सोमवार, 19 अगस्त 2013
रविवार, 18 अगस्त 2013
प्याज न खाने से नहीं मरता कोई..!
खाने में और सलाद
में प्याज का मजा तो मेरे जैसे प्याज के शौकीन ही समझ सकते हैं..! मजे से प्याज खा भी
रहे थे, बाजार में प्याज 35 से 40 रुपए किलो मिल भी जा रहा था लेकिन सभी समाचार
चैनलों के साथ ही अख़बारों में “प्याज के दाम आसमन में”, “थाली से प्याज गायब” टाईप ख़बरों ने प्याज
को एक बेशकीमती वस्तु बना दिया है..! प्याज की तुलना सेब के दामों सी की जाने लगी तो जो
प्याज 35 से 40 किलो रुपए बिक रहा था वो प्याज रातों रात 60 से 80 रुपए किलो बिकने
लगा..! (जरुर पढ़ें- एक प्याज की ताकत)
मीडिया का भी अगर
प्याज पर ध्यान केन्द्रित नहीं होता तो शायद प्याज पर न तो महंगाई के पंख लगते और
न ही मैं आज ये पोस्ट लिख रहा होता और आज एक बेशकीमती वस्तु बना प्याज सब्जी वाली
के ठेले में आलू के बराबर में पड़ा - पड़ा चुपचाप बिक रहा होता..!
सिर्फ प्याज से अगर
किसी भूखे का पेट भरता तो बात समझ में भी आती और प्याज के दामों को लेकर मच रहे हो
हल्ले में भईया हम भी शामिल हो जाते लेकिन सच तो ये है कि किसी गरीब परिवार में
सब्जी प्याज के बिना तो बन सकती है, वह प्याज के सलाद के बिना तो खाना खा सकता है
लेकिन उस परिवार के पास सब्जी और रोटी खरीदने के पैसे ही अगर न हों तो क्या कर
लिजिएगा..?
जाहिर है उसके पास
अगर पैसा है भी तो उसकी पहली प्राथमिकता रोटी, सब्जी, दाल चावल ही होगी न की सिर्फ
प्याज..! बावजूद इसके प्याज
को लेकर तो हो हल्ला मचा है लेकिन एक गरीब परिवार दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कैसे
करेगा इसकी फिक्र किसी को नहीं है..!
दिल्ली का ही अगर
उदाहरण ले लें तो कांग्रेस सरकार के 14 साल के कार्यकाल में दिल्ली में 737 लोगों
की मौत की वजह भूख और गरीबी रही है..! विश्व के 95 करोड़ भूखों में से 45 करोड़ तो भारत में ही
है, जिनमें से हर रोज कई लोग भूख के चलते दम तोड़ देते हैं..! मुझे नहीं लगता कि
इनमें से कोई भी एक ऐसा रहा होगा जिसकी मौत प्याज के दाम बढ़ने के कारण या प्याज न
खा पाने के कारण हुई हो..!
आटा 20 से 30 रुपए
किलो मिल रहा है, खाने लायक चावल 30 रुपए से कम में नहीं मिल रहा है, दालें 70 से
80 रुपए किलो मिल रही हैं और सब्जियों के दाम तो खुद सब्जी वाला किलो में नहीं
बताता कि कहीं खरीदने वाला ही न वापस लौट जाए..! ऐसे में सिर्फ एक प्याज के दामों को लेकर इतना हो
हल्ला कहां तक सही है..? और तो और प्याज के दाम पर सरकार भी बावली हुई जा रही है..! खासकर दिल्ली की
शीला दीक्षित सरकार को शायद 1998 याद आ रहा है और आगामी विधानसभा चुनाव में सत्ता
से बेदखल होने का डर सता रहा है तो 1998 में सत्ता गंवाने वाली भाजपा को 1998 का
ये दोहराव सत्ता की एक सीढ़ी नजर आ रही है..! शायद इसलिए ही भाजपा
प्याज की बढ़ती कीमतों को सरकार के खिलाफ मुद्दा बनाने की तैयारी कर रही है तो
सरकार प्याज के सरकारी स्टॉल लगाकर जनता की नाराजगी दूर करने का प्रयास कर रही
है..!
कुल मिलाकर प्याज के
नाम पर सिर्फ सियासत हो रही है..! समाचार चैनल और अखबार अपनी-अपनी टीआरपी बढ़ा रहे हैं, वर्ना एक प्याज की इतनी मजाल कि वो बिना कटे ही
लोगों की आंख से आंसू टपका दे..!
शनिवार, 17 अगस्त 2013
क्योंकि ये एक पत्रकार की लड़ाई है..!
किसी फैक्ट्री या
मिल में कर्मचारियों के साथ ज्यादती होती या फिर उसका उत्पीडन होता है तो फैक्ट्री/मिल के सभी कर्मचारी
भी प्रबंधन के इस फैसले के खिलाफ आवाज उठाते हैं..! व्यापारियों को लगता है कि सरकार उनके हित में
फैसले नहीं ले रही है तो व्यापारी भी एक दिन का सांकेतिक बंद या फिर चक्का जाम कर
अपनी आवाज उठाते हैं..! सरकारी कर्मचारी अपनी मांगों के लिए हड़ताल का रास्ता अख्तियार करते हैं..!
ये छोड़िए हमारे
नेतागण तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ भी आवाज उठाने से गुरेज नहीं करते
क्योंकि उन्हें लगता है कि कोर्ट के फैसले उनकी राजनीति का कहीं बंटाधार न हो
जाए..! इस सब के बीच मीडिया
की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि मीडिया ही एक ऐसा माध्यम है जो
फैक्ट्री या मिल के कर्मचारियों के साथ ही सरकारी कर्मचारियों और व्यापारियों के
साथ ही अपने हक की लड़ाई के लिए लड़ रहे लोगों के लिए सरकार तक पहुंचने का एक माध्यम
बनता है..!
सरकार और शोषित के
बीच पुल का कार्य करने वाले पत्रकार शोषित जनता को उनका हक दिलवाने का दम भरते हैं
लेकिन बात जब खुद के शोषण/उत्पीडन के खिलाफ आवाज उठाने की आती है तो यही पत्रकार चुप्पी साध कर बैठ जाते
हैं, जैसे इन्होंने कोई गुनाह किया हो और ये लोग इस गुनाह की सजा भुगत रहे हों..! आपको जानकर हैरत
होगी कि दूसरों के हक की आवाज उठाने वाले पत्रकार ही सबसे ज्यादा शोषण का शिकार हैं..! कई मीडिया
संस्थान दो – दो महीने तक अपने
कर्मचारियों को वेतन नहीं देते हैं तो कई संस्थानों में कब, किस दिन किसी पत्रकार
को अगले दिन से बिना कोई कारण बताए नौकरी में न आने का नोटिस थमा दिया जाए ये कोई
नहीं जानता..?
एक बार फिर ऐसा ही
हुआ है, देश के सबसे बड़े पूंजीपतियों में से मुकेश अंबानी ने नेटवर्क 18 समूह से
करीब 300 से ज्यादा मीडियाकर्मियों को नौकरी से चलता कर दिया है..! लेकिन हैरत की बात
है कि मीडिया की अब तक की सबसे बड़ी छंटनी के खिलाफ पत्रकार खामोश हैं..! दूसरों के हक के
लिए सरकार को कठघरे में खड़े करने वाली पत्रकार बिरादरी पूंजीपति के आगे नतमस्तक
है और कोई भी नेटवर्क 18 प्रबंधन के इस फैसले के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं
जुटा पा रहा है..! दुख की बात तो ये है
कि इन चैनलों के संपादक की कुर्सी पर बैठे तथाकथित बड़े-बड़े पत्रकार आशुतोष और
राजदीप सरदेसाई भी अपने कर्मचारियों के साथ खड़े नहीं दिखाई दे रहे हैं..!
इन संस्थानों के इस
फैसले के खिलाफ पत्रकार बिरादरी में जबरदस्त गुस्सा तो है लेकिन अंबानी जैसे
पूंजीपति के इस कत्लेआम के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत शायद किसी में नहीं है..!
सोशल मीडिया में एक छोटी
सी मुहिम जारी भी है लेकिन इसमें भी खुलकर अपनी बात कहने वाले पत्रकार गिने चुने
ही हैं..! भाई लोग ये जानते हैं कि आज ये कत्लेआम एक संस्थान
में हुआ है और कल उनके बारी भी आ सकती है लेकिन इसके बाद भी इस कत्लेआम का विरोध
करने का दम शायद किसी में नहीं है..! आज नहीं तो कल ये होगा और छंटनी के नाम पर पत्रकारों को नौकरी
से निकाल भी दिया जाएगा लेकिन पत्रकार कुछ नहीं बोलेंगे क्योंकि इन्हें शायद अपनी
लड़ाई लड़नी ही नहीं आती क्योंकि या तो हम इसके आदि हो गए हैं या फिर हमने इसी को
अपनी नियति मान लिया है..!
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बुधवार, 14 अगस्त 2013
लेकिन प्रधानमंत्री से उम्मीद करते हैं कि…
पूरा देश आजादी की 67वीं
वर्षगांठ के जश्न की तैयारियों में डूबा हुआ है। वर्ष में सिर्फ दो दिन (26 जनवरी
और 15 अगस्त) मौन व्रत तोड़ने वाले हमारे प्रधानमंत्री माननीय मनमोहन सिंह के मौन
टूटने का वक्त भी करीब आ गया है, उम्मीद करते हैं मनमोहन सिंह लाल किले की प्राचीर
से देश को संबोधित करने के बाद अपनी सोनिया मैडम की तरफ देखकर ये नहीं पूछेंगे कि “ठीक है”। (जरुर पढ़ें-दिल्ली गैंगरेप- “ठीक है” लोग इसे भी भूल
जाएंगे !)
मनमोहन सिंह लाल
किले की प्राचीर से यूपीए टू की उपलब्धियों को गिनाते हुए यूपीए टू के कार्यकाल को
स्वर्णिम करार देते हुए देश को गर्व करने का मौका देंगे लेकिन उम्मीद करते हैं कि
मनमोहन सिंह यूपीए टू के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार और घोटालों पर एक शब्द भी नहीं
बोलेंगे..!
माननीय प्रधानमंत्री
जी उत्तराखंड में आई भीषण प्राकृतिक आपदा पर दुख जताते हुए इससे उबरने में
उत्तराखंड राज्य सरकार की हर संभव मदद करने का ठोस आश्वासन देंगे और त्रासदी के
वक्त दिल्ली के चक्कर लगाने वाले उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की पीठ
जरुर ठोकेंगे..! लेकिन उम्मीद करते
हैं कि प्रधानमंत्री जी भीषण त्रासदी से निपटने में नाकाम बहुगुणा सरकार के खिलाफ एक शब्द भी
नहीं बोलेंगे..!
माननीय मनमोहन सिंह
अपने भाषण में सीमा पर पाकिस्तानी सैनिकों के हमले में शहीद हुए सैनिकों के प्रति दुख
प्रकट करेंगे लेकिन उम्मीद करते हैं कि भारत की नाक में दम करने वाले अपने धूर्त
पड़ोसी के खिलाफ लाल किले का प्राचीर से एक भी शब्द नहीं बोलेंगे..! हां, नवाज शरीफ की तरफ
दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए पाक प्रधानमंत्री को लंच या डिनर पर जरुर आमंत्रित
करेंगे..!
पीएम साहब अपने भाषण
में मंदी से निपटने और देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए हर संभव कदम
उठाने की बात तो करेंगे और देश की जनता का सामान्य ज्ञान ये कहकर बढ़ाएंगे कि पैसे
पेड़ पर नहीं लगते लेकिन उम्मीद करते हैं कि मनमोहन सिंह साहब सुरसा के मुहं की
तरह मुंह फाड़ती महंगाई पर अपनी चुप्पी नहीं तोड़ेंगे..! और न ही ये बताएंगे
कि पैसे पेड़ पर नहीं लगते तो फिर कहां लगते हैं..? (जरुर पढ़ें- ठीक कहा प्रधानमंत्री जी...पैसे पेड़ पर नहीं लगते)।
आखिर में
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह साहब यूपीए सरकार को महंगाई के बोझ तले दबी और भूख और
कुपोषण से मर रही देश की जनता की सबसे फिक्रमंद सरकार होने का तमगा खुद देंगे और जनता
से एक बार फिर से 2014 में कांग्रेस पर भरोसा करने की अपील करेंगे लेकिन उम्मीद
करते हैं कि मनमोहन सिंह यूपीए सरकार की नाकामी पर एक भी शब्द नहीं बोलेंगे और देश
के सुरक्षा हालात, आर्थिक हालात के साथ ही भ्रष्टाचार और घोटालों के फेरहिस्त की
तुलना पिछली सरकारों से करके अपने आंकड़ों को कम दिखाने की कोशिश नहीं करेंगे..!
अंत में प्रधानमंत्री
मनमोहन सिंह सभी भारतवासियों को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं देने के साथ ये
वादा करेंगे कि चाहे कुछ भी हो जाए मैं 26 जनवरी 2014 से पहले अपना मौन नहीं तोडूंगा..! जय हिंद !!
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गुरुवार, 8 अगस्त 2013
मान गए मंत्री जी, आपका भी जवाब नहीं !
भीम सिंह, पहले
इन्हें शायद न जानते हों लेकिन अब तो जान ही गए होंगे...आखिर काम ही ऐसा किया है
साहब ने..! पेशे से तो राजनेता
हैं, बिहार की जदयू सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री भी हैं लेकिन आपको जानकर हैरत
होगी कि मंत्री जी का सामान्य ज्ञान कमाल का है..! सीमा पर 5 सैनिकों की शहादत (पढ़ें- पाक को भारत का करारा जवाब !) पर मंत्री जी ने जो
बोला उससे कम से कम मेरा सामान्य ज्ञान तो बढ़ ही गया..! एक पत्रकार मित्र के
सवाल पर मंत्री जी बोले कि सैनिक शहीद होने के लिए ही तो होते हैं..!
मंत्री जी के बयान
के बाद मेरी जिज्ञासा का सागर तो हिलोरें मारने लगे है, सोच रहा था कि मंत्री जी
से आग्रह करूं कि जरा मेरी जिज्ञासा को शांत करने का कष्ट कर मुझे कृतार्थ करें..!
तो मंत्री जी मैं कह
रहा था कि अगर सैनिक शहीद होने के लिए होते हैं तो फिर देश की जनता किसलिए होती है
और आप जैसे नेतागण किसलिए होते हैं जरा ये भी बता दीजिए..! अपने बयान पर माफी
मांगने के बाद अब शायद आप अपना सामान्य ज्ञान बघार कर इन जिज्ञासाओं को शांत करने
की हिम्मत नहीं जुटा पाएंगे..!
लेकिन मंत्री जी
चिंता मत करिए नीतिश कुमार की फटकार के बाद आप नहीं बोल सकते तो क्या आपके अंर्तमन
की बातें मैं कागज पर उकेर देता हूं..! मैं तो सिर्फ सवाल पूछूंगा आप हां या न में उत्तर दे
दीजिएगा…! क्या कहा अब
पत्रकारों के किसी सवाल का जवाब नहीं देंगे..! ये लोग बात का बतंगड़ बना देते हैं..! चलिए कोई नहीं हां
या न में सिर हिलाकर ही जवाब दे दीजिएगा इसमें तो कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए
आपको..!
हां तो मैं ये पूछ
रहा था कि अगर सैनिक शहीद होने के लिए होते हैं तो फिर जनता किसलिए होती है और आप
जैसे नेतागण किसलिए होते हैं..?
कुछ तो बोलिए मंत्री
जी..?
क्या जनता नेताओं के
हाथों लुटने के लिए होती है..? भूख और कुपोषण से मरने
के लिए होती है..? महंगाई के बोझ तले
दबने के लिए होती है..? अपनी मेहनत की
गाढ़ी कमाई आप जैसे नेताओं के चरणों में अर्पित करने के लिए होती है..?
कुछ तो बोलिए मंत्री
जी, इशारों से काम नहीं चलेगा, कम से कम हां या न कुछ तो बोलिए..!
ये क्या मंत्री जी..? हां में भी सिर
हिला रहे हैं और न में भी..! आखिर आप कहना क्या चाहते हैं..? थोड़ा कन्फ्यूज लग रहे हैं..!
चलिए कोई बात नहीं मत
बताइए लेकिन अपने से जुड़े सवाल का जवाब तो दे दीजिए कि आखिर आप जैसे नेतागण
किसलिए होते हैं..?
क्या जनता तो लूटने
के लिए होते हैं..? जनता की मेहनत की
कमाई को भ्रष्टाचार और घोटालों में उड़ाने के लिए होते हैं..? देश के पैसे को
विदेशी बैंकों में कालेधन के रुप में जमा करने के लिए होते हैं..?
हां या न कुछ तो
बोलिए मंत्री जी..! ये क्या..? मुझे चुप रहने का
इशारा क्यों कर रहे हैं..? अरे हां या न में जवाब दे दीजिए, मैं किसी को नहीं बताऊंगा..! अरे कहां उठ कर चल
दिए मंत्री जी..? सुनिए तो सही, जवाब
तो देते जाइए मंत्री जी..!
ये लो, मंत्री जी तो
बिना जवाब दिए ही चल दिए लेकिन क्या वाकई में इन सवालों के जवाब जानने की जरुरत
है..?
दिल्ली से लेकर देश
के हर कोने में ऐसे हजारों भीम सिंह मौजूद हैं, जिनकी जुबान ज्यादा दिन तक खामोश
नहीं रह सकती..! देर सबेर कोई न कोई
भीम सिंह इन सवालों का जवाब दे ही देगा..! वैसे भी हमें तो आदत सी हो गई है भीम सिंह जैसों की
बेतुकी बातों को सुनने की..! लेकिन याद रखिए इनको कोई अगर जवाब दे सकता है तो वो हम ही हैं लेकिन क्या हम
एकजुट होकर कभी इनको जवाब दे पाएंगे..? कई राज्यों के विधानसभा चुनाव के साथ ही आम चुनाव
करीब है सोच लिजिए ऐसे नेताओं को जवाब देना है या फिर ऐसे ही रहना है..?
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बुधवार, 7 अगस्त 2013
शर्म करो सरकार !
भारतीय सीमा में
घुसकर भारतीय जवानों पर हमले की निंदा और इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देने का काम भारत
सरकार ने बिना देर किए कल ही निपटा दिया था। लगे हाथों हमारे रक्षा मंत्री ए के
एंटनी ने संसद में अपने बयान में पाकिस्तान को ये कहकर क्लीन चिट दे दी कि हमला
करने वाले आतंकी पाकिस्तानी सेना की वर्दी में थे..! वैसे भी पाकिस्तान हर बार की तरह इस बार भी पहले
ही इंकार कर चुका है कि उसका इस हमले में हाथ नहीं है..! (पढ़ें- पाक को भारत का करारा जवाब !)
पाकिस्तान के हमले
पर सरकारी उदासीनता को लेकर देश गुस्से में है लेकिन कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने पाक
के खिलाफ कोई कठोर कदम उठाने की बजाए एनडीए और यूपीए शासनकाल में हुए आतंकी हमलों
और इसमें हुए आम लोगों की मौत और सैनिकों की शहादत के आंकड़ों की तुलना कर इस पर
भी सियासत शुरु कर दी है..!
कांग्रेस प्रवक्ता
अजय माकन कह रहे हैं कि एनडीए के राज में 1998 से 2004 के दौरान जम्मू कश्मीर में सबसे ज्यादा 6115 आम नागरिक मारे गए जबकि यूपीए के दौर में पिछले साल सिर्फ 15 लोग मारे गए। एनडीए के राज में 1998 से 2004 के दौरान कुल 23603 आतंकी वारदात हुईं यानी हर साल 3372 आतंकी वारदात जबकि यूपीए राज में पिछले
साल सिर्फ 220 ऐसी घटनाएं हुईं। माकन आंकड़ों का
हवाला देकर कहते हैं कि इससे साबित होता है कि हमारी सरकार देश की सुरक्षा को लेकर
गंभीर है..!
माकन साहब आतंकी
घटनाओं की तुलना कर आप सरकार की गंभीरता को दिखाने का प्रयास कर रहे हैं..? पिछली सरकार के
कार्यकाल से तुलना करने से आपका दामन पाक साफ नहीं हो जाता..! आपको तो जनता ने
बेहतरी के लिए चुना है न, तो अच्छा कीजिए, पिछली सरकार के कामों का हवाला देकर
अपनी गलतियों पर पर्दा डालने से आप खुद को दूध का धुला साबित नहीं कर सकते..!
यूपीए सरकार के
कार्यकाल में कम घटनाएं हुई इसके लिए आपको बधाई...अब खुश हैं आप..? लेकिन अगर एक भी घटना हो रही है, एक भी जवान शहीद
हो रहा है तो क्यों..? क्या इसे रोकने के लिए कारगर कदम उठाना आपकी सरकार की जिम्मेदारी नहीं है..?
अगर सीमा में
पाकिस्तानी सैनिकों के हमले में एक भी भारतीय जवान शहीद हो रहा है तो उस पर भी
आपको दर्द होना चाहिए..! क्योंकि वो भी किसी का बेटा है, किसी का पति है, किसी का भाई है, किसी का पिता है..! जो अपने परिजनों से
हजारों किलोमीटर दूर विपरित परिस्थितियों में उन दुर्गम इलाकों में देश की रक्षा
के लिए जी जान लगा देता है जहां रहना किसी चुनौती से कम नही है..! लेकिन आप इस दर्द
को कैसे समझेंगे इनमे आपका कोई अपना नहीं है न..!
आपके लिए तो लगता है
भारत मां से भी बढ़कर सत्ता है, कुर्सी है..! जिस पर रहते हुए आप दुश्मनों से भारत मां की रक्षा के लिए कोई
कदम उठाने की बजाए आंकड़ों का सहारा लेकर राजनीति कर रहे हैं..! आप क्या इस बात का
इंतजार कर रहे हैं कि एनडीए सरकार के कार्यकाल से ज्यादा घटनाएं या हमले जब यूपीए
सरकार के कार्यकाल में होंगे तब ही आप देश की सुरक्षा को लेकर गंभीर होंगे..?
वक्त है, अब भी संभल जाओ ये
वक्त राजनीति करने का नहीं है बल्कि पाकिस्तान जैसे धूर्त पडोसी को करारा जवाब
देने का है, हमारी चुप्पी पाकिस्तान का हौसला ही बढ़ाती है जो आए दिन ऐसे हमलों के
रुप में सामने आते हैं..!
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मंगलवार, 6 अगस्त 2013
पाक को भारत का करारा जवाब !
लो, फिर दिखा दिया
पाकिस्तान ने दम कि उनके पास खाने के लिए खाना नहीं है, तो क्या भारतीय
सैनिकों को खिलाने के लिए गोली की कोई कमी नहीं है..! भारतीय सीमा में
घुसकर 5 भारतीय सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया..! सुना है, इस बार भारत ने भी पाकिस्तान को करारा जवाब
दिया है..! भारत सरकार ने पाक डिप्टी
हाई कमिश्नर को तलब कर भारतीय सैनिकों पर हमले के विरोध में कड़ी प्रतिक्रिया
जाहिर की है..! 5 भारतीय जवान
पाकिस्तानी हमले में शहीद हो गए तो क्या बदले में भारत ने भी तो पाक की इस नापाक
करतूत पर कड़ी आपत्ति जतायी है..! सुना है भारत की इस कड़ी आपत्ति से पाक डिप्टी हाई कमिश्नर काफी घबरा गए थे
और उन्होंने इस बार भारत को पक्का भरोसा दिलाया है कि आगे से पाकिस्तान ऐसी हरकत
नहीं करेगा..! (पढ़ें- “लातों के भूत बातों से नहीं मानते”)
गजब है भारत सरकार
भी..! हमारे रक्षा मंत्री
एंटनी बताते हैं कि 2013 में पाकिस्तानी सेना ने 17 बार घुसपैठ की कोशिश की तो 57
बार सीज फायर का उल्लंघन किया। सरकार को सीमा पर एक-एक घुसपैठ और सीज फायर उल्लंघन
की जानकारी है लेकिन बदले में सरकार ने क्या किया..? पाकिस्तानी हमलों की निंदा की, पाक के समक्ष कड़ी
आपत्ति जतायी..! भारत ने ये भी कहा
कि भारत जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार है लेकिन वो जवाबी कार्रवाई कब होगी..? ये नहीं पता..? लगातार पाक की नापाक
करतूतों पर भारत सरकार के रवैये को देखकर तो ऐसा लगता है कि भारत सरकार पाकिस्तान
के सीज फायर उल्लंघन और घुसपैठ के शतक पूरा होने का इंतजार कर रही है या फिर
भारतीय सैनिकों के शहीद होने का शतक..!
ज्यादा दिन पुरानी
बात नहीं है जब पाकिस्तानी सैनिकों ने भारत की सीमा में घुसकर हमारे दो सैनिकों के
सिर कलम कर दिए थे, तब क्या हुआ था..? (पढ़ें- मनमोहन को जगाओ, देश बचाओ !) कुछ दिन हो हल्ला मचा, उसके बाद फिर सब कुछ शांत हो
गया..! हां सरकार में शामिल
नेताओं, मंत्रियों के दो-एक घोटालों की गूंज जरुर सुनाई दी थी..!
दरअसल हमारी सरकार
को देश की सुरक्षा से कुछ लेना देना ही नहीं है..! एक तरफ चीन भारतीय क्षेत्र में आए दिन घुसपैठ कर
उसे अपना इलाका बता कर भारत को आंखे दिखा रहा है तो दूसरी तरफ पाकिस्तान हमारे
सैनिकों को मौत के घाट उतार रहा है..! सरकार को देश की सुरक्षा की चिंता होती तो क्या चीन और
पाकिस्तान को लेकर भारत सरकार गंभीर नहीं होती..! लेकिन सरकार तो अपने ही मसलों में उलझी हुई है..! सत्तारुढ़ दल को तो
चीन और पाक की नापाक करतूतों से निपटने की ज्यादा चिंता शायद इस बात की है कि कैसे
2014 के आम चुनाव में फिर से सत्ता हासिल की जाए..! (पढ़ें- वर्ना बदल जाएगा भारत का नक्शा..!)
वोटबैंक के लिए देश
की जनता को ही आपस में बांटने की जुगत में तो ये लगे रहते हैं लेकिन कैसे देश
सुरक्षा से जुड़े मसलों पर चर्चा के लिए, देश के दुश्मनों को करारा जवाब देने के
लिए इनके पास शायद वक्त नहीं है..! हां, भारतीय सैनिकों का सिर कलम करने वालों को दावत
देने के लिए ये अपने व्यस्तता के बीच भी समय निकाल ही लेते हैं..!
फिर से कहा जा रहा
है कि भारत कड़ी कार्रवाई करेगा लेकिन देखिएगा कुछ दिनों में फिर सब भुला दिया
जाएगा..! चर्चा होगी तो वही
भ्रष्टाचार, घोटालों की और चरम पर होगी सत्ता पाने के लिए वोटबैंक की राजनीति
लेकिन भारतीय सैनिकों की शहादत का कहीं जिक्र तक नहीं होगा..! फिर ऐसी ही कोई घटना
होगी तो फिर से बयानबाजी होगी, कड़ी आपत्ति जतायी जाएगी, निंदा की जाएगी और फिर से
इसे भुला दिया जाएगा लेकिन देश की सुरक्षा को लेकर कोई कदम नहीं उठाया जाएगा..! (पढ़ें- और कितने थप्पड़ खाओगे..?)
शायद यही भारत का
दुर्भाग्य है कि जिन्हें देश की जनता ने देश को आगे ले जाने की जिम्मेदारी है,
जिनके कंधों पर देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी है उनके लिए देश हित से बढ़कर उनके
व्यक्तिगत हित हैं और उन्हें पूरा करने के लिए वे देश की सुरक्षा से भी समझौता
करने में पीछे नहीं हटते..! (पढ़ें- मेरा भारत महान ! कोई शक..?)
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रविवार, 4 अगस्त 2013
अदालत में बहुगुणा का झूठ !
टीवी चैनल बदलते
बदलते इंडिया टीवी में जैसे तैसे उत्तराखंड
के मुख्यमंत्री बने विजय बहुगुणा पर नजर पड़ी तो देखा कि बहुगुणा साहब रजत
शर्मा के साथ आप की अदालत कार्यक्रम में उत्तराखंड में आई भीषण त्रासदी पर रजत शर्मा
के सवालों का जवाब दे रहे थे। हर एक सवाल पर बहुगुणा असहज दिखाई दे रहे थे लेकिन
इसके बाद भी बहुगुणा साहब ने आपदा प्रबंधन के साथ ही राहत एवं बचाव कार्य में देरी
को लेकर सरकार की नाकामी को स्वीकार नहीं किया..! (पढ़ें - उत्तराखंड के वो दिल्ली वाले मुख्यमंत्री..!)
हैरत तो तब हुई जब
बहुगुणा साहब किसी तरह की खामी को स्वीकारने की बजाए राहत एंव बचाव कार्य को दुनिया का सबसे
बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन बताकर वाहवाही लूटने का प्रयास करने लगे..! विजय बहुगुणा साहब
शायद ये भूल गए कि दिस रेस्क्यू ऑपरेशन पर वो आज इतरा रहे हैं, वो भारतीय सेना के
जांबाज सिपाहियों की बदौलत ही संभव हो पाया है वर्ना उनकी सरकार तो त्रासदी के
करीब डेढ़ माह बाद भी प्रभावितों को ठीक तरह से मदद तक नहीं पहुंचा पाई है..!
मीडिया मैनेजमेंट
में करोड़ों रुपए खर्च कर अपनी व सरकार की छवि को सुधारने की कोशिश में जुटे विजय
बहुगुणा भले ही अख़बारों और टीवी में विज्ञापन के जरिए अपनी पीठ थपथपा रहे हैं
लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि उत्तराखंड के आपदा प्रभावित जिलों उत्तरकाशी,
रुद्रप्रयाग, चमोली और पिथौरागढ़ के सुदूर इलाकों में आपदा प्रभावित आज भी दाने
दाने के लिए मोहताज हैं..! मीडिया वहां तक पहुंच गया, स्वंय सेवी संगठन के लोग वहां तक पहुंच गए लेकिन
सरकार का कोई प्रतिनिधि आज तक वहां तक क्यों नहीं पहुंच पाया इसका जवाब उत्तराखंड सरकार
के किसी नुमाइंदे के पास नहीं है..?
बहुगुणा को छोड़िए
उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी भी आपदा प्रभावित इलाकों का दौरा करने के नाम पर खूब
हवाई सैर का लुत्फ उठा रहे हैं, लेकिन दुर्गम पहाड़ी इलाकों में प्रसाव पीड़ा से
कराह रही गर्भवती महिलाओं को सुपक्षित प्रसव के लिए अस्पताल पहुंचाने के लिए
बहुगुणा सरकार के पास कोई साधन नहीं है..!
सरकार की नाकामी के
हर सवाल पर बहुगुणा साहब त्रासदी को कुदरत का कहर बताते हुए सरकार की लाचार तस्वीर
पेश कर रहे थे लेकिन आपदा प्रबंधन पूरी तरह फेल क्यों हो गया इसका जवाब विजय
बहुगुणा नहीं दे सके..? वे तो इसके लिए भी कुदरत को ही दोषी ठहराने लगे और दलील देने लगे कि ऐसी
त्रासदी से निपटना हिंदुस्तान क्या दुनिया की किसी सरकार के बस में नहीं है..! पूरी तरह नाकाम रहने
के बाद भी विजय बहुगुणा उत्तराखंड त्रासदी में एक प्रतिशत भी सरकारी नाकामी को स्वीकार
करने के लिए तैयार नहीं हैं..! ऐसा नहीं है उत्तराखंड सरकार ने कुछ काम नहीं किया लेकिन ऐसी भीषण त्रासदी के
वक्त जो संवेदनहीनता और तत्परता दिखाई देनी चाहिए थी वो कहीं भी नहीं दिखाई दी..!
त्रासदी के करीब
डेढ़ माह बाद भी केदारनाथ मंदिर में पूजा की सरकार को फिक्र है लेकिन त्रासदी में
आपना सब कुछ गंवा बैठी अपनी प्रजा की चिंता सरकार के राजा को नहीं है..!
टीवी कार्यक्रम में
ही सही अदालत के कठघरे में त्रासदी के सवालों का जवाब देते पूर्व जज रहे
मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा हर सवाल पर असहज होते हुए भी बड़ी ही चालाकी से खुद का व
सरकार का बचाव करने में सफल भले ही रहे लेकिन बहुगुणा साहब ये भूल रहे हैं कि अपनी
नाकामियों को वह ज्यादा दिनों तक नहीं छिपा सकते और देर सबेर उन्हें जनता को जवाब
देना ही होगा..!
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शुक्रवार, 2 अगस्त 2013
दागी नेता- राजनीतिक दल नहीं, जनता है दोषी !
खुद पर बन आई तो एक
बार फिर से सब एक हो गए, कुछ भी करना पड़ जाए लेकिन हमारे राजनीतिक दल दागी नेताओं
पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को नहीं मानेंगे फिर चाहे कानूनी संशोधन ही क्यों न
करना पड़े..! एक हो भी क्यों न..? आखिर सफेद कुर्ते पर
लगे दाग ही तो इनको कानून की नजर से बचाते हैं..! (पढ़ें- नेता जी, दाग अच्छे हैं..!) तभी तो सत्ता के
लिए एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए किसी भी हद को पार कर जाने वाले हमारे नेतागण
एक बार ठीक उसी तरह एक हो गए जैसे संसद और विधानसभा में अपने वेतन भत्तों को
बढ़ाने के लिए सारे गिले शिकवे भुला कर हाथ मिला लेते हैं..! इस बार तो बात इनके राजनीतिक
भविष्य पर आ गयी थी तो फिर क्यों न एक होते..! वैसे भी ऐसे मौके
कम ही आते हैं जब सभी राजनीतिक दल एक छतरी के नीचे खड़े होकर एक सुर में बात करते
हैं वर्ना तो ये लोग एक दूसरे को सत्ता की राह का सबसे बड़ा रोड़ा समझते हैं और इस
रोड़े से पार पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं..!
राजनीति में रहेंगे
तभी तो न कुर्सी के लिए एक दूसरे से लड़ेंगे इसलिए सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले
के विरोध में एक ही सुर में गुनगुनाना शुरु कर दिया है जिसके तहत जेल जाने या फिर
सजा होने पर नेताओं के चुनाव लड़ने पर ही रोक लग जाएगी..! जनता से जुड़े किसी
एक मुद्दे पर इनकी ऐसी एकजुटता देखने को नहीं मिलती जितनी कि अपने व्यक्तिगत लाभ
से जुड़े मसलों पर..! (पढ़ें-
और नेतानगरी में छाया मातम..!)
जनता के सामने ये
नेता भले ही अपराध पर अंकुश लगाने और अपराधियों को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाने
की बड़ी बड़ी बातें करते हैं लेकिन यही लोग चुनाव में बड़ी संख्या में अपराधिक
इतिहास वाले नेताओं को टिकट देने से गुरेज नहीं करते..! चुनाव के वक्त तो
जेल की सलाखों के पीछे अपने अपराध की सजा काट रहे नेता ही इन्हें सबसे जिताऊ
प्रत्याशी लगते हैं..!
आंकड़े इसको साबित
भी करते हैं कि किस तरह राजनीतिक दल आपराधिक इतिहास वाले नेताओं को दिल खोलकर टिकट
बांटते हैं और उनके दम पर सत्ता हासिल करने के ख़्वाब संजोते हैं..!
आंकड़े बताते हैं कि
4807 सांसदों, विधायकों में से 30 प्रतिशत यानि कि 1460 के खिलाफ आपराधिक केस चल
रहे हैं, जिनमें से राज्यसभा और लोकसभा के कुल मिलाकर 24 प्रतिशत सांसद दागी हैं
तो अलग अलग राज्यों की विधानसभाओं के 31 प्रतिशत विधायक दागी हैं। ऐसे नहीं है कि
दागियों पर कृपा किसी एक राजनीतिक दल की ही है। देश के दोनों प्रमुख राजनीजित दलों
कांग्रेस और भाजपा में तो मानो इसकी होड़ लगी हुई है। कांग्रेस के टिकट पर जीतकर 21
प्रतिशत दागी सांसद या विधायक बने तो भाजपा के टिकट पर जीतकर सांसद और विधायक बनने
वालों का प्रतिशत 31 है।
ऐसा भी नहीं था कि
दागी मैदान में थे और अपने आप चुनाव जीत गए इसमें राजनीतिक दलों से बड़ा हाथ उस
क्षेत्र की जनता का है, जिस जिस संसदीय क्षेत्र या विधानसभा से ये दागी
चुनाव जीतकर संसद या विधानसभा में पहुंचे..! उस क्षेत्र की जनता
भी इसके लिए उतनी ही दोषी है क्योंकि अगर जनता ऐसे दागियों को अपना वोट ही नहीं
देती तो ये दागी कभी भी लोकतंत्र के मंदिर में कदम रखना तो दूर चुनाव लड़ने से
पहले भी सौ बार सोचते..! लेकिन देश की संसद और राज्यों की विधानसभा में 30
प्रतिशत दागी सांसदों और विधायकों की मौजूदगी ये बताती है कि राजनीतिक दलों के साथ
ही देश की जनता ने भी इनका भरपूर साथ दिया..!
अब जब सर्वोच्च
न्यायालय ने दागियों के रास्ते में दीवार खड़ी कर दी है तो राजनीतिक दलों के पेट
में दर्द होने लगा है और वे एकजुट होकर कानूनी संशोधन की वकालत कर रहे हैं..! इनकी एकजुटता देखकर
लगता भी है कि ये लोग एक बार फिर से अपने मकसद में कामयाब हो जाएंगे और बेखौफ होकर
दागी चुनावी मैदान में ताल ठोकेंगे और जनता भी इन दागियों को सिर आंखों पर बैठाकर
इन्हें भगवान बनाकर लोकतंत्र के मंदिर में बैठने का पूरा मौका देगी..!
अब तक ऐसा ही तो होता
आया है लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि इस तस्वीर को बदलने की ताकत
भी जनता के पास ही है..! जिस दिन लोग अपने वोट की ताकत को पहचान जाएंगे उस
दिन किसी भी दल का कोई दागी नेता चुनाव जीतना तो दूर चुनाव लड़ने की भी नहीं
सोचेगा लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या कभी ऐसा होगा..?
उम्मीद तो कर ही सकते हैं
कि 2013 में छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली के साथ ही मिजोरम में होने
वाले विधानसभा चुनावों और इसके बाद 2014 के आम चुनाव में जनता अपने वोट की ताकत से
दागी नेताओं और इनको संरक्षण देने वालों को सबक सिखाएगी..!
deepaktiwari555@gmail.com
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