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बुधवार, 4 दिसंबर 2013

एक्जिट पोल- कहीं खुशी, कहीं गम

पांच राज्यों मिजोरम, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान के बाद दिल्ली के चुनावी नतीजे चाहे कुछ भी हों लेकिन विभिन्न समाचार चैनलों और एजेंसियों के एक्जिट पोल सर्वे ने 2014 में मोदी के सहारे केन्द्र की सत्ता में आने को बैचेन भाजपा को फिलहाल खुश होने का मौका तो दे ही दिया है। अब ये खुशी 8 दिसंबर के बाद भी कायम रह पाएगी या नहीं ये तो पांच राज्यों के चुनावी नतीजों के सामने आने के बाद ही साफ हो पाएगा लेकिन फिलहाल चुनावी थकान उतार रहे भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए ये एक्जिट पोल किसी ऐसी नशीली दवा की तरह हैं, जिसने उनकी सारी थकान पलभर में ही छू मंतर जरूर कर दी होगी।
विभिन्न एक्जिट पोल को देखने के बाद खुश तो मोदी भी बहुत हो रहे होंगे और शायद मोदी पीएम की कुर्सी को अपने और करीब महसूस कर रहे होंगे। लेकिन कांग्रेस युवराज राहुल गांधी का चेहरा भुलाए नहीं भूलता। आखिर राहुल गांधी का क्या हाल हो रहा होगा जो अघोषित तौर पर 2014 में कांग्रेस के घोषित पीएम कैंडिडेट हैं। उन कांग्रेसी नेताओं का क्या हाल हो रहा होगा जिन्हें देश में पीएम की कुर्सी के लिए राहुल गांधी से योग्य कोई और नेता नहीं दिखाई देता। हालांकि ये लोग फिलहाल तो नतीजों से पूर्व एक्जिट पोल पर भरोसा न करने की बात कर रहे हैं लेकिन एक्जिट पोल में अगर स्थिति ठीक इसके उल्ट होती और कांग्रेस जीत के रथ पर सवार दिखाई दे रही होती तो शायद इनके सुर कुछ और ही होते और ये एक्जिट पोल के नतीजों को जनता की आवाज बताते नहीं अघा रहे होते।
एक्जिट पोल सर्वे में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के नतीजे भले ही बहुत ज्यादा चौंकाने वाले न हों लेकिन कुल 70 विधानसभा सीटों वाली देश की राजधानी दिल्ली के नतीजे चौंकाने वाले जरूर हैं। जिस तरह से अधिकतर एक्जिट पोल में कांग्रेस को अर्श से फर्श पर आते और भाजपा को बहुमत के करीब पहुंचते और दिल्ली में सरकार बनाने का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी को करीब एक दर्जन से ज्यादा सीटें मिलने की बात कही जा रही है वो अपने आप में जनता का बड़े राजनीतिक दलों को एक बड़ा ईशारा है कि बेहतर विकल्प होने की स्थिति में जनता कांग्रेस और भाजपा को छोड़कर आप जैसे किसी पार्टी का भी हाथ थाम सकते हैं। सिर्फ एक साल पहले 26 नवंबर 2012 को गठित हुई आम आदमी पार्टी का दिल्ली में अगर विभिन्न एक्जिट पोल के अनुसार प्रदर्शन रहता है तो ये भाजपा और कांग्रेस के माथे पर बल लाने के लिए काफी है क्योंकि आम आदमी पार्टी आने वाले वक्त में दिल्ली से बाहर निकलकर भी दोनों बड़े दलों की नींद उड़ा सकती है जिसे कहीं न कहीं भारतीय राजनीति के लिए एक शुभ संकेत कहा जा सकता है बशर्ते आम आदमी पार्टी जनता से किए अपने वादों पर कायम रहे और भ्रष्टाचार की कालिख से खुद को बचाकर रखे।
बहरहाल 2014 के सेमीफाईनल माने जा रहे पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में जनता ने तो अपना फैसला सुना दिया है जो 8 दिसंबर को देश के सामने आएगा लेकिन कम से कम तब तक तो विभिन्न समाचार चैनलों और एजेंसियों के इन एक्जिट पोल सर्वे को स्वीकार कर खुश होने और इसे नकार कर अपनी जीत के दावे करने के लिए तो सभी राजनीतिक दल स्वतंत्र हैं ही। फिलहाल तो इंतजार करते हैं 8 दिसंबर का और देखते हैं जनता ने अपने वोट की ताकत से इस बार किस किस की बोलती ईवीएम में बंद कर दी है।


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सोमवार, 2 दिसंबर 2013

गैस त्रासदी – स्कूल किताब से हकीकत तक

भोपाल गैस त्रासदीएक ऐसा सच जिसका सामना करने की हिम्मत शायद किसी में नहीं है, न इस त्रासदी का शिकार हुए लोगों में और न ही मध्य प्रदेश और न ही केन्द्र सरकार में। वजह बिल्कुल साफ है, त्रासदी को 29 बरस पूरे हो गए हैं लेकिन न तो इस त्रासदी के जिम्मेदार वॉरेन एंडरसन को सजा हुई और न ही पीड़ितों को इंसाफ मिल पाया। मुआवजे के नाम पर करोड़ों रूपए रेवड़ियों की तरह बांटे गए लेकिन वास्तविक रूप में इसके असल हकदारों की फेरहिस्त लंबी हैं जिन्हें मुआवजे तक नहीं मिल पाया। जबकि इसके उल्ट तस्वीर का एक और पहलू ये है कि मुआवजे के नाम पर कुछ लोगों ने जमकर चांदी काटी और गैस पीड़ित का तमग लगाकर ये लोग लखपति बन बैठे।
गैस पीड़ितों के हक में आवाज़ उठाने वाले करीब एक दर्जन से ज्यादा गैस पीड़ित संगठन दावा तो गैस पीड़ितों के हिमायती होने का करते हैं। गैस पीड़ितों के नाम पर धरना प्रदर्शन कर खूब सुर्खियां बटोरते हैं लेकिन गैस पीड़ितों के नाम पर बटोरे गए देश विदेश से करोड़ों की चंदे की रकम को कितना ये लोग पीड़ितों के कल्याण पर खर्च करते हैं इसका अंदाजा गैस पीड़ित संगठनों के आकाओं के आलीशान घर और रहन सहन को देखकर लगाया जा सकता है(गैस पीड़ितों के लिए कार्य कर रहे सभी संगठन इसमें शामिल नहीं)।
2008 से लेकर 2010 तक भोपाल में पत्रकारिता के दौरान इन चीजों को मैंने खुद महसूस भी किया। बचपन में किताबों में जब भोपाल गैस त्रासदी के बारे में पढ़ाई करते हुए हाथ में बच्चे को पकड़े एक महिला की मूर्ति देखते वक्त ये कभी नहीं सोचा था कि एक वक्त ऐसा भी आएगा जब मैं खुद भोपाल में इनके बीच कार्य कर रहा हूंगा। सोचा तो ये भी नहीं था कि इस दौरान ऐसी कड़वी हकीकतों से भी रूबरू होना पड़ेगा जिसके बारे में कभी कल्पना तक नहीं की थी।
त्रासदी के ठीक बाद से ही केन्द्र औऱ राज्य सरकार ने पूरी ईमानदारी के साथ अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई और गैस पीड़ितों की बजाए इस त्रासदी के लिए जिम्मेदार लोगों की मदद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी..! मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर तो इस त्रासदी के मुख्य आरोपी वॉरेन एंडरसन को भोपाल से पहले दिल्ली और फिर दिल्ली से विदेश भगाने तक के गंभीर आरोप लगे..! हालांकि कांग्रेस ने हमेशा ही इसका खंडन किया लेकिन वॉरेन एंडरसन को भोपाल के जिलाधिकारी की सरकारी गाड़ी में एयरपोर्ट पहुंचाना और वहां से सरकारी विमान से दिल्ली पहुंचाना ये सवाल खड़े करता है कि अर्जुन सिंह और राजीव गांधी की भूमिका इस मामले में संदिग्ध थी..! अफसोस और ज्यादा होता है क्योंकि मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में चीजें आज भी नहीं बदली हैं। हजारों लोगों को मौत की नींद सुलाने वाली यूनियान कार्बाइड फैक्ट्री आज भी लोगों को मौत बांट रही है। 2-3 दिसंबर 1984 की दरम्यानी रात ये मौत मिथाईल आइसोसायनाइट के रूप में हवा में घुलकर लोगों को तड़पा तड़पा कर मार रही थी तो आज फैक्ट्री परिसर में मौजूद हजारों टन जहरीला रसायनिक कचरा भोपाल की हवा, पानी में घुलकर लोगों को बीमारियों की सौगात दे रहा है। आश्चर्य उस वक्त होता है जब मौत बांट रहे इस रसायनिक कचरे के निष्पादन की बजाए इस पर राजनीति होती है। इससे भी बड़ा आश्चर्य ये जानकर होता है कि ये राजनीति करने वाले राजनीतिक दल नहीं बल्कि वो गैस पीड़ित संगठन हैं जो नहीं चाहते कि ये रसायनिक कचरा फैक्ट्री परिसर से निकाल कर इसे नष्ट किया जाए। अगर ऐसा नहीं होता तो जबलपुर हाईकोर्ट के इस कचरे को गुजरात के अंकलेश्वर में नष्ट करने के आदेश के बाद ये कचरा कब का नष्ट किया जा चुका होता। लेकिन ख़बरें तो यहां तक थी कि भोपाल के गैस पीड़ित संगठनों ने गुजरात के कुछ एनजीओ के साथ मिलकर गुजरात में इसका विरोध करवाना शुरु कर दिय। जिसके बाद गुजरात सरकार ने अंकलेश्वर में कचरा नष्ट किए जाने से इंकार कर दिया। इसके बाद इंदौर के निकट पीथमपुर में जब इस कचरे को नष्ट किया जाने लगा तो एक बार फिर से इसका विरोध शुरु हो गया। कुछ गैस पीड़ित संगठन दलील देते है कि इस कचरे को डाउ कैमिकल अपने देश लेकर जाए और वहीं इसे नष्ट किया जाए। इसके खिलाफ तो वे विरोध प्रदर्शन करते हैं लेकिन इससे भोपाल की हवा और पानी में हो रहे प्रदूषण से बीमार हो रहे लोगों की इनको चिंता नहीं है। देखा जाए तो सिर्फ गैस पीड़ित संगठन ही इसके लिए जिम्मेदार नहीं है बल्कि कहीं न कहीं सरकार का गैर जिम्मेदार रवैया भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है। राजनीति से ऊपर उठकर सरकार ने राजनीतिक ईच्छाशक्ति दिखाई होती तो शायद 29 साल बाद भी कम से कम भोपाल की फिज़ा में ये जहर नहीं घुल रहा होता। उम्मीद करते हैं अगले साल जब ये त्रासदी अपने 30 साल पूरे कर चुकी होगी तो कम से कम फैक्ट्री परिसर में बिखरे पड़े हजारों टन जहरीले रसायनिक कचरे का निष्पादन हो चुका होगा।


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बुधवार, 27 नवंबर 2013

“आप” पर लगे आरोपों में कितना दम..?

चाहे कोई कुछ भी कहे लेकिन इस बात को नहीं नकार सकता कि इस भौतिक युग में अर्थ के बिना सब अनर्थ हैं। मतलब साफ है कि आप अगर किसी अच्छे कार्य के लिए लड़ाई भी लड़ रहे हैं तो भी आप अर्थ पर ही निर्भर हैं। आम आदमी पार्टी अगर भ्रष्टाचार के खात्मे के लक्ष्य के साथ चुनावी मैदान में है, जैसा कि आप के नेता अरविंद केजरीवाल दावा कर रहे हैं तो जाहिर है कि बिना अर्थ के वे इस लड़ाई को बहुत लंबे समय तक नहीं लड़ सकते। लेकिन अर्थ जुटाने के लिए आप के नेता किस हद तक जा रहे हैं, ये गौर करने वाली बात है। क्योंकि अगर आप बेनामी चंदे या किसी के भी कालेधन का इस्तेमाल इसके लिए कर रहे हैं तो इसे कहीं से भी जायज नहीं ठहाराया जा सकता। और अगर ऐसा हो रहा है तो आप और ऐसा करने वाले दूसरे लोगों में कोई फर्क नहीं रह जाएगा। चुनाव से ऐन पहले एक स्टिंग ऑपरेशन में आप के नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप ये सोचने पर मजबूर जरूर करते हैं।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि भ्रष्टाचार के खात्मे और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ झंडा बुलंद कर दिल्ली के चुनावी समर में उतरी आम आदमी पार्टी ने सत्ताधारी कांग्रेस के साथ ही एक बार फिर से दिल्ली की सत्ता हासिल करने का ख्वाब देख रही भारतीय जनता पार्टी की भी रातों की नींद उड़ा दी है। लेकिन जो पार्टी भ्रष्टाचार के खात्मे के संकल्प के साथ आम आदमी से वोट की अपील कर रही थी उस पार्टी पर भ्रष्टाचार के आरोपों का लगना निश्चित तौर पर हैरान वाला है। मीडिया सरकार संस्था ने अपने स्टिंग में जो दावा किया था उस पर अगर यकीन किया जाए तो ये भाजपा और कांग्रेस के विकल्प के रूप में आप की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे लोगों का दिल तोड़ने के लिए काफी है। लेकिन स्टिंग को देखने के बाद मेरा व्यक्तिगत रूप से ये मानना है कि मीडिया सरकार के स्टिंग में आप के नेताओं पर लगे आरोपों में दम बिल्कुल भी नहीं है। ये इसलिए भी क्योंकि स्टिंग में आम आदमी पार्टी के नेता शाजिया इल्मी के साथ ही कुमार विश्वास भी कैश के बदले रसीद देने की बात करते नजर आ रहे थे। जहां तक कुमार विश्वास का 50 हजार कैश लेने की बात है तो प्रोफेशनली देखा जाए तो उनका किसी आयोजन के बदले उसकी फीस लेना और सुविधाएं लेना गलत तो नहीं है, वो भी जब वे उसकी रसीद भी दे रहे हैं।  
वहीं आम आदमी पार्टी का रॉ फुटेज देखने के बाद दावा है कि टीवी पर एडिटेड फुटेज दिखाई गयी और कई अहम हिस्सों को कांट छांट कर हटा दिया गया। अगर ये सही है तो ऐसे में स्टिंग करने वाली संस्था मीडिया सरकार पर सवाल तो उठते ही हैं। चुनावी समय में सिर्फ एक ही पार्टी के कई नेताओं को टारगेट कर स्टिंग करना भी मीडिया सरकार की नीयत पर शक करने को मजबूर करता है।
जिस तरह से आम आदमी पार्टी ने अपने नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने पर आप ने साहस दिखाते हुए आरोप सही होने पर अपने उम्मीदवारों को चुनावी मैदान से वापस बुलाने तक की बात पूरी दमदारी से कही वो काबिले तारीफ है क्योंकि आज के समय में शायद ही कोई दूसरा ऐसा राजनीतिक दल होगा जो ये कहने का साहस दिखा पाएगा वो भी ऐसे वक्त पर जब वे उनकी जगह पर दूसरे उम्मीदवार को खड़ा नहीं कर सकते।
आप का कितना डर भाजपा और कांग्रेस में है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आप के नेताओं पर आरोप लगने के बाद भाजपा और कांग्रेस नेताओं ने इसे भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और आप पर चौतरफा हमले शुरु कर दिए। हालांकि आप ने इस स्टिंग के कांग्रेस का हाथ होने का दावा किया है और इसके लिए 1400 करोड़ रूपए खर्च करने का आरोप लगाया है लेकिन कांग्रेस का या फिर भाजपा का इस स्टिंग के पीछे कितना हाथ है ये तो वे ही बेहतर जानते होंगे लेकिन इसके बहाने भाजपा और कांग्रेस नेताओं ने जिस तरह आप पर चढ़ाई शुरु कर दी थी, वो जाहिर करने के लिए काफी है कि कहीं न कहीं आपका डर दोनों ही पार्टियों में हावी जरुर है। वैसे भी जो पार्टियां गले तक भ्रष्टाचार में डूबी हुई हों, जिनके नेताओं पर भ्रष्टाचार के तमाम आरोप लग चुके हों उनका भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आप पर सवाल उठाना कहीं से भी जायज तो नहीं ठहरा जा सकता। कम से कम इनके मुंह से ये बातें अच्छी तो बिल्कुल भी नहीं लगती।
बहरहाल दिल्ली के चुनावी नतीजों पर इस स्टिंग का कितना असर पड़ेगा और जनता आप के झाड़ू से कांग्रेस और भाजपा को किस हद तक साफ करेगी या फिर आप का झाड़ू आप पर ही उल्टा चलेगा ये तो 8 दिसंबर 2013 को दिल्ली विधानसभा के चुनावी नतीजों के बाद ही सामने आएगा लेकिन फिलहाल आप ने दिल्ली में तो कांग्रेस और भाजपा का बैंड बजाने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी है।


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सोमवार, 25 नवंबर 2013

जहरीला कौन..?

पांच राज्यों के चुनावी समर और 2014 के आम चुनाव से पहले सत्ता के जहर का नशा नेताओं के सिर चढ़कर बोल रहा है। खास बात ये है कि हर कोई इस जहर को पीने के लिए ललायित दिखाई दे रहा है। साथ ही किसने कितना जहर पिया..? कौन कितना जहरीला है इसका बखान भी खूब हो रहा है।
बात ज्यादा पुरानी नहीं है जब राजस्थान की राजधानी जयपुर में कांग्रेस के चिंतन शिविर में राहुल गांधी ने कांग्रेस में नंबर दो की पोजीशन संभालने से पहले अपने भाषण में कहा था कि बीती रात उनकी मां सोनिया गांधी ने उन्हें ये बताया कि सत्ता जहर के समान है। राहुल के इस बयान के बाद हर कोई हैरान था कि अगर वाकई में सत्ता जहर है तो फिर क्यों राहुल गांधी की मां सोनिया गांधी ने थाल सजाकर प्याले में अपने युवराज राहुल को ये जहर पीने के लिए दिया..? सवाल ये भी उठने लगे कि क्या ये इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या की याद को ताजा कर देश की जनता के नाम एक भावुक अपील थी..? इस पर चर्चाओं का लंबा दौर चला। खैर बात आयी गयी हो गयी थी लिहाजा लोग इस बात को ये समझकर भूल गए थे कि शायद सत्ता के जहर की मदहोशी का कुछ अलग ही मजा होता है। लेकिन पांच राज्यों दिल्ली, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मिजोरम के विधानसभा चुनाव के दौरान सोनिया गांधी ने भाजपा के लोगों को जहरीला कहकर एक बार फिर से उसी वाक्ये की याद ताजा कर दी। ऐसे में भाजपा के पीएम इन वेटिंग नरेन्द्र मोदी कहां पीछे रहने वाले थे उन्होंने कांग्रेस पार्टी को ही ये कहकर सबसे जहरीली पार्टी करार दे दिया कि कांग्रेस सबसे ज्यादा वक्त तक सत्ता में रही है ऐसे में उससे जहरीली पार्टी कोई और कैसे हो सकती है..?
चुनावों में चर्चा जहर और जहरीले लोगों की हो रही है, तो ऐसे में जेहन में कई सवाल उठते हैं। मसलन, जहर तो वही पीना चाहेगा जो खुदकुशी करना चाहता हो लेकिन ये बात भी गौर करने वाली है कि खुदकुशी कोई अपनी खुशी से तो नहीं करता..! ऐसे में क्यों सोनिया ने अपने बेटे राहुल को सत्ता रूपी जहर का प्याला दिया..? क्यों राहुल ने खुशी से इस प्याले को स्वीकार किया और क्यों कांग्रेस और भाजपा दोनों एक दूसरे को जहरीला साबित करने में तुले हुए हैं। मान दोनों रहे हैं कि सत्ता जहर है और जहर राजनीतिक दलों के साथ ही उनके नेताओं में भी है लेकिन जुबानी जंग इस बात को साबित करने की हो रही है कि कौन ज्यादा जहरीला है..? भाजपा कांग्रेस को तो कांग्रेस भाजपा को ज्यादा जहरीला साबित करने पर तुली हुई है।
खास बात तो ये है कि इस जहर को हर राजनेता पीना चाहता है, लेकिन ये दुनिया जानती है कि उनके लिए ये जहर न होकर अमृत के समान है क्योंकि एक बार सत्ता मिलने पर ये अपनी कई पीढ़ियों को तारने का ऐसा इंतजाम कर लेते हैं कि ताकि फिर किसी को कुछ करने की जरूरत ही न पड़े।
जहर असल में किसी को पीना पड़ता है, उसका असर किसी को सहना पड़ता है तो वो है देश की जनता, जिसके दम पर ही ये राजनेता सत्ता हासिल करते हैं। कभी घोटालों और भ्रष्टाचार का जहर तो कभी महंगाई और सांप्रदायिक दंगों का जहर और ये सब भ्रष्ट मंत्री और नेताओं के मंथन से ही बाहर निकलता है। नेता को ऐश करते हैं लेकिन ये जहर देश की जनता का जीना मुहाल कर देता है। उम्मीद करते हैं कि देश की जनता इस बार वोट डालने से पहले सत्ता के लिए ललायित नेताओं की जहरीली फुंकार से बचने के उपाय पर भी विचार करेगी और ऐसे प्रत्याशियों को चुनेगी जो सत्ता के लिए नहीं जनता की सेवा के लिए काम करे।   


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शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

मोदी रन – आखिरी किश्त

(पढ़ें - मोदी रन PART-1)
मोदी बिहार को पार कर यूपी को रवाना हो गए, वही यूपी जिसे फतह करने की तैयारी मोदी ने सौंपी है, अपने हनुमान यानि कि अमित शाह को। जाहिर है 80 लोकसभा सीटों वाला उत्तर प्रदेश हमेशा से सबसे अहम केन्द्र रहा है और हमेशा रहेगा। लेकिन क्या इतना आसान होगा मोदी के लिए अपने हनुमान के बूते यूपी को पार पाना, उस यूपी को जहां कि राजनीति धर्म और जातिवाद के मकड़जाल में उलझी हुई है...(पूरा पढ़ें – मोदी रन पार्ट 2)

पीएम की कुर्सी के रास्ते की सबसे अहम और बड़ी अड़चन यूपी को मोदी ने कई चांस के बाद पार किया तो मोदी के सामने था तमिलनाडू, वही तमिलनाडू जो केन्द्र की सत्ता में अपना अलग स्थान रखता है। वही तमिलनाडू जिसके सामने केन्द्र की यूपीए सरकार कई बार घुटने टेकने पर मजबूर हो जाती है। वही तमिलनाडू जहां पर खाता तक खोलना भाजपा के लिए किसी सपने के सच होने जैसा है। 39 सांसदों वाले तमिलनाडू में कांग्रेस के पास 8 सांसद तो भी हैं, लेकिन भाजपा यहां पर शून्य है। डगर मुश्किल थी और कांग्रेस के साथ ही पार पाना था करूणानिधी की द्रमुक और जयललिता की अन्नाद्रमुक को। मोदी ये बात अच्छी तरह जानते भी थे लेकिन मोदी ने फिर भी हिम्मत नहीं हारी और तमिलनाडू को फतह करने के लिए निकल पड़े। यहां भी मोदी के पास रिटेक का ही सहारा था और कई चांस के बाद मोदी तमिलनाडू को पार कर पाए।
तमिलनाडू के बाद मोदी पहुंचे असम तो यहां भी हालात कुछ वैसे ही थे। 14 सीटों वाले असम में कांग्रेस के पास 7 सीटें थी तो मोदी की भाजपा यहां भी शून्य ही थी। तमिलनाडू की भांति मोदी यहां भी गिरते पड़ते रिटेक के सहारे इसे पार कर गए और पहुंचे मध्य प्रदेश में जहां से मोदी के साथ ही भाजपा को बड़ी उम्मीदें हैं। हो भी क्यों न मध्य प्रदेश की 29 सीटों में से 16 पर भाजपा का कब्जा है और कांग्रेस के पास सिर्फ 12 सीटें हैं। भाजपा को यहां पर विधानसभा चुनाव में भी हैट्रिक की उम्मीद है तो लोकसभा चुनाव में अपनी सीटें 16 से आगे बढ़ने की उम्मीद। मश्किलें तो मोदी को मध्य प्रदेश में भी पेश आईं लेकिन मोदी ने आखिरकार मध्य प्रदेश को पार कर ही लिया। मध्य प्रदेश के बाद इसी तरह मोदी ने दौड़ते हुए, गिरते पड़ते, कई कई रिटेक के सहारे पंजाब, पश्चिम बंगाल, हरियाणा और ओडिशा समेत तमाम राज्यों को पार कर ही लिया।
खेल में तो हार जीत होती रहती है और साथ ही आपके पास खुद को बेहतर साबित करने के कई मौके भी होते हैं। सिर्फ खेल के हिसाब से सोचें तो मोदी के पास पीएम की कुर्सी तक पहुंचने के लिए हर राज्य को पार करना था, जो मोदी ने जैसे तैसे किया भी। लेकिन असल जिंदगी खेल से पूरी तरह अलग होती है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या वाकई में 2014 में भाजपा के पीएम उम्मीदवार मोदी के लिए इस कुर्सी पर काबिज होना इतना आसान है। जाहिर है असल जिंदगी में वो भी राजनीति में ये सब इतना आसान नहीं होता है, लेकिन चुनाव की रणभेरी में पीएम इन वेटिंग की पदवी संभाल कर जंग का ऐलान कर चुके मोदी के पास शायद कोई दूसरा रास्ता भी नहीं है। मोदी को पीएम की कुर्सी के आस पास भी पहुंचना है तो 2014 में भाजपा के हिंदी भाषी राज्यों के अलावा इस तिलिस्म को तोड़कर दूसरे राज्यों में भी भाजपा को आगे बढ़ाना होगा जो आसान लगता नहीं। सोशल नेटवर्किंग साईट्स में मोदी छाए हुए हैं, बातें मोदी लहर की भी हो रही हैं लेकिन सवाल ये है कि क्या ये बातें करने वाले, दफ्तर या घर पर बैठकर सोशल नेटवर्किंग साईट्स में मोदी की जय जयकार करने वाले क्या मतदान के दिन अपने अपने पोलिंग बूथ तक पहुंचेंगे और पहुंचेंगे भी तो क्या भाजपा के वोट में कनवर्ट हो पाएंगे..?
बहरहाल मोदी रन में मोदी को पीएम की कुर्सी तक पहुंचाकर मोदी समर्थकों के पास खुशी की वजह तो है और वे 2014 तक कई बार मोदी को इस खेल में तो कम से कम पीएम की कुर्सी तक पहुंचा सकते हैं लेकिन देखना होगा कि असल जिंदगी में क्या मोदी पीएम की कुर्सी तक पहुंच पाएंगे क्योंकि ये नहीं भूलना चाहिए कि रियल लाईफ में न तो मौके बार बार मिलते हैं और न ही रिटेक का कोई चांस होता है।

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मंगलवार, 19 नवंबर 2013

सचिन भारत रत्न तो ध्यानचंद और अटल क्यों नहीं..?

सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न मिलने पर उनके प्रशंसक फूले नहीं समा रहे हैं। क्रिकेट के शौकिनों के साथ ही सचिन के प्रशंसकों का खुश होना लाजिमी भी है क्योंकि क्रिकेट उनके लिए धर्म है तो सचिन तेंदुलकर क्रिकेट के भगवान। भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न पाना किसी के लिए भी गौरव की बात है लेकिन सवाल ये है कि क्या सचिन को सही वक्त पर भारत रत्न से सम्मानित किया गया..? कहीं ये फैसला जल्दबाजी में तो नहीं लिया गया..? खेल जगत की ही अगर बात करें तो क्या सचिन के चक्कर में दूसरे खिलाड़ियों को नजरअंदाज तो नहीं किया गया जो इसके हकदार थे..?
निश्चित तौर पर भारतीय क्रिकेट के लिए सचिन के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता लेकिन सचिन के अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने के तुरंत बाद बिना देर किए सचिन को इस सम्मान से नवाजना गले नहीं उतरता। जिस तरह से सचिन को भारत रत्न से नवाजा गया उससे तो कम से कम भारत सरकार का ये फैसला जल्दबाजी में लिया गया लगता है..!
ये इसलिए क्योंकि सचिन के मामले में उन्हें ये सम्मान महज 42 वर्ष की आयु में प्रदान कर दिया जाता है लेकिन खेल जगत के ऐसे कई भारतीय खिलाड़ी जो अलग अलग खेलों में अपना जौहर दिखाकर भारत का नाम रोशन कर चुके हैं उन्हें इस सम्मान के लायक ही नहीं समझा गया।
फ्लॉंईंग सिख के नाम से मशहूर एथलीट मिल्खा सिंह हों या फिर हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद दोनों ने विश्व स्तर पर कई मौकों पर अपने बेहतरीन प्रदर्शन के दम पर न सिर्फ तिरंगे के सम्मान को बढ़ाया बल्कि देशवासियों को गर्व करने का मौका दिया। मिल्खा सिंह को दी गयी उड़न सिख की उपाधि और ध्यानचंद को हॉकी के जादूगर की उपाधि ये बताने के लिए काफी हैं कि अपने अपने खेल में दोनों का विश्व में कोई सानी नहीं है। ये इनके खेल की जादूगरी ही थी कि विश्वस्तर पर आज भी इनके नाम का डंका बजता है। हो सकता है सचिन के प्रशंसकों को ये बातें नागवार गुजरे लेकिन सचिन की तुलना में भारत रत्न के लिए हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद सिंह और उड़न सिख मिल्खा सिंह के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ये स्पष्ट करना चाहूंगा कि यहां विरोध सचिन को भारत रत्न दिए जाने का नहीं है बल्कि दूसरे खिलाड़ियों को नजरअंदाज करने का है कि आखिर क्यों ऐसा किया गया..?
सचिन को भारत रत्न से नवाजने के बाद एक और नाम की गूंज सुनाई देने लगी है कि आखिर क्यों भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को आज तक भारत रत्न से सम्मानित नहीं किया गया। अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न देने की मांग न सिर्फ उनकी पार्टी के लोग कर रहे हैं बल्कि विरोधी पार्टियों के नेताओं फारुख अब्दुल्ला और नीतिश कुमार का अटल को भारत रत्न देने की मांग करना ये जाहिर करता है कि अटल बिहारी वाजपेयी की छवि एक निर्विवाद नेता की है और वे इसके हकदार भी हैं। अटल ने भारतीय राजनीति में रहते हुए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम ऊंचा ही किया है ऐसे में उनकी दावेदारी को खारिज नहीं किया जा सकता। कांग्रेसी भले ही अटल बिहारी वाजपेयी के नाम को ये कहकर खारिज कर रहे हैं कि 2002 में गुजरात दंगों के वक्त अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री रहते हुए राजधर्म का पालन नहीं किया लेकिन इस सवाल का जवाब शायद इनके पास नहीं होगा कि 1975 में देश पर आपातकाल लादकर भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली को खतरे में डालने वाली इंदिरा गांधी और बफोर्स घोटाले में नाम आने वाले राजीव गांधी आखिर इसके हकदार कैसे हो गए..?
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु और इंदिरा गांधी का खुद को भारत रत्न से नवाजना भी कई बातें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या भारतीय राजनीति में नेहरु – गांधी परिवार के जो सदस्य देश के पीएम बने, वे ही भारत रत्न के हकदार हैं, फिर चाहे उनके साथ कई विवाद क्यों न जुड़े हों..?  
बहरहाल सचिन को भारत रत्न मिलने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न दिए जाने की मांग और मेजर ध्यानचंद और मिल्खा सिंह नजरअंदाज क्यों के सवाल चाहे लाखों उठ रहे हो लेकिन आज का सच तो यही है कि अटल बिहारी, ध्यानचंद और मिल्खा सिंह भारत रत्न नहीं है लेकिन क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर भारत रत्न हैं और यही इतिहास के पन्नों में भी दर्ज होगा। मचाते रहो हल्ला होगा वही जो मंजूरे यूपीए सरकार होगा।
आखिर में एक सवाल और भारत रत्न सचिन को टीवी पर विज्ञापनों  में विभिन्न कंपनियों के उत्पादों का प्रचार करते देखकर आपको कैसा लग रहा है..?


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शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

राजनीति - सिर्फ आरोप से न हो भविष्य का फैसला

राजनीति को पवित्र करने की जरुरत है, जरूरत है राजनीति से उन लोगों की सफाई की जो अपने पापों को धाने के लिए राजनीति की गंगा में डुबकी लगाने से परहेज नहीं करते। हो भी क्यों न..? राजनीति दागियों के लिए अपने अपराधों के दागों को छिपाने का सबसे आसान जरिया जो बन गयी है। सोने पर सुहागा तो तब हो जाता है जब ये दागी सांसद और विधायक सत्ताधारी दल का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं। उस वक्त इनका आचरण देखने लायक होता है। वैसे भी अपराधियों के लिए राजनीति से बेहतर ऐशगाह और कहां हो सकती है..?
राजनीति की पेटेंट सफेद परिधान कुर्ता पायजामा में तो इनके सारे दाग जैसे छू मंतर हो जाते हैं। राजनीति दागी नेताओं के लिए टीवी पर अक्सर आने वाले उस टाईड डिटर्जेंट पाउडर और केक के विज्ञापन की तरह है, जो इनके दागों को पलक झपकते ही साफ कर देती है।  
ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर इसका ईलाज है क्या..? हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में यह कहा था कि 2 साल से ज्यादा की सजा पाने वाले सांसदों और विधायकों की सदस्यता खत्म कर दी जानी चाहिए। लेकिन मनमोहन कैबिनेट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटते हुए नए अध्यादेश की मंजूरी दे दी जिसके चलते सरकार ने दागी नेताओं को राहत देने का काम किया था। दागी नेताओं पर आई सुप्रीम कोर्ट की सुनामी टलने से दागियों के चेहरे खुशी से खिल गए थे लेकिन अचानक से कांग्रेस युवराज राहुल गांधी अध्यादेश को फाड़कर बाहर निकले और इसे नॉनसेंस कहते हुई अपनी पार्टी के नेता और देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक की किरकिरी कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
पीएम मनमोहन सिंह की मजबूरी सामने आई और उन्होंने इस अध्यादेश को वापस ले लिया जिसके पहले शिकार बने राजद अध्यक्ष और सासंद लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस सांसद राशिद मसूद।
अब केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने कैबिनेट के सामने एक प्रस्ताव पेश किया है जिसके तहत बलात्कार, हत्या, अपहरण आदि जैसे गुनाहों (जिनमें न्यूनतम सात वर्ष तक की सजा होती है) के आरोपियों को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। राजनीतिक सुधारों की दिशा में सोचा जाए तो ये प्रस्ताव काबिले तारीफ है लेकिन इस प्रस्ताव के विरोध में भी आवाज बुलंद होनी शुरु हो गयी है। ऐसे में सवाल ये है कि सिब्बल के इस प्रस्ताव का विरोध कितना जायज है..?
ये सवाल इसलिए भी क्योंकि ये प्रस्ताव उन राजनेताओं के राजनीतिक भविष्य को चौपट कर सकता है, जो या तो झूठे आरोपों में फंसे हुए हैं या फिर जिन पर राजनीतिक साजिश के तहत आरोप लगाए गए हों। राजनीति में कुछ भी संभव है, ऐसे में निश्चित तौर पर इसका फायदा उठाकर राजनेता अपने फायदे के लिए और विरोधी नेताओं का राजनीतिक भविष्य चौपट करने के लिए उन पर झूठे आरोप भी लगाने से गुरेज नहीं करेंगे।
निश्चित तौर पर इस प्रस्ताव के विरोध से वास्तव में दागी नेताओं को बचने का एक अवसर मिल जाएगा लेकिन इसकी कीमत पर ईमानदार या फिर झूठे मामलों में फंसाए गए नेताओं के भविष्य को चौपट नहीं किया जाना चाहिए। वैसे भी सुप्रीम कोर्ट पहले ही दागियों के राजनीतिक भविष्य को चौपट करने की दिशा में ऐतिहासिक फैसला दे ही चुका है जिसके दो बड़े शिकार भी लालू और राशिद मसूद के रूप में हमारे सामने मौजूद हैं। 
सिब्बल का ये प्रस्ताव सुधार की राजनीति के अंतर्गत जनता और समाज के हित में तो दिखाई देता है लेकिन इस प्रस्ताव को अमली जामा पहनाना ईमानदार राजनेताओं और राजनीति में जाने की ईच्छा रखने वाले लोगों के लिए एक बड़ी बाधा का काम करेगा। इसका मतलब ये भी नहीं कि राजनीति में सुधार की दिशा में सोचना बंद कर दिया जाए या इस पर काम न हो। सुप्रीम कोर्ट का हाल ही में आया ऐतिहासिक फैसला एक अच्छी शुरुआत दे चुका है। इस शुरुआत को आगे बढ़ाया जाना चाहिए लेकिन ये ध्यान भी रखा जाना चाहिए कि ये ईमानदार लोगों के लिए राजनीति के रास्ते बंद न हों बल्कि वे नए जोश के साथ राजनीति में प्रवेश करें।

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गुरुवार, 14 नवंबर 2013

राहुल के 82 वर्षीय युवा साथी !

2014 में कांग्रेस से अघोषित पीएम प्रत्याशी राहुल गांधी कहते हैं कि युवा देश की तकदीर बदल सकते हैं। राहुल युवाओं से आह्वान करते हैं कि वे राजनीति में आएं। राहुल अपनी पार्टी में युवाओं को प्रतिनिधित्व देने की बातें करते हैं। राहुल कहते हैं कि राजनीति में आना आसान नहीं है क्योंकि हर कोई उनकी तरह राजनीतिक पृष्ठभूमि से नहीं होता लेकिन राहुल ये वादा जरुर करते हैं कि वे युवाओं को राजनीति में लाना चाहते हैं और चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा युवा संसद और विधानसभा में पहुंचे ताकि देश की बागडोर युवाओं के हाथों में हों। एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस के बहाने वे अपनी इस सोच को परवान चढ़ाने की पूरी कोशिश भी करते हैं। लेकिन कांग्रेस के युवराज की पार्टी में कुछ ऐसा भी होता है, जो गले नहीं उतरता।
राजस्थान के चुनावी मैदान में ताल ठोक रहे राहुल के दो युवा साथियों को देखकर तो कम से कम ऐसा ही लगता है। दरअसल ये युवा साथी कुछ जरूरत से ज्यादा ही युवा हैं। 100 से 1 तक अगर उलटी गिनती करें तो इनकी उम्र करीब 18 वर्ष ही होती है, शायद इन दो केसों में राहुल की गिनती 100 से 1 की तरफ ही शुरु हुई होगी इसलिए ही ये दोनों राजस्थान के चुनावी मैदान में ताल ठोकते दिखाई दे रहे हैं। इनमें से एक भंवरी देवी यौन शोषण और हत्या के आरोप में जेल में बंद कांग्रेस विधायक मलखान सिंह की 82 वर्षीय माता अमरी देवी हैं, जिन्हें लूणी विधानसभा से टिकट मिला है तो दूसरे हैं, गहलोत सरकार में कृषि मंत्री हरजीराम बुरड़क जिन्हें टिकट मिला है लाडनूं विधानसभा सीट से। खास बात ये है कि उम्र के मामले में हरजीराम बुरड़क भी अमरी देवी की बराबरी कर रहे हैं और जीवन के 82 वसंत पूरे कर चुके हैं। बात यहीं खत्म हो जाती तो ठीक था लेकिन दिल्ली में अजय माकन की प्रेस कांफ्रेंस में दागियों को बचाने वाले अध्यादेश की कॉपी को नॉनसेंस कहते हुए सार्वजनिक रूप से फाड़ने वाले राहुल गांधी की फटा पोस्टर निकला राहुल वाली इमेज भी यहां पर उस वक्त धराशायी होती दिखाई दी जब कांग्रेस ने दागियों के परिजनों को दिल खोलकर टिकट बांटे।
बलात्कार के आरोप में जेल में बंद पूर्व मंत्री बाबू लाल नागर के भाई हजारी लाल नागर को दद्दू विधानसभा से अपना उम्मीदवार बनाया तो भंवरी देवी यौन शोषण और हत्या के आरोप में जेल मे बंद महिपाल मदेरणा की पत्नी लीला मदेरणा को जोधपुर की ओसियां विधानसभा से टिकट थमा दिया। भंवरी देवी मामले में जेल में बंद कांग्रेस विधायक मलखन सिंह की मां तो लूणी से कांग्रेस की उम्मीदवार हैं ही। ये छोड़िए दुष्कर्म के आरोपों से घिरे अपने विधायक उदय लाल आंजना को फिर से निम्बाहेड़ा विधानसभा सीट से टिकट थमा दिया तो एक महिला की मौत के मामले में मंत्री पद से हाथ धोने वाले रामलाल जाट को भी आसिंद विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाने में देर नहीं की। ये तो कुछ नाम है, प्रत्याशियों की सूची का पोस्टमार्टम किया जाए तो ये फेरहिस्त काफी लंबी दिखाई देगी।
इसके पीछे कांग्रेस का तर्क भी निराला है। कांग्रेस का कहना है कि ये टिकट विश्नोई और जाट समाज के दबाव में जारी किए गए हैं। अगर कांग्रेस के तर्कों से ही मतलब निकाला जाए तो साफ होता है कि वोटों के लिए न तो कांग्रेस को न तो 82 वर्षीय उम्मीदवार से परहेज है और न ही दागियों से क्योंकि राजस्थान में तो विधानसभा चुनाव के लिए जारी टिकटों की सूची में इनकी संख्या ठीक ठाक है।
इस सब के बाद अब राहुल गांधी की युवा और बेदाग नेताओं को संसद और विधानसभा पहुंचाने की सोच के साथ ही उनकी कथनी और करनी के फर्क का क्या मतलब निकाला जाए ये तो आप ही बेहतर बता सकते हैं। वैसे कुछ लोग हैं जो इसके जस्टिफाई भी कर सकते हैं, वो भी पूरे कुतर्कों के साथ, अब उनका नाम क्या लिखना जानते तो आप हैं ही।


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बुधवार, 13 नवंबर 2013

और नेता जी लुट गए !

लोकसभा चुनाव हो, विधानसभा चुनाव हों या फिर नगर निकाय या पंचायत के चुनाव। चुनाव जीतने के बाद खुद को राजा समझने वाले नेता जनता रूपी प्रजा को लूटने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते। भ्रष्टाचार और घोटालों के जरिए नेता जनता की खून पसीने की कमाई से अपनी नोटों को फसल को सींचने का कोई मौका नहीं छोड़ते क्योंकि ये नेता समझते हैं कि चुनाव जीतकर इन्होंने पांच साल का ऐश परमिट हासिल कर लिया है।
लेकिन चुनाव के वक्त जनता को लूटने वाले ये नेता भी कई बार लुट जाते हैं। ये बात अलग है कि इनकी धन दौलत तो नहीं लुटती, लेकिन धन दौलत का इंतजाम करने वाली कुर्सी पाने का इनका ख्वाब लुट कर जरुर टूट जाता है। इन्हें लूटने वाले भी इनके अपने ही होते हैं, लिहाजा अपनी महत्वकांक्षाओं को दबाकर अक्सर ये शांत बैठ जाते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो अपनी महत्वकांक्षाओं को दबा नहीं पाते और बागी हो जाते हैं। मैं बात चुनावी टिकट की कर रहा हूं जिसके लिए नेताओं की जद्दोजहद और मेहनत देखने लायक होती है, आखिर पांच साल का ऐश परमिट पाने की पहली बाधा तो चुनावी टिकट ही है।
देश के पांच राज्यों में चुनावी सरगर्मियां उफान पर हैं, अखबार से लेकर टीवी में चुनावी रंग में रंगे हुए हैं। सुबह की चाय के साथ अख़बार में ऐसी ही ख़बरों को टटोलते हुए राजस्थान के एक नामी दैनिक में एक नेता जी का टिकट कटने की ख़बर सुनी तो ख़बर को पूरा पढ़ने का मन किया। दरअसल एक नेता जी को चुनाव का टिकट मिलने के बाद उनसे छिन गया और उनकी जगह किसी दूसरे नेता को टिकट दे दिया गया। नेता जी का पांच साल का ऐश परमिट हासिल करने का ख्वाब टिकट लुटने के साथ ही टूट चुका था। नेता जी करते भी क्या लूटने वाला भी उनकी अपना ही बिरादरी का था और अपनी ही पार्टी का।
नेता जी बड़े महत्वकांक्षी थे, हर साल में पांच साल का ऐश परमिट हासिल करना चाहते थे। उन्हें अपनी जीत का पूरा भरोसा भी था, लिहाजा नेता जी ने अपनी पार्टी से बगावत करने का ऐलान कर दिया और बागी होकर अपनी ही पार्टी के प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव मैदान में ताल ठोकने की तैयारी शुरु कर दी। आखिर अपने हक के लिए नेता जी खुद आवाज नहीं उठाएंगे तो कौन उठाएगा..?
अच्छा लगा नेता जी को किसी के हक के लिए लड़ते हुए देखकर फिर भले ही अपने बिना किसी स्वार्थ के किसी के हक में आवाज न उठाने वाले नेता जी अपने ही हक के लिए क्यों न बगावत का झंडा उठाकर चुनावी मैदान में कूद पड़ें हों। और भी अच्छा लगा क्योंकि जनता को लूटने वाले नेता जी को भी पता चला कि आखिर लूटे जाने पर कितना दर्द होता है, लूटे जाने पर कितनी तकलीफ होती है। चुनाव के वक्त कम से कम इस टिकटों की लूट का तो लुत्फ उठा ही सकते हैं। जय हो नेतानगरी की।।

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शनिवार, 9 नवंबर 2013

CBI – तोता जो कभी उड़ा ही नहीं !

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने सीबीआई को असंवैधानिक क्या करार दिया सीबीआई की जांच के घेरे में आए नेताओं को तो मानो मुंह मांगी मुराद मिल गयी। बीते दिनों सर्वोच्च न्यायालय के नेताओं के राजनीतिक भविष्य पर विराम लगाने संबंधी फैसले से दहशत में आए जो नेता कल तक न्यायालय को पानी पी पीकर कोस रहे थे। वही नेता अब गुवाहाटी हाईकोर्ट के एक फैसले से फूले नहीं समा रहे हैं। आखिर इस फैसले ने उनके लिए सीबीआई के शिकंजे से बाहर निकलने का एक रास्ता जो तैयार कर दिया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि सीबीआई का गठन कुछ वक्त के लिए गृह मंत्रालय के प्रस्ताव के जरिए किया गया था। 1 अप्रैल 1963 का वो प्रस्ताव न तो केंद्रीय कैबिनेट का फैसला था और न ही उसे राष्ट्रपति की मंज़ूरी थी। लिहाजा वो विभागीय आदेश के अलावा कुछ भी नहीं है। ऐसे में DSPE एक्ट, 1946 के तहत सीबीआई पुलिस फोर्स की तरह बर्ताव नहीं कर सकती। हाईकोर्ट ने कहा है कि सीबीआई पुलिस फोर्स नहीं है, लिहाजा न तो वह जांच कर सकती है और न ही चार्जशीट दाखिल कर सकती है।
2जी मामले में आरोपी पूर्व संचार मंत्री ए राजा समेत कई आरोपियों ने तो इस आदेश के हवाला देते हुए उनके खिलाफ अदालती कार्यवाही रोकने की तक मांग कर डाली। कांग्रेस नेता सज्जन कुमार ने भी 84 दंगों में अपने खिलाफ दाखिल सीबीआई की चार्जशीट और जांच को गैरकानूनी करार देने की मांग की है। चारा घोटाले में जेल की हवा खा रहे लालू प्रसाद यादव की पत्नी राबड़ी देवी भी गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले का स्वागत करती दिखाई दे रही हैं।  
जाहिर है सीबीआई की जांच के घेरे में मौजूद सभी लोगों के लिए गुवाहाटी हाईकोर्ट का फैसला संजीवनी की तरह आया और इसे भुनाने की कवायद भी इन लोगों ने शुरु कर दी थी लेकिन इनकी ये खुशी ज्यादा देर तक नहीं रह सकी और केन्द्र की अर्जी पर सर्वोच्च न्यायालय ने गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले पर 6 दिसंबर तक रोक लगा दी। गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले ने केन्द्र सरकार की नींद उड़ा दी थी ऐसे में इस फैसले के खिलाफ आनन फानन में केन्द्र ने इस फैसले पर रोक के लिए सर्वोच्च न्यायालय में अर्जी दाखिल कर दी ताकि कई अहम मामलों में सीबीआई जांच में कोई रुकावट न आए।
करीब 2500 जांच अधिकारियों समेत करीब 6000 कर्मचारियों वाली सीबीआई हर साल करीब 1000 केसों की जांच करती है, जिनमें से 66 प्रतिशत केस सिर्फ भ्रष्टाचार के ही होते हैं। गुवाहाटी हाईकोर्ट का फैसला निश्चित तौर पर इन केसों को प्रभावित करता और भ्रष्टाचारियों को कुछ हद तक राहत मिलती और उनके हौसले बुलंद होते ऐसे में सरकार का सुप्रीम कोर्ट जाना तो लाजिमी ही था। सीबीआई को सर्वोच्च न्यायालय से फिलहाल संजीवनी तो मिल गयी है लेकिन गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले ने सीबीआई के अस्तित्व पर सवाल तो खड़े कर ही दिए हैं। हैरत की बात तो ये है कि सीबीआई जिसे देश की सबसे बड़ी व विश्वसनीय जांच एजेंसी का तमगा प्राप्त है, वह कभी इस विश्वास को कायम ही नहीं रख पाई। सीबीआई पर सियासी दबाव में काम करने के आरोप लगते रहे तो राजनीतिक दलों पर भी अपने सियासी फायदे के लिए सीबीआई का इस्तेमाल करने के आरोप लगे। केन्द्र सरकारें भले ही इसे नकारते रहे हों लेकिन सर्वोच्च न्यायालय का सीबीआई को पिंजरे में बंद तोते की उपाधि से नवाजना और खुद सीबीआई निदेशक का एजेंसी पर सरकार के दवाब को स्वीकार करना सीबीआई की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता रहा है, लेकिन इस बार तो सीबीआई के अस्तित्व पर ही हाईकोर्ट ने सवाल खड़े कर दिए हैं।
सीबीआई की जांच की धीमी रफ्तार कहें या फिर जांच में बाहरी दखल का असर पिछले पांच सालों में सीबीआई ने 300 से ज्यादा केसों की जांच को इसलिए रोक दिया क्योंकि उनकी तय डेडलाइन पूरी हो चुकी थी। इसके अलावा ऐसे केसों की फेरहिस्त भी लंबी है जिनमें सालों से सिर्फ जांच ही चल रही है। हालांकि सीबीआई ने केसों की जांच रफ्तार को तेज करने के लिए इसकी तय समय सीमा को दो से घटाकर एक साल कर दिया लेकिन इसके बाद भी सीबीआई के पास लंबित केसों की लंबी फेरहिस्त मौजूद है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि सीबीआई कितने दबाव में काम करती है और कितनी स्वतंत्रता और निष्पक्षता से कार्य कर रही है। इसके पीछे एक वजह जांच अधिकारियों और अन्य स्टॉफ की कमी भी हो सकती है लेकिन सिर्फ यही एक वजह का होना समझ में तो बिल्कुल नहीं आता।
बहरहाल आड़े मौके पर सीबीआई को ढाल बनाकर खुद को बचाने वाली सरकार अब सीबीआई को कैसे बचाती है ये तो 6 दिसंबर को ही सामने आएगा जब सरकार सर्वोच्च न्यायालय में सीबीआई को संवैधानिक ठहराने के लिए अपनी दलीलें पेश करेगी।


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एक्जिट पोल ने उड़ाई कांग्रेस की नींद !

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से पहले तमाम समाचार चैनलों और एजेंसियों के एक्जिट पोल जहां भाजपा को चुनाव नतीजों से पहले ही खुशी की एक बड़ी वजह दे रहे हैं, वहीं कांग्रेस की मुश्किलों में ईजाफा करते दिखाई दे रहे हैं। एक्जिट पोल पांच राज्यों में से चार प्रमुख राज्यों दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार बनने का दावा कर रहे हैं तो भाजपा का खुश होना लाजिमी भी है, लेकिन कांग्रेस की हार का दावा कर रहे ये एक्जिट पोल कांग्रेस को रास नहीं आ रहे हैं, शायद इसलिए ही कांग्रेस ने चुनाव आयोग की उस राय से झट से अपनी सहमति जता दी, जिसमें चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक दलों से चुनाव पूर्व होने वाले एक्जिट पोल पर बैन लगाने पर राय मांगी थी। कांग्रेस भले ही इसके पीछे ये तर्क दे रही है कि ऐसे सर्वे जनता के फैसले को प्रभावित करते हैं, लेकिन कहीं न कहीं कांग्रेस की इस मांग के पीछे एक डरी हुई कांग्रेस नजर आ रही है।
2014 के आम चुनाव से पहले काफी अहम माने जा रहे पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव पूर्व एक्जिट पोल में चार प्रमुख राज्यों में से दो राज्यों दिल्ली और राजस्थान में सत्ता में काबिज और दो राज्यों मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सत्ता पाने को बेकरार कांग्रेस की संभावित हार से कहीं न कहीं कांग्रेस क्या कांग्रेस की जगह कोई दूसरा राजनीतिक दल होता तो शायद फिलहाल चुनाव पूर्व एक्जिट पोल पर उसका यही नजरिया होता, जो अभी कांग्रेस का इन सर्वे को लेकर है।
ऐसे सर्वे जीत की आस लगाए बैठे किसी भी राजनीतिक दल का मनोबल तोड़ने के लिए काफी है और यही अभी कांग्रेस के साथ भी हो रहा है। लेकिन कांग्रेस के पास इसका जवाब नहीं होगा कि आज से पहले जिन सर्वे में कांग्रेस की संभावित विजय दिखाई जाती थी उस वक्त तो कांग्रेस को ये सर्वे खूब भाते थे और कांग्रेसी इस पर खूब इतराते थे।  
कांग्रेस घबराई हुई है तो एक्जिट पोल में चार प्रमुख राज्यों में अपनी संभावित जीत देख रही भाजपाई खूब इतरा रहे हैं, इसलिए भाजपा को चुनाव पूर्व एक्जिट पोल से कई आपत्ति नहीं है और भाजपा की मानें तो कांग्रेस का इसको बैन करने के पक्ष में इसलिए है, क्योंकि वो अपनी संभावित हार से बौखला गई है। शायद इसलिए ही भाजपा के पीएम इन वेटिंग नरेन्द्र मोदी ये तक बोल गए कि अगर कांग्रेस एक्जिट पोल सर्वे पर बैन लगाने की बात कह रही है तो क्यों ना चुनाव आयोग और न्यायालयों पर भी पाबंदी लगा दी जाए?
भाजपा का ये सवाल तो जायज है लेकिन भाजपा नेताओं को ये नहीं भूलना चाहिए कि अगर ये सर्वे के नतीजे उल्ट होते तो शायद भाजपा अभी कांग्रेस वाली स्थिति में होती और इन सर्वे को बेबुनियाद बताने का कोई मौका नहीं छोड़ती। 
वैसे सवाल तो ये भी उठता है कि क्या चुनाव पूर्व एक्जिट पोल के नतीजे जनता को बरगला सकते हैं और बरगला सकते हैं तो किस हद तक..? कांग्रेस का तो यही मानना है कि ऐसा हो सकता है और ऐसे सर्वे जनता के फैसले को प्रभावित करते हैं लेकिन मेरा व्यक्तिगत तौर पर ये मानना है कि आज का मतदाता सर्वे में दिखाई जाने वाले संभावित जीत या हार को ध्यान में न रखते हुए स्थानीय मुद्दों और अपने क्षेत्र के प्रत्याशी को ज्यादा तरजीह देते हैं और उसी के आधार पर अपने मत का प्रयोग करते हैं। कैडर वोट के मामले में हम इसे लागू नहीं कर सकते क्योंकि कैडर वोट तो पार्टी को मिलना ही मिलना है फिर चाहे पार्टी का प्रत्याशी कितना ही अच्छा या खराब क्यों न हों।  
लेकिन इससे भी बड़ा सवाल तो ये है कि क्या वाकई एक्जिट पोल के नतीजे पक्षपात पूर्ण होते हैं? सर्वे के नतीजों की निष्पक्षता पर सवाल हमेशा से उठते रहे हैं लेकिन अगर सर्वे के संपूर्ण रॉ डाटा को भी संबंधित एजेंसियां सार्वजनिक करे तो कुछ हद तक इस सवाल को जवाब तो मिल ही सकता है। ये बात अलग है कि जिस पार्टी की संभावित हार दिखाई जाएगी उसके नेता तो हमेशा ही इन सर्वे के निष्पक्ष होने पर सवाल उठाते रहेंगे। वैसे भी ये सर्वे सैंपल के आधार पर होते हैं और उसी के आधार पर पूरे प्रदेश की सभी सीटों में किसी भी पार्टी की संभावित जीत या हार का आंकलन एजेंसियां करती हैं। इन सर्वे के आधार पर हम पूर्ण रूप से ये नहीं मान सकते की फलां राज्य में फलां दल की सरकार बनेगी ही क्योंकि जनता ने कई बार इन एक्जिट पोल को गलत भी साबित किया है।
बहरहाल सर्वे चाहें कुछ कह रहें हों, किसी को खुश की वजह तो किसी को दुखी कर रहे हों, लेकिन असल फैसला तो जनता की अदालत में ही होगा ऐसे में देखना रोचक होगा कि 8 दिसंबर को किसके चेहरे पर जीत खुशी होगी और किसके चेहरे पर हार का गम।


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गुरुवार, 7 नवंबर 2013

दीपावाली पर तोहफे की खुशी

दीपावाली से दो दिन पहले की बात है, एक पार्सल बुक कराने के लिए पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के पार्सल कार्यालय कम गोदाम में जाना हुआ। कर्मचारी से लेकर वहां रहे वहां रखे पार्सल सब कुछ अस्त व्यस्त ही नजर आ रहे थे। पार्सलों के बीच से जैसे तैसे में अंदर दाखिल हुआ तो नजारा कुछ यूं था। एक कर्मचारी पार्सल के ऊपर ही आराम से पालती मारकर बैठा हुआ था तो दूसरा वहां रखी एक मेज पर। एक तीसरा व्यक्ति हाथ बांधकर खड़ा हुआ था। पास ही पड़ी एक दूसरी मेज पर रंगीन कागजों में लिपटे कुछ गिफ्ट पैक रखे हुए थे। कुछ ड्राई फ्रूट टाईप पैकेट दिखाई दे रहे थे और साथ में कुछ बड़े बड़े पैकेट भी थे। जो शायद आज ही इन्हें मिले थे। कर्मचरियों के बीच दीपावली के गिफ्ट को लेकर चर्चा जोरों पर थी।
उसके कुछ अंश इश प्रकार हैं।
पहला कर्मचारी – यार दीपावली को सिर्फ दो दिन बचे हैं, लेकिन इस बार गिफ्ट बहुत कम मिले हैं।
दूसरा कर्मचारी – हां यार, जो गिफ्ट मिले भी हैं, वो बड़े छोटे – छोटे और सस्ते हैं।
तीसरा कर्मचारी निश्चिंत भाव में – अरे यार अभी दो दिन बाकी हैं दीपावाली पर और गिफ्ट आएंगे अभी तो।
कर्मचारियों की गंभीर चर्चा में दखल देते हुए मैंने बीच में अपना एक पार्सल बुक कराने के लिए उनको टोका तो उनकी शारीरिक भाषा देखकर ऐसे लगा जैसे मैंने कोई बड़ी भूल कर दी। खैर मेरा 10 मिनट के काम में उन्होंने दो घंटे लगा दिए और बीच बीच में उनके दीपावाली के तोहफों की चर्चा जारी रही, जो समय बीतने के साथ चिंता में तब्दील होती जा रही थी।
इसी बीच एक शख्स वहां पहुंचा तो सभी कर्मचारियों को बांछें खिल गयी। वो उसे देखते ही अपनी कुर्सी से खड़े होकर उसे दीपावली की बधाई देने लगे। दरअसल उस शख्स के साथ एक लड़का था जिसके हाथ में चमकदार रंगीन कागजों में लिपटे ड्राई फ्रूट के डिब्बे और कुछ दूसरे उपहार थे। उस शख्स ने एक कागज निकाला और सबके नाम के आगे पैन से कुछ लिखा और कर्मचारियों को दीवाली की बधाई के साथ ही तोहफे देने लगा। इसकी क्या जरुरत थी, ऐसा बोलते हुए बड़े ही सहज भाव से सभी कर्मचारियों ने अपना काम छोड़ पहले तोहफे स्वीकार कर लिए।
ये वाक्या बहुत ही आम है, जो आपने भी दीपावाली पर अपने आस पास देखा होगा। आपको भी दीपावाली पर इस तरह के तोहफे मिले होंगे, मुझे भी मिले हैं। लेकिन जिस रेलवे पार्सल कार्यालय के बहाने मैं तमाम ऐसे सरकारी दफ्तरों में दीपावाली से पहले होने वाले तोहफों की सुगबुगाहट और चर्चा की बात कर रहा हूं वह सिर्फ दीपावाली पर तोहफों के मिलने का एक आम घटनाक्रम तो बिल्कुल भी नहीं दिखाई देता है।
जाहिर है जो लोग तोहफों की लालसा पाले बेकरारी से तोहफों का इंतजार करते हैं वो उन तोहफों के बदले सालभर तोहफे बांटने वाले के लिए काफी कुछ करते होंगे। तोहफे बांटने वालों के कई ऐसे काम आसानी से कर देते होंगे, जो या तो नियमों के खिलाफ होते होंगे या फिर इससे उन्हें मोटा मुनाफा होता होगा। वैसे भी आज के समय में ऐसे ही कोई मुफ्त में किसी को क्यों तोहफे बांटेगा..?
दरअसल ये तोहफे बांटने वालों के एक तरह का इन्वेस्टमेंट होता है, जिसे वे दीपावाली के मौके पर करते हैं और फिर सालभर इस इन्वेंस्टमेंट का रिटर्न लेते रहते हैं। वैसे इसे देशी भाषा में रिश्वत कहते हैं, जो कि गैर कानूनी है लेकिन दीपावाली पर दिया गया तोहफा न तो रिश्वत कहकर दिया जाता है और न ही रिश्वत कहकर लिया जाता है, इसे तो बस मिठाई कहा जाता है, जो खूब खिलाई भी जाती है और खाई भी जाती है।
खास बात तो ये है कि मलाईदार पदों पर बैठे कई आला अधिकारियों को ये नजराने हरे हरे नोटों के रूप में मिठाई के डिब्बे में बंद कर दिए जाते हैं और इसे भी नाम मिठाई का ही दिया जाता है वैसे भी देखना वालों के लिए तो ये मिठाई का ही डिब्बा है। बहरहाल जिन्हें इस तरह के खूब तोहफे मिले उनकी दीपावाली तो खूब रोशन रही लेकिन जिन्हें कम तोहफे मिले वे बेसब्री से अगली दीपावाली का इंतजार जरुर कर रहे होंगे।

फिलहाल तो सभी मित्रों को मेरी तरफ से दीपावली की शुभकामनाएं


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गुरुवार, 31 अक्टूबर 2013

मोदी रन – पार्ट 2


(जरुर पढ़ें - मोदी रन PART-1)
कर्नाटक में भ्रष्टाचार के कुहासे में कहीं गुम हो गई भाजपा की साख को खोजते खोजते मोदी ने कर्नाटक को पार तो कर लिया लेकिन कर्नाटक के आगे की राह मोदी के लिए और भी कांटों भरी थी क्योंकि कर्नाटक के बाद मोदी की गाड़ी आंध्र प्रदेश में जो प्रवेश कर रही है। आंध्र प्रदेश, जहां की 42 लोकसभा सीटों में से 33 पर कांग्रेस का कब्जा है, वहां पर हाल ही में जेल से छूटे वाईएसआर कांग्रेस के जगनमोहन रेड्डी को साथ लेकर अपनी नैया पार लगाने की कोशिश में लगी भाजपा को पार लगाने में भी मोदी को पसीने छूट रहे हैं। मोदी रन में आंध्र प्रदेश को डिजाईन भी कुछ इस तरह किया गया है कि मोदी आसानी से आंध्र का किला फतह न कर पाएं लेकिन यहां मोदी समर्थकों को निराश होने की बिल्कुल भी जरुरत नहीं है, क्योंकि यहां तो रीटेक के कई मौके हैं और एक बार गिर पड़े तो फिर से उसी रास्ते पर चल पड़ो, यहां कौन रोकने वाला है। हां इतना जरूर है कि इस बार यहां पर तेलंगाना का मसला भी नए गुल खिलाने की ओर संकेत दे रहा है। अब ये क्या रंग लाएगा ये तो वक्त ही बताएगा फिलहाल तो रीटेक के साथ गिरते पड़ते मोदी ने आंध्र को भी पार कर ही लिया है।
आंध्र के बाद मोदी रन ने बिहार में एंट्री मारी है, वही बिहार जिसकी 40 लोकसभा सीटों में से 20 पर जदयू का कब्जा है तो 12 सीटें भाजपा के भी पास हैं और कांग्रेस सिर्फ 2 पर ही सिमटी हुई है। वही बिहार जो केन्द्र की राजनीति की दशा और दिशा तय करता है। वही बिहार जहां भाजपा के मुताबिक उसे राजनीति में बेवफाई मिली है, वही बिहार जिसके मुख्यमंत्री को मोदी फूटी आंख नहीं सुहाते, वही बिहार जहां मोदी का स्वागत धमाकों के साथ होता है, वही बिहार जिसके मुखिया मोदी की बातों को झूठा साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। जाहिर है ऐसे में बिहार को पार पाना आसान तो बिल्कुल नहीं है और बिहार के मामले पर तो पूरे देश की निगाहें भी टिकी हैं कि आखिर जनता अपनी अदालत में किसे बेवफाई की सजा देगी मोदी की भाजपा को या फिर नीतिश की जदयू को।
मोदी रन में तो मोदी को बिहार में बहुत ज्यादा दिक्कत पेश आती नहीं दिखाई दी और एक – आद रीटेक के बाद मोदी बिहार को पार कर यूपी को रवाना हो गए, वही यूपी जिसे फतह करने की तैयारी मोदी ने सौंपी है, अपने हनुमान यानि कि अमित शाह को। जाहिर है 80 लोकसभा सीटों वाला उत्तर प्रदेश हमेशा से सबसे अहम केन्द्र रहा है और हमेशा रहेगा। लेकिन क्या इतना आसान होगा मोदी के लिए अपने हनुमान के बूते यूपी को पार पाना, उस यूपी को जहां कि राजनीति धर्म और जातिवाद के मकड़जाल में उलझी हुई है। जो कभी समाजवादी पार्टी की साईकिल में सवार होने से गुरेज नहीं करती तो बसपा के हाथी की सवारी से भी उसे परहेज नहीं है। खास बात तो ये है कि कांग्रेस का हाथ भी इन्हें अपना सा लगने लगता है, तो कमल खिलाने में भी यहां के लोग नहीं हिचकिचाते। 2009 में सपा की 23, कांग्रेस की 21, बसपा की 20 और भाजपा की 10 सीटें भी तो कुछ इसी ओर ईशारा कर रही हैं। लेकिन इस बार तस्वीर कुछ बदली बदली सी है। ऐसे में कौन यूपी के दम पर केन्द्रीय सत्ता में अपना दबदबा बनाएगा ये तो वक्त ही तय करेगा। मोदी भी जब यूपी में पहुंचे तो मानो उनकी राह में कांटों की फसल लहलहा रही थी लेकिन मोदी ने कई रीटेक के बाद ही सही यूपी को आखिर पार कर ही लिया। जारी है...

मोदी रन का सफर अभी बाकी है, तमिलनाडु, असम, मध्य प्रदेश, पंजाब, वेस्ट बंगाल, हरियाणा, ओडिशा जैसे तमाम राज्य से मोदी रन को तो अभी गुजरना है...मिलते हैं बहुत जल्द मोदी रन कि आखिरी किश्त के साथ।

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सोमवार, 28 अक्टूबर 2013

धमाके, शिंदे और “रज्जो”


पटना दहल रहा था लेकिन हमारे माननीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे मुंबई में फिल्म रज्जो के म्यूजिक एलबन रीलीज के कार्यक्रम में जाने की तैयारी कर रहे थे। धमाके के घायल अस्पताल में कराह रहे थे लेकिन शिंदे साहब मंच पर फिल्म अभिनेत्री कंगना राणावत के साथ खिलखिला रहा थे। पूरा देश जानना चाहता था कि आखिर क्यों इन धमाकों की कोई भनक तक केन्द्र व राज्य सरकार के साथ ही खुफिया एजेंसियों को नहीं लग पायी लेकिन शिंदे के लिए शायद रज्जो ज्यादा जरूरी थी। कितनी जरूरी इस बात का अंदाजा शिंदे के उस बयान से लगाया जा सकता है जब वे कार्यक्रम के बाद मीडिया के सवालों का जवाब दे रहे थे। (जरूर पढ़ें- क्यों पड़े हो शिंदे के पीछे..?)
बकौल शिंदे समय न होने के बाद भी वे इस कार्यक्रम में पहुंचे थेक्योंकि उनका इस कार्यक्रम में पहुंचने की दिली ख्वाहिश थी। लेकिन घटनास्थल पर जाने का, पटना के अस्पताल में भर्ती घायलों से मिलने का, जांच एजेंसियों के साथ ही पुलिस दोषियों की धरपकड़ के लिए क्या कदम उठा रही है, इसको जानने का शिंदे के पास वक्त नहीं था। गृहमंत्री शिंदे की प्राथमिक्ता में रज्जो के म्यूजिक लॉंचिंग का कार्यक्रम सबसे ऊपर था जबकि धमाकों की पूरी जानकारी लेना शायद उनकी प्राथमिक्ता में नहीं था। शायद इसलिए ही धमाकों के घंटों बाद तक गृहमंत्री साहब के पास धमाकों से संबंधित पुख्ता जानकारी तक नहीं थी।
याद दिलाना चाहूंगा कि ये वही सुशील कुमार शिंदे हैं, जो कोयला घोटाले पर ये कहते हैं कि लोगों की याददाश्त कमजोर होती है और बफोर्स की तरह लोग इसे भी भूल जाएंगे। शायद पटना धमाकों पर भी गृहमंत्री शिंदे कुछ ऐसा ही सोच रहे होंगे इसलिए ही उन्होंने अपनी पटना पहुंचने की बजाए मुंबई वाले कार्यक्रम को ज्यादा तरजीह दी। (पढ़ें - नहीं चाहते दलित गृहमंत्री..!)    
वैसे एक वाजिब वजह और दिखाई देती है देश के गृहमंत्री शिंदे की इस आचरण के पीछे। बात ज्यादा दिन पुरानी नहीं है, जब राहुल गांधी ने एक रैली में कहा था कि खुफिया एजेंसी के एक अधिकारी ने उन्हें बताया कि यूपी के मुजफ्फरनगर में दंगों के बाद से वहां के कुछ मुस्लिम युवकों से पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई संपर्क करने की कोशिश कर रही है। जब देश की खुफिया एजेंसिया गृहमंत्री की बजाए एक सासंद को देश की सुरक्षा से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी दे रही है तो फिर शिंदे क्यों न बेफिक्र होंगे। शायद खुफिया एजेंसियों के लिए गृहमंत्री से ज्यादा कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ज्यादा महत्वपूर्ण होंगे। अब ये क्यों होंगे इसे लिखने की शायद जरुरत नहीं है।