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शुक्रवार, 17 मई 2013

ब्रेकिंग न्यूज- संजू बाबा ने नाश्ते में पोहा खाया


सुबह - सुबह टीवी खोला तो सभी प्रमुख समाचार चैनलों में आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग के साथ ही ये ख़बर भी प्रमुखता से थी कि आर्म्स एक्ट में दोषी करार संजय दत्त की पहली रात आर्थर रोड जेल में कैसी गुजरी..? मसलन पहली रात किस बैरक में गुजरी..? संजय दत्त को नींद आई कि नहीं..? नाश्ते में संजय दत्त ने क्या खाया..? वगैराह वगैराह..!
समाचार चैनलों के अनुसार संजय दत्त ने पहली रात बैरक नंबर 12 में अकेले काटी। साथ में ये भी बताया जा रहा था कि संजय दत्त रातभर सो नहीं सके। सुबह उठकर संजय दत्त ने नाश्ते में पोहा खाया ये ख़बर भी सभी समाचार चैनलों की सुर्खियों में थी।
शुक्र है कि समाचार चैनल संजय दत्त के नाश्ते तक ही सीमित थे और साथ में ये नहीं बता रहे थे कि संजय दत्त ने एक दिन पहले क्या खाया था..?
टीवी देखते हुए अजीब सी उलझन के साथ ही कई सवाल जेहन में उठ रहे थे कि गैरकानूनी कार्यों में लिप्त रहने पर देश की सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दोषी ठहराए गए एक अपराधी के पीछे आखिर क्यों सब इतने दीवाने हो रहे हैं..?
इस सब को देखकर ऐसा लगने लगा है कि मानो संजय दत्त निर्दोष है और संजय दत्त को बिना किसी अपराध के जेल में डाल दिया गया है..! ऐसे लाखों मुल्जिम भारतीय जेलों में बंद हैं जिनके मामले विभिन्न अदालतों पर सालों से लंबित हैं..! वे मुजरिम नहीं ठहराए जाने के बाद भी किसी अपराधी की तरह सजा काट रहे हैं लेकिन ऐसे मुल्जिमों के लिए तो कोई आवाज़ नहीं उठाता..! संजय दत्त के मामले में ऐसा हो रहा है सिर्फ इसलिए कि वे एक मशहूर फिल्म अभिनेता हैं..!
मैं व्यक्तिगत तौर पर संजय तक का प्रशंसक हूं और दत्त के अभिनय का कायल हूं...संजय दत्त की शायद ही कोई फिल्म होगी जो मैंने न देखी हो लेकिन इसके बाद भी मैं संजय दत्त ने जो अपराध किया है...जिसके लिए वे दोषी भी ठहराए जा चुके हैं उस अपराध के लिए संजय दत्त को मिली सजा को माफ करने की मांग करने वालों की सूची में शामिल नहीं हूं और न ही संजय दत्त के इस आपराधिक कृत्य को लेकर मेरे मन में संजू बाबा के लिए जरा सी भी सहानुभूति है।
समझ नहीं आ रहा है कि आखिर क्यों संजय दत्त को मीडिया में इस तरह का ट्रीटमेंट दिया जा रहा है कि जिससे लोगों के मन में ये भाव उठने लगे कि संजय दत्त निर्दोष हैं..? संजय दत्त की सजा माफ कर देनी चाहिए..? एक अपराधी को आखिर इतनी अहमियत क्यों दी जा रही है..?
सिर्फ मीडिया ही नहीं विभिन्न क्षेत्रों के बड़े बड़े दिग्गज भी संजय दत्त की पैरवी को तैयार बैठे हैं क्यों..? क्योंकि संजय दत्त एक जानी मानी फिल्मी हस्ती है इसलिए..?
मैं खुद पत्रकारिता से जुड़ा हुआ हूं लेकिन फिर भी मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं है कि संजय दत्त से जुड़ी ख़बरों को लेकर मीडिया में जो सक्रियता दिखाई दे रही है वह पत्रकारिता के लिहाज से ठीक तो नहीं कही जा सकती..!
पत्रकारिता से जुड़े मेरे कुछ संगी साथियों को शायद ये बात पसंद न आए..! लेकिन क्या ये वास्तव में दर्शकों को ब्रेकिंग न्यूज के रुप में दिखाया या बताया जाना चाहिए कि जेल में रात को संजय दत्त को नींद आई कि नहीं..!  संजय दत्त ने सुबह नाश्ते में क्या खाया..?
ठीक है न...एक अपराधी को उसके किए अपराध के लिए सजा मिल गयी...वो जेल चला गया...! क्यों एक अपराधी का इतना महिमा मंडन हो रहा है कि दर्शकों को ये लगने लगे कि यार संजय दत्त तो निर्दोष है...दत्त की सजा माफ कर दी जानी चाहिए..!
121 करोड़ की आबादी वाले भारत में जन समस्यों का बड़ा अंबार है...जनता से जुड़े ऐसे लाखों मुद्दे हैं जिन्हें एक सशक्त आवाज और माध्यम की जरुरत है..! जेल में बंद संजय दत्त के नाश्ते में पोहे की ख़बरों की बजाए मीडिया के कैमरे उस तरफ की तस्वीर जनता के साथ ही सरकार को दिखाए और सरकार से जवाब मांगे तो शायद जनता की आधी से ज्यादा समस्याओं का हल चुटकी में निकल आए..!
जहां तक बात किसी भी अपराधी कि है तो उसे उसके कर्मों की सजा मिलनी ही चाहिए फिर चाहे वो अपराधी कसाब हो, या फिर संजय दत्त..!

deepaktiwari555@gmail.com

गुरुवार, 16 मई 2013

यहां सब कुछ फिक्स है..!


जिस खेल ने करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों के प्यार के साथ ही दौलत और शोहरत दी उस खेल की आत्मा का ही सौदा कर दिया..! पैसों के लिए उन करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों की भावना से तक खिलवाड़ करने में गुरेज नहीं किया जो क्रिकेट मैच की हर एक गेंद पर रोमांचित हो उठते हैं..! हर गेंद पर उनके दिल की धड़कनों को चरम पर पहुंचा देती है लेकिन उन्हें ये नहीं पता कि हर एक गेंद का सौदा तो पहले ही किया जा चुका है..!
कौन से गेंद वाईड होगी..? कौन सी गेंद नो बॉल...किस गेंद पर छक्का पड़ेगा..? ये सब तो पहले से ही फिक्स है..! यहां गेंदबाज सामने खड़े बल्लेबाज का विकेट लेकर अपनी टीम को मैच में जीत दिलाकर क्रिकेट प्रेमियों का दिल नहीं जीतना चाहता बल्कि उसे तो हर एक खराब गेंद फेंकने के लिए चाहिए लाखों रुपए। वैसे भी जब एक ओवर की सभी 6 खराब गेंद फेंकने के लिए 60 लाख रुपए मिल रहे हों तो क्यों न ऐसा किया जाए..?
हिंदुस्तान में क्रिकेट ही एक ऐसा खेल है जिसे लोग धर्म से बड़ा मानते हैं। करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों के लिए ये मायने नहीं रखता कि सामने वाला खिलाड़ी किस धर्म, जाति या राज्य से है..! करोड़ों क्रिकेट प्रेमी उस खिलाड़ी की हौसला अफजाई करते हैं...साथ ही करते हैं भारत की जीत की दुआ। लेकिन भोले भाले क्रिकेट प्रेमी ये नहीं जानते कि जिन खिलाड़ियों पर वे जान लुटा रहे हैं उनका इमान पैसों के लिए इतना डोल चुका है कि वे खेल की आत्मा तक का सौदा करने में तक नहीं हिचकते..!
आईपीएल में राजस्थान रॉयल्स के तीन खिलाड़ियों एस श्रीशांत, अंकित चौहान और अजीत चंदीलीया की स्पॉट फिक्सिंग में गिरफ्तारी के बाद एक बार फिर से करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों के भरोसे को तोड़ के रख दिया है।  
हालांकि ये पहली बार नहीं हुआ है जब फिक्सिंग की कालिख ने इस खेल का मुंह काला किया है..! इससे पहले भी पैसों के लिए खेल की आत्मा का सौदे की ख़बरें क्रिकेट प्रेमियों के भरोसे को तोड़ती रही हैं लेकिन सब भुला कर दर्शकों ने हर बार इस खेल को और खिलाड़ियों को सम्मान और प्यार दिया है..! आईपीएल के हर मैच में खचाखच भरे स्टेडियम ये बताने के लिए काफी हैं कि इस खेल का रोमांच किस कदर क्रिकेट प्रेमियों के सिर चढ़कर बोलता है..!
2000 में क्रिकेट के इस काले खेल का खुलासा उस वक्त हुआ था जब दिल्ली पुलिस ने दक्षिण अफ्रीका के कप्तान हैंसी क्रोनिए और एक बुकी के बीच बातचीत को ट्रेस किया था जिसमें क्रोनिए की मैच हारने के लिए बुकी से पैसे लेने की बात सामने आयी थी। क्रोनिए से शुरु हुई जांच में निकी बोए और हर्शल गिब्स के साथ ही पाकिस्तान के सलीम मलिक, भारत के मोहम्मद अजहरुद्दीन और अजय जडेजा का नाम सामने आया था।
उस वक्त इन खिलाड़ियों पर आईसीसी की कार्रवाई के बाद लगने लगा था कि भविष्य में शायद खिलाड़ी फिक्सिंग की काली परछाई से खुद को दूर रखेंगे लेकिन पैसों का लालच फिर से खेल भावना पर भारी पड़ता दिखा 2010 में जब इंग्लैंड दौरे में गयी पाकिस्तान टीम के तीन खिलाड़ी मोहम्मद आसिफ, सलमान बट्ट और मोहम्मद आमिर फिक्सिंग के दोषी पाए गए।
इन तीनों को भी सजा मिल गयी...क्रिकेट प्रेमी भी शायद इसे भुला बैठे थे लेकिन आईपीएल के रोमांच के बीच अचानक फिर से प्रकट हुई फिक्सिंग की काली परछाई ने एक बार फिर से भरोसे की डोर को तोड़ के रख दिया...जिसे फिर से जोड़ना राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट संस्थाओं के लिए आसान नहीं होगा..!


deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 15 मई 2013

शिलापट पर अब सिब्बल का भी नाम..!


बस केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल का नाम ही बाकी रह गया था वर्ना प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर उनके मंत्रिमंडल के अधिकतर सदस्यों के नाम तो भ्रष्टाचार और घोटालों के शिलापट पर स्वर्ण अक्षरों में अंकित हो ही चुके हैं..! वोडाफोन के बहाने रही सही कसर को केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने पूरा कर दिया..!
आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल के कपिल सिब्बल पर लगाए गए आरोप तो कम से कम यही कहानी बयां कर रहे हैं..! केजरीवाल ने कपिल सिब्बल के कानून मंत्रालय संभालते ही वोडाफोन के 11 हजार करोड़ रुपए के कर विवाद को अदालत से बाहर सुलझाने के फैसले पर सवाल खड़े करते हुए कहा है कि सिब्बल के इस फैसले से भ्रष्टाचार की बू आ रही है औऱ इसके लिए सिब्बल और कंपनी के बीच मोटी डील हुई है..!
केजरीवाल के आरोपों में कितना दम है ये तो वक्त ही बताएगा लेकिन कानून मंत्रालय का पदभार संभालने के तुरंत बाद वोडाफोन के 11 हजार करोड़ के कर विवाद को अदालत के बाहर सुलझाने का केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल का जल्दबाजी भरा फैसला कई सवालों को तो जन्म देता ही है..!
अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब कपिल सिब्बल मोदी के खिलाफ बड़ा खुलासा करने का दम भर रहे थे लेकिन खुलासे से पहले सिब्बल खुद ही खुल गए..! सिब्बल लगते तो समझदार हैं..! लेकिन वोडाफोन के मसले पर फैसला लेने में सिब्बल ने कुछ ज्यादा ही समझदारी दिखा दी..!
अरे सिब्बल साहब कुछ दिन ठहर जाते...फिर ले लेते वोडाफोन के मसले को अदालत से बाहर सुलझाने का फैसला...ऐसी भी क्या जल्दी थी..? कौन सा कोयला मंत्रालय आपको सिर्फ 24 घंटे के लिए ही मिला था..? वैसे भी तो यूपीए सरकार के आपके अधिकतर साथी भ्रष्टाचार और घोटालों के शिलापट पर अपना नाम खुदवा ही चुके हैं..! आप भी शिलापट पर नाम खुदवाने के फेर में आ गए...आप से तो ये उम्मीद नहीं थी..! लेकिन इसमें दोष आपका भी नहीं है...वैसे भी नेताओं को कुर्सी पर बैठने के साथ ही ज्यादा से ज्यादा शिलापटों पर अपने नाम खुदवाने का शौक तो पुराना है..! ये शिलापट तो वैसे भी आपसे पहले कई दिग्गजों के नामों से सुशोभित है..! ऐसे मे अपना नाम लिखवाने के लिए आपका उतावलापन समझ में तो आता है..!

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मंगलवार, 14 मई 2013

सीबीआई “तोता”, आईबी “मुर्गा” और दिग्विजय सिंह..?


कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह...इस नाम से तो वाकिफ ही होंगे आप..! बड़ी ही अदभुत और रोचक हस्ती हैं ये..! विरोधियों के खिलाफ जुबानी तीर छोड़ने में तो इन्हें महारत हासिल है..! कहने को तो कांग्रेस में महासचिव हैं लेकिन जब – जब कांग्रेस पर संकट घिरता है तब – तब दिग्विजय सिंह कांग्रेस के आनाधिकृत प्रवक्ता हो जाते हैं..!
कांग्रेस में दिग्विजय सिंह के रोल को हम यूं समझ सकते हैं- संकट में घिरी कांग्रेस जब कई बार असहज स्थिति में आ जाती है और पार्टी को ऐसी स्थिति में विरोधियों पर हमला बोलना होता है तो कांग्रेस आलाकमान दिग्विजिय सिंह का सहारा लेता है..!
दिग्विजय सिंह के तीखे जुबानी तीर कांग्रेस की बात को जनता तक और विरोधियों तक पहुंचा भी देते हैं और कांग्रेस इसे दिग्विजय सिंह का व्यक्तिगत मत कहते हुए इससे पल्ला भी झाड़ लेती है..! अगर ऐसा नहीं है तो आज से पहले जाने कितनी बार जब – जब दिग्विजय सिंह ने अपने तीखे जुबानी तीर छोड़े हैं तो कांग्रेस को दिग्विजय सिंह पर कार्रवाई करनी चाहिए थी लेकिन ऐसा कभी देखने को मिला नहीं..!
एक बार फिर से दिग्विजय सिंह चर्चा के केन्द्र में हैं। इस चर्चा का विषय बना है दिग्विजय सिंह का एक ट्विट जिसमें दिग्विजय सिंह सुप्रीम कोर्ट द्वारा सीबीआई को “पिंजरे में बंद तोता” कहे जाने पर नाराज़ दिखाई दे रहे हैं। साथ ही दिग्विजय सिंह को केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण(कैट) द्वारा इंटेलिजेंस ब्यूरो(आईबी) को “चिकन”(मुर्गा) कहे जाने पर भी ऐतराज है।
दिग्विजय सिंह सवाल करते हैं कि सीबीआई को “पिंजरे में बंद तोता” कहने और आईबी को “मुर्गा” कहने से क्या हम अपने संस्थानों की हैसियत नहीं घटा रहे हैं..?
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा ने तो ये स्वीकार ही कर लिया है कि सीबीआई पिंजरे मे बंद तोते की तरह ही है लेकिन कांग्रेस ने अधिकृत तौर पर इस पर कोई टिप्पणी नहीं की लेकिन दिग्विजय सिंह कब तक चुप रहते सो ट्विटर पर उनकी टिप्पणी आ ही गयी। लगे हाथों अब कांग्रेसी भी दिग्विजय सिंह की इस नाराजगी को बडे ही बैलेंस तरीके से जायज ठहरा रहे हैं..!
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी की चर्चा हो रही है...दिग्विजय सिंह की नाराजगी की चर्चा भी खूब हो रही है लेकिन ये सवाल तो ये है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट को ऐसी टिप्पणी करने की जरुरत ही क्यों पड़ी..?
क्या इस सब के लिए सरकार जिम्मेदार नहीं है...जिसने सीबीआई को अपने हाथ का खिलौना बना रखा है..? जो सीबीआई को अपने सियासी फायदे के लिए इस्तेमाल करती रही है..?
माया-मुलायम की सीबीआई और सरकार को लेकर आए दिए उनके बयान...डीएमके समर्थन वापस लेने के तुरंत बाद सीबीआई का छापा और ताजा मामले में कोलगेट पर सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट में सरकार का दखल क्या दर्शाती है..? ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट मे अगर सीबीआई को पिंजरे में बंद ऐसा तोता कहा जो अपने मालिक के इशारे पर काम करती है तो क्या गलत कहा..?
आज दिग्विजय सिंह कह रहे हैं कि इससे हम अपने संस्थानों की हैसियत घटा रहे हैं लेकिन वास्तविकता तो ये है कि सीबीआई की हैसियत तो सरकार ने खुद कभी रखी ही नहीं..?  कुछ एक अपवाद छोड़ दें तो सीबीआई ने तो हर बार सरकार के इशारे पर ही काम किया है..! सीबीआई के इसी कार्यप्रणाली से नाराज़ होकर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की तो ये दिग्विजय सिंह के गले नहीं उतर रही है..!
ये छोड़िए इसके बाद भी सरकार की बेशर्मी देखिए...सरकार में शामिल लोग ये मानने को तैयार ही नहीं हैं कि सीबीआई का इस्तेमाल कभी उन्होंने अपने सियासी फायदे के लिए किया..! जबकि सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को खुद ही सही ठहरा चुके हैं कि सीबीआई पिंजरे मे बंद तोते की तरह है जो अपने मालिक(सरकार) के इशारे पर काम करती है। बेहतर होगा कि सुप्रीम कोर्ट की तल्ख़ टिप्पणी के बाद केन्द्र सरकार सीबीआई जैसी संस्थाओं को अपने सियासी फायदे के लिए इस्तेमाल न करते हुए उनको स्वतंत्र रुप से कार्य करने दे..! लेकिन बड़ा सवाल तो ये है कि क्या कभी ऐसा हो पाएगा..?

deepaktiwari555@gmail.com

रविवार, 12 मई 2013

नवाज शरीफ के स्वागत को बेचैन मनमोहन..!


प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की इतनी त्वरित प्रतिक्रिया इससे पहले तो कभी नहीं देखी। अक्सर खामोश रहने वाले हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अहम मसलों पर भी अपनी चुप्पी तोड़ने में भी कई हफ्ते लगा देते हैं लेकिन पाकिस्तान में आम चुनाव में नवाज शरीफ की पार्टी को सबसे ज्यादा सीटें मिलने पर मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान नवाज शरीफ को बधाई देने में देर नहीं की। इतना ही नहीं लगे हाथ नवाज शरीफ को भारत आने का न्यौता भी दे दिया।
ज्यादा दिन नहीं हुए हैं जब पाक की कोट लखपत जेल में कैद भारतीय कैदी सरबजीत की साथी कैदियों की पिटाई के बाद लाहौर के जिन्ना अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गयी थी..! सरबजीत की मौत एक सामान्य मौत तो थी नहीं ऐसे में पाक की नीयत पर सवाल उठने लाजिमी थे। (जरुर पढ़ें- कब तक आंख रोएगी..?)
इससे पहले भारतीय सीमा में घुसपैठ पर भारतीय सैनिकों के सिर कलम करने की पाक सैनिकों की घटना को भी इतनी आसानी से नहीं भुलाया जा सकता..! पाक की नापाक करतूतों की फेरहिस्त तो काफी लंबी है लेकिन इन दोनों वाक्यों की ही अगर बात करें तो शायद आपको याद होगा की हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कभी इतनी त्वरित प्रतिक्रिया इन मामलों पर नहीं दी।
पाक की नापाक करतूत तो छोड़िए दिल्ली गैंगरेप और यूपीए सरकार के एक के बाद एक उजागर होते भ्रष्टाचार के मामले और घोटालों पर भी मनमोहन सिंह ने अपनी चुप्पी तोड़ने के लिए भी मानो हर बार किसी शुभ मुहूर्त का ही इंतजार किया..! जिस पाकिस्तान की नापाक करतूतों पर पूरा देश आक्रोशित था उस पर भी प्रधानमंत्री की चुप्पी हर बार लंबे इंतजार के बाद ही टूटी लेकिन नवाज शरीफ की पार्टी को पाकिस्तान के आम चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें मिलने पर बधाई देने और नवाज शरीफ को भारत आने का न्यौता देने के लिए प्रधानमंत्री का उतावलापन समझ से बाहर है..!
नवाज शरीफ को बधाई देने तक तो समझ में आता है लेकिन प्रधानमंत्री जी शरीफ को भारत आने का न्यौता क्यों..? क्या जिस तरह भारतीय सीमा में घुसकर भारतीय सैनिकों के सिर कलम करने के बाद सरकार ने पाक प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ को शाही लंच दिया उसी तरह क्या अब सरबजीत की पाक जेल में साजिशन हत्या के बाद अब आप नवाज शरीफ को भारत बुलाकर उनकी पीठ ठोकना चाहते हैं..? (जरुर पढ़ें- और कितने थप्पड़ खाओगे..?)
एक बार नहीं पाक ने हर बार भारत के दोस्ती के हाथ को थामने के बाद भारत की पीठ पर धोखे से वार किया है..! फिर भी आपको उम्मीद है कि पाक के साथ दोस्ती की गाड़ी उस रास्ते पर बिना रुके आगे बढ़ पाएगी जिस राह पर हर कदम पर बम धमाके, दगाबाजी, चालबाजी, दोहरा चरित्र और भारत की शांति को भंग करने की साजिश की लैंड माइन बिछी हुई है..!
प्रधानमंत्री जी काश इतना उतावलापन आपने देश के भीतर के अहम मसलों को सुलझाने पर और अपनी सरकार के मंत्रियों के भ्रष्टाचार और घोटालों पर लगाम कसने के लिए दिखाया होता तो शायद आज देश की तस्वीर कुछ और ही होती लेकिन अफसोस आपको भारत को हर कदम पर लहूलुहान करने वाले पाकिस्तान पर ज्यादा भरोसा है..!

deepaktiwari555@gmail.com

शुक्रवार, 10 मई 2013

काश, मनमोहन सिंह वास्तव में पीएम होते..!


कोशिश तो पूरी की...टोटके भी आजमा कर देख लिए लेकिन कुर्सी फिर भी नहीं बची..! जी हां बात वर्तमान के सबसे चर्चित दो चेहरे अश्विनी कुमार और पवन बंसल की हो रही है। दोनों ने कारनामे भी तो गजब किए थे..! एक साहब ने कानून मंत्री रहते हुए कोयला घोटाले पर सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट को ही बदल डाला तो दूसरे साहब ने रेल मंत्री रहते हुए अपने भांजे को भ्रष्टाचार की रेल चलाने की खुली छूट दे दी..! (जरुर पढ़ें- भांजा चला रहा मामा की रेल..!, भ्रष्टाचार का लाइसेंस..!)
जब कारनामों का खुलासा हुआ तो नैतिक जिम्मेदारी लेना तो दूर की बात है दोनों महानुभावों ने बेशर्मी की भी सारी हदें पार कर दी..! सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद भी न तो कानून मंत्री ने इस्तीफा दिया और न ही भांजे के कारनामे पर रेल मंत्री मामा पवन बंसल को शर्म आयी..! बंसल साहब ने तो इस्तीफा देने की बजाए भांजे से रिश्ता खत्म करना ज्यादा बेहतर समझा..! गलत भी क्या किया..? आखिर कुर्सी बार बार थोड़े न मिलती है..! अश्विनी कुमार की तो सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद भी इस्तीफा न देने की वजह समझ में आती है...अरे भई अश्विनी कुमार ने खुद से तो सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट में बदलाव किए नहीं...वो तो बस ऊपरी आदेश का पालन कर रहे थे...ऐसे में इस्तीफा सिर्फ अकेले वे ही क्यों दें..? (जरूर पढ़ें- क्यों दें कानून मंत्री इस्तीफा..?)
सरकार और पार्टी ने भी आरोप लगने के बाद पहले दोनों का खूब साथ दिया लेकिन जब लगने लगा कि फजीहत कुछ ज्यादा ही हो गयी तो ले लिया दोनों से इस्तीफा..! आखिर आम चुनाव करीब हैं जनता के सामने भ्रष्टाचार और घोटालों के सवाल पर जवाब देने के लिए कुछ तो पास में होना चाहिए..! अब कम से कम ये तो कहने को रहा कि हमने भ्रष्टाचार, घोटाले और गडबड़ी करने वाले मंत्रियों की कुर्सी छीन ली..!
आपको याद हो तो उत्तर प्रदेश में मायावती ने भी तो विधानसभा चुनाव से पहले कुछ ऐसा ही किया था लेकिन उसके बाद यूपी के विधानसभा चुनाव में क्या हुआ ये सबके सामने है..!
खुद ही सवालों के घेरे में घिरे सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह साहब अश्विनि कुमार और बंसल प्रकरण पर त्वरित फैसला लेते हुए दोनों से तत्काल इस्तीफा ले लेते तो शायद उनकी सरकार की इतनी फजीहत नहीं होती लेकिन मनमोहन सिंह बेचारे भी क्या करते..? काश वे वास्तव में देश के प्रधानमंत्री होते..!

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गुरुवार, 9 मई 2013

सरबजीत को शहीद का दर्जा क्यों..?


पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में भारतीय नागरिक सरबजीत की मौत अपने आप में कई सवाल खड़े कर गयी..? सरबजीत की बहन दलबीर कौर ने अपने भाई की बेगुनाही की लंबी लड़ाई लड़ी और समय - समय पर भारत सरकार ने भी इस मुद्दे को पाकिस्तान सरकार के सामने उठाया। भारत सरकार के साथ ही सरबजीत के परिजनों को सरबजीत की रिहाई के बाद भारत लौटने की पूरी उम्मीद थी लेकिन अचानक पाकिस्तान से आई एक ख़बर ने सरबजीत की रिहाई की उम्मीदों को तोड़ कर रख दिया..! पाक कैदियों के हमले में गंभीर रुप से घायल सरबजीत ने आखिरकार 2 मई की रात डेढ़ बजे लाहौर के जिन्ना अस्पताल में जिंदगी का साथ छोड़कर मौत का दामन थाम लिया।
सरबजीत को पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में 1990 में हुए बम विस्फोट में शामिल होने के आरोप में मौत की सजा सुनाई गयी थी...जिसके बाद से ही वो पाक जेल में कैद था। पाकिस्तान का ये भी कहना था कि सरबजीत भारतीय जासूस था...ये बात अलग है कि भारत ने कभी भी सरबजीत को अपना जासूस स्वीकार नहीं किया। वहीं सरबजीत के परिवार के अनुसार उसने गलती से पाक सीमा में प्रवेश कर लिया था और पाकिस्तान सरकार ने उसे झूठे आरोप में फंसाया है...जिसके बाद से ही भारत की तरफ से सरबजीत की रिहाई की मांग उठती रही जो सरबजीत की मौत के साथ ही खामोश हो गयी..! (जरूर पढ़ें- कब तक आंख रोएगी..?)
सरबजीत की मौत पाकिस्तान जेल में बंद एक कैदी की सामान्य मौत तो बिल्कुल भी नहीं थी। भारत ने भी सरबजीत की मौत को हत्या करार देते हुए पाकिस्तान सरकार से मामले की जांच और दोषियों को सजा देने की पुरजोर मांग की। सरबजीत का शव भारत आने पर पंजाब सरकार ने सरबजीत के परिवार को आर्थिक मदद देने के साथ ही सरबजीत को शहीद का दर्जा दे दिया। सरबजीत को शहीद का दर्जा दिए जाने के पंजाब सरकार के फैसले को लेकर लोगों के अलग – अलग मत हैं। कुछ लोग पंजाब सरकार के इस फैसले को सही ठहरा रहे हैं तो कुछ लोगों का कहना है कि सरकार का ये फैसला शहादत की अवधारणा के साथ खिलवाड़ है, ऐसे में सरबजीत को शहीद का दर्जा नहीं दिया जाना चाहिए..! सरबजीत के बारे में जो जानकारी मौजूद है उसको देखते हुए कहीं न कहीं ये लगता है कि सरबजीत को शहीद का दर्जा देने का पंजाब सरकार का फैसला सियासी ज्यादा लगता है..!
न जाने ऐसे कितने ही सरबजीत हैं जो गलती से पाक सीमा में प्रवेश कर गए और बिना किसी अपराध के पाक जेलों में सजा काट रहे हैं, ऐसे में तो फिर उन सब को भी सरबजीत की श्रेणी में रखा जाए और मरणोपरांत शहीद का दर्जा दिया जाए..!
ये बात अलग है कि सरबजीत के मसले ने पूरे देश को एक मुद्दे पर लामबंद किया लेकिन इसे आधार मानकर सरबजीत को शहीद का दर्जा तो नहीं दिया जा सकता..! किसी भी मसले में सिर्फ एक ही उदाहरण होता है जो देश को जगाता है...सरकार को झकझोरता है और एक सशक्त आंदोलन का निर्माण करता है। जिस तरह रेप और महिला उत्पीड़न के मामले में दिल्ली गैंगरेप केस ने महिला सुरक्षा के मुद्दे पर देश को एकजुट करने के साथ ही सरकार को झकझोरा ठीक उसी तरह सरबजीत प्रकरण ने पाक जेलों में बंद भारतीय कैदियों के मसले को एक आवाज़ दी।   
अगर सरबजीत भारत का जासूस होता और भारत सरकार सीमा ठोक कर इसे स्वाकार करती तो सरबजीत को शहीद का दर्जा देने की बात समझ में भी आती क्योंकि उस स्थिति में हम कह सकते कि सरबजीत देश के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर पाकिस्तान पहुंचा था लेकिन सरकार ने तो कभी इसे स्वीकार ही नहीं किया..! ऐसे में सरबजीत को शहीद का दर्जा दिया जाना सरकार का एक वर्ग विशेष के वोट हासिल करने के लिए अपने सियासी दांवपेंच से ज्यादा और कुछ नहीं है, जो कहीं न कहीं सरकार के सियाही फायदे को दर्शाता है और साथ भी शहादत की अवधारणा के साथ खिलवाड़ भी है..!
सरबजीत की रिहाई को लेकर सरबजीत के परिजनों ने खुद के बूते एक लंबी लड़ाई लड़ी जिसके चलते न सिर्फ सरबजीत भारतीय मीडिया की सुर्खियां बना बल्कि सरकार ने भी सरबजीत के मसले को पाकिस्तान के सामने उठाया। मीडिया के जरिए देशवासी सरबजीत को पहचान चुके थे और जब सरबजीत पर हमले की ख़बर आयी तो इस मुद्दे ने देश को लामबंद किया जबकि पाक जेलों में बंद दूसरे कैदी गुमानी के अंधेरे में ही खोए रहे..!
कुल मिलाकर सरकार से अब इतनी उम्मीद तो की ही जा सकती है कि वह सरबजीत की मौत से सबक लेकर पाक जेलों में बिना किसी अपराध के सालों से कैद भारतीय कैदियों की रिहाई के लिए पाकिस्तान के सामने पुरजोर तरीके से आवाज उठाए ताकि पाक जेल में कोई और भारतीय कैदी सरबजीत की मौत न मरे..!  (जरूर पढ़ें- और कितने सरबजीत..?)

deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 8 मई 2013

जब हरे हो गए हरीश रावत के जख़्म..!


कर्नाटक चुनाव नतीजों पर एक राष्ट्रीय समाचार चैनल पर चर्चा जारी थ। पैनल में कांग्रेस की तरफ से केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत थे तो दूसरी ओर थे भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी। कर्नाटक में रुझान कांग्रेस के पक्ष में जाते दिखाई दे रहे थे। ऐसे में हरीश रावत का इतराना लाजिमी था। आखिर केन्द्र सरकार के एक के बाद एक कभी न खत्म होने वाले घोटालों की फेरहिस्त से कांग्रेस की हो रही फजीहत के बाद कर्नाटक चुनाव के नतीजे कांग्रेस के लिए राहत की खबर लेकर आ रहे थे।
कांग्रेस की सरकार बनने की स्थिति में कर्नाटक में मुख्यमंत्री कौन बनेगा इस पर जब एंकर ने हरीश रावत से सवाल किया तो रावत साहब के जख्म एक बार फिर से हरे हो गए..! ये वही जख्म थे जो उत्तराखंड विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी न मिलने पर हरीश रावत को मिले थे..! हालांकि हरीश रावत ने इसको अपने चेहरे पर जाहिर नहीं होने दिया और रावत साहब ने बड़ी ही  सहजता से जवाब दिया कि मुख्यमंत्री को लेकर फैसला शीर्ष नेतृत्व करेगा और जिसके नेता के नाम पर कांग्रेस आलाकमान हरी झंडी दिखा देगा वही कर्नाटक का  मुख्यमंत्री बनेगा।
हरीश रावत साहब ने इस सवाल का जवाब तो दे दिया लेकिन इस जवाब को देने में रावत साहब को दर्द भी खूब हुआ होगा क्योंकि इसी सवाल के केन्द्र में उत्तराखंड विधानसभा चुनाव के परिणाम के बाद वे खुद थे। जब उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सरकार बनने पर मुख्यमंत्री की कुर्सी के हरीश रावत प्रबल दावेदार थे लेकिन कुर्सी मिल गयी थी दूर दूर तक दौड़ में शामिल न रहने वाले तत्कालीन टिहरी सांसद विजय बहुगुणा को..!
आज हरीश रावत कर्नाटक के संबंध में सीना ठोक कर कह रहे हैं कि आलाकमान का फैसला आखिरी होगा और उसे सबको मंजूर करना होगा लेकिन उत्तराखंड में जब हरीश रावत को दरकिनार कर विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाने का ऐलान कांग्रेस आलाकमान ने किया तो हरीश रावत के साथ ही उनके समर्थक विधायकों के बगावती तेवर तो आपको याद ही होंगे..!
अगर नहीं तो चलिए एक बार फिर से आपकी याददाश्त ताजा कर देते हैं। जैसे ही विजय बहुगुणा के नाम का ऐलान उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रुप में हुआ तो हरीश रावत के पैरों के नीचे से मानो जमनी खिसक गयी थी। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से लेकर दिल्ली में हरीश रावत के निवास पर हरीश गुट के विधायकों ने जमकर बवाल मचाया था। कई दिनों तक बवाल मचा लेकिन आखिर में हरीश रावत को मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं मिली।
ऐसा भी नहीं है कि इसके बदले में हरीश रावत को कुछ नहीं मिला। हरीश समर्थित महेन्द्र सिंह माहरा को राज्यसभा भेजा गया तो खुद हरीश रावत को केन्द्र में राज्यमंत्री से कैबिनेट मंत्री बनाकर कांग्रेस आलाकमान ने रावत की नाराजगी को दूर करने की कोशिश की..!
समाचार चैनल पर चर्चा जारी थी...अब इसी सवाल पर जब एंकर ने भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी से उनका पक्ष लेना चाहा तो पहले तो मुख्तार अब्बास नकवी ने इसे कांग्रेस का मसला बताकर टिप्पणी करने से इंकार कर दिया लेकिन जाते जाते नकवी हरीश रावत के जख्मों पर नमक छिड़कना नहीं भूले..!
नकवी साहब बोले कि ये कांग्रेस का मसला है और वैसे भी जब उत्तराखंड विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद सबसे योग्य व्यक्ति होने के बाद भी कांग्रेस आलाकमान ने जब हरीश रावत को मुख्यमंत्री नहीं बनाया तो अब वे कर्नाटक के संबंध में क्या कह सकते हैं..!
भाजपा नेता मुख्तार अब्बस नकवी के इस टिप्पणी पर हरीश रावत का चेहरा देखने लायक था जबकि मुख्तार अब्बास नकवी के साथ ही टीवी एंकर मंद मंद मुस्कुरा रहे थे..!

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मंगलवार, 7 मई 2013

क्यों बेबस है भारत..?


21 दिनों तक भारत के सीने पर मूंग दलने के बाद भले ही चीनी सेना वापस लौट गयी हो लेकिन ये 21 दिन ऐसा लगा भारत के लिए किसी गुलामी से कम नहीं थे..! गुलामी शब्द का इस्तेमाल शायद बहुत से लोगों को रास नहीं आ रहा होगा लेकिन भारतीय सीमा में घुसपैठ कर 21 दिनों तक भारत को हेकड़ी दिखाने वाले चीन ने जिस तरह से उस इलाके में बैनर लगाकर उसे अपना क्षेत्र घोषित कर दिया और जिस तरह भारत सरकार मूकदर्शक बनी रही उससे क्या ये जाहिर नहीं होता..? 
ये भारत की बेबसी नहीं तो और क्या थी..? हमारी सरकार चीन को तो अपनी सीमा से बाहर खदेड़ नहीं सकी..! चीन जब खुद वापस गया भी अपनी शर्तों पर और जाते जाते भारत को उसी के क्षेत्र में पीछे हटने पर मजबूर कर गया..!
भारत पर शुरु से ही नज़रें गढ़ाए बैठे चीन ने 21 दिनों तक लद्दाक के दौलत बेग ओल्डी में पूरी तरह राज किया..! भारत का दुर्भाग्य ये रहा कि भारत सरकार ने अपनी क्षेत्र में घुसी पड़ोसी देश की सेना को बाहर खदेड़ने के लिए कोई कड़े कदम नहीं उठाए और भारत सरकार चीन से पीछे हटने के लिए सिर्फ विनती ही करती रही..! (जरूर पढ़ें- और कितने थप्पड़ खाओगे..?)
खबरें तो यहां तक है कि चीनी सेना के कहने पर भारत सामरिक दृष्टि से अहम माने जाने वाली चुमार पोस्ट से पीछे हटने पर राजी हो गया है..!   
आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि भारत को अपने ही इलाके से अपने सैनिक पीछे हटाने पड़े..?  भारत चुमार पोस्ट से पीछे हटने पर सहमत हो गया..?
आखिर अपने ही घर में हम क्यों दब्बू बने बैठे रहे और चीन हमारे घर में घुसकर हम पर हेकड़ी जमाता रहा..?
शायद यही फर्क है चीन में और भारत में कि चीन को एलएसी के पास भारत की किसी गतिविधि पर अगर आपत्ति थी तो उसने बातचीत का रास्ता नहीं अपनाया और सीधे भारत में घुसपैठ कर अपने आक्रमक इरादे जाहिर कर दिए और अपनी बात मनवा के ही भारतीय इलाका छोड़ा जबकि हम हमारे घर में घुसे पड़ोसी को भगाने के लिए आक्रमक रुख अपनाने की बजाए बातचीत से हल निकालने की बात ही करते रह गए..!
भारत सरकार को क्या लगता है कि 21 दिनों तक चीनी सेना सिर्फ अपने तंबूओं में आराम करती रही होगी..? क्या चीन ने 20 किलोमीटर भारतीय सीमा के अंदर के एक एक स्थान का जायजा नहीं लिया होगा..? जिसका फायदा वो भविष्य में कभी भी भारत के खिलाफ उठा सकता है..! चीन भले ही वापस लौट गया लेकिन वो अपने मकसद में तो कामयाब ही रहा..!
भारत सरकार भले ही चीनी सेना के पीछे हटने को इसे अपनी कूटनीतिक जीत बताते हुए इतरा रही हो लेकिन सरकार में शामिल लोग इस बात को नहीं नकार सकते कि 21 दिनों तक वे चीन के आगे बेबस रहे..!
सवाल ये उठता है कि आखिर क्यों भारत बेबस बना रहा और चीन को अपनी सीमा से बाहर करने में विफल रहा..? क्या भारत चीन के 40 सैनिकों से घबरा गया था..?  (जरूर पढ़ें- सिर्फ 40 चीनी सैनिक ही तो हैं..!)
इसका जवाब सरकार की तरफ से गोल मोल ही मिल रहा है लेकिन चीन के आगे भारत की इस बेबसी ने विश्व बिरादरी में न सिर्फ भारत की कमजोर छवि को पेश किया है बल्कि ये भी दर्शा दिया कि भारत अपनी सीमाओं तक की रक्षा करने में सक्षम नहीं है..!
वजह चाहे जो भी हो लेकिन चीनी घुसपैठ पर भारत सरकार के लापरवाह और लचर रवैये ने चीन का हौसला ही बढ़ाया है..! आज चीन ने भारतीय सीमा में घुसपैठ कर अपनी बात मनवा ली तो क्या गारंटी है कि कल फिर वो ऐसी हरकत नही करेगा..? जाहिर है चीन की फितरत नहीं बदलेगी और वह फिर से ऐसी हरकत करेगा...ऐसे में भारत ने वक्त रहते अपनी पिछली गलतियों से सबक नहीं लिया तो आने वाला वक्त में चीन भारत के लिए बड़ा खतरा बन सकता है..! (जरूर पढ़ें- वर्ना बदल जाएगा भारत का नक्शा..!)

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सोमवार, 6 मई 2013

यूपीए के पास है भ्रष्टाचार का लाइसेंस..!


मामा रेल के सर्वेसर्वा थे तो मामा कैसे अपने प्यारे भांजे को रेल की चाबी देने से इंकार कर सकते थे..! ऐसे भांजे की काबलियत पर मामा भी कैसे शक कर सकते थे जिसने कुछ ही सालों में करोड़ों का साम्राज्य खड़ा कर खुद को साबित भी किया था..! सब कुछ ठीक ठाक चल भी रहा था लेकिन भ्रष्टाचार की रेल चला रहे ड्राईवर भांजे की रफ्तार कुछ ज्यादा ही तेज थी लिहाजा भ्रष्टाचार की रेल हो गयी डी रेल और भांजे के साथ ही रेल चलाने का ग्रीन सिग्नल देने वाले मामा की मुश्किलें भी बढ़ गयीं। (जरूर पढ़ें- भांजा चला रहा मामा की रेल..!)
भांजे के साथ खुद को सीबीआई के लपेटे में आने से बचाने के लिए मामा ने रेल डीरेल होने की जिम्मेदारी से ये कहते हुए पल्ला झाड़ लिया कि उन्होंने किसी को भ्रष्टाचार की रेल चलाने का ग्रीन सिग्नल कभी नहीं दिया..! लेकिन रेलमंत्री बंसल मामा की बात पर कौन यकीन करता लिहाजा विपक्ष ने कुर्सी छोड़ने की मांग को लेकर घेराबंदी शुरु कर दी। घूसकांड में मामा पर इस्तीफे का दवाब था ऐसे में इस्तीफे की आफत के बीच मामा के लिए राहत भरी खबर ये आयी कि उनकी पार्टी खुलकर उनके बचाव में आ गयी।
मामला संगीन था और भांजे को सीबीआई ने रंगे हाथों पकड़ा था ऐसे में नैतिक रुप से मामा का इस्तीफा तो बनता था लेकिन पार्टी के पीछे खड़े होने से मामा की कुर्सी बच गयी..!
अब सवाल ये खड़ा होता है कि संगीन आरोपों के बाद भी कांग्रेस रेलमंत्री के पक्ष में क्यों खड़ी हो गयी..? जाहिर है अगर रेलमंत्री से इस्तीफा लिया जाता तो ये सरकार की ही हार होती और विपक्ष इसको खूब जोर शोर से भुनाता..! अब कांग्रेस क्यों चाहेगी कि उनका एक मंत्री शहीद भी हो और विपक्ष को इसका फायदा मिले...ऐसे में पहले से ही भ्रष्टाचार की कश्ती पर सवार कांग्रेस ने एक और मंत्री को कश्ती से धकेलने की बजाए साथ में बैठाना बेहतर समझा..!
मनमोहन सरकार इससे पहले भी भ्रष्टाचार में डूबे अपने मंत्रियों का पूरा साथ देते आयी है..! सलमान खुर्शीद पर लगे आरोप तो आपको याद ही होंगे लेकिन खुर्शीद साहब का इस्तीफा तो दूर उन्हें प्रमोट कर विदेश मंत्री बना दिया गया..! कानून मंत्री अश्विनी कुमार के मामले में भी मनमोहन सरकार अश्विनी कुमार के साथ खड़ी है और अब ऐसा ही कुछ बंसल के मामले में भी हो रहा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस्तीफे की मांग को तो कांग्रेस पहले ही नकार चुकी है..! (जरूर पढ़ें- क्यों दें कानून मंत्री इस्तीफा..?)
ये छोड़िए भ्रष्टाचार के आरोप पर विपक्ष की घेराबंदी कांग्रेस को इतनी परेशान करने लगी है कि कुछ न सूझने पर अब कांग्रेस कह रही है कि भाजपा यूपीए सरकार पर ऊंगली उठाने से पहले एनडीए सरकार में हुए घोटालों को याद करें..! कांग्रेस की इस कथनी का तो ये मतलब निकलता है कि एनडीए सरकार के कार्यकाल में हुए घोटाले यूपीए सरकार के लिए भ्रष्टाचार और घोटाले करने का लाइसेंस है..!
ये तो वही बात हुई कि जब आपने भ्रष्टाचार और घोटालों की गंगा बहाई है तो हम उसमें डुबकी लगा रहे हैं तो क्या गलत है..? वाह..! क्या तरीका है कांग्रेस का यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार और घोटालों को जस्टिफई करने का..?
भ्रष्टाचार तो भ्रष्टाचार है चाहे वह किसी भी सरकार के कार्यकाल में किसी ने भी क्यों न किया हो..? दूसरे के गुनाहों की दुहाई देकर खुद को सही साबित करना कहां तक सही है..? भ्रष्टाचारी किसी भी सरकार में शामिल रहा हो या किसी भी दल से हो उसे बख्शा तो नहीं जा सकता न..! एनडीए ने जनता को छला तो जनता ने उसे सबक सिखाया और अब यूपीए सरकार में शामिल लोग जनता की गाढ़ी कमाई से अपनी जेबें भर रहे हैं तो जनता क्या उन्हें छोड़ेगी..? ये हमेशा याद रखिए कि आप कुछ दिनों तक तो जनता को बेवकूफ बना सकते हैं लेकिन लंबे वक्त तक नहीं..! फिर चाहे वो एनडीए हो या फिर यूपीए हो या फिर कोई और..!

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