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शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

उपचुनाव- हवा हुई मोदी लहर !

उत्तराखंड के सीएम हरीश रावत ने आखिर डर के आगे जीत का सफर पूरा कर ही लिया। सोमेश्वर और डोईवाला दो विधानसभा सीटें खाली होने के बाद भी धारचूला विधानसभा सीट खाली करवा कर वहां से चुनाव लड़ रहे हरीश रावत ने चुनाव जीतकर न सिर्फ मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है बल्कि उपचुनाव में 3-0 से क्लीन स्वीप कर एक तरह से राज्य में मोदी लहर की भी हवा निकाल दी है। 70 सीटों वाली उत्तराखंड विधानसभा में कांग्रेस सदस्यों की संख्या 32 से बढ़कर अब 35 हो गई है, जाहिर है बसपा और निर्दलीय विधायकों की बैशाखी के सहारे खड़ी रावत सरकार भी अब उत्तराखंड में मजबूत स्थिति में आ गई है। (पढ़ें - एक मुख्यमंत्री का डर !)
हार के डर के साथ चुनाव मैदान में उतरे हरीश रावत के लिए जीत की खुशी सबसे ज्यादा होगी क्योंकि जिन हालात में हरीश रावत ने उत्तराखंड के सीएम की कुर्सी संभाली और जिस मोदी लहर में आम चुनाव में उत्तराखंड में कांग्रेस का 5-0 से सफाया हो गया था, उस हालात में तीन सीटों पर उपचुनाव कांग्रेस के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था, शायद इसलिए ही रावत ने खाली पड़ी दो सीटों डोईवाला और सोमेश्वर से चुनाव लड़ने की बजाए अपने लिए सेफ सीट चुनी और धारचूला सीट को अपने ही खास विधायक हरीश धामी से खाली करवाया।
वैसे इन नतीजों की उम्मीद हरीश रावत ने भी नहीं की होगी वरना रावत धारचूला की बजाए डोईवाला या सोमेश्वर से चुनाव लड़ रहे होते। सीएम की कुर्सी में बैठने के बाद से ही मुश्किलों में जूझ रहे हरीश रावत के लिए तो फिलहाल ये जीत संजीवनी की तरह आई है या कह सकते हैं कि रावत के लिए अच्छे दिन लेकर आई है, लेकिन उत्तराखंड में रावत के सामने चुनौतियां कम नहीं है।
बीते साल केदारनाथ आपदा के दौरान मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार की नाकामी के दागों को धोकर आगे बढ़ना हरीश रावत के लिए आसान नहीं होगा, वो भी ऐसे वक्त पर जब आपदा के एक साल बाद भी सरकार की नाकामी और निकम्मेपन के सबूत लाशों के तौर पर सामने आ रहे हैं।  बहरहाल उम्मीद करते हैं उपचुनाव में जीत की संजीवनी के बाद अब हरीश रावत बहुगुणा के रास्ते पर न चलते हुए उत्तराखंड के विकास के लिए काम करेंगे, जैसा की हरीश रावत कहते आए हैं।
उत्तराखंड में 3-0 से कांग्रेस के पक्ष में उपचुनाव के नतीजे सिर्फ कांग्रेस के लिए ही अच्छे दिन नहीं लाए बल्कि भाजपा के लिए भी बुरे दिन की शुरुआत की तरह है। आम चुनाव में प्रचंड बहुमत से केन्द्र की सत्ता में आने वाली भाजपा ने शायद ही सोचा होगा कि मोदी लहर का असर दो महीने में ही काफूर हो जाएगा। उत्तराखंड के उपचुनाव में भाजपा शायद अति आत्मविश्वास से लबरेज थी लेकिन नतीजों ने उसे जमीन पर ला दिया है। जाहिर है आम जनता की जेब पर महंगाई की मार ने अपना असर तो दिखाया है, और ये असर जनता की नाराजगी के रूप में सामने आया है।
अहम बात ये है कि कुछ ही दिनों में कई राज्यों में खाली हुई सीटों पर उपचुनाव होना है और इसके साथ ही हरियाणा, महाराष्ट्र के साथ ही दिल्ली में भी विधानसभा चुनाव होने की संभावना है। जाहिर है उत्तराखंड में 3-0 की हार भाजपा के माथे पर बल लाने के लिए काफी हैं। हालांकि उत्तराखंड के उपचुनाव के नतीजों के आधार पर भविष्य में होने वाले चुनाव के नतीजों की भविष्यवाणी तो नहीं की जा सकती लेकिन इन नतीजों को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।


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बुधवार, 23 जुलाई 2014

सवाल, सांसद की रोटी का है !

सारी लड़ाई तो रोटी की ही है, ऐसे में रोटी खराब मिली तो क्यों न हंगामा करते शिवसेना के सांसद। आखिर इतनी मेहनत जो करते हैं, हमारे माननीय सांसद, दिनभर संसद में जी-तोड़ मेहनत करने के बाद शाम को आराम से रोटी खाने के लिए बैठे थे, ऐसे में रोटी भी ऐसी रबड़ सरीखी निकली जो हलक में ही न उतरे तो गुस्सा तो आएगा ही न। कितनी मेहनत करते हैं, हमारे माननीय सांसद इसका नजारा भी आज ही संसद में देखने को मिला जब रोटी और रोजेदार के मुद्दे पर हमारे माननीय एक दूसरे को सबक सिखाने के लिए बांह चढ़ाते तक देखे गए।
महाराष्ट्र सदन में जो हुआ और उसके बाद संसद में जो हुआ उसके लिए बहुत ज्यादा हैरानी नहीं होनी चाहिए, आखिर हमारे माननीय सांसदों की रोटी का जो सवाल था, फिर सामने वाले को हमारे सासंद सबक न सिखाएं, ऐसे हो सकता है भला ! वो भी तब जब ये सासंद शिवसेना के हों !
सांसदों की हरकत ने तो हैरान नहीं किया, लेकिन ये पूरा घटनाक्रम परेशान जरूर करता है। रमजान के पाक महीने में एक रोजेदार को जबरन रोटी खिलाने की कोशिश करना परेशान करता है। उससे भी ज्यादा परेशान करता है, इस मुद्दे को राजनीतिक रंग देने की कोशिश करना।
पहले तो ये सब होना नहीं चाहिए था, अगर माना आवेश में सांसदों ने ये सब कर भी दिया, तो माफी मांगकर कोई छोटा नहीं हो जाता। सांसद चाहते तो इस मुद्दे पर माफी मांग कर इसका पटाक्षेप कर सकते थे, लेकिन दिनभर इस पर अपने अपने हिसाब से लोग राजनीति करते रहे और जब तक शिवसेना सांसद ने घटनाक्रम पर माफी नहीं खेद जताया, तब तक बहुत देर हो गयी थी।
अच्छा लगता अगर हमारे माननीय सांसद किसी गरीब को रात को भूखा न सोना पड़े, इसके लिए इतनी दिलचस्पी दिखाते। किसी भूखे को रोटी खिलाने के लिए कभी लड़ाई लड़ते।
बड़ा अजीब लगता है, जिस देश में हर रोज भूख से कई मौतें होती हों, वहां पर इन भूखे लोगों को दो वक्त की रोटी नसीब हो, इसके लिए कोई सांसद कभी इतनी संजीदगी से प्रयास नहीं करता। लेकिन जब बात अपनी रोटी की आती है, तो ये कुछ भी करने से गुरेज नहीं करते। ये किसी भी हद तक जा सकते हैं, लेकिन अपने लिए, उसके लिए नहीं जिसकी वजह से ये लोग संसद तक पहुंच पाते हैं।
हां, वोट के लिए जब इनके पास जाना हो, तो वादों की झड़ी लगाने में देर नहीं करते लेकिन उनके हक की आवाज उठाने में, उनके हक की लड़ाई लड़ने में ये कहीं पीछे छूट जाते हैं।



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मंगलवार, 22 जुलाई 2014

रेप, ये कोई ख़बर है !

एक स्कूल में छह साल की बच्ची से रेप हो जाता है, लेकिन कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया विधानसभा में इस घटना पर बहस के दौरान खर्राटे भरते हैं, हद तो तब हो जाती है, जब रेप के घटना पर मुख्यमंत्री से सवाल पूछने पर सीएम साहब जवाब देते हैं कि क्या आपके पास कोई और ख़बर नहीं है..? दरअसल सीएम साहब नहीं चाहते कि 6 साल की मासूम के साथ हुई इस घिनौनी वारदात पर कोई उनसे सवाल करे। हालांकि सिद्धरमैया बाद में दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की बात भी करते हैं, लेकिन इस सवाल पर सिद्धरमैया का रिएक्शन बताने के लिए काफी है कि सीएम साहब के लिए स्कूल में मासूम के साथ रेप की घटना एक मामूली सी वारदात है। इस लिए ही सीएम साहब के लिए ये वारदात ख़बर बनने लायक तक नहीं है, इस लायक भी नहीं कि कोई पत्रकार उनसे इस घटना पर सवाल तक करे।
वैसे इसका अंदाजा तो उस दिन ही लग गया था, जब सीएम सिद्धरमैया रेप की इस घटना पर चर्चा के दौरान विधानसभा में खर्राटे भर रहे थे। मुख्यमंत्री सिद्धरमैया को मतलब नहीं था कि एक मासूम के साथ क्या बीती है, उसके साथ स्कूल में क्या दरिंदगी हुई है, उन्हें फर्क नहीं पड़ता, शायद उनसे उनका कोई रिश्ता नहीं था। होता तो शायद इस घिनौनी वारदात पर सिद्धरमैया का ये रवैया नहीं होता।
यूपी से लेकर कर्नाटक तक बच्चियों और महिलाओं के साथ दरिंदगी हो रही है, लेकिन अपराध और अपराधियों पर लगाम कसने की जिम्मेदारी संभालने वालों के लिए रेप की वारदातें सिर्फ एक मामूली अपराध भर है। वे रेप की घटना पर ऐसे रिएक्ट करते हैं, जैसे कुछ हुआ ही नहीं, यूपी के नेताजी इसे आबादी के तराजू में तौल कर इससे पल्ला झाड़ने की कोशिश करते हैं तो एक राज्यपाल महोदय के अनुसार रेप को रोकना भगवान के बूते की भी बात नहीं है। कर्नाटक के सीएम के लिए भी ये एक मामूली सी वारदात ही तो है, जिसका जिक्र भी करना उनका पारा चढ़ा देता है।
जनता ने चुना तो इन्हें इस भरोसे था कि ये एक भयमुक्त समाज के निर्माण में सहायक बनेंगे, लेकिन जब कानून बनाने वाले ही अपने बेतुके और संवेदनहीन बोलों से अपराधियों का हौसला बढ़ाएंगे तो फिर इनसे और क्या उम्मीद की जा सकती है।


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सोमवार, 21 जुलाई 2014

कुरैशी, भगवान और रेप

उत्तर प्रदेश में रेप पर सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह के कठोर बोल की गूंज कम भी नहीं हुई थी कि यूपी और उत्तराखंड के राज्यपाल अजीज कुरैशी साहब के विवादित बोल फूट पड़े। कुरैशी साहब कहते हैं कि पुलिस और सेना को लगा दिया जाए तब भी रेप नहीं रोके जा सकते। कुरैशी साहब यहीं नहीं रूके, वे कहते हैं कि भगवान भी उतर कर जमीन पर आ जाएं तो भी रेप नहीं रोक सकते।
ये वही कुरैशी साहब हैं, जो एक दिन पहले ही रेप की घटनाओं के सवाल पर पत्रकारों को कहते हैं कि आप बिरयानी और कबाब का मजा लीजिए। कुरैशी साहब, मतलब यूपी में जो हो रहा है, वो सब ठीक हो रहा है। महिलाओं की आबरू लुट रही है, तो वह ठीक हो रहा है। फिर आप क्यों बैठे हैं वहां, सरकार क्या कर रही है, आप तो पहले ही मानकर बैठे हैं कि महिलाओं के खिलाफ अपराध को सरकार, पुलिस और सेना तक नहीं रोक सकती, और तो और भगवान धरती पर आ जाएं तो वह भी नहीं रोक सकते। अखिलेश यादव को कुर्सी छोड़ेंगे नहीं, उनके पिताजी और सरकार के सर्वे सर्वा मुलायम सिंह तो कहते हैं कि लड़कों से गलती हो जाती है, मुलायम सिंह कहते हैं कि अपराध हो रहे हैं तो क्या हुआ, वो तो पिछली सरकार के कार्यकाल में भी हो रहे थे (पढ़ें - छलनी भी बोले जिसमें 72 छेद..!)। मुलायम सिंह अब कहते हैं कि 21 करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश में आप रेप की घटनाओं को नहीं रोक सकते। (पढ़ें - नेता जी, आबादी और रेप)।
कुरैशी साहब आप ही छोड़ दीजिए न अपनी कुर्सी, वैसे आप क्यों छोड़ेंगे कुर्सी, कांग्रेस पार्टी की भक्ति का इनाम के रूप में आपको राजभवन का सुख भोगने का जो मौका मिला है, जो राजनीति में आप जैसे पार्टी भक्त लोगों को ही मिलता है। कुरैशी साहब से मेरी उत्तराखंड राजभवन में इंउस वक्त मुलाकात हुई थी, जब कुरैशी साहब नए-नए उत्तराखंड के राज्यपाल बनकर आए थे। उस वक्त इंटरव्यू के दौरान कई मसलों को लेकर कुरैशी साहब ने राज्य में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद सरकार की खूब आलोचना की थी। उस वक्त कुरैशी साहब से बात करके लगा था कि ये सिर्फ रबर स्टेंप का काम नहीं करेंगे बल्कि सरकार के गलत फैसलों पर पैनी निगाह रखेंगे लेकिन ये भ्रम भी खुद कुरैशी साहब ने आज तोड़ दिया। कम से कम जिस पद पर कुरैशी साहब हैं, वहां बैठे हुए किसी व्यक्ति से रेप जैसे मसले पर ऐसे संवेदनहीन बयान की उम्मीद तो नहीं की जा सकती।


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शनिवार, 19 जुलाई 2014

नेता जी, आबादी और रेप

सूप बोले तो बोले, छलनी भी बोले जिसमें 72 छेद, 2013 में यूपी में पुलिस अधिकारी जिया उल हक की हत्या के बाद सपा सरकार पर सवाल उठने लगे तो सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव कुछ ऐसा ही बोले थे। दरअसल नेता जी सपा सरकार पर बसपा के आरोपों पर खिसयाए हुए थे, और सपा सरकार के कार्यकाल की तुलना बसपा सरकार के कार्यकाल में हुए अपराधों से करते हुए अखिलेश सरकार का बचाव कर रह थे। मुलायम सिंह के इस बयान का सीधा सा मतलब था कि पिछली सरकार में हुए अपराध उनकी सरकार को भी यही सब करने का लाइसेंस दे देता है। (पढ़ें - छलनी भी बोले जिसमें 72 छेद..!)
उस वक्त लगा था कि शायद अखिलेश सरकार की नींद टूटेगी और अखिलेश राज में यूपी में हालात बेहतर होंगे और अपराधियों पर लगाम कसने के साथ ही अपराध का ग्राफ भी नीचे आएगा लेकिन सवा साल बाद भी यूपी में हालात जस के तस हैं, या कहें कि हालात और भी बदतर हो गए हैं। बदायूं रेप कांड हो या फिर अब राजधानी लखनऊ में महिला की गैंगरेप के बाद निर्मम हत्या, ये घटनाएं बयां करने के लिए काफी है कि उत्तर प्रदेश में अपराधियों में पुलिस का कितना खौफ है ?
अपराधी बेलगाम है और सरकार के पास शायद आम जनता की सुरक्षा सुनिश्चित कराने से भी ज्यादा और बहुत काम है। इसलिए अपराधों का ग्राफ लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इस पर सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह का ये कहते हुए सरकार का बचाव करना कि 21 करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश में आबादी के लिहाज से अपराध बहुत कम है, ये जाहिर करता है कि न ही मुलायम सिंह को न ही अखिलेश सरकार को आम जनता से कोई सरोकार है। मुलायम सिंह के बयान से तो यही लगता है कि शायद वे आबादी के हिसाब से अपराध का ग्राफ बढ़ने का इंतजार कर रहे हैं ताकि इसके बाद अपराधियों पर लगाम कसी जाए। उन्हें अपराध नहीं दिखाई देते, उन्हें अपराध का अनुपात दिखाई देता है, जो बकौल मुलायम सिंह अन्य राज्यों की अपेक्षा काफी कम है। मुलायम सिंह जी अगर एक भी महिला के साथ ज्यादती हो रही है, एक भी शख्स की अगर हत्या हो रही है तो इस पर आपको सोचना चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है, और अगर हो भी रहा है तो भी पुलिस क्या कर रही है, अपराधियों में कानून का खौफ क्यों नहीं है, और सबसे बड़ी बात कि बार बार ये सब होने के बाद भी अखिर सरकार की नींद क्यों नहीं टूट रही है। आम चुनाव के नतीजों के बाद लगा था कि शायद अब आपका और आपकी सरकार का भ्रम टूटेगा लेकिन इससे भी शायद आपको अक्ल नहीं आई।
महिला की गैंगरेप के बाद निर्मम हत्या के बाद आप दोषियों पर कार्रवाई की बजाए ये कहते हो कि आबादी के हिसाब से यूपी में अपराध कम है। शर्म करो, मुलायम जी, शर्म करो अखिलेश सरकार, शर्म करो।

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गुरुवार, 10 जुलाई 2014

बजट, मूर्ति और 200 करोड़

वित्त मंत्री अरुण जेटली के बजट पेश करने के बाद जेटली को मोदी की शाबाशी मिल रही है तो विपक्ष इसे खोदा पहाड़ निकली चुहिया की संज्ञा दे रहा है। आयकर में छूट की उम्मीद लगाए बैठे लोगों को छूट के रूप में अच्छी ख़बर तो मिली लेकिन उनकी उम्मीद से कम। हालांकि अधिकतर अर्थशास्त्रियों की नजर में यह एक संतुलित बजट है, उनके मुताबिक इसमें हर क्षेत्र और वर्ग को सम्मिलित किया गया है। आयकर छूट की सीमा ढ़ाई लाख करने और 80 सी के तहत निवेश की सीमा डेढ़ लाख करने और पीपीएफ में निवेश की अधिकतम सीमा डेढ़ लाख करने से करदाताओं को राहत तो मिली है लेकिन उम्मीद इससे कहीं ज्यादा की थी। 
इसी तरह नमामि गंगा योजना के लिए 2037 करोड़ का प्रावधान किया गया है तो
4 नए एम्स बनाने के लिए 500 करोड़ रुपये, हर राज्य में एक एम्स खोलने का लक्ष्य। 5 नए आईआईटी और 5 नए आईआईएम के लिए 500 करोड़ रुपये समेत कई और योजनाएं शुरु किए जाने की बात कही गई है। ठीक है सारी चीजें समझ में आती हैं, ये बात भी ठीक है कि सबको खुश नहीं किया जा सकता।
लेकिन गुजरात में सरदार बल्लभ भाई पटेल की मूर्ति निर्माण के लिए 200 करोड़ का प्रवधान करना गले नहीं उतरता। मोदी सरकार का ये मूर्ति प्रेम समझ से परे है। सिर्फ मूर्ति प्रेम पर 200 करोड़ रूपए खर्च करना कहां तक तर्कसंगत है। वो भी ऐसे वक्त में जब मोदी सरकार का हर एक कारिंदा ये कहकर सरकार का बचाव कर रहा है कि देश की अर्थव्यवस्था मरणासन्न अवस्था में है। याद कीजिए जब उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती का मूर्ति प्रेम हिलोरे मार रहा था उस वक्त इसकी आलोचना करने में भाजपा पीछे नहीं थी लेकिन अच्छे दिन का इंतजार कर रही जनता की गाढ़ी कमाई के बड़े हिस्से को अब मूर्ति के लिए खर्च करने का मोदी सरकार के फैसले पर भाजपाई खामोश हैं। जाहिर है एक मूर्ति से जरूरी आमजन से जुड़े कई ऐसे काम हैं, जहां पर पैसे खर्च किए जाने की जरूरत है, लेकिन अफसोस सरकार की प्राथमिकता में मूर्ति है। प्रधानमंत्री का कहना है कि बजट मरणासन्न अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी का काम करेगी और अच्छे दिन आने का मार्ग प्रशस्त होगा। मोदी जी भले ही अच्छे दिन आने का भरोसा दिला रहे हों लेकिन इतना तो तय है कि कम से कम मूर्ति पर 200 करोड़ रूपए खर्च करने जैसे फैसलों से तो आम जनता के अच्छे दिन नहीं आने वाले।

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बुधवार, 9 जुलाई 2014

राहुल बाबा को सोने दो न प्लीज

हद होती है किसी चीज की भी, अरे भई राहुल बाबा ने एक झपकी ही तो ली न संसद में, हंगामा मचाकर रखा है। कौन सा पहाड़ टूट पड़ा है। वैसे भी 10 साल तक जब सरकार में थे तब तो गिनती के दिन ही संसद में दिखाई दिए थे। कितना काम करते थे उस वक्त। संसद में तक आने की फुर्सत नहीं मिलती थी। कभी किसी दलित की झोपड़ी में खाना खाने पहुंच जाते थे, कभी मजदूरों का दर्द जानने निकल पड़ते थे। कभी दागियों तो बचाने वाले अध्यादेश को किसी हीरो की तरह फाड़ देते थे।
अब जब जनता ने फिलहाल पांच साल तक आराम करने की सलाह दी है, तो क्या संसद में एक झपकी लेना भी गुनाह हो गया। कभी भावनाओं को भी तो समझा करो, क्या राहुल बाबा का मन नहीं करता होगा आराम करने का, आखिर इतना काम करते हैं, तो चैन की नींद तो बनती है न। आम चुनाव में कितनी मेहनत की, एक एक दिन में कई कई चुनावी रैलियां की, कांग्रेस की जीत के लिए जी तोड़ मेहनत की। इस बार तो अमेठी में अपने लिए वोट मांगने तक गए और इसका फल भी मिला और अमेठी से चुनाव जीत भी गए। ठीक है सरकार नहीं बना पाए तो क्या हुआ आम चुनाव में 44 सीटें जीतकर आई है कांग्रेस। मजाक बात है 44 सीटों पर फतह हासिल करना, अब अन्नाद्रमुक को देखो कुल 37 ही सीट जीत पाई, तृणमूल कांग्रेस को देखो कुल 34 सीट ही जीत पाई। जबकि समाजवादी पार्टी तो सिर्फ 5 ही सीट जीत पाई और बसपा का तो खाता भी नहीं खुला। इन सब से कितनी आगे है कांग्रेस। चलो कोई और काम करो, राहुल बाबा के सोने पर अब ज्यादा हल्ला मत मचाओ, अरे नींद से जाग जाएंगे बाबा।   

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मोदी सरकार, अमित शाह और अच्छे दिन


अच्छा है, आम जनता के नहीं तो क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खासम खास अमित शाह के तो अच्छे दिन आ ही गए। अमित शाह आखिरकार भाजपा महासचिव से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जो हो गए हैं। अमित शाह के अध्यक्ष बनने के बाद से लेकर तमाम तरह की बातें हो रही हैं। मसलन सरकार के बाद अब पार्टी पर भी मोदी के करीबी शाह काबिज हो गए हैं, लेकिन जो भी हो 2014 के आम चुनाव में दिल्ली की सत्ता का रास्ता तैयार करने वाले देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में प्रभारी रहते हुए भाजपा को 80 में से 71 सीटें दिलाने में अमित शाह की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता, भाजपा के लिए तो ये किसी चमत्कार से कम नहीं था। हालांकि राजस्थान, गुजरात, दिल्ली समेत कई और राज्यों में भाजपा ने क्लीन स्वीप करते हुए शानदार प्रदर्शन किया लेकिन अपने दम पर 282 की संख्या को हासिल करना यूपी में बड़ी जीत के बूते ही संभव था, जो कि अमित शाह ने कर दिखाया। ये वही राज्य था जहां पर भाजपा अपनी जमीन खो चुकी थी, लेकिन मोदी लहर और शाह की चुनावी रणनीतियों ने भाजपा के लिए ये काम एकदम आसान कर दिया। हालांकि यूपी में भाजपा का प्रदर्शन इतना शानदार रहेगा इसकी उम्मीद शायद ही भाजपा और अमित शाह दोनों को रही होगी, लेकिन ये हुआ और भाजपा ने यूपी में 71 सीटों पर विजय पताका फहराई।
अब भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिहं के गृहमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद निकट भविष्य में महाराष्ट्र, हरियाणा समेत दूसरे राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा के सामने राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए वैसे भी अमित शाह से बेहतर विकल्प था भी नहीं। अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचने के लिए शाह की मदद उनके शानदार ट्रैक रिकार्ड ने भी की(सोहराबुद्दीन और तुलसी प्रजापति एनकाउंटर मामला छोड़कर) जो बताता है कि न सिर्फ शाह खुद अब तक कोई चुनाव हारे हैं बल्कि एक बेहतर रणनीतिकार के तौर पर उन्होंने कई मौकों पर खुद को साबित भी किया है, फिर चाहे आडवाणी और वाजपेयी का चुनावी प्रबंधन हो या फिर आम चुनाव में यूपी में भाजपा का परचम लहराने की बात।
जाहिर है शाह के भाजपा अध्यक्ष बनने से सरकार और संगठन के बीच तालमेल भी बेहतर रहेगा क्योंकि शाह से मोदी की करीबीयां किसी से छिपी नहीं है। ये बात अलग है कि प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष दोनों एक ही राज्य गुजरात से होने से भाजपा में मोदी विरोधियों की बेचैनी जरूर बढ़ गई होगी। बहरहाल देखने वाली बात ये होगी कि अच्छे दिन के वादे के साथ सत्ता में आने वाली मोदी सरकार सरकार गठन के एक माह में ही जिस तरह बढ़ती महंगाई को लेकर विरोधियों के निशाने पर है, और आम जन बेचैन है, उसके बाद भी क्या निकट भविष्य में होने वाले कई राज्यों के विधानसभा चुनाव में मोदी का जादू चल पाएगा और एक बार फिर से अमित शाह की चुनावी रणनीतियों कामयाब हो पाएंगी या फिर बढ़ती महंगाई के बोझ तले दबी जनता चौंकने वाले परिणाम देगी।  

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मंगलवार, 8 जुलाई 2014

एक मुख्यमंत्री का डर !

आम चुनाव से पहले उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन करते हुए कांग्रेस आलाकमान ने उत्तराखंड के दिल्ली वाले मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की जगह हरीश रावत को कमान इस विश्वास के साथ सौंपी थी कि हर मोर्चे पर विफल रहने वाले बहुगुणा के प्रति आम जन की नाराजगी नए मुख्यमंत्री के तौर पर हरीश रावत की ताजपोशी के साथ शायद कुछ कम होगी। कांग्रेस आलाकमान को उम्मीद थी कि आम चुनाव में कांग्रेस उत्तराखंड की सभी पांचों सीटों को बचाने में सफल होगी, लेकिन मोदी लहर में प्रदेश की पांचों सीटों पर कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया। मुख्यमंत्री की पत्नी तक हरिद्वार से चुनाव हार गई।
मुख्यमंत्री बने रहने के लिए हरीश रावत को 6 महीने के अंदर विधायक के रूप में निर्वाचित होना है, ऐसे में प्रदेश की दो विधानसभा सीटों डोईवाला और सोमेश्वर सीट रमेश पोखरियाल निशंक और अजय टम्टा के सांसद चुने जाने के कारण रिक्त हो गयी हैं। हरीश रावत को चुनाव लड़ने के लिए किसी सीट को खाली कराने की जरूरत नहीं थी और वे इन दोनों में से किसी एक सीट से चुनाव जीतकर पार्टी की सीटों की संख्या में भी ईजाफा कर अपने दम पर बहुमत के और करीब पहुंच सकती थी लेकिन हरीश रावत ने डोईवाला और सोमेश्वर सीट से चुनाव न लड़ने की बजाए धारचूला सीट को खाली कराया, जो कांग्रेस के पास ही थी। बहुगुणा के सीएम रहने के दौरान उऩके धुर विरोधी रहे और हरीश रावत के खास माने जाने वाले हरीश धामी ने मुख्यमंत्री के लिए अपनी सीट खाली कर दी।
हरीश धामी सीएम रावत के खास माने जाते हैं, ऐसे में उनका रावत के लिए सीट खाली करना समझ में आता है, लेकिन हरीश रावत का दो रिक्त सीटों वो भी जो भाजपा कब्जे में थी, उनकी बजाए अपने विधायक की सीट खाली कराकर चुनाव लड़ने का फैसला कई सवाल खड़े करता है।
जाहिर है हरीश रावत को डोईवाला या सोमेश्वर सीट से चुनाव लड़ने में अपनी हार का डर है, शायद हरीश रावत को लगता है कि अब भी मोदी लहर उनकी जीत में बाधा बन सकती है। 2002 में और 2012 में मुख्यमंत्री बनने से चूक गए हरीश रावत किसी भी सूरत में चुनाव हारकर बड़े जतन से मिली मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवाना नहीं चाहते। 2002 में एनडी तिवारी उनकी राह में रोड़ा बन गए थे तो 2012 में कांग्रेस हाईकमान ने विजय बहुगुणा को सीएम बना दिया था। शायद इसलिए ही हरीश रावत ने सेफ सीट धारचूला को चुनाव लड़ने के लिए चुना, लेकिन ये सीट रावत के लिए कितनी सेफ साबित होगी ये तो चुनावी नतीजे के बाद ही सामने आ पाएगा लेकिन इतना तो तय है कि उत्तराखंड की तीनों सीटों पर हो रहे उपचुनाव में मुकाबला रोचक होगा।


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सोमवार, 7 जुलाई 2014

कांग्रेस, नेता प्रतिपक्ष और मोदी सरकार

सपना तो राहुल गांधी को 2014 में प्रधानमंत्री बनाने का था लेकिन सोनिया गांधी को क्या पता था कि लोकसभा में नेता विपक्ष के पद के लिए भी लोकसभा अध्यक्ष का मुंह ताकना पड़ेगा। 2014 के आम चुनाव में कांग्रेस के खाते में सिर्फ 44 सीटें ही आईं, जो कि लोकसभा में सदस्यों की कुल संख्या का 10 प्रतिशत यानि की 55 सीटें भी नहीं है।, जो कि नेता विपक्ष की कुर्सी के लिए जरूरी हैं। कांग्रेस को डर है कि सरकार के ईशारे पर लोकसभा स्पीकर नेता विपक्ष का पद शायद ही कांग्रेस को दे, ऐसे में अब कांग्रेस लोकसभा अध्यक्ष को चिट्ठी लिखने का मन बना रही है। कांग्रेसी नेता तमाम तरह की दुहाई देकर भले ही नेता विपक्ष का पद हासिल करने के जतन कर रहे हैं लेकिन भाजपा इस मुद्दे पर कांग्रेस की खिल्ली उड़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है। लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन इस पर क्या फैसला लेती हैं, ये जल्द ही सामने आ जाएगा लेकिन नेता विपक्ष के पद को लेकर बेचैन कांग्रेस का ये तर्क कि 1977 के कानून में ये स्पष्ट है कि सत्तारूढ़ दल के बाद सबसे बड़े दल को नेता प्रतिपक्ष का पद दिया जाना चाहिए क्योंकि कई संवैधानिक पदों की नियुक्ति के लिए नेता विपक्ष की जरूरत होती है, इसलिए गले नहीं उतरता क्योंकि कांग्रेस शासन में वर्ष 1980 से लेकर 1989 तक लोकसभा में नेता विपक्ष कोई नहीं था। हालांकि कांग्रेस दावा कर रही है कि उस समय किसी भी दल ने इस पद के लिए दावा नहीं किया था।
अब सवाल ये भी उठता है कि क्या भाजपा भी कांग्रेस की उस राह पर चलेगी, जिस राह पर कांग्रेस 1980 में चली थी या फिर एक स्वच्छ लोकतांत्रिक परिपाटी कायम करते हुए कांग्रेस को सबसे बड़े दल होने के नाते उसे नेता विपक्ष का पद दे देती है। बहरहाल भाजपा की मंशा और नीयत इसके पीछे जो भी हो लेकिन कांग्रेस को नेता विपक्ष का पद न मिलने पर देश की सबसे बड़ी राजनीततिक पार्टी की स्थिति को आसानी से समझा जा सकता है। कांग्रेस के पास राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा होने के बाद भी उसकी स्थिति लोकसभा में एक क्षेत्रीय पार्टी की तरह ही हो जाएगी और नेता विपक्ष का पद न मिलना कांग्रेस कार्यकर्ताओं के मनोबल पर भी असर डालेगा। ऐसे में कांग्रेस हर हाल में नेता प्रतिपक्ष का पद हासिल करना चाहती है और इसके लिए कांग्रेस ने पूरी ताकत भी झोंक दी है। बहरहाल गेंद लोकसभा अध्यक्ष के पाले में हैं और उनका कहना है कि किसी ऩे भी उनसे नेता विपक्ष पद के लिए मांग ही नहीं की है। देखना रोचक होगा कि क्या कांग्रेस को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद मिलेगा या फिर भविष्य में 16वीं लोकसभा एक ऐसी लोकसभा के रूप में जानी जाएगी जिसमें नेता विपक्ष ही नहीं रहा।  


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शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

शाह को Z Plus सुरक्षा, वाह !

सुना है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सबसे खासमखास और आम चुनाव में यूपी में भाजपा के खेवनहार अमित शाह को जेड प्लस सुरक्षा दी जाने वाली है। इसके पीछे कहा ये जा रहा है कि अमित शाह की जान को खतरा है, इसलिए उन्हें ये सुरक्षा मुहैया कराई जा रही है। जबकि इसके साथ ही कई वीवीआईपी नेताओं को वर्तमान में दी जा रही जेड प्लस श्रेणी की सुरक्षा पर फिर से विचार किया जा रहा है और जल्द ही इस पर गृह मंत्रालय फैसला ले सकता है यानि कि कई वीवीआईपी नेताओं की सुरक्षा हटाई जा सकती है। दूसरी बात तो समझ में आई कि कई वीवीआईपी को दी जा रही जेड प्लस सुरक्षा की समीक्षा के बाद उसे वापस लिया जा सकता है लेकिन अमित शाह को जेड प्लस सुरक्षा दिए जाने की बात गले नहीं उतर रही है।
पीएम की कुर्सी संभालने के साथ ही अपने मंत्रियों के साथ ही दूसरे लोगों को खर्चों में कटौती का पाठ पढ़ाने वाले पीएम नरेन्द्र मोदी के सबसे करीबी अमित शाह को जेड श्रेणी सुरक्षा दिया जाने का फैसला कई सवाल खड़े करता है। साथ ही मोदी की कथनी और करनी के फर्क को भी झलकाता है। जाहिर है शाह की सुरक्षा को लेकर गृह मंत्रालय के फैसले की जानकारी मोदी को भी होगी लेकिन इसके बाद भी अपने खासमखास को जेड प्लस श्रेणी की सुरक्षा दिए जाने पर मोदी की रजामंदी, शाह के मोदी प्रेम की ही एक झलक है।
आखिर हो भी क्यों न, आखिर दिल्ली का सुल्तान बनाने की राह में सबसे बड़े रोड़े उत्तर प्रदेश को अमित शाह ने मोदी के लिए फतह जो किया था। फतह भी ऐसी कि भारतीय जनता पार्टी ने अपने दम पर पहली बार 282 सीटों के साथ बहुमत हासिल कर लिया। वैसे भी मोदी के पीएम रहते अमित शाह ने अगर सत्ता सुख हासिल नहीं किया तो फिर और कौन करेगा ?
इस फैसले पर सवाल सिर्फ इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि एक तरफ मोदी खुद खर्चों में कटौती की बात कर रहे हैं, दिखावे से दूर रहने का पाठ सबको पढ़ा रहे हैं, इसके लिए जेड प्लस सुरक्षा प्राप्त लोगों की सुरक्षा की समीक्षा कर उसे वापस लेने की तैयारी सरकार कर रही है, दूसरी तरफ अमित शाह को जेड प्लस श्रेणी की सुरक्षा देने की तैयारी की जा रही है। बहरहाल बात अमित शाह की है, इसलिए कोई कुछ नहीं बोलेगा,  कहीं पीएम साहब नाराज हो गए तो अच्छे दिन कहां से आएंगे ?


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बुधवार, 2 जुलाई 2014

महंगाई, मोदी और अच्छे दिन !

जिस महंगाई का जाप कर यूपीए सरकार को पानी पी पी कर कोसने वाली भाजपा ने जनता का विश्वास इस विश्वास के साथ हासिल किया कि सत्ता में आने पर वे महंगाई को पलक झपकते ही छूमंतर कर देंगे, वही महंगाई अब मोदी सरकार के गले की फांस बन गई है। पेट्रोल, डीजल, गैस और आलू – प्याज के साथ खाद्य सामग्री के एक के बाद एक दाम आसमान पर चढ़ने से मोदी सरकार से जनता का विश्वास डगमगाने सा लगा है। सरकार भले ही इसके पीछे अलग अलग कारण गिनाते हुए पिछली यूपीए सरकार को कोसते हुए देश की जनता को अभी भी अच्छे दिन आने का भरोसा दिला रही हो लेकिन बढ़ती महंगाई से पार पाना फिलहाल तो सरकार के बूते की बात नहीं दिखाई दे रही है।
पेट्रोल और डीजल पर इराक संकट का हवाला देकर सरकार भले ही बचने का रास्ता खोज रही हो लेकिन आलू और प्याज जैसी अहम चीजों की देश में पर्याप्त उपलब्धता होने के बाद भी इनके दाम तेजी से चढ़ना न सिर्फ हैरान करता है बल्कि सरकार पर भी कई सवाल खड़े करता है। इससे भी ज्यादा हैरानी तब होती है जब सरकार जमाखोरों के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं कर पा रही है। कई राज्यों में जमाखोरों के खिलाफ ताबड़तोड़ छापामार कार्रवाई के बाद भी खासकर प्याज की कीमतें जमीन पर नहीं आ पा रही हैं। राज्य सरकारें असल जमाखोरों तक या तो पहुंच नहीं पा रही है या फिर पहुंचना नहीं चाहती। जाहिर है इस खेल में जनाखोर ही सिर्फ अकेले खिलाड़ी नहीं है बल्कि राजनेताओं के साथ ही अफसर भी इसमें किसी न किसी रूप में भागीदार हैं...! वरना ऐसे कैसे संभव है कि सरकार के पास हर जिले- तहसील में पूरा प्रशासनिक तंत्र होने के बाद भी जमाखरों मौज काट रहे हैं और गरीब जनता आलू-प्याज को तरस रही है। जाहिर है कहीं तो गड़बड़ है..!
हालांकि महंगाई पर चिंतित केन्द्र सरकार ने कैबिनेट की बैठक में अहम फैसला लेते हुए आलू और प्याज को एक साल के लिए एपीएमसी एक्ट से बाहर रखने का ऐलान किया है। जिसके बाद किसान मंडी से बंधा नहीं रहेगा और किसा आलू और प्याज को कहीं भी बेच सकेंगे। लेकिन सवाल वही कायम है कि क्या इससे आलू और प्याज के बढ़ते दामों पर लगाम कसेगी और आम जनता को राहत मिलेगी।
उम्मीद तो यही है, महंगाई डायन जनता का पीछा छोड़ेगी, लेकिन ये उम्मीद इतनी बार टूट चुकी है कि अब इस उम्मीद से भी कोई उम्मीद करना बेमानी लगता है। लेकिन आम जनता कर भी क्या सकती है, सिवाए अच्छे दिनों का इंतजार करने के, जो फिलहाल तो आते हुए नहीं दिखाई दे रहे हैं !  


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मंगलवार, 1 जुलाई 2014

दीदीराज में दादागिरी !

दीदी के राज में उनके लोग दादागिरी करें तो हैरानी नहीं होनी चाहिए, पश्चिम बंगाल के टीएमसी सांसद तापस पाल की बदजुबानी तो दीदीराज की असली कहानी बयां कर रही है। क्या कहा- अगर टीएमसी के कार्यकर्ताओं को छुआ भी तो मैं अपने लड़के भेजकर सीपीएम की महिला कार्यकर्ताओं को बलात्कार करवा दूंगा। ये शब्द हैं एक जनप्रतिनिधि के, जिसे जनता ने इसलिए चुना है कि वो उनके हक की आवाज संसद में उठाए और उनकी परेशानियों को दूर करने के लिए प्रयत्न करे लेकिन सांसद साहब तो किसी और ही काम में मशगूल हैं, उनके लिए अपने विरोधी पार्टी की महिलाओं के लिए कोई ईज्जत नहीं है, और तो और वे उनकी इज्जत को सरेआम तार-तार करने की धमकी देते नजर आते हैं।
तापस पाल दीदीराज में महिलाओं की इज्जत सरे बाजार तार तार करने की धमकी देते हैं लेकिन पार्टी सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुप हैं। पार्टी के नेता कहते हैं कि दीदी आहत हैं, लेकिन तापस पाल पर कोई फैसला लेने के लिए वे 48 घंटों का वक्त मांगते हैं। महिला मुख्यमंत्री के राज में महिलाओं की इज्जत से खेलने की बात सरेआम की जाती है, महिलाओं को धमकी दी जाती है लेकिन मुख्यमंत्री खामोश हैं। महिला चाहे वह विरोधी पार्टी की ही क्यों न हो, क्या सत्ताधारी दल के नेताओं को उनके खिलाफ कुछ भी बोलने का, कुछ भी करने का अधिकार मिल जाता है..? जाहिर है ये अधिकार किसी को नहीं है, ऐसे में महिला मुख्यमंत्री के होते हुए ये सब उनकी ही पार्टी के एक जनप्रतिनिधि द्वारा कहना अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।
हैरानी तो तब होती है जब टीएमसी के वरिष्ठ नेता और टीएमसी सरकार में शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी कहते हैं कि यह देखना चाहिए की सांसद तापस पाल ने किन परिस्थितियों में ऐसी बात कही होगी, विपक्ष ने जरूर ही ऐसी स्थिति पैदा की होगी कि तापस पाल ने ऐसी प्रतिक्रिया दी। गजब करते हो चटर्जी साहब, इसके लिए भी आप विपक्ष को ही जिम्मेदार ठहराने से बाज नहीं आ रहे हैं। ठीक है विपक्ष की कोई बात माना तापस पाल को चुभ गई होगी, लेकिन इससे तापस पाल को जो कि एक सांसद हैं, उन्हें महिलाओं के खिलाफ कुछ भी बोलने की आजादी मिल गई। बंगाल में टीएमसी और सीपीएम के बीच टकराव किसी से छिपा नहीं है, आए दिन खूनी झड़प होने की ख़बरें भी सामान्य सी बात है लेकिन एक जनता के चुने हुए जनप्रतिनिधि से ये उम्मीद तो नहीं की जा सकती कि वो महिलाओं की सुरक्षा की बात करने की बजाए सरेआम ये धमकी दे कि वो अपने लड़कों से महिलाओं का रेप करवा देगा। शर्म करो तापस पाल, शर्म करो सांसद का बचाव करने वाले शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी और शर्म करो पश्चिम बंगाल की महिला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जो अब तक तापस पाल के मुद्दे पर खामोश बैठी हुई है। महिलाओं के अपमान को महिला मुख्यमंत्री ही बर्दाश्त कर रही हो तो फिर और किसी से क्या उम्मीद की जा सकती है। उम्मीद करते हैं सांसद तापस पाल के बयान का संज्ञान लेते हुए लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन पाल के खिलाफ कार्रवाई करेंगी और ऐसे सांसद को संसद की सदस्यता से अयोग्य ठहराएंगी क्योंकि ऐसे जनप्रतिनिधि को देश की संसद में कदम रखने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए जो सरेआम महिलाओं की आबरू को तार तार करने की बात करता हो।


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सोमवार, 30 जून 2014

संकट में राष्ट्रीय दल !

सपने तो प्रधानमंत्री बनने तक के थे लेकिन अब अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। ख़बर तो यही है कि जद यू, राजद के बाद अब शरद पवार की एनसीपी, मायावती की बसपा और सीपीआई से राष्ट्रीय दल की मान्यता छिन सकती है। 2014 के आम चुनाव में राष्ट्रीय दल की शर्तों को पूरा न कर पाने पर अब चुनाव आयोग ने तीनों पार्टियों को नोटिस भेजकर जवाब मांगा है, जिस पर चुनाव आयोग जल्द फैसला ले सकता है।
आम चुनाव से पहले का वक्त याद कीजिए, एनसीपी के शरद पवार और बसपा सुप्रीमो मायावती के सपने खूब उड़ान भर रहे थे। इन्हें उम्मीद थी कि ये किंगमेकर बनने की स्थिति में होंगे और सीटों की संख्या ठीक ठाक होने पर इनके हाथ पीएम की कुर्सी भी लग सकती है, लेकिन मोदी की सुनामी में न सिर्फ इनके पीएम बनने के सपने बिखर गए बल्कि अब इनकी पार्टी के कद पर राष्ट्रीय से क्षेत्रिय होने के खतरा मंडराने लगा है।
चुनाव आयोग कि शर्तों के मुताबिक...
-राष्ट्रीय दल की मान्यता के लिए किसी भी राष्ट्रीय दल को चार राज्यों में कम से कम 6 फीसदी वोट मिले हों।
-उस राजनीतिक दल को तीन अलग-अलग राज्‍यों की लोकसभा (11 सीटों) की 2 प्रतिशत सीटें प्राप्‍त हुई हों।
-लोकसभा या विधानसभा के किसी आम चुनाव में उस राजनीतिक दल को 4 राज्‍यों के कुल मतों में से 6 प्रतिशत मत प्राप्‍त हुए हों और उसने लोकसभा की 4 सीटें जीती हों।
-किसी राजनीतिक दल को 4 या अधिक राज्‍यों में राज्‍य स्‍तरीय दल के रूप में मान्‍यता प्राप्‍त हो।
जाहिर है राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा छिन जाएगा तो इन पार्टियों की पहचान इनका चुनाव चिन्ह भी उन राज्यों तक ही सीमित रह जाएगा, जिन राज्यों में इन पार्टियों को राज्य स्तरीय दर्जा प्राप्त है। न फिर देशभर में शरद पवार की घड़ी चलेगी और न ही मायावती का मदमस्त हाथी देश भर में दौड़ लगा पाएगा। ऐसा ही कुछ हाल सीपीआई का भी होगा।
देश में पावर में आने का सपना देखने वाले पवार और हाथी की शाही सवारी करने का ख्वाब देखने वाली मायवती को 2014 के आम चुनाव में देश की जनता ने सीधे जमीन पर ला पटका है। यही हाल पीएम का ख्वाब संजोने वाले बिहार की राजनीति के महारथी लालू प्रसाद यादव का 2010 में भी हुआ था, जब चुनाव आयोग ने इसी तरह लालू की पार्टी राजद की मान्यता समाप्त कर दी थी। अब अगर एनीसीपी, बसपा और सीपीआई की मान्यता छिनती है तो देश में कुल तीन ही राष्ट्रीय दल रह जाएंगे, भाजपा, कांग्रेस और सीपीएम। हालांकि देश में राजनीतिक दल की वर्तमान स्थिति के हिसाब से 6 राष्ट्रीय दल हैं, जबकि 47 राज्य स्तरीय दल और 1563 गैर पंजीकृत दल हैं।  
एनसीपी, बसपा और सीपीआई से राष्ट्रीय दल की मान्यता छिनने की स्थिति में इन पार्टियों के नेताओं का कद भी क्षेत्रीय ही होकर रह जाएगा। जाहिर है ये इन राजनीतिक दलों के लिए बड़ा झटका है जो अब तक देशभर में सिर्फ एक ही सिंबल पर चुनाव लड़ते आए थे। ऐसे में न सिर्फ देशभर में इनकी साख दांव पर लग गई है बल्कि इनके सामने अपने वजूद को बचाने का भी संकट है। ये फैसला चुनाव आयोग जरूर कर रहा है लेकिन इसकी पटकथा जनता ने इन पार्टियों के प्रत्याशियों को नकार कर आम चुनाव के दौरान ही लिख दी थी। चुनाव के नतीजों में ये साफ दिखाई दिया था, जब इन राष्ट्रीय दलों को राष्ट्रीय दल कहने में भी विचार करना पड़ रहा था। मायावती का हाथी एक कदम भी नहीं चल पाया तो शरद पवार की घड़ी की सुई 6 बजे पर रुक गई जबकि सीपीआई महज एक सीट पर सिमट गई। (पढ़ें -  अच्छे दिन आने वाले हैं..! )
दरअसल ये वक्त इन तीनों पार्टियों के लिए विचार करने का भी है। आखिर क्यों देशभर के अधिकतर राज्यों में ठीक ठाक प्रभाव रखने वाले इन दलों के सामने अब अपने अस्तित्व को बचाए रखने का संकट खड़ा हो गया है। बहरहाल जनता के मिजाज को कौन समझ पाया है, कांग्रेस ने ही कहां सोचा होगा कि वो अपने इतिहास की अब तक की सबसे कम 44 सीटों पर आकर सिमट जाएगी तो भाजपा ने भी कहां सोचा था कि वो अपने दम पर 282 सीटों के साथ बहुमत हासिल कर लेगी।


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शनिवार, 28 जून 2014

पंचशील, मोदी सरकार और गुस्ताख चीन

उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी पड़ोसी देश चीन के साथ पंचशील समझौते की 60वीं वर्षगांठ मनाने चीन के दौरे पर हैं, लेकिन चीन अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। अरुणाचल प्रदेश के साथ ही जम्मू कश्मीर के एक बड़े हिस्से को अपने नए नक्शे में दिखाकर चीन ने साबित कर दिया है कि वह सुधरने वाला नहीं है। चंद दिन पहले ही चीन का एक हेलिकॉप्टर उत्तराखंड के जोशीमठ में भारतीय सीमा के घुस आया था। दिल्ली में काबिज मोदी सरकार भले ही बीजिंग की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा रही हो लेकिन चीन को लगता है, ये रास नहीं आ रहा है। वैसे देखा जाए तो इसमें चीन का कोई दोष नहीं है। ये तो चीन की फितरत में ही है, बस हमारी सरकार ही इसे नहीं समझ पाती। नतीजा चीन एक के बाद एक गुस्ताखी करता है और हमारी सरकार उसे नजरअंदाज करती रही है। यूपीए सरकार के वक्त भी यही हुआ था और अब दिल्ली में नई सरकार गठन के बाद भी तो यही हो रहा है। चीन की गुस्ताखियों पर हमारी सरकार का एक बयान आ जाता है, जिसमें वे इस पर कड़ी आपत्ति जताने की बात करते हुए चीन से बात करने की बात करते हैं, लेकिन चीन पर इसका कोई असर नहीं होता है।
ये सवाल इस वक्त इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि चीन के साथ पंचशील समझौते को 60 वर्ष पूरे हो चुके हैं और हमारे उपराष्ट्रपति इस 60वीं वर्षगांठ के अवसर पर चीन दौरे पर हैं। दरअसल पंचशील समझौते पर भारत के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू  और उनके चीनी समकक्ष चाऊ एन लाई ने 29 अप्रेल 1954 को दस्तखत किए थे। यह समझौता मुख्य रूप से भारत और तिब्बत के व्यापारिक संबंधों पर केन्द्रित है, लेकिन इसे इसके पांच सिद्धांतों की वजह से जाना जाता है।
ये सिद्धांत हैं –
1 एक - दूसरे की अखंडता और संप्रभुता का सम्मान करना
2 एक – दूसरे के विरूद्ध आक्रमक कार्रवाई न करना
3 एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना
4 समानता और परस्पर लाभ की नीती का पालन करना और
5 शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति में विश्वास रखना
  
इस समझौते के तहत भारत ने तिब्बत को चीन का एक क्षेत्र स्वीकार कर लिया। इस तरह उस समय इस संधि ने भारत और चीन के संबंधों के तनाव को काफ़ी हद तक दूर कर दिया था। भारत को 1904 की ऐंग्लो तिबतन संधि के तहत तिब्बत के संबंध में जो अधिकार मिले थे भारत ने वे सारे इस संधि के बाद छोड़ दिए, हालांकि बाद में ये भी सवाल उठे कि इसके एवज में भारत ने सीमा संबंधी सारे विवाद निपटा क्यों नहीं लिए। बहरहाल माना जाता है कि इसके पीछे भारत की मंशा भारत की चीन के प्रति मित्रता की भावना थी लेकिन चीन के मन में कुछ और ही था। इस समझौते के आठ साल बाद ही 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर अपने इरादे जाहिर कर दिए थे कि उसके लिए पंचशील जैसे समझौतों का कोई मोल नहीं है। इसके बाद भी विस्तारवादी सोच रखने वाले चीन की नजरें हमेशा अपने पड़ोसी देशों की सीमाओं पर लगी रही। भारत के अभिन्न अंग अरुणाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर में चीन अपना दावा जताता रहा और आए दिन भारतीय सीमा में घुसपैठ कर भारत को चुनौती देता रहा।
इसके उल्ट भारत एकतरफा पंचशील के सिद्धांतों पर चलता रहा और चीन पंचशील के सिद्धांतों की धज्जियां उड़ाते हुए अपनी दादागिरी झाड़ता रहा। इसका इससे बड़ा ताजा उदाहरण और क्या हो सकता है कि एक तरफ भारत के उपराष्ट्रपति पंचशील समझौते की 60वीं वर्षगांठ पर चीन दौरे पर चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग से मुलाकात करते हुए आपस के मतभेद दूर करने की बात करते हैं लेकिन चीन अपने नए नक्शे में अरूणाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर के बड़े हिस्से पर अपना जावा जताने से बाज नहीं आता।  
बहरहाल अच्छे दिनों के वादे के साथ दिल्ली की सत्ता में मोदी सरकार काबिज हो चुकी है, जिसने देश वासियों से भारत की सीमा में घुसपैठ कर भारत को आंख दिखाने वाले  चीन की दादागिरी खत्म करने का वादा भी किया था, ऐसे में निगाहें मोदी सरकार की तरफ है, देखते हैं देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी अब चीन की दादागिरी कैसे खत्म करते हैं। उम्मीद का पहाड़ तो बहुत बड़ा हैं, देखते हैं इन उम्मीदों पर कितना खरे उतरते हैं हमारे पीएम साहब ?


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बुधवार, 25 जून 2014

मोदी सरकार- 30 दिन कितने अच्छे ?

अबकी बार मोदी सरकार का नारा भी साकार हुए एक महीने का वक्त पूरा हो गया। मोदी सरकार के लिए शायद ये एक महीना बहुत तेजी से बीता होगा क्योंकि ये बात मोदी भी अच्छी तरह से जानते हैं कि जो उम्मीदें सत्ता में आने से पहले उन्होंने देशवासियों में जगाई हैं, उन्हें पूरा करना आसान काम तो बिल्कुल भी नहीं है। हालांकि ये उम्मीदें कितनी पूरी होंगी या फिर कभी पूरी ही नहीं होंगी ये एक अलग बात है लेकिन इतना तो तय है कि सब 30 दिन में तो संभव नहीं था। जनता से 60 महीने मांगने वाले मोदी की सरकार का एक महीना पूरा हुआ तो उनसे भी हिसाब किताब मांगे जाना लगा है। रेल किराए और माल भाड़े का बढ़ना और दो – दो रेल हादसे कई सवाल खड़े करने के लिए काफी हैं तो चीनी के दाम बढ़ना और एलपीजी के साथ ही केरोसीन के दाम किस्तों में बढ़ाने की ख़बरें पहले ही महंगाई के बोझ तले दबी जनता को सीधे सीधे बुरे दिनों की ओर ईशारा कर रही हैं।
हालांकि मोदी सरकार इऩ कड़वे फैसलों के लिए सीधे तौर पर इसका दोष पिछली यूपीए सरकार के सिर मढ़ रही है। सरकार का साफ कहना है कि यूपीए सरकार के गलत फैसलों के चलते देश की आर्थिक स्थिति खराब है। इसमें कोई नई बात नहीं है क्योंकि ये हर क्षेत्र का नियम है, फिर ये तो राजनीति है। नया बॉस सारी गलतियों के लिए पिछले बॉस को जिम्मेदार ठहरा देता है, और यही आसानी से अपना पल्ला झाड़ने का सबसे आसान तरीका भी है। मोदी सरकार भी अभी कुछ ऐसी ही स्थिति में है। अपने हर कड़वे फैसले के लिए मोदी पिछली सरकार को दोषी ठहरा रही है फिर चाहे वो रेल किराया व माल भाड़े में ईजाफे के फैसले की बात हो या फिर देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सरकार के और दूसरे फैसले।
सरकार के 30 दिनों में खासकर महंगाई जैसे कड़वे फैसलों के लिए विपक्ष की आलोचना झेल रहे मोदी के लिए इन पर जवाब देना भले ही असहज हो रहा हो लेकिन मोदी सरकार के कुछ फैसले सरकार की एक सधी हुई शुरुआत नजर आती है।
विदेश में जमा काले धन पर एसआईटी का गठन का फैसला हो या फिर फैसलों में तेजी लाने के लिए यूपीए काल के करीब दर्जनभर अधिकार प्राप्त मंत्रियों के समूहों को भंग करना ये ईशारा कर रहे थे कि मोदी सरकार जनता से किए अपने किए वादों को पूरा करने के प्रति गंभीर है। साथ ही सरकारी दफ्तरों में बाबूगिरी पर लगाम कसने की ओर कदम बढ़ाना जनता के लिए फायदेमंद जरूर साबित होगा क्योंकि जनता का पाला इन बाबूओं से ही पड़ता है और उनके काम महीनों-सालों तक लटके रहते हैं। मंत्रियों को अपने काम का रोडमैप बनाने और 100 दिन का एजेंडा तैयार करने के निर्देश देकर खुद उसकी मॉनीटरिंग करना इस ओर तो ईशारा करता है कि सरकार की नीयत काम करने की है, ये अलग बात है कि इसके दूरगामी ही सही, लेकिन परिणाम नजर आएं।
30 दिन में किसी भी सरकार के काम का आकलन करना कहीं से भी तर्क संगत तो नहीं लगता लेकिन हर कोई जानना चाहता है कि मोदी सरकार किस दिशा में आगे बढ़ रही है। क्या वाकई में अच्छे दिन आएंगे ? जो फिलहाल महंगे दिन दिखाई दे रहे हैं! क्या वाकई में सुशासन आएगा? क्या लोगों को महंगाई से निजात मिलेगी ? क्या भारत विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर होगा ? ऐसे तमाम सवालों की लंबी फेरहिस्त है क्योंकि चुनाव से पहले अबकी बार मोदी सरकार का नारा लगाते वक्त और अच्छे दिन लाने का वादा करते वक्त देश की आम जनता से किए वादों की लिस्ट की भी लंबी फेरहिस्त है।
उम्मीद करते हैं कि कुछ कड़वे फैसलों के बाद ही सही देश की जनता के अच्छे दिन आएंगे। वरना मोदी सरकार को ये नहीं भूलना चाहिए कि 59 महीने के बाद अच्छे दिन न सही देश की जनता का दिन तो आएगा ही, फिर जनता तय करेगी कि किसके अच्छे दिन आएंगे और किसके खराब !

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शुक्रवार, 20 जून 2014

कड़वी दवा का हैवी डोज


छुक - छुक गाड़ी में सफर करना अब जेब पर और भारी पड़ेगा। देशवासियों के अच्छे दिन कब आएंगे, इसका तो फिलहाल पता नहीं लेकिन महंगे दिन की शुरुआत जरुर हो गई है। याद भी तो यही आ रहा है कि वादा तो अच्छे दिन लाने का हुआ था, महंगे दिन लाने का नहीं, लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है, इसका संतोषजनक जवाब फिलहाल नहीं मिल रहा है। रेल मंत्री सदानंद गौड़ा साहब तर्क देते हैं कि ये फैसला तो यूपीए सरकार के कार्यकाल में ही हुआ था, इसे तो उन्होंने सिर्फ लागू करने का काम किया है। गौड़ा साहब की दलील तो इसी ओर ईशारा करती है कि यूपीए सरकार के तमाम और फैसलों से भी उन्हें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए फिर ताजा मामलों की ही बात करें तो तकरीबन एक दर्जन राज्यों के राज्यपालों को पद छोड़ने का दबाव क्यों बनाया जा रहा है ?  जाहिर है सरकार रेल किराया बढ़ाने के फैसले को रिव्यू भी कर सकती थी लेकिन शायद ऐसा हुआ नहीं। वैसे इसका जवाब प्रधानमंत्री मोदी से पूछा जाए तो शायद जवाब मिल जाए, लेकिन आजकल उनकी चुप्पी मनमोहन सिंह की याद दिला रही है। इसलिए भी क्योंकि मोदी को इतना चुप देखने की आदत नहीं है।
हां, ये अगर प्रधानमंत्री की कुर्सी का असर है तो अलग बात है। क्योंकि दस सालों तक प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विराजमान मनमोहन सिंह अपने मौन के लिए ही ज्यादा जाने जाते थे। सत्ता हासिल करने के लिए वादे करना और सत्ता में आने के बाद उन वादों को पूरा करना इतना आसान होता तो शायद यूपीए सरकार सत्ता से बेदखल ही नहीं होती। पीएम इन वेटिंग से पीएम तक का सफर तो मोदी ने देश की जनता से अच्छे दिन लाने के वादे के साथ पूरा कर लिया लेकिन मोदी जी पहले से ही महंगाई की मार झेल रहा देश ये सवाल आपसे पूछ रहा है कि क्या उनके अच्छे दिन आएंगे, जिसका वादा आपने किया था ? हालांकि गोवा में प्रधानमंत्री मोदी भारत की दम तोड़ती  अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए कड़वी दवाई पिलाने की बात खुद कह चुके थे लेकिन कड़वी दवा की पहली ही डोज इतनी हैवी होगी और इतनी जल्दी इस रूप में होगी ये शायद ही किसी ने सोचा था। जाहिर है रेल किराए में 14.2 फीसदी और माल भाड़े में 6.5 फीसदी तक की बढ़ोतरी का असर आम आदमी की जेब पर ही पड़ेगा क्योंकि ये बढ़ोतरी रेलवे में सभी श्रेणियों में की है। इसका असर सिर्फ रेल यात्रा पर ही पड़ता तो भी ठीक था लेकिन माल भाड़े में बढ़ोतरी से खाद्य पदार्थों के साथ ही कई अन्य चीजें भी महंगी हो जाएंगी।
अगर कड़वी दवा से देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर आती है और आम जनता को इसका दीर्घकालिक लाभ मिलेगा तो शायद ही किसी को कड़वी दवा से परहेज होगा क्योंकि बीमारी ठीक करने के लिए कड़वी दवा पीनी ही पड़ती है, लेकिन सत्ता के लिए कुछ भी कर गुजरने वाले राजनीतिक दलों के राजनेताओं की बातों पर शायद अब इस देश की जनता बहुत ज्यादा भरोसा नहीं है, हालांकि 2014 के आम चुनाव में देश की जनता ने ये भरोसा मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा पर जताकर उसे सत्ता तक पहुंचाया है, लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या नरेन्द्र मोदी इस भरोसे को कायम रख पाएंगे या फिर अच्छे दिन सिर्फ सपनों में ही रह जाएंगे ?

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शनिवार, 17 मई 2014

अच्छे दिन आने वाले हैं..!



हसरतें तो बहुत से लोगों की थी, हसरतें हो भी क्यों न, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का मुखिया कौन नहीं बनना चाहेगा, लेकिन लोकतंत्र का राजा वही बनता है, जिसे जनता चुनती है। हसरतें तो माया और मुलायम की भी थी, हसरतें जयललिता और ममता बनर्जी की भी थी, शरद पवार और लालू प्रसाद यादव को हम कैसे भूल सकते हैं। हसरत न सिर्फ किंग बनने की थी बल्कि हसरत ये भी थी कि किंग न बन सके तो किंगमेकर की भूमिका में तो आ ही जाएंगे। पर्दे के पीछे से आए बिना किंगमेकर क्या गुल खिला सकता है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल तो जरा भी नहीं है। लेकिन 16 मई को जब जनता ने अपना फैसला सुनाया तो क्या मुलायम सिंह, क्या मायावती  क्या करूणानिधि क्या नीतिश कुमार, क्या शरद पवार और क्या लालू प्रसाद यादव सब सिर्फ हाथ ही मलते रह गए। केन्द्र की कुर्सी का रास्ता तैयार करने वाले उत्तर प्रदेश में अपने गढ़ में मायावती का हाथी एक कदम भी नहीं चल पाया तो मुलायम कि साईकिल सिर्फ 5 कदम चलकर ही पंचर हो गई। तमिलनाडु में करूणानिधि अपना खाता भी नहीं खोल सके तो बिहार में इतराने वाले नीतिश कुमार सिर्फ 2 कदम चलकर ही लड़खड़ा गए।   
हालांकि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडू में जयललिता का जादू जरूर चला लेकिन किंगमेकर बनकर इतराने की इनकी हसरत भी मोदी की सुनामी में बह गई। ममता और जयललिता पश्चिम बंगाल और तमिलनाडू में अपने दमदार प्रदर्शन से खुश जरूर होंगी लेकिन उनकी ये खुशी वहीं तक सीमित रह गई। मोदी की सुनामी ने इन सब के लिए दिल्ली के रास्ते मानो अगले 5 साल तक तो बंद ही कर दिए। नतीजों के बाद इतरा तो नमो नमो जपने वाले भी खूब रहे हैं, लेकिन इन्हें ये याद रखना होगा कि निर्वाचित सरकार का कार्यकाल पांच वर्ष का ही होता है, सत्ता में रहते हुए समय कितनी तेजी से बीतता है, इसे सत्तारुढ़ दल से बेहतर और कौन समझ सकता है। जाहिर है चुनौतियां बहुत ज्यादा हैं, और देश की जनता से किए वादों को पूरा करने के लिए समय बहुत कम। जनादेश 2014 के साथ ही नरेन्द्र मोदी और भाजपा के अच्छे दिन तो आ ही गए हैं लेकिन सवाल ये है कि क्या वास्तव में देश की जनता के भी अच्छे दिन आएंगे।


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शनिवार, 10 मई 2014

चैन की सांस ले रहा होगा बनारस


कहने को तो पूरा बनारस चुनावी मौसम में इतरा रहा होगा, पूरे देश की निगाहें जो बनारस पर टिकी हैं। चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ काशी और काशी के लोगों की ही चर्चा है कि आखिर काशी के लोग किसे अपना सरताज चुनेंगे। लेकिन सही मायने में शनिवार शाम 6 बजे के बाद बनारसी चैन की सांस ले रहे होंगे। इस चुनाव में जो बनारस ने झेला, शायद ही हिंदुस्तान के किसी और शहर ने झेला होगा। हालांकि बनारस हमेशा से सभी का दिल खोलकर स्वागत करता है, लेकिन चुनावी मौसम में जो होड़ इस बार राजनीतिक दलों में देखने को मिली, उसकी शायद बनारस को आदत नही है। बनारस में नामांकन के बाद से चुनाव प्रचार समाप्त होने के आखिरी घंटे तक चले सियासी ड्रामे तक बनारस की जनता ने सिर्फ और सिर्फ तकलीफ ही झेली। कभी भाजपा के पीएम उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के रोड शो ने बनारस की रफ्तार थामी तो कभी कांग्रेस उपाध्यक्ष  राहुल गांधी के रोड शो ने। रही सही कसर पूरी कर दी आम आदमी पार्टी के संयोजक व बनारस से उम्मीदवार अरविंद केजरीवाल और यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के रोड शो ने। अब चुनाव प्रचार थमने के बाद बनारसी शायद चैन की नींद सो पा रहे होंगे कि कम से कम रविवार से उन्हें भरी गर्मी मे न तो रेंगते हुए अपने काम पर जाने पर मजबूर होना पड़ेगा और न ही किसी बेवजह के जाम में फंसकर राजनीतिक दलों की भीड़ का हिस्सा बनना पड़ेगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि इस चुनाव में बनारस देश की सबसे हॉट सीट बनी हुई है लेकिन इस हॉट सीट पर कौन राज करेगा ये तो बनारस की जनता को ही तय करना है। आखिरी वक्त में अपनी पूरी ताकत बनारस में झोंकने वाले राजनीतिक दल भले ही बनारस की हवा अपने – अपने पक्ष में होने का दम भर रहे हैं लेकिन बनारस के दिल में क्या है ये तो 16 मई को चुनावी नतीजों के सामने आने के बाद ही आ पाएगा। मुद्दा ये भी है कि बनारस में जो भी जीतेगा, क्या वो अगले पांच साल तक भी बनारस की सेवा में इसी तरह तत्पर रहेगा और बनारस की जनता के हक की बात करेगा, जिस तरह वह अभी बनारस की जनता के वोट पाने के लिए एड़ी – चोटी का जोर लगा रहा है। उम्मीद करते हैं कि बनारस की जनता ऐसे की व्यक्ति को चुनेगी जो जीतने के बाद भी बनारस के लिए इतनी ही चिंता करेगा, जितना की अभी उनके वोट पाने के लिए कर रहा है। दारोमदार बनारस की जनता के हाथ में ही है, क्योंकि अपने नेता को चुनने का अधिकार भी बनारस के पास ही है।

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