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रविवार, 27 अक्टूबर 2013

सुरक्षा में कोई चूक नहीं !

निशाने पर पटना, 7 धमाके, 5 लोगों की मौत, 100 के करीब घायल लेकिन बकौल बिहार मुखिया नीतिश कुमार सुरक्षा में कोई चूक नहीं हुई। धमाके के बाद मीडिया से मुखातिब नीतिश कुमार ने सुरक्षा में चूक की बात से साफ इंकार कर दिया। सुरक्षा में चूक का सवाल शुरु से लेकर आखिर तक कई कई बार नीतिश के सामने आया लेकिन नीतिश ने एक बार भी चूक की बात को स्वीकार नहीं किया।
नीतिश कहते हैं कि किसी भी तरह की ऐसी कोई घटना होने के कोई पूर्व सूचना या अलर्ट किसी भी एजेंसी ने जारी नहीं किया था। इसका मतलब तो ये हुआ नीतिश बाबू की जब आपकी सरकार के पास, खुफिया एजेंसियों के पास किसी तरह की अनहोनी की पूर्व सूचना होगी या इस पर अलर्ट जारी हुआ होगा तो ही सुरक्षा में चूक की बात को स्वीकार किया जा सकता है। लेकिन ये बात समझ में नहीं आयी कि अगर खुफिया एजेंसियों को किसी तरह के धमाके या हमले की पूर्व सूचना मिल जाती है तो फिर क्यों धमाके या आतंकी हमले होते हैं, ऐसे केस में तो किसी भी तरह की अनहोनी कभी होनी ही नहीं चाहिए।
नीतिश जी आप बार बार इसी बात को दोहरा रहे थे कि सुरक्षा में कोई चूक नहीं हुई, चलिए आपकी बात को हम स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन ये बताईए कि आखिर कैसे बिहार की राजधानी पटना निर्दोष लोगों के खून से लाल हो गई..?
कैसे पटना के गांधी मैदान में धमाके कैसे हो गए..?
कैसे रैली स्थल तक विस्फोटक सामग्री पहुंच गई..?
ये खुफिया तंत्र की बड़ी नाकामी तो है ही, लेकिन सवाल नीतिश जी आप पर भी उठते हैं क्योंकि आप बिहार के मुख्यमंत्री हैं। जिम्मेदारी आप की भी बनती है। आप ये कहकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकते कि खुफिया एजेंसियों ने किसी तरह का कोई अलर्ट जारी नहीं किया था और ऐसा बिहार में पहली बार हुआ है। ये सवाल और भी गंभीर इसलिए हो जाते हैं क्योंकि आप सात धमाकों में 5 लोगों की मौत के बाद भी यही कहते हैं कि सुरक्षा में किसी तरह की कोई चूक नहीं हुई है। वो भी ऐसे वक्त पर जब एक दिन पहले ही देश के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी पटना में मौजूद थे, ऐसे में तो सुरक्षा व्यवस्था इतनी ताक चौबंद होनी चाहिए थी कि सात धमाके क्या एक पटाखा भी नहीं फूटना चाहिए था।
नीतिश जी आपको सुरक्षा में चूक नहीं दिखाई देती, आपके मुताबिक सुरक्षा चाक चौबंद थी। लेकिन अगर हिम्मत है तो उन लोगों के परिजनों से आंख में आंखें डालकर ये बात कहिए जिन्होंने अपनों को इन धमाकों में खोया है। सुरक्षा में चूक न होती तो नीतिश जी मारे गए निर्दोष 5 लोग आज रैली के बाद अपने घर पहुंचते लेकिन घर पहुंची तो उनकी मौत की ख़बर।
उम्मीद करते हैं नीतिश जी कि अब जांच में और कोई चूक नहीं होगी और मानवता के दुश्मन, 5 निर्दोष लोगों की मौत के गुनहगार जल्द सलाखों के पीछे होंगे।


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मोदी रन PART-1

2014 के भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र दामोदर दास मोदी दौड़ रहे हैं, बेतहाशा दौड़ रहे हैं, बिना रूके दौड़ रहे हैं, गिर कर संभल रहे हैं फिर दौड़ रहे हैं, ये छोड़िए मौका मिलते ही उड़ने से भी परहेज नहीं करते। बस हर हाल में मंजिल पा लेना चाहते हैं, प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच जाना चाहते हैं। आखिर मोदी कहां दौड़ रहे हैं, कहां गिर रहे हैं और कहां उड़ रहे हैं, इस पर बात करने से पहले मोदी के चाहने वालों को जिक्र करना चाहूंगा जो किसी भी सूरत में मोदी को देश के अगले प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं।
मोदी के चाहने वालों को लगता है कि मोदी देश के प्रधानमंत्री बनेंगे तो देश की सारी समस्याओं को चुटकी बजाते ही हल कर देंगे। फिर चाहे वो गिरते रुपए को थामने की बात हो, अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की बात हो, महंगाई को कम करने की बात हो, बेरोजगारी का मसला हो, अपराध मुक्त समाज की बात हो या फिर अपने धूर्त पड़ोसी पाकिस्तान और चीन से सख्ती से निपटने की बात हो। मोदी के चाहने वालों को ये लगने लगा है कि ये सब सिर्फ और सिर्फ नरेन्द्र दामोदर दास मोदी के बूते की ही बात है। जाहिर है ये सब इतना आसान तो है नहीं जितना कि मोदी समर्थक समझ रहे हैं और दूसरों को समझा रहे हैं।   
खैर मोदी की दौड़ जारी है और मोदी के चाहने वाले भी मोदी को खूब दौड़ा रहे हैं और जिस तेजी से ये दौड़ चल रही है, उसे देखकर तो ऐसा लगता है कि मोदी समर्थकों का बस चले तो वे मनमोहन सिंह को हटाकर मोदी को आज ही प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा दें। दरअसल प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए मोदी रन का सफर जारी है। मोदी के गढ़ गुजरात से शुरू हुई मोदी रन देश के सभी राज्यों से होकर गुजर रही है लेकिन मोदी रनगैर भाजपा शासित राज्यों के साथ ही उन राज्यों में मोदी के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही है, जहां पर भाजपा के पास या तो गिनी चुनी सीटें हैं या फिर उन राज्यों में भाजपा की झोली सूनी ही रही है।
मैंने सोचा क्यों न मोदी रन में अपने भी हाथ आजमाएं जाएं। गुजरात से मोदी रन शुरु करते हुए मैंने भी आज मोदी को दौड़ना में कोई कसर नहीं छोड़ी, पहले गुजरात, फिर महाराष्ट्र, फिर उत्तराखंड, नरेन्द्र मोदी को एक पल के लिए भी आराम करने का मौका नहीं दिया। बस दौड़ाते रहा, दौड़ाते रहा, लेकिन ये क्या जैसे ही राजस्थान आया मोदी की तो मानो रफ्तार ही थम गयी। दो कदम दौड़ते ही मोदी धड़ाम से नीचे गिर जाते। समझ में नहीं आया कि आखिर राजस्थान का किला फतह करने में क्यों मोदी को पसीने आ रहे हैं। 2009 के आम चुनाव के नतीजे उठाकर देखा तो समझ में आया कि यहां तो 25 में से 20 लोकसभा सीटें कांग्रेस के कब्जे में हैं, जबकि भाजपा के पास सिर्फ 4 लोकसभा सीटें है और एक बची हुई सीट निर्दलीय के कब्जे में है। जाहिर है 4 से 25 न सही 20 में भी अगर पहुंचना है तो दम तो लगाना ही पड़ेगा और ये राह इतनी आसान भी नहीं, शायद इसीलिए ही मोदी को राजस्थान पार करने में पसीना आ रहा है।
मैंने सोचा ऐसे तो मोदी प्रधानमंत्री कैसे बन पाएंगे, कैसे अपने पीएम इन वेटिंग के टिकट को कनफर्म कर पाएंगे। अभी तो राजस्थान में ही एंट्री की है, इसके बाद तो आंध्र प्रदेश है, बिहार है, उत्तर प्रदेश है, कर्नाटक है, तमिलनाडु है और न जाने कितने ऐसे राज्य जहां की डगर मोदी के लिए आसान तो बिल्कुल भी नहीं रहने वाली।
खैर गिरते – पड़ते मोदी ने आखिरकार राजस्थान का किला भी फतह कर ही लिया। राजस्थान के बाद मोदी पहुंचे केरला लेकिन यहां तो हालात और भी मुश्किल निकले। मुश्किल होते भी क्यों न यहां की 20 लोकसभा सीटों में भाजपा शून्य जो है, जबकि कांग्रेस 13 सीटों की मालिक है। गिर कर उठने के फिर से दौड़ में शामिल होने के कई मौके थे, लिहाजा ये पड़ाव भी पार हो गया लेकिन इसके बाद आया भाजपा का दक्षिण का वो किला जिसे भाजपा ने बमुश्किल फतह किया था लेकिन अब वो बीते जमाने की बात हो गयी है। वर्तमान में भले ही भाजपा के पास कुल 28 में से 19 सीटें हों और कांग्रेस 6 सीटों की मालिक हो, लेकिन इसी साल कर्नाटक में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे जो भाजपा को 2008 की 110 विधानसभा सीटों से 40 सीटों पर ले आए, ये बताने के लिए काफी हैं कि 2014 में भाजपा के लिए 2009 का इतिहास दोहराना बिल्कुल भी आसान नहीं होगा। जारी है...

मोदी रन में आज तो फिलहाल में कर्नाटक तक ही पहुंच पाया, अभी तो कई राज्य बाकी हैं, जल्द लौटता हूं मोदी रन PART -2” के साथ।


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शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2013

पीएम बनने लायक सोच तो लाईए राहुल जी

कांग्रेस युवराज राहुल गांधी मनमोहन सरकार के फैसलों पर सवाल उठाते हुए प्रधानमंत्री की समझ और अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा देते हैं, लेकिन हमारे दिलेर प्रधानमंत्री इसके बाद भी कहते हैं कि वे राहुल को प्रधानमंत्री बनना देखना चाहते हैं और राहुल के लिए किसी भी वक्त पीएम की कुर्सी खाली करने को तैयार हैं। केन्द्रीय मंत्रियों से लेकर कांग्रेस शासित सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और कांग्रेस का हर छोटा बड़े नेता चाटुकारिता की हदें पार करते हुए राहुल के गुणगान करते नहीं आघाते। हर कांग्रेसी को राहुल गांधी देश के पीएम की कुर्सी के लिए सबसे योग्य नेता नजर आते हैं। सोनिया गांधी को भी शायद ये लगने लगा, जिसके बाद सोनिया ने जनवरी 2013 में जयपुर में कांग्रेस के चिंतन शिविर में राहुल को कांग्रेस उपाध्यक्ष के रूप में पार्टी में नंबर दो की कुर्सी सौंप दी गई। लेकिन राहुल बाबा को देखकर ये लगता नहीं कि राहुल गांधी को ये बात समझ में आ रही है। पांच राज्यों के चुनाव प्रचार मे निकले राहुल गांधी बांहे चढ़ाकर लोगों से जिस तरह बात कर रहे हैं, जिस तरह की बातें कर रहे हैं, उससे तो कम से कम यही जाहिर होता है।
राहुल कहते हैं कि कांग्रेस सभी लोगों को साथ लेकर चलती है लेकिन राहुल की चुनावी जनसभाओं को देखकर तो ऐसा नहीं लगता। राहुल कहते हैं कांग्रेस धर्म की राजनीति नहीं करती, लोगों को आपस में बांटने का काम नहीं करती लेकिन राहुल बोल क्या रहे हैं इसका अंदाजा शायद उन्हें भी नहीं है या फिर ये खास वर्ग को लुभाने के लिए कांग्रेस की चुनाव से पहले एक सियासी चाल है..!
राहुल बार बार अपनी दादी इंदिरा गांधी औऱ पिता राजीव गांधी की हत्या का जिक्र कर क्या जताना चाह रहे हैं..? क्या ये वोट के लिए सिर्फ एक भावुक अपील है या फिर से गढ़े मुर्दों को उखाड़ने की एक कवायद जो लोगों के बीच नफरत की आग को और ज्यादा भड़काएगी और एक खास वर्ग को कांग्रेस की तरफ मोड़ेगी..!
मुजफ्फरनगर दंगा पीड़ित दंगे की कड़वी यादों को अपने दिल से निकाल फेंकना चाहते हैं लेकिन राहुल अपनी हर जनसभा में मुजफ्परनगर दंगों को जिक्र कर लोगों के जख्मों को हरा कर रहे हैं..!
जिस राहुल गांधी को देश की सबसे बड़ा राजनीतिक दल का हर एक कार्यकर्ता भावी प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहती है, उस राहुल गांधी के पास क्या जनता के सामने बोलने के लिए कुछ नहीं है। क्यों राहुल गांधी भविष्य की बजाए उस भूतकाल की बात कर रहे हैं जो लोगों को को सिर्फ दुख ही देगा..?
क्यों वे भविष्य की, विकास की, खुशहाली की बात नहीं कर रहे..? क्या राहुल गांधी की सोच को लकवा मार गया है..?
क्यों वो बार बार अपने परिवार की हत्याओं का जिक्र पर वोट के लिए एक भावुक अपील कर रहे हैं और समुदाय विशेष के वोटों के लिए बड़ी मुश्किल से शांत हुई दंगों की आग को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं..?
राहुल को क्यों बार बार जनता को ये याद दिलाने की जरुरत पड़ रही है कि उसने एक गांव में जाकर पानी पिया तो उसका पेट खराब हो गया, गांव में एक रात गुजारी तो मुझे मच्छरों ने काट लिया। किसने बोला था राहुल जी आपको उन गांवों में जाने के लिए। अगर गए तो और कैमरे के सामने पानी पीना पड़ ही गया था, रात गुजारनी पड़ ही गयी थी तो उसके बाद आपने क्या कर लिया। उस एक गांव की ही कायाकल्प कर देते, वहां लोगों को साफ पीने का पानी मुहैया करा देते, उस गांव को उत्कृष्ट गांव बनाकर दिखा देते तो आपको हक होता कि ये बोलने का कि आपने वहां पर जाकर पानी पिया था और एक रात उस गांव में गुजारी थी लेकिन वहां तो हालात आज भी वैसे ही हैं।
राहुल जी भारत की 121 करोड़ जनता का तो पता नहीं लेकिन आपकी पार्टी के कार्यकर्ता और कांग्रेस के चाटुकार नेताओं की फौज के साथ ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तो आपको देश का प्रधानमंत्री बनता देखना चाहते ही हैं, कम से कम उनके सपने को पूरा करने के लिए ही सही प्रधानमंत्री बनने लायक सोच तो लाइए, सोच तो लाईए राहुल जी।


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गुरुवार, 24 अक्टूबर 2013

प्याज, सत्ता और मतदाता

प्याज के दामों से सबसे ज्यादा प्रभावित दिल्ली में तो मैं नहीं हूं लेकिन एक और चुनावी राज्य राजस्थान की राजधानी जयपुर में शाम को टहलते वक्त आपस में प्याज की कीमतों पर चर्चा कर रही महिलाओं के एक झुंड ने मेरा ध्यान अपनी ओर जरुर खींचा। चलते चलते में जितना समझ पाया वो यही था कि उनमें से एक महिला आज ही बाजार से प्याज खरीद कर लाई थी और प्याज की कीमतों पर दूसरी महिलाओं का सामान्य ज्ञान बढ़ा रही थी। चारों तरफ चर्चा में सिर्फ प्याज ही है, प्याज की कीमतों पर बहस और चर्चाओं का दौर जारी है तो उन दिनों को याद किया जा रहा है जब लोग सब्जीवाले से बिना दाम पूछे प्याज तुलवा लेते थे।
ऐसे वक्त पर जब पांच राज्यों में चुनावी मौसम अपने पूरे शबाब पर है, सत्ता पाने के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों की मतदाताओं को लुभाने की कोशिशें जारी हैं। प्याज सत्ताधारी दलों के लिए किसी विलेन से कम साबित नहीं हो रहा है। प्याज रूपी विलेन की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार और खाद्य मंत्री के वी थॉमस से मुलाकात कर दिल्ली में प्याज की आपूर्ति में सुधार लाने का अनुरोध करना पड़ा।
दिल्ली की सियासत में प्याज की अहमियत को शीला दीक्षित से बेहतर और कौन समझ सकता है, क्योंकि ये वही प्याज है जिसने 1998 में सत्ताधारी भाजपा को पटखनी देते हुए दिल्ली में अपना झंडा फहराया था। प्याज की आसमान छूती कीमतें शायद शीला को 1998 का वो दौर याद दिला रही होंगी और शायद यही शीला दीक्षित की डर की वजह भी है।
शीला दीक्षित की पूरी कोशिश यही है कि चुनाव से पहले कैसे भी प्याज की कीमतें जमीन पर आ जाएं ताकि प्याज न खरीद पाने की मतदाताओं का गुस्सा कम से कम दिल्ली में मतदान की तारीख 4 दिसंबर को शीला सरकार के खिलाफ न निकले। प्याज के चढ़ते दामों पर शीला की उड़ी हुई नींद का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि शीला ने सस्ते दाम में प्याज बेचने देने के लिए चुनाव आयोग के सामने गुहार लगाई है।
वैसे अच्छी बात ये है कि प्याज की आसमान चढ़ती कीमतों का ये डर आम आदमी से ज्यादा अब राजनीतिक दलों को सताने लगा है, क्योंकि प्याज की कीमतें जितनी चढ़ेंगी नेताओं की कुर्सी जाने का डर भी उतना ही बढ़ता जाएगा। ये डर दिखने भी लगा है और पांच साल तक जनता की सुध न लेने वाली सरकार के मुखिया को अब अचानक से नजर आने लगा है कि प्याज लोगों की थाली से गायब हो रहा है और प्याज के रुप में महंगाई किस कदर सुरसा के मुंह की तरह बढ़ रही है। अब इन्हें लोगों को सस्ते दाम पर प्याज उपलब्ध कराने की चिंता भी सताने लगी है और आम आदमी की पहुंच से दूर हो रहे प्याज को उनकी थाली में लाने का वादा भी ये करने लगे हैं। ये बात अलग है कि सरकार के पांच साल के कार्यकाल में इन्होंने आम जनता की सुध लेने की जहमत तक नहीं उठाई।
बहरहाल चुनावी मौसम में एक बार फिर से प्याज अहम रोल अदा करने जा रहा है, वोट के लिए प्याज की कीमतों को जमीन पर लाने के लिए नेता किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं, वो जमाखोरों औऱ मुनाफाखोरों को जमकर कोस रहे हैं लेकिन बहुत कम लोग ये जानते हैं कि जमाखोरों औऱ मुनाफाखोरों को संरक्षण देने वाले भी ये नेतागण ही हैं ऐसे में देखना ये होगा कि क्या मतदाता इस न दिखाई पड़ने वाले राजनातिक गठजोड़ को समझ पाएंगे और अपने वोट के जरिए ऐसे भ्रष्ट नेताओं को सबक सिखाएंगे..?

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बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

लोकायुक्त पर रार !

सरकार किसी की और श्रेय विरोधी ले जाए, ऐसे कैसे हो सकता है। अगर होता दिखाई दे और नेताजी खामोश बैठे रहें ऐसे तो संभव ही नहीं है। भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसने वाले लोकायुक्त अधिनियम को लेकर उत्तराखंड में सत्तापक्ष और विपक्ष में मचा घमासान तो कुछ इसी ओर ईशारा कर रहा है। लोकायुक्त अधिनियम को राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की मंजूरी मिलने के बाद भी जिस तरह से बहुगुणा सरकार ने इसको लागू करने को लेकर लचर रवैया अपनाया है, उसके बाद इस अधिनियम के अधर में लटकने का आसार ज्यादा दिखाई दे रहे हैं। खास बात ये है कि मुख्यमंत्री महोदय को अधिनियम में खामियां नजर आती हैं लेकिन उनकी ही पार्टी के नेता और विधानसभा अध्यक्ष गोविंद कुंजवाल चाहते हैं कि लोकायुक्त कानून को उसके मूल रूप में ही लागू किया जाए और जरुरत महसूस होने पर ही आवश्यक संशोधन किए जाएं।
दो साल पहले लोकपाल को लेकर जब समाज सेवी अन्ना हजारे का आंदोलन अपने चरम पर था ठीक उसी वक्त उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले दोबारा प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाले भाजपा के भुवन चंद्र खंडूड़ी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सशक्त लोकायुक्त लाने का वायदा किया था और उसी के तहत राज्य विधानसभा में इस विधेयक को रखा गया था। जिसे तत्कालीन राज्यपाल मार्गेट अल्वा ने अपनी सहमति देते हुए इसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेज दिया था। जिसके बाद बीती चार सितंबर को राष्ट्रपति ने इस विधेयक पर अपने हस्ताक्षर किए और लोकायुक्त अधिनियम का उत्तराखंड मे लागू होने का रास्ता साफ हो गया।
राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजे जाने और राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने की समयावधि के बीच उत्तराखंड में सत्ता परिवर्तन हो चुका था और 2012 के विधानसभा चुनाव में कांटे के मुकाबले के बाद आखिरकार कांग्रेस राज्य में सरकार बनाने में सफल साबित हुई और मुख्यमंत्री के तौर पर विजय बहुगुणा ने शपथ ली।
सूबे का निजाम बदला तो वह कैसे लोकायुक्त का श्रेय पिछली सरकार को दे सकता था लिहाजा बहुगुणा ने राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद भी लोकायुक्त अधिनियम के कई प्रावधानों पर आपत्ति जताते हुए ये संकेत दिए हैं कि पिछली भाजपा सरकार द्वारा पारित ये विधेयक शायद ही अपने मूल रूप में लागू हो पाए। हालांकि इस पर अखिरी फैसला सात नवंबर को होने वाली बहुगुणा कैबिनेट की बैठक में ही होगा लेकिन मुख्यमंत्री बहुगुणा ये कह चुके हैं कि इस अधिनियम में संशोधन भी किया जा सकता या फिर इसे निरस्त कर नया विधेयक भी लाया जा सकता है।
दरअसल कभी न्यायाधीश रहे मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को निचली न्यायपालिका को लोकायुक्त के दायरे में लाना असंवैधानिक लग रहा है। वहीं मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा ने लोकायुक्त को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इतना सशक्त लोकायुक्त किसी राज्य मे नहीं बना है और इससे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा। साथ ही इसमें किसी तरह के संशोधन को अनुचित ठहराते हुए सरकार से इसे इसके मूल स्वरूप में लागू करने की मांग की है। लेकिन उत्तराखंड में फिलहाल इस लोकायुक्त अधिनियम का लागू होना फिलहाल टेढ़ी खीर नजर आ रही है क्योंकि कांग्रेसी खेमा इसमें भी अपना नफा नुकसान तलाश रहा है।
वर्तमान स्वरूप में इस लोकायुक्त अधिनियम के लागू होने की स्थिति में भ्रष्टाचार पर कितना अंकुश लगता और भ्रष्टाचारियों पर कितनी नकेल कसती ये तो वक्त ही तय करता। लेकिन फिलहाल श्रेय की लड़ाई में भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसने वाला कानून उत्तराखंड में लागू होने से पहले ही दम तोड़ता दिखाई दे रहा है और शायद भ्रष्टाचारी राजनेता भी तो यही चाहते हैं।

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राहुल गांधी का डर !

20 जनवरी 2013 को राजस्थान की राजधानी जयपुर में कांग्रेस के चिंतन शिविर में पार्टी का उपाध्यक्ष बनने से पहले राहुल गांधी ने अपनी मां से ये जाना कि सत्ता जहर के समान है, लेकिन आश्चर्य उस वक्त हुआ जब पता चला कि राहुल गांधी ने इसे सिर्फ जाना पर समझा बिल्कुल भी नहीं। कई सवाल खड़े हुए, बहस के कई दौर चले कि अगर सत्ता जहर है तो फिर राहुल  गांधी क्यों इस जहर को पीने के लिए ललायित दिखाई पड़ रहे हैं। एक बार फिर से राजस्थान की धरती पर राहुल गांधी को ये एहसास हुआ है कि सत्ता का ये जहर उन्हें कभी भी निगल सकता है। राहुल गांधी ने जिस तरह से अपनी दादी व देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और अपने पिता व देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या का जिक्र करते हुए अपनी हत्या की आशंका जतायी उससे तो कम से कम यही जाहिर होता है कि राहुल गांधी को अब ये डर भी सताने लगा है कि सत्ता रुपी जहर एक दिन उनकी भी जान ले सकता है।
सवाल फिर खड़ा होता है कि क्या ये सिर्फ एक डर है या फिर सत्ता के लिए मतदाताओं से एक भावुक अपील जो लोगों को डराती है और भावुकता में बहकर एक बार फिर से कांग्रेस को सत्ता सौंपने की बात कहती है। राहुल के मन में चाहे जो कुछ हो लेकिन चुनावी जनसभा में मंच से कही गए राहुल के ये शब्द एक आम आदमी को, खासकर देश के युवा मतदाताओं को बहुत कुछ सोचने पर मजबूर जरुर करती है।
देश का एक युवा नेता जो अघोषित तौर पर 2014 के लिए कांग्रेस पार्टी का घोषित प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार है, वह कांग्रेस में नंबर दो की कुर्सी संभालने के बाद से अपने परिवार की कुर्बानियों का हवाला देते हुए भावुक अपील कर मतदाताओं से वोट मांग रहा है।
क्या इस युवा नेता के पास अपनी सोच के दम पर, अपनी भावी योजनाओं के दम पर, अपने कार्यों के दम पर मतदाताओं से वोट मांगने की कुव्वत नहीं है..?
क्या इस युवा नेता के पास देश के लाखों युवाओं के सपनों को नए पंख लगाने का दम नहीं है..?
क्या इस युवा नेता के पास देश का, शहरों का, गांवों का, हर गली कूचे के विकास का कोई रोडमैप दिखाकर जनता से वोट मांगने का हौसला नहीं है..?
क्या इस युवा नेता के पास एक भ्रष्टाचार मुक्त, भ्रष्टाचारियों मुक्त सरकार देने का भरोसा मतदाताओं को देने का दम नहीं है..?
क्या इस युवा नेता के पास एक अपराध मुक्त समाज देने का भरोसा देश की जनता को देने की हिम्मत नहीं है..?
अगर इऩ सब सवालों का जवाब हां में होता तो शायद 2014 के कांग्रेस के अघोषित तौर पर घोषित पीएम उम्मीदवार राहुल गांधी अपने परिवार में हुई मौतों का हवाला देते हुए सत्ता पाने के लिए भावुकता भरी अपील नहीं करते लेकिन अफसोस ऐसा हुआ नहीं !


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सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

सीएम बहुगुणा का खाने का रिकार्ड !

राजनीति में भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार की राजनीति में मस्त भ्रष्ट राजनेताओं को देखकर तो ऐसा लगने लगा था कि नेता सिर्फ भ्रष्टाचार की हांडी में पकने वाले घोटालों के लजीज व्यंजन का ही स्वाद चखते हैं। हर साल, हर महीने एक नई डिश भ्रष्टाचार की हांडी से उतरती है, इसे भ्रष्ट नेताओं से बेहतर और कौन बता सकता है कि हर नई डिश पिछली डिश से भी ज्यादा लजीज होती है। लेकिन आपको जानकर शायद हैरानी होगी कि हमारे ये महान नेतागण खाना भी खाते हैं। न सिर्फ खाते हैं बल्कि यहां पर भी वे खाने के सारे रिकार्ड अपने नाम करना चाहते हैं। दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों का तो पता नहीं लेकिन देवभूमि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा तो कुछ ऐसा ही कर रहे हैं।
दरअसल ये बात निकली उत्तराखंड के हल्दवानी के आरटीआई एक्टिविस्ट गुरविंदर सिंह चढ्ढा की एक आरटीआई से जो उन्होंने उत्तराखंड मुख्यमंत्री आवास और कार्यालय पर बीते एक साल के दौरान चाय पानी पर हुए खर्च की जानकारी को लेकर लगाई थी। मुख्यमंत्री कार्यालय से जो जानकारी मिली उसे जानकर एक बार को आपके भी होश उड़ जाएंगे।
मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा उपलब्ध कराई गयी जानकारी के अनुसार 13 मार्च 2012 को विजय बहुगुणा के उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज होने के बाद से अगस्त 2013 तक मुख्यमंत्री आवास और मुख्यमंत्री कार्यालय में चाय पानी, खाने पीने पर 56 लाख 74 हजार 728 रूपए खर्च किए गए हैं।
कुल 537 दिनों में औसतन एक दिन का चाय पानी, खाने पीने का खर्च 10 हजार 567 रूपए बैठता है। इसमें से मुख्यमंत्री कार्यालय में 27 लाख 34 हजार 153 रुपए खर्च किए गए तो मुख्यमंत्री कार्यालय में 29 लाख 40 हजार 575 रुपए खर्च किए गए। समझ से बाहर है कि आखिर सीएम आवास और कार्यालय में किस किस को क्या खिलाया और खुद खिलाया जाता है कि रोज का हजारों रुपए का खर्च आता है।
उत्तराखंड के सातवें मुख्यमंत्री बनने के बाद से लेकर काम को लेकर कम विवादों के लेकर ज्यादा चर्चा में रहने वाले विजय बहुगुणा के आवास और कार्यालय का 537 दिनों का ये खर्च 56 लाख 74 हजार 728 रूपए तब पहुंचा जब माननीय मुख्यमंत्री देहरादून में कम दिल्ली में ज्यादा रहते हैं।
बहुगुणा साहब को ये रकम भी शायद कम लगती हो क्योंकि जब वे सरकारी विज्ञापन के नाम पर कुछ महीनों में ही करीब 22 करोड़ अपनी छवि चमकाने के लिए पानी की तरह बहा सकते हैं, तो फिर खाने पीने में रोज के 10 हजार 567 रूपए खर्च करना विजय बहुगुणा के लिए कौन सी बड़ी बात है। (जरुर पढ़ें- मीडिया पर मेहरबान बहुगुणा सरकार !)
अगर फ्लैशबैक में जाएं तो शायद इस बात का जवाब हमें वहां पर मिल जाएं कि आखिर बहुगुणा ने ऐसा क्या खाया और खिलाया कि 537 दिनों में उनके आवास और कार्यालय पर खाने पीने पर 56 लाख 74 हजार रूपए खर्च हो गए। 2012 में उत्तराखंड में आपदा के बाद बहुगुणा ने आपदा प्रभावितों को उनके हाल में छोड़ शाही दावत उड़ाते देखे गए थे। इस साल भी जून में भीषण आपदा के बाद भी कुछ ऐसा ही हाल देखने को मिला था। जाहिर है शाही दावतों का दौर जारी रहेगा तो फिर क्यों न सीएम आवास का खर्च 29 लाख 40 हजार 575 रूपए पहुंचेगा और सीएम दफ्तर का खर्च 27 लाख 34 हजार 153 रुपए पहुंचेगा। एक बात और गौर करने लायक है, वो ये कि ये उसी कांग्रेस पार्टी के मुख्यमंत्री हैं, जिनके नेता सीना तान के ये कहते फिरते हैं कि 5 रुपए में एक व्यक्ति भरपेट भोजन कर सकता है।


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शनिवार, 19 अक्टूबर 2013

आम आदमी के भी तो सपने हैं

सपने तो सभी देखते हैं, एक सपना ही तो है जो अपना है, जो चाहे देखो, जिसे चाहो देखो, जो मन चाहे वो करो। न तो कोई सपने देखने का टिकट मांगने वाला और न ही आपको सपने देखने से रोकने वाला। ऐसे में अगर यूपी के उन्नाव के डौंडिया खेड़ा गांव में एक साधु शोभन सरकार ने सपने में राजा राम बक्श सिंह के किले में जमीन के अंदर सोने का भंडार देख लिया तो कौन सा गुनाह हो गया..!
ये बात अलग है कि साधु के सपने को मूर्त रूप देने के लिए केन्द्रीय मंत्री चरण दास महंत ने पूरी ताकत लगा दी जिसके बाद केन्द्र सरकार को भी साधु के सपने वाला सोने का भंडार नजर आने लगा और जीएसआई और एएसआई को काम पर लगा दिया कि खुदाई शुरु कर सोना निकाल कर लाओ। खास बात ये है कि डौडिया खेड़ा गांव के साधु शोभन सरकार ने ये सपना गहरी नींद में बंद आंखों से देखा था जबकि केन्द्र सरकार को ये सपना खुली आंखों से ही दिखाई देने लगा है और सरकार को उम्मीद है कि वे जनता से हकीकत में किए वादों को पूरा न कर पाए तो क्या साधु के सपने को पूरा करके ही दम लेंगे।
डौडिया खेड़ा में लगा मेला इसका प्रमाण भी है और जिस तरह से उन्नाव के डीएम ने फावड़ा चलाकर खजाने की खोज में खुदाई का शुभारंभ किया उससे तो यही जाहिर होता है कि सरकार के साथ ही आला प्रशासनिक अधिकारी भी कर्म से ज्यादा सपने में विश्वास रखते हैं।
सपने देखना और उसे पूरा करने की कोशिश करना अच्छी बात है लेकिन सरकार ने इतनी तत्परता अगर रोज रात को भूखे पेट सोने वाले के किसी दिन भरपेट खाना मिलने के सपने को पूरा करने में दिखाई होती तो कितना अच्छा होता।
सरकार ने अगर इतनी तत्परता एक बेरोजगार के नौकरी के सपने को पूरा करने में दिखाई होती तो कितना अच्छा होता।
सरकार ने इतनी तत्परता कर्ज के बोझ तले दबे किसान के खुशहाल जीवन के सपने को पूरा करने में दिखाई होती तो कितना अच्छा होता।
सरकार ने इतनी तत्परता अपराध मुक्त समाज का सपना देखने वाले एक आम आदमी के सपने को पूरा करने में दिखाई होती तो कितना अच्छा होता।
सरकार ने इतनी तत्परता महंगाई के बोझ तले आम आदमी के जरुरी सामान उसकी पहुंच में होने के सपने को पूरा करने में दिखाई होती तो कितना अच्छा होता।
सरकार ने इतनी तत्परता स्विस बैंकों में जमा काले धन को वापस लाने के आम आदमी के सपने को पूरा करने में दिखाई होती तो कितना अच्छा होता।
सरकार ने इतनी तत्परता बिजली, पानी और सड़क से महरूम लाखों लोगों के बिजली, पानी और सड़क के सपने को पूरा करने में दिखाई होती तो कितना अच्छा होता।
सरकार से ऐसे सपनों को पूरा करने की उम्मीद लगाए बैठी इस देश की जनता के सपनों की फेरहिस्त काफी लंबी है, जो न तो नाजायज है और न ही इतनी मुश्किल जिसे पूरा करना किसी सरकार के बस की बात न हो लेकिन इन सपनों को पूरा करने का वक्त हमारी सरकार के पास नहीं है, क्योंकि वे तो कुर्सी के सपने को पूरा करने में ही व्यस्त हैं।
क्योंकि वे तो अपनी तिजोरियों को भरने के सपने देखने और उन्हें पूरा करने में व्यस्त हैं।
क्योंकि वे तो देश की जनता को जाति और धर्म के आधार पर बांट कर राज करने के अपने सपने को पूरा करने में ही व्यस्त हैं।
बहरहाल डौडिया खेड़ा में सपने को सोने में बदलने की कवायद जारी है, सोने के सपने पर भरोसा तो नहीं लेकिन फिर भी उम्मीद करते हैं कि ये सपना पूरा हो। साथ ही ये भी उम्मीद करते हैं कि सरकार साधु के सपने की तरह आम आदमी के उन सपनों को पूरा करने में भी इतनी ही तत्परता दिखाए। जिसके लिए न ही किसी तरह के सर्वे की जरुरत है और न ही किसी खुदाई की। जरूरत है तो सिर्फ ईमानदारी और सपनों को पूरा करने की इच्छाशक्ति की।      

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शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

देवदूतों का बोलबाला !

आस्था के बाजार में सब कुछ बिकता है, बस आपके पास बेचने का हुनर होना चाहिए और खरीदने वाले की जेब में पैसा। वैसे धर्मस्थलों पर आपने कभी न कभी इस बात का अनुभव जरुर किया होगा। मेरा हाल ही में अजमेर और पुष्कर भ्रमण के दौरान कुछ ऐसा ही अनुभव रहा। हालांकि ये अनुभव मैं इससे पहले भी कई प्रसिद्ध धर्मस्थलों पर ले चुका हूं, लेकिन इस बार का अनुभव इसलिए आपसे साझा कर रहा हूं क्योंकि अब तक मैं समझता था कि ये सब सिर्फ हिंदुओं के धर्मस्थलों पर ही देखने को मिलता है, लेकिन वास्तव में अधिकतर धर्मस्थलों पर देवदूतों की ही तूती बोलती है।
बीते दिनों अपने कुछ मित्रों के साथ विश्व प्रसिद्ध दरगाह शरीफ अजेमर और पुष्कर जाना हुआ। गरीब नवाज़ के दर पर पहुंचते ही यहां भी हमें कुछ लोग ऐसे भी मिले जो आस्था के महाबाजार में आस्था के पुजारियों की जेबों को ढीली करने का कोई मौका नहीं छोड़ते। अचानक से हमारे सामने प्रकट हुए एक महाशय ने भी हमें भीड़ से अलग हटकर बिना लाईन में लगे फटाफट दर्शन कराने का ऑफर दिया। इसके बदले में इन महाशय ने कोई पैसे की मांग तो नहीं कि लेकिन पुष्प हमें खरीदने ही थे, तो ऐसे में ऑफर बुरा नहीं लगा क्योंकि यहां से हमें पुष्कर के लिए भी कूच करना था और शाम तक जयपुर भी पहुंचना था।
खैर हम इन महाशय के साथ हो लिए और भारी भीड़ होने के बावजूद सिर्फ 5 मिनट में हम दर्शन कर फारिग हो गए। वहां भी नजराने के नाम पर पैसों की मांग करने वालों की कोई कमी नहीं थी। नजराने की डिमांड इस कीमत पर की जा रही थी कि ख्वाजा आपकी हर मुराद पूरी करेंगे और आपकी झोली खुशियों से भर देंगे। ये समझ नहीं आया कि क्या बिना नजराने के ख्वाजा अपने दर पर दुआ मांगने वालों की दुआओं को कबूल नहीं करेंगे और उन्हें खाली हाथ लौटा देंगे।
ख्वाजा के दर से हम पुष्कर के लिए रवाना हो गए। पुष्कर की धरती पर अभी हमारी गाड़ी ढंग से रुकी भी नहीं थी कि एक सज्जन हमारी गाड़ी के पास पहुंच गए। गाड़ी से नीचे उतरते ही इन महाशय ने ब्रह्मा जी के मंदिर के साथ ही पुष्कर सरोवर के दर्शन और यहां के धार्मिक महत्व को बताने की कीमत 50 रुपए बताते हुए अपने साथ चलने का अनुरोध किया। पुष्कर के धार्मिक महत्व और इतिहास की पूरी जानकारी देने के बाद ये हमें एक प्रसाद की दुकान पर लेकर गए और प्रसाद खरीदकर पूजा करने के लिए चलने की बात कही। जिसके बाद पुष्कर सरोवर के किनारे हम पांच मित्रों को इन्होंने वहां पर पहले से बैठे 5 अलग अलग पंडितों के पास बैठने के लिए कहा। पंडित जी ने कुछ ही मिनटों में पूजा संपन्न करा दी लेकिन पूजा के दौरान एक बार बीच में भोग के नाम पर 501 से लेकर 5001 तक की भेंट देने का अनुरोध किया और आखिर में अपनी दक्षिणा की मांगी की ताकि पूजा का फल हम लोगों को मिल सके। ये बात इस अंदाज में कह गई कि मानो भोग के लिए पैसे और पूजा कि मुहंमांगी दक्षिणा न देने पर जैसे भगवान हमसे रुष्ट हो जाएंगे और हम दर्शन करने के बाद भी प्रभु की कृपा से वंचित रह जाएंगे। खैर हम सभी ने अपनी-अपनी सामर्थ्य अनुसार पंडित जी को दक्षिणा दी और इसके बाद हम दर्शन के लिए ब्रह्मा जी के मंदिर पहुंच गए। आखिर में ये सज्जन हमें मंदिर के बार स्थित एक देवी देवताओं की प्रतिमाओं की दुकान में भी लेकर गए और लगे हाथों दुकान से सामान खरीदने की सलाह भी दे डाली।
कुल मिलाकर दरगाह शरीफ से लेकर पुष्कर तक मुझे एक ही बात समझ में आयी कि धर्मस्थलों में भगवान के दर्शन हो या न हों लेकिन देवदूतों के दर्शन आपको जरुर हो जाएंगे जो देवों के दर्शन और पुण्य कमाने के नाम पर आपकी जेब ढीली करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं, लेकिन ये बात समझ में नहीं आयी कि निर्मल बाबा की तरह श्रद्धालुओं को प्रभु की कृपा दिलाने का दावा करने वाले इन देवदूतों पर आखिर प्रभु की कृपा क्यों नहीं बरसती।


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गुरुवार, 17 अक्टूबर 2013

दोष आसाराम और नारायण का नहीं !

हमारे देश में आस्था का तोड़ नहीं है और आस्था अगर अंधी हो तो फिर क्या कहने। अंधी अस्था के सागर में डुबकी लगाने वालों से तो कोई जीत ही नहीं सकता। अब आसाराम के समर्थकों को ही देख लिजिए। ये आसारम के प्रति उनकी अंधी आस्था नहीं तो और क्या है। आसाराम जेल में बंद है, आसाराम का कुपुत्र नारायण साईं पुलिस के साथ चोर-सिपाही का खेल खेल रहा है, लेकिन इनके अंध समर्थकों को अब भी दोनों पाक साफ लगते हैं। उन्हें लग रहा है कि दोनों को साजिश के तहत फंसाया जा रहा है। माना कि मामला अदालत में है और दोनों अभी तक न्यायालय द्वारा दोषी करार नहीं दिए गए हैं, लेकिन बाप बेटे के खिलाफ रेप, यौन शोषण सहित तमाम आरोप और गवाह के सामने आने के बाद आसाराम का जेल पहुंचना और नारायण साई का सिर पर पैर रखकर भागना कम से कम ये तो जाहिर करता ही है कि दोनों पाक साफ तो नहीं है।
लाई डिटेक्टर मशीन के डर से आसाराम की याददाश्त भी वापस आ गयी और आसाराम को वह सब याद आ गया, जिन काली करतूतों को आसाराम ने संत का चोला ओढ़ कर अंजाम दिया था। अभी तक लड़की को पहचानने से ही इंकार करने वाले आसाराम को लड़की भी याद आ गयी और अपनी काली करतूत भी जो उसने पीड़िता के साथ की थी।
लेकिन इसके बाद भी आस्था के पुजारियों की आंखों से शर्म का पर्दा हटने को तैयार नहीं है। आसारम के अंध समर्थकों को अब भी अपने पूज्यनीय बापू पर पूरा भरोसा है। गजब है आस्था का अंध बाजार भी जहां बड़े-बड़े पापी भी आस्था के इन पुजारियों को संत नजर आते हैं। दुनिया दोष आसाराम और उसके बेटे नारायण साईं को दे रही है, लेकिन वास्तव में इनका इसमें कोई कसूर नहीं है। कसूर है आंखें बंद कर आस्था के नाम पर ऐसे संतों को पूजने वालों का जो इन्हें सिर माथे पर बैठाने में देर नहीं करते हैं और इन्हें  भगवान से भी ऊंचा दर्जा दे देते हैं। अब इनके ये कथित भगवान क्या गुल खिला रहे हैं, वह सबके सामने हैं, लेकिन अफसोस इस बात का है कि इनकी आंखों पर अंधी आस्था का पर्दा इस तरह पड़ा हुआ है कि इन्हें अब भी संत का चोला ओढ़े ये ढोंगी बेदाग नजर आते हैं। इन्हें अब भी लगता है कि कोई चमत्कार होगा और कपड़े धोने का टाईड टाईप कोई डिटरजेंट अचानक से आएगा और आसाराम औऱ नारायण साईं पर लगे सारे आरोपों को कपड़े पर लगे किसी दाग की तरह धो देगा लेकिन इन अंध समर्थकों को कौन समझाए कि ये सिर्फ विज्ञापन में ही होता है, असल जिंदगी में नहीं। आंखे खोलों अंधी आस्था के पुजारियों वर्ना हिंदुस्तान में अंध अस्था की रायल्टी के सहारे भगवान बने बैठे ऐसे कई आसाराम और नारायण साईं आपको बेवकूफ बनाते रहेंगे।   


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बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

मीडिया पर मेहरबान बहुगुणा सरकार !

उत्तराखंड में आई भीषण त्रासदी में जहां हजारों लोग मौत के आगोश में समा गए वहीं पलभर में लाखों लोगों की खुशियां मातम में बदल गयी। घर बार सब कुछ त्रासदी की भेंट चढ़ जाने से लोग सड़कों पर आ गए। पलभर में मानो उनकी दुनिया ही उजड़ गयी। ऐसे मुश्किल वक्त में देशवासियों ने दिल खोलकर आपदा प्रभावितों की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाए। सरकारी आंकड़े कहते हैं कि अभी तक मुख्यमंत्री राहत कोष में देशभर से करीब 327 करोड़ रुपए जमा हो चुके हैं जबकि बहुगुणा सरकार ने इस राशि में से करीब 125 करोड़ रुपए खर्च भी कर चुकी है। लेकिन सवाल ये खड़ा होता है कि फंड की कोई कमी न होने के बावजूद भी आपदा प्रभावितों की मदद को लेकर राज्य सरकार आखिर अपना खजाना खोलने में क्यों शर्मा रही है, जबकि अपनी नाकामियां छिपाने के लिए राज्य सरकार ने मीडिया के लिए खजाने का मुंह खोलने में जरा सी भी देर नहीं की।
सूबे के मुखिया विजय बहुगुणा कहते हैं कि आपदा प्रभावितों को हर संभव मदद दी जा रही है। उनके राहत एवं पुनर्वास में कोई कमी नहीं छोड़ी जा रही है, लेकिन ऐसा दिखता तो नहीं। जो दिख रहा है, वो यह कि विजय बहुगुणा ने आपदा के बाद से सरकारी नाकामी पर पर्दा डालने और सरकार की छवि चमकाने के लिए मीडिया पर दिल खोलकर सरकारी खजाना लुटाया। शायद ही ऐसा कोई समाचार चैनल, समाचार पत्र या फिर पत्रिका होगी जिसमें सरकार के गुणगान के लिए बहुगुणा ने सरकारी विज्ञापन के नाम पर पानी की तरह पैसा न बहाया हो।
सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी के अनुसार आपदा के बाद से सितंबर तक बहगुणा सरकार ने करीब साढ़े 22 करोड़ रुपए के सरकारी विज्ञापन विभिन्न समाचार चैनलों, समाचार पत्रों औऱ पत्रिकाओं को जारी किए। उत्तराखंड में आपदा प्रभावित दाने दाने को मोहताज हो रहे थे। लेकिन इन सरकारी विज्ञापनों के जरिए समाचार चैनलों, समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में सरकार की तारीफ में कसीदे पढ़े जा रहे थे। बताया जा रहा था कि आपदा के दौरान सरकार के गुडवर्क के चलते हजारों लोगों की जानें बचायी गयी तों आपदा प्रभावितों को तत्काल राहत सामग्री पहुंचाई गयी।
मुख्यमंत्री बहुगुणा भले ही राहत कोष में जमा पैसे का उपयोग आपदा प्रभावितों के कल्याण के लिए खर्च करने की बात कर रहे हों लेकिन बड़ा सवाल ये है कि कहीं आमजन के लिए चलने वाली तमाम सरकारी योजनाओं के पैसे की तरह ही राहत राशि की बंदरबाट तो नहीं होगी और ये पैसा आपदा प्रभावितों की जिंदगी रोशन करने की बजाए भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों की जेबों को तो रोशन नहीं करेगा। कुल मिलाकर उत्तराखंड सरकार के पास फिलहाल आपदा प्रभावितों की मदद के साथ ही आपदा प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए फंड की कोई कमी नहीं है। कमी दिखाई देती है तो सरकार की नीयत में, कमी दिखाई देती है तो सरकार की ईच्छाशक्ति में, जिसका खामियाजा हर पल आपदा प्रभावितों को उठाना पड़ रहा है।

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शनिवार, 12 अक्टूबर 2013

ब्लॉग मित्र पुरुस्कार – दीपक तिवारी

हिंदी भाषा एंव साहित्य के संदर्भ में जागरण जंक्शन मंच की ओर से संचालित ब्लॉग शिरोमणि प्रतियोगिता के विजेताओं में अपना नाम देखकर खुशी का अनुभव हो रहा है। आज जब हिंदी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है, ऐसे में हिंदी भाषा के सम्मान और लोगों को इसके लिए प्रोत्साहित करने के लिए जागरण जंक्शन मंच भी बधाई का पात्र है। साथ ही ब्लॉग को सराहने और उत्साहवर्धन करने के लिए जागरण जंक्शन मंच के सभी पाठकों का भी में तहेदिल से शुक्रिया अदा करता हूं।






सोमवार, 7 अक्टूबर 2013

बेवकूफ बनाने का एक और !dea !

सेल्यूलर कंपनी आईडिया का लोगों को बेवकूफ बनाने का सिलसिला लगातार जारी है। टीवी विज्ञापनों के जरिए 121 डॉयल करने पर कस्टमर को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने का वादा करने वाली आईडिया कंपनी के हवाई दावों की एक और कहानी आपके सामने पेश कर रहा हैं, जिसका भुक्त भोगी मैं खुद हूं। आगे बढ़ने से पहले आपको फिर से बता दूं कि जयपुर में रोमिंग के दौरान अपना आईडिया कंपनी का सिम खराब हो जाने पर जब मैं डुप्लीकेट सिम लेने आईडिया कस्टमर केयर सेंटर पर पहुंचा तो कंपनी प्रतिनिधि ने ये कहकर मुझे सिम देने से इंकार कर दिया कि ऐसा कोई नियम नहीं है और डुप्लीकेट सिम आपको आपके होम सर्किल से ही मिलेगा। (पढ़ें- !dea बेवकूफ बनाने का !)
जयपुर से दो दिनों के लिए शनिवार सुबह(5 अक्टूबर 2013) को मैं अपने घर हल्दवानी (नैनीताल, उत्तराखंड) पहुंचा तो शाम के वक्त करीब साढ़े चार बजे मैं आईडिया सेंटर पर पहुंचा ताकि मैं वहां से डुप्लीकेट सिम हासिल कर सकूं लेकिन वहां मुझे ये कहकर लौटा दिया गया कि ये आईडिया पोस्टपेड का आउटलेट है और चूंकि आपका सिम प्रीपेड है इसलिए आपको राजा टेलीकॉम जाना होगा और वहां से ही आपको डुप्लीकेट सिम मिलेगा। वहां से 7 किमी दूर जब में राजा टेलीकॉम पहुंचा तो वहां पर मुझे ये कहकर लौटा दिया गया कि जो लड़की (जिसका नाम लेखा बताया गया था) डुप्लीकेट सिम इश्यू करती है वह आज छुट्टी पर है, जिस वजह से आज आपको सिम नहीं मिल पाएगा। अगले दिन रविवार की छुट्टी होने की बात कहकर मुझे सिम लेने के लिए सोमवार को आने की बात कहकर टाल दिया गया। मैंने वहां मौजूद दूसरे लोगों से कंपनी प्रतिनिधि लेखा का नंबर लेकर उन्हें कॉल करने का प्रयास किया ताकि मैं अपनी परेशानी बता सकूं लेकिन लेखा जी का फोन नहीं उठा, शायद वे छुट्टियां मनाने में कुछ ज्यादा ही व्यस्त थी। चूंकि मुझे अगले दिन रविवार को दिल्ली जाना था ऐसे में मुझे बिना सिम लिए ही जाना पड़ा।
जरा सोचिए कि आईडिया की एक कर्मचारी की छुट्टी पर होने से कंपनी के ग्राहक को सेवाएं नहीं मिल पाईं। ये वही कंपनी है, जो टीवी पर बड़े बड़े विज्ञापनों के जरिए ये दावा करती है कि सिर्फ 121 डॉयल करके आईडिया शोरुम आपके पास आ जाएगा लेकिन वास्तविक्ता ये है कि यहां तो कंपनी के शोरुम में जाकर भी ग्राहकों को सेवाएं नहीं मिल पा रही है। आज के समय पर जब एक क्लिक पर सब कुछ उपलब्ध है वहां आईडिया में एक कर्मचारी के छुट्टी पर होने से कंपनी की सर्विस डेस्क ने ही काम करना बंद कर दिया।
आईडिया कंपनी के एक प्रतिनिधि ने नियमों को हवाला देकर जयपुर में मुझे सिम देने से इंकार कर दिया जबकि होम सर्किल में मुझे सिम इसलिए नहीं मिला क्योंकि आईडिया प्रतिनिधि छुट्टी पर थी।
वाकई में बड़ी शानदार है आईडिया कंपनी की टैग लाईन “An !dea can change your life”.
मेरी Life तो बदल गयी, आपमें से कितने लोगों की बदली..?


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गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013

लालूनामा - शुरु भी जेल से खत्म भी जेल में !

सियासत का सितम तो देखिए, जिस सियासत ने लालू प्रसाद यादव को बिहार का सरताज बनाया और जिस सियासत के दम पर लालू देश का सरताज बनने का ख़्वाब तक देखने लगे थे। उसी सियासत ने लालू को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। सत्तर के दशक में जेपी के आंदोलन से हीरो बनकर निकले लालू प्रसाद यादव की सक्रिय राजनीति यात्रा की शुरुआत जेल से ही हुई थी और 38 साल बाद एक तरह से लालू की सियासी यात्रा का अंत भी जेल में होता हुआ दिखाई दे रहा है। ये बात अलग है कि उस वक्त जेल जाने पर लालू किसी हीरो से कम नहीं थे, लेकिन आज ये जेल की सलाखें लालू के राजनीतिक सफर में किसी काले धब्बे से कम नहीं है। (जरुर पढ़ें- अगर मैं चारा खाने नहीं जाता !)
हालांकि चारा घोटाले में 5 साल की सजा के खिलाफ लालू के पास ऊपरी अदालत में अपील करने का विकल्प खुला हुआ है, लेकिन इसी उम्मीद बहुत ज्यादा नहीं दिखाई देती कि लालू फिर से बिहार में चुनाव के मैदान में ताल ठोकते दिखाई देंगे या फिर बिहार की राजनीति के किंग और देश की राजनीति में किंगमेकर की भूमिका में दोबारा उसी दमखम से आ पाएंगे जिसके लिए लालू जाने जाते हैं।
ये भी सियासत ही थी, जिसने लालू को बिहार का मुख्यमंत्री से लेकर एक वक्त दिल्ली में किंगमेकर की स्थिति तक पहुंचाया और ये भी सिसायत ही थी, जिसके बल पर सत्ता हासिल करने के बाद सत्ता की हनक में लालू प्रसाद यादव ने इसे अपनी बपौती समझ लिया और जनता की गाढ़ी कमाई को चारा घोटाले के रुप में हजम करने में बिल्कुल भी देरी नहीं की।
लालू के परिजनों के साथ ही उनके शुभचिंतकों और राजद कार्यकर्ताओं को ये भले ही भाजपा और जदयू की साजिश नजर आती है लेकिन लालू खुद इस बात को नहीं नकार सकते कि इसकी पटकथा के रचियता के रुप में खुद लालू ही थे, जब लालू ने दोबारा बिहार के मुख्यमंत्री बनने के बाद भ्रष्टाचार की सारी हदें पार कर दी थी और आज इस पटकथा का अंत लालू को चारा घोटाले में 5 साल की सजा के साथ ही हुआ है।
वैसे कोस तो लालू और लालू के परिजन कांग्रेस युवराज राहुल गांधी को भी रहे होंगे जो कम से कम लालू और उन जैसे तमाम दागी नेताओं की राजनीतिक हत्या होने से तो रोक ही सकते थे। जाहिर है अगर दागियों को बचाने वाले अध्यादेश के पोस्टर को फाड़ कर बाहर निकलकर राहुल गांधी जनता की नजरों में हीरो बनने की कोशिश नहीं करते तो निश्चित तौर पर सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की कैबिनेट ने मिलकर लालू जैसे नेताओं की राजनीतिक हत्या होने से रोकने का पूरा इंतजाम तो कर ही दिया था लेकिन राहुल गांधी ने एक पहले से गढ़ी हुई स्क्रिप्ट के जरिए ही सही दागियों को बचाने की यूपीए सरकार की मंशा पर तो पानी फेर ही दिया। साथ ही अंधकारमय कर दिया उन सैंकड़ों दागी नेताओं के राजनीतिक भविष्य को जो इस अध्यादेश के सहारे अपने अंधकारमय होते राजनीतिक भविष्य में एक रोशनी की किरण को तलाश रहे थे। (जरुर पढ़ें- जनभावना नहीं राहुल गांधी की चिंता !)
किसी और चीज के लिए न सही राहुल गांधी कम से कम इस चीज के लिए धन्यवाद के पात्र हैं ही कि उन्होंने अपने राजनीतिक फायदे के लिए ही सही कांग्रेस रणनीतिकारों की सलाह पर इस दिशा में एक कदम तो आगे बढ़ाया ही है। वर्ना, कौन रोक लेता यूपीए सरकार को दागियों को बचाने वाले अध्यादेश को लाने से क्योंकि सोनिया गांधी कांग्रेस कोर ग्रुप की बैठक में इस अध्यादेश को हरी झंडी दे ही चुकी थी और मनमोहन कैबिनेट ने भी हर बार कि तरह सोनिया गांधी की आज्ञा का पालन करने में बिना देर किए इस स्वीकृति के लिए राष्ट्रपति के पास भेज ही दिया था।


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बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

जनभावना नहीं राहुल गांधी की चिंता !

जब चुनाव की घड़ी करीब आई तो यूपीए सरकार को जनभावना का ख्याल आया और दागियों को बचाने के वाले अध्यादेश के साथ ही मनमोहन कैबिनेट ने सर्वसम्मति से इस पर संसद में विचाराधीन बिल को भी वापस लेने का फैसला कर लिया। ये वही कैबिनेट थी जिसने कुछ दिन पहले ही दागियों को बचाने वाले अध्यादेश को सर्वसम्मति से पारित कर दिया था और इन्हें इंतजार था उस पल का जब राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी इस अध्यादेश पर दस्तख्त कर देते और दागियों की बल्ले बल्ले हो जाती।
जाहिर है अगर अब जनभावना के चलते ही इस अध्यादेश को वापस लिया गया है तो यही जनभावना तो उस वक्त भी थी जो कि अब है। चंद दिनों में तो देश की जनता ने अध्यादेश को लेकर अपनी भावना में परिवर्तन नहीं किया था लेकिन मनमोहन कैबिनेट ने फिर भी ऐसा किया क्योंकि ये न तो ये कोई जनभावना थी और न ही सरकार का रुख दागियों के खिलाफ एकाएक बदल गया।
दरअसल ये भावना थी कांग्रेस युवराज राहुल गांधी की, ये भावना थी कांग्रेस के उन रणनीतिकारों की जिन्होंने राहुल को जनता की नजरों में हीरो बनाने के लिए ये पूरी स्क्रिप्ट तैयार की थी जिसे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने अजय माकन की प्रेस कांफ्रेंस में पढ़ा था। राहुल ये बात अच्छी तरह जानते थे कि दागियों को बचाने वाला ये अध्यादेश भले ही उनकी पार्टी की मजबूरी हो लेकिन अगर समय रहते इसे वापस नहीं लिया गया तो 2014 में इस अध्यादेश के बहाने समूचा विपक्ष यूपीए की हैट्रिक और उनके प्रधानमंत्री बनने के ख्वाब पर पानी फेरने में अहम भूमिका अदा कर सकता है।
ये इसलिए भी क्योंकि जिस अध्यादेश को सोनिया गांधी की मौजूदगी में कांग्रेस कोर ग्रुप ने हरी झंडी दी हो, उस अध्यादेश की जानकारी राहुल गांधी को न हो ये तो संभव नहीं है।
अब यूपीए सरकार भले ही जनभावना की दलील दे रही हो लेकिन अगर वाकई में इन्हें जनभावना की इतनी ही चिंता है, फिर तो ऐसे कई मामले हैं जिन पर सरकार को जनभावना के अनुरूप ही अमल करना चाहिए फिर चाहे वह राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में लाने की बात हो या फिर सरकार में शामिल भ्रष्ट मंत्रियों पर कार्रवाई की बात हो। विदेशी बैंकों में जमा कालेधन को भारत में वापस लाने की बात हो या फिर अपने धूर्त पड़ोसी पाकिस्तान की कायराना हरकतों पर उसे सबक सिखाने की बात हो।
लेकिन आज तक यूपीए सरकार को जनभावना का ख्याल नहीं आया क्योंकि इस सब को लेकर कांग्रेस युवराज राहुल गांधी ने अपनी भावना का सार्वजनिक रुप से प्रधानमंत्री की धज्जियां उड़ाते हुए कभी प्रदर्शन नहीं किया। राहुल गांधी अहम मौके पर सार्वजनिक मंच से नदारद ही दिखाई दिए।
आज राहुल के बहाने यूपीए सरकार को जनभावना का ख्याल आ रहा है क्योंकि सरकार साउथ ब्लॉक, रायसीना हिल्स से नहीं बल्कि 10 जनपथ से चल रही है। आज मनमोहन सिंह को जनभावना का ख्याल आ रहा है क्योंकि 2014 में राहुल गांधी को पीएम बनाने के लिए किसी बहाने उन्हें जमीन तैयार करनी है। ये सब करने में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की कैबिनेट ने सिर्फ 15 मिनट का ही वक्त लिया जबकि देश से जुड़े अहम मुद्दों पर अपना मुंह खोलने में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह 15 महीने तक का वक्त लगा देते हैं। जय हो मनमोहन सिंह की, जय हो यूपीए सरकार की और जय हो देश की जनता की क्योंकि उम्मीद है कि चुनाव में वोट देते वक्त देश की जनता अपनी भावना का सही प्रदर्शन करेगी और जनभावनाओं का हवाला देकर अपने सियासी फायदे के लिए जनभावनाओं से खिलवाड़ करने वालों को करारा सबक सिखाएगी।

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सोमवार, 30 सितंबर 2013

अगर मैं चारा खाने नहीं जाता !

लालू प्रसाद यादव भारतीय राजनीति का एक ऐसा नाम जिससे शायद ही कोई न जानता हो। लालू की खासयित भी यही है कि उनके न चाहने वाले भी लालू के सामने होने पर या टीवी पर होने पर लालू को सुने बिना नहीं रह सकते। लेकिन अपने ही एक कारनामे की वजह से अगले कुछ सालों तक लालू का मसखरा अंदाज शायद ही अब संसद में या फिर टीवी पर देखने या सुनने को मिले। ये लालू के प्रशंसकों के लिए बुरी ख़बर जरुर हो सकती है लेकिन भारतीय राजनीति के भविष्य के लिहाज से ये सीबीआई की विशेष अदालत का एक ऐतिहासिक फैसला है।  
सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव, पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र समेत 45 लोगों को चारा घोटाले से जुड़ी चाईबासा ट्रेजरी से फर्जी तरीके से 37 करोड़ 70 लाख रुपए निकालने के मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद इन्हें कितने वर्ष की कारावास होगी ये तो 3 अक्टूबर को सबके सामने आ ही जाएगा लेकिन ये फैसला बिहार और झारखंड की राजनीति के साथ ही देश की राजनीति पर गहरा असर डालेगा। ये इसलिए भी क्योंकि ये फैसला ऐसा वक्त पर आया है जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही किसी भी मामले में सांसद या विधायक को दो वर्ष या उससे अधिक की सजा होने पर तत्काल प्रभाव से उनकी सदस्यता रद्द करने का आदेश जारी कर चुका है।
जाहिर है इसका गहरा असर लालू के राजनीतिक करियर पर पड़ेगा और बिहार में एक बार फिर से राजद को अपने दम पर वापस लाने का ख्वाब देख रहे लालू का ये ख्वाब पूरा होना अब इतना आसान नहीं रहेगा। 17 साल पहले जनता की गाढ़ी कमाई को चारा घोटाले के बहाने उड़ाने वाले राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने शायद ही उस वक्त सोचा होगा कि उनका ये कारनामा भविष्य में न सिर्फ उनके राजनीतिक भविष्य पर विराम लगा सकता है, बल्कि उन्हें जेल की हवा भी खिला सकता है। सत्ता के नशे में चूर रहे लालू प्रसाद यादव को शायद ही इस बात का आभास उस वक्त हुआ होगा लेकिन सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने पर रांची की बिरसा मुंडा सेंट्रल जेल में आराम फरमा रहे लालू को अब जरुर इसका एहसास हो रहा होगा।
राजनीति में ऐसे लालूओं की कोई कमी नहीं है जो सत्ता के नशे में चूर होने के बाद जनता की गाढ़ी कमाई को भ्रष्टाचार और घोटालों के जरिए अपनी तिजोरियों को भरने में जरा भी नहीं शर्माते हैं। उन्हें शर्म नहीं आती जनता के उस विश्वास को ठेस पहुंचाने में, जो इस उम्मीद के साथ उन्हें वोट देकर लोकतंत्र के मंदिर तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त करते हैं कि वे न सिर्फ उनकी समस्याओं का समाधान करेंगे बल्कि विकास का दूत बनकर काम करेंगे। लेकिन अफसोस लालू जैसे राजनेता इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते और सत्ता के नशे में मदहोश होकर जनता की गाढ़ी कमाई को उड़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं।
लालू के इस हश्र से ये तो नहीं कहा जा सकता कि इससे भारत में भ्रष्टाचार का अंत हो जाएगा और सत्ता के नशे में चूर राजनेता अब कोई भ्रष्टाचार या घोटाले को अंजाम नहीं देंगे लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि दागियों पर 10 जुलाई का सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला और लालू जैसे राजनेता का हश्र भ्रष्टाचारियों में एक भय का माहौल बनाने में अहम भूमिका जरुर निभाएगा।
ऐसे में जनता की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है कि वे अब भी अपने मत का इस्तेमाल जाति और धर्म के आधार पर करेंगे या फिर उम्मीदवार की योग्यता और ईमानदारी को ध्यान में रखकर करेंगे। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने 10 जुलाई के फैसले से चुनाव सुधार की दिशा में अपना काम तो कर दिया है, लेकिन ये अंजाम तक तभी पहुंच पाएगा जब देश की जनता चुनाव में दागियों को सबक सिखाएगी और सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले का असली मतलब अपनी वोट की ताकत से दागी नेताओं को समझाएगी।
आखिर में संसद में एफडीआई पर बहस के दौरान लालू प्रसाद यादव का नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज पर सुनाया गया एक शेर मुझे बार बार याद आ रहा है। साथ ही उस शेर के कुछ शब्दों को बदलकर सभी मित्रों को सुनाने का मन भी कर रहा है। लालू का कहा शेर कुछ यूं था – http://youtu.be/31yXIlicepI
मोहब्बत में तुम्हें आसूं बहाना नहीं आता।
अगर आपके बनारस में पान खाने नहीं आता।।

चारा घोटाले में रांची की बिरसा मुंडा सेंट्रल जेल में बंद लालू पर अब ये शेर कुछ यूं पढ़ने का मन कर रहा रहा है-
रांची की बिरसा मुंडा सेंट्रल जेल में नहीं जाता।
अगर 17 साल पहले मैं चारा नहीं खाता।।


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