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गुरुवार, 25 जुलाई 2013

मेरा भारत महान ! कोई शक..?

65 सांसद मोदी को वीजा न देने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा को चिट्ठी लिखते हैं तो भाजपा सांसद चंदन मित्रा मोदी की आलोचना करने पर अमर्तय सेन से भारत रत्न वापस लेने का राग अलापते हैं..!
योजना भवन में 35 लाख रुपए टॉयलेट निर्माण में खर्च करने वाला योजना आयोग कहता है कि गांव में 28 रुपए और शहर में 33 रुपए से कम खर्च करने वाला गरीब नहीं है..! कांग्रेसी नेता इस बेतुके तर्क को सही ठहराने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ते..! अभिनेता से नेता बने राज बब्बर कहते हैं कि मुंबई में 12 रुपये में आदमी भरपेट भोजन कर सकता है तो एक और कांग्रेसी राशिद मसूद कहते हैं कि दिल्ली में 5 रुपये में भरपेट भोजन मिलता है..!
हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र हुड्डा इन सब से दो कदम आगे निकल गए..! हरियाणा सरकार किसानों को मुआवजे के रूप में एक और दो रुपए का चैक देती है और मुख्यमंत्री हुड्डा कहते हैं कि सही हिसाब किताब के बाद ही किसानों को मुआवजे का चैक दिया गया है..!
चूतियापे की भी हद होती है, क्या बोल रहे हैं..? क्या कर रहे हैं..? किसी चीज का होश तक नहीं है..! इन महान नेताओं को देखकर, इनकी बातें सुनकर तो मानो ऐसा लगता है कि भारत में बस यही एक समझदार हैं बाकी तो सब निरे मूर्ख हैं..!
मतलब ये लोग कुर्सी पाने के लिए किसी भी हद तक गिरने को तैयार हैं और कुर्सी मिलने के बाद ये खुद को भगवान ये कम नहीं समझते..! खुद की संपत्ति करोड़ों के हिसाब से बढ़ रही है लेकिन गरीब की दो वक्त की रोटी के लिए इन्हें 33 रुपए बहुत नजर आते हैं..!
ससंद और राज्यों की विधानसभा में अपने वेतन भत्ते बढ़ाने की मांग को खूब उठाते हैं लेकिन बाढ़ में अपनी सालभर की मेहनत गंवा चुके किसान को मुआवजे के रुप में एक और दो रुपए का चैक थमाकर कहते हैं कि सही हिसाब किताब से मुआवजा दिया गया है..!
दो धूर्त पड़ोसी पाकिस्तान और चीन सिर पर नाच रहे हैं लेकिन ये खास वर्ग के वोटबैंक को साधने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखकर विश्व बिरादरी में अपने साथ ही भारत की 121 करोड़ जना का उपहास उड़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं..! (जरुर पढ़ें- वोटबैंक के लिए ओबामा को खत !)
अमर्त्य सेन एक भारतीय होने के नाते देश के प्रधानमंत्री के रुप में मोदी को न देखने की अपने मन की बात कहते हैं तो ये कहते हैं कि अमर्त्य सेन से भारत रत्न वापस ले लिया जाना चाहिए..!
ये चाहते हैं कि देश की जनता को ये मूर्ख बनाते रहें और जनता मूर्ख बनकर आंख मूंद कर बस इनको वोट देती रहे..! ये जो कहें उसे ही पत्थर की लकीर मानकर सच मान ले और ऐसे ही भ्रष्टाचार और घोटालों के नित नए कायम होते रिकार्डों को देखकर ताली बजाती रहे और महंगाई को इन नेताओं को वोट देने के प्रसाद के रूप में हंसकर गृहण करती रहे..!
इनता बस चले तो भूख और कुपोषण से देश में हो रही मौत पर ये जनता से ये कहें कि ये तो देश की बढ़ती आबादी को कम करने का सरकारी फार्मूला है..! आतंकवादी घटनाओं में निर्दोष लोग मारे जाएं ते यो लोग यहां भी यही सरकारी फार्मूला फिट करने में देर न करें..!
जब ये कौम(नेता) भारत में मौजूद है और न सिर्फ मौजूद है बल्कि देश के अहम पदों पर काबिज हैपूरे देश को चला रही है, तो फिर हम क्यों न शान से कहें- मेरा भारत महान” !

deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 24 जुलाई 2013

वोटबैंक के लिए ओबामा को खत !

उन्हें अपने संसदीय क्षेत्र की जनता की फिक्र नहीं है...उनके पास अपने संसदीय क्षेत्र में जाने का वक्त नहीं है..! ये छोड़िए कई माननीयों के पास संसद की कार्यवाही में हिस्सा लेना तक का वक्त नहीं है लेकिन किसी खास वर्ग के मतदाताओं को साधने की कला इन्हें बखूबी आती है..! कैसे अपने बयानों के जरिए, अपने अजीबो गरीब कारनामों के जरिए मतदाताओं को अपने पक्ष में किया जाए इस कला में इन्हें महारथ हासिल है लेकिन जनता की समस्याओं को संसद में उठाना या फिर अपने स्तर पर सक्षम होते हुए भी उनका निराकरण करना इन्हें फिजूल लगता है..!
जनता से जुड़े मसले, देशहित के मसलों पर न तो इनकी जुबान खुलती है और न ही इनकी कलम चलती है लेकिन कुर्सी पाने के लिए जुबान भी कैंची की तरह चलती है और चिट्ठी भी ये खूब लिखते हैं..!
बात हो रही है लोकसभा के उन 40 और राज्यसभा के 25 सांसदों की जिन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को खत लिखकर नरेन्द्र मोदी को वीजा नहीं देने की अपनी मौजूदा नीति को बनाए रखने की अपील की है।
इन माननीयों के पास इस चिट्ठी को लिखने के लिए खूब वक्त है, हो भी क्यों न आखिर मसला वोटबैंक से जो जुड़ा हुआ है...! इन्हें ये साबित भी तो करना है कि वे एक खास वर्ग के लोगों के शुभचिंतक हैं, उऩके लिए अमेरिका के राष्ट्रपति को तक चिट्ठी लिख सकते हैं..!
चिट्ठी लिखकर ये सांसद इतना इतरा रहे हैं मानो इन्होंने कोई जंग जीत ली हो लेकिन ये लोग शायद इतना नहीं समझते कि उनकी इस हरकत से वे खुद उपहास का पात्र बन रहे हैं..! अपने राजनीतिक ओछेपन को दूसरे देश के सामने उजागर कर रहे हैं कि वे लोग वोटबैंक के लिए किस हद तक जा सकते हैं..!
चीन आए दिन भारतीय सीमा में घुसपैठ कर भारत को चुनौती दे रहा है, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से भारत जूझ रहा है, भूख और कुपोषण से भारत में हजारों मौत हो रही हैं, महंगाई अपने चरम पर है, भ्रष्टाचारी और घोटालेबाज जनता की गाढ़ी कमाई को उड़ा रहे हैं लेकिन इन माननीयों ने कभी जनता से जुड़े मुद्दों पर, देशहित से जुड़े मुद्दों पर इतनी गंभीरता नहीं दिखाई, संसद में आवाज नहीं उठाई लेकिन वोटों के लिए ये कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं..!
मैं नरेन्द्र मोदी को वीजा न देना के अमेरिका के फैसले को सही या गलत नहीं ठहरा रहा हूं..! ये अमेरिकी की अपनी नीति है और मोदी को वीजा देना न देना उसका विशेषाधिकार है लेकिन इसको लेकर भारतीय सांसदों का विशेष वर्ग के वोटबैंक को साधने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखना  गले नहीं उतरता..!
इन सांसदों की चिट्ठी पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा क्या सोच रहे होंगे ये इस पोस्ट के साथ साझा किए गए कार्टूनिस्ट नवल के कार्टून में बेहतर ढंग से दर्शाया गया है..!

deepaktiwari555@gmail.com 


मंगलवार, 23 जुलाई 2013

मौत, साजिश और सियासत !

बिहार में सुशासन बाबू नीतिश कुमार के राज में 23 मासूम काल के गाल में समा जाते हैं। मासूमों कि मौत पर विपक्ष को राजनीति करता ही है लेकिन नीतिश बाबू भी इसमें अपना सियासी फायदा ढूंढने से बाज नहीं आ रहे हैं। मिड डे मील खाने से हुई बच्चों की मौत के बाद नीतिश का ये बयान की ये विपक्ष की साजिश हो सकती है और भाजपा और राजद दोनों मिलकर उन्हें बदनाम करना चाहते हैं ये जाहिर करती है कि बोधगया के महाबोधि मंदिर में धमाके और उसके तुरंत बाद मिड डे मील खाने से बच्चों की मौत के बाद बैकफुट पर आए नीतिश कुमार खुद इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं कि आखिर वे करें तो क्या करें..?
ऐसे में बजाए इसके कि बिहार के मुख्यमंत्री होने के नाते नीतिश इस हादसे के दोषियों को कड़ी सजा दिलाने और भविष्य नें ऐसे हादसे न होना ऐसा सुनिश्चित करने की ओर कड़े कदम उठाते...नीतिश ने बच्चों की मौत का ठीकरा भाजपा और लालू की राजद के सिर फोड़ने में देर नहीं की..!
क्या सुशासन बाबू आपसे तो ऐसी उम्मीद नहीं थी। सत्ता से दूर बैठे विपक्ष को तो माना सरकार पर निशाना साधने का मौका मिल गया है लेकिन आप तो प्रदेश के मुखिया हो, बिहारियों के हक के लिए दिल्ली में हुंकार भरते हो लेकिन अपने ही प्रदेश के 23 बच्चों की मौत पर आपका दिल नहीं पसीजता..! माना आप सियासत के मंझे हुए खिलाड़ी हैं लेकिन मासूमों की मौत पर तो कम से कम आपसे सियासत की उम्मीद नहीं थी..!
वैसे दोष आपका भी नहीं है नीतिश बाबू..! राजनीति चीज ही ऐसी है कि यहां संवेदनाएं मायने नहीं रखती, दूसरों का दुख दर्द मायने नहीं रखता, मायने रखती है तो बस सत्ता..! सत्ता पाने के लिए, विरोधी को सत्ता से बेदखल करने के लिए फिर चाहे लाशों पर राजनीतिक रोटियां ही क्यों न सेंकनी पड़े, आप जैसे लोग इससे भी परहेज नहीं करते..! बिहार में भी तो यही हो रहा है विपक्षी दल भाजपा और राजद भी यही कर रहे हैं और सत्ता में काबिज आप भी..!
उन मां बाप के दर्द को शायद आप में से कोई नहीं समझ पाएगा जिन्होंने अपने हाथों से अपने कलेजे के टुकड़े को जमीन में दफन कर दिया..! (जरुर पढ़ें- उसे भूख से डर लगता था..!)
समझोगे भी कैसे..? उनमें से कोई आपका अपना नहीं था न..! समझ पाते तो शायद कम से कम मासूमों की मौत पर तो बिहार में सियासत नहीं हो रही होती..!


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सोमवार, 22 जुलाई 2013

क्या शिवराज बनना चाहते हैं पीएम..!

भाजपा मोदी के नाम पर इतरा रही है...भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह मोदी की तारीफ करते नहीं अघा रहे हैं। 2014 में मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने के साथ ही पीएम के रुप में मोदी की ताजपोशी का दम भर रहे हैं लेकिन चुनाव की देहरी पर खड़े भाजपा शासित मध्य प्रदेश में भाजपा की जन आशीर्वाद यात्रा में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने मोदी की तस्वीर लगाने से तक परहेज किया है। जन आशीर्वाद यात्रा से जुड़े पोस्टर, बैनर, होर्डिंग से नरेन्द्र मोदी गायब हैं जबकि पार्टी के तमाम बड़े नेताओं की मुस्कुराती हुई तस्वीरें साथ नजर आ रही हैं।
2014 में मोदी के सहारे अपनी नैया पार लगाने के सपने देख रही भाजपा में कांग्रेस से बड़ी चुनौती अपनों से निपटने की होगी जो शायद भाजपा में मोदी के बढ़ते कद को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं..! मोदी के नाम पर आडवाणी की नाराजगी के बाद भाजपा के कई और नेताओं ने मोदी के नाम पर सहमति नहीं जताई, यहां तक कि एनडीए का कुनबा भी बिखर गया और जदयू ने अपनी राहें जुदा कर लीं लेकिन इसके बाद भी भाजपा मोदी के नाम पर आगे बढ़ती रही। मोदी को 2014 के चुनाव अभियान कमेटी का चेयरमैन बना दिया गया...राजनाथ सिंह पीएम के रुप में ईशारों ईशारों में कोई बार मोदी का नाम ले चुके हैं..!
राजनाथ सिंह बार बार कहते हैं कि मोदी भाजपा का सबसे ज्यादा लोकप्रिय चेहरा है लेकिन इसके बाद भी मध्य प्रदेश में सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए जन आशीर्वाद यात्रा निकाल रहे शिवराज सिंह चौहान ने मोदी को तरजीह देना जरूरी नहीं समझा..! जबकि ग्वालियर में आडवाणी के श्रीमुख से अपनी तारीफ सुनने के बाद खुद शिवराज सिंह ने ये कहा था कि मोदी, रमन सिंह और उनमें से वे तीसरे नंबर हैं जबकि मोदी नंबर एक पर..! लेकिन कुछ ही दिनों में ऐसा क्या हो गया कि मोदी को नंबर एक बताने वाले शिवराज की जन आशीर्वाद यात्रा के पोस्टर से तक मोदी गायब हैं..? (जरुर पढ़ें- मोदी- ये राह नहीं आसां)
महत्वकांक्षाएं हर किसी की होती हैं ऐसे में पीएम की कुर्सी को लेकर क्या शिवराज की महत्वकांक्षा तो नहीं जाग गयी..? क्या शिवराज को ये तो नहीं लगने लगा है कि मोदी भी तो उनकी तरह ही एक राज्य के मुख्यमंत्री हैं ऐसे मे अगर मोदी 2014 में पीएम पद के उम्मीदवार की दौड़ में शामिल हो सकते हैं तो वह क्यों नहीं..? आखिर कौन नहीं चाहेगा कि मौका मिलने पर राजनीति के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचा जाए..? (पढ़ें- मोदी, नीतीश और शिवराज..!)
इस बात से इसलिए भी इंकार नहीं किया जा सकता क्योंकि जनआशीर्वाद यात्रा के पोस्टर से मोदी का चेहरा गायब होने के सवाल पर शिवराज सिंह  का जवाब था कि ये स्थानीय यात्रा है, जबकि इस स्थानीय यात्रा में भाजपा के कई दूसरे राष्ट्रीय नेताओं की तस्वीर पोस्टर में शामिल थी..! लेकिन इस पर शिवराज कुछ नहीं बोले..!
बहरहाल ये राजनीति है...यहां कब, क्या हो जाए कहा नहीं जा सकता..? कौन, कब किसके साथ हो जाए..? कौन, कब किसके विरोध में हो जाए..? फिलहाल तो 2014 फतह करने की तैयारी में जुटी भाजपा के साथ ही नरेन्द्र मोदी के लिए अपनी ही पार्टी में एक के बाद एक सामने आ रही चुनौतियां उनकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा बनती दिखाई दे रही हैं..! ऐसे में देखना रोचक होगा कि मोदी कैसे अपनों से मिल रही चुनौतियों का सामना करते हैं..?


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शनिवार, 20 जुलाई 2013

मैं सीएम हूं...लेकिन मेरा काम क्या है..?

उत्तराखंड में इंद्र देवता कुछ ज्यादा ही मेहरबान हैं, लेकिन इंद्र देवता की ये मेहरबानी उत्तराखंड के खासकर दुर्गम पहाड़ी इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए किसी आफत से कम साबित नहीं हो रही है। लगातार हो रही बरसात के चलते लोग एक अनजाने डर के साए में जीने को मजबूर हैं। खासकर रात के वक्त हो रही बारिश के उफनती नदियों के शोर और दरकते पहाड़ों की आवाज़ लोगों की नींद उड़ाने के लिए काफी हैं..!
16-17 जून को केदारनाथ में आई भीषण त्रासदी की याद मात्र ही पूरे बदन में सिहरन पैदा कर देती है कि कहीं फिर ऐसी तबाही की दास्तां उत्तराखंड के किसी हिस्से में न लिख जाए..! दरअसल तबाही की ये दास्तां लिखी तो खुद इंसानों ने ही थी लेकिन ये ऊपर वाले पर उनका अटूट विश्वास ही है कि देवभूमि के वाशिंदे ये सोचकर अपने मन को दिलासा देने की कोशिश कर रहे हैं कि शायद ईश्वर की यही मर्जी थी और नियती को भी यही मंजूर था..! (पढ़ें- ओ गंगा तुम, गंगा बहती हो क्यों..?)
त्रासदी में अपनी आखों के सामने अपनों को खोने के बाद भी, पलभर में जीवनभर की पूंजी तबाह हो जाने के बाद भी ईश्वर पर से भरोसा नहीं डिगा है। मौत के मुंह से बाहर निकल आने पर ऊपरवाले का शुक्रिया अदा कर रहे लोगों को अब जिंदा रहने के लिए शासन प्रशासन से मदद की पूरी उम्मीद थी, लेकिन भीषण विपदा के समय में भी सरकारी उदासीनता ने इनके दर्द को कम करने की बजाए बढ़ाने का ही काम किया..!
आपदा प्रभावित इलाकों में मीडिया के लोग पहुंच गए, स्वंय सेवी संगठन के लोग पहुंच गए लेकिन सैंकडों इलाके ऐसे हैं जहां पर सरकार का कोई नुमाइंदा आज तक नहीं पहुंचा है, मदद और राहत सामग्री पहुंचना तो बहुत दूर की बात है..!
ऐसा नहीं है कि सरकार के पास पैसा नहीं है, संसाधनों की कमी है लेकिन इसके बाद भी प्रभावितों तक न तो मदद पहुंच पा रही है और न ही राहत सामग्री। सरकारी पैसा मीडिया पर नकारात्मक रिपोर्टिंग न करने के लिए खर्च किया जा रहा है (पढ़ें- वाह बहुगुणा ! हजारों मर गए, अब याद आया कर्तव्य..!) तो देश के अलग अलग हिस्सों से प्रभावितों के लिए पहुंच रही राहत सामग्री ट्रकों में और गोदामों में पड़े पड़े सड़ रही है..!
जो राहत सामग्री प्रभावितों तक पहुंच भी रही है तो उसे पाने के लिए ग्रामीणों को कई-कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ रहा है जबकि आपदा प्रभावित क्षेत्रों में कैंप करने के नाम पर जिम्मेदार अधिकारी होटलों में आराम फरमा रहे हैं और उत्तराखंड के वो दिल्ली वाले मुख्यमंत्री..! और उनके कैबिनेट सहयोगी हवाई दौरों की रसम निभा रहे हैं..!
इसका ये मतलब बिल्कुल नहीं कि शासन प्रशासन ने कुछ नहीं किया लेकिन जिस तेजी से सरकारी मशीनरी को काम करना चाहिए था वो तेजी कहीं भी नहीं दिखाई दी और न ही सरकार के मुखिया प्रभावितों के दुख को बांट पाए..! बहुगुणा तो आपदा प्रभावित एक क्षेत्र का दौरे पर वहां के लोगों से ये कहकर वापस लौट आए कि अगले दो महीने तक आपको अपनी रक्षा खुद करनी है। अरे बहुगुणा साहब माना आसमान से आफत बरस रही है, परिस्थितियां विपरीत हैं लेकिन इतनी विपरीत भी नहीं कि आप प्रभावितों को उनके हाल पर छोड़ दें..!
बहुगुणा साहब आप और आपके मंत्री, विधायक आपदा प्रभावित क्षेत्रों में जाकर बारी बारी से सिर्फ एक एक सप्ताह तक कैंप करते तो प्रशासनिक अमला भी सक्रिय होता और शायद राहत कार्य में भी तेजी आती और आपदा के करीब एक महीने बाद की तस्वीर कुछ और होती लेकिन आप और आपके मंत्री देहरादून का मोह नहीं छोड़ पाए और जिम्मेदार अधिकारी जिला मुख्यालय से बाहर नहीं निकल पाए..! नतीजा सबके सामने है स्थिति आज भी वैसी ही है या कहें कि पहले से भी बदतर है, अपना सब कुछ गंवा चुके लोगों के पास न तो सिर छिपाने के लिए छत का जुगाड़ है और न ही पेट की भूख मिटाने का इंतजाम..! जबकि इन लोगों के नाम पर  सरकार के पास फिलहाल न तो पैसे की कोई कमी है और न ही राहत सामग्री की..!

शायद यही इस राज्य का दुर्भाग्य है कि जिन लोगों ने उत्तर प्रदेश से अलग उत्तराखंड राज्य निर्माण की लड़ाई लड़ी, जिनके विकास के नाम पर इस राज्य का गठन हुआ है उन पर आई विपदा के वक्त उनके द्वारा चुनी सरकार के नुमाईंदे ही अपनी जिम्मेदारियों से मुहं मोड़ते दिखाई दे रहे हैं या कहें कि जिस कुर्सी पर वे बैठे हैं शायद उन्हें पता ही नहीं कि इस कुर्सी पर बैठने वाले का क्या काम है..? क्या जिम्मेदारियां हैं..?  (जरुर पढ़ें- एमपी नहीं मुख्यमंत्री कहो...)

गुरुवार, 18 जुलाई 2013

उसे भूख से डर लगता था..!


अगर किसी के पास खाने के लिए कुछ नहीं है...खाना खरीदने के लिए तक पैसे नहीं हैं तो फिर उसके लिए भूख से बड़ा डर और कोई नहीं हो सकता..! क्योंकि जब भूख आती है तो एक बार तो कोई भी उसे नजरअंदाज कर सकता है लेकिन कब तक..? ये कमबख्त भूख नहीं मानती और लौट लौट कर आ जाती है..! समय रहते अगर भूख को शांत नहीं किया तो ये भूख भूखे को ही खा जाती है..!
इन पंक्तियों से शायद ये बात बेहतर तरीके से समझ आ जाए..!
उसे भूख से डर लगता था
भूख आती थी वह उसे मार देता था
भूख जिंदा हो जाती थी
वह फिर उसे मार देता था
भूख लौट लौट कर आ जाती थी
वह उसे उलट उलट कर मार देता था
एक दिन भूख दबे पांव आई
और उसे...खा गई

केन्द्र सरकार ने इसी भूख के डर के बहाने गरीब बच्चों को स्कूल से जोडने की पहल की और मिड डे मील योजना की शुरुआत की। सरकार की योजना थी कि एक वक्त की भूख मिटाने के लिए ही सही कम से कम इसी बहाने गरीब परिवार अपने बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल तो भेजेंगे लेकिन बिहार के छपरा में मिड डे मील खाने से मौत के मुंह मे समाए बच्चों के परिजन शायद अब ये सोच रहे होंगे कि उनके जिगर का टुकड़ा स्कूल न जाता न सही लेकिन कम से कम आज उनके पास तो होता..! खुद एक रोटी कम खाकर अपने बच्चों का पेट भर देते लेकिन कम से कम वो उन्हें हमेशा के लिए छोड़कर तो नहीं जाता..!
सरकारी लापरवाही एक बार फिर से मासूमों की जान पर भारी पड़ गयी और करीब दो दर्जन बच्चों को इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी..! बात सिर्फ बिहार के छपरा तक ही सीमित होती तो ठीक था लेकिन देशभर के अलग अलग राज्यों में कई स्कूलों में आए दिन मिड मील खाकर बच्चों का बीमार पड़ना, मिड डे मील में मरी हुई छिपकली, कॉकरोच, चूहे का मिलना साबित करता है कि जिम्मेदार लोग अपने काम को लेकर कितने संजीदा हैं और कितनी ईमानदारी से अपने काम को अंजाम दे रहे हैं।
हर बार इस तरह की घटनाओं पर केन्द्र व राज्य सरकारें ये कहकर अपना पल्ला झाड़ लेती हैं कि वे दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे और कोशिश करेंगे कि भविष्य में ऐसे हादसे फिर कभी न हों लेकिन इसके बाद भी एक महीने, दो महीने, तीन महीने, छह महीने तो सालभर के बाद किसी ऐसे ही हादसे की ख़बर आती है..!
शायद यही सरकारी योजनाओं को सच है जिसकी कीमत आए दिन उस गरीब को ही चुकानी पड़ती है जिनके नाम पर ये योजनाएं शुरु की जाती हैं..! जरुरतमंदों को इन योजनाओं को कितना लाभ मिलता है इसकी हकीकत आए दिन टीवी चैनलों और समाचार पत्रों की सुर्खियों में दिखाई देती हैं..! रही सह कसर समय समय पर कैग की उन रिपोर्ट में पूरी हो जाती है जो इस सच को उजागर करती है कि योजनाओं का कितना लाभ जरुरतमंदों को मिला और कितना लाभ नेताओं के साथ ही सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को..?
इन्हीं योजनाओं को बड़े बड़े पोस्टरों – बैनरों में उकेर कर चुनाव के वक्त जनता से वोट मांगे जाते हैं..! जनता से जनता के लिए ही चुनाव जीतने पर ऐसी ही भारी भरकम बजट वाली योजनाएं शुरु करने का वादा किया जाता है लेकिन इन योजनाओं के नाम पर कितनों के वारे न्यारे होते हैं शायद ये बताने की जरुरत नहीं है..!
बिहार के छपरा में दिल दहला देने वाले हादसे के बाद भी केन्द्र और राज्य सरकारें जागेंगी या फिर भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों-कर्मचारियों की नींद टूटेगी और सरकारी लापरवाही फिर किसी पर भारी नहीं पड़ेगी इसकी उम्मीद कम ही है..!
केन्द्र और राज्य सरकार की नजरों में शायद यही सुशासन है...शायद यही असली भारत निर्माण है..?


deepaktiwari555@gmail.com

मंगलवार, 16 जुलाई 2013

लो जी, दिग्विजय सिंह बन गए हिंदू !

कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के ताजा ब्लॉग को लेकर कोई कुछ कहे लेकिन दिग्विजय सिंह के इस ब्लॉग से कम से कम देश की जनता का सामान्य ज्ञान तो बढ़ ही गया कि दिग्विजय सिंह भी वास्तव में हिंदू हैं..! यहां तक तो ठीक था लेकिन ये समझ में नहीं आया कि आखिर दिग्विजय सिंह को ये बताने की जरुरत क्यों पड़ी कि वे हिंदू है..! उन्होंने द्वारका के शंकराचार्य से दीक्षा ली है..!  वे एकादशी का व्रत रखते हैं..! मध्य प्रदेश के राघौगढ़ स्थित उनके घर  में नौ मंदिर हैं और वे रोज आधा घंटा पूजा करते हैं..!
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि दिग्विजय सिंह अल्पसंख्यकों खासकर मुस्लिमों के सबसे बड़े पैरोकार माने जाते हैं और संघ और भाजपा के बहाने हिंदुओं को गाली बकते नहीं अघाते फिर भी आखिर क्यों उस दिग्विजय सिंह को सामने आकर आज ये कहने की जरुरत पड़ रही है कि वे भी एक हिंदू हैं..?
इसको लेकर अलग-अलग लोगों को अलग-अलग राय हो सकती है लेकिन इसको अगर राजनीतिक चश्मे से देखें तो समझ में आता है कि दिग्विजय सिंह ने ऐसे ही टाईम पास करने के लिए ये ब्लॉग नहीं लिखा बल्कि इसके पीछे भी 22014 के आम चुनाव को ध्यान में रखते हुए एक बड़ी राजनीतिक वजह है। दिग्विजय सिंह वैसे तो कांग्रेस के महासचिव हैं लेकिन इसके बाद भी वे काम कांग्रेस प्रवक्ता का करते हैं और करते कुछ इस तरह से हैं कि उनकी बात कांग्रेस का आधिकारिक बयान भी नहीं बनता और कांग्रेस जो कहना चाहती है वो दिग्विजय के माध्यम से लोगों के बीच पहुंचा देती है। फिर भले ही कांग्रेस के अधिकृत प्रवक्ता दिग्गी के बयान को उनकी निजि राय क्यों न ठहरा दें..?
भाजपा ने अपने वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी को किनारे करके गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी को चुनाव अभियान समिति का चेयरमैन बनाकर एक तरह से ये संदेश दे दिया है कि 2014 के चुनाव में मोदी के चेहरे पर ही भाजपा चुनाव लड़ेगी। इससे ये भी साफ होता है कि भाजपा हिंदुत्व के एजेंडे पर ही 2014 में केन्द्र की सत्ता हासिल करने का ख्वाब देख रही है। भाजपा के यूपी प्रभारी अमित शाह का अयोध्या पहुंचकर राम मंदिर निर्माण पर बयान, राजनाथ सिंह का इस बात को दोहराना, मोदी का खुद को राष्ट्रवादी हिंदू बताना ये सब भाजपा के हिंदुत्व के एजेंडे पर आगे बढ़ने की ख़बरों पर मुहर लगाते हैं..!
दिग्विजय सिंह का खुद को हिंदू साबित करने की कोशिश करना क्या दिग्विजय सिंह की इस चिंता को जाहिर नहीं करता कि दिग्विजय सिंह अब खुद की हिंदू विरोधी नेता की छवि से बाहर निकलना चाहते हैं..!
क्या दिग्गी की ये कोशिश इस बात को पुख्ता नहीं करती कि मोदी और राम मंदिर के नाम पर हिंदुत्व के एजेंडे पर जोर शोर से आगे बढ़ रही भाजपा की ओर बड़ी संख्या में हिंदू वोटरों का ध्रुवीकरण हो सकता है और कांग्रेस को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है..!  
शायद इसलिए ही दिग्गी ने हिंदुओं के साथ भावनात्मक रुप से जुड़ने के लिए ये बताने की कोशिश की कि वे खुद एक कर्मकांडी हिंदू हैं और हिंदू विरोधी तो बिल्कुल भी नहीं..! जिस तरह से दिग्विजय सिंह ने संघ और भाजपा पर हिंदुओं को गुमराह करने का आरोप लगाया उससे क्या ये जाहिर नहीं होता कि वे मोदी और राम मंदिर के नाम पर भाजपा की ओर हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण को रोकना चाहते हैं..!
दिग्विजय सिंह कांग्रेस में वो शख्स हैं जो पार्टी की उस बात को, राय को भी बड़ी आसानी से जनता के बीच पहुंचाकर विरोधियों की मुश्किल बढ़ा देते हैं, जिसे जनता के बीच कहने की हिम्मत शायद पार्टी के किसी नेता में नहीं है और पार्टी सार्वजनिक तौर पर आधिकारिक रुप से ऐसा कहना भी नहीं चाहती..! तो फिर क्यों न दिग्विजय का खुद को हिंदू साबित करने की कोशिश करने को यूपीए की हैट्रिक का ख्वाब देख रही कांग्रेस से जोड़कर देखा जाए..? जिसे शायद मन ही मन ये डर सता रहा है कि कहीं हिंदुत्व के झंडे को थामकर भाजपा यूपीए की हैट्रिक के ख्वाब पर ग्रहण न लगा दे..!
ये सियासत हैं, यहां तो नेताओं के हर एक शब्द के पीछे भी एक सियासी चाल छिपी होती है, जो न सिर्फ जनता को खुद से जोड़ने की एक कोशिश होती है बल्कि अपने विरोधियों को चित्त करने का सटीक जरिया भी ऐसे में 2014 के चुनाव के करीब आने के साथ ही चाहे वो मोदी हो या फिर दिग्विजय सिंह या राहुल गांधी हर किसी का एक एक बोल अपने विरोधियों को चित्त करने और जनता के दिल में जगह बनाने वाला ही होगा।
बहरहाल फैसला तो जनता को ही करना है लेकिन इसके लिए आमजन को नेताओं की इस बोली को समझना होगा कि कौन अपनी मीठी बोली से उनको बहका रहा है और कौन वास्तव में उनकी चिंता करने वाला है..? हालांकि इन नेताओं से बहुत ज्यादा उम्मीदें तो नहीं हैं लेकिन फिर भी बेहतर विकल्प को चुनने की जिम्मेदारी को जनता के कंधे पर ही है..!

deepaktiwari555@gmail.com

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

और नेतानगरी में छाया मातम..!

हमारे देश के नेताओं पर लगता है अदालत की महादशा शुरु हो गयी है। पहले सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक इतिहास वाले दागी नेताओं पर लगाम कसने की ओर कदम बढ़ाते हुए फैसला दिया कि किसी भी मामले में दो या दो साल से ज्यादा की सजा होने पर सांसद और विधायक की सदस्यता खुद ब खुद समाप्त हो जाएगी तो यूपी हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश में जातीय आधारित रैलियों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाकर उन राजनीतिक दलों की नींद उड़ा दी है जो जाति के नाम पर लोगों को बांटकर सत्तासीन होने का ख़्वाब देख रहे थे..!
नेतागण इस सदमे से उबरे भी नहीं थे कि सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के उस फैसले पर अपनी मुहर लगा दी जिसमें पटना हाईकोर्ट ने जेल में जाते ही चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी यानि कि कोई भी व्यक्ति अब जेल जाने के बाद चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो जाएगा।
चुनाव करीब आते ही सत्ता पर नजरें गढ़ाए बैठे जिन नेताओं के चेहरे पर खुशी दिखाई देती थी वो सर्वोच्च न्यायलय और यूपी और पटना उच्च न्यायलय के फैसले के बाद अब अब काफूर होती दिखाई दे रही है..! नेता हैरान हैं...परेशान हैं कि करें तो क्या करें..?
अदालत के फैसले के सामने नेता न तो खुलकर कुछ बोल पा रहे हैं और न ही इसका विरोध कर पा रहे हैं..!
कुछ अदालत के आदेश को पढ़ने के बाद ही कुछ कहने की बात कर रहे हैं तो कुछ बेमन से अदालत के फैसले का स्वागत करते दिखाई दे रहे हैं..! (पढ़ें- नेता जी, दाग अच्छे हैं..!)
संसद और राज्य विधानसभाओं में जनता से जुड़े मुद्दों पर मुंह फेरने वाले और अपने हक के सवाल पर, अपने वेतन भत्तों को बढ़ाने के नाम पर एकजुट होने वाले अधिकतर नेताओं को सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद अब अपना भविष्य अंधकारमय नजर आने लगा है, क्योंकि हमारे अधिकतर माननीय अपनी सफेद पोशाक के पीछे हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण, बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों के साथ ही भ्रष्टाचार और घोटालों की कालिख को समेटे हुए हैं..!
ये छोड़िए, ये लोग तो लोगों को उनकी जाति के आधार पर बांटकर राज करने में भी गुरेज नहीं करते। देश के सबसे बड़े प्रदेश यूपी में तो जातीय समीकरण को अपने अपने पक्ष में फिट करने के लिए राजनीतिक दल क्या कुछ नहीं करते..? दलितों के नाम पर राज करने वाले बसपा सुप्रीमो मायावती भी ब्राह्मण सम्मेलन का आयोजन करती हैं तो समाजवादी पार्टी जिसका नाम ही समाजवाद है खास वोटों को अपने पक्ष में करने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ती..! ऐसा ही हाल राज्य में भाजपा और कांग्रेस के साथ ही दूसरे राजनीतिक दलों का भी है..! लेकिन जातीय रैलियों पर रोक के इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के फैसले के बाद अब सबकी सिट्टी पिट्टी गुम है। अब राजनीतिक दल मुश्किल में हैं कि करें तो क्या करें..? कैसे किसी खास जाति के मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए कोई नया रास्ता तैयार करें..?
बहरहाल अदालत के फैसले से नेतानगरी में भले ही मातम छाया हुआ है पर नेताओं की कारगुजारियों से अजीज आ चुकी देश की जनता में अदालत के इन फैसलों से खुशी की लहर है लेकिन इसका असली मजा तो तब है जब देश की जनता अपने वोट की कीमत को समझे और चुनावों में भी ऐसे नेताओं को सबक सिखाए..!


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बुधवार, 10 जुलाई 2013

नेता जी, दाग अच्छे हैं..!

अधिकतर मामलों में सबूतों के अभाव में नेताओं को कोर्ट से राहत मिलते तो कई बार देखा था लेकिन पहली बार सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से नेताओं की नींद उड़ते देखी है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय का फैसला होने के कारण चाहकर भी नेता इस फैसले के खिलाफ कुछ नहीं बोल सकते लेकिन जिन नेताओं पर छोटा या बड़ा कोई भी मामला अदालत में लंबित है उनके दिल का दर्द उनसे बेहतर और कौन समझ सकता है..?
हमारे देश में आपराधिक रिकार्ड वाले नेताओं की फेरहिस्त काफी लंबी है। हत्या, हत्या का प्रयास, लूट, अपहरण के साथ भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोपों से घिरे नेताओं की संख्या काफी ज्यादा है औऱ हैरत की बात तो ये है कि इसके बाद भी या तो वे विधायक हैं या फिर सांसद..! सबसे बड़ी बात तो ये कि इनके लिए विधानसभा और लोकसभा चुनाव में टिकट पाना कोई मुश्किल काम नहीं है। चुनाव में ईमानदार और स्वच्छ छवि के नेताओं को टिकट देने का दावा करने वाले हमारे देश के लगभग सभी छोटे बड़े राजनीतिक दल आपराधिक इतिहास वाले नेताओं को अपनी पार्टी का उम्मीदवार बनाने में जरा भी नहीं हिचकते..!
ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला कि किसी भी मामले में दो या दो से अधिक वर्ष की सजा होने पर सांसद और विधायक की सदस्यता रद्द हो जाएगी और वे चुनाव भी नहीं लड़ पाएंगे अपने आप में एक ऐतिहासिक फैसला है। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से न सिर्फ राजनीति में आपराधिक इतिहास वाले नेताओं की घुसपैठ पर रोक लगेगी बल्कि किसी भी अपराध को करने या उसमें किसी भी तरह से शामिल होने से पहले नेता सौ बार सोचेंगे..!
अभी तक किसी भी मामले पर सजा होने पर नेतागण जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8(4) को सुरक्षा कवच बनाकर फैसले के खिलाफ अपील लंबित होने पर अपने पद पर बने रहते थे लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस सुरक्ष कवच को ही खत्म कर दिया है जिसके बाद दो या दो साल से ज्यादा की सजा होने पर सांसद और विधायक की सदस्यता रद्द हो जाएगी।   
आपराधिक इतिहास वाले नेताओं की देश के छोटे बड़े सभी राजनीतिक दलों में कितनी पैठ है इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि मई 2009 की नेशनल इलेक्शन वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक 15वीं लोकसभा में 150 दागी सांसद हैं जिनमें से 73 के खिलाफ गंभीर आरोप हैं।
वहीं राज्यों की बात करें तो www.myneta.info के मुताबिक दागी विधायकों के मामले में झारखंड देश में सबसे अव्वल है, जहां पर कुल विधायकों में से 72 फीसदी (55 विधायक) विधायकों के खिलाफ कोई न कोई आपराधिक मामला चल रहा है। 55 में से भी 24 विधायकों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं।
बिहार इस सूची में दूसरे नंबर पर है जहां पर 58 फीसदी (140 विधायक) विधायक दागी हैं जिनमें से भी 84 विधायकों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं।
महाराष्ट्र इस फेरहिस्त में 51 फीसदी (146 विधायक) विधायकों के साथ तीसरे नंबर है जिनमें से 56 विधायकों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं।
विधायकों की संख्या के साथ चौथे नंबर पर उत्तर प्रदेश विराजमान है, जहां दागी विधायकों का प्रतिशत 47(189 विधायक) है, जिसमें से 98 विधायकों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं।
अन्य राज्यों में भी हालात कुछ जुदा नहीं है और बड़ी संख्या में दागी विधायक राज्य की विधानसभाओं की शोभा बढ़ा रहे हैं। सिर्फ मणिपुर ही इकलौता ऐसा राज्य है जहां पर किसी भी विधायक के खिलाफ कोई भी आपराधिक मामला नहीं है और सभी 60 विधायक बेदाग हैं।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद जाहिर है, ऐसे नेताओं के माथे पर बल पड़ना लाजिमी है। कोर्ट ने अपने फैसले से न सिर्फ देश की संसद और विधानसभाओं को साफ करने की ओर कदम उठाया है बल्कि कोर्ट का ये फैसले उन नेताओं और राजनीतिक दलों के मुंह पर एक करारा तमाचा है जो ये सोचते हैं कि पैसे और बाहुबल के आधार पर चुनाव जीतकर वे संसद या विधानसभा में आसानी से पहुंच जाएंगे और अपनी मनमानी करेंगे..!
देश के सर्वोच्च न्यायालय की अगर बात करें तो सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों की संख्या 60 हजार के करीब है जबकि वर्ष 2011 तक देश की विभिन्न उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या करीब 43 लाख 22 हजार से अधिक हैं। इससे देश के विभिन्न अदालतों में लंबित मामलों की संख्या का अंदाजा लगाया जा सकता है। (पढ़ें- इंसाफ- मौत के बाद..!)
ऐसे में अब उम्मीद है कि दागी सांसदों और विधायकों के संबंध में सर्वोच्च न्यायलय के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद देश की विभिन्न अदालतों में लंबित मामलों के तेजी से निपटारे को लेकर भी सर्वोच्च न्यायालय कोई सकारात्मक कदम उठाए ताकि अदालत का ये ऐतिहासिक फैसला जल्द सार्थक हो और देश की संसद और राज्य विधानसभाओं से दागी नेताओं का पत्ता साफ हो।

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मंगलवार, 9 जुलाई 2013

लोकार्पण करने वाले खुद पहुंच गए हवालात

नाम- राघवजी, उम्र-79 वर्ष, चेहरे पर सादगी लेकिन कर्म ऐसे कि शर्म भी शर्म से आंखें चुराने पर मजबूर हो जाए..! मोटे चश्मे के पीछे से झांकती शैतान निगाहें पता नहीं कब से बंद कमरे में अपनी हवस की भूख को शांत कर कितनों का जीवन नर्क करने पर तुली हुई थी..! जाने कितने वर्षों से अपने परिवार के साथ ही लोगों की आखों में राघव जी धूल झोंक कर एक सज्जन पुरुष का जीवन जीने का ढोंग रच रहे थे लेकिन राघवजी की ये करतूत तीसरी आंख से नहीं बच पाई और तीसरी आंख ने वो राज खोला कि सारी सज्जनता, सारी नैतिकता धरी की धरी रह गयी और 79 वर्ष की अवस्था में राघवजी का जो घिनौना चेहरा सामने आया वो किसी को भी शर्म से पानी पानी करने के लिए काफी है..!  (पढ़ें- ये हैं राजनीति के मर्यादा पुरुष..!)
कहते हैं इंसान को अपने कर्मों का फल जीते जी ही भगुतना पड़ता है..! उम्र के इस पड़ाव में राघवजी की गिरफ्तारी कम से कम इस विश्वास को तो और दृढ़ करती ही है। वक्त कैसे बदलता है, इसका इससे बढ़िया उदाहरण और क्या हो सकता है कि जिस हबीबगंज थाने का लोकार्पण राघवजी ने किया था उसी थाने में न सिर्फ राघवजी के खिलाफ एफआईआर लिखी गई बल्कि हबीबगंज थाना पुलिस ने ही राघवजी को हवालात तक भी पहुंचा दिया।
भोपाल में पत्रकारिता के दैरान चार साल पहले मैं खुद हबीबगंज थाने के लोकार्पण समारोह में मौजूद था जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और राघवजी ने थाने का लोकार्पाण किया लेकिन मैं क्या वहां मौजूद किसी शख्स ने विशेषकर राघवजी ने ये नहीं सोचा होगा कि भविष्य में वक्त ऐसी करवट लेगा कि हबीबगंज थाने में ही उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज होगी और जो हबीबगंज थाना पुलिस उनको मंत्री रहते हुए सलाम ठोक रही थी वही पुलिस उनको गिरफ्तार करेगी। 
ये भी वक्त का ही तकाजा है कि जिस राघवजी के साथ इस घटनाक्रम से पहले तक उनकी पार्टी कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रहती थी उसने भी राघवजी के कुकर्म की सीडी सामने आने के बाद राघवजी से किनारा कर लिया है।
आखिर चाल, चरित्र और चेहरे की बात करने वाली भारतीय जनता पार्टी के चेहरे पर उनके ही वयोवृद्ध नेता कालिख पोत दें तो सवाल उठने लाजिमी ही हैं..! ऐसे में भाजपा ने राघवजी से किनारा करने में जरा सी भी देर नहीं की लेकिन जो राघव जी कई दशकों से भाजपा के साथ जुड़े हुए थे उनसे एक झटके में किनारा करने से भाजपा का दामन तो साफ होगा नहीं..! और न ही वे सवाल शांत होंगे जो राघवजी की कुकर्म कथा ने भाजपा पर भी खड़े किए हैं..!
वैसे भी चुनाव की देहरी पर खड़े मध्य प्रदेश की सत्ता से 10 वर्षों से दूर कांग्रेस हर हाल में सत्ता हासिल करना चाहती है ऐसे में राघवजी की कुकर्म कथा तो कांग्रेस के लिए चुनाव में किसी संजीवनी से कम नहीं है और कांग्रेस ने भी इसको भुनाने की पूरी तैयारी कर ली है जबकि भाजपा के पास राघवजी की इस कुकर्म कथा पर उठ रहे सवालों का कोई जवाब नहीं है..!

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रविवार, 7 जुलाई 2013

अब और बर्दाश्त (नहीं) करेंगे..!

बोधगया के महाबोधी मंदिर पर आतंकी हमले के बाद हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं कि ऐसे हमले बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे..! आतंकी एक के बाद एक आतंकी हमले को अंजाम देते जाते हैं और हमारी सरकार के मुखिया हर बार ये कहते हैं कि देश में आतंकी हमले बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी। समझ में नहीं आता कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए आखिर इस बर्दाश्त की सीमा कहां तक है..?
मनमोहन सिंह बर्दाश्त न करने की बात तो हर बार कहते हैं लेकिन प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद से ही वे सिर्फ बर्दाश्त ही कर रहे हैं और कुछ नहीं..! देश के दुश्मन भी इस बात को अच्छी तरह समझ गए हैं कि भारत सिर्फ बर्दाश्त ही कर सकता है और कुछ करने का दम भारत में नहीं है..! शायद यही वजह है कि आतंकियों के हौसले बुलंद हैं और वे एक के बाद एक कभी मुंबई में तो कभी पुणे में, कभी बंगलुरु में तो कभी बिहार में आतंकी हमलों को अंजाम देकर निर्दोष भारतीयों को मौत के घाट उतार रहे हैं..!
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मजबूरी तो पूरा देश समझता है कि आखिर क्यों वे हर चीज बर्दाश्त न करने की बात तो कहते हैं लेकिन फिर भी चुपचाप बर्दाश्त करते रहते हैं..! वैसे भी प्रधानमंत्री की कुर्सी ऐसे ही थोड़े न मिल जाती है...उसके लिए तो बर्दाश्त करने की क्षमता होनी चाहिए..! जो कि मनमोहन सिंह में कूट कूट कर भरी हुई है..! लेकिन मनमोहन सिंह को कौन समझाए कि उनको पीएम की कुर्सी दिलाने वाली उनकी ये अनोखी काबिलियत देश पर भारी पड़ी रही है और आए दिन निर्दोष भारतीयों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा रहा है..!
हैरानी तो उस वक्त होती है जब इस तरह के आतंकी हमले होने की सूचना दिल्ली पुलिस के जरिए बिहार सरकार को पहले ही मिल जाती है लेकिन इसके बाद भी आतंकी बिहार के बोधगया में स्थित महाबोधी मंदिर में एक नहीं, दो नहीं पूरे एक दर्जन से ज्यादा बम आसानी से प्लांट कर अपने नापाक मंसूबों में कामयाब हो जाते हैं..! अंदाजा लगाया जा सकता है कि लोगों की सुरक्षा को लेकर सरकार कितनी गंभीर है..?
ये छोड़िए राज्य के डीजीपी अभयानंद महाबोधी मंदिर पर हुए धमाके की पूर्व सूचना के सवाल पर कहते हैं कि हर घटना से कुछ न कुछ सिखने को मिलता है..! सुन लिजिए ये कहना है राज्य के पुलिस प्रमुख का जिनका सोचना है कि कुछ सीखने के लिए ऐसी घटनाएं होना जरुरी है..! अब जनाब विस्फोट नहीं होंगे तो फिर बिहार पुलिस सबक कैसे लेगी..?
जब देश के प्रधानमंत्री कहते हैं बर्दाश्त (नहीं) करेंगे, बिहार के मुख्यमंत्री आतंकी हमले की सूचना के बाद भी मंदिर की सुरक्षा को लेकर कोई कारगर कदम नहीं उठाते और बिहार के ही पुलिस प्रमुख विस्फोट के बाद कहते हैं कि ऐसी घटनांओं से ही तो पुलिस कुछ सीखेगी..! फिर क्यों न आतंकी बेखौफ होकर एक के बाद धमाकों से भारत को दहलाते रहें..! जब हमारे प्रधानमंत्री बर्दाश्त न करके भी बर्दाश्त कर सकते हैं तो फिर आतंकी क्यों बर्दाश्त करें..? लेकिन असल सवाल तो ये है कि देश की जनता अपनी जान की कीमत पर आखिर कब तक ये सब बर्दाश्त करेगी..?


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