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रविवार, 30 जून 2013

बहुगुणा का सीएम बनना भी एक त्रासदी..!

उत्तराखंड विजय बहुगुणा के मुख्यमंत्री बनने की भीषण त्रासदी से सही से उबरा भी नहीं था कि एक और त्रासदी ने उत्तराखंड समेत पूरे देश को झकझोर के रख दिया। आधिकारिक रुप से त्रासदी में मौतों का आंकड़ा सैंकड़ों में है लेकिन कड़वा सच ये है कि चार धाम यात्रा पर उत्तराखंड पहुंचे हजारों लोगों का कुछ पता नहीं कि वे कहां गए..?
आपदा प्रबंधन को लेकर त्रासदी के बाद उत्तराखंड सरकार की पोल सबके सामने खुल ही चुकी है। ऐसे में अब त्रासदी के 48 घंटे पहले मौसम विभाग की सरकार को चेतावनी देने की ख़बर के बाद हर कोई हैरान है कि आखिर समय रहते सरकार की नींद क्यों नहीं खुली..? आखिर क्यों सरकार पहाड़ी इलाकों खासकर केदारनाथ में भारी बारिश की चेतावनी के बाद भी सोती रही..? क्यों नहीं एहतियात बरतते हुए लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने की कोई कोशिश सरकार की तरफ से की गई..?
समय रहते अगर सरकार ने मौसम विभाग की चेतावनी की गंभीरता से लेते हुए तत्परता दिखाते हुए आवश्यक कदम उठाए होते तो केदारनाथ की तबाही न सही लेकिन हजारों लोगों को मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सकता था..!
लेकिन ऐसा नहीं हुआ और नतीजा सबके सामने है...एक बार फिर से शासन – प्रशासन की अनदेखी और लापरवाही का भयावह परिणाम हजारों लोगों को भगुतना पड़ा..!
हद तो तब हो गयी जब जैसे तैसे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने विजय बहुगुणा साहब को ये कहते सुना कि सरकार की तरफ से कोई लापरवाही नहीं बरती गयी..! गजब करते हो बहुगुणा साहब अगर लापरवाही नहीं बरती गयी तो फिर त्रासदी के 48 घंटे पहले भारी बरसात और मौसम के बिगडने की चेतावनी के बाद भी आखिर क्यों सरकार सोती रही..? अगर लापरवाही नहीं बरती गयी तो फिर क्यों मौत का सैलाब अपने साथ हजारों जिंदगियों का बहा कर ले गया..? (पढ़ें- वाह बहुगुणा ! हजारों मर गए, अब याद आया कर्तव्य..!)
हैरानी की हात ये भी है कि बहुगुणा साहब ये भी कहते सुनाई दे रहे हैं कि त्रासदी में कितने लोग मारे गए इसका पता कभी नहीं चल पाएगा..! साथ ही बहुगुणा ने विधानसभा अध्यक्ष गोविंद कुंजवाल के उस बयान को भी गलत ठहराया जिसमें कुंजवाल ने एक दिन पहले ही त्रासदी में करीब 10 हजार से ज्यादा मौतें होने का अंदेशा जताया था। बहुगुणा भले ही कुंजवाल की बात को नकार रहे हों लेकिन इस बातसे इंकार नहीं किया जा सकता कि चार धाम यात्रा सीजन का पीक समय होने के कारण करीब 20 से 25 हजार श्रद्धालु त्रासदी के वक्त गौरीकुंड, रामबाड़ा और केदारनाथ में मौजूद थे।
गौरीकुंड, रामबाड़ा और केदारनाथ तीनों ही स्थान पूरी तरह से तबाह हो गए हैं और इसमें रामबाड़ा जो यात्रा का सबसे अहम पड़ा था उसका तो नामो निशान ही मिट गया है। तीनों ही स्थानों में हर वक्त श्रद्धालुओं की तादाद 5000 से 10000 के बीच रहती थी ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि मौत का वास्तविक आंकड़ा कहां तक पहुंच सकता है..! (जरुर पढ़ें- 15 हजार तक पहुंच सकता है मौत का आंकड़ा..!!!)
हालांकि अधिकतर लोगों के 10-10 फिट मलबे के नीचे दब जाने से और मंदाकिनी में बह जाने से भले ही हजारों लापता लोगों के शव कभी न मिल पाएं लेकिन देश भर के सभी राज्यों के लोगों से चारधाम यात्रा पर निकले उनके परिजनों का डाटा तैयार कर त्रासदी के बाद  लापता लोगों की वास्तविक संख्या का तो पता चल ही सकता है..!
सुना तो यहां तक है कि उत्तराखंड के वो दिल्ली वाले मुख्यमंत्री..! बहुगुणा साहब का ज्यादा ध्यान प्रभावितों तक मदद पहुंचाने की बजाए मीडिया को मैनेज करने की तरफ है और इसके लिए बतौर सूचना विभाग के आला अधिकारी दिन रात एक किए हुए हैं..! वहीं सुनने में ये भी आ रहा है कि बहुगुणा साहब को जैसे तैसे उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनाने में अहम किरदार निभान वाली उनकी बहन रीता बहुगुणा जोशी इस कार्य में भी अहम भूमिका में हैं..!
बहुगुणा की इस कवायद का असर दिखने भी लगा है और त्रासदी के तुरंत बाद जो बड़े बड़े चैनल बहुगुणा सरकार की बखिया उधेड़ने में लगे थे अब उनके तेवर नरम पड़ने लगे हैं। यहां तक कि सभी प्रमुख समाचार चैनलों में बहुगुणा साहब का 15 से 20 मिनट का साक्षात्कार भी चला जिसमें बहुगुणा कुदरत के कहर के आगे सरकार की बेबसी की कहानी सुनाते हुए नजर आए कुदरत के आगे किसी का बस न चलने की बात कहते हुए खुद को व सरकार को बचाते हुए दिखाई दिए।
ये उत्तराखंड का दुर्भाग्य ही है कि जिस भीषण त्रासदी के वक्त प्रदेश के मुख्यमंत्री को सरकार में शामिल सभी लोगों को साथ लेकर ज्यादा से ज्यादा आपदा प्रभावितों को दर्द बांटकर उनके राहत एवं पुनर्वास में पूरी ताकत के साथ जुट जाना चाहिए था वह मुख्यमंत्री सरकार की नाकामियों को छिपाने के साथ ही मीडिया मैनेजमेंट कर अपनी कुर्सी बचाने की जुगत में लगा हुआ है..! (जरुर पढ़ें- उतराखंड आपदा - एक कौम ऐसी भी..!)


गुरुवार, 27 जून 2013

उतराखंड आपदा - एक कौम ऐसी भी..!

उत्तराखंड में कुदरती आफत में सेना की राहत के बीच एक कौम ऐसी भी है जिसके लिए मानवीय संवेदनाएं कोई मायने नहीं रखती। उनके लिए आपदा भी एक पर्यटन सीजन की तरह है जिसमें वे अपना चेहरा चमकाने का कोई मौका नहीं छोड़ते..!
उत्तराखंड में भीषण त्रासदी के बाद से बीते कुछ दिनों में कुछ ऐसा हुआ जो किसी का भी सिर शर्म से झुकाने के लिए काफी है लेकिन खुद को जनता के कर्णधार बताने वाले इस कौम के लोगों को शर्म नहीं आती..! ये विपदा में घिरे इंसानों के हालातों पर भी अपनी नेतागिरी चमकाने का कोई मौका नहीं छोड़ते और लाशों पर भी अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने से गुरेज नहीं करते..!
शुरुआत जैसे तैसे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने विजय बहुगुणा से ही करें तो याद आता है कि किस तरह आपदा के बाद मुख्यमंत्री महोदय देहरादून से रुद्रप्रयाग पहुंचने के बाद वहां से सीधे दिल्ली के लिए उड़ गए। जिस बहुगुणा को लोगों को अपने चौपर से उतरकर लोगों के बीच जाकर उनका हौसला बढ़ाना था वो चाटुकारिता की सारी हदें पार करते हुए प्रभावितों को उनके हाल पर छोड़कर अपने आकाओं के पास दिल्ली के लिए उड़ गए..!
लौट कर वापस आए तो अपने आकाओं के साथ जिनके चक्कर में कई घंटे तक राहत एवं बचाव कार्य रोकना पड़ा...वजह बताई गई सुरक्षा..! लेकिन इस बात का जवाब किसी के पास नहीं था कि मौत के मुंह में फंसे करीब 80 हजार लोगों की जिंदगी की क्या कोई कीमत नहीं है..?
हवाई सैर को तरसने वाले उत्तराखंड सरकार के मंत्रियों, विधायकों के लिए तो मानो आपदा ने उनकी मन की मुराद पूरी कर दी। दे दनादन एक के बाद एक आपदा प्रभावित क्षेत्रों के दौरे के नाम पर मननीय खूब हवाई सैर कर रहे हैं। सरकार के एक कद्दावर मंत्री हरक सिंह रावत ने तो आपदा राहत सामग्री ले जाने की तैयारी में हैलिपेड में खड़े एक हेलिकॉप्टर से अपनी हवाई सैर के लिए राहत सामग्री तक उतरवा दी। अब इनके दौरों से आपदा प्रभावितों को कितना फायदा हुआ..? आपदा में फंसे कितने लोगों की जान इन्होंने बचाई ये  जगजाहिर है..!
अक्सर चर्चाओं में रहने वाले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी साहब का उत्तराखंड दौरा बहुगुणा सरकार के साथ ही केन्द्र सरकार को भी खल गया तो उन्होंने  किसी भी वीआईपी को आपदा प्रभावित क्षेत्रों में जाने पर रोक लगाने का आदेश जारी कर दिया लेकिन मजबूत पीआर वाले सीएम साहब ने 15 हजार गुजरातियों को बचाकर अपने साथ ले जाने का दावा कर सबकी नींद उड़ा दी...ये बात अलग है कि अब उस पर पार्टी की तरफ से सफाई पेश करने का दौर शुरु हो चुका है..!
अपने नेता के लिए अपने ही आदेश को पलटने वाले केन्द्रीय गृहंमंत्री सुशील कुमार शिंदे और बहुगुणा फिर विवादों में घिरे जब राहुल गांधी को तो उत्तराखंड के आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने की ईजाजत दे दी गयी जबकि दूसरे नेताओं को नहीं..!
ये छोड़िए अपदा के बीच अचानक से राहत सामग्री के ट्रकों को हरी झंडी दिखाते हुए दिल्ली में अपनी मां सोनिया गांधी के साथ प्रकट हुए राहुल गांधी ने जिन ट्रकों को प्रभावितों की मदद के लिए रवाना किया था उनके पहिए ऋषिकेश में जाकर थम गए...ख़बर है कि ट्रकों में आगे बढ़ने के लिए न तो डीजल है और न ही ट्रक ड्राईवरों के पास खाने के लिए पैसे..! अब इन ट्रकों को राहुल के उत्तराखंड दौरे की भूमिका तैयार करने के लिए और फोटो खिंचवाने के लिए रवाना किया गया था या फिर वास्तव में मदद का जज्बा था ये तो कांग्रेसी ही बेहतर जानते होंगे..! मैं तो कहता हूं कि एक बार इन ट्रकों का तिरपाल हटाकर भी देख लेना चाहिए कि ट्रकों में वाकई में राहत सामग्री है भी कि नहीं..!
वहीं उत्तराखंड पहुंचने में जिन राज्यों के मुख्यमंत्री पीछे रह गए वे धड़ाधड़ उत्तराखंड पहुंचने लगे और अपने अपने राज्यों के लोगों के बीच उनके रहनुमा बनने की कोई कसर नहीं छोड़ी।
देहरादून के जौलीग्रांट एयरपोर्ट पर आंध्र प्रदेश से कांग्रेस सांसद हनुमंत राव और टीडीपी सांसद रमेश राठौड़ की हरकतों ने तो शर्म को भी शर्म से पानी पानी कर दिया। वोटबैंक की राजनीति के लिए...खुद को आंध्र के लोगों का हिमायती दिखाने के लिए आपस में ही गुत्थम गुत्था हो गए।
भीषण आपदा के बीच लोगों को जान के लाले पड़े हुए थे...लोग भूख- प्यास से दम तोड़ रहे थे लेकिन नेता इसमें भी अपना अपना वोटबैंक तलाश रहे थे। ये सब पूरे देश की जनता के सामने हुआ लेकिन अफसोस इसके बाद भी ये नेता फिर से विधानसभा और संसद तक पहुंचेंगे..! हर बार यही तो होता आया है...क्या हम उम्मीद कर सकते हैं कि अब जागेगी देश की जनता..? और ऐसे नेताओं को सबक सिखाएगी..!

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मंगलवार, 25 जून 2013

वाह बहुगुणा ! हजारों मर गए, अब याद आया कर्तव्य..!

उत्तराखंड की बहुगुणा सरकार प्रदेश में आपदा प्रबंधन को लेकर कितनी तैयार थी इसकी पोल रुद्रप्रयाग, चमोली, उत्तरकाशी, और पिथौरागढ़ जिले में तबाही के बाद सबके सामने खुल ही चुकी है। शुक्र है सेना के जवानों का जिन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए हजारों लोगों को मौत के मुंह से निकालकर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। कैग की रिपोर्ट पहले ही आपदा प्रबंधन की जमीनी हकीकत को बेपर्दा कर चुकी है कि किस तरह 2007 में स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट ऑथोरिटी की आज तक कोई बैठक ही नहीं हुई है। ये छोडिए इस ऑथोरिटी ने आपदा से निपटने के लिए न कोई नियम कानून बनाए और न ही कोई दिशा निर्देश जारी किए। ऐसे में अब उत्तराखंड के राज्यपाल अजीज कुरैशी ने भी आपदा प्रबंधन के मोर्चें पर फेल बताया है। राज्यपाल ने कहा है कि उत्तराखंड की चार धाम यात्रा अव्यवस्थाओं से भरी पड़ी थी और आपदा आने पर इसके प्रबंधन की सरकार की कोई तैयारी नहीं थी।
राज्यपाल का चार धाम यात्रा की तैयारी और आपदा प्रबंधन को लेकर सरकार पर सवाल खड़ा करना अपने आप में बड़ी बात है। ये सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं क्योंकि बीते साल मई माह में उत्तराखंड का राज्यपाल नियुक्त होने के बाद अजीज कुरैशी ने सड़क मार्ग से बदरीनाथ धाम की यात्रा की थी। बदरीनाथ की यात्रा से लौटने के बाद राजभवन में राज्यपाल अजीज कुरैशी के आधे घंटे के साक्षात्कार के दौरान मैंने जब राज्यपाल से चार धाम यात्रा को लेकर सवाल किए तो राज्यपाल अजीज कुरैशी ने चार धाम यात्रा मार्ग में अव्यवस्थाओं को लेकर सरकार के खिलाफ खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर की थी। इतना ही नहीं राज्यपाल ने चारों धामों के लिए डेवलेपमेंट ऑथोरिटी बनाए जाने की भी वकालत की थी। इसके लिए राज्य सरकार को पत्र लिखकर निर्देशित भी किया था लेकिन बहुगुणा सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। (जरुर पढ़ें- उत्तराखंड के वो दिल्ली वाले मुख्यमंत्री..!)
आपदा प्रबंधन के मोर्चे पर पूरी तरह फेल होने के बाद भी राज्य के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा साहब को शर्म नहीं है..! बहुगुणा सरकार अखबारों और समाचार चैनलों में आपदा राहत कार्य के दौरान हजारों लोगों को बचाने का दावा करने वाले बड़े बड़े विज्ञापनों के जरिए वाहवाही लूटने में लगी है लेकिन सरकार के किसी नुमाईंदे के पास इस बात का जवाब नहीं है कि आखिर क्यों समय रहते आपदा प्रबंधन को लेकर सरकार ने कोई कदम क्यों नहीं उठाया..?
अखबारों औऱ टीवी चैनलों में लाखों रुपए के इन विज्ञापनों के जरिए विजय बहुगुणा के नाम से एक संदेश जारी किया गया है। संदेश हैं – प्रत्येक जीवन अमूल्य है- उसकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है- विजय बहुगुणा, मुख्यमंत्री उत्तराखंड।
मुख्यमंत्री साहब से सवाल करना चाहूंगा कि आपके इस कर्तव्य की याद आपको हजारों लोगों की मौत के बाद ही क्यों आई..?  हर साल उत्तराखंड में हजारों लोग आपदा की भेंट चढ़ते हैं लेकिन तब सरकार को...आपको अपना कर्तव्य याद क्यों नहीं आता..?
माना आप पिछले साल ही जैसे तैसे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने हैं (जरुर पढ़ें- विजय बहुगुणा कैसे बने मुख्यमंत्री ?) लेकिन आपके कुर्सी संभालने के बाद बीते साल उत्तरकाशी में आपदा ने सैंकड़ों लोगों को लील लिया था लेकिन तब भी आपको अपने इस कर्तव्य की याद नहीं आयी जिसे आप आज लाखों रुपए खर्च कर अखबारों और टीवी चैनलों में विज्ञापन के जरिए लोगों को बता रहे हैं कि आपका कर्तव्य क्या है..?
बीते साल तो आपदा प्रबंधन का खामियों का ठीकरा आपने पिछली भाजपा सरकार पर फोड़ दिया था लेकिन अब क्यों आपके पास कोई जवाब नहीं है..? सेना के जवान अपनी जान को जोखिम में डालकर लोगों की जान बचा रहे हैं और आप अखबारों में टीवी चैनलों को विज्ञापन जारी कर अपना चेहरा चमका रहे हैं। बहुगुणा साहब अखबारों, समाचार चैनलों में विज्ञापन के बजाए इस पैसे का इस्तेमाल आपदा प्रभावितों को राहत पहुंचाने में करते तो शायद आपदा पीड़ितों का दर्द कुछ कम होता लेकिन आपके लिए तो सरकारी पैसे से विज्ञापन जारी कर अपनी फोटो छपवाकर सरकार की छवि को सुधारने की ज्यादा चिंता है लेकिन ये मत भूलिए बहुगुण साहब की जनता को अब आप इतनी आसानी से नहीं बरगला सकते।


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सोमवार, 24 जून 2013

जिंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर

जिंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर, जान देने की रुत रोज आती नहीं...ये पंक्तियां मानो भारतीय सैनिकों के लिए ही रची गयी। सीमा पर दुश्मन को मुंह तोड़ जवाब देना हो या फिर देश के भीतर आयी कोई भीषण आपदा या विपदा सहारा सिर्फ और सिर्फ भारत के वीर सैनिकों का ही है। भारत के वीर जवानों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वे विपरित परिस्थितियों में भी किसी भी मुश्किल हालात का सामना कर सकते हैं। फिर चाहे सीमा पर दुश्मन की गोलियों का जवाब देना हो या फिर उत्तराखंड जैसे किसी राज्य में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे आपदा में फंसे हजारों लोगों को खतरों से भरे दुर्गम पहाड़ी इलाकों से सुरक्षित स्थान पर पहुंचाना हो।
उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग और चमोली के दुर्गम पहाड़ी इलाकों में जहां एक तरफ पहाड़ों से मौत के रुप में पत्थर और विशालकाय बोल्डर बरस रहे हों और दूसरी तरफ पूरे उफान पर नदियों में मौत बह रही हो...ऐसे रास्तों से आपदा में फंसे हजारों लोगों को सुरक्षित निकालना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है लेकिन भारतीय सेना के वीर जवानों ने अपनी जान की परवाह किए बगैर दिन रात एक करके हजारों लोगों की जिंदगी की उम्मीद को जिंदा रखा।
राहत एवं बचाव कार्य में लगे सभी जवानों का जोश और जज्बा देखने लायक है। खुद को मौत के मुंह में झोंक पर दूसरे की जान बचाना कोई इनसे सीखे।
अपने कंधों पर खतरों से भरे रास्ते पर उन श्रद्धालुओं को उठाकर पहाड़ों पर चढ़ना...जहां पर एक गलत कदम उन्हें पूरे उफान पर मौत के रुप में बहती नदियों में झोंक सकता है...वाकई में रोंगटे खड़े कर देता है लेकिन सेना के इन वीर जवानों के चेहरे पर इसके बाद भी कोई शिकन नहीं है। एक श्रद्धालु को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाकर वे दूसरे श्रद्धालु की जान बचाने में जी जान से जुट जाते हैं।
आईटीबीपी की आठवीं बटालियन के कमांडिग ऑफिसर जी एस चौहान कहते हैं कि आपदा के बाद कई जवानों ने तो पहले से स्वीकृत अपनी छुट्टियों पर जाने से खुद ही मना कर दिया और जो जवान छुट्टी पर थे भी वे लोग भी आपदा के बाद मुश्किल में फंसे लोगों की मदद करने के लिए वापस आ गए। सलाम है ऐसे वीर जवानों को।
तस्वीर का एक पहलू और देखिए एक तरफ ये जवान हैं जो अपनी जान जोखिम में डालकर लोगों की जान बचा रहे हैं और दूसरी तरफ हैं उत्तराखंड के वो दिल्ली वाले मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा जो आपदा के बाद आपदाग्रस्त क्षेत्रों में कैंप कर प्रभावितों का हौसला बढ़ाने की बजाए अपने उडनखटोले को दिल्ली की ओर मोड़ लेते हैं और जब वापस आते भी हैं तो देहरादून में बैठकर सुबह शाम प्रेस कांफ्रेंस कर इस आपदा को प्रकृति का कहर बताते हुए अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाडने का कोई मौका नहीं छोड़ते..! वैसे भी जिस व्यक्ति ने पहाड़ को, पहाड़ के लोगों की पीड़ा को कभी समझा ही नहीं उससे और क्या उम्मीद की जा सकती है..?

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रविवार, 23 जून 2013

15 हजार तक पहुंच सकता है मौत का आंकड़ा..!!!

केदारनाथ में प्रलय के बाद जैसे जैसे दिन गुजर रहे हैं वैसे वैसे मौत का आंकड़ा भी लगातार बढ़ता जा रहा है। तबाही थमने के बाद मौत का जो आंकड़ा पहले 15 से 20 लोगों का बताया जा रहा था अगले दिन वो संख्या 60 पर पहुंच गयी। इसी तरह मृतकों की संख्या इसके बाद 100 फिर 200 और फिर साढ़े पांच सौ से 700 तक बतायी जा रही है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा तो अब इस बात को स्वीकार कर चुके हैं कि ये संख्या एक हजार के करीब हो सकती है।
बहुगुणा भले ही एक हजार की संख्या में अटके हों लेकिन उत्तराखंड में खासकर केदारनाथ, रामबाड़ा और गौरीकुंड में हुई तबाही की तस्वीरें कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं। केदारनाथ के कपाट साल में सिर्फ छह माह के लिए खुलते हैं ऐसे में हर कोई इन छह माह में केदारनाथ के दर्शन कर धन्य हो जाना चाहता है। खासकर मई – जून में मैदानों में भीषण गर्मी और छुट्टियों का समय होने के कारण भी इस वक्त श्रद्धालु चार धाम यात्रा के लिए उत्तराखंड का रुख करते हैं। 14 किलोमीटर की खड़ी पैदल चढ़ाई होने के कारण चारों धामों में केदारनाथ धाम की यात्रा सबसे कठिन मानी जाती है।
गौरीकुंड से केदारनाथ की पैदल यात्रा शुरु होती है ऐसे में गौराकुंड केदारनाथ यात्रा का पहला और सबसे अहम पड़ाव है। दोपहर बाद या शाम के वक्त गौरीकुंड पहुंचने वाले अधिकतर यात्री गौरीकुंड में रात्रिविश्राम करते हैं और दूसरे दिन सुबह 14 किलोमीटर तक पैदल चढ़ाई शुरु करते हैं। बीते साल अप्रेल में केदारनाथ यात्रा पर हमारा पहला पड़ाव भी गौरीकुंड ही था और उस वक्त वहां के सभी होटल, धर्मशाला और लॉज यात्रियों से खचाखच भरे हुए थे। गौरीकुंड मे ही करीब 100 से ज्यादा छोटे बड़े होटल, धर्मशाला और लॉज हैं औऱ यात्रा सीजन में सारे होटल, धर्मशाला और लॉज फुल रहते हैं। अनुमान के मुताबिक यहां पर एक बार में 8 से 10 हजार यात्री रुकते हैं।
इसके बाद आधे रास्ते पर यानि 7 किलोमीटर पर रामबाड़ा पर यात्रा का अगला पड़ाव है और यहां पर भी बड़ी संख्या में अंधेरा घिरने पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु रात्रि विश्राम करते हैं। हालांकि यहां पर बड़े पक्के निर्माण नहीं है लेकिन इसके बाद भी यात्रियों के खाने पीने के साथ ही ठहरने के लिए पर्याप्त व्यवस्थाएं रहती हैं। यहां पर भी श्रद्धालुओं की ये संख्या करीब 4 से 5 हजार रहती है।
रामबाड़ा के बाद 7 किलोमीटर की यात्रा के बाद श्रद्धालु केदारनाथ धाम पहुंचते हैं। रात घिरने पर श्रद्धालु केदारनाथ में रात्रि विश्राम करते हैं और सुबह केदार बाबा के दर्शन के बाद श्रद्धालु केदारनाथ से वापस लौटते हैं। केदारनाथ में एक दिन में कम से कम 10 हजार श्रद्धालु मौजूद रहते हैं। साथ ही यहां के पुजारियों, पंडों और दुकान, होटल, लॉज, धर्मशाला संचालकों की संख्या करीब 5 हजार से ज्यादा रहती है। केदारनाथ पहुंचने के बाद हमने एक रात केदारनाथ में गुजारी थी और इस दौरान हमने देखा था कि सभी होटल, लॉज, धर्मशाला, गेस्ट हाउस पूरी तरह श्रद्धालुओं से भरे हुए थे।
इसके साथ ही केदारनाथ से रामबाड़ा और रामबाड़ा से गौरीकुंड के बीच के रास्ते में भी हजारों यात्री बिना रुके आ जा रहे होते हैं। चूंकि केदारनाथ में मौत का सैलाब सुबह करीब 8 बजे के आस पास आया था ऐसे में ज्यादातर यात्री धर्मशाला, होटल और लॉज के अदंर ही थे। मौत के इस सैलाब में जहां केदारनाथ, रामबाड़ा और गौरीकुंड के सभी होटल, लॉज और धर्मशालाओं जमींदोज हो गयी हैं तो ऐसे में अंजादा लगाया जा सकता है कि सिर्फ इन तीनों स्थानों पर ही कितने यात्रियों की मौत हुई होगी..?
उत्तराखंड सरकार ये आंकड़ा भले ही एक हजार के करीब होने का अनुमान लगा रही हो लेकिन वास्तव में मौत का ये आंकड़ा 15 हजार से भी बहुत ज्यादा है। इसके साथ ही बद्रीनाथ, हेमकुंड साहिब, गंगोत्री और यमुनोत्री के साथ आपदा प्रभावित दूसरे इलाकों में हुई मौतों का आंकड़ा अलग से है।
हम तो यही उम्मीद करेंगे कि मौत का आंकड़ा कम से कम हो लेकिन तबाही का ये मंजर और हालात तो कुछ और ही बयां कर रहे हैं..!
शासन प्रशासन तो बहुत कुछ नहीं कर पाया हालांकि इनसे बहुत ज्यादा उम्मीद भी नहीं थी लेकिन भारतीय सेना के उन सभी जवानों को सलाम है जिन्होंने दुर्गम पहाड़ी इलाकों में विपरित परिस्थितियों में न सिर्फ हजारों लोगों की जान बचाई बल्कि बिना रुके वे लगातार अपने लोगों की जिंदगियों को बचा रहे हैं।


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शुक्रवार, 21 जून 2013

त्रासदी - उत्तराखंडियों का क्या होगा..?

उत्तराखंड में आपदा में फंसे यात्रियों को निकालने के लिए राहत एवं बचाव कार्य जारी है...ये बात अलग है कि सुरक्षित स्थानों पर पहुंच रहे यात्रियों का अनुभव राहत एवं बचाव कार्य की चौंकाने वाली हकीकत सामने ला रहा है लेकिन फिर भी उम्मीद करते हैं कि सभी यात्री सकुशल अपने अपने घर पहुंच जाएं। (जरुर पढ़ें- ओ गंगा तुम, ओ गंगा बहती हो क्यों..?)
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद सरकार गति में आयी है और राहत एवं बचाव कार्य में अपेक्षाकृत तेजी दिखाई दे रही है लेकिन एक सवाल बार बार जेहन में उठ रहा है कि जब उत्तराखंड के उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग और चमोली जिले के अलग अलग क्षेत्रों में फंसे यात्रियों को सकुशल सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया जाएगा उसके बाद क्या होगा..?
जो लोग आपदा प्रभावित इलाकों के रहने वाले हैं...जिनकी घर-गृहस्थी पूरी तरह से तबाह हो चुकी है...जिनके पास सिर्फ शरीर के कपड़े छोड़कर और कुछ नहीं बचा है...जिनके घर के कमाने वाले अब उनसे बिछुड चुके हैं उनका क्या होगा..?
ये तो अभी मानसून की दस्तक मात्र थी...असली बरसात तो अभी बाकी है...ऐसे में कहां वे रहेंगे..? कैसे वे रहेंगे..? कैसे वे दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करेंगे..?
ऐसे तमाम सवाल हैं जो दिल को दुखा रहे हैं और लगातार उलझन में डाल रहे हैं...लेकिन शायद इसका जवाब न तो आपदा प्रभावितों के पास है और न ही उस सरकार के पास जिसने हर साल ऐसी ही आपदाओं से दो चार होने वाले इन लोगों की कभी सुध ली..!
जाहिर है सभी फंसे हुए लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने के बाद सरकार और प्रशासनिक मशीनरी सुस्त पड़ेगी और फिर से सरकार उसी पुराने ढर्रे पर लौट आएगी..! हालांकि मृतकों और घायलों के परिजनों के साथ ही अपना सबकुछ गंवा चुके लोगों को सरकारी मदद का ऐलान तो कर दिया गया है लेकिन ये मदद इनके लिए उसी तरह है जैसे ऊंट के मुंह में जीरा..!
अपनों को खो चुके लोगों की कमी तो ये राहत राशि कभी नहीं कर पाएगी लेकिन जिंदगी फिर से पटरी पर लौट सके इसका सिर्फ एक ही विकल्प है...सिर पर छत और जेब में पैसा..!
ऐसा नहीं है कि सरकार सिर्फ आर्थिक मदद देकर पल्ला झाड़ लेगी...बेघर हो चुके लोगों को पुनर्वासित करने के लिए भी सरकार काम करेगी लेकिन प्रभावितों का पुनर्वास कब तक हो पाएगा..?
उत्तराखंड में 2010 में आयी आपदा अगर आपको याद हो तो बताना चाहूंगा कि उस वक्त भी प्रदेश के अलग अलग जिलों में कुछ इस तरह का ही मंजर था। फर्क सिर्फ इतना था कि उस वक्त चार धाम यात्रा पर कुदरत का कहर इतना नहीं टूटा था और मौत का आंकड़ा भी इतना नहीं था लेकिन सैंकड़ों लोगों की घर-गृहस्थी आपदा भी भेंट चढ़ गयी थी। सरकार ने उस वक्त भी सभी प्रभावितों के राहत और पुनर्वास पर काम करते हुए सभी के पुनर्वास का दावा किया था लेकिन जमीनी हकीकत इससे इतर है...बीते दिनों एक टीवी चैनल पर आई एक रिपोर्ट ने इस सच्चाई पर से पर्द हटाते हुए दिखाया था कि आज भी कई परिवार ऐसे हैं जिन्हें राहत के नाम पर चंद सिक्के तो मिले लेकिन सिर पर छत आज तक नसीब नहीं हो पायी है...ये लोग आज भी टेंटों में जीवन बसर कर रहे हैं..!
वैसे भी राहत और पुनर्वास के नाम पर जारी कितना पैसा वास्तव में प्रभावितों तक पहुंच पाता है इस हकीकत से सभी वाकिफ हैं..!
ये ख़्याल तक मन में एक डर पैदा कर रहा है कि आपदा प्रभावित कैसे अपने आगे का जीवन बसर करेंगे..? क्योंकि सुस्ती के बाद सरकार की ये चुस्ती तभी तक है जब तक देशभर के यात्री उत्तराखंड में फंसे हैं..! जैसे ही सारे यात्रियों को सुरक्षित निकाल लिया जाएगा उसके बाद उत्तराखंड के आपदा प्रभावितों को दर्द साझा करने वाला कोई नहीं होगा..! (जरुर पढ़ें- उत्तराखंड के वो दिल्ली वाले मुख्यमंत्री..!)
वैसे भी उत्तराखंड सरकार के लिए तो पहाड़ के लोगों की दिक्कतें आम हैं...फिर चाहे सरकार भाजपा की रही हो या फिर कांग्रेस की उन्हें लगता है कि इन्हें तो हर साल बरसात में इस दर्द को बर्दाश्त करने की आदत है शायद इसलिए सब कुछ जानते हुए भी कि पहाड़ में मानसून का आगमन एक बड़ी विपदा का आगमन है सरकारें इससे निपटने के लिए न तो कोई प्रभावी कार्ययोजना तैयार की जाती है और न ही आपदा प्रबंधन के पर्याप्त इंतजामात किए जाते हैं..! नतीजा हर साल आसमानी आफत सैंकड़ों लोगों की जिंदगियां लील जाती है तो हजारों लोगों के सपनों को पानी में मिला देती है..! एक बार फिर वही स्थिति हैलोग आपदा का दर्द झेल रहे हैं लेकिन सवाल वहीं खड़ा है कि क्या इस बार टूटेगी सरकार की नींद..!


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बुधवार, 19 जून 2013

ओ गंगा तुम, गंगा बहती हो क्यों..?

उत्तराखंड में कुदरत के इस कहर से हर कोई हैरान है...शासन-प्रशासन बेबस है...हर किसी के जुबान पर यही सवाल है कि आखिर ये तबाही क्यों..? तबाही का ये मंजर दर्दनाक और दिल को दहला देने वाला जरुर है लेकिन आज नहीं तो कल ये होना ही था..! कुदरत अपना हिसाब खुद बराबर करती है...उसे न तो जेसीबी मशीन की जरुरत है न ही किसी विस्फोटक की..! उसने तो एक झटके में सब तहस नहस कर दिया..!
आसमान से बादलों की गर्जना शुरु हुई तो जीवनदायनि ने रौद्र रुप धारण कर लिया...पहाड़ों का सीना दरकने लगा और जीवन देने वाली मौत देने पर अमादा हो गयी..! रास्ते में जो मिला सब बहा कर ले गयीक्या घर, क्या सड़कें, क्या पुल, क्या गाड़ियां, क्या पेड़, क्या इंसान, क्या जानवर! भागीरथी मानो सब कुछ बहा ले जाना चाहती थी..!
चारों तरफ हाहाकार मचा था...हर कोई ये जानना चाहता था कि आखिर कुदरत क्यों इतना रूठ गयी है कि सब कुछ तबाह कर देना चाहती है..! इसका जवाब को लेकर एक बड़ी बहस शुरु हो सकती है लेकिन इसका जवाब तबाही के इस मंजर में ही छिपा हुआ है। याद कीजिए उत्तराखंड राज्य निर्माण से पहले का वो समय जब गंगा अविरल बहती थी...उसे अतिक्रमण की दीवारों में कैद करके नहीं रखा गया था..! 200-200 फिट चौड़ी गंगा को 20-20 फिट की नहरों मे तब्दील नहीं किया गया था। गंगा अपने तट पर बसने वाले करोड़ों लोगों को जीवन देते हुए बिना रुके बहती थी..!
इंसान हो, वनस्पतियां हों या फिर जानवर गंगा सबके लिए जीवनदायिनि थी लेकिन बीते कुछ सालों में गंगा का स्वरुप बदलता चला गया। गंगा को कभी बांधों ने बांधा तो कभी गंगा किनारे अवैध अतिक्रमण के नाम पर बने होटल, रेस्टोरेंट और अवैध बस्तियों ने गंगा की पहचान को ही खत्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ी..! अतिक्रमण से भी मन नहीं भरा तो होटल, रेस्टोरेंट और अवैध बस्तियों का मल मूत्र भी गंगा में ही डाला जाने लगा..! गंगा धीरे-धीरे एक गंदे नाले में तब्दील होने लगी..!
निर्मल पावन गंगा की जगह भ्रष्टाचार की मैली गंगा बहने लगी और हर कोई भ्रष्टाचार की इस गंगा में डुबकी लगाकर अपने ऐशो आराम की हर वस्तु पा लेना चाहता था..!
गंगा घुट- घुट कर बहने पर मजबूर होने लगी तो पेड़ों की अवैध कटाई से हरे भरे वनों से आच्छादित खूबसूरत पहाड़ियां भी कंक्रीट के जंगलों में तेजी से तब्दील होने लगी..! गंगा अतिक्रमण की बेड़ियों से मुक्त होकर अविरल करोड़ो लोगों को जीवन देते हुए बहना चाहती थी लेकिन गंगा के इस दर्द को किसी ने नहीं समझा..! ऐसे में भागीरथी क्या करती..?
कई बार छोटी मोटी आपदाओं के जरिए कुदरत ने अपने निजि स्वार्थों के लिए प्रकृति से खिलवाड़ कर रहे लोगों को संदेश देने की कोशिश भी की लेकिन कुदरत के ये इशारे समझने में इंसान नाकाम रहा या यूं कहें कि किसी ने समझने की कोशिश ही नहीं की..!
नासमझ लोगों को समझाने के लिए कुदरत के पास शायद आखिर में यही एक रास्ता था देवभूमि को विकृत होने से रोकने का...देवभूमि को वापस उसके स्वरूप में लाने का...तो कुदरत ने अपना रास्ता खुद बना लिया..!
इसका ये मतलब कतई नहीं है कि पहाड़ों में विकास कार्य न किए जाएं...वहां के लोग बिजली, पानी और सड़क से महरूम रहें लेकिन प्रकृति से छेड़छाड किए बिना भी तो ये सब संभव है। प्रभावी कार्ययोजना के साथ...निजि स्वार्थों को त्याग कर भी तो पहाड़ों में विकास की गंगा बहायी जा सकती है। इस तरह पहाड़ की खूबसूरती भी बरकरार रहेगी और भागीरथी के प्रवाह को रोकने की भी जरुरत नहीं पड़ेगी लेकिन अफसोस ऐसा होता नहीं है..!
तबाही के इस भयावह मंजर के बाद भी शासन-प्रशसान के साथ ही स्थानीय लोग सबक लें तो भी भविष्य में ऐसी आपदाओं को रोका तो नहीं जा सकता लेकिन इससे होने वाले जान माल के नुकसान को कम जरुर किया जा सकता है। लेकिन सवाल फिर खड़ा होता है कि क्या ऐसा कभी हो पाएगा..?
आखिर में गंगा की हालत और तबाही के इस मंजर पर गंगा पर लिखी गयी ये पंक्तियां याद आ रही हैं।

विस्तार है अपार प्रजा दोनों पार
करे हाहाकार निःशब्द सदा
ओ गंगा तुम, गंगा बहती हो क्यों
नैतिकता नष्ट हुयी, मानवता भ्रष्ट हुयी
निर्लज्ज भाव से बहती हो क्यों
इतिहास की पुकार करे हुंकार
ओ गंगा की धार निर्बल जन को
सबल संग्रामी समग्र गामी बनाती नहीं हो क्यों
ओ गंगा तुम, गंगा बहती हो क्यों


deepaktiwari555@gmail.com

मंगलवार, 18 जून 2013

उत्तराखंड के वो दिल्ली वाले मुख्यमंत्री..!

सुना है...उत्तराखंड के दिल्ली वाले मुख्यमंत्री आजकल भारी टेंशन में हैं..! विजय बहुगुणा को जैसे तैसे मुख्यमंत्री की कुर्सी तो मिल गयी लेकिन करना क्या है..? ये कौन बताए..? ऐसे में देहरादून में हैलीपेड पर सीएम साहब का सरकारी चौपर फर्राटे भरने के लिए हरदम तैयार रहता है। क्या पता..? कब क्या पूछने दिल्ली जाना पड़ जाए..? अब हर फैसले खुद से तो ले नहीं सकते न..! साहब को दस जनपथ में ताल भी तो ठोंकनी होती है ताकि 10 जनपथ के चक्कर लगा लगाकर बड़ी मुश्किल से हाथ आई कुर्सी कहीं सरक न जाए..!
दरअसल ख़बर है कि लंबे चौड़े कद वाले सीएम साहब को छोटे प्रदेश की बड़ी कुर्सी संभालने में पसीने छूट रहे हैं..! जब कुर्सी मिली थी तो अपनी ही पार्टी के नेताओं ने विरोध में मोर्चा खोल दिया था...जैसे तैसे मामला ठंडा पड़ा तो बीते साल आपदा ने उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों का नक्शा ही बदल कर रख दिया..!
सरकार पर सवाल उठने लगे तो नए नवेले मुख्यमंत्री बने बहुगुणा ने आपदा प्रबंधन के पर्याप्त इंतजामात न होने पर इसका ठीकरा सूबे की पिछली भाजपा सरकार पर फोड़ दिया। यहां तक तो ठीक था लेकिन इसके बाद आपदा प्रभावितों के राहत और पुनर्वास पर जोर देने की बजाए सीएम साहब ने प्रभावितों को भजन कीर्तन करने की तक सलाह दे डाली थी..!  
एक बार फिर से उत्तराखंड आपदा की चपेट में हैं...बीते साल भाजपा सरकार पर आपदा प्रबंधन की तैयारी न होने का ठीकरा फोड़ने वाले सीएम साहब पशोपेश में हैं कि करें तो क्या..?
अपनी ही पार्टी के नेताओं और विधायकों की आपदा से पहले ही घिरे बहुगुणा के लिए दैवीय आपदा दोहरी मुसीबत लेकर आयी है..! अब तो बीते साल वाला बहाना भी नहीं चलेगा वरना ठीकरा पिछली भाजपा सरकार पर फोड़कर अपना पल्ला झाड़ लेते..!
भारी टेंशन में घिरे सीएम साहब की मुश्किल अब कैसे आसान हों..? एक सुपुत्र से बड़ी उम्मीद थी लेकिन उसने भी टिहरी उपचुनाव में कहीं का नहीं छोड़ा..! लेकिन सुना है कई विधाओं में माहिर सुपुत्र खूब खेल कर रहे हैं..! सुना तो यहां तक है कि साहब ने तो प्रदेश में कई जगह जमीन पर रहते हुए ही करोड़ों का खेल कर दिया..! राजनीति चले न चले जीवन की गाड़ी पूरे ठाठ से बिना रुके चले इसका पूरा इंतजाम तो कर ही लिया है..!  
दिल्ली की दौड़ लगाने को हरदम तैयार बैठे रहने वाले बहुगुणा अब दिल्ली जाने में भी घबरा रहे हैं..! दरअसल हरियाणा के हथिनी कुंड बैराज से पानी यमुना के रास्ते दिल्ली पहुंच गया है। यमुना खतरे के निशान से ऊपर बह रही है ऐसे में बाढ़ के मुहाने में बैठी दिल्ली में कोई क्यों आना चाहेगा भला..? हिमाचल प्रदेश में मंडी उपचुनाव के लिए प्रचार करने किन्नौर पहुंचे मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ये गलती कर ही चुके हैं और सांगला घाटी में फंसे हुए हैं..!
सुना है बहुगुणा बड़े चतुर हैं..! वे वीरभद्र सिंह जैसी गलती नहीं करेंगे..! सीएम हाउस में बैठकर दिल्ली आने जाने में हुई डेढ़ साल की थकान उतारेंगे और फिर जब इंद्र देव की कृपा कम होगी और गंगा- यमुना शांत हो जाएंगी तो फिर से दिल्ली चले जाएंगे..! लेकिन सीएम साहब दिल्ली यूं ही नहीं जाएंगे बकायदा उत्तराखंड के आपदा प्रभावितों के राहत और पुनर्वास के नाम पर करोड़ों का पैकेज मागेंगे और फिर मीडिया में बघारेंगे कि उन्हें आपदा प्रभावितों की बड़ी फिक्र है...इसके लिए पांच साल में पांच हजार बार भी दिल्ली के चक्कर लगाना पड़े तो खुशी से लगाउंगा..! जय उत्तराखंड।।



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रविवार, 16 जून 2013

गठबंधन - दोस्त बन गए दुश्मन..!

17 साल तक मजबूती से बंधी भाजपा और जद यू बंधन की गांठ आखिर खुल ही गयी। दोनों के रास्ते भले ही अलग अलग हो गए हों लेकिन दोनों की मंजिल एक ही है...किसी भी तरह से सत्ता को हासिल करना..! 17 साल पहले भी जब ये गांठ बंधी थी तब भी दोनों सत्ता पाने के लक्ष्य को लेकर साथ हो चले थे और आज जब ये गांठ खुल गयी है तो भी दोनों की निगाहें सत्ता पर ही हैं..!
वैसे भी राजनीति की यही रीत है...यहां न तो कोई स्थायी दुश्मन होता है और न ही स्थाई दोस्त..! जब..जहां...जो उपयोगी लगता है...वो दोस्त बन जाता है और जब इसी दोस्त से अपना नुकसान लगने लगता है तो दोस्ती को तोड़ने में देर नहीं की जाती...फिर भले ही ये दोस्ती 17 साल पुरानी क्यों न हो..?
भाजपा और जद यू की दोस्ती की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। सत्ता हासिल करने के लक्ष्य को लेकर 17 साल पहले दोनों ने हाथ मिलाया था। दोनों एक दूसरे के काम भी आए और समय समय पर आपसी समझौते के आधार पर दोनों ने सत्ता सुख भी भोगा...फिर चाहे वो केन्द्र का मामला हो या फिर बिहार का..!
दोस्ती में उतार चढ़ाव आते रहते हैं लेकिन खासकर मुसीबत में सच्चे दोस्त कभी साथ नहीं छोड़ते लेकिन अगर ये दोस्ती राजनीतिक हो और सत्ता सुख भोगने के लिए की गयी हो तो फिर इस दोस्ती को दुश्मनी में बदलने में देर नहीं लगती..!
जद यू और भाजपा की दोस्ती भी राजनीतिक थी ऐसे में देर सबेर इस दोस्ती को टूटना ही था। लंबे समय से केन्द्र की सत्ता से दूर भाजपा हर हाल में सत्ता पाने को आतुर है ऐसे में भाजपा को मोदी की बढ़ती लोकप्रियता इसका रास्ता दिखाई देने लगी तो भाजपा ने तमाम विरोधों के बाद भी मोदी की ताजपोशी 2014 की चुनाव अभियान समिति के चेयरमैन की कुर्सी पर कर दी।
मोदी को सांप्रदायिक मानने वाली जद यू को भाजपा का ये फैसला बिहार में उसके लिए नुकसान की चाबी लगा..! ऐसे में जद यू को भाजपा के साथ दोस्ती में एक खास वर्ग के वोटरों का उससे खिसक जाने का भय लगने लगा तो जद यू ने भाजपा से 17 साल पुरानी दोस्ती तोड़ दी..!
भाजपा और जद  दोनों में से किसी ने भी 17 साल पुरानी इस दोस्ती को कायम रखने की कोशिश नहीं की और दोनों ही अपनी – अपनी जिद पर अड़े रहे। मजे की बात तो ये है कि बंधन की गांठ खुलने पर दोनों अब एक दूसरे को दोषी ठहरा रहे हैं..!
राजनीति के इस रुप को भी समझिए जो नेता अब तक साथ मिलकर बिहार की जनता के हक की बात करते हुए अलग अलग मुद्दों पर एक स्वर में फैसले लेते थे अब उन्हीं नेताओं में एक-एक मुद्दे पर तकरार सुनाई देगी..! शुरुआत भाजपा ने नीतीश कुमार का इस्तीफा मांग कर और 18 जून को बिहार बंद के एलान के साथ कर ही दी है..!
बहरहाल अपने अपने राजनीतिक फायदे के लिए वोटबैंक की राजनीति के रास्ते पर दोनों दल भले ही चल दिए हों लेकिन इन्हें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि जो जनता इन्हें सत्ता तक पहुंचा सकती है...वही जनता इन्हें सत्ता से बेदखल भी कर सकती है..!


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शनिवार, 15 जून 2013

नीतीश तो 2002 से खा रहे हैं मरने की दवा..?

एनडीए से जद यू के अलग होने की संभावनाओं के बीच बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक शेर पढ़ते हुए अपने दिल की बात कुछ यूं कही...दुआ देते हैं जीने की, दवा देते हैं मरने की...नीतीश कुमार के इस शेर का मतलब तो आप समझ ही गए होंगे कि इस शेर में दुआ का क्या मतलब है और दवा के क्या मायने हैं।
जाहिर है भाजपा-जद यू गंठबंधन को न तोड़ने की भाजपा की मंशा को नीतिश ने दुआ में व्यक्त किया है तो गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को चुनाव अभियान समिति का चेयरमैन बनाने को नीतीश ने दवा के रुप में..! कुल मिलाकर नीतीश के तेवरों और इस शायराना अंदाज का साफ मतलब है कि नीतीश 2014 के लिए मोदी को भाजपा के संभावित पीएम पद के उम्मीदवार के रुप में किसी भी कीमत में स्वीकार नहीं करना चाहते हैं फिर चाहे इसके लिए जद यू और भाजपा का 17 साल पुराना साथ ही क्यों न छूट जाए..!
सेक्यूलरिज्म की बात करने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को मोदी 17 सालों तक सेक्यूलर नजर आते हैं लेकिन बात जब प्रधानमंत्री की कुर्सी की आती है तो यही मोदी नीतीश कुमार को सांप्रदायिक नजर आते हैं। सिर्फ सांप्रदायिक नजर आते तो ठीक था लेकिन यहां तो नीतीश को मोदी मरने की दवा लगने लगे हैं..!
ये वही नीतीश कुमार हैं जो 2002 में गुजरात में हुए दंगों के वक्त केन्द्र की तत्कालीन एनडीए सरकार में रेलमंत्री थे। दंगों की वजह से ही नीतीश मोदी को मरने की दवा कह रहे हैं लेकिन अगर वाकई में ऐसा है तो सवाल तो नीतीश पर उठता है कि आखिर क्यों नीतिश ने तब रेल मंत्री की कुर्सी से इस्तीफा देकर अपने रास्ते अलग कर लिए..?
ये छोड़िए इसके बाद क्यों उसी मोदी वाली भाजपा के साथ मिलकर बिहार में विधानसभा चुनाव भी लड़ा..? तब तक भी नीतीश को मोदी सांप्रदायिक नहीं दिखाई दिए..! नीतीश यहां ये तर्क भले ही दे सकते हैं कि वे समय समय पर मोदी का विरोध करते रहे हैं लेकिन इसके बाद भी तो नीतीश मोदी वाली पार्टी के साथ मिलकर ही बिहार में सरकार चला रहे हैं..!
अब मोदी वाली भाजपा में जब मोदी का कद बढ़ रहा है तो नीतीश कुमार एंड कंपनी के पेट में दर्द होने लगा है और वे मोदी के नाम पर भाजपा से गंठबंधन तोड़ने की तैयारी कर रहे हैं..!
नीतीश कुमार जी ये तब भी मोदी वाली ही भाजपा थी जब आप 2002 में एनडीए सरकार में रेल मंत्री थे...ये तब भी मोदी वाली ही भाजपा थी जब आपने बिहार में भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और ये अब भी मोदी वाली वही भाजपा है जिससे अब आप जीने की दुआ के साथ मरने की दवा खिलाने की बात कर गंठबंधन तोड़ने की बात कर रहे हैं..!
नीतीश जी शेर तो आपने आज पढ़ा लेकिन आपके ही अनुसार मरने की दवा तो आप 2002 से खा रहे हैं क्योंकि 2002 में शाद आपसे रेलमंत्री की कुर्सी का मोह नहीं छूट रहा था और उसके बाद बिहार में जद यू की सरकार बनाकर मुख्यमंत्री बनने का सपना आपको साकार करना था..!
सही मायने में राजनीति शायद इसी का नाम है...जब तक अपना फायदा है तब तक सब ठीक है...किसी से भी दोस्ती करने में परहेज नहीं है लेकिन जब अपना नुकसान लगने लगे या फिर सामने वाले आगे बढ़ने लगे तो उसकी टांग खींच दो..!
जद यू भी यही कर रही है...नीतीश को लगता है कि पीएम पद के उम्मीदवार के लिए मोदी के नाम पर सहमति जताने से बिहार का अल्पसंख्यक वोटर उनसे कट जाएगा तो भाजपा को लगता है मोदी की लोकप्रियता के नाम पर 2014 में उनकी नैया तर जाएगी..! लेकिन भाजपा और जद यू दोनों को ही ये नहीं भूलना चाहिए कि ख्वाब वे चाहे जितने बड़े देख लें लेकिन जनता के साथ के बिना ये साकार नहीं हो सकते... क्योंकि ये पब्लिक है...ये सब जानती है..!


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