहीं था लेकिन 1955 में इस प्रावधान को भी इसमें जोड़ दिया गया। जिसके बाद से अब तक 11 लोगों को मरणोपरांत भारत रत्न प्रदान किया चुका है।
ख़बरों के मुताबिक अब एक बार फिर से भारत रत्न के लिए सरकारी कवायद शुरु हो गई है तो इस पर सियासत गर्माने लगी है। चर्चा में चल रहे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, हॉकी के जादूगर ध्यानचंद, दलित नेता काशीराम और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नाम बाहर आने के बाद अब कांग्रेस को लगता है कि इसमें और नामों को जोड़ा जाना चाहिए। हालांकि ये अलग बात है कि खुद सत्ता में रहते हुए कांग्रेस को इन महापुरुषों को भारत रत्न से नवाजने का कभी ख्याल नहीं आया। (पढ़ें - सचिन भारत रत्न तो ध्यानचंद और अटल क्यों नहीं..?)
मुद्दा ये नहीं है कि यूपीए सरकार में किसे इस सम्मान से नवाजा गया और एनडीए सरकार में किसे..?
मुद्दा ये है कि क्या भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान पर हो रही सियासत कितनी जायज है..?
ये एक ऐसा सम्मान है जिसे हर भारतीय पाना चाहेगा लेकिन जो लोग इस सम्मान के हकदार हैं, क्या उन्हें नजरअंदाज तो नहीं किया जा रहा और उनकी मौत के बाद उनको सम्मानित किया जा रहा है..?
सवाल ये भी है कि क्यों कुछ लोगों ने देश का प्रधानमंत्री रहते हुए खुद को तो इस सम्मान के लायक समझ लिया लेकिन कई वास्तविक हकदारों को जीते जी इस सम्मान के लायक नहीं समझा गया और मरणोपरांत उनका योगदान नजर आया।  जाहिर है बात जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी की ही हो रही है।
फरवरी 2014 में जब क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को इस सम्मान से नवाजा गया तो इसके पीछे की सियासत को आसानी से समझा जा सकता था। सियासत हर पार्टी कर रही है, भाजपा अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न दिए जाने की बात कहती रह गई लेकिन यूपीए सरकार ने नहीं दिया, अब मोदी सरकार इस दिशा में कदम बढ़ाती दिख रही है, तो दूसरे नामों को उछालकर कांग्रेस इस पर सियासत कर रही है।
बात भाजपा, कांग्रेस की या फिर अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न दिया जाए या न दिया जाए की नहीं है बल्कि इस पर हो रही सियासत की है और इस सियासत में हर कोई शामिल है। अच्छा होगा कि भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान पर कम से कम राजनीति न हो और कम से कम इस सम्मान का मान बना रहे।


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रविवार, 10 अगस्त 2014

बेनीवाल पर बवाल से हैरानी क्यों ?

गुजरात से मिजोरम तबादला और फिर अपमानजनक बर्खास्तगी, कभी नरेन्द्र दामोदर दास मोदी की नींद उड़ाने वाली कमला बेनीवाल ने ये सोचा भी नहीं होगा कि ताउम्र शान से राजनीति करने के बाद उम्र के इस पड़ाव में उन्हें अपमान का घूंट पीना पड़ेगा। बेनीवाल के साथ ही तमाम कांग्रेसी इसे भले ही बदले की राजनीति करार देते नहीं अघा रहे हों, लेकिन मोदी सरकार के इस फैसले से हैरानी जरा भी नहीं होती। जो काम 2004 में केन्द्र की सत्ता में आने पर कांग्रेसनीत यूपीए सरकार ने किया था, उसी नक्शेकदम पर अब मोदी सरकार भी चल रही है।
कांग्रेस के सवाल उठाने पर सरकार इसे नियमों के तहत लिया गया सही फैसला ठहराते हुए तमाम तर्क पेश कर रही हो लेकिन इस फैसले के पहले मोदी सरकार की क्या नीयत थी, इसे आसानी से समझा जा सकता है। गुजरात में तत्कालीन मोदी सरकार के फैसलों को रेड लाईन खींचने वाली कमला बेनीवाल ने शायद ही उस वक्त ये सोचा होगा कि जिस गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी के फैसलों को रेड लाईट दिखाकर वे कांग्रेस आलाकमान की आंखों का तारा बनने के साथ ही कांग्रेस को गुजरात की मोदी सरकार पर सवाल उठाने के मौके भी कांग्रेस को दे रही हैं, वही मोदी भविष्य में उन्हें उनके राजनीतिक जीवन के अब तक के सबसे कड़वे दिन दिखाने वाले हैं।
बेनीवाल क्या, शायद ही किसी वे ये कल्पना की होगी कि मोदी के नेतृत्व में भाजपा 2014 के आम चुनाव नें प्रचंड बहुमत से सत्ता में आएगी। लेकिन ऐसा हुआ और कमला बेनीवाल मोदी सरकार के रडार में ऐसी आईं कि उन्हें बुरी तरह अपमानित होकर राजभवन के ठाट त्याग कर घर लौटना पड़ा। जहां पर उनके किए कुछ कारनामों के लिए उन्हें और भी मुश्किल भरे दिनों से गुजरना पड़ सकता है।
शायद यही राजनीति है, कब, किसकी किस्तम का सितारा चमकने लगे, कोई नहीं जानता, न ही पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ये सोचा था कि कभी वे भारत के प्रधानमंत्री बनेंगे और न ही नरेन्द्र मोदी ने इस जीत ती उम्मीद भी कभी की होगी, जो उन्हें 2014 के आम चुनाव में मिली। ये तो सिर्फ दो ही ताजा उदाहरण हैं। राजनीति का इतिहास ऐसे तमाम उदाहरणों से भरा पड़ा है, जब सत्ता ने खुद कई लोगों के कदम चूमे तो कई लोग सत्ता के करीब पहुंचकर भी हाथ मलते रह गए। अब बेनिवाल के साथ ये हो रहा है तो अचरज की कोई बात नहीं है, आज मोदी सरकार यूपीए के वक्त नियुक्त राज्यपालों को रडार पर ले रही है, भविष्य में कभी एनडीए सरकार में नियुक्त राज्यपालों को हो सकता है फिर से ऐसे ही दिन देखने पड़े।


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गुरुवार, 7 अगस्त 2014

लो खुल गई राहुल गांधी की नींद !

संसद से नदारद रहने वाले और मौजूद रहने पर भी चुप्पी साधने वाले कांग्रेस युवराज राहुल गांधी को संसद में बोलते देखना अच्छा लगा। सोचा नहीं था कि राहुल इतने आक्रमक भी हो सकते हैं कि संसद की वेल में आकर सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद करेंगे, लेकिन राहुल इतने सक्रिय और आक्रमक पहले हो गए होते तो शायद आम चुनाव में कांग्रेस की ये गत न होती।
आम चुनाव के बाद जम्मू में नेशनल कांफ्रेंस का कांग्रेस से अलग होना, महाराष्ट्र में कांग्रेस के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण और हरियाणा में कांग्रेसी मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के खिलाफ कांग्रेस के दिग्गज नेताओं का बगावत का झंडा बुलंद करना तो कम से कम इस ओर ही ईशारा करता है कि कांग्रेस का जहाज डगमगा रहा है और जहाज का कप्तान जहाज को संभालने में नाकाम साबित हो रहा है। महंगाई पर चर्चा के दौरान संसद में राहुल गांधी का झपकी लेने वाली तस्वीरों ने संभलने की कोशिश कर रही कांग्रेसियों की उम्मीदों को निराशा का अंधेरा ही दिया। (जरूर पढ़ें - राहुल बाबा को सोने दो न प्लीज)  
इस दौरान एक-एक कर कांग्रेस के कई दिग्गजों का राहुल की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाना भी ये ईशारा कर गया कि राहुल के नेतृत्व में शायद अब कांग्रेसियों का दम घुटने लगा है। लेकिन राहुल गांधी अचानक से अति सक्रिय और आक्रमक हो गए हैं। राहुल एंग्री यंगमैन की भूमिका में दिखाई देने लगे हैं। वो दिखा देना चाह रहे हैं कि वे संसद में बोल भी सकते हैं और जरूरत पड़ने पर संसद की वेल में आकर हाथ ऊपर उठाकर चिल्ला भी सकते हैं।
लेकिन राहुल बाबा की ये नींद काफी देर से खुली, जब राहुल का प्रधानमंत्री बनने का सपना भी चकनाचूर हो चुका था और देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। लोकसभा में कांग्रेस के सदस्यों की संख्या सिर्फ 44 ही रह गई है और दिग्गज कांग्रेसियों का गांधी परिवार के अपने सर्वमान्य नेताओं से विश्वास उठने लगा है ! लेकिन अच्छा है, देर से ही सही, राहुल गांधी की नींद तो टूटी, राहुल गांधी के लिहाज से भी, कांग्रेस पार्टी के लिहाज से भी राहुल की ये सक्रियता और आक्रमकता आवश्यक है। प्रचंड बहुमत वाली सरकार के कामकाज पर नजर रखने के लिए सदन के भीतर ये जरूरी भी है, लेकिन सवाल फिर उठता है कि कांग्रेस में नई जान फूंकने की तैयारी कर रहे राहुल गांधी कि ये सक्रियता, ये आक्रमकता कितने दिन दिखाई देती है। क्या अगले पांच साल तक राहुल गांधी इसी एंग्री यंगमैन की भूमिका में दिखाई देंगे..?  


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गुरुवार, 31 जुलाई 2014

सोनिया गांधी- त्याग की मूर्ति !

राजनीति में त्याग की कहानियां कम ही सुनने को मिलती हैं, 2004 में जब यूपीए सत्ता में आई तो ऐसी ही एक कहानी कही गई कि यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी का त्याग किया है। उस वक्त सोनिया गांधी ने ये कहते हुए प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया था कि ये उनकी अंतरआत्मा की आवाज है। लेकिन कभी कांग्रेस परिवार के करीबी रहे नटवर सिंह की आने वाली आत्मकथा वन लाइफ इज नॉट इनफमें गांधी परिवार से जुड़ी कई बातों का खुलासा होने की उम्मीद है। उनमें से एक खुलासा ये भी है कि सोनिया गांधी ने 2004 में अपनी अंतरआत्मा की आवाज़ पर पीएम बनने से इंकार नहीं किया था बल्कि इसके पीछे राहुल गांधी का डर था।
बकौल नटवर सिंह राहुल गांधी को डर था कि पीएम बनने पर सोनिया गांधी की उनकी दादी इंदिरा गांधी और पिता राजीव गांधी की ही तरह हत्या हो सकती है। मतलब साफ है कि पीएम न बनने का सोनिया गांधी का फैसला सोनिया की अंतरआत्मा की नहीं बल्कि राहुल की अंतरआत्मा की आवाज़ थी, जो सोनिया को प्रधानमंत्री न बनने के लिए कह रही थी। नटवर सिंह ये भी बताते हैं कि सोनिया के पीएम बनने वाली बात को किताब से हटाने के लिए प्रियंका गांधी उनसे मिली थी और सोनिया और राहुल गांधी ने भी उनसे इसको लेकर बात की थी। कांग्रेसी इसे भले ही राजनीति से प्रेरित बता रहे हों, लेकिन सवाल तो उठते ही हैं।
2005 में कांग्रेस से निकाले जा चुके नटवर सिंह की बातों पर विश्वास किया जाए तो ये साफ होता है कि सोनिया जिसे कांग्रेसी उनके इस फैसले के लिए त्याग की मूर्ति कहते हैं, वो दरअसल पीएम बनना चाहती थी लेकिन अपने बेटे राहुल के चलते उन्हें पीछे हटना पड़ा और खुद सोनिया गांधी ने इस फैसले से संसद के सेंट्रल हॉल में सबको ये कहते हुए अवगत कराया था कि वे अपनी अंतरआत्मा की आवाज़ पर पीएम बनने से पीछे पीछे हट रही हैं।
वैसे एक बात और समझ नहीं आती कि वाकई में सोनिया सत्ता नहीं चाहती थी, प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहती थी तो फिर उस वक्त एक ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री क्यों बनाया, जो यूपीए वन और यूपीए 2 के दस साल के कार्यकाल में प्रधानमंत्री होते हुए सिर्फ एक कठपुतली की तरह काम करता रहा जबकि सत्ता का दूसरा केन्द्र सोनिया गांधी ही थी..!
वाकई में अगर सोनिया को सत्ता की चाहत नहीं थी तो क्यों नहीं किसी दूसरे नेता को पीएम नहीं बनाया गया..? यहा जिक्र मनमोहन सिंह का हो रहा है, और इस बात का खुलासा कभी मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू भी अपनी किताब 'द ऐक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर: द मेकिंग ऐंड अनमेंकिंग ऑफ मनमोहन सिंह में कर चुके हैं कि मनमोहन सिंह सिर्फ एक एक्टिंग प्राइम मिनिस्टर ही थे, जबकि सरकार सोनिया गांधी चला रहीं थी..!
सोनिया पीएम बनना चाहती थी लेकिन पुत्र राहुल गांधी की बात नहीं टाल पाई, ऐसे सरकार पर नियंत्रण के लिए सोनिया को पीएम की कुर्सी पर मनमोहन सिंह टाईप नेता ही चाहिए था, जो सोनिया के ईशारे पर काम करता रहे और मनमोहन सिंह ने भी सोनिया गांधी को निराश नहीं किया..!
राजनीति में सत्ता हासिल करने के लिए किसी भी हद तक जाने वाले राजनेता सत्ता का त्याग करें, ये गले नहीं उतरता, फिर सोनिया क्यों अपनी अंतरआत्मा की आवाज पर पीएम की कुर्सी छोड़ती। इसको जयपर में कांग्रेस के चिंतन शिविर में राहुल गांधी के उस बयान से भी समझ सकते हैं, जब कांग्रेस उपाध्यक्ष की कुर्सी संभालते वक्त राहुल ने दिया था। याद होगा आपको राहुल गांधी ने कहा था कि मां ने उनसे कहा था कि सत्ता जहर के समान है।  
है न, हैरत की बात कि बेटा मां को पीएम इसलिए बनने से रोकता है क्योंकि उसे मां की हत्या का डर था, जबकि मां बेटे से कहती है कि सत्ता जहर है, लेकिन उस जहर को पीने के लिए आगे करती है..! अब मां – बेटे की इस थ्योरी को तो सिर्फ कांग्रेसी ही समझ सकते हैं..! वैसे समझने के लिए अभी काफी कुछ बाकी भी बचा है, नटवर सिंह कि आत्मकथा आनी अभी बाकी है। इंतजार कीजिए।

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मंगलवार, 29 जुलाई 2014

हुड्डा पर हाईकमान मेहरबान !

हरियाणा विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़ा है, ऐसे में कांग्रेस और हुड्डा दोनों चाहते हैं कि हरियणा में उनकी सरकार बने लेकिन हरियाणा कांग्रेस के दिग्गज नेता चौधरी बिरेन्द्र सिंह, कुमारी शैलजा समेत ऐसे कांग्रेसियों की लंबी फेरहिस्त है, जो भी चाहते हैं कि सरकार तो कांग्रेस की ही बने लेकिन उन्हें लगता है कि अगर कांग्रेस ने ये चुनाव भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में लड़ा तो कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ेगी।
इसके पीछे इन कांग्रेसियों का ये तर्क है कि हुड्डा का कार्यकाल नाकामियों से भरा है और हुड्डा ने प्रदेश के विकास के लिए कुछ नहीं किया और हुड्डा सरकार का पूरा ध्यान क्षेत्र विशेष के विकास पर ही रहा। इसका खामियाजा कांग्रेस को 2014 के आम चुनाव में भी भुगतना पड़ा था, जब कांग्रेस को राज्य की 10 सीटों में से सिर्फ एक ही सीट मिली जबकि 2009 में कांग्रेस के पास 9 सीटें थी। हरियाणा में कांग्रेस का स्कोर में 10 में से 9 की बजाए सिर्फ एक रह गया। वो भी रोहतक ससंदीय सीट, जहां पर मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के बेटे दीपेन्द्र सिंह हुड्डा ने जीत हासिल की।   
आम चुनाव के बाद आगामी विधानसभा चुनावों में जीत की संजीवनी ढ़ूंढ़ रही कांग्रेस के लिए हरियाणा राज्य इसलिए भी अहम है क्योंकि यहां पर कांग्रेस की सरकार है और कांग्रेस नहीं चाहती कि हरियाणा उसके हाथ से निकल जाए लेकिन हरियाणा कांग्रेस में जो कुछ हो रहा है, उसको देखते हुए तो लगता है कि हरियाणा कांग्रेस के हाथ से निकलना लगभग तय है। हुड्डा के विरोध में बिरेन्द्र सिंह और कुमारी शैलजा जैसे दिग्गज पहले ही विरोध का झंडा बुलंद करने में कोई कसर नहीं छोड रहे थे, ऐसे में अब हुड्डा के हालिया फैसलों ने कांग्रेस की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।
हुड्डा अब हरियाणा में स्टेट इन्फर्मेशन कमिशन के नए सदस्यों और राइट टु सर्विस कमिश्नरों की विवादास्पद नियुक्तियों को लेकर चौतरफा घिर गए हैं। हुड्डा पर इन नियुक्तियों में नियमों का ताक पर रखने का आरोप लगा है। हुड्डा सरकार में ही बिजली मंत्री अजय यादव ने उन पर आरोप लगाते हुए इस्तीफा दे दिया है। यादव हुड्डा के लिए यह तक कह बैठे कि किसी को तो बिल्ली के गले में घंटी बांधनी ही थी, यह काम मैंने कर दिया। साथ ही प्रशासनिक सुधार विभाग के सचिव प्रदीप कासनी ने भी नियुक्तियों पर सवाल उठाते हुए इस पर दस्तखत करने से इंकार कर दिया। मामला यहीं थम जाता तो ठीक था लेकिन हरियाणा के मुख्य सचिव एससी चौधरी ने तो दस्तखत न करने पर आईएएस प्रदीप कासनी को धमकी भरा एसएमएस तक भेज दिया। मुख्य सचिव एसएमएस में लिखते हैं कि - 'गुड नाइट...प्लीज सेलिब्रिटी वाली हैसियत इंजॉय करो...लेकिन, अपनी मां का दूध पिया है तो मेरे सारे मेसेज प्रेस को दिखा देना।' ना नुकुर के बाद मुख्य सचिव ने एसएमएस के लिए माफी तो मांग ली, लेकिन इसने हुड्डा सरकार की जमकर किरकिरी हुई है।
मुख्यमंत्री हुड्डा विवादों में हैं, अपनी ही पार्टी के नेताओं के निशाने पर हैं लेकिन बकौल हुड्डा उनकी सरकार के सारे फैसले सही हैं। हुड्डा कहते हैं कि उनकी सरकार ने हरियाणा के विकास के लिए इतना काम किया, जितना अब तक किसी सरकार ने नहीं किया। हुड्डा इसे साबित करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं, यकीन न आए तो हरियाणा के किसी भी समाचार चैनल और अख़बार, मैग्जीन पर एक निगाह डाल लिजिए, समझ जाएंगे कि हुड्डा कैसे सरकारी विज्ञापनों के जरिए हरियाणा को नंबर वन बना रहे हैं। करोड़ों रूपया सिर्फ इस बात पर खर्च किया जा रहा है कि हुड्डा का गुणगान किया जा सके, हरियाणा को विज्ञापनों में नंबर वन दिखाया जा सके लेकिन हुड्डा साहब को कौन समझाएं कि विज्ञापनों से वोट नहीं मिला करते।
एक बात और समझ नहीं आई, शायद हुड्डा जी ही समझा पाएंगे कि जब उनके मुताबिक उनकी सरकार ने हरियाणा में विकास की बयार बहाई है, हरियाणा को नंबर वन बनाया है, तो फिर ये सब हरियाणा की जनता को विज्ञापनों में करोड़ों रूपए खर्च कर ढ़िंढ़ोरा पीट पाटकर बताने की जरूरत क्यों पड़ रही है, बेहतर होता कि इस पैसे को भी हरियाणा के विकास पर ही खर्च करते।
हैरान करने वाली बात तो ये है कि हरियाणा में कांग्रेस नेताओं की अपसी जंग का अखाड़ा बनी हुई है, लेकिन कांग्रेस आलाकमान खामोश है। मुख्यमंत्री हुड्डा के खिलाफ कांग्रेस के कई दिग्गज मोर्चा खोलकर बैठे हैं, लेकिन कांग्रेस आलाकमान को हुड्डा से कोई शिकायत नहीं है। वो भी ऐसे वक्त पर जब आम चुनाव में अपने अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रही कांग्रेस के लिए हरियाणा का विधानसभा चुनाव सबसे अहम है। वजह चाहे जो भी हो, लेकिन सियासी गलियारों में तो यही चर्चाएं हैं कि कहीं मुख्यमंत्री हुड्डा पर कांग्रेस आलाकमान की मेहरबानी की वजह सोनिया गांधी के दाबाद राबर्ट वाड्रा तो नहीं है।

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रविवार, 27 जुलाई 2014

बिहार – दुश्मन का दुश्मन दोस्त !

राजनीति में राज करने का मौका न मिले तो फिर राजनीति करना व्यर्थ है। वैसे भी राजनीति में विरले ही ऐसे होते हैं, जो सत्ता सुख न भोगना चाहते हों, फिर इसके लिए उन्हें किसी भी हद तक क्यों न जाना पड़े। आम चुनाव के बाद बिहार में नीतिश कुमार की जदयू, लालू की राजद का जो हाल हुआ उसके बाद दोनों को भी शायद ये समझ में आ ही गया है। बिहार में विधानसभा की 10 सीटों पर होने जा रहे उपचुनाव से पहले कभी एक दूसरे के धुर विरोधी रहे लालू और नीतिश की जुगलबंदी बताती है कि सत्ता के लिए वे किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। हालांकि दोनों का ये याराना नया नहीं है और कभी दोनों साथ हुआ करते थे लेकिन बदलते वक्त के साथ दोनों एक – दूसरे के राजनीतिक दुश्मन बन गए थे और एक दूसरे पर कीचड़ उछालने तक का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। जिस बिहार में कभी नीतिश को लालू राज किसी जंगलराज की तरह नजर आता था, वही नीतिश अब अपनी नई दुश्मन भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए लालू के साथ जुगलबंदी करने से तक परहेज नहीं कर रहे हैं। पीएम के लिए नरेन्द्र मोदी के नाम पर भाजपा का दामन छोड़ने वाले नीतिश को शायद उस वक्त ये एहसास तक नहीं होगा कि उनका ये फैसला उन्हें अपने पुराने समाजवादी साथी लालू प्रसाद यादव के करीब ले आएगा।   
हाल ही में हुए आम चुनाव में मोदी लहर में बिहार में जो हाल सत्ताधारी जदयू का हुआ था उसके बाद आगामी विधानसभा चुनाव में अपनी नई दुश्मन भाजपा को हराने के लिए नीतिश कुछ भी करने को तैयार दिखाई दे रहे हैं। आम चुनाव में राज्य में सत्तासीन होने के बाद भी 40 में सिर्फ दो सीट जीतने वाली जदयू को शायद डर है कि ऐसा ही हाल विधानसभा उपचुनाव और फिर उसके बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी का न हो। इसलिए ही घबराए नीतिश कुमार अब भाजपा को हराने के लिए राज्य में राजद और कांग्रेस से तक हाथ मिलाने में परहेज नहीं कर रहे हैं। हालांकि हश्र तो बिहार में लालू की राजद और कांग्रेस का भी कुछ जदयू जैसा ही हुआ है। राजद जहां सिर्फ 4 सीटें जीत पाई थी, वहीं कांग्रेस को बिहार में सिर्फ 2 सीट से ही संतोष करना पड़ा था। ऐसे में क्यों न राजद और कांग्रेस नीतिश का ये ऑफर ठुकराते..?
राज्य में आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए तीनों क्यों न हाथ मिलाते..?
भाजपा या कहें मोदी लहर का तीनों ही पार्टियों को कि कदर डर सता रहा है इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि भाजपा को टक्कर देने के लिए कुछ ही दिनों में बिहार की 10 विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव में जदयू, राजद और कांग्रेस में गठबंधन हो गया है, जिसमें 4 सीटों पर जदयू, चार सीटों पर राजद तो 2 सीटों पर कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया है।
कहते हैं दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, बिहार में जदयू, राजद और कांग्रेस का हालिया गठबंधन तो कम से कम इसी ओर ईशारा कर रहा है, ऐसे में अब देखना रोचक होगा कि इन तीनों की जुगलबंदी उपचुनाव में क्या गुल खिलाती है। देखना तो ये भी रोचक होगा कि बिहार की जनता इस नए राजनीतिक दोस्ती के क्या मायने निकालती है, और उपचुनाव में क्या फैसला सुनाती है।
हालांकि राह तो भाजपा की भी इतनी आसान नहीं है। भाजपा को भी इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि वो आम चुनाव जैसे परिणाम बिहार में फिर से दोहरा सकती है, क्योंकि महंगाई की मार के तले दबी जनता उपचुनाव के जरिए अपना गुस्सा दिखा सकती है, जैसे कि हाल ही में उत्तराखंड में देखने को मिला जहां भाजपा को विधानसभा की तीन सीटों पर हुए उपचुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा।


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शनिवार, 26 जुलाई 2014

यूपी - दंगे और सियासत !

उत्तर प्रदेश में अपराध का ओवरफ्लो थमने का नाम नहीं ले रहा था कि मुरादाबाद के बाद अब सहारनपुर में भी दो गुटों में हुई हिंसक झड़प ने विकराल रूप ले लिया। सूबे की सरकार का अपराध पर नियंत्रणहो या न हो, लेकिन इस बहाने राजनीति खूब हो रही है। मुरादाबाद के बाद सहारनपुर की घटना और उस पर सियासी बयानबाजी तो कम से कम इसी ओर ईशारा कर रही है। यूपी में अपराध को अगर एक पल के लिए किनारे कर भी लिया जाए तो उसके अलावा जो कुछ हो रहा है, वह विशुद्ध रूप से राजनीति ही है। राजनीतिक दलों के नेता अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। मुरादाबाद के कांठ में छोटी सी घटना का विकराल रुप ले लेना। इसके बाद सहारनपुर में दो गुटों में हिंसक संघर्ष की ताजा घटना भी इस ओर ईशारा कर रही है। जैसी की ख़बरें हैं कि इस खूनी संघर्ष से पहले कांग्रेस के कुछ नेताओं ने भड़काऊ बयानबाजी से माहौल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, ये बताने के लिए काफी है कि अपने सियासी फायदे के लिए लोगों को लड़वाने में, जैसे कि ये हमेशा से करते आए हैं, ये राजनीतिक दल कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। जाहिर है इस हिंसक घटना को होने से रोका जा सकता था, लेकिन सियासतदान अपने मंसूबों में कामयाब हो गए। एक महीने से मुरादाबाद में सुलग रही चिंगारी को कैसे भुलाया जा सकता है, और उस जो सियासत हो रही है, उसको कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है, फिर चाहे वो भारतीय जनता पार्टी हो, कांग्रेस हो या फिर सत्ताधारी समाजवादी पार्टी या कोई और राजनीतिक दल।
इन घटनाओं को होने देने के लिए नैतिक तौर पर जिम्मेदार यूपी की सत्ताधारी समाजवादी पार्टी के नेता नरेश अग्रवाल के इस भय को भी जरा समझने की कोशिश कीजिए। अग्रवाल कहते हैं कि यूपी में राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए भारतीय जनता पार्टी साजिश रच रही है और इन सब घटनाओं के लिए भाजपा ही जिम्मेदार है। अग्रवाल की बातों में कितना सच है, ये तो वही जानें लेकिन अग्रवाल साहब ये सब कहकर आपकी सरकार अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। आप दूसरों को दोष देते रहो, कि इसके लिए ये जिम्मेदार है, इसके लिए वो जिम्मेदार है लेकिन अग्रवाल साहब आपकी सरकार क्या कर रही है, क्या वह यूपी की जनता के लिए जिम्मेदार नहीं है। क्या यूपी में जो कुछ हो रहा है, उसको रोकने के लिए राज्य में शांति और सदभाव स्थापित करने के लिए अखिलेश सरकार जिम्मेदार नहीं है। आप अपने सुरक्षित घरों में बैठकर अपने विरोधियों को कोस रहे हो, और यूपी सुलग रहा है, लोग मर रहे हैं, लोग खौफ के साए में जीने को मजबूर हैं, लेकिन आपको इससे कोई सरोकार नहीं है क्योंकि इनमें शायद आपका कोई अपना नहीं है न।
काश इन नेताओं के उकसावे में आने वाले वो लोग भी समझ पाते कि नेता तो अपनी सियासी रोटियां सेंक रहे हैं और जिंदगी नर्क हो रही है उनकी। ये लोग नहीं क्यों नहीं समझ पाते कि इऩ घटनाओं में अपनी जान गंवाने वाला कभी भी एक नेता क्यों नहीं होता है..?  क्यों आम आदमी इस नफरत की आग में झुलस कर अपनी जान गंवाता है..? शायद जिस दिन ये बात समझ जाएं, उस दिन काफी हद तक हालात सुधर भी जाएं, लेकिन क्या ये कभी होगा..?
वैसे नरेश अग्रवाल की बात में कितनी सच्चाई है, कहा तो नहीं जा सकता लेकिन यकीन मानिए राजनीति में कुछ भी संभव है।


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