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शुक्रवार, 14 जून 2013

नौ साल का वनडे मैच..!


आर्थिक सुधार कोई वन डे मैच नहीं है जिसमें हर गेंद पर विकेट गिरने या छक्का लगने की उम्मीद की जा सके..ये कहना है वित्त मंत्री पी चिदंबरम का। वैसे इसका आशय भी आप समझ ही गए होंगे कि चिदंबरम साहब कहना चाह रहे हैं कि आर्थिक सुधारों के लिए सरकार को और वक्त चाहिए। यूपीए सरकार को नौ साल हो गए हैं लेकिन बकौल चिदंबरम आर्थिक सुधारों के लिए ये नौ साल भी कम हैं..!
चिदंबरम की गणित को समझा जाए तो फिर आर्थिक सुधारों की दिशा में सरकार द्वारा उठाए गए कदमों के बेहतर नतीजे के लिए ये वक्त काफी नहीं है और यूपीए सरकार को कम से कम 50 साल शासन करने का मौका और दिया जाना चाहिए तब जाकर देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर आएगी..!
आर्थिक सुधारों के विषय में अपना सामान्य ज्ञान तो चिबंदरम के आगे कहीं टिकटा नहीं ऐसे में चलिए मान लेते हैं कि चिदंबरम साहब सही कह रहे हैं कि आर्थिक सुधार कोई वन डे मैच नहीं हैं लेकिन ये समझ नहीं आया कि फिर नौ साल तक यूपीए सरकार ने क्या काम किया..? अब जबकि सरकार का कार्यकाल सिर्फ एक साल बचा है तो चिदंबरम जनता को आर्थिक सुधार और वन डे मैच का गणित समझा रहे हैं..!
अरे चिदंबरम साहब आर्थिक सुधारों के संबंध में आपका सामान्य ज्ञान ज्यादा अच्छा होगा लेकिन वन डे मैच और 9 साल के यूपीए सरकार के कार्यकाल को देश की जनता आप से बेहतर ही समझ रही है।
नौ सालों में जब हर गेंद पर घोटालों और भ्रष्टाचार के रिकार्ड आपकी सरकार में शामिल लोग बना सकते हैं लेकिन देश की अर्थ व्यव्स्था को पटरी पर लाने के सवाल पर आप कहते हो कि आर्थिक सुधार कोई वनडे मैच नहीं है। चिदंबरम साहब सरकार में शामिल लोगों को ध्यान अगर घोटालों और भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं होता तो शायद अर्थ व्यवस्था की ये हालत ही नहीं होती..! लेकिन अगर सरकार को अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की चिंता होती तो फिर नेताओं की जेबें घोटालों और भ्रष्टाचार की कमाई से कैसे भरती..?
रुपए की लगातार गिरावट पर चिदंबरम ये कहते हुए खुद के साथ ही जनता को दिलासा दे रहे हैं कि ब्राजील, मैकेसिको और चिली जैसे देश भी खराब दौर से गुजर रहे हैं..! गजब है चिदंबरम साहब तुलना भी कर रहे हो तो ब्राजील, मेक्सिको और चिली से...कभी चीन और जापान की बात भी तो कर लिया करो..आप तो ये देखकर खुश होने में लगे हैं कि चिली, मैक्सिको और ब्राजील भी ख़राब दौर से गुजर रहे हैं..!
दोष आपका भी नहीं है चिदंबरम साहब, जब देश के प्रधानमंत्री देश वासियों का सामान्य ज्ञान ये कहकर बढ़ाते हैं कि पैसे पेड़ पर नहीं लगते तो फिर आपसे क्या उम्मीद की जा सकती है..!

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बुधवार, 12 जून 2013

तौलिया मास्टर और कांडा..!

आईपीएल के तौलिया माटर एस श्रीशांत तिहाड़ से बाहर आ गए हैं। बड़े खुश हैं श्रीशांत महाराज...जेल में श्रीशांत को कांडा गुरु जो मिल गए। कांडा से श्रीशांत इतने प्रभावित हैं कि कांडा की तारीफ करते नहीं थक रहे हैं। कांडा को तो जानते ही होंगे न आप...वही गोपाल कांडा...हरियाण का पूर्व मंत्री जो एयर होस्टेस गीतिका आत्महत्या केस में फिलहाल तिहाड़ जेल में बंद है..!
तौलिया मास्टर कह रहे हैं कि गोपाल कांडा ने जेल में उसका खूब हौसला बढ़ाया...टिप्स भी दिए कि कैसे बुरे वक्त में हिम्मत रखी जाती है। श्रीशांत ने कांडा की तारीफ तो कि लेकिन ये नहीं बताया कि कांडा ने उसे और क्या क्या गुरुमंत्र दिए हैं..? जैसे- कैसे लड़कियों का शोषण करो..? कैसे लड़कियों को ब्लैकमेल करो..? कैसे उन पर अत्याचार करो..? और उन्हें आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर दो..? (पढ़ें ख़बर - तिहाड़ में गोपाल कांडा ने दिए श्रीशांत को 'टिप्स')
अब श्रीशांत ने कितनी सीख ली ये तो श्रीशांत ही जानें लेकिन जिस तरह से जेल से जमानत पर बाहर आने पर श्रीशांत गोपाल कांडा की तारीफ करते नहीं अघा रहे थे उससे तो यही लगता है कि कांडा और श्रीशांत की तिहाड़ में आपस में खूब जमी..!
अरे तौलिया मास्टर अब तो शर्म करो..! और अगर तारीफ ही करनी थी तो किसी दूसरे की कर लेते...लेकिन लगता है कांडा के कारनामों से तुम ज्यादा ही प्रभावित दिखे..! खैर इसमें तुम्हारा भी दोष नहीं है...तिहाड़ में वैसे भी तुम्हें गोपाल कांडा जैसे लोगों के अलावा और मिलता भी कौन..?  
एक ठहरा राजनेता और दूसरा क्रिकेटर...दोनों के पास दौलत और शोहरत की कोई कमी नहीं थी..! लेकिन इनको ये रास नहीं आयी और अपनी अय्याशी के लिए एक ने अपनी ही कंपनी की एयर होस्टेस का जमकर शारीरिक और मानसिक शोषण कर उसे आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया तो दूसरे ने उस खेल को कलंकित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जिस खेल ने उसे दौलत और शोहरत के शिखर पर पहंचाया..!
ये छोड़िए इतना सब होने के बाद भी दोनों खुद को निर्दोष ठहरा रहे हैं और एक दूसरे की तारीफ में कसीदे गढ़ रहे हैं..! अब दोनों वाकई निर्दोष हैं तो भई कम से कम दोनों तिहाड़ जेल प्रबंधन को अपनी मेहमान नवाजी का मौका तो नहीं ही दे रहे होते..!  


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मंगलवार, 11 जून 2013

चिट्ठी में लिखे शब्द कैसे वापस लोगे आडवाणी जी..?

आडवाणी पीएम पद के उम्मीदवार की रेस में मोदी से न जीत पाए तो क्या..? ग्वालियर में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तारीफ, गोवा बैठक से पहले आडवाणी की बीमारी और फिर मोदी की चुनाव अभियान समिति के चेयरमैन पद पर ताजपोशी के बाद पार्टी के सभी पदों से आडवाणी के इस्तीफे की चिट्ठी ने इतना काम तो कर ही दिया है कि जिस मोदी के सहारे भाजपा 2014 में केन्द्र की सत्ता में 10 साल बाद वापसी का ख्वाब देख रही है, वो ख्वाब पूरा होना अब इतना आसान नहीं रहा जितना कि भाजपा के इस नाटकीय घटनाक्रम से पहले लग रहा था..!
आडवाणी की बीमारी तक तो भाजपा के लिए सब कुछ इतना नहीं बिगड़ा था लेकिन पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को लिखी आडवाणी के इस्तीफे की चिट्ठी ने भाजपा की साख पर ही बट्टा लगा दिया। आडवाणी ने जिस तरह से चिट्ठी में पार्टी की दिशा दशा को लेकर सवाल उठाए वो हैरान करने वाला था..! आडवाणी के इन सवालों ने न सिर्फ भाजपा के विरोधियों को भाजपा पर पूरी तरह से हावी होने का मौका दिया बल्कि 2014 को लेकर भाजपा की उम्मीदों पर भी कुठाराघात का काम किया..!  
मान मनौव्वल के बाद आडवाणी ने भले ही अपना इस्तीफा वापस ले लिया हो लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मिलकर भाजपा को शिखर में पहुंचाने वाले आडवाणी ने ही भाजपा को एक झटके में धरातल में लाने में कोई कसर नहीं छोड़ी..!
आडवाणी ने इस्तीफा तो वापस लिया लेकिन आडवाणी पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को लिखी चिट्ठी में लिखे अपने शब्दों रुपी उन बाणों को चाहकर भी वापस नहीं ले सकते जिन बाणों के निशाने पर उनकी अपनी ही पार्टी है..! और ये बाण 2014 में भाजपा को लहूलुहान भी कर सकते हैं..!
आडवाणी ने ये सब शायद इसलिए भी किया क्योंकि उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं था...इस सब से आडवाणी जैसे तैसे पीएम पद की उम्मीदवारी पा जाते तो ये आडवाणी का प्लस ही होता लेकिन आडवाणी की बीमारी और खासकर चिट्ठी से भाजपा और मोदी दोनों कुछ पाने से पहले ही बहुत कुछ खोने की स्थिति में आ गए हैं..!


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सोमवार, 10 जून 2013

वो तेरे नसीब की बारिशें, किसी और छत पे बरस गयीं...

लाल कृष्ण आडवाणी ने राजनाथ सिंह को लिखी इस्तीफे की अपनी चिट्ठी में न सिर्फ अपने दर्द को बयां किया बल्कि ये भी लिखा कि जिस पार्टी का ध्येय देश सेवा हुआ करता था वह पार्टी अब नेताओं के निजि हितों को पूरा करने का माध्यम बन गयी है।
ये बात जगजाहिर हो चुकी है कि आडवाणी को पार्टी का उनकी इच्छा के खिलाफ मोदी को चुनाव अभियान समिति का चेयरमैन बनाने के फैसले पर आपत्ति है लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आडवाणी खुलकर इस बात को क्यों नहीं कहते कि उन्हें पीएम पद के उम्मीदवार के तौर पर हो रही मोदी की ताजपोशी की तैयारी से दिक्कत है और वे खुद एक बार फिर से पीएम पद के उम्मीदवार बनना चाहते हैं..?
पार्टी में गिने चुने नेताओं को छोड़ दें तो कोई भी इस बात को कहने वाला नहीं है कि आडवाणी 2014 के लिए भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार हों..! आडवाणी मोदी के बढ़ते कद से तो नाराज़ हैं लेकिन खुद न तो इस बात को कह रहे है कि मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार न बनाया जाए और न ही ये कि पीएम पद की उम्मीदवार वे खुद बनना चाहते हैं..!
माना कि आडवाणी खुद पीएम पद का उम्मीदवार नहीं बनना चाहते तो फिर वे विकल्प सुझाएं न...वे क्यों नहीं अपनी दिल की पूरी बात कहते कि फलां नेता के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाए और फलां नेता को ही पीएम पद का उम्मीदवार बनाया जाए..?
जाहिर है आडवाणी कि खुद की इच्छा है कि वे पीएम पद के उम्मीदवार बनें और शायद इसलिए ही मोदी की चुनाव अभियान समिति के चेयरमैन पद पर ताजपोशी से आडवाणी को ये आभास हो गया है कि अब मोदी पीएम पद के उम्मीदवार की दौड़ में उनसे कहीं आगे निकल गए हैं..! ऐसे में आडवाणी ने पार्टी में उनकी एक न सुनी जाने पर पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा देकर पार्टी के काम काज के तरीके और औचित्य पर ही सवाल खड़ा कर दिया..!
राजनीति भी गजब है जिस पार्टी को खड़ा करने में आडवाणी ने अपना पूरा जीवन लगा दिया उस पार्टी की कार्यप्रणाली और दशा-दिशा पर अब आडवाणी खुद ही सवाल उठाने लगे हैं और खुद के साथ ही पार्टी की भी मिट्टी पलीत करने में लगी हैं।
आडवाणी जी ये कैसा आपका पार्टी प्रेम हैं...खुद के निजि हित पूरे होते नहीं दिखाई दे रहे तो पार्टी पर ही सवाल खड़ा कर दिया..! और बात कर रहे हैं कि पार्टी नेताओं के निजि हितों को पूरा करने का माध्यम बन गयी है।
जिस पार्टी के साथ आडवाणी ने अपना पूरा जीवन गुजार दिया उम्र के इस पड़ाव में आडवाणी उस पार्टी का दमन छोड़कर अलग पार्टी का गठन या किसी दूसरे दल में तो शामिल होंगे नहीं..! ताउम्र भाजपा के प्राथमिक सदस्य तो बने ही रहेंगे फिर भी अपनी पार्टी की मिट्टी पलीत करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं..!
यहां आडवाणी की बात पर गौर कीजिए...आडवाणी कहते हैं कि वे पार्टी के काम करने के तरीके और दशा दिशा से खुद को इसलिए नहीं जोड़ पा रहे हैं कि क्योंकि उन्हें लगता है कि भाजपा अब वो पार्टी नहीं रही जिसका ध्येय राष्ट्र व राष्ट्र के लोगों की सेवा हुआ करता ।  
आडवाणी जी आप राष्ट्र सेवा की बात कर रहे हैं तो क्या सिर्फ पार्टी में रहकर या पीएम की कुर्सी पाकर ही राष्ट्र व राष्ट्र के लोगों की सेवा की जा सकती है..? क्या जो लोग किसी न किसी पार्टी के महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हैं या पीएम जैसी कुर्सी पर बैठे हैं वे ही लोग राष्ट्र सेवा कर रहे हैं..?
जाहिर है राष्ट्र व राष्ट्र के लोगों की सेवा के लिए पार्टी या कुर्सी की जरुरत नहीं है बस सेवा करने का भाव दिल में होना चाहिए वरना जो लोग राजनीतिक दलों में बड़े पदों पर हैं या पीएम की कुर्सी पर बैठे हैं वे लोग कैसी देश सेवा कर रहे हैं ये तो देश बरसों से देखता आ रहा है..!
बहरहाल भाजपा में घमासान जारी है...लाल कृष्ण आडवाणी को इस्तीफा वापस लेने के लिए उन्हें मनाने की पूरी कोशिश की जा रही है ऐसे में देखना ये होगा कि आडवाणी के निजि हित पार्टी पर भारी पड़ेंगे या फिर आडवाणी भाजपा के लिए इतिहास हो जाएंगे। फिलहाल तो आडवाणी जी के लिए एक मशहूर शेर याद आ रही है-
वो तेरे नसीब की बारिशें, किसी और छत पर बरस गयीं
जो तुझे मिला उसे याद कर, जो न मिला उसे भूल जा


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रविवार, 9 जून 2013

शराब चीज ही ऐसी है न छोड़ी जाए

शराब चीज ही ऐसी है न छोड़ी जाए...पंकज उधास की गज़ल के ये बोल तो आपने सुने ही होंगे। मैंने भी आज से पहले इन बोलों को सिर्फ सुना ही था इसे साक्षात रुप में देखा नहीं था लेकिन रविवार को ये बोल मुझे बकायदा दौड़ते हुए दिखाई दिए। दरअसल मैं अपने एक मित्र के साथ दिल्ली के मयूर विहार फेज थ्री की मार्केट से गुजर रहा था। हमने देखा कि मार्केट के साथ ही लगे पार्क के सामने मदिरा की दुकान पर खूब रौनक थी।
मदिरा की दुकान के सामने पार्क में भी शराबियों की महफिल सजी हुई थी। इसी बीच दिल्ली पुलिस के दो जवान डंडा फटकारते हुए पार्क में दाखिल हुए तो पार्क में भगदड़ मच गयी। पुलिस कर्मियों के तेवर देखकर समझ में आ गया था कि उनका इरादा किसी को पकड़ने का नहीं था बस पार्क में मदिरा का सेवन कर रहे लोगों को खदेड़ना था। शायद ये पुलिसकर्मियों की रोज की एक्सरसाईज थी खैर जो भी हो लेकिन पार्क का नजारा बड़ा ही जबरदस्त था...शायद में इसे उस अंदाज में शब्दों में न बयां कर पाऊं...फिर भी कोशिश करता हूं।
दोनों पुलिस जवान अलग-अलग दिशा में शराबियों को डंडा फटकारते हुए खदेड़ने लगे। इसी बीच मेरी नजर एक युवक पर पड़ी जिसकी उम्र करीब 35 से 40 वर्ष रही होगी। जिस दिशा में हम आगे बढ़ रहे थे उसी दिशा में यह युवक पार्क के अंदर दौड़ रहा था और बार – बार पीछे मुड़ - मुड़ कर पुलिसवालों को देख रहा था। युवक के एक हाथ में डिस्पोजल गिलास में शराब थी तो दूसरे हाथ में पानी का पाउच। काफी आगे तक दौड़ने के बाद जब युवक को लगा कि अब पुलिसकर्मी उसके तरफ नहीं आ रहे हैं तो वह एक पल को रुका और फिर उसने चैन की सांस लेते हुए एक ही घूंट में पूरा गिलास खाली कर दिया और फिर शान से आगे बढ़ गया। हमारी केन्द्र में सिर्फ यह युवक था लेकिन पार्क में इधर उधर भाग रहे मदिरा प्रेमियों की हालत एक जैसी ही थी।
फिर से ये पंक्तियां दोहरा रहा हूं- शराब चीज ही ऐसी है न छोड़ी जाए...ये मेरे यार के जैसी है न छोड़ी जाए। वाकई में उस युवक को देखकर लग रहा था कि उसके लिए शराब के क्या मायने हैं..? उसके लिए शराब क्या चीज है..? जिस तरह वह शराब के गिलास को पकड़कर दौड़ रहा था उससे उस युवक का मदिरा प्रेम तो कम से कम जाहिर हो ही रहा था। अब लोग कहते हैं तो कहते रहें कि शराब बुरी चीज है...शराब पीना छोड़ दो। अब शराब की बोतल में लिखा हुआ होता है कि मदिरा सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है तो लिखा रहे लेकिन शराब पीने का आनंद उस युवक से बेहतर कौन समझा सकता है जो पुलिसकर्मियों से बचकर भाग रहा है लेकिन शराब का गिलास उसने नहीं छोड़ा और जैसे ही उसे मौका मिला एक ही सांस में पूरा गिलास खाली कर दिया और शान से अपने रास्ते चल दिया...जैसे वह कोई बड़ी जंग जीतकर आ रहा हो।

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मोदी- ये राह नहीं आसां

1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के समय में भाजपा का एक नारा याद आ रहा है - सबको देखा बारी बारी अबकी बारी अटल बिहारी...ये नारा भाजपा क खूब भाया था और केन्द्र में एनडीए की सरकार बनने के साथ ही अटल बिहारी दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने थे।
समय बदल गया है...भाजपा में चेहरे भी तेजी से बदलने लगे हैं। अटल बिहारी वाजपेयी के बाद 2009 में भाजपा में आडवाणी शिखर पर थे लेकिन 2014 आते आते अब आडवाणी युग भी ढलान पर है। गोवा में मोदी को 2014 के चुनाव अभियान समिति का चेयरमैन बनाने की घोषणा के साथ ही अब मोदी अपने शिखर पर हैं।
भाजपा ने भले ही मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार घोषित न किया हो लेकिन अटल बिहारी की तरह मोदी के नाम का नारा गढ़ने की शुरुआत भाजपा में हो चुकी है या कहें कि नारा तो गढ़ा जा चुका है और मोदी के चाहने वाले इसका जप भी कर रहे हैं..! लेकिन सवाल वहीं खड़ा है कि मोदी को आगे करने से और मोदी के नाम का नारा गढ़ने से क्या 2014 में केन्द्र की सत्ता में वापसी का भाजपा का ख़्वाब साकार रुप ले पाएगा..?
केन्द्र की यूपीए सरकार भ्रष्टाचार और घोटालों से घिरी हुई है...ऐसे में भाजपा के पास सत्ता में वापसी का मौका भी है। तमाम ओपिनियन पोल औऱ सर्वे भी मोदी को भाजपा की नैया के खैवनहार होने की भविष्यवाणी कर रहे हैं लेकिन जितनी तेजी से मोदी की लोकप्रियता और कद बढ़ा उतनी ही तेजी से भाजपा में एक ऐसा वर्ग तेजी से तैयार हुआ जिन्हें मोदी के नाम पर एलर्जी है..!
ये एलर्जी होना लाजिमी भी है क्योंकि राजनीति में कुर्सी पाना हर किसी का ख्वाब होता है ऐसे में सालों से कुर्सी के लिए वेटिंग की कतार में खड़े नेता हों या फिर दूसरे बड़े नाम हर किसी की महत्वकांक्षा 2014 में सत्ता के एहसास में जोर मारने लगी थी..! लेकिन ये एलर्जी भाजपा में तेजी से फैलती इससे पहले ही गोवा में मोदी को चुनाव अभियान समिती की चेयरमैन बना दिया गया और अघोषित तौर पर 2014 के आम चुनाव के लिए मोदी एनडीए के पीएम पद के उम्मीदवार भी घोषित कर दिए गए..!
मोदी के नाम से जिन्हें एलर्जी है उनकी जब एक न चली तो जाहिर है 2014 में भाजपा और सत्ता के बीच की राह के सबसे बड़े रोड़े भी वे ही लोग हैं जो सबके सामने तो फिलहाल पार्टी के फैसले के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं लेकिन शायद ही वे कभी इस फैसले को स्वीकार कर पाएं..!
जाहिर है इन नेताओं की नाराजगी पर्दे के पीछे पार्टी और मोदी दोनों की राह में एक दीवार की तरह काम करेगी और 2014 की जो राह भाजपा मोदी के सहारे आसानी से तय करने का ख्वाब देख रही है वो राह आसान होने की बजाए और मुश्किल होती जाएगी..!
ऐसे में 2014 में पार्टी और खुद का ख़्वाब साकार करना नरेन्द्र मोदी के लिए आसान राह होने के बाद भी आसान तो बिल्कुल भी नहीं लगता..!
वैसे भी राजनीति में कब…? कौन..? किससे हाथ मिला ले..? कब..? कौन..? किससे नाता तोड़ ले कहा नहीं जा सकता..? ऐसे में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि जो आज मोदी के साथ खड़े हैं वो कल मोदी के विरोध में खड़े हों और जो मोदी का विरोध कर रहे हैं वो उनके साथ खड़े दिखाई दें..!

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शनिवार, 8 जून 2013

आडवाणी- अभी जिंदा है उम्मीद..!

डूबते हुए सूरज का नजारा मनमोहक भले ही होता है लेकिन सूरज के इस रुप को कोई सलाम नहीं करता। भाजपा में लाल कृष्ण आडवाणी के साथ भी कुछ ऐसा ही होता दिखाई दे रहा है..! मोदीमय होती भाजपा में आडवाणी के कुछ न चाहने का कोई मोल अब नजर नहीं आ रहा है..! लेकिन आडवाणी के लिए डूबते हुए सूरज के मायने शायद कुछ अलग हैं..! आडवाणी डूबते हुए सूरज में भी अगले दिन की उम्मीद भरी सुबह का नजारा देख रहे हैं जो आडवाणी के मन में 2014 में एनडीए की सरकार बनने की स्थिति में पीएम की कुर्सी की उम्मीद को जिंदा रखे हुए है..! शायद आडवाणी की यही उम्मीद नरेन्द्र मोदी को 2014 के आम चुनाव के मद्देनजर पीएम पद का उम्मीदवार होता नहीं देखना चाहती और शायद यही गोवा में भाजपा की कार्यसमिति की बैठक से पहले आडवाणी की बीमारी की वजह भी है..!
लेकिन अफसोस अडवाणी की ये उम्मीद भाजपा में नरेन्द्र मोदी के जादू के आगे नाउम्मीदी में तब्दील होती दिखाई दे रही है। आडवाणी के मोदी को अहम जिम्मेदारी न देने की इच्छा के बावजूद भाजपा में मोदी की ताजपोशी की तैयारी को देखकर तो कम से कम यही लग रहा है..!
कुर्सी चीज ही ऐसी है कि उसे पाने के लिए आडवाणी क्या कोई भी नेता मरते दम तक नाउम्मीद नहीं होना चाहेगा ऐसे में आडवाणी ने पीएम की कुर्सी के अपने ख्वाब को हकीकत में बदलने के लिए पूरा जोर लगा दिया तो क्या हुआ..? आखिर आडवाणी को भी तो हक है अपनी इच्छा को जताने का...ये बात अलग है कि भाजपा में मोदी के नाम के आगे उनकी इच्छा-अनिच्छा का बहुत ज्यादा असर अब दिखाई नहीं दे रहा है..!  
कुल मिलाकर वर्तमान में भाजपा में मोदी और आडवाणी की स्थिति को देखकर तो यही लग रहा है कि आडवाणी भाजपा के लिए डूबते हुए सूरज के समान हो गए हैं तो मोदी उगते हुए सूरज के समान जिसके नेतृत्व में भाजपा 2014 में केन्द्र की सत्ता में काबिज होने का सुनहरा ख़्वाब देख रही है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या नरेन्द्र मोदी इस ख़्वाब को हकीकत में बदल पाने में कामयाब होंगे..?


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बुधवार, 5 जून 2013

बेड़ियों में जकड़े अखिलेश..!

देर से ही सही आखिर सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव को समझ में तो आ गया कि उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था का हाल बुरा है। ये छोड़िए मुलायम ने इस बात को स्वीकार भी कर लिया कि उनके सुपुत्र अखिलेश यादव कानून व्यवस्था को दुरुस्त बनाए रखने में विफल साबित हो रहे हैं लेकिन मुलायम ये कहना नहीं भूले कि वे अगर मुख्यमंत्री होते तो 15 दिनों में कानून व्यवस्था को सुधार देते..!
ये वही मुलायम सिंह यादव हैं जो कुछ महीने पहले कानून व्यवस्था को लेकर बसपा सुप्रीमो मायावती द्वारा सवाल उठाने पर ये कहते सुनाई दे रहे थे कि सूप तो सूप छलनी भी बोले जिसमें 72 छेद। (जरुर पढ़ें- छलनी भी बोले जिसमें 72 छेद..!)
मुलायम सिंह को मायावती का कानून व्यवस्था पर सवाल उठना नागवार गुजरा था और मुलायम ने उल्टा बसपा सरकार के कार्यकाल की स्थितियों से इसकी तुलना करनी शुरु कर दी थी। मुलायम तब कह रहे थे कि बसपा सरकार में भी तो अपराध हुए थे ऐसे में मायावती को सपा सरकार पर सवाल उठाने का कोई हक नहीं है..!
लेकिन अब जब पानी सिर से ऊपर जाने लगा है तो मुलायम सिंह को बदहाल कानून व्यवस्था दिखाई देने लगी है। अरे मुलायम सिंह जी ये चिंता कुछ महीने पहले कर लेते तो शायद ये हालात ही यूपी में न होते..! वैसे देर से ही सही आपकी इस चिंता से भी भविष्य में कानून व्यवस्था में बहुत बड़ा सुधार हो जाएगा इसकी उम्मीद कम ही है..! जहां तक बात है कि आप सीएम रहते हुए कानून व्यवस्था को 15 दिनों में सुधार देते तो ये ज्ञान अपने सुपुत्र अखिलेश यादव को दीजिए न...मीडिया में इस बघारने की क्या जरुरत है..?
मुलायम ये भी कहते सुनाई दे रहे हैं कि अखिलेश सरकार में उनका कोई दखल नहीं है और अखिलेश स्वतंत्र रुप से कार्य कर रहे हैं..! मुलायम की इस बात पर तो विश्वास नहीं होता है क्योंकि जिस अखिलेश के मंत्रिमंडल में मुलायम के राजनीतिक सफर में बरसों से उनके साथ रहे साथी शामिल हों उन पर क्या अखिलेश उन पर लगाम कस सकते हैं..? या फिर उनकी किसी बात को काट सकते हैं..? चाहे अनर्गल बयानबाजी की बात हो या फिर अपने अनुसार काम करवाने की बात..!
और अगर मुलायम सही कह रहे हैं और वास्तव में अखिलेश बिना किसी दबाव के स्वतंत्र रुप से काम कर रहे हैं फिर तो मुझे अखिलेश यादव की काबलियत पर शक होता है..! अखिलेश क्यों अपनी सोच को अपने मंत्रिमंडल सहयोगियों और उन अधिकारियों तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं जिनके कंधे पर प्रदेश के विकास की जिम्मेदारी है..?
अखिलेश ने क्यों अपने मंत्रिमंडल में दागी मंत्रियों को जगह दी..?
एक युवा मुख्यमंत्री से जो उम्मीदें प्रदेश वासियों को थी उन पर अखिलेश खरे क्यों न उतर पा रहे हैं..?
आखिर क्यों कानून व्यवस्था को पटरी पर लाने में अखिलेश सरकार को पसीना छूट रहा है..? (जरुर पढ़ें- अखिलेश ने बदल दी यूपी की तस्वीर..!)
जाहिर है ये सब अखिलेश के लिए इतना मुश्किल नहीं है लेकिन अखिलेश यादव चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं और ये तभी संभव है जब वे कार्य करने के लिए...फैसले लेने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं..! जिसका सीधा मतलब कि मुलायम सिंह यादव झूठ बोल रहे हैं कि सरकार के कामकाज में उनका कोई दखल नहीं है..!
बहरहाल जो भी हो हम तो कम से कम यही उम्मीद करेंगे कि अखिलेश यादव अपने पिता और पिता के संगी साथियों की राजनीतिक बेडियों को तोड़कर बाहर निकलें और स्वतंत्र रुप से कार्य करें ताकि सरकार के बाकी बचे चार साल उस तरह न गुजरें जैसे सरकार का पहला साल बीता..!


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मंगलवार, 4 जून 2013

RTI - पर्दे में रहने दो…पर्दा न उठाओ

राजनीति भी क्या चीज है...जब तक अपना फायदा दिख रहा है तब तक तो सब ठीक है...जनता के बीच गला फाड़ फाड़ कर नेता इसका बखान करने से नहीं चूकते लेकिन जब अपनी ही पोल पट्टी खुलने का खतरा महसूस हो तो सब बकवास है..राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में लाने की बात पर तो कम से कम कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है। क्या कांग्रेस..? क्या भाजपा..? क्या अन्य सभी राजनीतिक दल..? सबकी रातों की नींद उड़ी हुआ है..! राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में लाने की सूचना आयोग की कवायद इनमें से किसी के गले नहीं उतर रही है..! तर्क भी अजीब अजीब दिए जा रहे हैं....कह रहे हैं कि हम चुनाव आयोग को सारी जानकारी देते रहे हैं ऐसे में राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में लाना ठीक नहीं है..! अरे महाराज जब आप चुनाव आयोग को जानकारी दे रहे हैं तो फिर सूचना आयोग को देने में क्या दिक्कत है..?
आरटीआई का लाने का ढिंढ़ोरा पीट पीटकर वोट मांगने वाली कांग्रेस कह रही है कि ये फैसला उसे अस्वीकार्य है और इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होगी। केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद तो ये तक कह बैठे कि आरटीआई पर अंकुश बहुत जरुरी है...इसे इस तरह बेकाबू नहीं होने दे सकते। खुर्शीद साहब तो जानते हैं आरटीआई के नफा नुकसान...खुर्शीद की संस्था में उजागर हुए भ्रष्टाचार का मामला तो याद ही होगा आपको..!
आरटीआई को लेकर पारा भाजपा का भी खूब चढ़ा हुआ है। भाजपा का तर्क है कि इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होगी। समझ नहीं आ रहा कि इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर कैसे होगी..? मेरी समझ से तो इससे तो लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए...जनता का विश्वास राजनीतिक दलों पर और बढ़ना चाहिएअब भाजपाईयों के इन तर्कों के पीछे की कहानी तो वे ही बेहतर जानते होंगे लेकिन आरटीआई के करंट का असर फिलहाल सभी राजनीतिक दलों पर साफ दिखाई दे रहा है..!      
जाहिर है आरटीआई के दायरे में रहने पर राजनीतिक दल किसी जानकारी को छिपा नहीं सकते...खासकर पार्टियों को मिलने वाले चंदे, सरकारी मदद, सस्ती जमीन और किराए में छूट आदि...ऐसे में इन्हें करंट तो लगना ही था..!
कुर्सी की लड़ाई में राजनीतिक दलों को विरोधी दल की हर बात पर...हर फैसले पर एतराज होता है और वे एक दूसरे को जमकर कोसते हैं लेकिन जब बात अपने हितों की आती है तो ये एक हो जाते हैं। यहां पर भी तो ऐसा ही कुछ हो रहा है राजनीतिक दलों को आरटीआई में लाने के फैसले के खिलाफ एक दूसरे के धुर विरोधी राजनीतिक दल साथ मिलकर इस लड़ाई को लड़ रहे हैं।
देश से जुड़े अहम मसलों पर इनकी एकजुटता कभी नहीं दिखाई देती...चाहे संसद चलने देने का मामला हो या फिर जनहित से जुड़े अहम मुद्दों पर एकजुट होकर फैसला लेने का मामला..! हां एक और मौका है जब इनकी एकजुटता देखने लायक होती है...वो है जब संसद में इनके वेतन भत्ते बढ़ाने की बात आती है। उस वक्त तो धव्निमत से ये विधेयक पास कर दिए जाते हैं क्योंकि ये उनकी व्यक्तिगत लाभ से जुड़ा हुआ मसला है न...जनता से जुड़ा हुआ नहीं..!
राजनीतिक दल जनता के हितैषी होने का दम भरते हैं...सत्ता में आने पर देश सेवा, जन सेवा की बड़ी बड़ी बातें करते हैं लेकिन ये राजनीतिक दल क्या-क्या कर रहे हैं..? कैसे-कैसे कर रहे हैं..? इसको जनता के साथ साझा करने को तैयार नहीं है।
अरटीआई  के नाम पर ये घबराहट क्यों है..? आरटीआई के नाम पर पसीना क्यों आ रहा है..? जाहिर है कि सब कुछ इतना स्पष्ट नहीं है जितना कि राजनीतिक दल जनता को दिखाने की कोशिश करते हैं।
चुनावों में आंख मूंद कर इन राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों को वोट देने वाली जनता को अब इस बात को समझ लेना चाहिए कि जो राजनीतिक दल अपने जानकारियों को जनता से ही पर्दे में रखना चाहते हैं वे क्या इनका भला करेंगे..! वैसे आरटीआई पर नेताओं की छटपटाहट को देखकर तो इन पर एक पुराना गाना याद आ रहा है...पर्दे में रहने दो पर्दा न उठाओ...पर्दा जो उठ गया तो भेद खुल जाएगा..!


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सोमवार, 3 जून 2013

आडवाणी- ढ़लता हुआ सूरज..!

लगता है भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी को अभी भी पीएम की कुर्सी मिलने की पूरी आस है..! ये बात अलग है कि उनके नाम की पैरवी करने वाला उनके सिवाय अब भाजपा में कोई नहीं है लेकिन अपने दम पर अपने सियासी बोलों के जरिए आडवाणी किसी भी तरह की गणित भिड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं..! ग्वालियर में आडवाणी का मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से बेहतर बताना तो कम से कम इसी ओर ईशारा कर रहा है..!
देखा जाए तो आडवाणी ने शिवराज को मोदी से बेहतर सीएम कहकर न सिर्फ पार्टी में नरेन्द्र मोदी का कद छोटा करने की कोशिश की बल्कि मोदी के पीएम पद की उम्मीदवारी की राह में रोड़ा अटकाने की भी पूरी कोशिश की..!
2014 में एनडीए की सरकार बनने की स्थिति में पीएम इन वेटिंग का टिकट कन्फर्म करने के लिए आडवाणी चाहकर भी खुद की दावेदारी तो ठोंक नहीं सकते लिहाजा आडवाणी के पास एक ही रास्ता बचता है कि इस दौड़ में सबसे आगे चल रहे नरेन्द्र मोदी की चाल को धीमा कर दिया जाए और इसके लिए आडवाणी ने सहारा लिया शिवराज सिंह के नाम का..! आडवाणी को शायद ये उम्मीद थी कि मोदी का कद छोटा होने से मोदी अगर पीएम की उम्मीदवारी की दौड़ में पिछड़ते हैं तो ऐसे में क्या पता धोखे से ही सही उनका पीएम इन वेटिंग का टिकट कन्फर्म हो जाए..!
आडवाणी ने अपने इस बयान से न सिर्फ लोगों की नजरों में मोदी का कद घटाने की पूरी कोशिश की बल्कि मोदी को विरासत में विकसित गुजरात प्रदेश मिलने की बात कहकर कांग्रेस को मोदी के खिलाफ बैठे बिठाए एक मुद्दा दे दिया..! ऐसा इसलिए क्योंकि मोदी जगह- जगह अपने भाषणों में गुजरात में कांग्रेस सरकार के गड्ढ़े भरने की बातें बड़े जोश के साथ करते हैं और गुजरात के विकास का श्रेय लेने में कोई कसर नहीं छोड़ते। ऐसे में लाल कृष्ण आडवाणी अगर ये कहें कि मोदी को विरासत में विकसित राज्य मिला तो मोदी के दावों पर सवाल उठने लाजिमी हैं..!
आडवाणी के मन की ख्वाहिश उनकी इस कोशिश के बहाने जुबां पर आयी तो मोदी के नाम पर 2014 में अपनी नैया पार लगाने को कोशिश में लगी भाजपा में भी भूचाल आना लाजिमी था ऐसे में पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को सफाई देने खुद आगे आना पड़ा और राजनाथ सिंह ने मोदी को सर्वाधिक लोकप्रिय नेता कहकर न सिर्फ एक बार फिर से नमो नमो का जाप किया बल्कि आडवाणी के बयान का गलत मतलब निकालने की बात कहकर भी मामला ठंडा करने की कोशिश की..!
इतना ही नहीं कुछ दिन पहले तक मोदी के साथ बराबर की दौड़ लगा रहे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी खुद की तारीफ में निकले आडवाणी के बोल को मोदी की तरफ उछाल दिया और खुद को मोदी और रमन सिंह के बाद तीसरे नंबर पर रखकर इस विवाद से ही किनारा कर लिया..!
आडवाणी ने शिवराज को आगे कर मोदी को पीछे करने की कोशिश कर अपने लिए आखिरी रास्ता बनाने की कोशिश तो की लेकिन आडवाणी की इस कोशिश पर उनके अपनों ने ही पानी फेर दिया..! इतना सब होने के बाद आडवाणी को अब तो कम से कम ये समझ लेना चाहिए कि वे भाजपा में अब एक ढ़लते हुए सूरज की तरह हैं और ढ़लते हुए सूरज को कई सलाम नहीं करता..!

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मंगलवार, 28 मई 2013

बधाई...हो रहा भारत निर्माण..!

टीवी पर आजकल यूपीए सरकार की उपलब्धियों से भरा हुआ एक विज्ञापन खूब नजर आ रहा है। विज्ञापन का शीर्षक है हो रहा भारत निर्माण शुरु में तो ये विज्ञापन एनडीए सरकार के इंडिया शाइनिंग नारे की याद दिला रहा था और लगने लगा था कि ये इंडिया शाइनिंग पार्ट 2 है..! लेकिन जैसे ही ये ख़बर पढ़ी की चीन ने भारतीय सीमा में 5 किलोमीटर तक सड़क का निर्माण कर लिया है तो उसके बाद यूपीए सरकार के हो रहा भारत निर्माण नारे की सच्चाई समझ में आने लगी..!   
भारत सरकार का हो रहा भारत निर्माण का नारा वास्तविक रुप में भारत – चीन सीमा पर आकार लेता दिखाई दे रहा है...जहां भारतीय सैनिकों का पैदल पहुंचना मुश्किल था वहां सड़क का निर्माण हो गया है..!
अरे भई यूपीए सरकार के कार्यकाल में भारत चीन सीमा के सुदूरवर्ती इलाके में तक सड़क का निर्माण हो गयाये क्या यूपीए सरकार की कोई छोटी मोटी उपलब्धि है..?
अब सड़क का निर्माण भारत की जगह चीन ने किया तो क्या हुआ..? सड़क बनी तो भारतीय इलाके में ही है..! (जरुर पढ़ें- और कितने थप्पड़ खाओगे..?)
आज सड़क बनी है...निकट भविष्य में चीनी सेना के बंकर और छोटा मोटा चीनी बाजार भी बन जाएगा..! वैसे भी देखा जाए तो इसका फायदा तो भारत को ही होगा न...सीमावर्ती गांवों में रहने वाले भारत के लोगों को अपनी सभी रोजमर्रा की जरुरतों का सामान सस्ती दरों पर आसानी से चीनी बाजार से मिल पाएगा और कभी कभार सामान लाने के बहाने वे बिना वीजा के विदेश(चीन) की सैर भी कर आएंगे..!
चीनी उत्पादों को वैसे तो कामचलाऊ कहा जाता है लेकिन भारत सरकार को लगता है चीनी सामान पर कुछ ज्यादा ही भरोसा है। तभी तो भारत ने लद्दाक की चुमार पोस्ट पर अपने बंकर को खुद तोड़ दिया ताकि चीन वहां पर मजबूत और टिकाऊ बंकर का निर्माण कर सके..! (जरुर पढ़ें- क्यों बेबस है भारत..?)
अब ये भी समझ आने लगा है कि भारत चीन के प्रधानमंत्री ली केकियांग के स्वागत को इतना उत्सुक क्यों था..? अरे भई चीनी प्रधानमंत्री ली केकियांग अपने साथ भारतीय सीमा के अंदर 5 किलोमीटर तक सड़क ले आए तो भारत सरकार क्यों न ली केकियांग के स्वागत को बेचैन रहती..? आखिर भारत का सड़क निर्माण का खर्च जो बच गया..!
देश के लिए नेताओं के त्याग की भी दाद देनी पड़ेगी...अगर सीमावर्ती इलाके में सड़क का निर्माण भारत करता तो जाहिर है इसमें भी भ्रष्टाचार होता और कई लोगों की जेब गर्म होती लेकिन यहां पर सरकार में शामिल लोगों ने अपनी कमाई की फिक्र न करते हुए चीन को सड़क का निर्माण करने दिया..!
मैं तो कहता हूं कि भारत में भ्रष्टाचार को खत्म करने का एक ही तरीका है...जिस तरह भारत ने चीन को अपनी सीमा में 5 किलोमीटर तक सड़क का निर्माण करने देने के बाद उसे भारत निर्माण का नाम दिया ठीक इसी तरह दूसरे काम भी चीन को सौंप देने चाहिए। इससे यूपीए सरकार का हो रहा भारत निर्माण का नारा भी सार्थक हो जाएगा और भ्रष्टाचार भी नहीं होगा..! बोलो यूपीए सरकार की जय..!!!

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रविवार, 26 मई 2013

नक्सली हमले- आखिर कब तक..?

आमतौर पर मीडिया की सुर्खियों से गायब रहने वाला छत्तीसगढ़ एक बार फिर से सुर्खियों में है। छत्तीसगढ़ के सुर्खियों में रहने की वजह एक बार फिर से नक्सली ही हैं जिन्होंने घात लगाकर किए हमले में छ्त्तीसगढ़ कांग्रेस के अधिकतर दिग्गज नेताओं की हत्या कर छत्तीसगढ़ पीसीसी को वीरान कर कर दिया है। किसी भी राजनीतिक दल के नेताओं पर शायद ये नक्सलियों का सबसे बड़ा हमला है लेकिन राजनीतिक दलों से इतर नक्सली इससे भी बड़े हमले कर सरकार का अपनी ताकत का एहसास पहले भी करा चुके हैं।
तीन साल पहले अप्रेल 2010 में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के 76 जवानों की हत्या कर नक्सलियों ने राज्य व केन्द्र सरकार की नींद उड़ा दी थी। सवाल मुंह बाएं खड़ा था कि जब नक्सली 76 हथियारबंद जवानों को घेर कर मौत के घाट उतार सकते हैं तो नक्सली क्या नहीं कर सकते..?
इसी तरह बीते साल अप्रेल 2012 में सुकमा कलेक्टर एलैक्स पॉल मेनन का अपहरण कर भी नक्सलियों ने सरकार को खुली चुनौती दी थी। कलेक्टर मेनन तो आखिर रिहा हो गए लेकिन एक कलेक्टर का अपहरण अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया। जब एक कलेक्टर ही सुरक्षित नहीं है तो आम आदमी की सुरक्षा की क्या गारंटी है..?
छत्तीसगढ़ में अमूमन रोज नक्सली कभी गोलीबारी कर तो कभी बारुदी सुरंग से विस्फोट कर जवानों को निशाना बनाते रहे हैं। ये ख़बरें सिर्फ स्थानीय अख़बारों के पन्नों तक सिमट कर रह जाती हैं क्योंकि इन हमलों में एक या दो जवान ही शहीद होते हैं लेकिन जब तीन साल पहले दंतेवाड़ा में 76 सीआरपीएफ जवान शहीद होते हैं या फिर कांग्रेस के काफिले पर हमला होता है जिसमें दिग्गज कांग्रेसी नेताओं समेत करीब दो दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हो जाती है तो ये ख़बरें छत्तीसगढ़ से दिल्ली तक भी पहुंचती हैं।
नक्सलियों के बड़े हमलों के बाद छत्तीसगढ़ से दिल्ली तक हंगामा मचता है। नकस्लियों के हमलों पर बहस का दौर शुरु हो जाता है लेकिन कुछ दिनों बाद शांति पसर जाती है और ऐसे ही एक बड़े हमले पर छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली तक इसकी गूंज सुनाई देती है..!
हालांकि ऐसा नहीं है कि कार्रवाई एक तरफ से ही होती है। सर्चिंग के दौरान या मुठभेड़ के दौरान आए दिए एक आद नक्सली के मारे जाने की खबर भी आती है और इस दौरान निर्दोष आदिवासियों की हत्या का आरोप भी जवानों पर लगता है जैसे हाल ही में बीजापुर के एड़समेटा गांव में तीन बच्चों समेत आठ लोगों की हत्या का आरोप जवानों पर लगा था लेकिन सवाल यहां भी खड़ा होता है कि आखिर क्यों नक्सल प्रभावित इलाकों में हमेशा अघोषित जंग के हालात बने रहते हैं..?
जिस तरह से नक्सलियों ने जवानों और आदिवासियों के बाद अब नेताओं को अपने निशाने में लिया है उससे ये साफ जाहिर होता है कि नक्सली खुद को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं मानते और लोकतांत्रिक सरकार से इतर अपनी एक समानांतर सरकार चलाना चाहते हैं या कहें कि चला रहे हैं। अपने बाहुल्य वाले इलाकों में वे विकास कार्य नहीं चाहते क्योंकि उन्हें डर है कि अगर सड़क का निर्माण हो गया या उस इलाके में पक्के स्कूल या सरकारी इमारतें बन गयी तो सुरक्षाबल उसका इस्तेमाल उनके खिलाफ कर सकते हैं।
सरकार नक्सलियों से हथियार डालकर बातचीत का रास्ता अपनाने की बात करती है लेकिन इसके बाद भी आए दिन छोटी मोटी नक्सली हमलों के बीच दंतेवाड़ा या सुकमा जैसे बड़े नक्सली हमले सामने आते रहते हैं जो साफ ईशारा करते हैं कि नक्सली कभी हथियार नहीं डालने वाले लेकिन इसके बाद भी स्वामी अग्निवेश टाइप लोग कहते हैं कि नक्सलियों ने दंतेवाड़ा में 76 जवानों की हत्या की तो क्या हुआ…जवानों ने भी तो निर्दोष आदिवासियों को नक्सली बताकर उनकी हत्या की थी..! मतलब तो ये हुआ कि अग्निवेश नक्सलियों द्वारा जवानों की हत्या को जस्टिफाई करने की कोशिश कर रहे हैं और अघोषित तौर पर नक्सलियों का समर्थन कर रहे हैं..!
एक तरफ भारत पहले ही अपने पड़ोसी पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और ड्रैगन के दोहरे खतरे से जूझ रहा है ऊपर से देश के अंदर विभिन्न राज्यों में नक्सली इससे भी बड़ा खतरा बनकर ऊभर रहे हैं लेकिन हमारी सरकार हर चीज का हल शांति प्रक्रिया से निकालना चाहती है। गांधी जी के अहिंसा के सिद्धांतों पर चल रही हमारी सरकारों को कौन समझाए कि नक्सली शांति वार्ता से नहीं मानने वाले..!
नक्सली भी इस देश की ही नागरिक हैं लेकिन अगर वे हथियार की भाषा ही बोलना और समझना चाहते हैं तो क्यों न उनकी भाषा में उनसे बात की जाए..? क्या हमारी सरकार इतनी सक्षम नहीं है कि नक्सल बाहुल्य इलाकों में अभियान चलाकर नक्सलियों को हथियार डालने पर मजबूर कर दिया जाए। जाहिर है हमारी सरकार भी सक्षम है और सुरक्षाबल भी लेकिन फिर सवाल खड़ा हो जाता है कि ये फैसला ले कौन..?
केन्द्र और राज्य सरकारों के साथ ही सभी राजनीतिक दलों को मिलकर ये फैसला लेना होगा कि वे अब और नक्सली हमले नहीं सहेंगे और समर्पण या बातचीत के रास्ते से न मानने पर नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए एक दृढ़ निर्णय लेना ही होगा वर्ना एक अंतराल के बाद फिर से दंतेवाड़ा या फिर सुकमा जैसी घटनाएं हमारे सामने आती रहेंगी।

deepaktiwari555@gmail.com