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शनिवार, 19 अक्टूबर 2013

आम आदमी के भी तो सपने हैं

सपने तो सभी देखते हैं, एक सपना ही तो है जो अपना है, जो चाहे देखो, जिसे चाहो देखो, जो मन चाहे वो करो। न तो कोई सपने देखने का टिकट मांगने वाला और न ही आपको सपने देखने से रोकने वाला। ऐसे में अगर यूपी के उन्नाव के डौंडिया खेड़ा गांव में एक साधु शोभन सरकार ने सपने में राजा राम बक्श सिंह के किले में जमीन के अंदर सोने का भंडार देख लिया तो कौन सा गुनाह हो गया..!
ये बात अलग है कि साधु के सपने को मूर्त रूप देने के लिए केन्द्रीय मंत्री चरण दास महंत ने पूरी ताकत लगा दी जिसके बाद केन्द्र सरकार को भी साधु के सपने वाला सोने का भंडार नजर आने लगा और जीएसआई और एएसआई को काम पर लगा दिया कि खुदाई शुरु कर सोना निकाल कर लाओ। खास बात ये है कि डौडिया खेड़ा गांव के साधु शोभन सरकार ने ये सपना गहरी नींद में बंद आंखों से देखा था जबकि केन्द्र सरकार को ये सपना खुली आंखों से ही दिखाई देने लगा है और सरकार को उम्मीद है कि वे जनता से हकीकत में किए वादों को पूरा न कर पाए तो क्या साधु के सपने को पूरा करके ही दम लेंगे।
डौडिया खेड़ा में लगा मेला इसका प्रमाण भी है और जिस तरह से उन्नाव के डीएम ने फावड़ा चलाकर खजाने की खोज में खुदाई का शुभारंभ किया उससे तो यही जाहिर होता है कि सरकार के साथ ही आला प्रशासनिक अधिकारी भी कर्म से ज्यादा सपने में विश्वास रखते हैं।
सपने देखना और उसे पूरा करने की कोशिश करना अच्छी बात है लेकिन सरकार ने इतनी तत्परता अगर रोज रात को भूखे पेट सोने वाले के किसी दिन भरपेट खाना मिलने के सपने को पूरा करने में दिखाई होती तो कितना अच्छा होता।
सरकार ने अगर इतनी तत्परता एक बेरोजगार के नौकरी के सपने को पूरा करने में दिखाई होती तो कितना अच्छा होता।
सरकार ने इतनी तत्परता कर्ज के बोझ तले दबे किसान के खुशहाल जीवन के सपने को पूरा करने में दिखाई होती तो कितना अच्छा होता।
सरकार ने इतनी तत्परता अपराध मुक्त समाज का सपना देखने वाले एक आम आदमी के सपने को पूरा करने में दिखाई होती तो कितना अच्छा होता।
सरकार ने इतनी तत्परता महंगाई के बोझ तले आम आदमी के जरुरी सामान उसकी पहुंच में होने के सपने को पूरा करने में दिखाई होती तो कितना अच्छा होता।
सरकार ने इतनी तत्परता स्विस बैंकों में जमा काले धन को वापस लाने के आम आदमी के सपने को पूरा करने में दिखाई होती तो कितना अच्छा होता।
सरकार ने इतनी तत्परता बिजली, पानी और सड़क से महरूम लाखों लोगों के बिजली, पानी और सड़क के सपने को पूरा करने में दिखाई होती तो कितना अच्छा होता।
सरकार से ऐसे सपनों को पूरा करने की उम्मीद लगाए बैठी इस देश की जनता के सपनों की फेरहिस्त काफी लंबी है, जो न तो नाजायज है और न ही इतनी मुश्किल जिसे पूरा करना किसी सरकार के बस की बात न हो लेकिन इन सपनों को पूरा करने का वक्त हमारी सरकार के पास नहीं है, क्योंकि वे तो कुर्सी के सपने को पूरा करने में ही व्यस्त हैं।
क्योंकि वे तो अपनी तिजोरियों को भरने के सपने देखने और उन्हें पूरा करने में व्यस्त हैं।
क्योंकि वे तो देश की जनता को जाति और धर्म के आधार पर बांट कर राज करने के अपने सपने को पूरा करने में ही व्यस्त हैं।
बहरहाल डौडिया खेड़ा में सपने को सोने में बदलने की कवायद जारी है, सोने के सपने पर भरोसा तो नहीं लेकिन फिर भी उम्मीद करते हैं कि ये सपना पूरा हो। साथ ही ये भी उम्मीद करते हैं कि सरकार साधु के सपने की तरह आम आदमी के उन सपनों को पूरा करने में भी इतनी ही तत्परता दिखाए। जिसके लिए न ही किसी तरह के सर्वे की जरुरत है और न ही किसी खुदाई की। जरूरत है तो सिर्फ ईमानदारी और सपनों को पूरा करने की इच्छाशक्ति की।      

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शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

देवदूतों का बोलबाला !

आस्था के बाजार में सब कुछ बिकता है, बस आपके पास बेचने का हुनर होना चाहिए और खरीदने वाले की जेब में पैसा। वैसे धर्मस्थलों पर आपने कभी न कभी इस बात का अनुभव जरुर किया होगा। मेरा हाल ही में अजमेर और पुष्कर भ्रमण के दौरान कुछ ऐसा ही अनुभव रहा। हालांकि ये अनुभव मैं इससे पहले भी कई प्रसिद्ध धर्मस्थलों पर ले चुका हूं, लेकिन इस बार का अनुभव इसलिए आपसे साझा कर रहा हूं क्योंकि अब तक मैं समझता था कि ये सब सिर्फ हिंदुओं के धर्मस्थलों पर ही देखने को मिलता है, लेकिन वास्तव में अधिकतर धर्मस्थलों पर देवदूतों की ही तूती बोलती है।
बीते दिनों अपने कुछ मित्रों के साथ विश्व प्रसिद्ध दरगाह शरीफ अजेमर और पुष्कर जाना हुआ। गरीब नवाज़ के दर पर पहुंचते ही यहां भी हमें कुछ लोग ऐसे भी मिले जो आस्था के महाबाजार में आस्था के पुजारियों की जेबों को ढीली करने का कोई मौका नहीं छोड़ते। अचानक से हमारे सामने प्रकट हुए एक महाशय ने भी हमें भीड़ से अलग हटकर बिना लाईन में लगे फटाफट दर्शन कराने का ऑफर दिया। इसके बदले में इन महाशय ने कोई पैसे की मांग तो नहीं कि लेकिन पुष्प हमें खरीदने ही थे, तो ऐसे में ऑफर बुरा नहीं लगा क्योंकि यहां से हमें पुष्कर के लिए भी कूच करना था और शाम तक जयपुर भी पहुंचना था।
खैर हम इन महाशय के साथ हो लिए और भारी भीड़ होने के बावजूद सिर्फ 5 मिनट में हम दर्शन कर फारिग हो गए। वहां भी नजराने के नाम पर पैसों की मांग करने वालों की कोई कमी नहीं थी। नजराने की डिमांड इस कीमत पर की जा रही थी कि ख्वाजा आपकी हर मुराद पूरी करेंगे और आपकी झोली खुशियों से भर देंगे। ये समझ नहीं आया कि क्या बिना नजराने के ख्वाजा अपने दर पर दुआ मांगने वालों की दुआओं को कबूल नहीं करेंगे और उन्हें खाली हाथ लौटा देंगे।
ख्वाजा के दर से हम पुष्कर के लिए रवाना हो गए। पुष्कर की धरती पर अभी हमारी गाड़ी ढंग से रुकी भी नहीं थी कि एक सज्जन हमारी गाड़ी के पास पहुंच गए। गाड़ी से नीचे उतरते ही इन महाशय ने ब्रह्मा जी के मंदिर के साथ ही पुष्कर सरोवर के दर्शन और यहां के धार्मिक महत्व को बताने की कीमत 50 रुपए बताते हुए अपने साथ चलने का अनुरोध किया। पुष्कर के धार्मिक महत्व और इतिहास की पूरी जानकारी देने के बाद ये हमें एक प्रसाद की दुकान पर लेकर गए और प्रसाद खरीदकर पूजा करने के लिए चलने की बात कही। जिसके बाद पुष्कर सरोवर के किनारे हम पांच मित्रों को इन्होंने वहां पर पहले से बैठे 5 अलग अलग पंडितों के पास बैठने के लिए कहा। पंडित जी ने कुछ ही मिनटों में पूजा संपन्न करा दी लेकिन पूजा के दौरान एक बार बीच में भोग के नाम पर 501 से लेकर 5001 तक की भेंट देने का अनुरोध किया और आखिर में अपनी दक्षिणा की मांगी की ताकि पूजा का फल हम लोगों को मिल सके। ये बात इस अंदाज में कह गई कि मानो भोग के लिए पैसे और पूजा कि मुहंमांगी दक्षिणा न देने पर जैसे भगवान हमसे रुष्ट हो जाएंगे और हम दर्शन करने के बाद भी प्रभु की कृपा से वंचित रह जाएंगे। खैर हम सभी ने अपनी-अपनी सामर्थ्य अनुसार पंडित जी को दक्षिणा दी और इसके बाद हम दर्शन के लिए ब्रह्मा जी के मंदिर पहुंच गए। आखिर में ये सज्जन हमें मंदिर के बार स्थित एक देवी देवताओं की प्रतिमाओं की दुकान में भी लेकर गए और लगे हाथों दुकान से सामान खरीदने की सलाह भी दे डाली।
कुल मिलाकर दरगाह शरीफ से लेकर पुष्कर तक मुझे एक ही बात समझ में आयी कि धर्मस्थलों में भगवान के दर्शन हो या न हों लेकिन देवदूतों के दर्शन आपको जरुर हो जाएंगे जो देवों के दर्शन और पुण्य कमाने के नाम पर आपकी जेब ढीली करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं, लेकिन ये बात समझ में नहीं आयी कि निर्मल बाबा की तरह श्रद्धालुओं को प्रभु की कृपा दिलाने का दावा करने वाले इन देवदूतों पर आखिर प्रभु की कृपा क्यों नहीं बरसती।


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गुरुवार, 17 अक्टूबर 2013

दोष आसाराम और नारायण का नहीं !

हमारे देश में आस्था का तोड़ नहीं है और आस्था अगर अंधी हो तो फिर क्या कहने। अंधी अस्था के सागर में डुबकी लगाने वालों से तो कोई जीत ही नहीं सकता। अब आसाराम के समर्थकों को ही देख लिजिए। ये आसारम के प्रति उनकी अंधी आस्था नहीं तो और क्या है। आसाराम जेल में बंद है, आसाराम का कुपुत्र नारायण साईं पुलिस के साथ चोर-सिपाही का खेल खेल रहा है, लेकिन इनके अंध समर्थकों को अब भी दोनों पाक साफ लगते हैं। उन्हें लग रहा है कि दोनों को साजिश के तहत फंसाया जा रहा है। माना कि मामला अदालत में है और दोनों अभी तक न्यायालय द्वारा दोषी करार नहीं दिए गए हैं, लेकिन बाप बेटे के खिलाफ रेप, यौन शोषण सहित तमाम आरोप और गवाह के सामने आने के बाद आसाराम का जेल पहुंचना और नारायण साई का सिर पर पैर रखकर भागना कम से कम ये तो जाहिर करता ही है कि दोनों पाक साफ तो नहीं है।
लाई डिटेक्टर मशीन के डर से आसाराम की याददाश्त भी वापस आ गयी और आसाराम को वह सब याद आ गया, जिन काली करतूतों को आसाराम ने संत का चोला ओढ़ कर अंजाम दिया था। अभी तक लड़की को पहचानने से ही इंकार करने वाले आसाराम को लड़की भी याद आ गयी और अपनी काली करतूत भी जो उसने पीड़िता के साथ की थी।
लेकिन इसके बाद भी आस्था के पुजारियों की आंखों से शर्म का पर्दा हटने को तैयार नहीं है। आसारम के अंध समर्थकों को अब भी अपने पूज्यनीय बापू पर पूरा भरोसा है। गजब है आस्था का अंध बाजार भी जहां बड़े-बड़े पापी भी आस्था के इन पुजारियों को संत नजर आते हैं। दुनिया दोष आसाराम और उसके बेटे नारायण साईं को दे रही है, लेकिन वास्तव में इनका इसमें कोई कसूर नहीं है। कसूर है आंखें बंद कर आस्था के नाम पर ऐसे संतों को पूजने वालों का जो इन्हें सिर माथे पर बैठाने में देर नहीं करते हैं और इन्हें  भगवान से भी ऊंचा दर्जा दे देते हैं। अब इनके ये कथित भगवान क्या गुल खिला रहे हैं, वह सबके सामने हैं, लेकिन अफसोस इस बात का है कि इनकी आंखों पर अंधी आस्था का पर्दा इस तरह पड़ा हुआ है कि इन्हें अब भी संत का चोला ओढ़े ये ढोंगी बेदाग नजर आते हैं। इन्हें अब भी लगता है कि कोई चमत्कार होगा और कपड़े धोने का टाईड टाईप कोई डिटरजेंट अचानक से आएगा और आसाराम औऱ नारायण साईं पर लगे सारे आरोपों को कपड़े पर लगे किसी दाग की तरह धो देगा लेकिन इन अंध समर्थकों को कौन समझाए कि ये सिर्फ विज्ञापन में ही होता है, असल जिंदगी में नहीं। आंखे खोलों अंधी आस्था के पुजारियों वर्ना हिंदुस्तान में अंध अस्था की रायल्टी के सहारे भगवान बने बैठे ऐसे कई आसाराम और नारायण साईं आपको बेवकूफ बनाते रहेंगे।   


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बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

मीडिया पर मेहरबान बहुगुणा सरकार !

उत्तराखंड में आई भीषण त्रासदी में जहां हजारों लोग मौत के आगोश में समा गए वहीं पलभर में लाखों लोगों की खुशियां मातम में बदल गयी। घर बार सब कुछ त्रासदी की भेंट चढ़ जाने से लोग सड़कों पर आ गए। पलभर में मानो उनकी दुनिया ही उजड़ गयी। ऐसे मुश्किल वक्त में देशवासियों ने दिल खोलकर आपदा प्रभावितों की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाए। सरकारी आंकड़े कहते हैं कि अभी तक मुख्यमंत्री राहत कोष में देशभर से करीब 327 करोड़ रुपए जमा हो चुके हैं जबकि बहुगुणा सरकार ने इस राशि में से करीब 125 करोड़ रुपए खर्च भी कर चुकी है। लेकिन सवाल ये खड़ा होता है कि फंड की कोई कमी न होने के बावजूद भी आपदा प्रभावितों की मदद को लेकर राज्य सरकार आखिर अपना खजाना खोलने में क्यों शर्मा रही है, जबकि अपनी नाकामियां छिपाने के लिए राज्य सरकार ने मीडिया के लिए खजाने का मुंह खोलने में जरा सी भी देर नहीं की।
सूबे के मुखिया विजय बहुगुणा कहते हैं कि आपदा प्रभावितों को हर संभव मदद दी जा रही है। उनके राहत एवं पुनर्वास में कोई कमी नहीं छोड़ी जा रही है, लेकिन ऐसा दिखता तो नहीं। जो दिख रहा है, वो यह कि विजय बहुगुणा ने आपदा के बाद से सरकारी नाकामी पर पर्दा डालने और सरकार की छवि चमकाने के लिए मीडिया पर दिल खोलकर सरकारी खजाना लुटाया। शायद ही ऐसा कोई समाचार चैनल, समाचार पत्र या फिर पत्रिका होगी जिसमें सरकार के गुणगान के लिए बहुगुणा ने सरकारी विज्ञापन के नाम पर पानी की तरह पैसा न बहाया हो।
सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी के अनुसार आपदा के बाद से सितंबर तक बहगुणा सरकार ने करीब साढ़े 22 करोड़ रुपए के सरकारी विज्ञापन विभिन्न समाचार चैनलों, समाचार पत्रों औऱ पत्रिकाओं को जारी किए। उत्तराखंड में आपदा प्रभावित दाने दाने को मोहताज हो रहे थे। लेकिन इन सरकारी विज्ञापनों के जरिए समाचार चैनलों, समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में सरकार की तारीफ में कसीदे पढ़े जा रहे थे। बताया जा रहा था कि आपदा के दौरान सरकार के गुडवर्क के चलते हजारों लोगों की जानें बचायी गयी तों आपदा प्रभावितों को तत्काल राहत सामग्री पहुंचाई गयी।
मुख्यमंत्री बहुगुणा भले ही राहत कोष में जमा पैसे का उपयोग आपदा प्रभावितों के कल्याण के लिए खर्च करने की बात कर रहे हों लेकिन बड़ा सवाल ये है कि कहीं आमजन के लिए चलने वाली तमाम सरकारी योजनाओं के पैसे की तरह ही राहत राशि की बंदरबाट तो नहीं होगी और ये पैसा आपदा प्रभावितों की जिंदगी रोशन करने की बजाए भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों की जेबों को तो रोशन नहीं करेगा। कुल मिलाकर उत्तराखंड सरकार के पास फिलहाल आपदा प्रभावितों की मदद के साथ ही आपदा प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए फंड की कोई कमी नहीं है। कमी दिखाई देती है तो सरकार की नीयत में, कमी दिखाई देती है तो सरकार की ईच्छाशक्ति में, जिसका खामियाजा हर पल आपदा प्रभावितों को उठाना पड़ रहा है।

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शनिवार, 12 अक्टूबर 2013

ब्लॉग मित्र पुरुस्कार – दीपक तिवारी

हिंदी भाषा एंव साहित्य के संदर्भ में जागरण जंक्शन मंच की ओर से संचालित ब्लॉग शिरोमणि प्रतियोगिता के विजेताओं में अपना नाम देखकर खुशी का अनुभव हो रहा है। आज जब हिंदी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है, ऐसे में हिंदी भाषा के सम्मान और लोगों को इसके लिए प्रोत्साहित करने के लिए जागरण जंक्शन मंच भी बधाई का पात्र है। साथ ही ब्लॉग को सराहने और उत्साहवर्धन करने के लिए जागरण जंक्शन मंच के सभी पाठकों का भी में तहेदिल से शुक्रिया अदा करता हूं।






सोमवार, 7 अक्टूबर 2013

बेवकूफ बनाने का एक और !dea !

सेल्यूलर कंपनी आईडिया का लोगों को बेवकूफ बनाने का सिलसिला लगातार जारी है। टीवी विज्ञापनों के जरिए 121 डॉयल करने पर कस्टमर को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने का वादा करने वाली आईडिया कंपनी के हवाई दावों की एक और कहानी आपके सामने पेश कर रहा हैं, जिसका भुक्त भोगी मैं खुद हूं। आगे बढ़ने से पहले आपको फिर से बता दूं कि जयपुर में रोमिंग के दौरान अपना आईडिया कंपनी का सिम खराब हो जाने पर जब मैं डुप्लीकेट सिम लेने आईडिया कस्टमर केयर सेंटर पर पहुंचा तो कंपनी प्रतिनिधि ने ये कहकर मुझे सिम देने से इंकार कर दिया कि ऐसा कोई नियम नहीं है और डुप्लीकेट सिम आपको आपके होम सर्किल से ही मिलेगा। (पढ़ें- !dea बेवकूफ बनाने का !)
जयपुर से दो दिनों के लिए शनिवार सुबह(5 अक्टूबर 2013) को मैं अपने घर हल्दवानी (नैनीताल, उत्तराखंड) पहुंचा तो शाम के वक्त करीब साढ़े चार बजे मैं आईडिया सेंटर पर पहुंचा ताकि मैं वहां से डुप्लीकेट सिम हासिल कर सकूं लेकिन वहां मुझे ये कहकर लौटा दिया गया कि ये आईडिया पोस्टपेड का आउटलेट है और चूंकि आपका सिम प्रीपेड है इसलिए आपको राजा टेलीकॉम जाना होगा और वहां से ही आपको डुप्लीकेट सिम मिलेगा। वहां से 7 किमी दूर जब में राजा टेलीकॉम पहुंचा तो वहां पर मुझे ये कहकर लौटा दिया गया कि जो लड़की (जिसका नाम लेखा बताया गया था) डुप्लीकेट सिम इश्यू करती है वह आज छुट्टी पर है, जिस वजह से आज आपको सिम नहीं मिल पाएगा। अगले दिन रविवार की छुट्टी होने की बात कहकर मुझे सिम लेने के लिए सोमवार को आने की बात कहकर टाल दिया गया। मैंने वहां मौजूद दूसरे लोगों से कंपनी प्रतिनिधि लेखा का नंबर लेकर उन्हें कॉल करने का प्रयास किया ताकि मैं अपनी परेशानी बता सकूं लेकिन लेखा जी का फोन नहीं उठा, शायद वे छुट्टियां मनाने में कुछ ज्यादा ही व्यस्त थी। चूंकि मुझे अगले दिन रविवार को दिल्ली जाना था ऐसे में मुझे बिना सिम लिए ही जाना पड़ा।
जरा सोचिए कि आईडिया की एक कर्मचारी की छुट्टी पर होने से कंपनी के ग्राहक को सेवाएं नहीं मिल पाईं। ये वही कंपनी है, जो टीवी पर बड़े बड़े विज्ञापनों के जरिए ये दावा करती है कि सिर्फ 121 डॉयल करके आईडिया शोरुम आपके पास आ जाएगा लेकिन वास्तविक्ता ये है कि यहां तो कंपनी के शोरुम में जाकर भी ग्राहकों को सेवाएं नहीं मिल पा रही है। आज के समय पर जब एक क्लिक पर सब कुछ उपलब्ध है वहां आईडिया में एक कर्मचारी के छुट्टी पर होने से कंपनी की सर्विस डेस्क ने ही काम करना बंद कर दिया।
आईडिया कंपनी के एक प्रतिनिधि ने नियमों को हवाला देकर जयपुर में मुझे सिम देने से इंकार कर दिया जबकि होम सर्किल में मुझे सिम इसलिए नहीं मिला क्योंकि आईडिया प्रतिनिधि छुट्टी पर थी।
वाकई में बड़ी शानदार है आईडिया कंपनी की टैग लाईन – “An !dea can change your life”.
मेरी Life तो बदल गयी, आपमें से कितने लोगों की बदली..?


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गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013

लालूनामा - शुरु भी जेल से खत्म भी जेल में !

सियासत का सितम तो देखिए, जिस सियासत ने लालू प्रसाद यादव को बिहार का सरताज बनाया और जिस सियासत के दम पर लालू देश का सरताज बनने का ख़्वाब तक देखने लगे थे। उसी सियासत ने लालू को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। सत्तर के दशक में जेपी के आंदोलन से हीरो बनकर निकले लालू प्रसाद यादव की सक्रिय राजनीति यात्रा की शुरुआत जेल से ही हुई थी और 38 साल बाद एक तरह से लालू की सियासी यात्रा का अंत भी जेल में होता हुआ दिखाई दे रहा है। ये बात अलग है कि उस वक्त जेल जाने पर लालू किसी हीरो से कम नहीं थे, लेकिन आज ये जेल की सलाखें लालू के राजनीतिक सफर में किसी काले धब्बे से कम नहीं है। (जरुर पढ़ें- अगर मैं चारा खाने नहीं जाता !)
हालांकि चारा घोटाले में 5 साल की सजा के खिलाफ लालू के पास ऊपरी अदालत में अपील करने का विकल्प खुला हुआ है, लेकिन इसी उम्मीद बहुत ज्यादा नहीं दिखाई देती कि लालू फिर से बिहार में चुनाव के मैदान में ताल ठोकते दिखाई देंगे या फिर बिहार की राजनीति के किंग और देश की राजनीति में किंगमेकर की भूमिका में दोबारा उसी दमखम से आ पाएंगे जिसके लिए लालू जाने जाते हैं।
ये भी सियासत ही थी, जिसने लालू को बिहार का मुख्यमंत्री से लेकर एक वक्त दिल्ली में किंगमेकर की स्थिति तक पहुंचाया और ये भी सिसायत ही थी, जिसके बल पर सत्ता हासिल करने के बाद सत्ता की हनक में लालू प्रसाद यादव ने इसे अपनी बपौती समझ लिया और जनता की गाढ़ी कमाई को चारा घोटाले के रुप में हजम करने में बिल्कुल भी देरी नहीं की।
लालू के परिजनों के साथ ही उनके शुभचिंतकों और राजद कार्यकर्ताओं को ये भले ही भाजपा और जदयू की साजिश नजर आती है लेकिन लालू खुद इस बात को नहीं नकार सकते कि इसकी पटकथा के रचियता के रुप में खुद लालू ही थे, जब लालू ने दोबारा बिहार के मुख्यमंत्री बनने के बाद भ्रष्टाचार की सारी हदें पार कर दी थी और आज इस पटकथा का अंत लालू को चारा घोटाले में 5 साल की सजा के साथ ही हुआ है।
वैसे कोस तो लालू और लालू के परिजन कांग्रेस युवराज राहुल गांधी को भी रहे होंगे जो कम से कम लालू और उन जैसे तमाम दागी नेताओं की राजनीतिक हत्या होने से तो रोक ही सकते थे। जाहिर है अगर दागियों को बचाने वाले अध्यादेश के पोस्टर को फाड़ कर बाहर निकलकर राहुल गांधी जनता की नजरों में हीरो बनने की कोशिश नहीं करते तो निश्चित तौर पर सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की कैबिनेट ने मिलकर लालू जैसे नेताओं की राजनीतिक हत्या होने से रोकने का पूरा इंतजाम तो कर ही दिया था लेकिन राहुल गांधी ने एक पहले से गढ़ी हुई स्क्रिप्ट के जरिए ही सही दागियों को बचाने की यूपीए सरकार की मंशा पर तो पानी फेर ही दिया। साथ ही अंधकारमय कर दिया उन सैंकड़ों दागी नेताओं के राजनीतिक भविष्य को जो इस अध्यादेश के सहारे अपने अंधकारमय होते राजनीतिक भविष्य में एक रोशनी की किरण को तलाश रहे थे। (जरुर पढ़ें- जनभावना नहीं राहुल गांधी की चिंता !)
किसी और चीज के लिए न सही राहुल गांधी कम से कम इस चीज के लिए धन्यवाद के पात्र हैं ही कि उन्होंने अपने राजनीतिक फायदे के लिए ही सही कांग्रेस रणनीतिकारों की सलाह पर इस दिशा में एक कदम तो आगे बढ़ाया ही है। वर्ना, कौन रोक लेता यूपीए सरकार को दागियों को बचाने वाले अध्यादेश को लाने से क्योंकि सोनिया गांधी कांग्रेस कोर ग्रुप की बैठक में इस अध्यादेश को हरी झंडी दे ही चुकी थी और मनमोहन कैबिनेट ने भी हर बार कि तरह सोनिया गांधी की आज्ञा का पालन करने में बिना देर किए इस स्वीकृति के लिए राष्ट्रपति के पास भेज ही दिया था।


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बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

जनभावना नहीं राहुल गांधी की चिंता !

जब चुनाव की घड़ी करीब आई तो यूपीए सरकार को जनभावना का ख्याल आया और दागियों को बचाने के वाले अध्यादेश के साथ ही मनमोहन कैबिनेट ने सर्वसम्मति से इस पर संसद में विचाराधीन बिल को भी वापस लेने का फैसला कर लिया। ये वही कैबिनेट थी जिसने कुछ दिन पहले ही दागियों को बचाने वाले अध्यादेश को सर्वसम्मति से पारित कर दिया था और इन्हें इंतजार था उस पल का जब राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी इस अध्यादेश पर दस्तख्त कर देते और दागियों की बल्ले बल्ले हो जाती।
जाहिर है अगर अब जनभावना के चलते ही इस अध्यादेश को वापस लिया गया है तो यही जनभावना तो उस वक्त भी थी जो कि अब है। चंद दिनों में तो देश की जनता ने अध्यादेश को लेकर अपनी भावना में परिवर्तन नहीं किया था लेकिन मनमोहन कैबिनेट ने फिर भी ऐसा किया क्योंकि ये न तो ये कोई जनभावना थी और न ही सरकार का रुख दागियों के खिलाफ एकाएक बदल गया।
दरअसल ये भावना थी कांग्रेस युवराज राहुल गांधी की, ये भावना थी कांग्रेस के उन रणनीतिकारों की जिन्होंने राहुल को जनता की नजरों में हीरो बनाने के लिए ये पूरी स्क्रिप्ट तैयार की थी जिसे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने अजय माकन की प्रेस कांफ्रेंस में पढ़ा था। राहुल ये बात अच्छी तरह जानते थे कि दागियों को बचाने वाला ये अध्यादेश भले ही उनकी पार्टी की मजबूरी हो लेकिन अगर समय रहते इसे वापस नहीं लिया गया तो 2014 में इस अध्यादेश के बहाने समूचा विपक्ष यूपीए की हैट्रिक और उनके प्रधानमंत्री बनने के ख्वाब पर पानी फेरने में अहम भूमिका अदा कर सकता है।
ये इसलिए भी क्योंकि जिस अध्यादेश को सोनिया गांधी की मौजूदगी में कांग्रेस कोर ग्रुप ने हरी झंडी दी हो, उस अध्यादेश की जानकारी राहुल गांधी को न हो ये तो संभव नहीं है।
अब यूपीए सरकार भले ही जनभावना की दलील दे रही हो लेकिन अगर वाकई में इन्हें जनभावना की इतनी ही चिंता है, फिर तो ऐसे कई मामले हैं जिन पर सरकार को जनभावना के अनुरूप ही अमल करना चाहिए फिर चाहे वह राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में लाने की बात हो या फिर सरकार में शामिल भ्रष्ट मंत्रियों पर कार्रवाई की बात हो। विदेशी बैंकों में जमा कालेधन को भारत में वापस लाने की बात हो या फिर अपने धूर्त पड़ोसी पाकिस्तान की कायराना हरकतों पर उसे सबक सिखाने की बात हो।
लेकिन आज तक यूपीए सरकार को जनभावना का ख्याल नहीं आया क्योंकि इस सब को लेकर कांग्रेस युवराज राहुल गांधी ने अपनी भावना का सार्वजनिक रुप से प्रधानमंत्री की धज्जियां उड़ाते हुए कभी प्रदर्शन नहीं किया। राहुल गांधी अहम मौके पर सार्वजनिक मंच से नदारद ही दिखाई दिए।
आज राहुल के बहाने यूपीए सरकार को जनभावना का ख्याल आ रहा है क्योंकि सरकार साउथ ब्लॉक, रायसीना हिल्स से नहीं बल्कि 10 जनपथ से चल रही है। आज मनमोहन सिंह को जनभावना का ख्याल आ रहा है क्योंकि 2014 में राहुल गांधी को पीएम बनाने के लिए किसी बहाने उन्हें जमीन तैयार करनी है। ये सब करने में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की कैबिनेट ने सिर्फ 15 मिनट का ही वक्त लिया जबकि देश से जुड़े अहम मुद्दों पर अपना मुंह खोलने में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह 15 महीने तक का वक्त लगा देते हैं। जय हो मनमोहन सिंह की, जय हो यूपीए सरकार की और जय हो देश की जनता की क्योंकि उम्मीद है कि चुनाव में वोट देते वक्त देश की जनता अपनी भावना का सही प्रदर्शन करेगी और जनभावनाओं का हवाला देकर अपने सियासी फायदे के लिए जनभावनाओं से खिलवाड़ करने वालों को करारा सबक सिखाएगी।

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सोमवार, 30 सितंबर 2013

अगर मैं चारा खाने नहीं जाता !

लालू प्रसाद यादव भारतीय राजनीति का एक ऐसा नाम जिससे शायद ही कोई न जानता हो। लालू की खासयित भी यही है कि उनके न चाहने वाले भी लालू के सामने होने पर या टीवी पर होने पर लालू को सुने बिना नहीं रह सकते। लेकिन अपने ही एक कारनामे की वजह से अगले कुछ सालों तक लालू का मसखरा अंदाज शायद ही अब संसद में या फिर टीवी पर देखने या सुनने को मिले। ये लालू के प्रशंसकों के लिए बुरी ख़बर जरुर हो सकती है लेकिन भारतीय राजनीति के भविष्य के लिहाज से ये सीबीआई की विशेष अदालत का एक ऐतिहासिक फैसला है।  
सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव, पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र समेत 45 लोगों को चारा घोटाले से जुड़ी चाईबासा ट्रेजरी से फर्जी तरीके से 37 करोड़ 70 लाख रुपए निकालने के मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद इन्हें कितने वर्ष की कारावास होगी ये तो 3 अक्टूबर को सबके सामने आ ही जाएगा लेकिन ये फैसला बिहार और झारखंड की राजनीति के साथ ही देश की राजनीति पर गहरा असर डालेगा। ये इसलिए भी क्योंकि ये फैसला ऐसा वक्त पर आया है जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही किसी भी मामले में सांसद या विधायक को दो वर्ष या उससे अधिक की सजा होने पर तत्काल प्रभाव से उनकी सदस्यता रद्द करने का आदेश जारी कर चुका है।
जाहिर है इसका गहरा असर लालू के राजनीतिक करियर पर पड़ेगा और बिहार में एक बार फिर से राजद को अपने दम पर वापस लाने का ख्वाब देख रहे लालू का ये ख्वाब पूरा होना अब इतना आसान नहीं रहेगा। 17 साल पहले जनता की गाढ़ी कमाई को चारा घोटाले के बहाने उड़ाने वाले राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने शायद ही उस वक्त सोचा होगा कि उनका ये कारनामा भविष्य में न सिर्फ उनके राजनीतिक भविष्य पर विराम लगा सकता है, बल्कि उन्हें जेल की हवा भी खिला सकता है। सत्ता के नशे में चूर रहे लालू प्रसाद यादव को शायद ही इस बात का आभास उस वक्त हुआ होगा लेकिन सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने पर रांची की बिरसा मुंडा सेंट्रल जेल में आराम फरमा रहे लालू को अब जरुर इसका एहसास हो रहा होगा।
राजनीति में ऐसे लालूओं की कोई कमी नहीं है जो सत्ता के नशे में चूर होने के बाद जनता की गाढ़ी कमाई को भ्रष्टाचार और घोटालों के जरिए अपनी तिजोरियों को भरने में जरा भी नहीं शर्माते हैं। उन्हें शर्म नहीं आती जनता के उस विश्वास को ठेस पहुंचाने में, जो इस उम्मीद के साथ उन्हें वोट देकर लोकतंत्र के मंदिर तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त करते हैं कि वे न सिर्फ उनकी समस्याओं का समाधान करेंगे बल्कि विकास का दूत बनकर काम करेंगे। लेकिन अफसोस लालू जैसे राजनेता इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते और सत्ता के नशे में मदहोश होकर जनता की गाढ़ी कमाई को उड़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं।
लालू के इस हश्र से ये तो नहीं कहा जा सकता कि इससे भारत में भ्रष्टाचार का अंत हो जाएगा और सत्ता के नशे में चूर राजनेता अब कोई भ्रष्टाचार या घोटाले को अंजाम नहीं देंगे लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि दागियों पर 10 जुलाई का सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला और लालू जैसे राजनेता का हश्र भ्रष्टाचारियों में एक भय का माहौल बनाने में अहम भूमिका जरुर निभाएगा।
ऐसे में जनता की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है कि वे अब भी अपने मत का इस्तेमाल जाति और धर्म के आधार पर करेंगे या फिर उम्मीदवार की योग्यता और ईमानदारी को ध्यान में रखकर करेंगे। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने 10 जुलाई के फैसले से चुनाव सुधार की दिशा में अपना काम तो कर दिया है, लेकिन ये अंजाम तक तभी पहुंच पाएगा जब देश की जनता चुनाव में दागियों को सबक सिखाएगी और सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले का असली मतलब अपनी वोट की ताकत से दागी नेताओं को समझाएगी।
आखिर में संसद में एफडीआई पर बहस के दौरान लालू प्रसाद यादव का नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज पर सुनाया गया एक शेर मुझे बार बार याद आ रहा है। साथ ही उस शेर के कुछ शब्दों को बदलकर सभी मित्रों को सुनाने का मन भी कर रहा है। लालू का कहा शेर कुछ यूं था – http://youtu.be/31yXIlicepI
मोहब्बत में तुम्हें आसूं बहाना नहीं आता।
अगर आपके बनारस में पान खाने नहीं आता।।

चारा घोटाले में रांची की बिरसा मुंडा सेंट्रल जेल में बंद लालू पर अब ये शेर कुछ यूं पढ़ने का मन कर रहा रहा है-
रांची की बिरसा मुंडा सेंट्रल जेल में नहीं जाता।
अगर 17 साल पहले मैं चारा नहीं खाता।।


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रविवार, 29 सितंबर 2013

क्या देहाती औरत सम्मान के लायक नहीं ?

मुझे पता है कि मोदी के अंध समर्थकों द्वारा इस पोस्ट को पढ़ने के बाद मैसेज, ईमेल या फिर कमेंट के रुप में मुझ पर गालियों का खूब बौछार होगी। फिर भी मैं ये पोस्ट लिख रहा हूं क्योंकि ये गांवों में बसने वाले भारत की देहाती औरतों के सम्मान का सवाल है। क्योंकि ये भारतीय संस्कृति को आज भी जिंदा रखने वाली महिलाओं का सवाल है।
हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को न्यूयार्क में पाकिस्तान के वजीरे आजम नवाज शरीफ ने देहाती औरत कहा कि नहीं इसको लेकर संशय बरकरार है। इस पर एक लंबी चौड़ी बहस भी की जा सकती है, लेकिन जिस अंदाज में भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने देहाती औरत शब्द पर जोर देकर जिस तरह से देहाती औरत को लेकर अपनी सोच का प्रदर्शन किया उससे ये तो जाहिर होता ही है कि गांवों में बसने वाले भारत में आज किसी को देहाती कहे जाने पर नरेन्द्र मोदी को अपमान महसूस हो रहा है। उन्हें मनमोहन सिंह को देहाती औरत कहे जाने पर ऐतराज है। आखिर क्यों..?  
क्या आपकी नजर में एक देहाती औरत का कोई सम्मान नहीं है..? क्या आपकी नजर में देहाती औरत समाज में रहने लायक नहीं है..?
आपके इस गुस्से और हाव भाव देखकर तो कम से कम यही अंदाजा हो रहा है कि देहाती औरत न हो गयी अछूत हो गयी..!
ठीक है, दूसरे देश के प्रधानमंत्री खासकर पाकिस्तान के वजीरेआजम नवाज शरीफ का हमारे प्रधानमंत्री पर टिप्पणी करने पर आपने आपत्ति जतायी, आपने अपना गुस्सा प्रकट किया लेकिन आप गुस्सा सिर्फ इस बात पर हो रहे हैं कि हमारे प्रधानमंत्री को देहाती औरत की संज्ञा दे दी गयी। नवाज शरीफ ने जो कहा, नहीं कहा...उसे छोड़िए लेकिन आपने देश की राजधानी में भरे मंच से देश की जनता के सामने एक देहाती औरत का क्या मान रखा..?
गांवों में बसने वाले भारत की एक देहाती औरत के सम्मान की तो आपने एक पल में ही धज्जियां उड़ा दीं।
क्या सोच रहे होंगे लोग गांवों में बसने वाले भारत की उन औरतों के लिए जो दिन रात बिना किसी ऐशो आराम की चाहत के बिना अपने परिवार का ख्याल रखती हैं।
जो बिना किसी बनावटी मुस्कान के बिना ही अपनों का दिल जीत लेती हैं।
जो अपने सपनों का गला घोंट कर अपने परिवार की खुशी के लिए हर दुख हंसते हंसते सहन कर लेती है।
जो शहर की चकाचौंध से दूर आज भी न सिर्फ भारतीय संस्कृति को जिंदा रखे हुए हैं बल्कि इस परंपरा को बिना रुके आगे बढ़ा रही हैं।
मोदी जी ये देहाती औरत ही है जो आज भारतीय संस्कृति को जिंदा रखे हुए है। इनके लिए तो दिल में सम्मान का भाव पैदा होना चाहिए न कि इनसे किसी की तुलना करने पर गुस्सा आना चाहिए।
चोरी करने के बाद सीना जोरी करने वाले पाकिस्तान के वजीर नवाज शरीफ की भारत के प्रधानमंत्री मनोमहन सिंह पर टिप्पणी पर गुस्सा आना लाजिमी है लेकिन गांवों में बसने वाली भारतीय महिलाएं जिसे देहाती औरत कहा जा रहा है, उसका अपमान करना तो जायज नहीं है न, वो भी उस वयक्ति का जो एक प्रमुख राजनीतिक दल का पीएम पद का उम्मीदवार हो।


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शनिवार, 28 सितंबर 2013

क्या अब जनता दिखाएगी दम ?

2014 के आम चुनाव से पहले आम जनता की नजरों में खुद को एक दूसरे से बेहतर साबित करने के लिए राजनीतिक दल सियासी मंच पर किसी भी तरह की नौटंकी करने से बाज नहीं आ रहे हैं। दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद से ही शुरु हुआ ये सिलसिला अनवरत जारी है। फिर चाहे इस पर पहले सभी दलों का एक सुर में बात करना हो या फिर सरकार का इस फैसले को पलटने के लिए अध्यादेश लाना और ऐन वक्त पर राहुल गांधी का अध्येदेश को बकवास करार देते हुए इसे फाड़ कर फेंक देने जैसे बात कहना। (जरुर पढ़ें- सियासी ड्रामे के जरिए ही सही, कुछ तो अच्छा हुआ !)
सुप्रीम कोर्ट का ये ऐतिहासिक फैसला रास तो शायद ही किसी राजनीतिक दल को आ रहा है लेकिन इसका खुलकर विरोध करने की हिम्मत शायद किसी में नहीं है। भाजपा ने कोशिश करके पैर पीछे खींच लिए तो कांग्रेस भी भाजपा की देखा देखी राहुल गांधी के गुस्से के बहाने अपने कदम पीछे खींचने की तैयारी कर ली है। ये बात अलग है कि राहुल का ये गुस्सा कुछ ज्यादा ही बाहर आ गया जिसके चलते सरकार असहज स्थिति में दिखाई दे रही है। इतनी असहज की प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सोच तक नहीं पा रहे हैं कि राहुल के इस गुस्से पर प्रतिक्रिया दें या फिर अपना इस्तीफा..!
कुल मिलाकर सभी राजनीतिक दल जनता के सामने अब ये तस्वीर रखने की कोशिश में हैं कि वे सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से नाखुश नहीं है और वे नहीं चाहते कि दागियों को बचाया जाए। दिल में तो सबके चोर है लेकिन दिखाना ये चाहते हैं कि वे जनता के सच्चे हितैषी हैं और चुनाव सुधारों की दिशा में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का वे पूरा सम्मान करते हैं। लेकिन बड़ी संख्या में दागियों को चुनाव में वे क्यों दिल खोलकर टिकट देते हैं इसका सीधा सा जवाब शायद किसी के पास नहीं है।
राजनीतिक दलों की सियासी चालों को न समझने वाले लोगों को लगने लगा है कि भाजपा ने इस अध्यादेश का विरोध कर ठीक किया है और राहुल गांधी ने भी अध्यादेश को बकवास करार देकर एक नेक काम किया है और भविष्य में ये सभी राजनीतिक दल चुनाव में अब दागियों को टिकट देने से परहेज करेंगे लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या ऐसा कभी हो पाएगा..?
जाहिर है दागी मैदान में उतारे जाते रहेंगे और राजनीतिक दल भी इनको पूरा संरक्षण देते रहेंगे लेकिन लोगों को ये नहीं भूलना चाहिए कि दागियों से निजात दिलाने के लिए जनता को राजनीतिक दलों के भरोसे नहीं बैठना चाहिए, उन्हें ये याद रखना चाहिए कि इसकी चाबी तो उनके खुद के पास ही है। चुनाव में दागियों को नकार कर ईमानदार उम्मीदवार को जिताकर चाहे वह किसी भी दल का क्यों न हो जनता अपनी ताकत का एहसास इन राजनीतिक दलों के आकाओं को करा सकती है, लेकिन सवाल यहां भी खड़ा है कि क्या हम ऐसा होने की उम्मीद कर सकते हैं..?

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शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

सियासी ड्रामे के जरिए ही सही, कुछ तो अच्छा हुआ !

राहुल गांधी ने पहली बार तो कुछ सही बोला है लेकिन यहां पर भी राहुल गांधी के इस बयान के पीछे की मंशा पर संदेह हो रहा है क्योंकि राहुल गांधी न तो विपक्ष में हैं और न ही यूपीए के किसी घटक दल के नेता कि जो अपनी ही सरकार के फैसले के खिलाफ आवाज उठाएं। वो भी उस यूपीए सरकार के फैसले पर जिसके अघोषित मुखिया वे और उनकी मां व यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ही है। उस यूपीए सरकार के फैसले पर जिसके घोषित मुखिया प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कुछ बोलें न बोलें लेकिन ये कहने में पीछे नहीं हटते की वे राहुल के लिए कुर्सी खाली करने के लिए हरदम तैयार हैं और राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे योग्य और कांग्रेस में सर्वमान्य नेता हैं।
सवाल ये भी उठता है कि दागियों पर सुप्रीम कोर्ट के जिस फैसले को पलटने के लिए सरकार फैसले के बाद से ही कवायद कर रही थी उस पर राहुल आज तक चुप क्यों रहे..? क्यों राहुल गांधी को इससे पहले यूपीए सरकार की ये कवायद बकवास नहीं लगी और क्यों अचानक से राहुल गांधी को लगा कि इसे फाड़कर फेंक देना चाहिए..? हैरत तो तब होती है राहुल के इस बयान से कुछ मिनट पहले तक इस यूपीए सरकार के इस अध्यादेश को लाने के फैसले को सरकार में शामिल मंत्री और नेता जस्टिफाई करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे थे। हालांकि केन्द्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा जैसे कुछ गिने चुने कांग्रेसी ऐसे थे जिन्हें सरकार का ये फैसला अखर रहा था लेकिन इनकी बात की भावना को समझने वाले यूपीए में शायद कोई नहीं था।
चापलूसी की हद तो तब हो जाती है जब अध्यादेश पर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की नाराजगी के बाद सरकार में शामिल सभी मंत्रियों के साथ ही कांग्रेसी नेताओं के सुर बदल जाते हैं और अध्यादेश पर सरकार के फैसले को जस्टिफाई करने वाले ये कांग्रेसी और मंत्री अब राहुल गांधी की राय को ही पार्टी की राय बताने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।
ये भी अजब है कि राहुल गांधी की नाराजगी के बाद अब यूपीए सरकार भी दागियों को बचाने वाले अध्यादेश को वापस लेने की तैयारी कर रही है। अब इसका क्या मतलब निकाला जाए कि आखिर सरकार किसके ईशारे पर चल रही है और सरकार जो भी फैसले लेती है या आजतक लेती आई है उसमें राहुल गांधी की कितनी भूमिका है। जाहिर है राहुल गांधी को जो पसंद नहीं होगा वह सरकार नहीं करेगी क्योंकि जनाब सरकार साउथ ब्लॉक, रायसीना हिल्स से नहीं 10 जनपथ से चलती है..!
बहरहाल सियासी ड्रामे के जरिए ही सही, सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक पहल के बाद चुनाव सुधारों की दिशा में कम से कम एक अच्छा काम तो हो रहा है, जो बहुत हद तक राजनीति की गंदगी को साफ करने में एक अहम रोल अदा करेगा।


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गुरुवार, 26 सितंबर 2013

आखिर कब तक सहते रहेंगे हम ?

वो मारेंगे हम सहेंगे, वो खून बहाएंगे हम फूलमाला लेकर उनका स्वागत करेंगे, वो उल्टा हमें आंख दिखाएंगे और हम उन्हें बातचीत करने का न्यौता देंगे आखिर कब तक..? एक बार फिर वही तो हुआ लेकिन फिर भी सरकार के सरदार कह रहे हैं कि हम बातचीत का रास्ता खुला रखेंगे। तीन आतंकवादी एक लेफ्टिनेंट कर्नल सहित 12 लोगों को मौत के घाट उतार देते हैं लेकिन हमारे प्रधानमंत्री सिर्फ ये कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं कि इस घटना की निंदा करने के लिए उनके पास शब्द नहीं है। शब्दकोष तो मनमोहन सिंह का पहले ही खाली है, ऐसे में ये बात तो समझ में आती है कि या तो वे घटना की कड़ी शब्दों में निंदा करेंगे या फिर कुछ बोलेंगे ही नहीं। (जरुर पढ़ें- फिर से- पाकिस्तान की तो..!)
यहां तक तो ठीक था लेकिन आतंकी हमले के दो दिन बाद वे अपने इस धूर्त पड़ोसी देश के वजीरे आजम से अपनी मुलाकात को नहीं टाल सकते। वो और उनकी सरकार में शामिल लोग कहते हैं कि बातचीत ही एकमात्र रास्ता है लेकिन हर महीने ऐसे दो तीन आतंकी हमलों में अपनी जान गंवाने वाले सेना के जवान और निर्दोष नागरिकों का आखिर क्या कसूर था इसका जवाब शायद उनके पास नहीं है। ये समझते हैं कि शहीदों के परिवार के प्रति अपनी संवेदनाएं प्रकट करके, शहीदों के घरवालों को मुआवजा राशि देकर शायद उनका दर्द कम हो जाएगा लेकिन अफसोस इस दर्द को ये कभी नहीं समझ पाएंगे क्योंकि इस दर्द को वही समझ सकता है जिसने किसी अपने को खोया हो। (जरुर पढ़ें- पाक को भारत का करारा जवाब !)
धूर्त पडोसी की ये धूर्तता एक, दो या तीन बार होती तो हमारी सरकार का ये रवैया समझ में आता कि आपसी बातचीत से वे पड़ोसी देश के हुक्मरानों को समझा लेंगे लेकिन पाकिस्तान की ये कायराना हरकत और बार बार पीठ में छुरा घोंपना क्या पाकिस्तान का भारत को सीधा जवाब नहीं है कि आप चाहे कुछ कर लो लेकिन हम नहीं सुधरेंगे।
भारत का एक अहम अंग होने के साथ ही जम्मू कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुनी हुई सरकार होने के बावजूद पाकिस्तान का बार बार कश्मीर को विवादित क्षेत्र बताना और ये कहना कि कश्मीर के लोग अपनी आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं और अपनी सेना की मदद से कश्मीर में आतंकवाद को प्रायोजित करना क्या ये नहीं दर्शाता कि पाकिस्तान कभी नहीं चाहता कि जम्मू कश्मीर में शांति रहे। लेकिन अफसोस ये सब बातें जानने के बाद भी हमारी सरकार नासमझ बने रहना चाहती है। (जरुर पढ़ें- मनमोहन को जगाओ, देश बचाओ !)
आए दिन आतंकी हमलों में हमारे जवान शहीद हो रहे हैं, निर्दोष नागरिक मारे जा रहे हैं, लोग जर के साए में जीने को मजबूर हैं लेकिन हमारी सरकार अहिंसा की पुजारी बने रहना चाहती है। जो सरकार अपने नागरिकों की रक्षा न कर सके, सेनैकों का मनोबल तोड़ने का काम करे उससे और क्या उम्मीद की जा सकती है, आखिर अपने नागरिकों की सुरक्षा से बड़ी चीज किसी देश की सरकार के लिए और क्या हो सकती है। कम से कम अमेरिका से ही कुछ सीख लो जो अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है और अपनी तरफ आंख उठाने वाले को उसके घर में घुसकर मारकर ही दम लेता है। ओसामा बिन लादेन से बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है लेकिन हम पाकिस्तान के आगे गिड़गिड़ाते ही रहते हैं कि मुंबई हमले के मास्टर माइंड हाफिज सईद को हमें सौंप दो, हमारे देश पर आतंकी हमले मत करो लेकिन होता क्या है छोटे से अंतराल के बाद भारत पर आतंकी हमले और शहीद होते हमारे जवान। (जरुर पढ़ें- “लातों के भूत बातों से नहीं मानते”)
जहां जरुरत है वहां बातचीत करो लेकिन कहते हैं न कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते, इसलिए पकिस्तान को समझाना है तो बातों से काम नहीं चलेगा मनमोहन सिंह जी, बातों से काम नहीं चलेगा। आप तो देश के प्रधानमंत्री हैं, बेहतर समझते होंगे कि अटैक इज द बेस्ट डिफेंस। उम्मीद है कि आपकी सरकार कुछ ऐसे कदम उठाएगी कि पाकिस्तान भारत की तरफ आंख उठाने से पहले हजार बार सोचे।


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बुधवार, 25 सितंबर 2013

हिंदी ब्लॉगिंग से मिलेगा मान ! Contest

विदेशी भाषा के आगे अपना सम्मान खोती हिंदी के लिए हिंदी ब्लॉगिंग उसे उसका खोया मान दिलाने में निश्चित तौर पर सार्थक हो सकती है बशर्ते तेजी से लोकप्रिय हो रही हिंदी ब्लॉगिंग के साथ ही हिंदी लोगों की पसंदीदा भाषा भी बने। बीते कुछ समय से ये देखा जा रहा है कि हिंदी ब्लॉगिंग के प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ा है और लोग हिंदी ब्लॉगिंग के माध्यम से खुलकर अपनी बात शासन-प्रशासन के साथ ही समाज के सामने रख रहे हैं। इसमें वो बातें और आमजन से जुड़ी वो समस्याएं हैं जो न तो अखबारों की सुर्खियां बन पाती हैं और न ही टीआरपी के लिए किसी भी हद तक जाने वाले समाचार चैनल इन्हें दिखाने में अपनी रुचि दिखाते हैं।
बड़ी संख्या में आम लोग समय निकालकर न सिर्फ ब्लॉगिंग कर रहे हैं बल्कि ये अपनी बात कहने का एक बड़ा ही सशक्त माध्यम बन चुकी है। ब्लॉगिंग के लिए हिंदी लिखने से परहेज करने वाले शख्स तक न सिर्फ हिंदी टाईपिंग सीख रहे हैं बल्कि उन्हें ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपनी बात पहुंचाने का एक सशक्त और आसान माध्यम लगता है।
सोशल नेटवर्किंग साईट्स और ब्लॉग्स में हिंदी में मेरे द्वारा हिंदी में स्टेटस अपडेट करने और ब्लॉग्स लिखने पर मेरे कई मित्रों ने मुझ से कई बार ये सवाल पूछा है कि यार तुम हिंदी में कैसे लिखते हो, जरा हमें भी बताओ ताकि हम भी हिंदी में टाईप कर सकें। इसमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो अंग्रेजी की बजाए हिंदी भाषा में अपने मन की बात को बेहतर तरीके से ज्यादा से ज्यादा लोगों को समझा सकते हैं और चाहते हैं कि वे भी सोशल नेटवर्किंग साईट्स में हिंदी में लिखे और हिंदी में ब्लॉगिंग शुरु करें।
आज अंग्रेजी भले ही हिंदी से आगे निकल गयी हो लेकिन इस बात को नहीं नकारा जा सकता कि आज भी हिंदुस्तान में अंग्रेजी बोलने और लिखने वालों की संख्या हिंदी बोलने और लिखने वालों की अपेक्षा काफी कम है। हां, ये एक कड़वा सच जरुर है कि लोग अंग्रेजी बोलना और लिखना सीखने के आतुर जरुर दिखाई दे रहे हैं।
हिंदी ब्लॉगिंग एक ऐसा माध्यम बन रहा है, जो लोगों की इस आतुरता को हिंदी भाषा की तरफ मोड़ सकता है, बस जरुरत है कि लोगों को इसके लिए प्रोत्साहित किया जाए। अंग्रेजी न बोल पाने या न लिख पाने पर उन्हें उनके साथी हतोत्साहित न करें बल्कि हिंदी में अपनी बात कहने के लिए प्रोत्साहित करें।
इसका ये मतलब बिल्कुल नहीं कि अंग्रेजी का पूर्णतया बहिष्कार कर दें और अंग्रेजी के खिलाफ बैनर-पोस्टर लेकर सड़कों पर उतर कर आंदोलन शुरु कर दें। अंग्रेजी भी सीखें और जहां अंग्रेजी के बिना काम ही नहीं चल सकता वहां पर अंग्रेजी का इस्तेमाल भी करें लेकिन इसके लिए अपनी मातृभाषा हिंदा का अपमान न करें वर्ना हमारी मातृभाषा सिर्फ बाजार का एक हिस्सा बनकर रह जाएगी और 1947 से पहले जिस तरह अंग्रेजों ने हम पर शासन किया ठीक उसी तरह अंग्रेजी भी एक दिन पूर्ण रुप से हिंदी पर अपना आधिपत्य जमा लेगी।

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मंगलवार, 24 सितंबर 2013

!dea बेवकूफ बनाने का !

बेहतर कस्टमर सर्विस का दावा करने वाला एक कंपनी सेल्यूलर का नया विज्ञापन तो आपने देखा ही होगा लेकिन सवाल ये है कि क्या वाकई में जो विज्ञापन में दिखाया जाता है वैसी ही सेवाएं कंपनी अपने ग्राहकों को देती है या फिर ये कंपनी का अपने ग्राहकों को बेवकूफ बनाने का सिर्फ एक तरीका है। मेरे साथ जयपुर में जो वाक्या हुआ उसके बाद से मेरी राय तो कम से कम कंपनी के लिए ऐसी ही हो गयी है।
फर्ज कीजिए कि अप किसी अंजान शहर में हों और आपका मोबाईल चोरी हो जाए या खो जाए या फिर आपका सिम किसी वजह से खराब हो जाए। ऐसे में क्या कीजिएगा..? जाहिर है आप जिस कंपनी का सिम इस्तेमाल कर रहे थे उस कंपनी के कस्टमर केयर को जानकारी देंगे और नया सिम पाने के लिए कंपनी के दफ्तर की ओर रुख करेंगे। लेकिन सोचिए कि जैसे ही आप एक नए शहर में बड़ी मशक्कत के बाद जैसे तैसे कंपनी के दफ्तर को खोजते हुए अंदर दाखिल होकर ग्राहक सेवा के लिए सामने बैठे शख्स को अपनी समस्या बताते हैं और वह बड़ी ही बेरुखी से आपकी समस्या का समाधान करने से ये कहते हुए इंकार कर देता है कि ऐसा कोई नियम नहीं है तब आप को कैसे महसूस होगा..?
वो भी तब जब आपको कस्टमर केयर सेंटर में बैठा एक्जीक्यूटिव ये कहकर कंपनी के आउटलेट में जाने के लिए कहता है कि आपकी समस्या का समाधान कंपनी आउटलेट पर हो जाएगा। जाहिर है ऐसी स्थिति में गुस्सा तो बहुत आएगा।
गुस्सा तो मुझे भी बहुत आया और साथ ही बार बार याद आ रहा था वो विज्ञापन जिसमें बताया जा रहा है कि आपको सभी सेवाएं सिर्फ तीन अंक का एक नंबर डायल करने पर घर बैठे मिल जाएंगी लेकिन यहां तो कंपनी के आउटलेट पर जाने पर भी कंपनी प्रतिनिधी ने सेवा न होने की बात कहकर अपना पल्ला झाड लिया। जब्कि कंपनी के कस्टमर केयर सेंटर पर बैठे कंपनी के ही एक दूसरे प्रतिनिधि ने आउटलेट पर जाने पर समस्या के समाधान का वादा किया था।
जयपुर में रोमिंग के दौरान मेरा आईडिया का सिम खराब हो जाने पर जब मैंने उसी नंबर की डुप्लीकेट सिम हासिल करने का तरीका जानने के लिए 9887012345 नंबर डायल कर आईडिया के कस्टमर केयर सेंटर पर फोन किया। सिम मेरा ही इसकी पूरी तफ्तीश करने के बाद कंपनी प्रतिनिधि ने मुझे बताया कि आईडी, एड्रेस प्रूफ और एक फोटोग्राफ के साथ आईडिया आउटलेट जाकर 25 रूपए में आपको डुप्लीकेट सिम मिल जाएगा जो 24 घंटे में एक्टिवेट हो जाएगी। नया शहर था, तो जैसे तैसे आईडिया आउटलेट को खोजते खोजते मैं जब वहां पहुंचा तो वहां बैठे प्रतिनिधि जिनका नाम पुनीत शर्मा था ने ये कहकर सिम देने से इंकार कर दिया कि आपको डुप्लीकेट सिम सिर्फ आपके होम सर्किल (यूपी वेस्ट) से ही मिलेगा।
एक ही कंपनी के दो प्रतिनिधि की अलग अलग बातें सुन मुझे गुस्सा तो बहुत आया लेकिन मैं कर भी क्या सकता था।
आईडिया कंपनी प्रतिनधि पुनीत शर्मा ने मुझे जो बताया उसके मुताबिक अगर आप अपने होम सर्किल से बाहर हों यानि कि रोमिंग में हो चाहे किसी भी शहर में क्यों न हो और आपको किसी कारणवश फोन खो जाने, चोरी हो जाने या सिम खराब हो जाने पर डुप्लीकेट सिम चाहिए तो आपको उसके लिए अपने होम सर्किल में स्थित कंपनी के आउटलेट पर जाना पडेगा। ग्राहक परेशान हो तो हो लेकिन कम से कम आईडिया वाले आपको डुप्लीकेट सिम नहीं देंगे।
आज के समय में जब सारी चीजें सिर्फ एक क्लिक की दूरी पर हैं, तब अगर कोई कंपनी आपको अंजान शहर में अपना सिम उपलब्ध नहीं करा सकती तो इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है। ऐसा कई लोगों के साथ हुआ होगा, लेकिन हैरानी की बात ये है कि कंपनी आज तक इसका कोई समाझान नहीं खोज पाई है और न ही कंपनी ने ग्राहकों को रोमिंग के दौरान दूसरे सर्किल में होने पर डुप्लीकेट सिम उपलब्ध कराने के लिए कोई कदम ही उठाया है। जब अंजान शर में ये कंपनियां अपने ग्राहकों की समस्या समाधान नही कर सकती फिर क्या फायदा ऐसी कंपनियों की सेवाएं इस्तेमाल करने का..?
हैरत की बात है कि ये वही कंपनी है जो टीवी पर विज्ञापन के जरिए ये प्रचार करने में कोई कसर नहीं छोड़ती की उन्हें अपने ग्राहकों की कितनी चिंता है, जो ये दिखाने की कोशिश करती हैं कि उनके लिए ग्राहक सेवा से बढ़कर और कुछ नहीं है, जो ये कहती हैं कि सिर्फ 121 डायल करके आपको सभी सेवाएं मिल जाएंगी, कस्टमर केयर सेंटर पर फोन करने पर उनके प्रतिनिधि झूठ बोलते हैं कि आपकी समस्या का समाधान हो जाएगा लेकिन असल में ऐसा कुछ नहीं होता। होता है तो ग्राहक का समय और पैसा दोनों बर्बाद।
आईडिया कंपनी का कोई अधिकारी इसे पढ़ रहा हो तो जनाब आपसे अनुरोध है कि ग्राहकों को बेवकूफ मत बनाईए, ग्राहकों से झूठ मत बोलिए। सर्विस नहीं दे सकते तो सीधे मना कीजिए और मेहरबानी करके ग्राहकों को बेवकूफ बनाने वाले ऐसे विज्ञापन मत दिखाईए।


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सोमवार, 23 सितंबर 2013

इन्हें शर्म नहीं आती !

ऐसा लगता है कि एक रेस सी चल रही है, जिसमें एक दूसरे से आगे निकड़ने की जबरदस्त होड़ जारी है। नेताओं से लेकर संत का चोला ओढ़ कर लोगों को बेवकूफ बनाने वाले शर्मे हया का पर्दा उतारकर बस दौड़े चले जा रहे हैं। रेस भी ऐसी की शर्म भी शर्म से पानी पानी हो जाए। भोपाल में राघव जी को बुढ़ापे में जोश आ गया तो संत का चोला डाल लोगों को सीख देने वाले आसाराम की काली करतूत भी सबके सामने आ ही गयी। (जरुर पढ़ें- अब बोलो आसाराम, ताली कितने हाथ से बजी ?)
बुजुर्गों की इस रेस में आसाराम तो राघवजी से आगे निकल गए लेकिन ये रेस उस वक्त और रोचक हो गयी जब राजस्थान की गहलोत सरकार में डेयरी मंत्री बाबू लाल नागर भी इसमें शामिल हो गए। (जरुर पढ़ें- लोकार्पण करने वाले खुद पहुंच गए हवालात) राघव जी और आसाराम की तरह नागर को फिलहाल तक जेल तो नहीं जाना पड़ा है लेकिन मंत्री की कुर्सी से नागर को हाथ धोना पड़ा। नागर की देखा देखी राजस्थान के ही निम्बाहेड़ी से कांग्रेस विधायक उदयलाल आंजना भी इस दौड़ में शामिल हो गए। उम्मीद है इस रेस में शामिल नागर और आंजना की दौड़ भी हवालात में जाकर ही थमेगी।
ये रेस चल ही रही थी कि लखनऊ में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एनडी तिवारी की एक ख़बर देखकर लगा कि एनडी तिवारी को शायद अपनी जवानी याद आ गयी। “कदम कदम बढ़ाए जा” गीत के बोल के साथ कदम बढ़ाते एनडी तिवारी ने स्टेज पर कार्यक्रम का संचालन कर रही महिला को पकड़ लिया और करने लगे डांस। लंबे समय से ख़बरों से बाहर एऩडी तिवारी को शायद लगा होगा कि वे रेस में पिछड़ रहे हैं, तो क्यों न कुछ अलग किया जाए।
अब बिना सहारे के भले ही एनडी तिवारी अपनी जगह से हिल भी न पाते हों लेकिन डांस करने के लिए एनडी की ऊर्जा देखने लायक थी। उम्र की इस दहलीज पर बिना सहारे के कब तक थिरकते, ऐसे में सहारा तो चाहिए ही था, तो थाम लिया मंच पर मौजूद महिला का हाथ। वैसे भी ये एनडी तिवारी का पुराना स्टाईल है। लगे रहिए एनडी साहब, लगे रहिए, वैसे भी अभी उम्र(90 वर्ष) ही क्या है आपकी। ये गाना भी शायद आप जैसों के लिए ही बना है- अभी तो मैं जवान हूं, अभी तो मैं जवान हूं।
क्या राघव जी, क्या आसारम, क्या एनडी तिवारी...पैर कब्र में लटक रहे हैं लेकिन इनके कारनामे देखिए। देखने-सुनने वाले को शर्म आ जाएगी लेकिन इन्हें नहीं आती, दुनिया से छोड़िए पता नहीं ये लोग अपने घरवालों से कैसे नजरें मिलाते होंगे..?


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शनिवार, 21 सितंबर 2013

वाह महाराज वाह !

कम से कम अभी तक मैं तो यही सोचता था कि नेता भी आखिर इंसान होते हैं, वे एक इंसान का दर्द समझ सकते हैं। पूरी दुनिया का न सही लेकिन कम से कम अपने क्षेत्र की जनता का दर्द तो समझ ही सकते हैं जिसने उन्हें अपना जनप्रतिनिधि चुनकर संसद या विधानसभा में भेजा है। लेकिन इस गलतफहमी को एक बार फिर से एक नेता ने ही दूर कर दिया। वो भी एक ऐसे नेता ने जो नेतानगरी के साथ ही धर्म की नगरी में लोगों को सादगी पसंद जीवन जीने की सीख के साथ ही इंसानियत का पाठ पढ़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ता।
इन नेताजी को लोग सतपाल महाराज के नाम से जानते हैं। नेता जी राजनीति के साथ ही धर्म की नगरी में भी खूब मशहूर हैं। ये अपने भक्तों को ज्ञान बांटने का कोई मौका नहीं छोड़ते। लेकिन सादगी औऱ इंसानियत की बात करने वाले इन नेताजी के खुद के कारनाम अगर आप सुनेंगे तो शायद आपके पैरों तले जमीन खिसक जाएगी।
दरअसल 21 सितंबर को सतपाल महाराज ने हरिद्वार में शाही अंदाज में अपना जन्मदिन मनाया। इस आयोजन को भव्य बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से लेकर उनकी कैबिनेट के कई मंत्री तक इस भव्य आयोजन में न सिर्फ शरीक हुए बल्कि इन्होंने इस आयोजन का खूब लुत्फ उठाया।
मुझे सतपाल महाराज के जन्मदिन मनाने से कोई दिक्कत नहीं है लेकिन एक जनप्रतिनिधि को क्या ऐसे वक्त पर अपने जन्मदिन का शाही आयोजन करना चाहिए जब उनके क्षेत्र की जनता आपदा के दंश को झेल रही हो और दाने दाने को मोहताज हो..? लोगों को सादगी और इंसानियत का पाठ पढ़ाने वाले ऐसे व्यक्ति से खुद क्या ऐसे व्यवहार की उम्मीद की जा सकती है..?
जाहिर है एक जनप्रतिनिधि होने के नाते सांसद महोदय को अपने क्षेत्र की जनता के बीच होना चाहिए था और उनके कष्टों को कम करने की कोशिश करनी चाहिए थी लेकिन शाही आयोजनों के लिए मशहूर सतपाल महाराज के लिए अपना जन्मदिन मनाना शायद उनकी पहली प्राथमिकता रही होगी। आपदा प्रभावितों के बीच जाकर, पूरा दिन उनके साथ बिताकर अगर सतपाल महाराज अपना जन्मदिन मनाते, संकट के वक्त जरुरत की चीजें प्रभावितों को वितरित करते तो शायद पलभर के लिए ही सही उनके क्षेत्र की जनता के चेहरे पर खुशी की एक झलक तो आती लेकिन सतपाल महाराज के लिए शायद अपने क्षेत्र की जनता के कष्टों का कोई मूल्य नहीं है।
जब प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से लेकर उनके मंत्री तक एक के बाद एक शाही भोज का आयोजन कर आपदा प्रभावितों को मुंह चिड़ा रहे हों तो फिर पौड़ी सासंद सतपाल महाराज क्यों पीछे रहें..? उनके पास तो शाही आयोजन के सवाल पर कहने के लिए उनके जन्मदिन का बहाना भी है।
वैसे भी सांसद महोदय से और क्या उम्मीद की जा सकती है, क्योंकि ये तो इनका पुराना स्टाईल है। बीते साल भी आपदा के वक्त सतपाल महाराज ने न सिर्फ इसी तरह शाही अंदाज में अपना जन्मदिन मनाया था बल्कि उसके तुरंत बाद 23 अक्टूबर 2012 को अपने बेटे श्रद्धेय के विवाह (जरुर पढ़ें- शर्म करो महाराज !) में भी करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाकर शादी को शाही शादी बानाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।


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