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रविवार, 9 जून 2013

शराब चीज ही ऐसी है न छोड़ी जाए

शराब चीज ही ऐसी है न छोड़ी जाए...पंकज उधास की गज़ल के ये बोल तो आपने सुने ही होंगे। मैंने भी आज से पहले इन बोलों को सिर्फ सुना ही था इसे साक्षात रुप में देखा नहीं था लेकिन रविवार को ये बोल मुझे बकायदा दौड़ते हुए दिखाई दिए। दरअसल मैं अपने एक मित्र के साथ दिल्ली के मयूर विहार फेज थ्री की मार्केट से गुजर रहा था। हमने देखा कि मार्केट के साथ ही लगे पार्क के सामने मदिरा की दुकान पर खूब रौनक थी।
मदिरा की दुकान के सामने पार्क में भी शराबियों की महफिल सजी हुई थी। इसी बीच दिल्ली पुलिस के दो जवान डंडा फटकारते हुए पार्क में दाखिल हुए तो पार्क में भगदड़ मच गयी। पुलिस कर्मियों के तेवर देखकर समझ में आ गया था कि उनका इरादा किसी को पकड़ने का नहीं था बस पार्क में मदिरा का सेवन कर रहे लोगों को खदेड़ना था। शायद ये पुलिसकर्मियों की रोज की एक्सरसाईज थी खैर जो भी हो लेकिन पार्क का नजारा बड़ा ही जबरदस्त था...शायद में इसे उस अंदाज में शब्दों में न बयां कर पाऊं...फिर भी कोशिश करता हूं।
दोनों पुलिस जवान अलग-अलग दिशा में शराबियों को डंडा फटकारते हुए खदेड़ने लगे। इसी बीच मेरी नजर एक युवक पर पड़ी जिसकी उम्र करीब 35 से 40 वर्ष रही होगी। जिस दिशा में हम आगे बढ़ रहे थे उसी दिशा में यह युवक पार्क के अंदर दौड़ रहा था और बार – बार पीछे मुड़ - मुड़ कर पुलिसवालों को देख रहा था। युवक के एक हाथ में डिस्पोजल गिलास में शराब थी तो दूसरे हाथ में पानी का पाउच। काफी आगे तक दौड़ने के बाद जब युवक को लगा कि अब पुलिसकर्मी उसके तरफ नहीं आ रहे हैं तो वह एक पल को रुका और फिर उसने चैन की सांस लेते हुए एक ही घूंट में पूरा गिलास खाली कर दिया और फिर शान से आगे बढ़ गया। हमारी केन्द्र में सिर्फ यह युवक था लेकिन पार्क में इधर उधर भाग रहे मदिरा प्रेमियों की हालत एक जैसी ही थी।
फिर से ये पंक्तियां दोहरा रहा हूं- शराब चीज ही ऐसी है न छोड़ी जाए...ये मेरे यार के जैसी है न छोड़ी जाए। वाकई में उस युवक को देखकर लग रहा था कि उसके लिए शराब के क्या मायने हैं..? उसके लिए शराब क्या चीज है..? जिस तरह वह शराब के गिलास को पकड़कर दौड़ रहा था उससे उस युवक का मदिरा प्रेम तो कम से कम जाहिर हो ही रहा था। अब लोग कहते हैं तो कहते रहें कि शराब बुरी चीज है...शराब पीना छोड़ दो। अब शराब की बोतल में लिखा हुआ होता है कि मदिरा सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है तो लिखा रहे लेकिन शराब पीने का आनंद उस युवक से बेहतर कौन समझा सकता है जो पुलिसकर्मियों से बचकर भाग रहा है लेकिन शराब का गिलास उसने नहीं छोड़ा और जैसे ही उसे मौका मिला एक ही सांस में पूरा गिलास खाली कर दिया और शान से अपने रास्ते चल दिया...जैसे वह कोई बड़ी जंग जीतकर आ रहा हो।

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मोदी- ये राह नहीं आसां

1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के समय में भाजपा का एक नारा याद आ रहा है - सबको देखा बारी बारी अबकी बारी अटल बिहारी...ये नारा भाजपा क खूब भाया था और केन्द्र में एनडीए की सरकार बनने के साथ ही अटल बिहारी दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने थे।
समय बदल गया है...भाजपा में चेहरे भी तेजी से बदलने लगे हैं। अटल बिहारी वाजपेयी के बाद 2009 में भाजपा में आडवाणी शिखर पर थे लेकिन 2014 आते आते अब आडवाणी युग भी ढलान पर है। गोवा में मोदी को 2014 के चुनाव अभियान समिति का चेयरमैन बनाने की घोषणा के साथ ही अब मोदी अपने शिखर पर हैं।
भाजपा ने भले ही मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार घोषित न किया हो लेकिन अटल बिहारी की तरह मोदी के नाम का नारा गढ़ने की शुरुआत भाजपा में हो चुकी है या कहें कि नारा तो गढ़ा जा चुका है और मोदी के चाहने वाले इसका जप भी कर रहे हैं..! लेकिन सवाल वहीं खड़ा है कि मोदी को आगे करने से और मोदी के नाम का नारा गढ़ने से क्या 2014 में केन्द्र की सत्ता में वापसी का भाजपा का ख़्वाब साकार रुप ले पाएगा..?
केन्द्र की यूपीए सरकार भ्रष्टाचार और घोटालों से घिरी हुई है...ऐसे में भाजपा के पास सत्ता में वापसी का मौका भी है। तमाम ओपिनियन पोल औऱ सर्वे भी मोदी को भाजपा की नैया के खैवनहार होने की भविष्यवाणी कर रहे हैं लेकिन जितनी तेजी से मोदी की लोकप्रियता और कद बढ़ा उतनी ही तेजी से भाजपा में एक ऐसा वर्ग तेजी से तैयार हुआ जिन्हें मोदी के नाम पर एलर्जी है..!
ये एलर्जी होना लाजिमी भी है क्योंकि राजनीति में कुर्सी पाना हर किसी का ख्वाब होता है ऐसे में सालों से कुर्सी के लिए वेटिंग की कतार में खड़े नेता हों या फिर दूसरे बड़े नाम हर किसी की महत्वकांक्षा 2014 में सत्ता के एहसास में जोर मारने लगी थी..! लेकिन ये एलर्जी भाजपा में तेजी से फैलती इससे पहले ही गोवा में मोदी को चुनाव अभियान समिती की चेयरमैन बना दिया गया और अघोषित तौर पर 2014 के आम चुनाव के लिए मोदी एनडीए के पीएम पद के उम्मीदवार भी घोषित कर दिए गए..!
मोदी के नाम से जिन्हें एलर्जी है उनकी जब एक न चली तो जाहिर है 2014 में भाजपा और सत्ता के बीच की राह के सबसे बड़े रोड़े भी वे ही लोग हैं जो सबके सामने तो फिलहाल पार्टी के फैसले के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं लेकिन शायद ही वे कभी इस फैसले को स्वीकार कर पाएं..!
जाहिर है इन नेताओं की नाराजगी पर्दे के पीछे पार्टी और मोदी दोनों की राह में एक दीवार की तरह काम करेगी और 2014 की जो राह भाजपा मोदी के सहारे आसानी से तय करने का ख्वाब देख रही है वो राह आसान होने की बजाए और मुश्किल होती जाएगी..!
ऐसे में 2014 में पार्टी और खुद का ख़्वाब साकार करना नरेन्द्र मोदी के लिए आसान राह होने के बाद भी आसान तो बिल्कुल भी नहीं लगता..!
वैसे भी राजनीति में कब…? कौन..? किससे हाथ मिला ले..? कब..? कौन..? किससे नाता तोड़ ले कहा नहीं जा सकता..? ऐसे में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि जो आज मोदी के साथ खड़े हैं वो कल मोदी के विरोध में खड़े हों और जो मोदी का विरोध कर रहे हैं वो उनके साथ खड़े दिखाई दें..!

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शनिवार, 8 जून 2013

आडवाणी- अभी जिंदा है उम्मीद..!

डूबते हुए सूरज का नजारा मनमोहक भले ही होता है लेकिन सूरज के इस रुप को कोई सलाम नहीं करता। भाजपा में लाल कृष्ण आडवाणी के साथ भी कुछ ऐसा ही होता दिखाई दे रहा है..! मोदीमय होती भाजपा में आडवाणी के कुछ न चाहने का कोई मोल अब नजर नहीं आ रहा है..! लेकिन आडवाणी के लिए डूबते हुए सूरज के मायने शायद कुछ अलग हैं..! आडवाणी डूबते हुए सूरज में भी अगले दिन की उम्मीद भरी सुबह का नजारा देख रहे हैं जो आडवाणी के मन में 2014 में एनडीए की सरकार बनने की स्थिति में पीएम की कुर्सी की उम्मीद को जिंदा रखे हुए है..! शायद आडवाणी की यही उम्मीद नरेन्द्र मोदी को 2014 के आम चुनाव के मद्देनजर पीएम पद का उम्मीदवार होता नहीं देखना चाहती और शायद यही गोवा में भाजपा की कार्यसमिति की बैठक से पहले आडवाणी की बीमारी की वजह भी है..!
लेकिन अफसोस अडवाणी की ये उम्मीद भाजपा में नरेन्द्र मोदी के जादू के आगे नाउम्मीदी में तब्दील होती दिखाई दे रही है। आडवाणी के मोदी को अहम जिम्मेदारी न देने की इच्छा के बावजूद भाजपा में मोदी की ताजपोशी की तैयारी को देखकर तो कम से कम यही लग रहा है..!
कुर्सी चीज ही ऐसी है कि उसे पाने के लिए आडवाणी क्या कोई भी नेता मरते दम तक नाउम्मीद नहीं होना चाहेगा ऐसे में आडवाणी ने पीएम की कुर्सी के अपने ख्वाब को हकीकत में बदलने के लिए पूरा जोर लगा दिया तो क्या हुआ..? आखिर आडवाणी को भी तो हक है अपनी इच्छा को जताने का...ये बात अलग है कि भाजपा में मोदी के नाम के आगे उनकी इच्छा-अनिच्छा का बहुत ज्यादा असर अब दिखाई नहीं दे रहा है..!  
कुल मिलाकर वर्तमान में भाजपा में मोदी और आडवाणी की स्थिति को देखकर तो यही लग रहा है कि आडवाणी भाजपा के लिए डूबते हुए सूरज के समान हो गए हैं तो मोदी उगते हुए सूरज के समान जिसके नेतृत्व में भाजपा 2014 में केन्द्र की सत्ता में काबिज होने का सुनहरा ख़्वाब देख रही है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या नरेन्द्र मोदी इस ख़्वाब को हकीकत में बदल पाने में कामयाब होंगे..?


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बुधवार, 5 जून 2013

बेड़ियों में जकड़े अखिलेश..!

देर से ही सही आखिर सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव को समझ में तो आ गया कि उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था का हाल बुरा है। ये छोड़िए मुलायम ने इस बात को स्वीकार भी कर लिया कि उनके सुपुत्र अखिलेश यादव कानून व्यवस्था को दुरुस्त बनाए रखने में विफल साबित हो रहे हैं लेकिन मुलायम ये कहना नहीं भूले कि वे अगर मुख्यमंत्री होते तो 15 दिनों में कानून व्यवस्था को सुधार देते..!
ये वही मुलायम सिंह यादव हैं जो कुछ महीने पहले कानून व्यवस्था को लेकर बसपा सुप्रीमो मायावती द्वारा सवाल उठाने पर ये कहते सुनाई दे रहे थे कि सूप तो सूप छलनी भी बोले जिसमें 72 छेद। (जरुर पढ़ें- छलनी भी बोले जिसमें 72 छेद..!)
मुलायम सिंह को मायावती का कानून व्यवस्था पर सवाल उठना नागवार गुजरा था और मुलायम ने उल्टा बसपा सरकार के कार्यकाल की स्थितियों से इसकी तुलना करनी शुरु कर दी थी। मुलायम तब कह रहे थे कि बसपा सरकार में भी तो अपराध हुए थे ऐसे में मायावती को सपा सरकार पर सवाल उठाने का कोई हक नहीं है..!
लेकिन अब जब पानी सिर से ऊपर जाने लगा है तो मुलायम सिंह को बदहाल कानून व्यवस्था दिखाई देने लगी है। अरे मुलायम सिंह जी ये चिंता कुछ महीने पहले कर लेते तो शायद ये हालात ही यूपी में न होते..! वैसे देर से ही सही आपकी इस चिंता से भी भविष्य में कानून व्यवस्था में बहुत बड़ा सुधार हो जाएगा इसकी उम्मीद कम ही है..! जहां तक बात है कि आप सीएम रहते हुए कानून व्यवस्था को 15 दिनों में सुधार देते तो ये ज्ञान अपने सुपुत्र अखिलेश यादव को दीजिए न...मीडिया में इस बघारने की क्या जरुरत है..?
मुलायम ये भी कहते सुनाई दे रहे हैं कि अखिलेश सरकार में उनका कोई दखल नहीं है और अखिलेश स्वतंत्र रुप से कार्य कर रहे हैं..! मुलायम की इस बात पर तो विश्वास नहीं होता है क्योंकि जिस अखिलेश के मंत्रिमंडल में मुलायम के राजनीतिक सफर में बरसों से उनके साथ रहे साथी शामिल हों उन पर क्या अखिलेश उन पर लगाम कस सकते हैं..? या फिर उनकी किसी बात को काट सकते हैं..? चाहे अनर्गल बयानबाजी की बात हो या फिर अपने अनुसार काम करवाने की बात..!
और अगर मुलायम सही कह रहे हैं और वास्तव में अखिलेश बिना किसी दबाव के स्वतंत्र रुप से काम कर रहे हैं फिर तो मुझे अखिलेश यादव की काबलियत पर शक होता है..! अखिलेश क्यों अपनी सोच को अपने मंत्रिमंडल सहयोगियों और उन अधिकारियों तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं जिनके कंधे पर प्रदेश के विकास की जिम्मेदारी है..?
अखिलेश ने क्यों अपने मंत्रिमंडल में दागी मंत्रियों को जगह दी..?
एक युवा मुख्यमंत्री से जो उम्मीदें प्रदेश वासियों को थी उन पर अखिलेश खरे क्यों न उतर पा रहे हैं..?
आखिर क्यों कानून व्यवस्था को पटरी पर लाने में अखिलेश सरकार को पसीना छूट रहा है..? (जरुर पढ़ें- अखिलेश ने बदल दी यूपी की तस्वीर..!)
जाहिर है ये सब अखिलेश के लिए इतना मुश्किल नहीं है लेकिन अखिलेश यादव चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं और ये तभी संभव है जब वे कार्य करने के लिए...फैसले लेने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं..! जिसका सीधा मतलब कि मुलायम सिंह यादव झूठ बोल रहे हैं कि सरकार के कामकाज में उनका कोई दखल नहीं है..!
बहरहाल जो भी हो हम तो कम से कम यही उम्मीद करेंगे कि अखिलेश यादव अपने पिता और पिता के संगी साथियों की राजनीतिक बेडियों को तोड़कर बाहर निकलें और स्वतंत्र रुप से कार्य करें ताकि सरकार के बाकी बचे चार साल उस तरह न गुजरें जैसे सरकार का पहला साल बीता..!


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मंगलवार, 4 जून 2013

RTI - पर्दे में रहने दो…पर्दा न उठाओ

राजनीति भी क्या चीज है...जब तक अपना फायदा दिख रहा है तब तक तो सब ठीक है...जनता के बीच गला फाड़ फाड़ कर नेता इसका बखान करने से नहीं चूकते लेकिन जब अपनी ही पोल पट्टी खुलने का खतरा महसूस हो तो सब बकवास है..! राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में लाने की बात पर तो कम से कम कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है। क्या कांग्रेस..? क्या भाजपा..? क्या अन्य सभी राजनीतिक दल..? सबकी रातों की नींद उड़ी हुआ है..! राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में लाने की सूचना आयोग की कवायद इनमें से किसी के गले नहीं उतर रही है..! तर्क भी अजीब अजीब दिए जा रहे हैं....कह रहे हैं कि हम चुनाव आयोग को सारी जानकारी देते रहे हैं ऐसे में राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में लाना ठीक नहीं है..! अरे महाराज जब आप चुनाव आयोग को जानकारी दे रहे हैं तो फिर सूचना आयोग को देने में क्या दिक्कत है..?
आरटीआई का लाने का ढिंढ़ोरा पीट पीटकर वोट मांगने वाली कांग्रेस कह रही है कि ये फैसला उसे अस्वीकार्य है और इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होगी। केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद तो ये तक कह बैठे कि आरटीआई पर अंकुश बहुत जरुरी है...इसे इस तरह बेकाबू नहीं होने दे सकते। खुर्शीद साहब तो जानते हैं आरटीआई के नफा नुकसान...खुर्शीद की संस्था में उजागर हुए भ्रष्टाचार का मामला तो याद ही होगा आपको..!
आरटीआई को लेकर पारा भाजपा का भी खूब चढ़ा हुआ है। भाजपा का तर्क है कि इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होगी। समझ नहीं आ रहा कि इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर कैसे होगी..? मेरी समझ से तो इससे तो लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए...जनता का विश्वास राजनीतिक दलों पर और बढ़ना चाहिए…अब भाजपाईयों के इन तर्कों के पीछे की कहानी तो वे ही बेहतर जानते होंगे लेकिन आरटीआई के करंट का असर फिलहाल सभी राजनीतिक दलों पर साफ दिखाई दे रहा है..!      
जाहिर है आरटीआई के दायरे में रहने पर राजनीतिक दल किसी जानकारी को छिपा नहीं सकते...खासकर पार्टियों को मिलने वाले चंदे, सरकारी मदद, सस्ती जमीन और किराए में छूट आदि...ऐसे में इन्हें करंट तो लगना ही था..!
कुर्सी की लड़ाई में राजनीतिक दलों को विरोधी दल की हर बात पर...हर फैसले पर एतराज होता है और वे एक दूसरे को जमकर कोसते हैं लेकिन जब बात अपने हितों की आती है तो ये एक हो जाते हैं। यहां पर भी तो ऐसा ही कुछ हो रहा है राजनीतिक दलों को आरटीआई में लाने के फैसले के खिलाफ एक दूसरे के धुर विरोधी राजनीतिक दल साथ मिलकर इस लड़ाई को लड़ रहे हैं।
देश से जुड़े अहम मसलों पर इनकी एकजुटता कभी नहीं दिखाई देती...चाहे संसद चलने देने का मामला हो या फिर जनहित से जुड़े अहम मुद्दों पर एकजुट होकर फैसला लेने का मामला..! हां एक और मौका है जब इनकी एकजुटता देखने लायक होती है...वो है जब संसद में इनके वेतन भत्ते बढ़ाने की बात आती है। उस वक्त तो धव्निमत से ये विधेयक पास कर दिए जाते हैं क्योंकि ये उनकी व्यक्तिगत लाभ से जुड़ा हुआ मसला है न...जनता से जुड़ा हुआ नहीं..!
राजनीतिक दल जनता के हितैषी होने का दम भरते हैं...सत्ता में आने पर देश सेवा, जन सेवा की बड़ी बड़ी बातें करते हैं लेकिन ये राजनीतिक दल क्या-क्या कर रहे हैं..? कैसे-कैसे कर रहे हैं..? इसको जनता के साथ साझा करने को तैयार नहीं है।
अरटीआई  के नाम पर ये घबराहट क्यों है..? आरटीआई के नाम पर पसीना क्यों आ रहा है..? जाहिर है कि सब कुछ इतना स्पष्ट नहीं है जितना कि राजनीतिक दल जनता को दिखाने की कोशिश करते हैं।
चुनावों में आंख मूंद कर इन राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों को वोट देने वाली जनता को अब इस बात को समझ लेना चाहिए कि जो राजनीतिक दल अपने जानकारियों को जनता से ही पर्दे में रखना चाहते हैं वे क्या इनका भला करेंगे..! वैसे आरटीआई पर नेताओं की छटपटाहट को देखकर तो इन पर एक पुराना गाना याद आ रहा है...पर्दे में रहने दो पर्दा न उठाओ...पर्दा जो उठ गया तो भेद खुल जाएगा..!


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सोमवार, 3 जून 2013

आडवाणी- ढ़लता हुआ सूरज..!

लगता है भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी को अभी भी पीएम की कुर्सी मिलने की पूरी आस है..! ये बात अलग है कि उनके नाम की पैरवी करने वाला उनके सिवाय अब भाजपा में कोई नहीं है लेकिन अपने दम पर अपने सियासी बोलों के जरिए आडवाणी किसी भी तरह की गणित भिड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं..! ग्वालियर में आडवाणी का मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से बेहतर बताना तो कम से कम इसी ओर ईशारा कर रहा है..!
देखा जाए तो आडवाणी ने शिवराज को मोदी से बेहतर सीएम कहकर न सिर्फ पार्टी में नरेन्द्र मोदी का कद छोटा करने की कोशिश की बल्कि मोदी के पीएम पद की उम्मीदवारी की राह में रोड़ा अटकाने की भी पूरी कोशिश की..!
2014 में एनडीए की सरकार बनने की स्थिति में पीएम इन वेटिंग का टिकट कन्फर्म करने के लिए आडवाणी चाहकर भी खुद की दावेदारी तो ठोंक नहीं सकते लिहाजा आडवाणी के पास एक ही रास्ता बचता है कि इस दौड़ में सबसे आगे चल रहे नरेन्द्र मोदी की चाल को धीमा कर दिया जाए और इसके लिए आडवाणी ने सहारा लिया शिवराज सिंह के नाम का..! आडवाणी को शायद ये उम्मीद थी कि मोदी का कद छोटा होने से मोदी अगर पीएम की उम्मीदवारी की दौड़ में पिछड़ते हैं तो ऐसे में क्या पता धोखे से ही सही उनका पीएम इन वेटिंग का टिकट कन्फर्म हो जाए..!
आडवाणी ने अपने इस बयान से न सिर्फ लोगों की नजरों में मोदी का कद घटाने की पूरी कोशिश की बल्कि मोदी को विरासत में विकसित गुजरात प्रदेश मिलने की बात कहकर कांग्रेस को मोदी के खिलाफ बैठे बिठाए एक मुद्दा दे दिया..! ऐसा इसलिए क्योंकि मोदी जगह- जगह अपने भाषणों में गुजरात में कांग्रेस सरकार के गड्ढ़े भरने की बातें बड़े जोश के साथ करते हैं और गुजरात के विकास का श्रेय लेने में कोई कसर नहीं छोड़ते। ऐसे में लाल कृष्ण आडवाणी अगर ये कहें कि मोदी को विरासत में विकसित राज्य मिला तो मोदी के दावों पर सवाल उठने लाजिमी हैं..!
आडवाणी के मन की ख्वाहिश उनकी इस कोशिश के बहाने जुबां पर आयी तो मोदी के नाम पर 2014 में अपनी नैया पार लगाने को कोशिश में लगी भाजपा में भी भूचाल आना लाजिमी था ऐसे में पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को सफाई देने खुद आगे आना पड़ा और राजनाथ सिंह ने मोदी को सर्वाधिक लोकप्रिय नेता कहकर न सिर्फ एक बार फिर से नमो नमो का जाप किया बल्कि आडवाणी के बयान का गलत मतलब निकालने की बात कहकर भी मामला ठंडा करने की कोशिश की..!
इतना ही नहीं कुछ दिन पहले तक मोदी के साथ बराबर की दौड़ लगा रहे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी खुद की तारीफ में निकले आडवाणी के बोल को मोदी की तरफ उछाल दिया और खुद को मोदी और रमन सिंह के बाद तीसरे नंबर पर रखकर इस विवाद से ही किनारा कर लिया..!
आडवाणी ने शिवराज को आगे कर मोदी को पीछे करने की कोशिश कर अपने लिए आखिरी रास्ता बनाने की कोशिश तो की लेकिन आडवाणी की इस कोशिश पर उनके अपनों ने ही पानी फेर दिया..! इतना सब होने के बाद आडवाणी को अब तो कम से कम ये समझ लेना चाहिए कि वे भाजपा में अब एक ढ़लते हुए सूरज की तरह हैं और ढ़लते हुए सूरज को कई सलाम नहीं करता..!

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मंगलवार, 28 मई 2013

बधाई...हो रहा भारत निर्माण..!

टीवी पर आजकल यूपीए सरकार की उपलब्धियों से भरा हुआ एक विज्ञापन खूब नजर आ रहा है। विज्ञापन का शीर्षक है “हो रहा भारत निर्माण”। शुरु में तो ये विज्ञापन एनडीए सरकार के इंडिया शाइनिंग नारे की याद दिला रहा था और लगने लगा था कि ये इंडिया शाइनिंग पार्ट 2 है..! लेकिन जैसे ही ये ख़बर पढ़ी की चीन ने भारतीय सीमा में 5 किलोमीटर तक सड़क का निर्माण कर लिया है तो उसके बाद यूपीए सरकार के “हो रहा भारत निर्माण” नारे की सच्चाई समझ में आने लगी..!   
भारत सरकार का “हो रहा भारत निर्माण” का नारा वास्तविक रुप में भारत – चीन सीमा पर आकार लेता दिखाई दे रहा है...जहां भारतीय सैनिकों का पैदल पहुंचना मुश्किल था वहां सड़क का निर्माण हो गया है..!
अरे भई यूपीए सरकार के कार्यकाल में भारत चीन सीमा के सुदूरवर्ती इलाके में तक सड़क का निर्माण हो गया…ये क्या यूपीए सरकार की कोई छोटी मोटी उपलब्धि है..?
अब सड़क का निर्माण भारत की जगह चीन ने किया तो क्या हुआ..? सड़क बनी तो भारतीय इलाके में ही है..! (जरुर पढ़ें- और कितने थप्पड़ खाओगे..?)
आज सड़क बनी है...निकट भविष्य में चीनी सेना के बंकर और छोटा मोटा चीनी बाजार भी बन जाएगा..! वैसे भी देखा जाए तो इसका फायदा तो भारत को ही होगा न...सीमावर्ती गांवों में रहने वाले भारत के लोगों को अपनी सभी रोजमर्रा की जरुरतों का सामान सस्ती दरों पर आसानी से चीनी बाजार से मिल पाएगा और कभी कभार सामान लाने के बहाने वे बिना वीजा के विदेश(चीन) की सैर भी कर आएंगे..!
चीनी उत्पादों को वैसे तो कामचलाऊ कहा जाता है लेकिन भारत सरकार को लगता है चीनी सामान पर कुछ ज्यादा ही भरोसा है। तभी तो भारत ने लद्दाक की चुमार पोस्ट पर अपने बंकर को खुद तोड़ दिया ताकि चीन वहां पर मजबूत और टिकाऊ बंकर का निर्माण कर सके..! (जरुर पढ़ें- क्यों बेबस है भारत..?)
अब ये भी समझ आने लगा है कि भारत चीन के प्रधानमंत्री ली केकियांग के स्वागत को इतना उत्सुक क्यों था..? अरे भई चीनी प्रधानमंत्री ली केकियांग अपने साथ भारतीय सीमा के अंदर 5 किलोमीटर तक सड़क ले आए तो भारत सरकार क्यों न ली केकियांग के स्वागत को बेचैन रहती..? आखिर भारत का सड़क निर्माण का खर्च जो बच गया..!
देश के लिए नेताओं के त्याग की भी दाद देनी पड़ेगी...अगर सीमावर्ती इलाके में सड़क का निर्माण भारत करता तो जाहिर है इसमें भी भ्रष्टाचार होता और कई लोगों की जेब गर्म होती लेकिन यहां पर सरकार में शामिल लोगों ने अपनी कमाई की फिक्र न करते हुए चीन को सड़क का निर्माण करने दिया..!
मैं तो कहता हूं कि भारत में भ्रष्टाचार को खत्म करने का एक ही तरीका है...जिस तरह भारत ने चीन को अपनी सीमा में 5 किलोमीटर तक सड़क का निर्माण करने देने के बाद उसे भारत निर्माण का नाम दिया ठीक इसी तरह दूसरे काम भी चीन को सौंप देने चाहिए। इससे यूपीए सरकार का “हो रहा भारत निर्माण” का नारा भी सार्थक हो जाएगा और भ्रष्टाचार भी नहीं होगा..! बोलो यूपीए सरकार की जय..!!!

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रविवार, 26 मई 2013

नक्सली हमले- आखिर कब तक..?

आमतौर पर मीडिया की सुर्खियों से गायब रहने वाला छत्तीसगढ़ एक बार फिर से सुर्खियों में है। छत्तीसगढ़ के सुर्खियों में रहने की वजह एक बार फिर से नक्सली ही हैं जिन्होंने घात लगाकर किए हमले में छ्त्तीसगढ़ कांग्रेस के अधिकतर दिग्गज नेताओं की हत्या कर छत्तीसगढ़ पीसीसी को वीरान कर कर दिया है। किसी भी राजनीतिक दल के नेताओं पर शायद ये नक्सलियों का सबसे बड़ा हमला है लेकिन राजनीतिक दलों से इतर नक्सली इससे भी बड़े हमले कर सरकार का अपनी ताकत का एहसास पहले भी करा चुके हैं।
तीन साल पहले अप्रेल 2010 में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के 76 जवानों की हत्या कर नक्सलियों ने राज्य व केन्द्र सरकार की नींद उड़ा दी थी। सवाल मुंह बाएं खड़ा था कि जब नक्सली 76 हथियारबंद जवानों को घेर कर मौत के घाट उतार सकते हैं तो नक्सली क्या नहीं कर सकते..?
इसी तरह बीते साल अप्रेल 2012 में सुकमा कलेक्टर एलैक्स पॉल मेनन का अपहरण कर भी नक्सलियों ने सरकार को खुली चुनौती दी थी। कलेक्टर मेनन तो आखिर रिहा हो गए लेकिन एक कलेक्टर का अपहरण अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया। जब एक कलेक्टर ही सुरक्षित नहीं है तो आम आदमी की सुरक्षा की क्या गारंटी है..?
छत्तीसगढ़ में अमूमन रोज नक्सली कभी गोलीबारी कर तो कभी बारुदी सुरंग से विस्फोट कर जवानों को निशाना बनाते रहे हैं। ये ख़बरें सिर्फ स्थानीय अख़बारों के पन्नों तक सिमट कर रह जाती हैं क्योंकि इन हमलों में एक या दो जवान ही शहीद होते हैं लेकिन जब तीन साल पहले दंतेवाड़ा में 76 सीआरपीएफ जवान शहीद होते हैं या फिर कांग्रेस के काफिले पर हमला होता है जिसमें दिग्गज कांग्रेसी नेताओं समेत करीब दो दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हो जाती है तो ये ख़बरें छत्तीसगढ़ से दिल्ली तक भी पहुंचती हैं।
नक्सलियों के बड़े हमलों के बाद छत्तीसगढ़ से दिल्ली तक हंगामा मचता है। नकस्लियों के हमलों पर बहस का दौर शुरु हो जाता है लेकिन कुछ दिनों बाद शांति पसर जाती है और ऐसे ही एक बड़े हमले पर छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली तक इसकी गूंज सुनाई देती है..!
हालांकि ऐसा नहीं है कि कार्रवाई एक तरफ से ही होती है। सर्चिंग के दौरान या मुठभेड़ के दौरान आए दिए एक आद नक्सली के मारे जाने की खबर भी आती है और इस दौरान निर्दोष आदिवासियों की हत्या का आरोप भी जवानों पर लगता है जैसे हाल ही में बीजापुर के एड़समेटा गांव में तीन बच्चों समेत आठ लोगों की हत्या का आरोप जवानों पर लगा था लेकिन सवाल यहां भी खड़ा होता है कि आखिर क्यों नक्सल प्रभावित इलाकों में हमेशा अघोषित जंग के हालात बने रहते हैं..?
जिस तरह से नक्सलियों ने जवानों और आदिवासियों के बाद अब नेताओं को अपने निशाने में लिया है उससे ये साफ जाहिर होता है कि नक्सली खुद को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं मानते और लोकतांत्रिक सरकार से इतर अपनी एक समानांतर सरकार चलाना चाहते हैं या कहें कि चला रहे हैं। अपने बाहुल्य वाले इलाकों में वे विकास कार्य नहीं चाहते क्योंकि उन्हें डर है कि अगर सड़क का निर्माण हो गया या उस इलाके में पक्के स्कूल या सरकारी इमारतें बन गयी तो सुरक्षाबल उसका इस्तेमाल उनके खिलाफ कर सकते हैं।
सरकार नक्सलियों से हथियार डालकर बातचीत का रास्ता अपनाने की बात करती है लेकिन इसके बाद भी आए दिन छोटी मोटी नक्सली हमलों के बीच दंतेवाड़ा या सुकमा जैसे बड़े नक्सली हमले सामने आते रहते हैं जो साफ ईशारा करते हैं कि नक्सली कभी हथियार नहीं डालने वाले लेकिन इसके बाद भी स्वामी अग्निवेश टाइप लोग कहते हैं कि नक्सलियों ने दंतेवाड़ा में 76 जवानों की हत्या की तो क्या हुआ…जवानों ने भी तो निर्दोष आदिवासियों को नक्सली बताकर उनकी हत्या की थी..! मतलब तो ये हुआ कि अग्निवेश नक्सलियों द्वारा जवानों की हत्या को जस्टिफाई करने की कोशिश कर रहे हैं और अघोषित तौर पर नक्सलियों का समर्थन कर रहे हैं..!
एक तरफ भारत पहले ही अपने पड़ोसी पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और ड्रैगन के दोहरे खतरे से जूझ रहा है ऊपर से देश के अंदर विभिन्न राज्यों में नक्सली इससे भी बड़ा खतरा बनकर ऊभर रहे हैं लेकिन हमारी सरकार हर चीज का हल शांति प्रक्रिया से निकालना चाहती है। गांधी जी के अहिंसा के सिद्धांतों पर चल रही हमारी सरकारों को कौन समझाए कि नक्सली शांति वार्ता से नहीं मानने वाले..!
नक्सली भी इस देश की ही नागरिक हैं लेकिन अगर वे हथियार की भाषा ही बोलना और समझना चाहते हैं तो क्यों न उनकी भाषा में उनसे बात की जाए..? क्या हमारी सरकार इतनी सक्षम नहीं है कि नक्सल बाहुल्य इलाकों में अभियान चलाकर नक्सलियों को हथियार डालने पर मजबूर कर दिया जाए। जाहिर है हमारी सरकार भी सक्षम है और सुरक्षाबल भी लेकिन फिर सवाल खड़ा हो जाता है कि ये फैसला ले कौन..?
केन्द्र और राज्य सरकारों के साथ ही सभी राजनीतिक दलों को मिलकर ये फैसला लेना होगा कि वे अब और नक्सली हमले नहीं सहेंगे और समर्पण या बातचीत के रास्ते से न मानने पर नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए एक दृढ़ निर्णय लेना ही होगा वर्ना एक अंतराल के बाद फिर से दंतेवाड़ा या फिर सुकमा जैसी घटनाएं हमारे सामने आती रहेंगी।

deepaktiwari555@gmail.com

शनिवार, 25 मई 2013

ये गर्मी बड़ी बेशर्म है













ये गर्मी भी बड़ी बेशर्म है
सुबह 6 बजे भी हवाएं गर्म हैं
पसीने से बदन तर बतर है
चारों तरफ गर्म हवाओं का असर है
ये गर्मी भी बड़ी बेशर्म है
नहाने जाओ तो नलके का पानी गर्म है
अब तो किसी को मटके का पानी देने में भी शर्म है
आसमान से बरस रही आग के बीच
एसी से निकलता ताप चरम पर है
ये गर्मी भी बड़ी बेशर्म है
झुलसती गर्मी में मजदूरी कैसे न करें
बच्चों को पालना भी तो धर्म है
तन पर कपड़ा क्यों न डालें
मौसम को नहीं तो क्या हमें तो शर्म है
ये गर्मी भी बड़ी बेशर्म है
रात के 12 बजे भी हवाएं गर्म है
नींद कैसे आए बिस्तर भी तो गर्म है
पंखे कूलर भी बंद हो गए
अब तो लगता है बिजली भी बेशर्म है
ये गर्मी भी बड़ी बेशर्म है

© deepaktiwari555@gmail.com

शुक्रवार, 24 मई 2013

ट्रैफिक जाम- जिम्मेदार कौन..?


सूर्य देवता अपने पूरे शबाब पर हैं। देश भर में आसमान से आग बरस रही है। दिल्ली – एनसीआर भी इससे अछूता नहीं है। पारा 50 डिग्री को छूने को बेताब है। आसमान से बरसती आग के बीच सड़कों पर एसी गाड़ियों से निकलती गर्मी वातावरण को और भी तपा रही है। सोचिए ऐसे में किसी रेड लाइट पर आपको भीषण जाम का सामना करना पड़े तो क्या हालत होगी..?
नोएडा में सुबह के करीब 10 बजे घर से दफ्तर के लिए निकलते वक्त बस हर रोज यही दुआ करता हूं कि ऐसी भीषण गर्मी में किसी ट्रैफिक सिग्नल पर रेड लाइट से मुलाकात न हो और ट्रैफिक जाम से तो कभी भी नहीं..! बस रोज सारे सिग्नल हरे मिले ताकि बिना किसी परेशानी के दफ्तर पहुंच जाऊं लेकिन शायद ही ऐसी कभी हुआ और भविष्य में होने की उम्मीद नजर आती है। घर से दफ्तर के बीच में सात ट्रैफिक सिग्नलों से सामना होता है। कुछ एक सिग्नल तो आराम से पार हो जाते हैं लेकिन दो-तीन ट्रैफिक सिग्नलों को पार करने में पसीने छूट जाते हैं। कई-कई बार तो तीसरी या चौथी बार सिग्नल ग्रीन होने पर चौराहा पार करने का नंबर आता है।  
24 मई 2013, शुक्रवार का दिन था सूर्य देवता पूरे शबाब पर थे...अख़बार और टीवी सुबह से ही दिन का तापमान 46 डिग्री को पार करने की भविष्यवाणी कर लोगों को डरा रहे थे लेकिन नौकरीपेशा लोगों को दफ्तर तो जाना ही था। इसी तरह व्यापारियों को अपनी दुकानें खोलनी थी तो रिक्शे वाले को भी दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना ही था...मरते क्या न करते भीषम गर्मी में भी सड़कों पर अपने – अपने काम को निकले लोगों की वही भीड़ थी। आसमान से बरसती आग और एसी गाडियों से निकलती गर्मी के बीच रेड लाइट पर 15 सेकंड भी रुकने की हिम्मत नहीं हो रही थी ऐसे में दफ्तर के रास्ते में पड़ने वाली तीन अलग अलग चौराहों पर अकदम अलग तस्वीर देखने को मिली जिसे आपके साथ साझा कर रहा हूं।
पहली तस्वीर- एक चौराहे पर ट्रैफिक सिग्नल ठीक से काम कर रहे थे लेकिन दफ्तर जाने का वक्त होने के चलते अत्याधिक ट्रैफिक दबाव के कारण तीसरी या चौथी बार में चौराहा पार करने का नंबर आया। इस दौरान करीब 250 सेकेंड झुलसाने वाली धूप का सामना करना पड़ा। कार में बैठे लोग तो एसी चलाकर ठंडक का मजा ले रहे थे लेकिन बाहर दोपहिया वाहन या फिर बस, ऑटो या रिक्शे में बैठे लोगों के लिए एसी कार सवारों का मजा किसी सजा से कम नहीं था।
दूसरी तस्वीर- एक व्यस्त चौराहे पर गाड़ियों की लंबी कतार...ट्रैफिक सिग्नल खराब था लिहाजा भीषण गर्मी में ट्रैफिक पुलिस का एक जवान बिना किसी छांव के सूरज की गर्मी और चारों तरफ से गाड़ियों से निकलती गर्मी के बीच ट्रैफिक व्यवस्था को मुस्तैदी से संभाले हुए था।
अंदाजा लगाया जा सकता है कि सुबह दस बज के वक्त 40 डिग्री से ऊपर तापमान में कैसे ये जवान चौराहे पर अपनी ड्यूटी कर रहा था और ट्रैफिक व्यवस्था को बिगड़ने नहीं दे रहा था..? उसके खड़े होने के लिए न तो कोई शेड ही था और न ही एक पल के लिए छांव में जाने का मौका क्योंकि अगर वह एक पल के लिए भी वहां से हटे तो फिर दफ्तर जाने की जल्दी में रेड लाइट पर खड़े लोग ट्रैफिक का क्या हाल करेंगे..!
हालांकि ये उस ट्रैफिक जवान की ड्यूटी का हिस्सा है कि उसे ट्रैफिक व्यवस्था को बिगड़ने नहीं देना है लेकिन इतनी भीषण गर्मी में ट्रैफिक पुलिस के जवान का हौसला काबिले तारीफ था क्योंकि इतनी शिद्दत और ईमानदारी से पुलिसकर्मियों को काम करते हुए देखने की आदत नहीं है न..!
इस सब के बाद भी दफ्तर पहुंचने की जल्दबाजी में लोग ट्रैफिक नियमों को तोड़ने से बाज नहीं आ रहे थे और अपने साथ ही दूसरे की जान को भी खतरे में डाल रहे थे।    
तीसरी तस्वीर- फिर से एक व्यस्त चौराहा...टैफिक सिग्नल खराब हैं...ट्रैफिक को नियंत्रित करने के लिए यातायात पुलिस का कोई भी जवान मौजूद नहीं है...सोचिए कैसा नजारा होगा। चौराहे पर भीषण जाम...वजह पहले निकलने के चक्कर में चारों दिशाओं से आ रही गाड़ियां एक दूसरे का रास्ता रोक कर खड़ी थी। कोई भी न तो पीछे हटने को तैयार था और न ही सामने आ रही गाड़ी को जाने देने के लिए जगह देने को तैयार...हर कोई एक दूसरे को कोस रहा था लेकिन खुद की गलती का एहसास किसी को नहीं था। नतीजा जाम लगातार बढ़ता ही जा रहा था। बाईक पर करीब आधा घंटा मुझे भी जाम में फंसे हो गया था...आसमान से बरसती आग और एसी गाड़ियों की गर्मी झुलसा रही थी। झुलसाने वाली गर्मी में हालत ऐसी थी जिसे शायद ही मैं शब्दों में बयां कर पाऊं..! मेरा क्या शायद हर किसी का यही हाल था लेकिन क्या करते चारों तरफ से गाड़ियों से घिर चुका था न तो आगे जाने की जगह थी न पीछे जाने का रास्ता। इसी बीच सायरन बजाती हुई एक पीसीआर वैन आई और उसमें से उतरे पुलिसकर्मियों ने जैसे तैसे जाम खुलवाया। जाम खुलवाया शब्द पढ़ने में तो शायद एक सेकेंड लगा होगा लेकिन इस जाम को खुलवाने में कितना समय लगा होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है..!
ये तीन तस्वीरें ये बयां करने के लिए काफी हैं कि जिस ट्रैफिक जाम से हम घबराते हैं...उसके लिए कहीं न कहीं किसी न किसी रुप में हम खुद ही जिम्मेदार हैं। घर से निकलते वक्त सारी रेड लाइट के हरे हो जाने की तो हम कामना करते हैं लेकिन मौका मिलने पर ट्रैफिक सिग्नल को तोड़े में हम देर नहीं करते..! क्या ट्रैफिक को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी सिर्फ यातायात पुलिस की ही है..?
जाहिर है सड़क पर चल रहे हर व्यक्ति की भी ये उतनी ही जिम्मेदारी है जितनी की यातायात पुलिस की लेकिन जाम में फंसने पर हम यातायात पुलिस के जवान के न होने पर हम उसे गरियाने में तो देर नहीं करते लेकिन खुद नियमों को तोड़ते हुए चले जाते हैं..!
अगर हम सब इस जिम्मेदारी को समझें तो सड़क पर अपनी आधी से ज्यादा दिक्कतों को हम खुद ही आसान कर सकते हैं लेकिन क्या ये कार्य इतना आसान है..? यकीन मानिए अगर आसान नहीं है तो इतना मुश्किल भी नहीं है कि हम यातायात नियमों को पालन ही न कर सकें..! कोशिश तो करके देखिए...एक दिन शायद अपने गंतव्य पर थोड़ी देरी से पहुंचेंगे...दो दिन देरी से पहुंचेंगे लेकिन इसका दीर्घकालिक असर दिखेगा लेकिन याद रखिए अपने साथ ही हमें दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करते हुए चलना होगा।   

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गुरुवार, 23 मई 2013

अब मेरे राजदां और भी हैं..!


यूपीए सरकार के 9 साल पूरे हो गए लेकिन बकौल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह गिलास अभी खाली है। यूपीए 1 के बाद यूपीए 2 का कार्यकाल खत्म होने में महज 12 माह का वक्त बचा है लेकिन गिलास भरने में अभी वक्त लगेगा। ये बात अलग है कि सरकार में शामिल सभी लोगों के घर के गिलास, कटोरे, चम्मच तक सब भर गए हैं..!
“मौनी सम्मान” से नवाजे जा चुके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह न सिर्फ बोले बल्कि एक शेर पढ़ना भी नहीं भूले...जो कुछ इस तरह था...'गए दिन कि तन्हा था मैं अंजुमन में, यहां अब मेरे राज़दां और भी हैं। सितारों से आगे जहां और भी हैं।” (जरुर पढ़ें- UPA सरकार के 9 साल (व्यंग्य)।
मनमोहन सिंह ने शेर एकदम सटीक चुना...वाकई में अब मनमोहन तन्हा कहां है,  भ्रष्टाचार और घोटालों में उनके साथ उनके अधिकतर मंत्रीमंडलीय सहयोगी भी तो साथ में हैं...और अभी तो एक साल का वक्त बचा है...जो पीछे रह गए हैं...वे भी साथ आ ही जाएंगे..!
बकौल मनमोहन और सोनिया ये जश्न का वक्त है। सोनिया गांधी तो ये भी कहती हैं कि यह बताने का वक्त है कि हमने नौ साल में क्या किया है। सोनिया चैलेंज करती हैं और कहती हैं कि क्या कोई हम पर सवाल उठा सकता है..? गजब का कॉन्फिडेंस है भई..!
सोनिया गांधी सरकार में पारदर्शिता होने और जवाबदेही तय होने की बात करती हैं...यहां भी सोनिया ने कौन सा गलत कहा..! पारदर्शिता को इतनी है कि कोयला घोटाले पर सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट में कानून मंत्री अश्विनि कुमार बदलाव कर देते हैं..! पारदर्शिता यहीं खत्म नहीं हो जाती...रेलवे मंत्रालय में तो गजब की पारदर्शिता है...एक-एक कुर्सी के दाम तय हैं वो भी पूरी पारदर्शिता के साथ..!
जवाबदेही का तो जवाब नहीं...देश से जुड़े अहम मसलों पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मौन साध लेते हैं तो भ्रष्टाचार और घोटालों से घिरे मंत्री कहते हैं उन्होंने कुछ गलत नहीं किया है...फिर वे क्यों इस्तीफा दें..? अगर प्रधानमंत्री का मौन सही है और मंत्रियों के तर्क सही हैं तो फिर हजारों करोड़ों के घोटाला कैसे हो रहे हैं इसका जवाब किसी के पास नहीं है..?
बहरहाल सरकार के पास 12 माह का वक्त अभी बाकी है…ऐसे में देखना रोचक होगा कि 9 साल से भरने के इंतजार में रखे खाली गिलास को मनमोहन सिंह और उनकी टीम अब भर पाएगी या फिर ये 12 महीने मनमोहन सिंह और उनकी टीम 9 साल के जश्न की खुमारी उतारने में ही गुजार देगी..!

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