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शनिवार, 20 जुलाई 2013

मैं सीएम हूं...लेकिन मेरा काम क्या है..?

उत्तराखंड में इंद्र देवता कुछ ज्यादा ही मेहरबान हैं, लेकिन इंद्र देवता की ये मेहरबानी उत्तराखंड के खासकर दुर्गम पहाड़ी इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए किसी आफत से कम साबित नहीं हो रही है। लगातार हो रही बरसात के चलते लोग एक अनजाने डर के साए में जीने को मजबूर हैं। खासकर रात के वक्त हो रही बारिश के उफनती नदियों के शोर और दरकते पहाड़ों की आवाज़ लोगों की नींद उड़ाने के लिए काफी हैं..!
16-17 जून को केदारनाथ में आई भीषण त्रासदी की याद मात्र ही पूरे बदन में सिहरन पैदा कर देती है कि कहीं फिर ऐसी तबाही की दास्तां उत्तराखंड के किसी हिस्से में न लिख जाए..! दरअसल तबाही की ये दास्तां लिखी तो खुद इंसानों ने ही थी लेकिन ये ऊपर वाले पर उनका अटूट विश्वास ही है कि देवभूमि के वाशिंदे ये सोचकर अपने मन को दिलासा देने की कोशिश कर रहे हैं कि शायद ईश्वर की यही मर्जी थी और नियती को भी यही मंजूर था..! (पढ़ें- ओ गंगा तुम, गंगा बहती हो क्यों..?)
त्रासदी में अपनी आखों के सामने अपनों को खोने के बाद भी, पलभर में जीवनभर की पूंजी तबाह हो जाने के बाद भी ईश्वर पर से भरोसा नहीं डिगा है। मौत के मुंह से बाहर निकल आने पर ऊपरवाले का शुक्रिया अदा कर रहे लोगों को अब जिंदा रहने के लिए शासन प्रशासन से मदद की पूरी उम्मीद थी, लेकिन भीषण विपदा के समय में भी सरकारी उदासीनता ने इनके दर्द को कम करने की बजाए बढ़ाने का ही काम किया..!
आपदा प्रभावित इलाकों में मीडिया के लोग पहुंच गए, स्वंय सेवी संगठन के लोग पहुंच गए लेकिन सैंकडों इलाके ऐसे हैं जहां पर सरकार का कोई नुमाइंदा आज तक नहीं पहुंचा है, मदद और राहत सामग्री पहुंचना तो बहुत दूर की बात है..!
ऐसा नहीं है कि सरकार के पास पैसा नहीं है, संसाधनों की कमी है लेकिन इसके बाद भी प्रभावितों तक न तो मदद पहुंच पा रही है और न ही राहत सामग्री। सरकारी पैसा मीडिया पर नकारात्मक रिपोर्टिंग न करने के लिए खर्च किया जा रहा है (पढ़ें- वाह बहुगुणा ! हजारों मर गए, अब याद आया कर्तव्य..!) तो देश के अलग अलग हिस्सों से प्रभावितों के लिए पहुंच रही राहत सामग्री ट्रकों में और गोदामों में पड़े पड़े सड़ रही है..!
जो राहत सामग्री प्रभावितों तक पहुंच भी रही है तो उसे पाने के लिए ग्रामीणों को कई-कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ रहा है जबकि आपदा प्रभावित क्षेत्रों में कैंप करने के नाम पर जिम्मेदार अधिकारी होटलों में आराम फरमा रहे हैं और उत्तराखंड के वो दिल्ली वाले मुख्यमंत्री..! और उनके कैबिनेट सहयोगी हवाई दौरों की रसम निभा रहे हैं..!
इसका ये मतलब बिल्कुल नहीं कि शासन प्रशासन ने कुछ नहीं किया लेकिन जिस तेजी से सरकारी मशीनरी को काम करना चाहिए था वो तेजी कहीं भी नहीं दिखाई दी और न ही सरकार के मुखिया प्रभावितों के दुख को बांट पाए..! बहुगुणा तो आपदा प्रभावित एक क्षेत्र का दौरे पर वहां के लोगों से ये कहकर वापस लौट आए कि अगले दो महीने तक आपको अपनी रक्षा खुद करनी है। अरे बहुगुणा साहब माना आसमान से आफत बरस रही है, परिस्थितियां विपरीत हैं लेकिन इतनी विपरीत भी नहीं कि आप प्रभावितों को उनके हाल पर छोड़ दें..!
बहुगुणा साहब आप और आपके मंत्री, विधायक आपदा प्रभावित क्षेत्रों में जाकर बारी बारी से सिर्फ एक एक सप्ताह तक कैंप करते तो प्रशासनिक अमला भी सक्रिय होता और शायद राहत कार्य में भी तेजी आती और आपदा के करीब एक महीने बाद की तस्वीर कुछ और होती लेकिन आप और आपके मंत्री देहरादून का मोह नहीं छोड़ पाए और जिम्मेदार अधिकारी जिला मुख्यालय से बाहर नहीं निकल पाए..! नतीजा सबके सामने है स्थिति आज भी वैसी ही है या कहें कि पहले से भी बदतर है, अपना सब कुछ गंवा चुके लोगों के पास न तो सिर छिपाने के लिए छत का जुगाड़ है और न ही पेट की भूख मिटाने का इंतजाम..! जबकि इन लोगों के नाम पर  सरकार के पास फिलहाल न तो पैसे की कोई कमी है और न ही राहत सामग्री की..!

शायद यही इस राज्य का दुर्भाग्य है कि जिन लोगों ने उत्तर प्रदेश से अलग उत्तराखंड राज्य निर्माण की लड़ाई लड़ी, जिनके विकास के नाम पर इस राज्य का गठन हुआ है उन पर आई विपदा के वक्त उनके द्वारा चुनी सरकार के नुमाईंदे ही अपनी जिम्मेदारियों से मुहं मोड़ते दिखाई दे रहे हैं या कहें कि जिस कुर्सी पर वे बैठे हैं शायद उन्हें पता ही नहीं कि इस कुर्सी पर बैठने वाले का क्या काम है..? क्या जिम्मेदारियां हैं..?  (जरुर पढ़ें- एमपी नहीं मुख्यमंत्री कहो...)

गुरुवार, 18 जुलाई 2013

उसे भूख से डर लगता था..!


अगर किसी के पास खाने के लिए कुछ नहीं है...खाना खरीदने के लिए तक पैसे नहीं हैं तो फिर उसके लिए भूख से बड़ा डर और कोई नहीं हो सकता..! क्योंकि जब भूख आती है तो एक बार तो कोई भी उसे नजरअंदाज कर सकता है लेकिन कब तक..? ये कमबख्त भूख नहीं मानती और लौट लौट कर आ जाती है..! समय रहते अगर भूख को शांत नहीं किया तो ये भूख भूखे को ही खा जाती है..!
इन पंक्तियों से शायद ये बात बेहतर तरीके से समझ आ जाए..!
उसे भूख से डर लगता था
भूख आती थी वह उसे मार देता था
भूख जिंदा हो जाती थी
वह फिर उसे मार देता था
भूख लौट लौट कर आ जाती थी
वह उसे उलट उलट कर मार देता था
एक दिन भूख दबे पांव आई
और उसे...खा गई

केन्द्र सरकार ने इसी भूख के डर के बहाने गरीब बच्चों को स्कूल से जोडने की पहल की और मिड डे मील योजना की शुरुआत की। सरकार की योजना थी कि एक वक्त की भूख मिटाने के लिए ही सही कम से कम इसी बहाने गरीब परिवार अपने बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल तो भेजेंगे लेकिन बिहार के छपरा में मिड डे मील खाने से मौत के मुंह मे समाए बच्चों के परिजन शायद अब ये सोच रहे होंगे कि उनके जिगर का टुकड़ा स्कूल न जाता न सही लेकिन कम से कम आज उनके पास तो होता..! खुद एक रोटी कम खाकर अपने बच्चों का पेट भर देते लेकिन कम से कम वो उन्हें हमेशा के लिए छोड़कर तो नहीं जाता..!
सरकारी लापरवाही एक बार फिर से मासूमों की जान पर भारी पड़ गयी और करीब दो दर्जन बच्चों को इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी..! बात सिर्फ बिहार के छपरा तक ही सीमित होती तो ठीक था लेकिन देशभर के अलग अलग राज्यों में कई स्कूलों में आए दिन मिड मील खाकर बच्चों का बीमार पड़ना, मिड डे मील में मरी हुई छिपकली, कॉकरोच, चूहे का मिलना साबित करता है कि जिम्मेदार लोग अपने काम को लेकर कितने संजीदा हैं और कितनी ईमानदारी से अपने काम को अंजाम दे रहे हैं।
हर बार इस तरह की घटनाओं पर केन्द्र व राज्य सरकारें ये कहकर अपना पल्ला झाड़ लेती हैं कि वे दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे और कोशिश करेंगे कि भविष्य में ऐसे हादसे फिर कभी न हों लेकिन इसके बाद भी एक महीने, दो महीने, तीन महीने, छह महीने तो सालभर के बाद किसी ऐसे ही हादसे की ख़बर आती है..!
शायद यही सरकारी योजनाओं को सच है जिसकी कीमत आए दिन उस गरीब को ही चुकानी पड़ती है जिनके नाम पर ये योजनाएं शुरु की जाती हैं..! जरुरतमंदों को इन योजनाओं को कितना लाभ मिलता है इसकी हकीकत आए दिन टीवी चैनलों और समाचार पत्रों की सुर्खियों में दिखाई देती हैं..! रही सह कसर समय समय पर कैग की उन रिपोर्ट में पूरी हो जाती है जो इस सच को उजागर करती है कि योजनाओं का कितना लाभ जरुरतमंदों को मिला और कितना लाभ नेताओं के साथ ही सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को..?
इन्हीं योजनाओं को बड़े बड़े पोस्टरों – बैनरों में उकेर कर चुनाव के वक्त जनता से वोट मांगे जाते हैं..! जनता से जनता के लिए ही चुनाव जीतने पर ऐसी ही भारी भरकम बजट वाली योजनाएं शुरु करने का वादा किया जाता है लेकिन इन योजनाओं के नाम पर कितनों के वारे न्यारे होते हैं शायद ये बताने की जरुरत नहीं है..!
बिहार के छपरा में दिल दहला देने वाले हादसे के बाद भी केन्द्र और राज्य सरकारें जागेंगी या फिर भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों-कर्मचारियों की नींद टूटेगी और सरकारी लापरवाही फिर किसी पर भारी नहीं पड़ेगी इसकी उम्मीद कम ही है..!
केन्द्र और राज्य सरकार की नजरों में शायद यही सुशासन है...शायद यही असली भारत निर्माण है..?


deepaktiwari555@gmail.com

मंगलवार, 16 जुलाई 2013

लो जी, दिग्विजय सिंह बन गए हिंदू !

कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के ताजा ब्लॉग को लेकर कोई कुछ कहे लेकिन दिग्विजय सिंह के इस ब्लॉग से कम से कम देश की जनता का सामान्य ज्ञान तो बढ़ ही गया कि दिग्विजय सिंह भी वास्तव में हिंदू हैं..! यहां तक तो ठीक था लेकिन ये समझ में नहीं आया कि आखिर दिग्विजय सिंह को ये बताने की जरुरत क्यों पड़ी कि वे हिंदू है..! उन्होंने द्वारका के शंकराचार्य से दीक्षा ली है..!  वे एकादशी का व्रत रखते हैं..! मध्य प्रदेश के राघौगढ़ स्थित उनके घर  में नौ मंदिर हैं और वे रोज आधा घंटा पूजा करते हैं..!
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि दिग्विजय सिंह अल्पसंख्यकों खासकर मुस्लिमों के सबसे बड़े पैरोकार माने जाते हैं और संघ और भाजपा के बहाने हिंदुओं को गाली बकते नहीं अघाते फिर भी आखिर क्यों उस दिग्विजय सिंह को सामने आकर आज ये कहने की जरुरत पड़ रही है कि वे भी एक हिंदू हैं..?
इसको लेकर अलग-अलग लोगों को अलग-अलग राय हो सकती है लेकिन इसको अगर राजनीतिक चश्मे से देखें तो समझ में आता है कि दिग्विजय सिंह ने ऐसे ही टाईम पास करने के लिए ये ब्लॉग नहीं लिखा बल्कि इसके पीछे भी 22014 के आम चुनाव को ध्यान में रखते हुए एक बड़ी राजनीतिक वजह है। दिग्विजय सिंह वैसे तो कांग्रेस के महासचिव हैं लेकिन इसके बाद भी वे काम कांग्रेस प्रवक्ता का करते हैं और करते कुछ इस तरह से हैं कि उनकी बात कांग्रेस का आधिकारिक बयान भी नहीं बनता और कांग्रेस जो कहना चाहती है वो दिग्विजय के माध्यम से लोगों के बीच पहुंचा देती है। फिर भले ही कांग्रेस के अधिकृत प्रवक्ता दिग्गी के बयान को उनकी निजि राय क्यों न ठहरा दें..?
भाजपा ने अपने वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी को किनारे करके गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी को चुनाव अभियान समिति का चेयरमैन बनाकर एक तरह से ये संदेश दे दिया है कि 2014 के चुनाव में मोदी के चेहरे पर ही भाजपा चुनाव लड़ेगी। इससे ये भी साफ होता है कि भाजपा हिंदुत्व के एजेंडे पर ही 2014 में केन्द्र की सत्ता हासिल करने का ख्वाब देख रही है। भाजपा के यूपी प्रभारी अमित शाह का अयोध्या पहुंचकर राम मंदिर निर्माण पर बयान, राजनाथ सिंह का इस बात को दोहराना, मोदी का खुद को राष्ट्रवादी हिंदू बताना ये सब भाजपा के हिंदुत्व के एजेंडे पर आगे बढ़ने की ख़बरों पर मुहर लगाते हैं..!
दिग्विजय सिंह का खुद को हिंदू साबित करने की कोशिश करना क्या दिग्विजय सिंह की इस चिंता को जाहिर नहीं करता कि दिग्विजय सिंह अब खुद की हिंदू विरोधी नेता की छवि से बाहर निकलना चाहते हैं..!
क्या दिग्गी की ये कोशिश इस बात को पुख्ता नहीं करती कि मोदी और राम मंदिर के नाम पर हिंदुत्व के एजेंडे पर जोर शोर से आगे बढ़ रही भाजपा की ओर बड़ी संख्या में हिंदू वोटरों का ध्रुवीकरण हो सकता है और कांग्रेस को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है..!  
शायद इसलिए ही दिग्गी ने हिंदुओं के साथ भावनात्मक रुप से जुड़ने के लिए ये बताने की कोशिश की कि वे खुद एक कर्मकांडी हिंदू हैं और हिंदू विरोधी तो बिल्कुल भी नहीं..! जिस तरह से दिग्विजय सिंह ने संघ और भाजपा पर हिंदुओं को गुमराह करने का आरोप लगाया उससे क्या ये जाहिर नहीं होता कि वे मोदी और राम मंदिर के नाम पर भाजपा की ओर हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण को रोकना चाहते हैं..!
दिग्विजय सिंह कांग्रेस में वो शख्स हैं जो पार्टी की उस बात को, राय को भी बड़ी आसानी से जनता के बीच पहुंचाकर विरोधियों की मुश्किल बढ़ा देते हैं, जिसे जनता के बीच कहने की हिम्मत शायद पार्टी के किसी नेता में नहीं है और पार्टी सार्वजनिक तौर पर आधिकारिक रुप से ऐसा कहना भी नहीं चाहती..! तो फिर क्यों न दिग्विजय का खुद को हिंदू साबित करने की कोशिश करने को यूपीए की हैट्रिक का ख्वाब देख रही कांग्रेस से जोड़कर देखा जाए..? जिसे शायद मन ही मन ये डर सता रहा है कि कहीं हिंदुत्व के झंडे को थामकर भाजपा यूपीए की हैट्रिक के ख्वाब पर ग्रहण न लगा दे..!
ये सियासत हैं, यहां तो नेताओं के हर एक शब्द के पीछे भी एक सियासी चाल छिपी होती है, जो न सिर्फ जनता को खुद से जोड़ने की एक कोशिश होती है बल्कि अपने विरोधियों को चित्त करने का सटीक जरिया भी ऐसे में 2014 के चुनाव के करीब आने के साथ ही चाहे वो मोदी हो या फिर दिग्विजय सिंह या राहुल गांधी हर किसी का एक एक बोल अपने विरोधियों को चित्त करने और जनता के दिल में जगह बनाने वाला ही होगा।
बहरहाल फैसला तो जनता को ही करना है लेकिन इसके लिए आमजन को नेताओं की इस बोली को समझना होगा कि कौन अपनी मीठी बोली से उनको बहका रहा है और कौन वास्तव में उनकी चिंता करने वाला है..? हालांकि इन नेताओं से बहुत ज्यादा उम्मीदें तो नहीं हैं लेकिन फिर भी बेहतर विकल्प को चुनने की जिम्मेदारी को जनता के कंधे पर ही है..!

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गुरुवार, 11 जुलाई 2013

और नेतानगरी में छाया मातम..!

हमारे देश के नेताओं पर लगता है अदालत की महादशा शुरु हो गयी है। पहले सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक इतिहास वाले दागी नेताओं पर लगाम कसने की ओर कदम बढ़ाते हुए फैसला दिया कि किसी भी मामले में दो या दो साल से ज्यादा की सजा होने पर सांसद और विधायक की सदस्यता खुद ब खुद समाप्त हो जाएगी तो यूपी हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश में जातीय आधारित रैलियों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाकर उन राजनीतिक दलों की नींद उड़ा दी है जो जाति के नाम पर लोगों को बांटकर सत्तासीन होने का ख़्वाब देख रहे थे..!
नेतागण इस सदमे से उबरे भी नहीं थे कि सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के उस फैसले पर अपनी मुहर लगा दी जिसमें पटना हाईकोर्ट ने जेल में जाते ही चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी यानि कि कोई भी व्यक्ति अब जेल जाने के बाद चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो जाएगा।
चुनाव करीब आते ही सत्ता पर नजरें गढ़ाए बैठे जिन नेताओं के चेहरे पर खुशी दिखाई देती थी वो सर्वोच्च न्यायलय और यूपी और पटना उच्च न्यायलय के फैसले के बाद अब अब काफूर होती दिखाई दे रही है..! नेता हैरान हैं...परेशान हैं कि करें तो क्या करें..?
अदालत के फैसले के सामने नेता न तो खुलकर कुछ बोल पा रहे हैं और न ही इसका विरोध कर पा रहे हैं..!
कुछ अदालत के आदेश को पढ़ने के बाद ही कुछ कहने की बात कर रहे हैं तो कुछ बेमन से अदालत के फैसले का स्वागत करते दिखाई दे रहे हैं..! (पढ़ें- नेता जी, दाग अच्छे हैं..!)
संसद और राज्य विधानसभाओं में जनता से जुड़े मुद्दों पर मुंह फेरने वाले और अपने हक के सवाल पर, अपने वेतन भत्तों को बढ़ाने के नाम पर एकजुट होने वाले अधिकतर नेताओं को सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद अब अपना भविष्य अंधकारमय नजर आने लगा है, क्योंकि हमारे अधिकतर माननीय अपनी सफेद पोशाक के पीछे हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण, बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों के साथ ही भ्रष्टाचार और घोटालों की कालिख को समेटे हुए हैं..!
ये छोड़िए, ये लोग तो लोगों को उनकी जाति के आधार पर बांटकर राज करने में भी गुरेज नहीं करते। देश के सबसे बड़े प्रदेश यूपी में तो जातीय समीकरण को अपने अपने पक्ष में फिट करने के लिए राजनीतिक दल क्या कुछ नहीं करते..? दलितों के नाम पर राज करने वाले बसपा सुप्रीमो मायावती भी ब्राह्मण सम्मेलन का आयोजन करती हैं तो समाजवादी पार्टी जिसका नाम ही समाजवाद है खास वोटों को अपने पक्ष में करने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ती..! ऐसा ही हाल राज्य में भाजपा और कांग्रेस के साथ ही दूसरे राजनीतिक दलों का भी है..! लेकिन जातीय रैलियों पर रोक के इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के फैसले के बाद अब सबकी सिट्टी पिट्टी गुम है। अब राजनीतिक दल मुश्किल में हैं कि करें तो क्या करें..? कैसे किसी खास जाति के मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए कोई नया रास्ता तैयार करें..?
बहरहाल अदालत के फैसले से नेतानगरी में भले ही मातम छाया हुआ है पर नेताओं की कारगुजारियों से अजीज आ चुकी देश की जनता में अदालत के इन फैसलों से खुशी की लहर है लेकिन इसका असली मजा तो तब है जब देश की जनता अपने वोट की कीमत को समझे और चुनावों में भी ऐसे नेताओं को सबक सिखाए..!


deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 10 जुलाई 2013

नेता जी, दाग अच्छे हैं..!

अधिकतर मामलों में सबूतों के अभाव में नेताओं को कोर्ट से राहत मिलते तो कई बार देखा था लेकिन पहली बार सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से नेताओं की नींद उड़ते देखी है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय का फैसला होने के कारण चाहकर भी नेता इस फैसले के खिलाफ कुछ नहीं बोल सकते लेकिन जिन नेताओं पर छोटा या बड़ा कोई भी मामला अदालत में लंबित है उनके दिल का दर्द उनसे बेहतर और कौन समझ सकता है..?
हमारे देश में आपराधिक रिकार्ड वाले नेताओं की फेरहिस्त काफी लंबी है। हत्या, हत्या का प्रयास, लूट, अपहरण के साथ भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोपों से घिरे नेताओं की संख्या काफी ज्यादा है औऱ हैरत की बात तो ये है कि इसके बाद भी या तो वे विधायक हैं या फिर सांसद..! सबसे बड़ी बात तो ये कि इनके लिए विधानसभा और लोकसभा चुनाव में टिकट पाना कोई मुश्किल काम नहीं है। चुनाव में ईमानदार और स्वच्छ छवि के नेताओं को टिकट देने का दावा करने वाले हमारे देश के लगभग सभी छोटे बड़े राजनीतिक दल आपराधिक इतिहास वाले नेताओं को अपनी पार्टी का उम्मीदवार बनाने में जरा भी नहीं हिचकते..!
ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला कि किसी भी मामले में दो या दो से अधिक वर्ष की सजा होने पर सांसद और विधायक की सदस्यता रद्द हो जाएगी और वे चुनाव भी नहीं लड़ पाएंगे अपने आप में एक ऐतिहासिक फैसला है। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से न सिर्फ राजनीति में आपराधिक इतिहास वाले नेताओं की घुसपैठ पर रोक लगेगी बल्कि किसी भी अपराध को करने या उसमें किसी भी तरह से शामिल होने से पहले नेता सौ बार सोचेंगे..!
अभी तक किसी भी मामले पर सजा होने पर नेतागण जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8(4) को सुरक्षा कवच बनाकर फैसले के खिलाफ अपील लंबित होने पर अपने पद पर बने रहते थे लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस सुरक्ष कवच को ही खत्म कर दिया है जिसके बाद दो या दो साल से ज्यादा की सजा होने पर सांसद और विधायक की सदस्यता रद्द हो जाएगी।   
आपराधिक इतिहास वाले नेताओं की देश के छोटे बड़े सभी राजनीतिक दलों में कितनी पैठ है इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि मई 2009 की नेशनल इलेक्शन वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक 15वीं लोकसभा में 150 दागी सांसद हैं जिनमें से 73 के खिलाफ गंभीर आरोप हैं।
वहीं राज्यों की बात करें तो www.myneta.info के मुताबिक दागी विधायकों के मामले में झारखंड देश में सबसे अव्वल है, जहां पर कुल विधायकों में से 72 फीसदी (55 विधायक) विधायकों के खिलाफ कोई न कोई आपराधिक मामला चल रहा है। 55 में से भी 24 विधायकों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं।
बिहार इस सूची में दूसरे नंबर पर है जहां पर 58 फीसदी (140 विधायक) विधायक दागी हैं जिनमें से भी 84 विधायकों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं।
महाराष्ट्र इस फेरहिस्त में 51 फीसदी (146 विधायक) विधायकों के साथ तीसरे नंबर है जिनमें से 56 विधायकों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं।
विधायकों की संख्या के साथ चौथे नंबर पर उत्तर प्रदेश विराजमान है, जहां दागी विधायकों का प्रतिशत 47(189 विधायक) है, जिसमें से 98 विधायकों के खिलाफ गंभीर आरोप हैं।
अन्य राज्यों में भी हालात कुछ जुदा नहीं है और बड़ी संख्या में दागी विधायक राज्य की विधानसभाओं की शोभा बढ़ा रहे हैं। सिर्फ मणिपुर ही इकलौता ऐसा राज्य है जहां पर किसी भी विधायक के खिलाफ कोई भी आपराधिक मामला नहीं है और सभी 60 विधायक बेदाग हैं।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद जाहिर है, ऐसे नेताओं के माथे पर बल पड़ना लाजिमी है। कोर्ट ने अपने फैसले से न सिर्फ देश की संसद और विधानसभाओं को साफ करने की ओर कदम उठाया है बल्कि कोर्ट का ये फैसले उन नेताओं और राजनीतिक दलों के मुंह पर एक करारा तमाचा है जो ये सोचते हैं कि पैसे और बाहुबल के आधार पर चुनाव जीतकर वे संसद या विधानसभा में आसानी से पहुंच जाएंगे और अपनी मनमानी करेंगे..!
देश के सर्वोच्च न्यायालय की अगर बात करें तो सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों की संख्या 60 हजार के करीब है जबकि वर्ष 2011 तक देश की विभिन्न उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या करीब 43 लाख 22 हजार से अधिक हैं। इससे देश के विभिन्न अदालतों में लंबित मामलों की संख्या का अंदाजा लगाया जा सकता है। (पढ़ें- इंसाफ- मौत के बाद..!)
ऐसे में अब उम्मीद है कि दागी सांसदों और विधायकों के संबंध में सर्वोच्च न्यायलय के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद देश की विभिन्न अदालतों में लंबित मामलों के तेजी से निपटारे को लेकर भी सर्वोच्च न्यायालय कोई सकारात्मक कदम उठाए ताकि अदालत का ये ऐतिहासिक फैसला जल्द सार्थक हो और देश की संसद और राज्य विधानसभाओं से दागी नेताओं का पत्ता साफ हो।

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मंगलवार, 9 जुलाई 2013

लोकार्पण करने वाले खुद पहुंच गए हवालात

नाम- राघवजी, उम्र-79 वर्ष, चेहरे पर सादगी लेकिन कर्म ऐसे कि शर्म भी शर्म से आंखें चुराने पर मजबूर हो जाए..! मोटे चश्मे के पीछे से झांकती शैतान निगाहें पता नहीं कब से बंद कमरे में अपनी हवस की भूख को शांत कर कितनों का जीवन नर्क करने पर तुली हुई थी..! जाने कितने वर्षों से अपने परिवार के साथ ही लोगों की आखों में राघव जी धूल झोंक कर एक सज्जन पुरुष का जीवन जीने का ढोंग रच रहे थे लेकिन राघवजी की ये करतूत तीसरी आंख से नहीं बच पाई और तीसरी आंख ने वो राज खोला कि सारी सज्जनता, सारी नैतिकता धरी की धरी रह गयी और 79 वर्ष की अवस्था में राघवजी का जो घिनौना चेहरा सामने आया वो किसी को भी शर्म से पानी पानी करने के लिए काफी है..!  (पढ़ें- ये हैं राजनीति के मर्यादा पुरुष..!)
कहते हैं इंसान को अपने कर्मों का फल जीते जी ही भगुतना पड़ता है..! उम्र के इस पड़ाव में राघवजी की गिरफ्तारी कम से कम इस विश्वास को तो और दृढ़ करती ही है। वक्त कैसे बदलता है, इसका इससे बढ़िया उदाहरण और क्या हो सकता है कि जिस हबीबगंज थाने का लोकार्पण राघवजी ने किया था उसी थाने में न सिर्फ राघवजी के खिलाफ एफआईआर लिखी गई बल्कि हबीबगंज थाना पुलिस ने ही राघवजी को हवालात तक भी पहुंचा दिया।
भोपाल में पत्रकारिता के दैरान चार साल पहले मैं खुद हबीबगंज थाने के लोकार्पण समारोह में मौजूद था जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और राघवजी ने थाने का लोकार्पाण किया लेकिन मैं क्या वहां मौजूद किसी शख्स ने विशेषकर राघवजी ने ये नहीं सोचा होगा कि भविष्य में वक्त ऐसी करवट लेगा कि हबीबगंज थाने में ही उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज होगी और जो हबीबगंज थाना पुलिस उनको मंत्री रहते हुए सलाम ठोक रही थी वही पुलिस उनको गिरफ्तार करेगी। 
ये भी वक्त का ही तकाजा है कि जिस राघवजी के साथ इस घटनाक्रम से पहले तक उनकी पार्टी कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रहती थी उसने भी राघवजी के कुकर्म की सीडी सामने आने के बाद राघवजी से किनारा कर लिया है।
आखिर चाल, चरित्र और चेहरे की बात करने वाली भारतीय जनता पार्टी के चेहरे पर उनके ही वयोवृद्ध नेता कालिख पोत दें तो सवाल उठने लाजिमी ही हैं..! ऐसे में भाजपा ने राघवजी से किनारा करने में जरा सी भी देर नहीं की लेकिन जो राघव जी कई दशकों से भाजपा के साथ जुड़े हुए थे उनसे एक झटके में किनारा करने से भाजपा का दामन तो साफ होगा नहीं..! और न ही वे सवाल शांत होंगे जो राघवजी की कुकर्म कथा ने भाजपा पर भी खड़े किए हैं..!
वैसे भी चुनाव की देहरी पर खड़े मध्य प्रदेश की सत्ता से 10 वर्षों से दूर कांग्रेस हर हाल में सत्ता हासिल करना चाहती है ऐसे में राघवजी की कुकर्म कथा तो कांग्रेस के लिए चुनाव में किसी संजीवनी से कम नहीं है और कांग्रेस ने भी इसको भुनाने की पूरी तैयारी कर ली है जबकि भाजपा के पास राघवजी की इस कुकर्म कथा पर उठ रहे सवालों का कोई जवाब नहीं है..!

deepaktiwari555@gmail.com

रविवार, 7 जुलाई 2013

अब और बर्दाश्त (नहीं) करेंगे..!

बोधगया के महाबोधी मंदिर पर आतंकी हमले के बाद हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं कि ऐसे हमले बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे..! आतंकी एक के बाद एक आतंकी हमले को अंजाम देते जाते हैं और हमारी सरकार के मुखिया हर बार ये कहते हैं कि देश में आतंकी हमले बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी। समझ में नहीं आता कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए आखिर इस बर्दाश्त की सीमा कहां तक है..?
मनमोहन सिंह बर्दाश्त न करने की बात तो हर बार कहते हैं लेकिन प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद से ही वे सिर्फ बर्दाश्त ही कर रहे हैं और कुछ नहीं..! देश के दुश्मन भी इस बात को अच्छी तरह समझ गए हैं कि भारत सिर्फ बर्दाश्त ही कर सकता है और कुछ करने का दम भारत में नहीं है..! शायद यही वजह है कि आतंकियों के हौसले बुलंद हैं और वे एक के बाद एक कभी मुंबई में तो कभी पुणे में, कभी बंगलुरु में तो कभी बिहार में आतंकी हमलों को अंजाम देकर निर्दोष भारतीयों को मौत के घाट उतार रहे हैं..!
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मजबूरी तो पूरा देश समझता है कि आखिर क्यों वे हर चीज बर्दाश्त न करने की बात तो कहते हैं लेकिन फिर भी चुपचाप बर्दाश्त करते रहते हैं..! वैसे भी प्रधानमंत्री की कुर्सी ऐसे ही थोड़े न मिल जाती है...उसके लिए तो बर्दाश्त करने की क्षमता होनी चाहिए..! जो कि मनमोहन सिंह में कूट कूट कर भरी हुई है..! लेकिन मनमोहन सिंह को कौन समझाए कि उनको पीएम की कुर्सी दिलाने वाली उनकी ये अनोखी काबिलियत देश पर भारी पड़ी रही है और आए दिन निर्दोष भारतीयों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा रहा है..!
हैरानी तो उस वक्त होती है जब इस तरह के आतंकी हमले होने की सूचना दिल्ली पुलिस के जरिए बिहार सरकार को पहले ही मिल जाती है लेकिन इसके बाद भी आतंकी बिहार के बोधगया में स्थित महाबोधी मंदिर में एक नहीं, दो नहीं पूरे एक दर्जन से ज्यादा बम आसानी से प्लांट कर अपने नापाक मंसूबों में कामयाब हो जाते हैं..! अंदाजा लगाया जा सकता है कि लोगों की सुरक्षा को लेकर सरकार कितनी गंभीर है..?
ये छोड़िए राज्य के डीजीपी अभयानंद महाबोधी मंदिर पर हुए धमाके की पूर्व सूचना के सवाल पर कहते हैं कि हर घटना से कुछ न कुछ सिखने को मिलता है..! सुन लिजिए ये कहना है राज्य के पुलिस प्रमुख का जिनका सोचना है कि कुछ सीखने के लिए ऐसी घटनाएं होना जरुरी है..! अब जनाब विस्फोट नहीं होंगे तो फिर बिहार पुलिस सबक कैसे लेगी..?
जब देश के प्रधानमंत्री कहते हैं बर्दाश्त (नहीं) करेंगे, बिहार के मुख्यमंत्री आतंकी हमले की सूचना के बाद भी मंदिर की सुरक्षा को लेकर कोई कारगर कदम नहीं उठाते और बिहार के ही पुलिस प्रमुख विस्फोट के बाद कहते हैं कि ऐसी घटनांओं से ही तो पुलिस कुछ सीखेगी..! फिर क्यों न आतंकी बेखौफ होकर एक के बाद धमाकों से भारत को दहलाते रहें..! जब हमारे प्रधानमंत्री बर्दाश्त न करके भी बर्दाश्त कर सकते हैं तो फिर आतंकी क्यों बर्दाश्त करें..? लेकिन असल सवाल तो ये है कि देश की जनता अपनी जान की कीमत पर आखिर कब तक ये सब बर्दाश्त करेगी..?


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शनिवार, 6 जुलाई 2013

ये हैं राजनीति के मर्यादा पुरुष..!

मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार में वित्त मंत्री राघवजी और यूपी के औरेया के सपा जिलाध्यक्ष और श्रम प्रवर्तन विभाग के चेयरमैन रामबाबू यादव के कारनामों को सुनकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नारायण दत्त तिवारी की याद आ गयी। रामबाबू यादव एनडी तिवारी की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं तो राघव जी ने वो कर दिया जो शायद तिवारी जी नहीं कर पाए..!
79 वर्ष के राघव जी शिवराज कैबेनिट के सबसे वरिष्ठ सदस्य थे और वित्त मंत्रालय की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे थे। 2008 से 2010 तक भोपाल में पत्रकारिता के दौरान कई मौकों पर राघव जी से सामना हुआ। वो राघव जी जो बिना सहारे के ठीक से चल भी नहीं सकते। चश्मा लगाने के बाद भी पढ़ने में उन्हें दिक्कत होती थी..!
राघव जी की नौकर के साथ अपाकृतिक कृत्य की ख़बर सुनी तो राघव जी की पूरी काया जेहन में ताजा हो गयी। शुरु में तो यकीन नहीं हुआ लेकिन जब इसकी रिकार्डिंग होने की बात सामने आयी तो फिर क्या कह सकते हैं..! कहते भी हैं न कि कैमरा झूठ नहीं बोलता..!
क्या राघव जी 79 साल में जो कमाया था वो नवाबों के शौक में गंवा दिया..! वैसे भी तो भोपाल नवाबों का ही शहर है..! हालांकि राघवी जी कह रहे हैं कि ये उनके खिलाफ राजनीतिक साजिश है लेकिन सीडी बनाने का दावा करने वाला भी भाजपा का ही नेता है वो भी राघव जी के गृहक्षेत्र विदिशा का। ऐसे में राघव जी के लिए अपनों की ही घेराबंदी से पाक साफ निकल पाना आसान नहीं होगा..! वैसे भी मध्य प्रदेश में सत्ता पाने को बेकरार कांग्रेस के लिए आगामी विधानसभा चुनाव में भुनाने के लिए इससे अच्छा मुद्दा और क्या हो सकता है..?
समाजवादी पार्टी से ताल्लुक रखने वाले 71 वर्ष के रामबाबू यादव के बारे में तो ज्यादा नहीं जानता लेकिन उनकी ही पार्टी की एक महिला मधु पांडे के साथ उनकी एक ऑडियो रिकार्डिंग ने उनके चर्चे भी बढ़ा दिए हैं। साहब को चूजे(कम उम्र की लड़कियों) का शौक है। खुद के पांव कब्र में लटक रहे हैं और लड़कियां चाहिए 18 से 20 साल की..! अब इनके शौक को क्या कहें..?
लगता है ये साहब एनडी तिवारी से कोई गुप्त फार्मूला लेकर आए हैं तभी तो 71 की उम्र में 18-20 साल की लड़कियों का शौक चढ़ा है..! माफ करना चौधरी साहब कम से कम इतना ही ख्याल कर लेते कि आपके पोते पोती की उम्र भी इतनी ही होगी..!
राघवजी और रामबाबू याद दोनों व्यक्ति भले ही अलग अलग हैं, दोनों की पार्टी भले ही अलग अलग हैं लेकिन कौम एक ही है...वही कौम जिससे एनडी तिवारी भी आते हैं..! दूसरों को मर्यादित आचरण की सीख देने वाले और खुद को पाक साफ बताने वाले इस कौम वाले निजी जीवन में कितने मर्यादित हैं और कैसी नीयत वाले हैं, ये सबके सामने है..?  समझ नहीं आता कि ये लोग अपने परिवार संग कैसे रहते हैं..? कैसे अपने बीवी बच्चों से नज़रें मिलाते हैं..?


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मंगलवार, 2 जुलाई 2013

आपके घर पर कोई अतिक्रमण कर ले तो..?


आपके घर पर अगर कोई अतिक्रमण कर ले तो कैसे लगेगा..? आपकी कार पार्किंग की जगह कोई और अपनी गाड़ी पार्क कर ले तो कैसा लगेगा..?
जाहिर है बहुत गुस्सा आएगा लेकिन ऐसे में आप क्या करेंगे..? प्यार से समझाने के बाद भी जब अतिक्रमणकारी नहीं मानेगा तो फिर आप क्या करेंगे..?
कुछ समझ आया कि केदारनाथ में ऐसा क्यों हुआ..?
समझ आया कि क्यों भागीरथी, मंदाकिनी, अलकनंदा, पिंडर और दूसरी नदियां क्यों अपने साथ सब कुछ बहा कर ले गई..!
जिस तरह आपके घर में कोई जबरन घुसकर कब्जा कर ले और बाहर जाने का नाम न ले ठीक उसी तरह पहाड़ों में नदियों में स्वार्थी, लालची लोगों ने कब्जा करने की कोशिश की..! पहाड़ों का सीना छलनी कर दिया तो नदियों की धारा को रोकने का प्रयास किया..! नतीजा सबके सामने है। जिस तरह हम अपने घर में किसी के अतिक्रमण को बर्दाश्त नहीं कर सकते ठीक उसी तरह नदियों और पहाड़ों ने भी ऐसा ही किया..!
और तो और हिमालय की गोद में बसे भगवान शिव के पावन धाम केदारनाथ को भी नहीं छोड़ा। मंदाकिनी के किनारों पर खड़े कर दिए दो-तीन मंजिले होटल, धर्मशाला और लॉज...सजा ली प्रसाद की थाली और फूलों की दुकान। किसलिए..? सिर्फ अपने निजि स्वार्थ के लिए..! पैसा कमाने के लिए..! तो क्यों न होती तबाही..? केदार बाबा क्यों अपने धाम में अतिक्रमण बर्दाश्त करते..? क्यों केदारनाथ की शांति भंग करने वालों को सबक नहीं सिखाते..?
जिम्मेदार लोगों (शसन-प्रशासन) ने अपनी जिम्मेदारी ठीक ढंग से निभाई होती तो शायद हालात इतने बुरे नहीं होते लेकिन जिम्मेदार लोगों की जेबें गरम हो रही थी तो उन्होंने आंख मूंद कर गहरी नींद में सो जाना ही बेहतर समझा। जिम्मेदार लोग सो रहे थे और पहाड़ों का सीना छलनी हो रहा था...नदियों की धारा को जंजीरों में बांधा जा रहा था। पहाड़ खोखले हो चुके थे, हरियाली मुरझा चुकी थी और नदियां नालों में बदल चुकी थी तो फिर आप ही बताओ कि क्यों न होता विनाश..? क्यों न गिरते पहाड़..? क्यों न रौद्र रुप धारण करती भागीरथी, अलकनंदा, मंदाकिनी, पिंडर और दूसरी नदियां..?
अब रोते रहो कुदरत के कहर का राग अलापते हुए कुदरत ने तो अपना हिसाब बराबर कर लिया..!

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सोमवार, 1 जुलाई 2013

उत्तराखंड त्रासदी- लाशों पर बहुगुणा की कमेंट्री..!

उत्तराखंड में आई भीषण त्रासदी से निपटने में नाकाम रहने के साथ ही मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने एक बार फिर से ये साबित कर दिया कि आखिर क्यों वे उत्तराखंड के लिए एक राजनीतिक त्रासदी की तरह हैं। 16 जून को केदारनाथ में आए मौत के सैलाब के बाद से ही बहुगुणा सरकार एक तमाशबीन की तरह सिर्फ मौत का तमाशा ही देखती रही..! सरकार का आपदा प्रबंधन फेल हो चुका था और सरकार हर मोर्चे पर नाकाम साबित हो रही थी। विजय बहुगुणा का दरअसल पता ही नहीं था कि इस भीषण त्रासदी से आखिर निपटा कैसे जाए..? (पढ़ें - बहुगुणा का सीएम बनना भी एक त्रासदी..!)
त्रासदी के बाद से ही विजय बहुगुणा सुबह, दोपहर और शाम तीनों वक्त मीडिया के आगे एक बेबस मुख्यमंत्री की तरह दिखाई दे रहे थे और कर रहे थे तो सिर्फ त्रासदी में हुई मौत के आंकड़ों की कमेंट्री..! बहुगुणा सरकार के पास न कोई एक्शन प्लान था और न ही प्रभावितों की मदद करने का जज्बा...वो तो भला हो भारतीय सेना के जाबांज जवानों का जिन्होंने खुद को मौत के मुंह में झोंक कर लाखों लोगों को मौतौ के मुंह से निकालकर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया।
सेना काम कर रही थी और बहुगुणा लाशों की गिनती की कमेंट्री..! बहुगुणा को लगा कि सरकार की छीछालेदर हो रही है तो करोड़ों में मीडिया को मैनेज कर समाचार चैनलों में कमेंट्री करने लगे। बताने लगे कि कुदरत के कहर के आगे सरकार बेबस है..!
दिल्ली में शीश नवाने के बाद उत्तराखंड के वो दिल्ली वाले मुख्यमंत्री आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने पहुंचे तो आपदा प्रभावितों से साफ कह दिया कि दो महीने आप अपनी सुरक्षा खुद करो...सरकार कुछ नहीं कर सकती..! कहने का अंदाज भी ऐसा था कि मानो साल के 10 महीने बहुगुणा सरकार उत्तराखंड की आवाम का पूरा ख्याल रखती हो..!  हवाई जहाज में बैठकर आपदा प्रभावित क्षेत्रों में पहुंचने वाले मुख्यमंत्री आपदा प्रभावितों को संबल देने की बजाए...मदद का आश्वासन देने की बजाए जब ऐसा कहे कि अपनी सुरक्षा स्वंय करो तो सोचिए क्या बीती होगी उन हजारों आपदा प्रभावितों पर जो मुख्यमंत्री का हवाई जहाज जमीन पर उतरने से पहले उसे इस आस में टकटकी लगाए देख रहे थे कि ये जमीन पर उतरेगा तो उनकी आधी परेशानियां तो ऐसे ही दूर हो जाएंगी लेकिन अफसोस उनके सपने उस रहनुमा ने ही तोड़ दिए जिससे उन्हें सबसे ज्यादा आस थी..!
देहरादून लौटकर मीडिया में शेखी बघारते हैं कि आपदा प्रभावितों को राशन पानी मुहैया कराया जा रहा है जबकि जमीनी हकीकत तो ये है की उत्तराखंड के कई आपदा प्रभावित गांवों से भुखमरी और खाने के लिए खून खराबे की ख़बरें सामने आ रही हैं..! जिन गांव वालों ने अपने घर के राशन पानी से बाहरी प्रदेश से चार धाम यात्रा पर आए लोगों का पेट भरा वे खुद दाने दाने को मोहताज हो रहे हैं लेकिन बकौल बहुगुणा सरकार राहत सामग्री लोगों तक पहुंच रही है..!
देशभर से प्रभावितों के लिए मदद के नाम पर करोड़ों की राशि के साथ ही भारी मात्रा में राहत सामग्री पहुंच रही है लेकिन सरकार इसका सही प्रबंधन करने में भी नाकाम साबित हो रही है। पैसे राहत कोष में जमा हो रहा है...राहत सामग्री गोदामों में या फिर खड़े ट्रकों में खराब हो रही है लेकिन मुख्यमंत्री साहब को ये पता ही नहीं कि इसका इस्तेमाल कैसे किया जाए..? (पढ़ें- वाह बहुगुणा ! हजारों मर गए, अब याद आया कर्तव्य..!)
बेहतर होगा कि अब भी वक्त रहते लाशों की गिनती की बजाए किसी तरह त्रासदी में जिंदा बचे लोगों को लाश में तब्दील होने से रोकने के लिए बहुगुणा साहब अपनी कमेंट्री बंद करें और राहत एवं पुनर्वास में पूरी ताकत लगा दें ताकि काल की तरह आपदा प्रभावितों के सिर पर खड़े बरसात के दो महीनों में देवभूमि में और लाशों के ढ़ेर न लगें..!

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रविवार, 30 जून 2013

बहुगुणा का सीएम बनना भी एक त्रासदी..!

उत्तराखंड विजय बहुगुणा के मुख्यमंत्री बनने की भीषण त्रासदी से सही से उबरा भी नहीं था कि एक और त्रासदी ने उत्तराखंड समेत पूरे देश को झकझोर के रख दिया। आधिकारिक रुप से त्रासदी में मौतों का आंकड़ा सैंकड़ों में है लेकिन कड़वा सच ये है कि चार धाम यात्रा पर उत्तराखंड पहुंचे हजारों लोगों का कुछ पता नहीं कि वे कहां गए..?
आपदा प्रबंधन को लेकर त्रासदी के बाद उत्तराखंड सरकार की पोल सबके सामने खुल ही चुकी है। ऐसे में अब त्रासदी के 48 घंटे पहले मौसम विभाग की सरकार को चेतावनी देने की ख़बर के बाद हर कोई हैरान है कि आखिर समय रहते सरकार की नींद क्यों नहीं खुली..? आखिर क्यों सरकार पहाड़ी इलाकों खासकर केदारनाथ में भारी बारिश की चेतावनी के बाद भी सोती रही..? क्यों नहीं एहतियात बरतते हुए लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने की कोई कोशिश सरकार की तरफ से की गई..?
समय रहते अगर सरकार ने मौसम विभाग की चेतावनी की गंभीरता से लेते हुए तत्परता दिखाते हुए आवश्यक कदम उठाए होते तो केदारनाथ की तबाही न सही लेकिन हजारों लोगों को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सकता था..!
लेकिन ऐसा नहीं हुआ और नतीजा सबके सामने है...एक बार फिर से शासन – प्रशासन की अनदेखी और लापरवाही का भयावह परिणाम हजारों लोगों को भगुतना पड़ा..!
हद तो तब हो गयी जब जैसे तैसे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने विजय बहुगुणा साहब को ये कहते सुना कि सरकार की तरफ से कोई लापरवाही नहीं बरती गयी..! गजब करते हो बहुगुणा साहब अगर लापरवाही नहीं बरती गयी तो फिर त्रासदी के 48 घंटे पहले भारी बरसात और मौसम के बिगडने की चेतावनी के बाद भी आखिर क्यों सरकार सोती रही..? अगर लापरवाही नहीं बरती गयी तो फिर क्यों मौत का सैलाब अपने साथ हजारों जिंदगियों का बहा कर ले गया..? (पढ़ें- वाह बहुगुणा ! हजारों मर गए, अब याद आया कर्तव्य..!)
हैरानी की हात ये भी है कि बहुगुणा साहब ये भी कहते सुनाई दे रहे हैं कि त्रासदी में कितने लोग मारे गए इसका पता कभी नहीं चल पाएगा..! साथ ही बहुगुणा ने विधानसभा अध्यक्ष गोविंद कुंजवाल के उस बयान को भी गलत ठहराया जिसमें कुंजवाल ने एक दिन पहले ही त्रासदी में करीब 10 हजार से ज्यादा मौतें होने का अंदेशा जताया था। बहुगुणा भले ही कुंजवाल की बात को नकार रहे हों लेकिन इस बातसे इंकार नहीं किया जा सकता कि चार धाम यात्रा सीजन का पीक समय होने के कारण करीब 20 से 25 हजार श्रद्धालु त्रासदी के वक्त गौरीकुंड, रामबाड़ा और केदारनाथ में मौजूद थे।
गौरीकुंड, रामबाड़ा और केदारनाथ तीनों ही स्थान पूरी तरह से तबाह हो गए हैं और इसमें रामबाड़ा जो यात्रा का सबसे अहम पड़ा था उसका तो नामो निशान ही मिट गया है। तीनों ही स्थानों में हर वक्त श्रद्धालुओं की तादाद 5000 से 10000 के बीच रहती थी ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि मौत का वास्तविक आंकड़ा कहां तक पहुंच सकता है..! (जरुर पढ़ें- 15 हजार तक पहुंच सकता है मौत का आंकड़ा..!!!)
हालांकि अधिकतर लोगों के 10-10 फिट मलबे के नीचे दब जाने से और मंदाकिनी में बह जाने से भले ही हजारों लापता लोगों के शव कभी न मिल पाएं लेकिन देश भर के सभी राज्यों के लोगों से चारधाम यात्रा पर निकले उनके परिजनों का डाटा तैयार कर त्रासदी के बाद  लापता लोगों की वास्तविक संख्या का तो पता चल ही सकता है..!
सुना तो यहां तक है कि उत्तराखंड के वो दिल्ली वाले मुख्यमंत्री..! बहुगुणा साहब का ज्यादा ध्यान प्रभावितों तक मदद पहुंचाने की बजाए मीडिया को मैनेज करने की तरफ है और इसके लिए बतौर सूचना विभाग के आला अधिकारी दिन रात एक किए हुए हैं..! वहीं सुनने में ये भी आ रहा है कि बहुगुणा साहब को जैसे तैसे उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनाने में अहम किरदार निभान वाली उनकी बहन रीता बहुगुणा जोशी इस कार्य में भी अहम भूमिका में हैं..!
बहुगुणा की इस कवायद का असर दिखने भी लगा है और त्रासदी के तुरंत बाद जो बड़े बड़े चैनल बहुगुणा सरकार की बखिया उधेड़ने में लगे थे अब उनके तेवर नरम पड़ने लगे हैं। यहां तक कि सभी प्रमुख समाचार चैनलों में बहुगुणा साहब का 15 से 20 मिनट का साक्षात्कार भी चला जिसमें बहुगुणा कुदरत के कहर के आगे सरकार की बेबसी की कहानी सुनाते हुए नजर आए कुदरत के आगे किसी का बस न चलने की बात कहते हुए खुद को व सरकार को बचाते हुए दिखाई दिए।
ये उत्तराखंड का दुर्भाग्य ही है कि जिस भीषण त्रासदी के वक्त प्रदेश के मुख्यमंत्री को सरकार में शामिल सभी लोगों को साथ लेकर ज्यादा से ज्यादा आपदा प्रभावितों को दर्द बांटकर उनके राहत एवं पुनर्वास में पूरी ताकत के साथ जुट जाना चाहिए था वह मुख्यमंत्री सरकार की नाकामियों को छिपाने के साथ ही मीडिया मैनेजमेंट कर अपनी कुर्सी बचाने की जुगत में लगा हुआ है..! (जरुर पढ़ें- उतराखंड आपदा - एक कौम ऐसी भी..!)