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गुरुवार, 28 मार्च 2013

महान हैं आसाराम जैसे संत..!


संत का नाम लेते ही मन में एक ऐसी छवि उत्पन्न होती है जो सांसारिक सुख-सुविधाओं से कोसों दूर हो। उसका आचरण ऐसा हो कि लोग उसे अपने जीवन में अपनाएं। उसका रहन सहन ऐसा हो कि लोग उसकी मिसाल दे। वो सिर्फ लोगों को उपदेश ही न दे बल्कि अपनी कही बातों को अपने जीवन में भी आत्मसात करे। वह लोगों को सतमार्ग में चलने की और बुराइयों से दूर रहने की सीख दे।
लेकिन क्या आज के समय में वाकई ऐसे लोग हैं..? क्या आज के समय में ऐसे लोग हैं जो संत कहलाने लायक हैं..? जिनका हमें आंख मूंद कर अनुसरण करना चाहिए..? अगर आप इसका जवाब हां में देने की सोच रहे हैं तो पहले आसाराम बापू के बारे में अपना सामान्य ज्ञान अपडेट कर लीजिए।
आसाराम बापू...नाम तो सुना ही होगा आपने...कभी टीवी पर प्रवचन देते भी सुना होगा। मन को मोह लेनी वाली बड़ी अच्छी और मधुर बातें करते हैं आसाराम बापू। लेकिन क्या वाकई में यही आसाराम बापू का वास्तविक चरित्र है..? क्या आसाराम बापू अपनी कही बातों को अपने जीवन में आत्मसात करते हैं..? वैसे तो दिल्ली गैंगरेप के मसले पर आसाराम बापू की बेतुकी टिप्पणी ही काफी थी उनके चरित्र को जानने के लिए लेकिन बापू के बोल  यहीं नहीं थमे। (जरूर पढ़ें- दिल्ली गैंगरेप- "राम राम" आसाराम)
होली पर आसाराम खूब पानी बहाते हैं लेकिन पानी की बर्बादी आसाराम को गलत नहीं लगती..! वे कहते हैं कि पानी किसी के बाप का नहीं है...जब पानी किसी के बाप का नहीं है तो फिर आपके बाप का भी नहीं है न महाराज..! (पढ़ें- भगवान से है यारी, बारिश करवा दूंगा: आसाराम)
आसाराम कहते हैं वे जब चाहें बारिश करवा सकते हैं...तो करवा दो न महाराज बड़ी कृपा होगी आपकी इस देश पर..! कम से कम हिंदुस्तान को आप जैसे संत होने का फायदा तो मिलेगा..! आज तक तो सिर्फ अंधविश्वास ही मिला है..!  कम से कम सूखे से परेशान  किसान आत्महत्या तो नहीं करेंगे..!
खुद को संत कहते हैं लेकिन आसाराम का अभिमान देखिए...इनका आचरण देखिए..! धर्म के नाम पर लोगों की आंखों में अंधविश्वास की पट्टी बांधकर अपना धंधा चलाना कोई इनसे सीखे..! बात सिर्फ आसाराम बापू की ही नहीं है...हिंदुस्तान में ऐसे संतों की फेरहिस्त कभी न खत्म होने जितनी लंबी है।
वैसे दोष आसाराम या इनके जैसे दूसरे संतों का भी नहीं है...जब अंधविश्वास में डूबे लोग आंख मूंदकर ऐसे संतों की जय जयकार करेंगे तो ऐसा ही होगा। क्यों न ये खुद को भगवान समझेंगे..? क्यों न ये भगवान को अपना यार कहेंगे..? क्यों न ये कहेंगे की मैं जब चाहूं...जहां चाहूं बारिश करवा सकता हूं..!
ये अच्छी तरह जानते हैं कि इनके अंध भक्त इनकी हर बात पर आंख मूंदकर यकीन कर लेंगे और ये उन्हें मूर्ख बनाते रहेंगे..! और  ये सब उस वक्त तक चलता रहेगा जब तक कि इनके अंध भक्तों के आंखों से अंधविश्वास की पट्टी नहीं खुलेगी और ये लोग ऐसे लोगों को भगवान का दर्जा देना बंद नहीं करेंगे..! लेकिन हिंदुस्तान में ऐसा कभी होगा इसकी उम्मीद कम ही है..!

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“राज” नीति- जम्मू कश्मीर से तमिलनाडु तक


कौन कहता है कि नेता जनता के लिए नहीं लड़ते..? उनकी हक की आवाज़ नहीं उठाते..? उनके लिए लड़ाई नहीं लड़ते..? उन्हें जनता की चिंता नहीं है..? नेताओं को जनता की चिंता भी है और वे उनके हक की आवाज़ भी उठाते हैं बशर्ते इसमें उनका भी तो कुछ फायदा होना चाहिए। नेताओं को वैसे भी जनता से क्या चाहिए एक अदद वोट। इस एक वोट के लिए तो हमारे नेतागण किसी भी हद तक जा सकते हैं..! वोटों को साधने का कोई मौका ये नेता नहीं छोड़ते चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े..!
हिंदुस्तान की राजनीति कुछ ऐसे ही चलती है। बरसों से यही तो होता आ रहा है। अलग – अलग राज्यों की भाषा, संस्कृति अलग- अलग है लेकिन नेताओं का चरित्र बिल्कुल एक  जैसा है..! उत्तर से लेकर दक्षिण तक की हालिया राजनीतिक हलचलें इस तस्वीर की धुंधलाहट को और साफ करती है। शुरुआत वर्तमान में सबसे चर्चित दक्षिणी राज्य तमिलनाडु से करते हैं। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता को चेन्नई में आईपीएल मैचों में श्रीलंकाई खिलाड़ियों के खेलने पर एतराज है। इतना ही नहीं वे भारत सरकार से श्रीलंका से मैत्रीपूर्ण संबंध खत्म करने तक की वकालत करती हैं। उन्हें श्रीलंका को भारत का मित्र देश कहने में तक आपत्ति है। जयललिता तो जयललिता द्रमुक प्रमुख करुणानिधि को ही देख लिजिए।
श्रीलंकाई तमिलों के लिए केन्द्र सरकार से समर्थन तक वापस लेने से पीछे नहीं हटे। आखिर क्यों..? श्रीलंका के तमिलों के हितों की रक्षा के बहाने खुद को तमिलों का सबसे बड़ा हितैषी जो साबित करना है तभी तो तमिलनाडु में तमिलों की सहानुभूति हासिल कर पाएंगे..!
जयललिता के तेवर देखकर तो ऐसा लगता है कि जैसे तमिलनाडु में रहने वाले तमिलों को कोई दुख तकलीफ है ही नहीं..! जैसे तमिलनाडु में न तो तमिलों के मानवाधिकारों का हनन होता है और न ही तमिलों के साथ किसी तरह की ज्यादती..!
मैडम जी अच्छा लगा सुनकर कि आपको श्रीलंकाई तमिलों की चिंता है लेकिन पहले अपने राज्य के हालात तो सुधार लें...उनकी सुध तो ले लें...फिर करना श्रीलंकाई तमिलों की चिंता..!
जयललिता जी राष्ट्रीय अपराध नियंत्रण ब्यूरो(एनसीआरबी) के आंकड़े कहते हैं कि 2011 में देश में अपराधों के मामले में उत्तर प्रदेश(33.4 %) के बाद दूसरा नंबर तमिलनाडु (11.5 %) का है। आपको अपने घर को आग से बचाने की चिंता नहीं है लेकिन दूसरे के घर की आग की भभक आपको परेशान कर रही है।
वोटों के लिए हमारे एक और राज्य बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी आजकल कुछ ज्यादा ही सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। उन्हें बिहार को हर हाल में विशेष राज्य का दर्जा जो दिलवाना है। कभी बिहार में तो कभी दिल्ली में बिहार के लोगों के नाम पर उनके हक की बात करते दिखाई दे रहे हैं। इस बहाने बिहार की जनता का हितैषी कहलाने का तमगा भी हासिल कर लेंगे ताकि आम चुनाव में भी बिहार की जनता इनकी पार्टी के उम्मीदवारों को जिता कर संसद पहुंचाए..!
इन सब से दो कदम आगे हैं जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अबदुल्ला। साहब जिस देश में रहते हैं...जिस देश की खाते हैं उसके खिलाफ बोलने में नहीं हिचकते..! मानवता की दुहाई देकर देश के दुश्मनों की पैरवी करने का कोई मौका नहीं चूकते..! अफजल गुरु की फांसी के बाद उमर की प्रतिक्रिया को याद ही होगी आप सभी को। उमर की प्रतिक्रिया से तो ऐसा लग रहा था मानो अफजल को फांसी देकर सरकार ने बड़ी गलती कर दी..!
इन साहब को भी सिर्फ वोट ही दिखाई देते हैं। सीमा पार से आकर भारतीय सैनिकों का सिर कलम करने वाले या देश की संसद पर हमला करने वाले इन्हें नहीं दिखाई देते..! इन्हें तो कश्मीर में जवानों का हथियार लेकर चलने में तक आपत्ति है..! इनका बस चले तो आतंकी अगर जवानों पर हमला करें तो ये जवानों को मुकाबला करने के लिए लाठी पकड़ा दें..! हाल ही में सीआरपीएफ जवानों पर आतंकियों ने जब हमला किया तो क्या ऐसा नहीं हुआ था..?
ये कहानी सिर्फ तमिलनाडु, बिहार या जम्मू-कश्मीर की ही कहानी नहीं है...सभी राज्यों में कुछ ऐसा ही हो रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि हर राज्य में ये काम करने वाले सत्ताधारी दल के नेता अलग – अलग हैं...उनकी पार्टी अलग है लेकिन सबके तीर का निशाना एक ही है...वोटबैंक..! आखिर सत्ता की चाबी हासिल करने का यही तो सबसे सटीक तरीका जो लगता है इन्हें..!
विडंबना देखिए फैसला तो जनता को ही करना होता है लेकिन हमारे देश की जनता बड़ी भोली है...हर बार नेताओं की मीठी बातों पर इनके झूठे वादों पर एतबार कर लेती है...और इन्हें सौंप देती है सत्ता की चाबी...लेकिन बड़ा सवाल तो ये है कि आखिर कब तक..? क्या जनता समझ पाएगी इन नेताओं का चरित्र..?

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बुधवार, 27 मार्च 2013

किराए के समर्थकों से चाटुकारिता का तड़का..!


बात ज्यादा दिन पुरानी नहीं है जब मैं शिरडी जाने के लिए ग्वालियर रेलवे स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार कर रहा था कि अचानक स्टेशन परिसर में भारतीय जनता पार्टी का झंडा थामे एक हुजूम दाखिल हुआ। कुछ के हाथों में फूलों के हार थे तो कुछ के हाथों बंदूकों से तने थे। ग्वालियर - चंबल अंचल में जिसके पास जितनी बंदूकें उसे उतना बड़ा और ताकतवर समझा जाता है लिहाजा बंदूक थामे लोगों की तादाद भी फूल और झंडा लिए लोगों से कम नहीं थी।  
ये नजारा देख इतना तो समझ आ गया था कि भाजपा का कोई कद्दावर नेता ट्रेन से ग्वालियर पहुंचने वाला है और उसके स्वागत में ही स्थानीय नेता कार्यकर्ताओं की भीड़ के सहारे अपना शक्ति प्रदर्शन के साथ ही चाटुकारिता का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते थे।
जिज्ञासा हुई कि आखिर कौन भाजपा नेता यहां पहुंचने वाला है जिसके स्वागत मे ये लोग पलकें पावड़ें बिछाए बैठे हैं..? भाजपा का झंडा थामे एक व्यक्ति से पूछा तो वो तपाक से बोला उमा दीदी आ रही हैं और हम उन्हीं के स्वागत के लिए यहां आए हुए हैं। दरअसल भाजपा की फायर ब्रांड नेत्री और मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती दिल्ली से ग्वालियर पहुंच रही थी। रेलवे स्टेशन भाजपा कार्यकर्ताओं और भाजपा के झंडे थामे कार्यकर्ताओं से भाजपामय दिखाई दे रहा था और सभी लोग बेसब्री से ट्रेन का इंतजार करते दिखाई दे रहे थे।
इसी बीच मेरी नज़र कार्यकर्ताओं की भीड़ में सबसे पीछे भाजपा का झंडा थामे कुछ लोगों पर पड़ी तो बड़ी हैरानी हुई। संख्या में ये लोग करीब दो दर्जन से अधिक होंगे। कपड़ों से और इनके चेहरे देख इतना तो समझ आ रहा था कि ये लोग रिक्शा या रेहड़ी चलाने वाले, मजदूरी करने वाले या फिर रेलवे स्टेशन में पल्लेदारी करने वाले लोग थे। समझते देर न लगी कि उमा भारती का स्वागत करने पहुंचे स्थानीय नेताओं ने ज्यादा से ज्यादा कार्यकर्ताओं की भीड़ जुटाने के लिए चाटुकारिता की सारी हदें पार करते हुए रिक्शा चालकों, मजदूरों और पल्लेदारों के हाथों में तक झंडा थमाने से गुरेज नहीं किया।
हालांकि राजनीति में ये कोई नई बात नहीं है क्योंकि हमारे देश में आमतौर पर चुनावी रैलियों में इस तरह के नजारे आम हैं। नेताओं की सभा में भीड़ जुटाने के लिए पैसे देकर इसी तरह लोगों को बुलाया जाता है और यहां भी कुछ ऐसा ही हुआ था..!
मध्य प्रदेश में इसी साल नवंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं ऐसे में टिकट की होड़ अभी से शुरु हो गयी है। टिकट की चाह रखने वाले नेता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को उनके आगमन पर ज्यादा से ज्यादा कार्यकर्ताओं की भीड़ जुटाकर शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं और इसी बहाने टिकट के लिए अपनी दावेदारी मजबूत करने में लगे हुए हैं।
उमा भारती की भाजपा में वापसी होने के बाद मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण में उमा भारती की महत्वपूर्ण भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता लिहाजा उमा भारती के स्वागत में भी टिकट की चाह लगाए बैठे उमा समर्थक स्थानीय नेताओं ने उमा के स्वागत के बहाने कार्यकर्ताओं की भीड़ के साथ शक्ति प्रदर्शन का कोई मौका नहीं छोड़ा।
विडंबना देखिए किराए के समर्थकों के साथ शक्ति प्रदर्शन करने वाले ऐसे नेताओं को न सिर्फ चुनाव में टिकट मिल जाता है बल्कि ये लोग विधानसभा और संसद तक भी पहुंच जाते हैं..!
ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर क्यों सब कुछ जानते हुए भी जनता ऐसे नेताओं को चुनकर विधानसभा और संसद तक भेज देती है..!  क्या ऐसे नेताओं को चुनना जनता की मजबूरी है या फिर चुनाव में विकल्पविहीन जनता को नेताओं की पूरी जमात में कोई फर्क  ही नजर नहीं आता और इसका फायदा ऐसा नेताओं को मिलता है..?
जाहिर है सिर्फ बेहतर विकल्प न होना ही इसकी वजह नहीं है बल्कि कहीं न कहीं योग्य प्रत्याशी की बजाए पार्टी को वोट देने की प्रवृत्ति भी इसके लिए जिम्मेदार है। जब तक जनता राजनीतिक दलों के मोहपाश से खुद को मुक्त करके चुनाव मैदान में खड़े योग्य प्रत्याशी का चुनाव नहीं करेगी चाहे वो किसी भी दल से क्यों न हो तब तक ऐसे चाटुकार नेता ही संसद और विधानसभा में पहुंचते रहेंगे जिन्हें न तो अपने देश और प्रदेश की फिक्र है और न ही जनता से कोई सरोकार। (जरूर पढ़ें- आम आदमी जाए भाड़ में..!)।
उम्मीद करते हैं कि जनता पर छाया राजनीतिक दलों का मोहपाश टूटेगा और जनता आगामी विधानसभा और आम चुनाव में योग्य प्रत्याशियों को चुनकर विधानसभा और संसद में भेजेगी और देश और जनता को जूते की नोंक पर रखने खुद का विकास को सर्वोपरी रखने वाले चाटुकार नेताओं को सबक सिखाएगी।

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सोमवार, 25 मार्च 2013

तो 35 साल हो बालिग होने की उम्र..!


फिल्मी पर्दे से असल जीवन में तक खलनायक साबित हुए संजय दत्त की सजा माफ करने के लिए एक मुहिम छिड़ी है। मुहिम का झंडा मायानगरी से लेकर नेतानगरी तक बुलंद है। हर किसी को संजय दत्त निर्दोष नजर आ रहे हैं। मुहिम को देखकर ऐसा लगता है कि मानो ये मुहिम किसी अपराधी की सजा माफ करने के लिए न होकर किसी देशभक्त को न्याय दिलाने के लिए चल रही हो। बड़बोलेपन के लिए मशहूर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को तो संजय दत्त निर्दोष होने के साथ ही नासमझ भी नजर आते हैं।
दिग्गी बाबू कहते हैं कि जिस वक्त संजय दत्त के घर से पुलिस ने हथियार बरमद किए थे उस वक्त संजय दत्त नासमझ थे और नासमझी में संजय दत्त ने ये गलती कर दी। दिग्विजय सिंह को संजय दत्त के इस अपराध के पीछे उनकी नादान उम्र का दोष नजर आता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि दिग्विजय जिस नादान उम्र की बात कर रहे हैं वो उस वक्त 33 साल थी और बकौल दिग्विजय सिंह इस उम्र में संजय दत्त नासमझ थे। (पढ़ें- संजय दत्त- मेकिंग ऑफ रियल खलनायक..!)
अगर दिग्विजय सिंह की बात मान लें कि 33 साल की उम्र में कोई व्यक्ति नासमझ या नादान होता है तो फिर तो दिग्विजय सिंह को एक कदम और आगे बढ़ाकर केन्द्र सरकार से बालिग होने की उम्र 35 साल करने की अपील करनी चाहिए क्योंकि अभी तो हमारे देश में बालिग होने की उम्र 18 साल है।
जब 33 साल के व्यक्ति को इतनी समझ नहीं है कि अंडरवर्ल्ड के संपर्क में रहना, फोन पर अपराधियों से बात करना और अपने घर में अवैध हथियार रखना गैरकानूनी है तो फिर 18 साल से 33 साल के बीच के युवा को कितनी समझ होगी..! (पढ़ें- 'मासूम' मुन्ना ब्लास्ट के बाद भी करते थे 'भाई' से बात)
फिर तो दिग्विजय सिंह को सरकार से ये भी मांग करनी चाहिए कि 33 साल से कम उम्र के उन सभी अपराधियों को माफ कर दिया जाए जिन्हें अदालत सजा सुना चुकी है लेकिन दिग्विजय सिंह ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि 33 साल तक की उम्र के सभी अपराधी कांग्रेसी रहे सुनील दत्त की औलाद जो नहीं हैं..!
कांग्रेस ने भले ही दिग्विजय सिंह के इस बयान से पल्ला झाड़ लिया हो लेकिन कांग्रेस में दिग्विजय सिंह वही बोलते हैं जो आलाकमान चाहता है..! भले ही बाद में दिग्विजय के बयान से कांग्रेस पीछा छुड़ाने का प्रयास करती दिखाई देती है लेकिन विवादित मुद्दों पर दिग्विजय का बयान तब तक मीडिया की सुर्खियां बटोर चुका होता है। मुझे तो ऐसा एक भी मौका याद नहीं आता जब दिग्विजय सिंह के बड़बोलेपन पर कांग्रेस आलाकमान ने सख्ती दिखाते हुए दिग्विजय सिंह के खिलाफ कोई कार्रवाई की हो।
जाहिर है ये दिग्विजय के बड़बोलेपन को कांग्रेस आलाकमान का मौन समर्थन नहीं तो और क्या है..? खैर सरकार के फैसलों पर विपक्ष की घेराबंदी पर तो दिग्विजय की बोली समझ में आती है लेकिन एक अपराधी के लिए माफी की अपील क्या दर्शाती है..? वो भी तब जब देश का सर्वोच्च न्यायालय अपराध साबित होने पर संजय दत्त को 5 साल कारावास की सजा सुना चुका है वो भी इस टिप्पणी के साथ कि संजय दत्त के अपराध की प्रकृति काफी गंभीर थी जो माफी लायक नहीं है। (पढ़ें- संजय दत्त निर्दोष हैं..!)
बहरहाल संजय दत्त की सजा माफी को लेकर मुहिम जारी है...कोई राष्ट्रपति को चिट्ठी लिख रहा है तो कोई राज्यपाल से मुलाकात कर रहा है लेकिन विभिन्न अपराधों में जेल में बंद लाखों अपराधी जिन्हें अदालत सजा सुना चुकी है उन तक अगर ये खबर पहुंच रही होगी तो एक सवाल उनके जेहन में भी जरूर उठ रहा होगा कि काश मैं भी एक फिल्म स्टार होता तो मेरे लिए भी कोई आवाज उठाता...मेरे अपराध को भी कोई नादानी कहता और एक दिन मेरे भी सारे गुनाह माफ होते और अपने परिवार के साथ मैं भी खुली हवा में  सांस ले पाता..!

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रविवार, 24 मार्च 2013

शादी से पहले सेक्स क्यों..?


इंडिया टुडे- नीलसन के अध्य्यन में ये बात सामने आई है कि कैजुअल सेक्स की बढ़ती पहुंच के बावजूद आज लगभग 65 प्रतिशत पुरुष अपने लिए कुंवारी(वर्जिन) पत्नी की तलाश कर रहे हैं। यानि कि वह ऐसी महिला को अपनी जीवनसंगिनी नहीं बनाना चाहते जिसने विवाह से पहले किसी के साथ सेक्स किया हो। भारतीय युवाओं की मानसिकता को केन्द्र में रखकर किया गया ये सर्वेक्षण अलग अलग लोगों की सोच और मानसिकता पर फिट नहीं बैठता लिहाजा इसको लेकर विवाद गहराना लाजमी था।
इस सर्वे के बाद कुछ लोगों का ये मत है कि वर्तमान हालात और युवाओं की बदलती सोच और मानसिकता को देखते हुए वर्जिनिटी की अवधारणा को समाप्त कर देना चाहिए और शादी से पहले युवक- युवती के बीच शारीरिक संबंध को नैसर्गिक संबंध की तरह देखना चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ परंपराओं और नैतिक समाज के पक्षधर लोगों का कहना है कि वर्जिनिटी की अवधारणा को समाप्त करने का अर्थ है युवाओं को सेक्स की खुली छूट दे देना। उन्हें किसी भी प्रकार की नैतिक जिम्मेदारियों से मुक्त कर देना। अगर हम ऐसा कुछ भी करते हैं तो यह सामाजिक और पारिवारिक ढांचे को पूरी तरह समाप्त कर देगा। (जरूर पढ़ें- कामसूत्र ने किया फेल..!)
वर्जिनिटी की आवधारणा को लेकर अपनी अपनी सोच और मानसिकता के लिहाज से लोगों के अलग – अलग मत हैं लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि जब कई पुरुष शादी से पहले सेक्स संबंधों में लिप्त रहते हैं तो उनका वर्जिन बीवी का तलाश करना कितना सही है..? जैसे कि ये सर्वे भी कह रहा है कि 65 प्रतिशत पुरुष शादी के लिए वर्जिन बीवी की तलाश कर रहे हैं। सर्वे में भले ही ये प्रतिशत 65 हो लेकिन वास्तव में सौ प्रतिशत लोग ऐसा ही चाहते हैं..! फिर चाहे वो पुरुष हो या फिर कोई महिला..!
लेकिन मेरा व्यक्तिगत ये मत है कि अगर कोई पुरुष शादी से पहले सेक्स कर रहा है तो फिर उसे शादी के लिए किसी वर्जिन महिला की तलाश करने की बात करने का कोई हक नहीं है। जाहिर है ऐसे पुरुष महिला से अपेक्षा कर रहे हैं कि वो शादी से पहले किसी के साथ सेक्स न करे लेकिन खुद पर वे इस बात को लागू नहीं कर रहे। वो खुद को इससे अलग कैसे कर सकते हैं..? इसका मतलब तो ये है कि ऐसे पुरुष महिला को सिर्फ घर में रखा एक सामान समझते हैं जिसकी न तो कई सोच है...न ही कोई इच्छाएं..! (जरूर पढ़ें- अबोध कन्याओं से यौन अपराध क्यों..?)
निश्चित तौर पर शारीरिक संबंध एक व्यक्तिगत मसला है लेकिन भारतीय समाज शादी से पूर्व खासकर महिलाओं(महिलाओं इसलिए क्योंकि पुरुष ऐसा करते आए हैं और उन पर ऊंगली उठाने की बजाए महिलाओं को ही सॉफ्ट टारगेट बनाया जाता है।) को शारिरिक संबंध स्थापित करने की अनुमति नहीं देता और ऐसे तमाम उदाहरण मिल जाएंगे जहां शादी से पूर्व शारीरिक संबंध उजागर होने पर महिलाओं को प्रताड़ित करने या समाज से बेदखल करने का कोई मौका नहीं छोड़ा गया और कई बार महिला को अपनी जान से तक हाथ धोना पड़ा है...ऐसी स्थिति में हमने महिला के परिजनों को भी उसके साथ खड़ा होने की बजाए उसके विरोध में ही देखा है..!
जहां तक वर्जिनिटी की अवधारणा को लेकर भारतीय समाज की बात है तो मौजूदा हालात भले ही बदल गए हों। महिला और पुरुष दोनों की सोच और मानसिकता में बड़ा बदलाव आया हो लेकिन इसके बाद भी मूल्यों और आदर्श के पक्के भारतीय समाज में सेक्स जैसे विषय पर जहां आज भी खुलकर बात करने में लोग संकोच करते हैं वहां इसकी अवधारणा आज भी उतना ही स्थान रखती है जितना कि आज से पहले..! (जरूर पढ़ें- सेक्स एजुकेशन- कितनी कारगर..?)
वर्जिनिटी की अवधारणा को समाप्त करने से न सिर्फ विवाह पूर्व सेक्स संबंधों को बढ़ावा मिलेगा बल्कि ये भविष्य में शादी जैसे बंधन में आपसी विश्वास को भी कम करने में अपनी भूमिका अदा करेगा जिसका सीधा असर वैवाहिक जीवन पर पड़ेगा और कहीं न कहीं आपसी विश्वास से जुड़ी रहने वाली दांपत्य जीवन की डोर भी कमजोर पड़ेगी।
ऐसे में अगर वर्जिनिटी के महत्व को समाप्त कर दिया जाता है तो भारतीय समाज के लिए इसकी स्वीकारोक्ती आसान नहीं होगी क्योंकि जिस देश में सर्वे के मुताबिक 65 प्रतिशत युवा शादी के लिए वर्जिन पत्नी की तलाश करते हैं और महिलाओं के लिए वर्जिनिटी ही उनका गहना माना जाता है वो समाज कभी वर्जिनिटी की अवधारणा को समाप्त करने को अपनी मान्यता नहीं देगा..!

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राजनीति- चोर-चोर मौसेरे भाई..!


अब तक तो सिर्फ सुना ही था कि चोर- चोर मौसेरे भाई होते हैं...लेकिन उत्तराखंड में इसकी बानगी भी खूब देखने को मिल रही है। मीडिया मे भले ही कांग्रेसी और भाजपाई एक दूसरे को आरोपों की बौछार कर खूब गरियाते देते फिरते दिखाई देते हों लेकिन पर्दे की पीछे की सच्चाई कुछ और ही है..!  भाजपा सरकार के कार्यकाल के घोटालों की जांच के लिए गठित भाटी जांच आयोग की टीडीसी घोटाले में रिपोर्ट सरकार को सौंपने के बाद भाजपा के खिलाफ बहुगुणा सरकार के नरम रवैये को देखते हुए तो कम से कम ऐसा ही लग रहा है..! (जरूर पढ़ें- विजय बहुगुणा कैसे बने मुख्यमंत्री..?)
दरअसल भाटी जांच आयोग की रिपोर्ट में दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की बजाए बहुगुणा सरकार दोषियों को बचाते हुए मामले की लीपापोती करने में लगी है..! सरकार ने जांच आयोग की रिपोर्ट में उजागर नेताओं और अफसरों को अलग – अलग वर्ग में बांट दिया है। सरकार ने जहां एक ही अपराध में शामिल नेताओं के खिलाफ आयोग की रिपोर्ट को तहरीर में बदलकर अज्ञात के नाम से थाने में मुकदमा दर्ज कराया है तो वहीं रिपोर्ट में दोषी ठहराए गए अफसरों पर कार्रवाई की बजाए उसका परीक्षण कराने का फैसला लिया है। यानि की तहरीर के आधे हिस्से का परीक्षण सरकार करेगी और बाकी की विवेचना पुलिस करेगी जबकि कानून के जानकारों की नजरों में ये गलत है।
सत्ता में आने के बाद कांग्रेस ने भाजपा शासन में घोटालों की बाढ़ आने का आरोप लगाते हुए भाजपा शासन के सभी घोटालों को बेनकाब कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का दम भरा था। घोटालों की जांच के लिए बकायदा बहुगुणा सरकार ने भाटी जांच आयोग का गठन भी किया था। इसके तहत भाटी जांच आयोग ने टीडीसी घोटाले पर हाल ही में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी जिसके बाद दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने का दम भरने वाले बहुगुणा सरकार के तेवर ही बदल गए और अब सरकार दोषियों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट कराने से भी पीछे हट रही है..! जबकि भाटी आयोग ने जब सरकार को जांच रिपोर्ट सौंपी थी तो मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने साफ कहा था कि रिपोर्ट में भाजपा के एक पूर्व मुख्यमंत्री और जिन लोगों को दोषी ठहराया गया है उनके खिलाफ नामजद रिपोर्ट दर्ज करायी जाएगी लेकिन अब अचानक बहुगुणा साहब को लगता है कि नामजद रिपोर्ट कराना जरूरी नहीं है। बहुगुणा अब कह रहे हैं कि नामजद रिपोर्ट दर्ज कराना अवश्यक नहीं था। (जरूर पढ़ें- शराब के लिए पैसे हैं...रसोई गैस के लिए नहीं..!)
आखिर बीते कुछ दिनों में ऐसा क्या हुआ कि भाजपाईयों के खिलाफ आक्रमक तेवर दिखाने वाले कांग्रेसी मुख्यमंत्री के तवर एकदम से नरम पड़ गए..? (जरूर पढ़ें- विजय बहुगुणा- कैसा गैरसैंणकैसा स्वाभिमान..? )
क्या भाजपा और कांग्रेस में पर्दे की पीछे कोई बड़ी डील हुई या फिर बहुगुणा साहब ये समझ गए कि सत्ता से बेदखल होने के बाद भविष्य में कभी उनकी बारी भी आ सकती है लिहाजा ज्यादा तेवर दिखाए तो कल कहीं उनके ये तेवर उन पर ही भारी न पड़ जाएं..!
जाहिर है अगर ऐसा कुछ नहीं हुआ तो फिर दर्ज रिपोर्ट नामजद होनी चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जनता के सामने तो विपक्षी दलों को चोर और भ्रष्टाचारी बताने वाले राजनीतिक दल खुद को जनता का हितैषी साबित करने की पूरी कोशिश करते हैं लेकिन जब भ्रष्टाचार और घोटालों की जांच के लिए गठित भाटी जांच आयोग जैसे किसी आयोग की रिपोर्ट आती है तो उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है..! (जरूर पढ़ें- 50 लाख का जनता दरबार..!)
कहा भी जाता है कि राजनीति में न तो कोई स्थाई दोस्त होता है और न ही स्थाई दुश्मन। क्या पता कब..? कहां किसका वक्त बदल जाए..? किसकी जरूरत कब..? कहां आन पड़े..? इसलिए वक्त के साथ अपने तेवर बदलते चलो क्या पता कल कहीं अपने ही पाप का घड़ा फूट जाए..! तब कौन काम आएगा..? कहीं बहुगुणा साहब भी तो यही नहीं कर रहे..? लगे रहो बहुगुणा साहब...लगे रहो अभी तो सिर्फ टीडीसी घोटाले की जांच रिपोर्ट आई है अभी तो 5 और घोटालों की जांच रिपोर्ट आनी हैं तब भी तो आपको अपने भविष्य की चिंता करते हुए भ्रष्टाचारियों और घोटालेबाजों का वर्तमान सुरक्षित करना है फिर चाहे वो विपक्षी पार्टी के ही क्यों न हों...आखिर सवाल आपके भविष्य से भी तो जुड़ा हुआ है..!
  
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शनिवार, 23 मार्च 2013

पहले पूछी उम्र...फिर किया बलात्कार..!


दिल्ली गैंगरेप के बाद से ही चारों तरफ महिला सुरक्षा को लेकर मंथन हो रहा है। सरकार ने भी आखिरकार नींद से जागने के बाद एंटी रेप बिल संसद में पेश किया जिस पर मुहर संसद की मुहर भी लग चुकी है लेकिन ये सवाल पहले दिन से ही जेहन में उमड़ रहा है कि क्या सिर्फ कड़े कानून बनाने से महिलाओं के खिलाफ अपराध में कमी आएगी..? क्या अपराधियों में कानून का खौफ पैदा होगा..?
इस सब के बीच यूपी के देवरिया जिले में एक एएसपी की बलात्कार पीड़िता पर की गयी टिप्पणी ने तो इन सवालों का जवाब ढूंढ़ना और भी मुश्किल कर दिया है..! दरअसल बलात्कार की शिकायत दर्ज कराने देवरिया जिले में तैनात एएसपी केसी गोस्वामी के पास पहुंची पीड़िता से केसी गोस्वामी साहब ने उसके बच्चों की उम्र पूछते हुए कहा कि इतनी उम्र की महिला के साथ कौन बलात्कार करेगा..? (जरूर पढ़ें- अबोध कन्याओं से यौन अपराध क्यों..?)
पीड़ित की शिकायत दर्ज कर आरोपियों को सलाखों के पीछे पहुंचाने की बजाए जब पुलिस अधिकारी इस तरह का रवैया अपनाएंगे तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि बलात्कार की पीड़ित कितनी महिलाओं की शिकायत संबंधित थाने में दर्ज होती होंगी और कितने आरोपी सलाखों के पीछे पहुंचते होंगे। जब इंसाफ की गुहार लगाने पुलिस के पास पहुंची पीड़ित के प्रति पुलिस का ऐसा रवैया रहेगा तो क्या इससे दुष्कर्म करने वालों का हौसला नहीं बढ़ेगा..?
दुष्कर्म की शिकार होने के बाद अधिकतर पीड़ित या उनके परिजन सिर्फ इसलिए शिकायत दर्ज कराने पुलिस के पास नहीं जाते क्योंकि कहीं न कहीं उनकी शिकायत दर्ज करने की बजाए थाने में उनसे तरह तरह के सवाल पूछकर उन्हें और ज्यादा अपमानित किया जाता है..! हालांकि सौ प्रतिशत मामलों में ये बात लागू नहीं होती लेकिन दुर्भाग्य से देश के कई हिस्सों में ऐसी घटनाएं आम हैं..! (जरूर पढ़ें- बलात्कार- 1971 से लगातार..!)
सरकार एक तरफ महिलाओं के खिलाफ अपराध करने पर दोषियों के खिलाफ कड़े कानून बना रही है...उन्हें सख्त से सख्त सजा देने की दिशा में काम कर रही है लेकिन बड़ा सवाल ये है कि जब तक यूपी जैसे किसी राज्य के देवरिया जैसे किसी जिले में केसी गोस्वामी जैसे अधिकारी पुलिस विभाग में तैनात रहेंगे तो कैसे अपराधियों पर लगाम कसेगी..? कैसे महिलाएं बिना डर के बेझिझक होकर अपनी शिकायत दर्ज कराने थाने तक पहुंचने का साहस जुटा पाएंगी..?
हम बात करते हैं कि अबोध कन्याओं को तक अपनी हवस का शिकार बनाने वाले दरिंदों की विकृत मानसिकता की…ऐसे लोगों की सोच में मानसिकता में बदलाव लाने की लेकिन जब केसी गोस्वामी जैसी मानसिकता के लोग पुलिस विभाग में वो भी अधिकारी की कुर्सी पर बैठे होंगे तो कैसे महिलाओं के प्रति अपराधों पर...विकृत मानसिकता से ग्रसित अपराधियों पर लगाम कस पाएगी..?
यूपी पुलिस के आला अधिकारी भले ही एएसपी गोस्वामी के इस बयान पर माफी मांगते हुए एएसपी के स्पष्टीकरण मांके बाद एएसपी के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कर रहे हैं लेकिन क्या सिर्फ एक एएसपी के खिलाफ कार्रवाई से महिलाओं के खिलाफ गोस्वामी जैसे दूसरे पुलिसवालों की सोच बदल पाएगी और आगे ऐसी कोई घटना नहीं होगी..? (जरूर पढ़ें- क्या लड़की होना उसका कसूर था ?)
जाहिर है जब तक पुलिसवालों के रवैये में सुधार नहीं आता न तो महिलाओं के खिलाफ अपराध रुकेंगे और न ही अपराधियों पर लगाम कसेगी और उनके मन में पुलिस के प्रति भय पैदा होगा लेकिन पुलिस विभाग में गोस्वामी जैसे पुलिस अधिकारियों के रहते ये संभव नहीं लगता..! हम तो बस बेहतरी की उम्मीद ही कर सकते हैं लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या ये उम्मीद कभी परवान चढ़  पाएगी..?

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शुक्रवार, 22 मार्च 2013

संजय दत्त निर्दोष हैं..!


काटजू साहब ने संजय दत्त की सजा माफ करने की अपील की है...इतना ही नहीं तरीका भी सुझा दिया है। अब काटजू साहब ठहरे पूर्व न्यायाधीश तो न्याय प्रक्रिया के तौर तरीके और उससे बचने की हर काट से तो वाकिफ ही होंगे..! लेकिन सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश का जिसने जज रहते हुए जाने कितने लोगों को कानून तोड़ने पर सजा सुनाई होगी अगर वो किसी व्यक्ति की सजा माफ करने की अपील करता है तो ये बात गले नहीं उतरती..!
माना काटजू साहब भी संजय दत्त की अदाकारी के मुरीद रहे हों लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि किसी पर अपराध सिद्ध होने के बाद वे उसकी सजा माफ करने की पैरवी करें..! अकेले काटजू ही नहीं बॉलिवुड सितारों के साथ ही नेताओं की भी लंबी फेरहिस्त है जिन्हे संजय दत्त सर्वोच्च न्यायालय में जुर्म साबित होने के बाद भी निर्दोष दिखाई देते हैं..!
इन लोगों की दलील तो सुनिए ये कहते हैं कि संजय दत्त ने 20 सालों में काफी कुछ भुगता है लिहाजा संजू बाबा की सजा माफ कर दी जानी चाहिए। लेकिन इन लोगों को कौन समझाए कि हिंदुस्तान में सुस्त और लंबी न्याय प्रक्रिया के चलते लाखों लोग सालों से यही सब तो भुगत रहे हैं फिर ऐसे में क्यों न उन सबकी सजा भी माफ कर दी जाए..?
संजय दत्त एक अच्छे फिल्म अभिनेता हैं तो इसका मतलब ये तो नहीं कि उनके लिए अलग से कानून बनाया जाए। हैं तो वे इसी देश के नागरिक न फिर क्यों न अपराध करने पर दूसरे अपराधियों की तरह संजय दत्त को सजा मिले..? सुनील दत्त और नर्गिस के बेटे और फिल्म अभिनेता होने से क्या वे देश के कानून से न्यायालय से ऊपर हो जाते हैं..? ये भी दलील दी जा रही है कि संजय दत्त और उनके माता – पिता ने लंबे तक तक समाज की सेवा की है।  फिर तो चोर – डकैत करोड़ों की डकैती कर लेंगे और उस पैसे का कुछ चैरिटी में खर्च कर समाजसेवी का तमगा हासिल कर लेंगे और अपनी सजा माफ करने की अपील करेंगे..! कहेंगे- हमने तो चैरिटी करते हैं लिहाजा हमारी सजा माफ कर दो..!
आज संजय दत्त की सजा माफ होगी तो कल किसी दूसरे की सजा माफ करने से आप कैसे इंकार कर सकते हैं..? जाहिर है  ये अपराधियों का मनोबल बढ़ाने के साथ ही आम और खास आदमी के बीच न्याय प्रक्रिया में भी एक दीवार खड़ी करने का काम करेगा। संजय दत्त जैसे अभिनेता को 5 साल जेल की सजा से आम लोगों में न्यायपालिका के प्रति जो विश्वास मजबूत हुआ है उसे तो ये पलभर में ही धवस्त कर देगा।
केरल तट पर भारतीय मछुवारों को गोली मारने वाले इटली के नौसैनिकों को भारत वापस लाने के लिए आप न्याय की बातें करते हुए दुनियाभर में ढिंढोरा पीटते हैं लेकिन अपने ही देश के अंदर कानून तोड़ने वाले को सर्वोच्च न्यायालय से सजा होने के बाद भी उसकी सजा माफ करने की पैरवी करते हैं।
अपराध चाहे किसी ने भी किया हो उसे सजा मिलनी ही चाहिए फिर चाहे वो एक आम आदमी हो या फिर संजय दत्त जैसा खास।

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गुरुवार, 21 मार्च 2013

सीबीआई- फिर काम आया ब्रह्मास्त्र..!


डीएमके के समर्थन वापस लेने से संकट में घिरी सरकार के लिए सीबीआई एक बार फिर से ब्रह्मास्त्र साबित हुआ और केन्द्रीय मंत्री बेनी की तान पर सरकार को हेकड़ी दिखा रहे मुलायम सिंह की सारी हेकड़ी सीबीआई के नाम पर कुछ ही घंटों में हवा हो गयी..!
डीएमके नेता स्टालिन के घर पर सीबीआई के छापे के बाद खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भले ही छापे की टाईमिंग को लेकर हैरानी प्रकट करते हुए इसमें सरकार की किसी तरह की भमिका से इंकार कर रहे हों लेकिन पर्दे के पीछे की सच्चाई किसी से छुपी नहीं है..! (पढ़ें- सीबीआई जिंदाबाद..!)
सरकार कहती है कि सीबीआई के छापे में सरकार का किसी तरह का कोई दखल नहीं है तो फिर ये बात समझ में नहीं आती कि आखिर फिर छापे की कार्यवाही को अब क्यों रोका गया..? क्या ये सीबीआई के काम में दखल नहीं है..? अगर सीबीआई निष्पक्ष तरीक से अपना काम कर रही थी तो फिर खुद प्रधानमंत्री और सरकार में शामिल मंत्रियों को क्यों डीएमके नेता स्टालिन के घर छापे के बाद इस पर सफाई देने की जरूरत पड़ी..? करने देते सीबीआई को अपना काम...इससे आपके माथे पर चिंता की लकीरें क्यों उभर आयी..?
राजनीति में सरकार को बचाने का मैनेजमेंट भी गजब का है। सहयोगी आंखें दिखाए तो सीबीआई का सिर्फ डर दिखा दो सारा काम अपने आप हो जाएगा..! दामन तो किसी नेता का पाक साफ है नहीं कि किसी मामले में जांच से न घबराएं..! जाहिर है नेताओं का भ्रष्टाचार और बेहिसाब अर्जित की गयी संपत्ति ही उनके मन में सीबीआई का डर पैदा करते हैं, वर्ना क्यों कोई नेता सीबीआई के नाम से ही खौफ खाए..?
सीबीआई को सरकार का ब्रह्मास्त्र यूं ही नहीं कहा जाता...सीबीआई की मारक क्षमता देखिए दक्षिण में डीएमके नेता के घर छापा पड़ता है और उत्तर में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह के तेवर मिनटों में नरम पड़ जाते हैं। छापे की कार्यवाही के बाद जितनी जल्दी मुलायम के तेवर नरम पड़े इतनी देर में तो हवाई जहाज से भी दक्षिण से उत्तर तक का सफर पूरा नहीं होता है लेकिन मुलायम की कठोरता जाने में देर नहीं लगी।
ऐसा नहीं कि बात सिर्फ मुलायम तक सीमित हो...सरकार को बाहर से समर्थन दे रही बसपा सुप्रीमो मायावती को ही देख लिजिए। सीबीआई के दुरुपयोग और इसका शिकार होने की बात करती हैं लेकिन फिर भी कहती हैं कि सरकार को समर्थन देना जारी रखेंगे। डीएमके की कहानी तो अभी ताजी ही है।
बहरहाल सीबीआई के सहारे सरकार को फिर से कोई नई आफत आने तक राहत की ऑक्सीजन तो मिल ही गयी है। वैसे भी सरकार के पास सीबीआई रूपी ब्रह्मास्त्र तो है ही फिर कोई आफत आई तो उससे भी निपट लेंगे तब तक 2014 भी आ ही जाएगा..!

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संजय दत्त- द मेकिंग ऑफ रियल खलनायक..!


सर्वोच्च न्यायालय ने 20 साल पहले 12 मार्च पहले 1993 में हुए मंबई ब्लास्ट के सिलसिले में अवैध हथियार रखने का दोषी पाए जाने पर फिल्म अभिनेता संजय दत्त की 5 साल की सजा पर मुहर लगा दी है। आमतौर पर किसी को उसके किए की सजा मिलने पर हालांकि दोषी से साहनुभूति रखने वाले उसके परिजन और रिश्तेदार ही होते हैं लेकिन संजय दत्त के मामले में तस्वीर कुछ अलग दिखाई दे रही है।
फिल्म अभिनेता होने के नाते संजू बाबा से सहानुभूति रखने वालों प्रशंसकों की तादाद खासी है जिनमें से अधिकतर को अभी भी ये लगता है कि कम से कम संजय दत्त को तो सजा नहीं सुनाई जानी चाहिए थी..! हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने संजय दत्त की सजा को 6 साल से घटाकर 5 साल कर दिया है और 18 महीने जेल में काट चुके संजू बाबा को करीब साढ़े तीन साल जेल में काटने होंगे।
कुछ ही घंटों के अंतराल में देश की आर्थिक राजधानी में 12 बम धमाके, 257 लोगों की मौत, 713 घायल और करोड़ों का नुकसान...ये कोई छोटी घटना नहीं थी। 20 सालों में बहुत कुछ बदल गया बंबई का नाम बदलकर मुंबई हो गया। इसी तरह 18 महीने जेल में बिताने के बाद संजय दत्त की जिंदगी में भी कई बदलाव देखने को मिले। संजय ने फिल्मों में वापसी के साथ ही राजनीति जुड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटने के तमाम प्रयास भी किए जिसमें वे सफल भी होते दिखाई दिए लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एक बार फिर से संजय दत्त की जिंदगी सलाखों के पीछे लाकर खड़ी कर दी है। ये संजय दत्त की वो रियल लाईफ है जहां संजयद दत्त को चाहकर भी रिटेक का मौका नहीं मिलने वाला यानि कि जो गुनाह आपने किया है उसकी सजा आपको भुगतनी ही पड़ेगी।
संजय ने कई फिल्मों में बेहतरीन अभिनय किया...कभी वे पुलिसवाले के किरदार में ईमानदार अफसर की भूमिका में बदमाशों को सलाखों के पीछे धकेलते नजर आए तो कई बार खलनायक और डॉन के रूप में। कभी संजू बाबा गांधी जी के आदर्शों पर चलते हुए गांधीगिरी करते नजर आए तो कई बार मुन्नाभाई के रूप में लोगों को गुदगुदाते नजर आए लेकिन 1993 में संजय की जिंदगी में भूचाल लाने वाली मुंबई ब्लास्ट का दि एंड पांच साल जेल की सजा के साथ होगा ऐसा शायद ही संजय दत्त और उनके प्रशंसकों ने कभी सोचा होगा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में जिस तरह संजय दत्त के अपराध की प्रकृति को गंभीर बताते हुए 5 साल सजा का फैसला सुनाया वो अपने आप में एक नजीर की तरह है।
संजू बाबा से सहानुभूति रखने वालों की तादाद में भले ही उनके प्रशंसकों के अलावा बॉलिवुड की हस्तियां और राजनीतिक लोग भी हैं जो संजय दत्त को सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद भी बेगुनाह ठहरा रहे हैं लेकिन इस फैसले ने देश की न्याय व्यवस्था पर भरोसे को और मजबूत ही किया है।
ये एक कलाकार को चाहने वालों के लिए एक बुरी खबर जरूर हो सकती है लेकिन ये न्याय की जीत है जो न्याय व्यवस्था पर लोगों के भरोसे को मजबूती प्रदान करती है। ये फैसला खासतौर पर उन कथित बड़े लोगों के लिए एक सबक है जो ये सोचते हैं कि वे कहीं भी, कभी भी, कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र हैं और उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता..!
लेकिन इस तस्वीर का एक अफसोसजनक और दुखद पहलू ये भी है कि इस धमाके के 20 साल बाद भी धमाकों के मास्टरमाइंड आज भी खुली हवा में सांस ले रहे हैं जो अपने आप में कई सवाल खड़े करता है..?

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बुधवार, 20 मार्च 2013

स्टालिन के बहाने मुलायम पर निशाना..!


अब इसे इत्तेफाक कहें या कुछ 18 सासंदों वाली करूणानिधि की डीएमके ने केन्द्र सरकार से समर्थन क्या वापस लिया उधर सीबीआई ने विदेशी कारों से अवैध आयात के मामले में करूणानिधि के बेटे एमके स्टालिन के घर छापा मार दिया। स्टालिन पर आरोप है कि उनके प्रड्यूसर बेटे उदयनिधि ने विदेशी गाड़ी मंगवाई है लेकिन इसकी ड्यूटी नहीं चुकाई है। (पढ़ें- सपोर्ट वापस लेते ही सीबीआई ने मारी रेड)।
सीबीआई के इस छापे से एक बार फिर से कई सवाल खड़े हुए हैं जो सरकार पर सीबीआई के दुरुपयोग को लेकर लगते रहे हैं कि केन्द्र सरकार सहयोगी दलों को डराने के लिए सीबीआई का उपयोग करती रही है..!
फिलहाल तो सीबीआई ने छापा सरकार से श्रीलंकाई तमिलों के मुद्दे पर समर्थन वापस ले चुकी द्रमुक नेता और द्रमुक प्रमुख करूणानिधि के बेटे स्टालिन के घर मारा है लेकिन इसकी मार केन्द्र सरकार को बाहर से समर्थन दे रही समाजवादी पार्टी पर पड़ने की पूरी संभावना है..! (पढ़ें- CBI का डर या राजनीति का दोगलापन !)।  
बेनी के बयान पर सरकार से पंगा ले रही 22 सांसदों वाली मुलायम की पार्टी अगर केन्द्र सरकार से समर्थन वापस ले लेती है तो निश्चित तौर पर मनमोहन सरकार अल्पमत में आ जाएगी ऐसे में द्रमुक नेता स्टालिन के घर समर्थन वापसी के दो दिन बाद सीबीआई की ये कार्यवाही केन्द्र सरकार का मुलायम के लिए एक ईशारे की तरह है कि अगर द्रमुक की राह पर चलोगे तो तुम्हारा भी कुछ ऐसा ही हश्र होगा..!
इस बात को इसलिए भी नहीं झुठलाया जा सकता क्योंकि मुलायम सिंह पूर्व में खुद इस बात को स्वीकार कर चुके हैं कि केन्द्र सरकार सहयोगी दलों को सीबीआई का डर दिखाती है। ऐसे में डीएमके नेता एमके स्टालिन के घर सीबीआई के छापे के बाद मुलायम केन्द्र सरकार के प्रति अपने नाम को सार्थक करने हुए कठोर से फिर से मुलायम हो जाएं तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए..!
अपने सियासी फायदे के लिए सीबीआई के दुरुपयोग के आरोप हमेशा लगते रहे हैं फिर चाहे केन्द्र में यूपीए की सरकार हो या एनडीए की..! इससे पहले बसपा सुप्रीमो मायावती 2004 के आम चुनाव से पहले यूपी में साथ मिलकर चुनाव न लड़ने पर  भाजपा पर सीबीआई के नाम पर धमकाने का आरोप लगा चुकी हैं।
यूपीए पर तो हमेशा से ही इस तरह के आरोप लगते रहे हैं फिर चाहे वो मुलायम सिंह और मायावती का मसला हो या फिर अब द्रमुक का..! (पढ़ें- माया-मुलायम के कितने मुंह ?)
समाजसेवी अन्ना हजारे, आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी के साथ योगगुरु बाबा रामदेव भी सीबीआई के दुरुपयोग को लेकर केन्द्र सरकार पर निशाना साधते रहे हैं और सीबीआई की स्वायत्ता को लेकर आवाज बुलंद करते रहे हैं।
एक बार फिर से सीबीआई के बहाने केन्द्र की यूपीए सरकार फिर से सियासी दलों के निशाने पर हैं वो भी ऐसे वक्त पर जब सरकार पर अल्ममत में आने का संकट गहरा रहा है। सरकार भले ही डीएमके नेता स्टालिन के घर सीबीआई के छापे का समर्थन वपस लेने से कोई संबंध होने से इंकार करती नजर आएगी लेकिन समर्थन वापसी के दो दिन के बाद सीबीआई का छापा कहीं न कहीं सरकार की नीयत पर सवाल खड़े करने के लिए काफी है ऐसे में देखना ये होगा कि सीबीआई का ये छापा केन्द्र सरकार की राह आसान करता है या फिर मुश्किल..! फिलहाल तो इस छापे ने मुलायम सिंह को केन्द्र सरकार के प्रति अपने कठोर रुख के लिए एक बार फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया होगा..!  

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