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बुधवार, 17 अप्रैल 2013

असरदार ब्लॉग@Makemytrip.com

ख़बर का असर तो आपने सुना और देखा होगा लेकिन क्या बलॉग का असर सुना है। मेरे साथ तो कुछ ऐसा ही हुआ। Makemytrip.com का अपना एक कटु बस यात्रा का अनुभव कल आप सभी लोगों के साथ साझा किया था। (जरूर पढ़ें- अनुभव@Makemytrip.com)। रवि मिश्रा जी ने नवभारत टाइम्स के मेरे ब्लॉग को अपने ट्विटर अकाउंट पर Share किया था जिस पर Makemytrip.com की Customer Care Team की भी नजरें पड़ गयी और मेरा ये अनुभव Makemytrip.com के लोगों तक  तक भी पहुंच गया। आज शाम 3 बजकर 54 मिनट पर Makemytrip.com से किन्हीं सलमान अहमद का फोन आया था और उन्होंने मुझसे पूरी घटना की जानकारी ली और अपने स्तर पर भी इसकी जांच कराने की बात कही।

4 बजकर 20 मिनट पर फिर से सलमान अहमद साहब का फोन आता है और मुझे हुई असुविधा के लिए Makemytrip.com की तरफ से माफी मांगते हुए यात्रा का पूरा पैसा रिफंड करने की बात कहते हैं। साथ ही संबंधित बस ऑपरेटर International Tourist Centre को तत्काल Blacklist किए जाने की भी मुझे जानकारी दी। ऐसा नहीं है कि यात्रा का अनुभव या इसकी शिकायत मैंने Makemytrip.com से नहीं की थी लेकिन ईमेल और फोन से फीडबैक देने के बाद Makemytrip.com से कोई जवाब नहीं मिला।
खैर ब्लॉग के माध्यम से देर से ही सही Makemytrip.com की सकारात्मक प्रतिक्रिया आयी तो अच्छा लगा। लेकिन Makemytrip.com किसी शिकायत के आने से पहले ही यात्री सुविधाओं से कोई समझौता न करते हुए पहले ही बेहतर सर्विस देने वाले बस ऑपरेटर्स से समझौता करता तो ज्यादा अच्छा लगता।
फिलहाल तो Makemytrip.com का सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया। उम्मीद करता हूं कि भविष्य में किसी का मेरी तरह इस कटु अनुभव से सामना न हो। 

deepaktiwari555@gmail.com


काश मैं भी संजय दत्त होता..!



फिल्म अभिनेता संजय दत्त के लिए राहत भरी खबर है...अरे भई सुप्रीम कोर्ट से सरेंडर करने के लिए चार सप्ताह की मोहलत जो मिल गई है। पांच साल की सजा के बचे हुए साढ़े तीन साल के लिए जेल में सजा काटनी थी...ऐसे में चार सप्ताह की मोहलत के बहाने साढ़े तीन साल की एडवांस कमाई करने का मौका जो मिल गया..! संजय दत्त ने भी तो यही दलील दी थी कि बॉलिवुड का 278 करोड़ रूपया उनकी फिल्मों में लगा है लिहाजा फिल्मों को पूरा करने के लिए उन्हें 6 माह की मोहलत दी जाए। हालांकि कोर्ट ने संजय दत्त को 6 माह की तो नहीं लेकिन एक माह की मोहलत तो दे ही दी है। (जरूर पढ़ें- तो 35 साल हो बालिग होने की उम्र..!)
एक दिन पहले ही कोर्ट ने जैबुनिस्सा अनवर काजी की अर्जी खारिज कर दी लेकिन संजय दत्त को 4 सप्ताह की मोहलत दे दी। हालांकि संजय को मोहलत मिलने की उम्मीद कम ही जतायी जा रही थी लेकिन कोर्ट का फैसला सबके सामने है। वैसे ये सिर्फ हिंदुस्तान में ही हो सकता है कि एक व्यक्ति को उसकी व्यवसायिक जिम्मेदारियां पूरी करने के लिए सरेंडर करने के लिए 4 सप्ताह की मोहलत दे दी जाती है जबकि अलग-अलग मामलों में सजा पाए लोगों को एक घंटे की भी मोहलत नहीं दी जाती..!
हिंदुस्तान में विभिन्न अपराधों में जेल में बंद अपराधियों की भी व्यवसायिक जिम्मेदारियां होती होंगी..? व्यवसायिक न सही पारिवारिक जिम्मेदारियां तो होंगी ही..? कईयों की हालत तो ऐसी होती है कि उनके घर में परिवार के मुखिया के या किसी कमाऊ सदस्य के जेल जाने पर परिवार के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो जाता है..! बच्चों की स्कूल की फीस जमा करने की कोई व्यवस्था नहीं होती है..! जवान हो रही लड़की की शादी के इंतजाम के लिए पैसा उनके पास नहीं होता है लेकिन किसी को अपनी इन जिम्मेदारियों को पूरा करने की मोहलत नहीं मिलती है..!
संजय दत्त व्यवसायिक जिम्मेदारियों का हवाला देते हैं। बॉलिवुड की 278 करोड़ की फिल्मों का काम अधूरा रहने की दलील देते हैं और उन्हें पैसा कमाने के लिए 4 सप्ताह की मोहलत मिल जाती है। एक तरह से देखें तो साढ़े तीन साल जेल में रहते हुए भी संजय दत्त की फिल्में रीलीज हो रही होंगी..! वे अपनी फिल्मों से जेल में रहते हुए भी पैसा कमा रहे होंगे और जेल से निकलने के बाद उनके पास कम से कम पैसे की तो कोई कमी नहीं होगी..! लेकिन लाखों लोग जो जेल में बंद रहते हैं तो उनके परिवार की क्या हालत होती होगी इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है..! वे भी आज यही सोच रहे होंगे कि काश हम भी संजय दत्त की तरह फिल्म अभिनेता होते..बड़े आदमी होते तो हमें भी अपनी व्यवसायिक या पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करने की मोहलत मिल जाती..! वे सोच रहे होंगे कि हमारे लिए भी कोई जस्टिस काटजू राष्ट्रपति के पास हमारी सजा माफ करने की अपील करते..! लेकिन अफसोस ये लाखों लोग न तो संजय दत्त हैं और न ही जस्टिस काटजू जैसे कोई सज्जन उनकी सजा माफी के लिए राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखने वाले हैं..! (जरूर पढ़ें- संजय दत्त निर्दोष हैं..!)
मैं न तो संजय दत्त को सरेंडर करने की मोहलत दिए जाने के समर्थन में हूं और न ही जेल में बंद लाखों अपराधियों के लिए मेरे मन में कोई नरम भाव है लेकिन एक ही देश में कानून के अलग-अलग रूप कम से कम मुझे तो समझ में नहीं आते..! कानून सबके लिए समान होना चाहिए फिर चाहे वो कोई फिल्म अभिनेता संजय दत्त हो...कोई राजनेता हो...कोई उद्योगपति हो या फिर कोई दूसरा अपराधी..!

deepaktiwari555@gmail.com

मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

बेनी न हुए पाकिस्तान हो गए..!


भारत और पाकिस्तान का एक रूप आजकल भारतीय राजनीति में देखने को मिल रहा है। हालांकि इस तरह के रूप भारतीय राजनीति में कोई नयी बात नहीं है लेकिन केन्द्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा और सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के बीच वाकुयुद्ध को देखकर बेनी को अगर पाकिस्तान और मुलायम को अगर भारत की संज्ञा दे दी जाए तो गलत नहीं होगा..! हालांकि बेनी पाकिस्तान की संज्ञा पाने के मजबूत दावेदार इसलिए भी हैं क्योंकि बेनी की फितरत कुछ-कुछ पाकिस्तान की तरह है और वे जब चाहे मुलायम या अपने दूसरे विरोधियों पर जुबानी बम फोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ते..! लेकिन मुलायम भारत की संज्ञा से कहीं आगे जाते दिखाई देते हैं..! ऐसा इसलिए कि सीमा पर पाकिस्तान के आए दिन सीज फायर के उल्लंघन पर भारत की हमेशा से सुस्त प्रतिक्रिया रही है जबकि बेनी के जुबानी बम पर मुलायम और उनकी पूरी ब्रिगेड जवाबी हमला करने में कोई कसर नहीं छोड़ती..! 
कुछ दिनों से बेनी बाबू और मुलायम सिंह के बीच सीज फायर सी स्थिति थी लेकिन बेनी बाबू ने एक बार फिर से मुलायम पर जुबानी बम फोड़ दिए और मुलायम को मुसलमानों का सबसे बड़ा दुश्मन बता डाला। इतना ही नहीं बेनी बाबू ने बाबरी विध्वंस मामले में नया बखेड़ा करते हुए मुलायम पर आडवाणी संग सोची समझी साजिश के तहत विवादित ढ़ांचे को गिराने का आरोप मढ़ डाला..! हालांकि मुलायम पर बेनी की भीषण बम वर्षा के बाद कांग्रेस आलाकमान ने बेनी को सीज फायर की हिदायत दी थी लेकिन बेनी बाबू मौन ज्यादा जिन तक धारण नहीं कर सके..! वैसे भी बेनी बाबू हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरह तो ठहरे नहीं कि मौन धारण कर लें..!
वैसे भी बेनी बाबू की जुबान से फूलों की वर्षा होती है तो सिर्फ कांग्रेस युवराज राहुल गांधी के लिए और जुबानी बाण निकलते हैं तो सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह को निशाना बनाकर..! राहुल गांधी के लिए चाटुकारिता भरी फूलों की वर्षा का भी कोई मौका बेनी बाबू नहीं छोड़ते और राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की तो बेनी ठान कर बैठे हैं। अब चाटुकारिता भरी फूलों की वर्षा होगी तो साथ में जुबानी बाण भी तो निकलेंगे ही...सो फिर से लगा दिया बेनी बाबू ने मुलायम सिंह पर निशाना..!
लोग भले ही इसे बेनी का बड़बोड़ापन या बेनी बाबू पर उनकी उम्र का असर कहें लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और ही है..! जाहिर है बेनी कांग्रेस आलाकमान की हिदायत के बाद भी इस तरह के जुबानी तीर छोड़ रहे हैं तो इसके पीछे कुछ तो पक रहा है..? 2012 के यूपी के विधानसभा चुनाव में सपा ने यूपी में परचम फहराते हुए पूर्ण बहुमत हासिल किया था...ऐसे में कांग्रेस ये बात अच्छी तरह जानती है कि सपा के पक्ष में बनी हवा यूपी में 2014 में कांग्रेस की सीटें बढ़ाने की राह में रोड़ा बन सकती है और सपा एक बार फिर से इस हवा के झोंके में 2014 में अपनी सीटों की संख्या को बढ़ा सकती है..!
लिहाजा कांग्रेस आलाकमान के आशीर्वाद से बेनी मुलायम के खिलाफ बयानबाजी कर मुसलमानों की नजरों में मुलायम और उनकी पार्टी को विलेन बनाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपी में मुसलमानों को कांग्रेस की तरफ मोड़ सके और केन्द्र की सत्ता का रास्ता कहे जाने वाले यूपी में अपनी सीटों की संख्या बढ़ा सके..!
सीबीआई के डर से केन्द्र सरकार को समर्थन दे रहे मुलायम आंखे दिखाते हैं तो कांग्रेस आलाकमान बेनी को हिदायत देकर बयानबाजी न करने को कहता है और पीठ पीछे बेनी की पीठ ठोकता है..! वर्ना किसी नेता में इतनी हिम्मत कि कांग्रेस आलाकमान के आदेश का उल्लंघन करे लेकिन बेनी ऐसा बार-बार करते हैं..!
बहरहाल सियासी खेल में बेनी ने जुबानी बम फोड़े हैं तो इसकी गूंज मुलायम एंड कंपनी के कानों को तो भाएगी नहीं...ऐसे में देखना ये होगा कि मुलायम अब बेनी के इस हमले का जवाब किस तरह देते हैं..?

deepaktiwari555@gmail.com

अनुभव@Makemytrip.com


Make My Trip ये नाम तो सुना ही होगा आपने...टीवी पर विज्ञापन भी आपने देखे ही होंगे। कंपनी दावा करती है कि Make My Trip के अनुभव इतना शानदार रहता है कि आप चाहकर भी इसे भूल नहीं पाएंगे। अब कंपनी इतने विश्वास से दावा करती है तो मैंने भी सोचा की Make My Trip की सेवाएं ले ली जाएं। 11 अप्रैल की बात है दिल्ली से हल्दवानी (नैनीताल) जाना था। ट्रेन में वेटिंग कन्फर्म नहीं हुई तो मैंने Make My Trip कंपनी की वेबसाइट में हल्दवानी के लिए ऑनलाइन बसों का खोज की तो कई सारे बस ऑपरेटर की बसें दिखाई दी।
आन्नद विहार आईएसबीटी के पास स्थित बस ऑपरेटर International Tourist Centre की रात साढ़े दस बजे की (2x2 Push Back Seat) बस का ऑनलाइन टिकट मैंने Make My Trip की वेबसाइट से बुक कराया। टिकट बहुत ही आसानी से बुक हो गया। मैं निश्चिंत था कि चलो हल्दवानी पहुंचने का इंतजाम तो हो गया। सवा दस बजे मैं International Tourist Centre के दफ्तर पहुंच गया। बस ऑपरेटर के दफ्तर में बैठे युवक से मैंने बस के बारे में पूछताछ की तो उसने मुझे 5 मिनट में बस के आने की बात कह कर दफ्तर में ही बैठने के लिए कहा। करीब 11 बजे एक बस वहां पहुंची तो युवक ने मुझे बस में बैठने के लिए कहा।
बस की हालत देखकर समझ में आ गया था कि सफर कैसा गुजरने वाला है। खैर में बस में चढ़ा तो बस खचाखच भरी हुई थी। अंदर एक युवक जो शायद परिचालक था उससे सीट को लेकर पहले ही कई यात्री उलझ रहे थे। 21 नंबर की मेरी सीट पर पहले से ही कोई और यात्री बैठा हुआ था। मैंने बस में मौजूद उस युवक को अपनी टिकट देते हुए अपनी सीट खाली कराने की बात कही तो वो साहब मुझे बस की सबसे आखिरी सीट पर बैठने का इशारा करने लगे। मैंने आखिरी सीट पर बैठने से इंकार करते हुए अपनी सीट पर बैठने की बात की तो मुझ पर ही चिल्लाने लगा कि आखिरी सीट पर बैठना है तो बैठ जाओ। युवक के अऩुसार ये बस International Tourist Centre की नहीं थी ऐसे में उसने मुझे बुक सीट देने से साफ इंकार कर दिया। काफी तकरार के बाद भी जब वो मुझे सीट देने को तैयार नहीं हुआ तो मैं बस से बाहर आ गया। International Tourist Centre के दफ्तर में मौजूद युवक से मैंने बात की तो मुझे बातों में उलझाने लगा और इधर उधर की बात कहकर घुमाने लगा। खैर मुझे लेकर वो बस में पहुंचा और जैसे तैसे उसने मुझे 6 नंबर की सीट पर बैठाया। सीट की हालत बस की तरह ही खस्ता थी लेकिन यात्रा करना जरूरी था इसलिए मैं सीट पर बैठ गया। पूरी रात मैंने कैसे यात्रा की ये तो मैं ही जानता हूं। Make My Trip की वेबसाइट के अनुसार साढ़े दस बजे की जिस बस में मैंने टिकट बुक कराया था वो बस ऑपरेटर International Tourist Centre की थी लेकिन वास्तव में वो बस किसी और कंपनी की थी। इसी तरह बस की खस्ता हालत भी कंपनी की सेवाओं पर सवाल खड़े करने के लिए काफी हैं..!
यात्रा के दौरान और यात्रा के बाद मुझे Make My Trip का वो विज्ञापन जरूर याद आ रहा था जिसमें दिखाया जाता है कि Make My Trip का अनुभव कितना शानदार रहता है। मेरा अनुभव तो इतना शानदार था कि मैं लोगों से Make My Trip की चर्चा किए बिना नहीं रह पा रहा हूं। लेकिन फर्क इतना है कि अपने मित्रों से Make My Trip की सेवाएं लेने से पहले सौ बार सोचने की सलाह दे रहा हूं। अपने इस अनुभव को शब्दों में उकेर कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने की भी यही वजह है।
एक बात और Make My Trip कंपनी अपने ग्राहकों का कितना ख्याल रखती है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ऑनलाइन बस टिकट बुक करने के बाद तुरंत मुझे एक SMS और EMAIL आया जिसमें कंपनी ने मुझ से यात्रा का अनुभव पूछा था। मैंने भी बिना देरी किए अपना ये अनुभव Make My Trip के साथ साझा किया लेकिन इसके बाद Make My Trip की तरफ से न तो कोई SMS आया और न ही कोई EMAIL आया। अपने ग्राहकों को बेहतर सेवा देने का दावा करने वाली कंपनी के किसी प्रतिनिधि ने तक फोन कर फीडबैक का कोई जवाब नहीं दिया।
कुल मिलाकर मैंने जो महसूस किया कि कंपनी सिर्फ विज्ञापन के जरिए झूठे वादे कर लोगों को बेवकूफ बना रही है और पैसा बना रही है। कंपनी के वादों और दावों का फर्क तो मैंने देख लिया जिसके बाद भविष्य में Make My Trip की सेवाएं तो मैं शायद ही लूंगा।

deepaktiwari555@gmail.com

रविवार, 14 अप्रैल 2013

मोदी, नीतीश और शिवराज..!


2014 के आम चुनाव से पहले देश के तीन बड़े राज्य सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। देश के अन्य राज्यों के साथ ही इन तीनों राज्यों में विकास भी खूब हुआ है लेकिन इन तीनों राज्यों में से चर्चा सिर्फ एक ही राज्य की ज्यादा हो रही है और वो राज्य है गुजरात..! गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी गुजरात के विकास की बातों के सहारे देश की तकदीर बदलने की बात करते हैं। बकौल मोदी जितना विकास गुजरात में हुआ है...उतनी तरक्की देश के किसी राज्य ने नहीं की है। मोदी गुजरात के विकास मॉडल की तारीफ करते नहीं थकते और गुजरात के विकास मॉडल को सर्वश्रेष्ठ ठहराते हैं। मोदी की नजरें 2014 में पीएम की कुर्सी पर है और इसके लिए मोदी हवा को अपने पक्ष में करने के लिए पूरी कोशिश कर रहे हैं।
विकास के मुद्दे पर चर्चा में पीछे छूट रहा हिंदुस्तान का हृद्य प्रदेश मध्य प्रदेश चर्चा में भले ही गुजरात से पीछे हो लेकिन विकास की दौड़ में मध्य प्रदेश वास्तव में पीछे नहीं है लेकिन जितनी बातें गुजरात के विकास की होती हैं उतनी बातें मध्य प्रदेश की नहीं होती..! ये बात मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी शायद कचोटती होगी..! गुजरात और मध्य प्रदेश दोनों ही राज्यों में भाजपा की सरकार है ऐसे में शिवराज सिंह चाहकर भी गुजरात के विकास के दावों पर सवाल तो नहीं उठा सकते..! शायद इसलिए ही कई मौकों पर विकास के मुद्दे पर गुजरात का जिक्र आने पर शिवराज सिंह मध्य प्रदेश के विकास की कहानियां सुनाने लगते हैं और दोनों ही प्रदेशों की स्थितियों की चर्चा करते हुए मध्य प्रदेश की 19 प्रतिशत की रिकार्ड कृषि विकास दर और 12 प्रतिशत की विकास दर का जिक्र करना नहीं भूलते हैं। प्रधानमंत्री के पद को लेकर मोदी की उम्मीदवारी पर वे किसी के नाम नहीं लेते तो किसी के नाम पर हामी भी नहीं भरते। खुद की उम्मीदवारी पर मन में किसी हसरत के बिना काम करने की बात कहना शिवराज नहीं भूलते हैं।
भाजपा शासित राज्यों मोदी के गुजरात और शिवराज के मध्य प्रदेश के अलावा भाजपा समर्थित नीतीश कुमार का बिहार भी विकास के मुद्दे पर चर्चा में गुजरात के आगे नहीं ठहरता लेकिन इस बात को नहीं नकारा जा सकता कि नीतीश के राज में बिहार में तरक्की ने रफ्तार पकड़ी है..!
विकास के मुद्दे पर चर्चा में गुजरात से पीछे छूट जाने की तकलीफ तो नीतीश को भी होती होगी..! तभी तो नीतीश बिहार को विशेष राज्य के दर्जे की मांग पर कभी दिल्ली में शक्ति प्रदर्शन करते हुए मोदी की लोकप्रियता को टक्कर देने की कोशिश करते हैं तो कभी सांप्रदायिकता के बहाने ही सही मोदी के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए अपनी इस तकलीफ को जाहिर भी करते हैं..! नीतिश भले ही भाजपा से परहेज न करने की बात करते हुए सिर्फ मोदी से परहेज करने की बात करते हों लेकिन इसके पीछे सिर्फ धर्मनिरपेक्षता का ही मुद्दा है ये बात आसानी से हजम नहीं होती क्योंकि एक व्यक्ति विशेष को सांप्रदायिक कहते हुए आप विरोध का झंडा बुलंद करने में देर नहीं करते लेकिन उस व्यक्ति की पार्टी जिस पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगता है उसे आप स्वीकार कर लेते हो..!(जरूर पढ़ें- नरेन्द्र मोदी-नीतिश कुमार...क्यों है तकरार?)
जाहिर है विकास के नाम सिर्फ गुजरात की चर्चा होने पर शिवराज और नीतीश के पेट में भी दर्द होता होगा जो मानव स्वाभाव के अनुसार लाजिमी भी है..! मोदी और शिवराज की पार्टी एक होने के नाते शिवराज का मोदी को नीचा दिखाकर अपनी नाक ऊंचा न कर पाना भले ही उनकी राजनीतिक मजबूरी हो सकती है लेकिन नीतीश कुमार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। इससे नीतीश न सिर्फ खुद को सेक्यूलर दिखाकर खुद को अल्पसंख्यकों का सबसे बड़ा हिमायती दिखाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं बल्कि ये भी लोगों को बताने का पूरा जतन कर रहे हैं कि विकास सिर्फ गुजरात में नहीं हुआ है वरन बिहार में भी विकास की गंगा बह रही है..! टोपी पहनने और टीका लगाने के नीतीश के बोल तो कम से कम इसी ओर इशारा कर रहे हैं।
बहरहाल मोदी की निगाहें पीएम की कुर्सी पर हैं तो नीतीश की कोशिश पीएम की कुर्सी मोदी से दूर रखने की है ऐसे में देखना ये होगा कि नीतीश की कोशिश कामयाब होती है या फिर चलता है मोदी का जादू..? फिलहाल तो 2014 के करीब आने के साथ - साथ ये लड़ाई और भी रोचक होनी की पूरी उम्मीद है..!

deepaktiwari555@gmail.com

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

आईपीएल- बाप बड़ा न भैया...सबसे बड़ा रूपैया..!


एक कहावत है- बाप बड़ा न भैया...सबसे बड़ा रुपैया। सुनी तो आपने भी होगी और आज के समय में जब हर कोई पैसे के पीछे भाग रहा है तो ये कहावत कई मौकों पर चरितार्थ भी होती दिखाई देती है। आईपीएल में तो ये कहावत खूब चरितार्थ हो रही है। आईपीएल मैच के दौरान अलग – अलग फ्रेंचायजी मालिक की टीमों में खेल रहे एक ही देश के खिलाड़ी मैदान में ही एक दूसरे से भिड़ते नजर आ रहे हैं और नौबत गाली – गलौज और हाथापाई तक आ रही है। ये वही खिलाड़ी हैं जो हैं तो एक ही देश के और अंतर्राष्ट्रीय मैचों में एक दूसरे का हौसला बढ़ाते दिखाई देते हैं लेकिन आईपीएल में कहानी कुछ और ही नजर आ रही है।
11 अप्रेल को आईपीएल 6 में भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला। दुर्भाग्य से आपस में भिड़ने वाले दोनों खिलाड़ी भारत के ही थे और अपनी – अपनी टीम का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। बॉलिवुड में किंग खान के नाम से मशहूर शाहरुख खान की टीम कोलकाता नाईटराइडर्स और उद्योग जगत में किंग ऑफ गुड टाइम्स के नाम से मशहूर विजय माल्या की टीम रॉयल चैलेंजर्स बैंगलौर आमने – सामने थी। मुकाबला कांटे का था। कोलकाता ने पहले बल्लेबाजी करते हुए बंगलौर के सामने जीत के लिए 155 रनों का लक्ष्य रखा। कोलकाता की ओर से कप्तान  गंभीर ने सबसे ज्यादा 59 रन बनाए। बंगलौर के लिए 20 ओवर में 155 का लक्ष्य आसान नहीं था तो बहुत ज्यादा मुश्किल भी नहीं था वो भी तब जब विरोधी टीम में टी-20 के किंग क्रिस गेल मौजूद हों। हुआ भी कुछ ऐसा ही जब मयंक अग्रवाल के रूप में पहला विकेट गिरने के बाद बंगलौर के कप्तान विराट कोहली ने गेल के साथ मिलकर कोलकाता की धज्जियां उड़ानी शुरु कर दी। कोलकाता के कप्तान गंभीर के माथे पर बल साफ दिखाई दे रहे थे तो बंगलौर के कप्तान कोहली कुछ ज्यादा ही जोश में दिखाई दे रहे थे और हर गेंद को बाउंड्री के बाहर पहुंचाने को बेताब दिखाई दे रहे थे। ऐसी ही एक कोशिश में कोहली बालाजी की गेंद में मोर्गन को कैच थमा बैठे। परेशान गंभीर का चेहरा खिल उठा तो कोहली की खीज साफ दिखाई दी। गंभीर और कोहली के बीच इशारों इशारों में शुरु हुई तकरार गाली – गलौज तक पहुंच गयी। साथी खिलाड़ियों ने दोनों को अलग कर स्थिति को संभाला लेकिन तब तक ये शर्मनाक वाक्या घट चुका था। गेल के 50 गेदों में 9 छक्कों की मदद से बनाए धमाकेदार 85 रनों की बदौलत मैच भले ही विराट कोहली की टीम बंगलौर ने जीत लिया हो और गंभीर की टीम कोलकाता को मात मिली हो लेकिन यहां हार हुई तो खेल भावना की जिसकी दोनों ही टीमों के कप्तानों ने मैदान में धज्जियां उड़ा दी और दिखा दिया कि पैसे के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं..!
मैच के बाद भले ही दोनों ने इसे मैदान के अंदर की बात बताकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की लेकिन ये वाक्या अपने आप में कई सवाल खड़े कर गया..! आईपीएल में टी-20 का रोमांच जरूर है लेकिन विशुद्ध रूप से ये सिर्फ पैसों का खेल है। जिसकी शुरुआत खिलाड़ियों की बिक्री के साथ शुरु होती है। फ्रेंचायजी मालिक अपने पसंदीदा खिलाड़ी पर दिल खोलकर पैसा लुटाते हैं और बदले में खिलाड़ी पर दबाव होता है हर मैच में टीम को जीत दिलाने के साथ ही आईपीएल जिताने का..! जाहिर है जो फ्रेंचायजी मालिक करोड़ों खर्च कर एक-एक खिलाड़ी को खरीद रहा है वो इन खिलाड़ियों से आईपीएल को झोली में लाने की उम्मीद तो पालेगा ही..!
पैसे के इस खेल में खिलाड़ी पर अच्छे प्रदर्शन के साथ ही टीम को जिताने का किस तरह का दबाव रहता है इसका ताजा उदाहरण कोलकाता और बंगलौर के मैच में हुई दोनों टीम के कप्तानों गंभीर और कोहली की शर्मनाक भिड़ंत है। ये शर्मनाक इसलिए है क्योंकि ये दोनों ही खिलाड़ी एक ही देश के हैं और अंतर्राष्ट्रीय मैचों में विरोधियों के खिलाफ एक ही टीम में खेलते हुए एक दूसरे का हौसला बढ़ाते हैं लेकिन पैसे के खेल आईपीएल ने इन्हें एक – दूसरे का दुश्मन बना दिया..!
जाहिर है पैसा खिलाड़ियों के सिर चढ़कर बोल रहा है और इसके लिए वे कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं..! क्या फर्क पड़ता है कि ये अंतर्राष्ट्रीय मैचों में विरोधियों के खिलाफ एक ही देश के लिए एक ही टीम से खेलते हैं..! पैसे के लिए तो ये कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं..!

deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

1984 दंगे- इंसाफ अभी बाकी है..!


29 साल का वक्त छोटा नहीं होता। 29 साल में लोगों की जिंदगियां बदल जाती है। 29 साल में एक बच्चा व्यसक हो जाता है। वो स्कूल से निकलकर अपने रोजगार में जुट जाता है तो अपनी जीवन संगिनी के साथ एक नये जीवन की शुरुआत कर लेता है। उसकी जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं और वो एक जिम्मेदार व्यक्ति बन जाता है लेकिन 29 सालों में कुछ लोगों के लिए कुछ भी नहीं बदला।
उनके चेहरे पर झुर्रियां जरूर उभर आयीं लेकिन चेहरे की झुर्रियां भी उनके दर्द को छुपा नहीं पायी। 29 साल से इंसाफ की उम्मीद में जीवन का एक – एक पल अपनों को खोने के गम में काटने वाले 1984 के सिख विरोधी दंगों में मारे गए लोगों के परिजनों के चेहरों को देखकर तो ऐसा ही लगता है। दंगो में कांग्रेसी नेता जगदीश टाईटलर की भूमिका की जांच कर रही जिस सीबीआई पर लोगों को भरोसा था कि उनके न्याय की लड़ाई में सीबीआई उनका साथ देगी उसी सीबीआई ने जगदीश टाईटलर को क्लीन चिट देते हुए अदालत में मामले को बंद करने की अर्जी दे दी।
लेकिन अदालत ने न्याय की आस में जिंदा लोगों को निराश नहीं किया और सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को खारिज करते हुए दोबारा से मामले की जांच के आदेश देते हुए कांग्रेसी नेता टाईटलर के खिलाफ केस चलाने के आदेश दे दिया। लोगों के चेहरे में न्याय की उम्मीद की खुशी जरूर थी लेकिन मन में ये सवाल भी था कि 29 साल बाद फिर से टाईटलर के खिलाफ केस चलेगा तो उन्हें इंसाफ कब मिलेगा..?  कितना और वक्त इंसाफ मिलने में लगेगा..?
सवाल ये भी है कि जिस सीबीआई ने टाईटलर को क्लीन चिट देते हुए अदालत में केस बंद करने की अर्जी दे दी वही सीबीआई अब फिर से जांच करेगी तो कैसे ये जांच निष्पक्ष होगी..?
अदालत के फैसले से ये न्याय व्वस्था पर एक बार फिर से विश्वास तो मजबूत हुआ है लेकिन सवाल भी कई खड़े हुए हैं। जाहिर है सीबीआई ने अपना काम पूरी ईमानदारी से नहीं किया जिस वजह से टाईटलर बचते रहे और आखिरकार कोर्ट ने क्लोजर रिपोर्ट को खारिज कर दिया..!
1984 में सिख विरोधी दंगों के वक्त टाईटलर की उम्र 40 साल थी। 29 साल बाद जब अदालत ने सीबीआई की अर्जी खारिज करते हुए टाईटलर के खिलाफ दोबारा से केस चलाने का आदेश दिया है तो अब टाईटलर की उम्र 69 वर्ष है। टाईटलर इन 29 वर्षों में कई बार केन्द्रीय मंत्री भी रहे और टाईटलर ने बड़े ही आराम से इस वक्त को काटा लेकिन इसके उल्ट इंसाफ की आस लगाए बैठे दंगों के पीड़ितों के लिए ये 29 वर्ष किसी सजा से कम नहीं थे। अब फिर से सीबीआई मामले की जांच करेगी तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितना और वक्त सीबीआई मामले की दोबारा जांच में लेगी..? हो सकता है शायद तब तक टाईटलर की उम्र 80 से 85 वर्ष हो जाए या ऐसा भी हो सकता है कि इस लंबे वक्त में टाईटलर की स्वाभाविक मौत हो जाए..!
इंसाफ की आस लगाए बैठे पीड़ित जो इन 29 सालों में जैसे तैसे अपनी लड़ाई लड़ते रहेहो सकता है कि वे इंसाफ की आस में वे दम तोड़ दें..!  जगदीश टाईटलर के साथ ही पीड़ितों की उम्र का तकाजा तो कम से कम इसी ओर ईशारा कर रहा है कि शायद ही जीते जी टाईटलर को सजा और पीड़ितों को इंसाफ मिले..!
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये खड़ा होता है कि लंबी और जटिल कानूनी प्रक्रिया के बाद अगर टाईटलर को सजा होती भी है तो क्या वाकई में ये पीड़ितों के साथ इंसाफ होगा..?
टाईटलर के केस के बहाने एक बार फिर से क्या भारतीय अदालतों में सालों से लंबित पड़े उन आधा करोड़ मामलों पर सोचने का वक्त नहीं है कि क्यों न लंबित मामलों के निपटारे के लिए विशेष कदम उठाएं जाएं..? (पढ़ें- चौटाला केस- भ्रष्टाचारियों के लिए सबक)। हालांकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ ही चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने भी इस पर चिंता जाहिर की है लेकिन सवाल फिर उठता है कि क्या ये चिंता सालों से न्याय की आस लगाए बैठे लाखों लोगों के लिए एक उम्मीद की किरण लेकर आएगी..?

deepaktiwari555@gmail.com

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

खुश तो बहुत होंगे आडवाणी आज..!


खुश तो बहुत होंगे आडवाणी आज...आखिर भाजपा नेता विजय गोयल ने आडवाणी को खुशी की वजह जो दे दी। जो बात आडवाणी चाहकर भी अपने मुंह से नहीं कह सकते थे वो बात भाजपा के स्थापना दिवस के मौके पर विजय गोयल ने कह दी। पीएम इन वेटिंग का तमगा आडवाणी को यूं ही नहीं मिला..! इसके पीछे की कहानी से कौन नहीं वाकिफ है..? अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में उप प्रधानमंत्री बनने के बाद से लेकर बीते आम चुनाव तक प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने की आडवाणी की प्रबल इच्छा थी लेकिन जनता जनार्दन ने एनडीए को सत्ता में वापस न लाकर आडवाणी का पीएम इन वेटिंग के टिकट को कन्फर्म करने में कोई दरियादिली नहीं दिखाई। नतीजा आडवाणी पीएम इन वेटिंग ही रह गए..! (जरूर पढ़ें- पीएम इन वेटिंग...बड़ी आत्म संतुष्टि)
2014 में सत्ता में आने का ख़्वाब संज़ों रही भाजपा में पीएम की उम्मीदवारी के लिए मोदी की प्रबल दावेदारी के बीच जिस तरह से दिल्ली भाजपा प्रदेश अध्यक्ष विजय गोयल ने भाजपा के स्थापना दिवस समारोह में आडवाणी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की बात कह डाली वो 85 साल के आडवाणी के लिए खुशी की वजह नहीं तो और क्या है..? (जरूर पढ़ें- क्या सच बोल रहे हैं आडवाणी ?)
गोयल भले ही बाद में अपनी बात पर ये कहकर सफाई देते दिखाई दिए कि वे पीएम का उम्मीदवार घोषित करने वाले कौन होते हैं लेकिन गोयल का जुबानी तीर तो मंच से चल ही चुका था वो भी तब जब मंच में भाजपा के तमाम कद्दावर नेताओं के साथ ही लाल कृष्ण आडवाणी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह भी मौजूद थे। वैसे भी नेता चाहे वे किसी भी दल के क्यों न हों उनका अपने बयान से पलटना ठीक उसी तरह है जैसे खुजली होने पर खुजलाना। अब गोयल भी पलट गए तो क्या लेकिन बात निकली है तो फिर दूर तलक जाएगी ही..!
खैर गोयल के बयान के बाद चर्चा का दौर भी शुरु हो ही गया है लेकिन खुद आडवाणी भी इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि गोयल का ये बयान उन्हें पलभर की खुशी से ज्यादा और कुछ नहीं दे सकता है..! पीएम के लिए वेटिंग कन्फर्म करना तो दूर की कौड़ी है..! भाजपा में मोदी का लगातार बढ़ता कद और लोकप्रियता के साथ ही भाजपा के वर्तमान हालात को कम से कम इसी ओर इशारा कर रहे हैं..! (जरूर पढ़ें- भाजपा से क्यों हुआ मोहभंग..?)
लेकिन राजनीति में नेता की किस्मत कब उसे अर्श से फर्श पर और फर्श से अर्श पर पहुंचा दे कहा नहीं जा सकता...अब पीवी नरसिंह राव, एचडी देवगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल के साथ ही मनमोहन सिंह ने क्या कभी सोचा होगा कि वे देश के प्रधानमंत्री बनेंगे..? लेकिन इतिहास हमारे सामने है। आडवाणी तो कम से कम प्रधानमंत्री के लिए वेटिंग की कतार में तो लंबे वक्त तक रहे ही हैं और एक बार फिर गोयल ने आडवाणी के नाम को हवा दे ही दी है..! (जरूर पढ़ें- मोदी बनाम राहुल- किसका चमकेगा सितारा..?)
आडवाणी की खुशी के लिए ही सही उम्र के इस पड़ाव में किसी ने तो उनके नाम का झंडा बुलंद किया। वैसे भी खुश होने का मौका कम ही लोगों को मिलता है अब आडवाणी को प्रधानमंत्री की कुर्सी की बड़ी खुशी न मिली तो क्या हुआ इसका एहसास खुश होने के लिए काफी है...कहते भी हैं न कि बड़ी खुशी के चक्कर में नन्ही न कर बेकार”…इसलिए आडवाणी जी पीएम की दावेदारी के एहसास से ही काम चलाइए वैसे भी इस बात की क्या गारंटी है कि 2014 में जनता जनार्दन एनडीए को सरकार बनाने का मौका देगी ही..!

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शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

मोदी बनाम राहुल- किसका चमकेगा सितारा..?


2014 के आम चुनाव से देश के दो बड़े राजनीतिक दलों में चर्चा चुनाव जीतने की नहीं है बल्कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा इसको लेकर ज्यादा है। कांग्रेसी एकमत से राहुल गांधी को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाना चाहते हैं...मनमोहन सिंह तो राहुल गांधी के लिए कुर्सी छोड़ने को तैयार बैठे हैं..! लेकिन कांग्रेस के युवराज हैं कि मानने को तैयार ही नहीं हैं। अलग-अलग मंचों पर राहुल गांधी के बयानों से तो कम से कम यही लगता है। पीएम की उम्मीदवारी के चाटुकारिता भरे सवाल पर कभी वे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को फटकार लगाते हैं तो कभी पीएम के सवाल को फिजूल बताते हैं। (जरूर पढ़ें- विजय बहुगुणा कैसे बने मुख्यमंत्री ?)
उपाध्यक्ष की कुर्सी सौंपने के बाद सोनिया गांधी ने भले ही राहुल को अघोषित तौर पर पीएम प्रोजेक्ट करने के संकेत दिए हों लेकिन राहुल की तेवर देखकर तो ऐसा लगता है कि वे फिलहाल कांग्रेस के लिए बतौर पॉलीटिक्ल एक्टिविस्ट ही काम करते रहना चाहते हैं। कुल मिलाकर राहुल का बार-बार पीएम की कुर्सी के सवाल पर इससे मुहं मोड़ना अपने आप में कई सवाल खड़े करता है..? जाहिर है ये वेवजह तो नहीं हो सकता तो फिर इसके पीछे कहीं राहुल गांधी का वो डर तो नहीं जो उन्हें अंदर ही अंदर पीएम की कुर्सी के सवाल पर इससे दूरी बनाए रखने की ही सलाह देता है। (जरूर पढ़ें- राहुल गांधी का डर !)
एक तरफ कांग्रेस के युवराज राहुल जहां पीएम की कुर्सी की राह में चुनाव जीतने की स्थिति में भी पार्टी की तरफ से कोई रोड़ा न होने पर भी कुर्सी से दूरी बनाए रखना चाहते हैं वहीं दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी ही पार्टी में पीएम पद पर उनकी उम्मीदवारी के विरोध में स्वर के बाद भी गुजरात का कर्ज उतारने के बाद अब देश का कर्ज उतारने की हुंकार भरते हैं। भाजपा ने 2014 के लिए भले ही नरेन्द्र मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार घोषित न किया हो लेकिन संसदीय बोर्ड में मोदी की एंट्री सारी कहानी खुद बयां कर रही है।
तीसरी बार गुजरात के मुख्यमंत्री का ताज पहनने वाले नरेन्द्र मोदी के पास जहां खोने के लिए कुछ भी नहीं है वहीं कांग्रेस युवराज राहुल गांधी के लिए 2014 का आम चुनाव किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है..! (जरूर पढ़ें- अगला पीएम कौनराहुल, मोदी या..?)
2014 में अगर एनडीए की सरकार बनने की स्थिति आती है तो नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की भी संभावना भी प्रबल है..! जाहिर है मोदी किसी राज्य के मुख्यमंत्री से देश के प्रधानमंत्री बनते हैं तो मोदी का कद बढ़ेगा ही लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है तो मोदी के पास खोने के लिए तो कुछ है नहीं...बाकी गुजरात तो रहेगा ही मोदी के पास ..!
वहीं दूसरी तरफ यूपीए की सरकार बनने की स्थिति आती है तो राहुल के पास  पाने के लिए पीएम की कुर्सी भी नहीं है क्योंकि वो तो वैसे भी अघोषित तौर पर राहुल गांधी के पास है ही..! हां बड़ा सियासी फायदा राहुल गांधी को ये होगा कि 2014 में कांग्रेस की जीत राहुल गांधी का बायोडाटा जरूर सुधार देगी..!
लेकिन अगर कांग्रेस की हार होती है तो राहुल गांधी के करियर पर एक और सियासी शिकस्त का दाग लगेगा जो शायद राहुल गांधी कभी नहीं चाहेंगे इसलिए ही वे पीएम की उम्मीदवारी पर फिलहाल बात नहीं कर रहे हैं क्योंकि पीएम की उम्मीदवारी के साथ चुनाव लड़ने पर शिकस्त मिलने का मतलब है कि हार का दाग कुछ ज्यादा ही गहरा नजर आएगा..!
2014 के चुनावी नतीजे सिर्फ देश की ही तकदीर तय नहीं करेंगे बल्कि गुजरात के बाद देश की जनता पर जादू चलाने की कोशिश कर रहे नरेन्द्र मोदी के साथ ही देश की दशा – दिशा बदलने की बात करने वाले कांग्रेस युवराज राहुल गांधी के सियासी भविष्य का भी फैसला करेंगे..! हम तो नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी को शुभकामनाएं ही दे सकते हैं बाकी फैसला तो देश की आवाम के ही हाथ में है।

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बुधवार, 3 अप्रैल 2013

केजरीवाल- छलावा या आम आदमी का संघर्ष..?


राजनीति के दलदल में उतरकर जनता के लिए सत्ता का रास्ता तैयार करने की बात करने वाले आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल लिया है और बकौल आम आदमी पार्टी उन्हें जनता का भरपूर साथ मिल रहा है लेकिन ये साथ वास्तव में दिखाई नहीं दे रहा है। केजरीवाल को लेकर लोगों के मत भी अलग- अलग है और कुछ लोग राजनीति में उतरकर राजनीति की गंदगी को साफ करने के केजरीवाल के फैसले को सही मानते है तो कुछ लोग इसे सिर्फ स्वार्थ की राजनीति करार देते हैं ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या वाकई में केजरीवाल का राजनीति में उतरने का फैसला व्यक्तिगत स्वार्थों को साधने का एक जरिया है या फिर वाकई में केजरीवाल जिस मिशन की बात कर रहे हैं उस पर विश्वास किया जा सकता है..?
अन्ना हजारे से अलग होने के बाद राजनीतिक दल गठन के केजरीवाल के फैसले से कहीं न कहीं लोगों का विश्वास टूटा है और लोगों को भ्रष्ट तंत्र में सुधार की जो गुंजाईश दिखाई देने लगी थी कहीं न कहीं वो धुंधली हुई है और शायद यही वजह है कि जो जनसहयोग केजरीवाल के अन्ना से अलग होने से पहले इस तरह के अनशन में या आंदोलन में दिखाई देता था वो अब कहीं नजर नहीं आता है।
राजनीतिक दलों और राजनेताओं के झूठे वादे और व्यक्तिगत स्वार्थों की राजनीति से कहीं न कहीं लोग इस कदर त्रस्त हैं कि शायद वे अब राजनीति के रास्ते इस गंदगी को साफ करने के केजरीवाल के फैसले को पचा नहीं पा रहे हैं और केजरीवाल एंड कपनी को भी उसी नजर से देखने लगे हैं जिस नजर से वे मौजूदा राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को देखते हैं।
लेकिन केजरीवाल के राजनीतिक दल गठन से पहले की भूमिका और इससे पहले उनके कार्यों को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते ऐसे में ये कहना फिलहाल जल्दबाजी होगा कि अरविंद केजरीवाल भी दूसरे राजनेताओं की तरह व्यक्तिगत स्वार्थ की राजनीति कर रहे हैं और सत्ता में पहुंचकर अपने हित साधना चाहते हैं। जो लोग ऐसे कह रहे हैं अगर वाकई में उनकी बातों में दम है तो इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि केजरीवाल अगर ऐसा कुछ कर रहे हैं तो वो ज्यादा दिन तक जनता को बेवकूफ नहीं बना सकते..!  
जहां तक केजरीवाल को अन्ना से अलग होने के बाद पहले जितना जनसमर्थन न मिलने की बात है तो इसके पीछे कहीं न कहीं अन्ना के आंदोलन के बिखरने को हम एक वजह के रूप में देख सकते हैं क्योंकि उस वक्त टीम अन्ना से देश की जनता की उम्मीदें बहुत ज्यादा बढ़ गयी थी जिसका प्रमाण आंदोलन में शामिल होने वाला लोगों का भारी जनसमूह था लेकिन आंदोलन का एकाएक खत्म होना और केजरीवाल का राजनीतिक दल गठन का फैसला करना लोगों की उम्मीदों पर एक कुठाराघात की तरह था जिसका असर अब केजरीवाल के आंदोलन में साफ दिखाई देने लगा है जहां पहले जितना जनसमर्थन नहीं दिखाई देता..!  
दरअसल इसके पीछे राजनीति के प्रति लोगों की बन चुकी वो मानसिकता भी है जो लोगों को ये सोचने पर मजबूर करती है कि कोई भी आंदोलन एक राजनीतिक हथकंडा है और लोगों का एक वर्ग कहीं न कहीं ये मानने लगा है कि अरविंद केजरीवाल का आंदोलन भी सिर्फ एक राजनीतिक हंथकंडा है जिसका खामियाजा केजरीवाल के आंदोलन और संघर्ष को भुगतना पड़ रहा है और राजनीतिक दल गठन से पहले केजरीवाल की जो छवि लोगों के जेहन में थी राजनीति शब्द जुड़ने के साथ ही वो छवि भी अब राजनैतिक हो गयी लगती है..!
निश्चित तौर पर राजनीति में उतरने का अधिकार हर व्यक्ति को है और अगर अरविंद ने ऐसा किया है तो इसे हम पूरी तरह गलत नहीं ठहरा सकते हैं। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि राजनीति के दलदल में में खुद को डूबने से बचाना केजरीवाल एंड कंपनी के लिए आसान काम नहीं होगा..?
हो सकता है केजरीवाल खुद को इस दलदल में डूबने से बचा भी लें लेकिन आम आदमी पार्टी से जुड़े उनके आस पास रहने वाले लोग क्या खुद को डूबने से बचा पाएंगे..? जाहिर है अगर उनके आस पास के लोग इस दलदल में डूबते हैं तो उस वक्त सवाल केजरीवाल पर ही उठेंगे और केजरीवाल के लिए इन सवालों का सामना करना आसान नहीं होगा।
अलग – अलग लोगों की दलीलें भी अलग- अलग हैं और हम सिर्फ इन दलीलों के आधार पर ही सरकारी अधिकारी से समाजसेवी और समाजसेवी से राजनेता बने अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी से मुंह नहीं मोड़ सकते कि केजरीवाल का संघर्ष देश की जनता के साथ छलावा है क्योंकि केजरीवाल भी ये बात अच्छी तरह समझते हैं कि अगर उनकी नीयत में अगर खोट है तो वो ज्यादा दिन तक देश की जनता को नहीं छल सकते।
बहरहाल चुनाव में असल तस्वीर पर से पर्दा जनता को ही हटाना है और चुनावी नतीजे ये साफ कर देंगे कि जिस आम आदमी के सहारे अरविंद केजरीवाल भ्रष्टतंत्र को बदलने की लड़ाई लड़ रहे हैं उस आम आदमी के दिल में केजरीवाल जगह बना पाए हैं या नहीं..?

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मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

अगला पीएम कौन…राहुल, मोदी या..?


राजनीति में सत्ता की डगर आसान नहीं होती। हो भी कैसे ये रास्ता जनता के दिलों के साथ ही विरोधियों के दरवाजे से भी होकर गुजरता है। जनता का दिल को कहीं न कहीं पसीज भी जाता है लेकिन अपने विरोधी को चारों खाने चित करने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं..!
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने अपनी टीम का ऐलान क्या किया विरोधियों ने यहां भी घेराबंदी का कोई मौका नहीं छोड़ा। कांग्रेसी इसे 2014 में भाजपा की लुटिया डुबोने वाली टीम करार दे रहे हैं तो दूसरे विरोधी भी निशाना साधने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। हालांकि भाजपा नेता भले ही इस सब से इत्तेफाक न रखते हों लेकिन ये कारनामा करने में वे भी पीछे नहीं रहे जब कांग्रेस ने राहुल गांधी को उपाध्यक्ष बनाकर कांग्रेस में दूसरी नंबर की पोजिशन दी उस वक्त भाजपा भी कुछ ऐसा ही राग अलाप रही थी जो कि अब कांग्रेसी नेता अलाप रहे हैं..!
सही मायने में शायद यही राजनीति है कि राजनीतिक दल और उनके नेता खुद को मजबूत करने की बजाए अपने विरोधियों को कमजोर करने में अपना पूरी ताकत लगाते हैं..! वे खुद की उपलब्धियों की बजाए विरोधियों की कमजोरियों और नाकामियों को हथियार बनाते हैं..! और इसी के बल पर सत्ता हासिल करने का ख्वाब देखते हैं..!
राहुल गांधी की ताजपोशी के वक्त ये काम भाजपा नेताओं ने किया तो राजनाथ सिंह की नई टीम के एलान और संसदीय बोर्ड में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की एंट्री पर अब कांग्रेसी इस काम को कर रहे हैं। लेकिन सवाल ये है कि क्या संसदीय बोर्ड में नरेन्द्र मोदी की एंट्री के बाद वाकई में 2014 में मुकाबला राहुल गांधी बनाम नरेन्द्र मोदी होगा..? क्या एनडीए की सरकार बनने की स्थिति में प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए मोदी की राह भी उतनी ही आसान है जितनी कि यूपीए में राहुल गांधी की..?
राहुल गांधी भले ही पीएम की कुर्सी की दावेदारी से इंकार करते रहे हों लेकिन कांग्रेसी नेताओं का चाटुकारिता के बहाने ही सही लेकिन बार – बार ये कहना कि राहुल गांधी की कांग्रेस की सरकार बनने की स्थिति में प्रधानमंत्री बनेंगे कहीं न कहीं जाहिर करता है कि 2014 से ऐन पहले राहुल गांधी को उपाध्यक्ष बनाकर कांग्रेस में नंबर दो की कुर्सी पर काबिज करना कहीं न कहीं इसका एक संकेत है..! इसमें कोई दो राय भी नहीं कि अगर 2014 में यूपीए की सरकार बनने की स्थिति आती है तो पीएम की कुर्सी के लिए राहुल के नाम पर कांग्रेस में आपत्ति करने की हिम्मत शायद ही किसी नेता में होगी..!
वहीं भाजपा की अगर बात करें तो गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की लगातार बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए ही शायद भाजपा ने मोदी को संसदीय बोर्ड में शामिल कर कहीं न कहीं मोदी के नेतृत्व में 2014 का आम चुनाव लड़ने के संकेत दिए हैं..! लेकिन मोदी के नाम पर पार्टी के अंदर ही नेताओं का एकजुट न होना और गंठबंधन के सहयोगियों का मोदी के नाम पर आंखे तरेरना मोदी की राह में रोड़े अटकाता भी दिखाई दे रहा है..! भाजपा भले ही चुनाव मोदी के नेतृत्व में लड़ने का फैसला कर ले लेकिन भविष्य में अगर एनडीए की सरकार बनने की स्थिति बनती है तो उस वक्त पीएम की कुर्सी को लेकर घमासान मचना तय है।
कोई कुछ भी कहे लेकिन 2014 की रणभेरी में राहुल गांधी बनाम नरेन्द्र मोदी के बीच मुकाबले की पटकथा लिखी जा चुकी है और अपनी – अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए सियासी जोर आजमाईश शुरु हो चुकी है।
जीत का सेहरा किसके सिर सजेगा ये तो जनता जनार्दन को तय करना है लेकिन पीएम की कुर्सी पर बैठने का ख्वाब तो राहुल और मोदी के अलावा भी कई पाले बैठे हैं..! ऐसे में देखना ये होगा कि 2014 में फिर किसी मनमोहन सिंह की किस्मत उसे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाती है या फिर भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी की तरह कुछ लोगों के ख्वाब भी पीएम इन वेटिंग की खिड़की पर ही दम तोड़ देंगे..!

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