कुल पेज दृश्य

मंगलवार, 24 सितंबर 2013

!dea बेवकूफ बनाने का !

बेहतर कस्टमर सर्विस का दावा करने वाला एक कंपनी सेल्यूलर का नया विज्ञापन तो आपने देखा ही होगा लेकिन सवाल ये है कि क्या वाकई में जो विज्ञापन में दिखाया जाता है वैसी ही सेवाएं कंपनी अपने ग्राहकों को देती है या फिर ये कंपनी का अपने ग्राहकों को बेवकूफ बनाने का सिर्फ एक तरीका है। मेरे साथ जयपुर में जो वाक्या हुआ उसके बाद से मेरी राय तो कम से कम कंपनी के लिए ऐसी ही हो गयी है।
फर्ज कीजिए कि अप किसी अंजान शहर में हों और आपका मोबाईल चोरी हो जाए या खो जाए या फिर आपका सिम किसी वजह से खराब हो जाए। ऐसे में क्या कीजिएगा..? जाहिर है आप जिस कंपनी का सिम इस्तेमाल कर रहे थे उस कंपनी के कस्टमर केयर को जानकारी देंगे और नया सिम पाने के लिए कंपनी के दफ्तर की ओर रुख करेंगे। लेकिन सोचिए कि जैसे ही आप एक नए शहर में बड़ी मशक्कत के बाद जैसे तैसे कंपनी के दफ्तर को खोजते हुए अंदर दाखिल होकर ग्राहक सेवा के लिए सामने बैठे शख्स को अपनी समस्या बताते हैं और वह बड़ी ही बेरुखी से आपकी समस्या का समाधान करने से ये कहते हुए इंकार कर देता है कि ऐसा कोई नियम नहीं है तब आप को कैसे महसूस होगा..?
वो भी तब जब आपको कस्टमर केयर सेंटर में बैठा एक्जीक्यूटिव ये कहकर कंपनी के आउटलेट में जाने के लिए कहता है कि आपकी समस्या का समाधान कंपनी आउटलेट पर हो जाएगा। जाहिर है ऐसी स्थिति में गुस्सा तो बहुत आएगा।
गुस्सा तो मुझे भी बहुत आया और साथ ही बार बार याद आ रहा था वो विज्ञापन जिसमें बताया जा रहा है कि आपको सभी सेवाएं सिर्फ तीन अंक का एक नंबर डायल करने पर घर बैठे मिल जाएंगी लेकिन यहां तो कंपनी के आउटलेट पर जाने पर भी कंपनी प्रतिनिधी ने सेवा न होने की बात कहकर अपना पल्ला झाड लिया। जब्कि कंपनी के कस्टमर केयर सेंटर पर बैठे कंपनी के ही एक दूसरे प्रतिनिधि ने आउटलेट पर जाने पर समस्या के समाधान का वादा किया था।
जयपुर में रोमिंग के दौरान मेरा आईडिया का सिम खराब हो जाने पर जब मैंने उसी नंबर की डुप्लीकेट सिम हासिल करने का तरीका जानने के लिए 9887012345 नंबर डायल कर आईडिया के कस्टमर केयर सेंटर पर फोन किया। सिम मेरा ही इसकी पूरी तफ्तीश करने के बाद कंपनी प्रतिनिधि ने मुझे बताया कि आईडी, एड्रेस प्रूफ और एक फोटोग्राफ के साथ आईडिया आउटलेट जाकर 25 रूपए में आपको डुप्लीकेट सिम मिल जाएगा जो 24 घंटे में एक्टिवेट हो जाएगी। नया शहर था, तो जैसे तैसे आईडिया आउटलेट को खोजते खोजते मैं जब वहां पहुंचा तो वहां बैठे प्रतिनिधि जिनका नाम पुनीत शर्मा था ने ये कहकर सिम देने से इंकार कर दिया कि आपको डुप्लीकेट सिम सिर्फ आपके होम सर्किल (यूपी वेस्ट) से ही मिलेगा।
एक ही कंपनी के दो प्रतिनिधि की अलग अलग बातें सुन मुझे गुस्सा तो बहुत आया लेकिन मैं कर भी क्या सकता था।
आईडिया कंपनी प्रतिनधि पुनीत शर्मा ने मुझे जो बताया उसके मुताबिक अगर आप अपने होम सर्किल से बाहर हों यानि कि रोमिंग में हो चाहे किसी भी शहर में क्यों न हो और आपको किसी कारणवश फोन खो जाने, चोरी हो जाने या सिम खराब हो जाने पर डुप्लीकेट सिम चाहिए तो आपको उसके लिए अपने होम सर्किल में स्थित कंपनी के आउटलेट पर जाना पडेगा। ग्राहक परेशान हो तो हो लेकिन कम से कम आईडिया वाले आपको डुप्लीकेट सिम नहीं देंगे।
आज के समय में जब सारी चीजें सिर्फ एक क्लिक की दूरी पर हैं, तब अगर कोई कंपनी आपको अंजान शहर में अपना सिम उपलब्ध नहीं करा सकती तो इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है। ऐसा कई लोगों के साथ हुआ होगा, लेकिन हैरानी की बात ये है कि कंपनी आज तक इसका कोई समाझान नहीं खोज पाई है और न ही कंपनी ने ग्राहकों को रोमिंग के दौरान दूसरे सर्किल में होने पर डुप्लीकेट सिम उपलब्ध कराने के लिए कोई कदम ही उठाया है। जब अंजान शर में ये कंपनियां अपने ग्राहकों की समस्या समाधान नही कर सकती फिर क्या फायदा ऐसी कंपनियों की सेवाएं इस्तेमाल करने का..?
हैरत की बात है कि ये वही कंपनी है जो टीवी पर विज्ञापन के जरिए ये प्रचार करने में कोई कसर नहीं छोड़ती की उन्हें अपने ग्राहकों की कितनी चिंता है, जो ये दिखाने की कोशिश करती हैं कि उनके लिए ग्राहक सेवा से बढ़कर और कुछ नहीं है, जो ये कहती हैं कि सिर्फ 121 डायल करके आपको सभी सेवाएं मिल जाएंगी, कस्टमर केयर सेंटर पर फोन करने पर उनके प्रतिनिधि झूठ बोलते हैं कि आपकी समस्या का समाधान हो जाएगा लेकिन असल में ऐसा कुछ नहीं होता। होता है तो ग्राहक का समय और पैसा दोनों बर्बाद।
आईडिया कंपनी का कोई अधिकारी इसे पढ़ रहा हो तो जनाब आपसे अनुरोध है कि ग्राहकों को बेवकूफ मत बनाईए, ग्राहकों से झूठ मत बोलिए। सर्विस नहीं दे सकते तो सीधे मना कीजिए और मेहरबानी करके ग्राहकों को बेवकूफ बनाने वाले ऐसे विज्ञापन मत दिखाईए।


deepaktiwari555@gmail.com

सोमवार, 23 सितंबर 2013

इन्हें शर्म नहीं आती !

ऐसा लगता है कि एक रेस सी चल रही है, जिसमें एक दूसरे से आगे निकड़ने की जबरदस्त होड़ जारी है। नेताओं से लेकर संत का चोला ओढ़ कर लोगों को बेवकूफ बनाने वाले शर्मे हया का पर्दा उतारकर बस दौड़े चले जा रहे हैं। रेस भी ऐसी की शर्म भी शर्म से पानी पानी हो जाए। भोपाल में राघव जी को बुढ़ापे में जोश आ गया तो संत का चोला डाल लोगों को सीख देने वाले आसाराम की काली करतूत भी सबके सामने आ ही गयी। (जरुर पढ़ें- अब बोलो आसाराम, ताली कितने हाथ से बजी ?)
बुजुर्गों की इस रेस में आसाराम तो राघवजी से आगे निकल गए लेकिन ये रेस उस वक्त और रोचक हो गयी जब राजस्थान की गहलोत सरकार में डेयरी मंत्री बाबू लाल नागर भी इसमें शामिल हो गए। (जरुर पढ़ें- लोकार्पण करने वाले खुद पहुंच गए हवालात) राघव जी और आसाराम की तरह नागर को फिलहाल तक जेल तो नहीं जाना पड़ा है लेकिन मंत्री की कुर्सी से नागर को हाथ धोना पड़ा। नागर की देखा देखी राजस्थान के ही निम्बाहेड़ी से कांग्रेस विधायक उदयलाल आंजना भी इस दौड़ में शामिल हो गए। उम्मीद है इस रेस में शामिल नागर और आंजना की दौड़ भी हवालात में जाकर ही थमेगी।
ये रेस चल ही रही थी कि लखनऊ में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एनडी तिवारी की एक ख़बर देखकर लगा कि एनडी तिवारी को शायद अपनी जवानी याद आ गयी। कदम कदम बढ़ाए जा गीत के बोल के साथ कदम बढ़ाते एनडी तिवारी ने स्टेज पर कार्यक्रम का संचालन कर रही महिला को पकड़ लिया और करने लगे डांस। लंबे समय से ख़बरों से बाहर एऩडी तिवारी को शायद लगा होगा कि वे रेस में पिछड़ रहे हैं, तो क्यों न कुछ अलग किया जाए।
अब बिना सहारे के भले ही एनडी तिवारी अपनी जगह से हिल भी न पाते हों लेकिन डांस करने के लिए एनडी की ऊर्जा देखने लायक थी। उम्र की इस दहलीज पर बिना सहारे के कब तक थिरकते, ऐसे में सहारा तो चाहिए ही था, तो थाम लिया मंच पर मौजूद महिला का हाथ। वैसे भी ये एनडी तिवारी का पुराना स्टाईल है। लगे रहिए एनडी साहब, लगे रहिए, वैसे भी अभी उम्र(90 वर्ष) ही क्या है आपकी। ये गाना भी शायद आप जैसों के लिए ही बना है- अभी तो मैं जवान हूं, अभी तो मैं जवान हूं।
क्या राघव जी, क्या आसारम, क्या एनडी तिवारी...पैर कब्र में लटक रहे हैं लेकिन इनके कारनामे देखिए। देखने-सुनने वाले को शर्म आ जाएगी लेकिन इन्हें नहीं आती, दुनिया से छोड़िए पता नहीं ये लोग अपने घरवालों से कैसे नजरें मिलाते होंगे..?


deepaktiwari555@gmail.com

शनिवार, 21 सितंबर 2013

वाह महाराज वाह !

कम से कम अभी तक मैं तो यही सोचता था कि नेता भी आखिर इंसान होते हैं, वे एक इंसान का दर्द समझ सकते हैं। पूरी दुनिया का न सही लेकिन कम से कम अपने क्षेत्र की जनता का दर्द तो समझ ही सकते हैं जिसने उन्हें अपना जनप्रतिनिधि चुनकर संसद या विधानसभा में भेजा है। लेकिन इस गलतफहमी को एक बार फिर से एक नेता ने ही दूर कर दिया। वो भी एक ऐसे नेता ने जो नेतानगरी के साथ ही धर्म की नगरी में लोगों को सादगी पसंद जीवन जीने की सीख के साथ ही इंसानियत का पाठ पढ़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ता।
इन नेताजी को लोग सतपाल महाराज के नाम से जानते हैं। नेता जी राजनीति के साथ ही धर्म की नगरी में भी खूब मशहूर हैं। ये अपने भक्तों को ज्ञान बांटने का कोई मौका नहीं छोड़ते। लेकिन सादगी औऱ इंसानियत की बात करने वाले इन नेताजी के खुद के कारनाम अगर आप सुनेंगे तो शायद आपके पैरों तले जमीन खिसक जाएगी।
दरअसल 21 सितंबर को सतपाल महाराज ने हरिद्वार में शाही अंदाज में अपना जन्मदिन मनाया। इस आयोजन को भव्य बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से लेकर उनकी कैबिनेट के कई मंत्री तक इस भव्य आयोजन में न सिर्फ शरीक हुए बल्कि इन्होंने इस आयोजन का खूब लुत्फ उठाया।
मुझे सतपाल महाराज के जन्मदिन मनाने से कोई दिक्कत नहीं है लेकिन एक जनप्रतिनिधि को क्या ऐसे वक्त पर अपने जन्मदिन का शाही आयोजन करना चाहिए जब उनके क्षेत्र की जनता आपदा के दंश को झेल रही हो और दाने दाने को मोहताज हो..? लोगों को सादगी और इंसानियत का पाठ पढ़ाने वाले ऐसे व्यक्ति से खुद क्या ऐसे व्यवहार की उम्मीद की जा सकती है..?
जाहिर है एक जनप्रतिनिधि होने के नाते सांसद महोदय को अपने क्षेत्र की जनता के बीच होना चाहिए था और उनके कष्टों को कम करने की कोशिश करनी चाहिए थी लेकिन शाही आयोजनों के लिए मशहूर सतपाल महाराज के लिए अपना जन्मदिन मनाना शायद उनकी पहली प्राथमिकता रही होगी। आपदा प्रभावितों के बीच जाकर, पूरा दिन उनके साथ बिताकर अगर सतपाल महाराज अपना जन्मदिन मनाते, संकट के वक्त जरुरत की चीजें प्रभावितों को वितरित करते तो शायद पलभर के लिए ही सही उनके क्षेत्र की जनता के चेहरे पर खुशी की एक झलक तो आती लेकिन सतपाल महाराज के लिए शायद अपने क्षेत्र की जनता के कष्टों का कोई मूल्य नहीं है।
जब प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से लेकर उनके मंत्री तक एक के बाद एक शाही भोज का आयोजन कर आपदा प्रभावितों को मुंह चिड़ा रहे हों तो फिर पौड़ी सासंद सतपाल महाराज क्यों पीछे रहें..? उनके पास तो शाही आयोजन के सवाल पर कहने के लिए उनके जन्मदिन का बहाना भी है।
वैसे भी सांसद महोदय से और क्या उम्मीद की जा सकती है, क्योंकि ये तो इनका पुराना स्टाईल है। बीते साल भी आपदा के वक्त सतपाल महाराज ने न सिर्फ इसी तरह शाही अंदाज में अपना जन्मदिन मनाया था बल्कि उसके तुरंत बाद 23 अक्टूबर 2012 को अपने बेटे श्रद्धेय के विवाह (जरुर पढ़ें- शर्म करो महाराज !) में भी करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाकर शादी को शाही शादी बानाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।


deepaktiwari555@gmail.com

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

हिंदी शर्म नहीं गर्व की भाषा

बात ज्यादा दिन पुरानी नहीं है, जब मैं अपने मित्रों के साथ गुलाबी नगरी जयपुर के पास स्थित नाहरगढ़ किले के भ्रमण पर था। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र होने के कारण बड़ी संख्या में देशी पर्यटकों के साथ ही विदेशी पर्यटक भी भारत भ्रमण के दौरान जयपुर जरुर आना चाहते हैं। नाहरगढ़ में भी हमें बड़ी तादाद में देशी के साथ विदेशी पर्यटकों का जमावड़ा देखने को मिला।
युवा विदेशी पर्यटकों का एक समूह काफी खुश दिखाई दे रहा था। हमने उनसे उनके भारत भ्रमण और इस किले के बावत उनका अनुभव जानने के लिए उनसे अंग्रेजी में बात करने की कोशिश की तो मालूम चला की उनकी अंग्रेजी बहुत अच्छी नहीं है। वे कहने लगे कि उन्हें न तो यहां की भाषा बोलनी आती है और न ही वे अंग्रेजी ठीक से बोल पाते हैं। बातों बातों में इतना पता चला कि वे पर्यटकों का ये समूह बेल्जियम से आया था। बेल्जियम में बोले जाने वाली भाषा डच, फ्रेंच और जर्मन भाष में अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल कर रहे थे। जाहिर है वे या तो अंग्रेजी में बात नहीं करना चाहते थे या फिर अपने देश की भाषा बोलने में ही वे गर्व महसूस कर रहे थे।
ये अनुभव मैं सिर्फ इसलिए साझा कर रहा हूं क्योंकि हमारे देश में जहां की मातृभाषा हिंदी है, बड़ी संख्या में लोग उसे बोलने में, लिखने में गर्व की बजाए शर्म महसूस करते हैं। जबकि दूसरे देशों में वहां के लोग शायद अंग्रेजी से ज्यादा अपनी भाषा को ज्यादा महत्व देते हैं और वे दुनिया के किसी भी कोने में हों अपनी भाषा बोलने में गर्व महसूस करते हैं, जबकि हम हिंदुस्तानियों के साथ इसका एकदम उल्ट है। वे खुलकर ये कहने में शर्म महसूस नहीं करते कि उन्हें अंग्रेजी भाषा नहीं आती लेकिन हमारे देश में हमें अंग्रेजी न आने के सवाल पर लोग शर्म महसूस करते हैं और अंग्रेजी बोलनी आती है कहने पर गर्व महसूस करते हैं, चाहे हमें ढंग से अंग्रेजी बोलनी भी न आती हो।
हम शायद ये सोचते हैं कि हिंदी अब सिर्फ गरीबों और अनपढ़ों की ही भाषा है जबकि अंग्रेजी बोलने से हम बड़े बन जाएंगे, हमारा मान बढ़ जाएगा, लोग हमें सम्मान की नजरों से देखेंगे जबकि अगर हम हिंदी में बात करेंगे तो लोग हमें हीन दृष्टि से देखेंगे, लोग हमारा मजाक बनाएंगे। जहां जरुरत हो वहां पर अंग्रेजी पर बात करना तो समझ में आता है लेकिन जहां आमने – सामने वाले दोनों लोग हिंदी समझते हों, वहां पर भी क्या अंग्रेजी में बात करने की जरुरत है..? ठीक है मत बात करिए हिंदी में लेकिन जरुरत पड़ने पर हिंदी में बोलने पर कम से कम शर्म की बजाए गर्व तो मसहूस कीजिए और ये कहने में मत हिचकिचाहट महसूस कीजिए की हिंदी हमारी मातृभाषा है।
वास्तव में हमें हिंदी को उसका सम्मान वापस दिलाना है तो इसकी शुरुआत हमें ही करनी होगी, कोई आपसे ये नहीं कहेगा कि आप हिंदी में ही बात करो, हिंदी में ही अपने सारे काम करो, बस फर्क सिर्फ सोच का है कि आप अपनी मातृभाषा के लिए क्या सोचते हैं..? क्या आप वास्तव में अपनी मातृभाषा का सम्मान करते हैं..? इसका जवाब आप ही के पास है, जिस दिन आपने इसका जवाब खोज लिया यकीन मानिए हिंदी अपना सम्मान, अपनी जगह खुद खोज लेगी और उसे अपने सम्मान के लिए फिर किसी विदेशी भाषा का मोहताज नहीं होना पड़ेगा।


deepaktiwari555@gmail.com

गुरुवार, 19 सितंबर 2013

किसके दरबार में बहुगुणा ?

अपनी कुर्सी बचाने की जुगत में लगे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा कोशिश तो लाख कर रहे हैं कि कैसे भी उनकी बच जाए लेकिन इसे उनकी राजनीतिक समझ की कमी कहें या फिर कुछ और लाख जतन के बाद भी विवादों से अपना पीछा नहीं छुड़ा पा रहे हैं। बहुगुणा का हर एक फैसला उनकी मुश्किलें कम करने की बजाए बढ़ाता ही जा रहा है।
आपदा के 86 दिन बाद केदारनाथ में पूजा के बहाने आपदा प्रबंधन में सरकार की नाकामी और राहत कार्यों में ढिलाई के दागों को धोने की कोशिश में लगे बहुगुणा पर सवाल पूजा के फैसले को लेकर ही उठने लगे थे। केदारनाथ के मुख्य रावल भीमा शंकर लिंगम से लेकर उनकी अपनी ही पार्टी के सांसद सतपाल महाराज ने तक पूजा की तारीख को लेकर बहुगुणा पर सवाल खड़े करने में देर नहीं की। मुख्य रावल ने पूजा का तारीख उनकी राय से तय न किए जाने की आरोप लगाया तो सतपाल महाराज ने भी पूजा की टाईमिंग को लेकर सरकार के प्रति खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर की।
11 सितंबर को पूजा हो भी गयी लेकिन मुख्यमंत्री बहुगुणा दिल्ली परिक्रमा के चक्कर में खुद केदारनाथ नहीं पहुंच पाए। हालांकि मुख्यमंत्री के पास इसके लिए एक बार फिर से खराब मौसम का बहाना था लेकिन असल में पूजा की तारीख से तीन दिन पहले बहुगुणा दिल्ली दरबार की परिक्रमा में व्यस्त थे।
दरअसल मुख्यमंत्री की कोशिश थी कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनाया गांधी व राहुल गांधी 11 सितंबर को पूजा के वक्त केदारनाथ पहुंचे ताकि वे आलाकमान को ये भरोसा दिला सकें कि आपदा के दंश को झेल रहे उत्तराखंड में हालात सामान्य हो रहे हैं और उनकी डगमगाती कुर्सी बच जाए, लेकिन बहुगुणा की ये कोशिश भी नाकाम साबित हुई। सोनिया और राहुल तो केदारनाथ पहुंचे नहीं, खुद मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा भी दिल्ली दरबार की पूजा के चलते केदारनाथ पूजा में नहीं पहुंच पाए।
मुख्यमंत्री का हवा में केदारनाथ पहुंचने का कार्यक्रम था लेकिन मौसम दगा दे गया और बहगुणा देहरादून में ही रह गए। जबकि भाजपा नेता और सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक पैदल मार्ग से केदारनाथ पहुंच गए। जाहिर है बहुगुणा अगर चाहते तो वे भी सड़क मार्ग से केदारनाथ पहुंच सकते लेकिन बहुगुणा ने ये जहमत नहीं उठाई क्योंकि वे तो दिल्ली दरबार की परिक्रमा में व्यस्त थे।
सड़क मार्ग से बहुगुणा जाते तो शायद उन्हें एहसास होता कि वास्तव में आपदा प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोग एक एक पल कैसे गुजार रहे हैं, कैसे वे आज भी वे हर पल मौत के साए में जिंदगी बसर करने पर मजबूर हैं लेकिन अफसोस बहुगुणा को शायद आपदा प्रभावितों के दर्द को समझने की बजाए चिंता इस बात की ज्यादा थी कि कैसे अपनी कुर्सी बचायी जाए।
आसमान से तो वैसे भी सिर्फ बहती नदियां और हरे भरे पहाड़ ही दिखाई देते हैं, जिंदगी और मौत से जंग लड़ रहे आपदा प्रभावितो का दर्द नहीं। इस दर्द को समझने के लिए उनके बीच जाना होगा, उनके साथ कुछ वक्त गुजारना होगा लेकिन सरकार के मुखिया के पास राहुल गांधई को खुश करने के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी में एनएसयूआई के प्रत्याशियों के लिए प्रचार कर वोट मांगने का तो वक्त है लेकिन आपदा से जूझ रही अपनी प्रजा का हाल जानने का वक्त नहीं। आपदा के बाद से ही उडनखटोलों से तो मुख्यमंत्री और उनके नुमाइंदों ने आपदा प्रभावित क्षेत्रों के दौरे के नाम पर खूब हवाई सैर की लेकिन जमीन पर उतरकर आपदा प्रभावितों का दर्द समझने की हिम्मत ये लोग नहीं जुटा सके।    
बहरहाल केदारनाथ में जैसे तैसे पूजा जरुर शुरु हो गयी है लेकिन जमीनी हकीकत ये है कि पीड़ितों की मदद के नाम पर देशभर से भरपूर फंड जुटाने के बाद भी सरकार आपदा पीडितों के जख्मों को भरने में नाकाम साबित हुई है। मुख्यमंत्री पूजा के बहाने हालात सामान्य होने का दिखावा भले ही करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन आपदा प्रभावित क्षेत्रों में हालात आज भी बद से बदतर हैं। सरकारी अमला राहत एवं बचाव कार्य में कितनी संजीगदी से लगा था इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आपदा के करीब तीन माह बाद भी उत्तराखंड की पहाड़ियां नर कंकाल उगल रही है तो कई क्षेत्रों में जैसे तैसे अपनी जान बचाने में कामयाब रहे लोग आज भी राहत एवं पुनर्वास की बाट जोह रहे हैं।



शनिवार, 14 सितंबर 2013

हिंदी है हम वतन से, हिंदोस्तां हमारा

हिंदी हैं हम वतन से लेकिन हम हिंदी बोलेंगे नहीं, हमें अंग्रेजी में ही बात करनी है क्योंकि अंग्रेजी बोलना हमें स्टेटस सिंबललगता है। हम कोशिश करते हैं कि हम कहीं जाएं तो हम हिंदी की जगह अंग्रेजी में ही बात करें। जहां जरुरत नहीं है, हम वहां पर भी हिंदी में ही बात करने की कोशिश करते हैं। सवाल ये है कि क्या इसकी वाकई में जरुरत है..? जहां जरुरी है, वहां तक तो अंग्रेजी ठीक है लेकिन क्या हम हिंदी को उसका सम्मान वापस दिलवाने के लिए अपनी तरफ से पहल नहीं कर सकते..? क्या हम जहां जरुरी न हो वहां अंग्रेजी की जगह हिंदी का इस्तेमाल नहीं कर सकते..
हमारी सरकार हिंदी भाषा को बढ़ावा देने की बात करती है। हर वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। इस मौके पर सरकारी विभागों में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए हिंदी पखवारे का आयोजन किया जाता है। लोगों से हिंदी में अपना काम करने की अपील की जाती है लेकिन अक्सर देखने को मिलता है कि इस सब के लिए सरकारी विभागों से जो आदेश जारी होते हैं, वो अंग्रेजी में जारी होते हैं। बात हिंदी की होती है लेकिन भाषा अंग्रेजी इस्तेमाल की जाती है।
अब ऐसे में इन हिंदी पखवारे को मनाने का क्या औचित्य है..? ये कम से कम मेरी समझ से तो बाहर है। सबसे अहम चीज कि क्या सिर्फ हिंदी पखवारे से ही हम हिंदी को उसका वो सम्मान लौटा सकते हैं, जो उसे वास्तव में मिलना चाहिए..? जाहिर है सिर्फ वर्ष में एक दिन हिंदी दिवस मनाने और हिंदी पखवारे के आयोजन मात्र से ही अंग्रेजी के सामने हम हिंदी को खड़ा नहीं कर सकते। जाहिर है इस तरह के आयोजन सिर्फ एक औपचारिकता मात्र होते हैं और पूरे साल इस पर कोई बात नहीं होती। 
इसका मतलब ये नहीं है कि अंग्रेजी को पूर्णतया तिलांजलि दे दी जाए, बदलते वक्त के साथ अंग्रेजी की अपनी अलग अहमियत है लेकिन इसका ध्यान तो रखा जा सकता है कि हिंदी खुद को उपेक्षित महसूस न करे।
हम ये सोचें कि इसकी जिम्मेदारी भी हमें सरकार पर छोड़ देनी चाहिए तो वास्तव में ये हमारी बड़ी भूल होगी क्योंकि इसकी शुरुआत हम लोगों से ही होती है। हम अगर ठान लें कि हम जहां अंग्रेजी के बिना आपका काम नहीं चल सकता उस जगह को छोड़कर सिर्फ हिंदी में ही बात करेंगे, अपना ज्यादा से ज्यादा काम हिंदी में ही करने की कोशिश करेंगे तो निश्चित तौर पर हम हिंदी को उसका सम्मान वापस दिला सकते हैं। ये शायद हिंदी दिवस पर आयोजित होने वाले हिंदी पखवारे से ज्यादा प्रभावी होगा और हम गर्व से कह सकेंगे की हिंदी है हम वतन से, हिंदोस्तां हमारा...सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा। आप सभी को हिंदी दिवस की शुभकामनाएं। 


deepaktiwari555@gmail.com

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

काली होगी बहुगुणा की दीपावली !

दीपों के त्यौहार दीपावली की तैयारियां शुरु हो गयी हैं, घर की सफाई की जा रही है और रंगाई पुताई कर घर को नया रुप रंग दिया जा रहा है। हो भी क्यों न, दीपों का ये त्यौहार सिर्फ अंधेरे को ही दूर नहीं भगाता बल्कि जीवन में भी नयी उमंग भर देता। दीपावली के भी कई रुप हैं, जितने बड़े कद के लोग, उनकी उतनी ही बड़ी दीपावली भी होती है, लेकिन बड़े पद के साथ ही बड़ी कद काठी वाले उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के लिए इस बार की दीपावली रोशनी की बजाए अमावस की काली रात में तब्दील होती दिखाई दे रही है। मतलब साफ है कि इस दीपावली से पहले उत्तराखंड में कांग्रेस आलाकमान ने भी सफाई की तैयारी शुरु कर दी है।
दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय के विश्वसनीय सूत्रों के हवाले से आ रही ख़बरों पर अगर यकीन किया जाए तो अक्टूबर माह की विदाई की बेला उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की कुर्सी से विजय बहुगुणा को विदा करती दिखाई दे रही है। हालांकि इस बात की चर्चाएं देहरादून में तो काफी पहले से ही गर्म हैं, लेकिन अब दिल्ली में भी इसकी गूंज सुनाई देने लगी है औऱ इसके सूत्रधार बने हैं, मुख्यमंत्री की कुर्सी की महत्वकांक्षा मन में लिए कांग्रेस में एक ही छत के नीचे रहने वाले कुछ कांग्रेसी, जिन्हें बहुगुणा इस कुर्सी पर फूटी आंख नहीं सुहाते।    
वैसे भी मुख्यमंत्री बनने के बाद अपने फैसलों को लेकर विवादों में रहने वाले विजय बहुगुणा की कुर्सी उस वक्त से कुछ ज्यादा ही डगमगाने लगी है, जब देवभूमि उत्तराखंड ने अपने सीने में उत्तराखंड के इतिहास की अब तक की सबसे भीषणतम त्रासदी को झेला था। आपदा के वक्त दिल्ली दरबार में हाजिरी लगाने और राहत एवं बचाव कार्य की धीमी गति और लचर प्रबंधन ने उत्तराखंड में बहुगुणा पर आती दिखाई दे रही राजनीतिक आपदा में अहम रोल अदा किया। रही सही कसर पूरी कर दी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नजरें गढ़ाए बैठे कांग्रेस के कद्दावर नेताओं ने। ये सब दरअसल इस पूरी पटकथा का एक अहम हिस्सा था जो दीपावली से ठीक पहले अक्टूबर की विदाई के साथ साकार होता दिखाई दे रहा है।
आलाकमान को हर तरह से साधने में माहिर विजय बहुगुणा को उनके ऊपर आने वाली इस राजनीतिक आपदा का पूरी तरह आभास भी है कि उनकी कुर्सी कभी भी भरभरा कर गिर सकती है, और इसीलिए बहुगुणा ने जैसे तैसे जोड़ तोड़ कर मिली इस कुर्सी को बचाने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। फिर चाहे वो दिल्ली दरबार में हाजिरी लगाकर उनको खुश करने का कोई मौका न छोड़ने की बात हो या फिर करोड़ों रुपए खर्च कर मीडिया मैनेजमेंट के जरिए अपनी धूमिल छवि पर पर्दा डालने की बात।
बहुगुणा हर जुगत अपना रहे है कि कैसे भी जैसे तैसे जुगत कर मिली इस कुर्सी को बचा लिया जाए लेकिन बहुगुणा की नाकामियों की फेरहिस्त के साथ ही अपनी ही पार्टी में उनके विरोधियों की फेरहिस्त इतनी छोटी भी नहीं कि कांग्रेस आलाकमान उसे लंबे वक्त तक नजरअंदाज कर सके। लिहाजा अक्टूबर माह के आखिरी में उत्तराखंड कांग्रेस में बड़ी उठापठक देखने को मिल सकती है।
अगर ऐसे होता है तो जाहिर है ये उत्तराखंड में मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा के लिए बड़ा मुद्दा बन सकता है और भाजपा इसे 2014 में जनता के बीच भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी लेकिन कांग्रेस के पास उत्तराखंड में दूसरा कोई चारा भी नहीं है क्योंकि बहुगुणा खुद को साबित करने में विफल ही रहे हैं फिर चाहे वो आपदा के बाद उनका लचर प्रबंधन हो या फिर बहुगुणा सरकार के दूसरे फैसले।
जाहिर है विजय बहुगुणा की दीपावली अगर काली होती है तो बहुगुणा के मंत्रियों के घरों में भी दीपों की चमक फीकी पड़ेगी और इसके उल्ट कुछ लोगों के घरों में रोशनी के साथ ही आतिशबाजी की गूंज कुछ ज्यादा ही सुनाई देगी। अंदरखाने इसकी तैयारी तो दिल्ली से लेकर देहरादून तक कई कांग्रेसी दिग्गज कर रहे हैं लेकिन आलाकमान का आशीर्वाद किसे मिलेगा इसको लेकर सस्पेंस बरकरार है।
हालांकि 2002 और 2012 में उत्तराखंड में मुख्यमंत्री की कुर्सी के सबसे दमदार दावेदार रहे हरीश रावत को बहुगुणा की जगह उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी जा सकती है, लेकिन उत्तराखंड में मुख्यमंत्री की कुर्सी का ख्वाब संजोए बैठी कांग्रेस की ही कद्दावर नेता इंदिरा हृद्येश व हरक सिंह रावत जैसे घाघ कांग्रेसी एक बार फिर से हरीश रावत की राह में रोड़ा बन सकते हैं।
बहरहाल उत्तराखंड में कुर्सी बचाने और कुर्सी हासिल करने की कवायद तेज हो चुकी है। निराशा और हताशा के साथ ही उम्मीद के बादल भी कांग्रेसियों के घरों पर मंडराने लगे हैं। किसके घर पर निराशा और हताशा के बादल बरसेंगे और किसके घर पर उम्मीद के बादल बरसेंगे ये तो वक्त ही तय करेगा। लेकिन अगर इस बार दीपावली से पहले ही उत्तराखंड में कई कांग्रेसियों के घरों में रोशनी और जोरदार आतिशबाजी के साथ ही ढोल नगाड़ों की आवाज सुनाई दे तो समझ लिजिएगा कि कुछ लोगों की दीपावली तो काली हो ही गयी है।


deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 11 सितंबर 2013

नर कंकालों का सियासी सच !

सरकारी विज्ञापनों के जरिए करोड़ों रुपए खर्च कर उत्तराखंड सरकार भले ही उत्तराखंड में आई भीषण त्रासदी पर अपने गुड वर्क का प्रचार प्रसार कर खुद अपनी पीठ थपथपा रही हो लेकिन इस त्रासदी के करीब ढाई महीने बाद अब केदारनाथ घाटी में मिल रहे कंकाल चीख चीख कर कह रहे हैं कि हमारी मौत की जिम्मेदार उत्तराखंड सरकार है।
चार दिनों में केदारनाथ, रामबाड़ा, त्रियुगी नारायण और भीमबलि की पहाड़ियों में मिले करीब 170 से ज्यादा कंकाल बयां कर रहे हैं कि कैसे वक्त पर मदद न मिल पाने के कारण भूख और प्यास से तड़प तड़प कर उन्होंने दम तोड़ दिया। आपदा के बाद सरकार अपनी पीठ थपथपाती रही कि हमने दुनिया के सबसे बड़े रेस्कयू ऑपरेशन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है लेकिन आपदा के दौरान अपनी जान बचाने के लिए निर्जन पहाड़ियों की ओर भागे लोग सरकारी मदद का इंतजार करते रहे। उन्हें आस थी कि जमीन के रास्ते न सही लेकिन आसमान के रास्ते फरिश्ते के रुप में उनकी मदद के लिए कोई न कोई जरुर आएगा और उन्हें यहां से सुरक्षित निकाल ले जाएगा। उनका ये इंतजार उनकी सांसे थमने के साथ ही समाप्त हो गया लेकिन उन्हें बचाने के लिए कोई नहीं आया।  
पहाड़ियों में मिल रहे कंकाल सरकारी लापरवाही की दास्तां बयां करने लगे तो बेशर्मों की तरह सरकार ने इसका ठीकरा खराब मौसम के सिर फोड़ दिया। राज्य के मुख्य सचिव सुभाष कुमार कहते हैं कि हमने सभी लोगों को बचाने की पूरी कोशिश की थी लेकिन मौसम अनुकूल न होने की वजह से हम सब लोगों को नहीं बचा पाए। सरकार को आपदा प्रभावित क्षेत्रों को मानव रहित घोषित करने की जल्दी क्यों थी इसका जवाब सरकार के किसी नुमाइंदे पास नहीं है।
आपदा के बाद सरकार ने अगर तत्परता से आपदा प्रभावित क्षेत्रों की पहाडियों में रेस्कयू ऑपरेशन शुरु किया होता तो शायद आज ये पहाड़ियां कंकाल नहीं उगल रही होती लेकिन सरकार ने दुर्गम क्षेत्रों में लोगों को खोजने के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठाए, नतीजा कंकालों के मिलने के साथ ही आपदा में मौत का आंकड़ा लगातार बढ़ता ही जा रहा है।
आपदा के बाद से ही सरकार पर निशाना साधने वाली भाजपा ने सरकार को असंवेदहीन करार देते हुए सैंकड़ों लोगों की मौत के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट कहते हैं कि हमने सरकार को पहले ही अगाह किया था कि केदारनाथ और रामबाड़ा की पहाडियों पर हजारों लोग फंसे हो सकते हैं लेकिन सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया।  

बहरहाल केदारनाथ, रामबाड़ा के साथ ही गोमकरा और दूंजागिरी क्षेत्रों में डीआईजी जी एस मर्तोलिया के नेतृत्व में पुलिस टीम का सर्चिंग अभियान जारी है, जो दिन बीतने के साथ ही इन क्षेत्रों से और कंकालों की बरामदगी के साथ आपदा में मौत का आंकड़ा और बढ़ने की ओर ईशारा कर रहा है और आज भी अपनों के घर लौट आने की आस लगाए बैठे लोगों की उम्मीद तोड़ने के लिए काफी है।  

deepaktiwari555@gmail.com

सोमवार, 9 सितंबर 2013

सांप्रदायिक दंगे और अखिलेश की टोपी !

लोग मर रहे हैं, लेकिन इन्हें वोट की चिंता है। इन्हें चिंता है कि कैसे एक खास वर्ग के वोटबैंक को अपनी ओर खींचा जाए। उनके जख्मों पर मरहम लगाने के नाम पर कैसे उनके वोट हासिल किए जाएं। आखिर सवाल सत्ता का है तो फिर क्यों न राजनीतिक दल वोटबैंक की राजनीति करें..?
वोटों की खातिर आम आदमी की चिता पर अपने हाथ सेंकने वाले नेता भले ही इससे इंकार करें लेकिन ये राजनीति नहीं तो और क्या है..? एक के बाद एक लोग मारे गए लेकिन शासन प्रशासन के कानों में जूं तक नहीं रेंगी..! जब 31 लोगों की मौत हो गयी तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव मीडिया के सामने आकर इसका ठीकरा विपक्ष के सिर फोड़ने लगे..! ये छोड़िए अखिलेश यादव जब मीडिया से बात करने सामने आए तो गोल टोपी पहनकर सामने आए। न तो ये ईद का मौका था न ही कोई खास आयोजन लेकिन फिर भी अखिलेश के सिर पर गोल टोपी थी।
आखिलेश जी आखिर क्या जरुरत पड़ गयी इस टोपी को पहनकर मीडिया के सामने आने की..? जाहिर है टोपी के माध्यम से खास वर्ग के लोगों को संदेश देने की कोशिश थी कि हमें आपकी चिंता है और 2014 के आम चुनाव में आप हमें ही वोट देना..!
जरुरत तो थी कि आप सभी वर्गों के लोगों को भरोसा दिलाते कि सरकार उनकी सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और ऐसी घटनाएं प्रदेश में नहीं होंगी, लेकिन आपकी सरकार ने तो हालात बिगड़ने का आशंका होने के बाद भी कोई कदम नहीं उठाया और नतीजा एक पत्रकार समेत 31 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। लोगों में भय है, अपनों को खोने का गम है, लेकिन आपको गोल टोपी पहनने की सूझ रही है..! (जरुर पढ़ें- छलनी भी बोले जिसमें 72 छेद..!)
अखिलेश जी आपके अब तक के कार्यकाल में करीब 30 सांप्रदायिक दंगे बयां करने के लिए काफी हैं कि आपके राज में आमजन कितना सुरक्षित है..? सरकार आपकी है और आप इसका ठीकरा विपक्ष के सिर फोड़ रहे हैं..! जब लोगों की हत्या की जा रही थी तो कहां थे आप..? कहां थी आपकी पुलिस..?
दूध का धुला तो कोई भी नहीं है, फिर चाहे वो भाजपा हो, कांग्रेस हो या फिर बहुजन समाज पार्टी या दूसरे राजनीतिक दल लेकिन दूसरों के सिर ठीकरा फोड़ कर आप अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते..! वाकई में आपको आम लोगों की इतनी फिक्र होती जितना की आप जता रहे हैं तो आपके राज में अब तक 30 के करीब सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए होते..! (जरुर पढ़ें- अखिलेश ने बदल दी यूपी की तस्वीर..!)


deepaktiwari555@gmail.com

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

मनमोहन सिंह से बेहतर पीएम और कहां ?

15 अगस्त के बाद लगा था कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सुनने का मौका अब 26 जनवरी को ही मिलेगा लेकिन संसद में कोयला घोटाले पर आखिर प्रधानमंत्री को सुनने का मौका मिल ही गया। कोयला घोटाले से जुड़े दस्तावेज गायब हो गए हैं, ऐसे में सवाल उठने लाजिमी थे। देर से ही सही मनमोहन सिंह ने इस पर आखिर अपनी चुप्पी तोड़ी लेकिन जो प्रधानमंत्री ने बोला उसके बाद लगा कि अगर मनमोहन सिंह बिना कुछ बोले ही विदेश यात्रा पर निकल जाते तो ज्यादा अच्छा था..!
कोयला घोटाले से जुड़ी अहम फाइलों के गायब होने पर प्रधानमंत्री का संसद में जवाब था कि सरकार के पास छिपाने के लिए कुछ भी नहीं है। वैसे देखा जाए तो प्रधानमंत्री ने क्या गलत कहा..? (पढ़ें- अब मेरे राजदां और भी हैं..!)
सरकार के पास छिपाने के लिए है क्या..? जो था वो देश के सामने आ ही गया है। कोयला घोटाला, कॉमनवेल्थ खेल घोटाला, टूजी स्पैक्ट्रम घोटाला और न जाने कौन कौन से घोटाले, सभी तो देश के सामने आ ही गए हैं, जो नहीं आए हैं वो धीरे धीरे सबके सामने आ ही रहे हैं, अब और प्रधानमंत्री क्या छिपाएंगे..?
एक रुपया ही है, लेकिन वो भी डॉलर के आगे घुटने टेक रहा है। पेट्रोल और डीजल है, दोनों सेंचुरी जड़ने की ओर बढ़ रहे हैं..! रोजमर्रा की चीजों के दाम आसमान में पहुंच गए हैं...वाकई में है ही क्या सरकार के पास छिपाने के लिए..? हम बेवजह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कोस रहे हैं, आखिर सब कुछ तो सरकार ने जनता को दिखा दिया, सोने का भंडार तक विदेशियों के लिए खोलने की तैयारी कर ली है और हम कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री को देश की चिंता नहीं है। (जरुर पढ़ें- काश, मनमोहन सिंह वास्तव में पीएम होते..!)
प्रधानमंत्री ये भी कह रहे हैं कि कोयला घोटाले की जांच में सरकार सीबीआई को पूरा सहयोग कर रही है। यहां भी कौन सा प्रधानमंत्री ने झूठ बोला..? ठीक ही तो कहा सरकार सीबीआई को ये बताकर पूरा सहयोग कर रही है कि जांच में किसे क्लीन चिट देनी है और किसे नहीं..? अब प्रधानमंत्री ने यही सच तो बोला उस पर भी हो हल्ला मचा है..! आखिर 80 साल की उम्र में देश चला रहे किसी व्यक्ति पर ऐसे आरोप लगाना ठीक नहीं है। वो भी ऐसे व्यक्ति पर जो फैसले लेने के लिए दूसरों पर निर्भर हो, जो बिना पूछे कोई कार्य न करता हो, जो स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस के अलावा कभी कभार ही अपनी जुबान खोलता हो और कुछ बोले भी तो सामने वाले से बिना झिझक पूछ लेने की हिम्मत रखता है कि ठीक है। अरे भई इससे अच्छा प्रधानमंत्री देश को भला कहां मिल सकता है।

deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 28 अगस्त 2013

ये भूख है बड़ी..!

2014 को ध्यान में रखते हुए चार महत्वपूर्ण राज्यों दिल्ली, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस अध्यक्ष और यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने देश के गरीबों का पेट भरने का इंतजाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और लोकसभा में खाद्य सुरक्षा विधेयक ध्वनिमत से पारित हो गया..!
विपक्ष ने भी संशोधन के जरिए जरुर इसमें अपनी भूमिका बनाने की कोशिश की लेकिन वास्तव में विपक्ष चाहकर भी इसका विरोध नहीं कर सकता था लिहाजा ये जानते हुए भी कि ये खाद्य सुरक्षा विधेयक नहीं बल्कि वोट सुरक्षा विधेयक भाजपा सहित तमाम विपक्षी दलों ने इस बिल के रास्ते में अड़चन लगाने के अपने इरादे छोड़ दिए..! हालांकि बिल की टाइमिंग को लेकर भाजपा के मुरली मनोहर जोशी से लेकर सपा के मुलायम सिंह यादव ने जरुर बहस के दौरान अपनी दिल की भड़ास बाहर निकाली..!
खाद्य सुरक्षा विधेयक की अगर बात करें तो इससे देश की 67 फीसदी आबादी को हर महीने 5 किलो अनाज प्रति व्यक्ति के हिसाब से बाजार से कम मूल्य पर दिया जाएगा। चावल 3 रुपये प्रति किलो के हिसाब से तो गेंहू 2 रुपये प्रति किलो के हिसाब से जबकि बाकी अनाजों को 1 रुपये प्रति किलो के आधार पर देश की 75 फीसदी ग्रामीण आबादी और 50 फीसदी शहरी आबादी को दिया जाएगा..!
बहुत अच्छी बात है कि कम से कम कोई गरीब परिवार जैसा सरकार सोच रही है कि भूखा नहीं सोएगा और उस खाने के अधिकार के जरिए सरकारी राशन की दुकान से उसके हिस्से का अन्न मिलेगा लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि जिस नीयत से खाने का अधिकार बिल लाया गया है, क्या वास्तव में क्रियान्वयन तक ये नीयत कायम रह पाएगी..!
देश की 67 फीसदी आबादी यानि की करीब 80 करोड़ लोगों का पेट भरने के लिए अनाज की मांग 5.5 करोड़ मिट्रिक टन से बढ़कर 6.1 मिट्रिक टन हो जाएगी। साथ ही फूड सब्सिडी लागू होने पर सरकार के खजाने पर अतिरिक्त बोझ करीब 20,000 करोड़ रुपये होगा। इसके लिए करीब 6.123 करोड़ टन फूडग्रेन्स की जरूरत होगी और फूड सब्सिडी बिल पर कुल फूड सब्सिडी कवर करीब 1.3 लाख करोड़ रुपये होगा।
क्या दम तोड़ती अर्थव्यवस्था के बीच सरकार इस योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए फंड जुटाने के साथ ही संसाधनों का इंतजाम कर पाएगी..?
क्या 80 करोड़ लोगों का पेट भरने के लिए दिल्ली से जो पैसा चलकर राज्यों में जाएगा और फिर पूरे सिस्टम के जरिए गरीबों तक अन्न पहुंचेगा वह क्या उतनी ही मात्रा में पहुंचेगा और उसकी गुणवत्ता पर कोई बदलाव नहीं आएगा..?
क्या गारंटी है कि दूसरी सरकारी योजनाओं की तरह ये योजना भी भ्रष्टाचार की भेंट नहीं चढ़ेगी..? क्या वास्तव में गरीबों को उनका हक मिल पाएगा और उनके हिस्से का खाद्यान्न पीछे के दरवाजे से निजी गोदामों में नहीं जाएगा..?
ऐसे तमाम सवाल हैं जो खाने के अधिकार के सही क्रियान्वयन को लेकर लगातार जेहन में उठ रहे हैं..! ये सवाल उठने इसलिए भी लाजिमी है क्योंकि इससे पहले भी ऐसी तमाम सरकारी योजनाएं हैं, जो शुरु तो की गयी थी आमजन के लिए लेकिन वास्तविक हकदारों को उन योजनाओं का लाभ कभी मिल ही नहीं पाया..! सबसे बड़ा और सबक लेने वाला उदाहरण भी यूपीए सरकार की एक औऱ महत्वकांक्षी योजना मनरेगाही है, जिसके बूते यूपीए ने सत्ता सुख तो भोगा लेकिन इस योजना ने भ्रष्टाचार के निए नए रिकार्ड खड़े किए..!
121 करोड़ की आबादी वाले जिस देश में भूखों की तादाद ही करीब 45 करोड़ से अधिक हो, भूख से हर रोज हजारों लोग दम तोड़ते हों उस देश को शायद ऐसे किसी योजना की सबसे ज्यादा जरुरत है लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या ये विधेयक भूखे सोने वाले के भूख के डर को कभी पूरी तरह मिटा पाएगा..?
वहीं खाद्य सुरक्षा विधेयक आगामी चुनाव में कांग्रेस के लिए वोट सुरक्षा विधेयक बन पाएगा या नहीं ये तो चुनाव नतीजों के बाद ही तय होगा लेकिन भारत जैसे देश में जिसकी नसों में भ्रष्टाचार का कीड़ा पूरी रफ्तार से दौड रहा है वहां पर ये विधेयक भ्रष्टाचारियों के लिए एक सोने का अंडा देने वाली मुर्गी की तरह दिखाई दे रहा है..!
हालात तो यही बयां कर रहे हैं कि 80 करोड़ लोगों का पेट भरे न भरे लेकिन ये योजना भ्रष्टाचारियों की जेबें जरुर भर देगी..! 80 करोड़ लोगों को खाद्य सुरक्षा मिले या न मिले लेकिन भ्रष्टाचार करने वालों को अपने भविष्य के लिए कालेधन की सुरक्षा जरुर मिलेगी..!
उम्मीद तो यही करते हैं कि ऐसा न हो और 80 करोड़ क्या भारत के एक भी नागरिक को कभी भूखे पेट न सोना पड़े और सोनिया गांधी ने जो प्रतिबद्धता इस बिल को लेकर दिखाई है और जो वादा देश की जनता से किया है वो पूरा हो और भविष्य में कभी किसी सर्वे में ये न कहा जाए कि विश्व के 95 करोड़ भूखों में से लोगों में से 45 करोड़ भारत में हैं..!


deepaktiwari555@gmail.com

सोमवार, 26 अगस्त 2013

जनता अपना फैसला कब सुनाएगी..?



वो बातें बड़ी बड़ी करते हैं...खुद को देश का सच्चा हितैषी बताते हैंभारत और भारतवासियों के विकास की बातें करते हैं, दम तोड़ती अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की बातें करते हैं..! बेरोजगारी दूर करने के साथ ही महंगाई से निजात दिलाने का वादा करते हैं..! विदेशी बैंकों में जमा कालेधन को भारत में वापस लाने की बात करते हैं, भ्रष्टाचार और अपराध को खत्म करने का भी वादा करते हैं..! धूर्त पड़ोसियों पाकिस्तान और चीन को सबक सिखाने का भी दम भरते हैं..!
इस सब के नाम पर देश की जनता से सत्ता की चाबी सौंपने की अपील करते हैं लेकिन...लेकिन अफसोस जब बारी आती है इस कसौटी पर खुद को साबित करने की तो ये भी उसी जमात में शामिल हो जाते हैं जिनके हाथ से सत्ता खुद को सौंपने की ये जनता से अपील कर रहे होते हैं..!
जाहिर है सभी एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं जो खुद को एक दूसरे से अलग दिखाने के सिर्फ ढोंग ही करते हैं..! कहावत भी है कि चोर-चोर मौसेरे भाई, बात बात पर कुर्सी – मेज तोड़ने वाले ये लोग अपने व्यक्तिगत हितों के लिए सामूहिक रुप से हुंकार भरते हुए संसद में मेज थपथपाने में देर नहीं करते क्योंकि ये इनकी कौम का जो मामला है..!
खुद की जान पर बन आई तो राजनीतिक दलों ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को पलटने में जरा भी देर नहीं की जिसने दागी नेताओं के राजनीतिक भविष्य पर पूर्ण विराम तो नहीं लेकिन विराम लगाने का रास्ता जरुर खोल दिया था..! अपने राजनीतिक भविष्य पर संकट के बादल मंडराते देख आपस में लड़ने वाले सभी दल एक हो गए औऱ जन प्रतिनिधित्व कानून में संशोधन संबंधी प्रस्ताव पर सर्वदलीय बैठक में सभी दलों की सहमति के बाद केन्द्रीय कैबिनेट ने भी इस पर अपनी मुहर लगा दी है..! जिसके बाद अब न तो निचली अदालत से दो साल या अधिक की सजा होने पर सांसदो, विधायकों की सदस्यता रद्द होगी और न ही हिरासत में रहते हुए चुनाव लड़ने पर रोक रहेगी..!
सत्ताधारी दल तो गले तक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है लेकिन विपक्ष क्या कर रहा है..? विपक्ष इस सब का हवाला देकर जनता से 2014 में सत्ता की चाबी मांग रहा है लेकिन जब बात अपने किए किसी एक वादे को ही चुनाव पूर्व पूरा करने की बारी आई तो इन्होंने अपना असली रंग दिखा दिया..! ये अपने दागी साथियों को बचाने के लिए एकसाथ खड़े हो गए और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने की सरकारी कवायद का विरोध करने की बजाए कधे से कंधा मिलाकर चलने में भी इन्होंने जरा सी देर नहीं की..! सत्ता पक्ष के साथ ही क्या भाजपा, क्या सपा, क्या बसपा, क्या जदयू..? समूचा विपक्ष अपने साथियों के व भविष्य में अपने राजनीतिक भविष्य पर मंडराते संभावित खतरे से निपटने के लिए एक ही छतरी के नीचे आ गए..!
आपराधिक इतिहास वाले नेताओं की देश के छोटे बड़े सभी राजनीतिक दलों में कितनी पैठ है इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि मई 2009 की नेशनल इलेक्शन वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक 15वीं लोकसभा में 150 दागी सांसद हैं जिनमें से 73 के खिलाफ गंभीर आरोप हैं। वहीं राज्यों की बात करें तो दागी विधायकों के मामले में झारखंड देश में सबसे अव्वल है, जहां पर कुल विधायकों में से 72 फीसदी (55 विधायक) विधायकों के खिलाफ कोई न कोई आपराधिक मामला चल रहा है। 55 में से भी 24 विधायकों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं। बिहार इस सूची में दूसरे नंबर पर है जहां पर 58 फीसदी (140 विधायक) विधायक दागी हैं जिनमें से भी 84 विधायकों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं। महाराष्ट्र इस फेरहिस्त में 51 फीसदी (146 विधायक) विधायकों के साथ तीसरे नंबर है जिनमें से 56 विधायकों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं। विधायकों की संख्या के साथ चौथे नंबर पर उत्तर प्रदेश विराजमान है, जहां दागी विधायकों का प्रतिशत 47(189 विधायक) है, जिसमें से 98 विधायकों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं।
अन्य राज्यों में भी हालात कुछ जुदा नहीं है और बड़ी संख्या में दागी विधायक राज्य की विधानसभाओं की शोभा बढ़ा रहे हैं। सिर्फ मणिपुर ही इकलौता ऐसा राज्य है जहां पर किसी भी विधायक के खिलाफ कोई भी आपराधिक मामला नहीं है और सभी 60 विधायक बेदाग हैं।
राजनीतिक दलों के चश्मे से देखें तो इन्होंने क्या गलत किया..? कौन अपने भविष्य पर विराम लगने का रास्ता खुला रखना चाहेगा..? वही तो इन्होंने भी किया, सत्ता के लिए आपस में जूतम पैजार तक करने से बाज नहीं आने वाले ये नेता अपने भविष्य पर आंच आते देख एक सुर में गाने लगे..! आंकड़ें चीख चीख कर यही गवाही दे रहे हैं कि अगर राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए एक नहीं होते तो शायद हमारी संसद और देश की तस्वीर ही बदल जाती, जो शायद राजनीतिक दल कभी नहीं चाहेंगे..! सुप्रीम कोर्ट के फैसले को तो इन्होंने पलटने में देर नहीं की पर जनता का फैसला ये नहीं पलट पाएंगे, लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या जनता चुनाव में अपनी वोट की ताकत से दागियों के खिलाफ फैसला सुनाएगी..?  


deepaktiwari555@gmail.com