कुल पेज दृश्य

मंगलवार, 5 मार्च 2013

इरोम शर्मिला- न जीने देते हैं न मरने देते हैं..!


क्या सिर्फ उग्रवादी होने के शक के आधार पर किसी की सरेआम गोली मारकर हत्या कर देना जायज है..? या फिर ऐसे किसी कानून को हटाए जाने की मांग को लेकर 12 सालों से भूख हड़ताल पर बैठी किसी महिला की सुध न लेकर उसे मरने के लिए छोड़ देना जायज है..?
मेरी समझ से दोनों ही मामलों में अधिकतर लोगों का जवाब नहीं में होगा..! लेकिन दुर्भाग्य से दोनों ही मामलों में ऐसा ही कुछ हो रहा है।  जिस देश में मुबंई जैसे आतंकी हमले में सैंकड़ों लोगों की हत्या के दोषी कसाब को सारे सबूत उसके खिलाफ होने के बाद भी पूरी कानूना प्रक्रिया के बाद...उसे बचाव का पूरा मौका देने के बाद फांसी की सजा सुनाई जाती है...उस देश में तो कम से कम शक के आधार पर किसी की गोली मारकर हत्या कर देना कहीं से भी जायज नहीं ठहराया जा सकता।
जिस देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे और बाबा रामदेव अनशन पर बैठते हैं तो उन्हें मनाने के लिए उनका अनशन समाप्त करने के लिए तमाम सरकारी कोशिशें होती हैं...उस देश में 12 साल से भूख हड़ताल पर बैठी सामाजिक कार्यकर्ता की सुध न लेना भी कहीं से भी जायज नहीं ठहराया जा सकता।
आज जब 12 साल से मणिपुर से सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून को हटाए जाने की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठी समाज सेविका इरोल शर्मिला पर आमरण अनशन के दौरान खुदकुशी की कोशिश के मामले में आरोप तय किए जाने की खबर पढ़ी उस वक्त से ये सवाल जेहन में उठ रहे हैं। दरअसल इरोम शर्मिला मणिपुर में लागू सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून को हटाने की मांग को लेकर 2001 से अनशन पर बैठी हैं और 6 साल से ज्यादा समय से पुलिस हिरासत में हैं। 2006 में इरोम पर जंतर मंतर पर आमरण अनशन के दौरान खुदकुशी करने का आरोप है और इसी मामले में दिल्ली की एक अदालत ने इरोम के खिलाफ आरोप तय कर दिए हैं।
मणिपुर के इंफाल घाटी के मालोम में 2 नवंबर 2000 में असम रायफल्स के जवानों ने 10 लोगों को उग्रवादी बताकर गोली मार दी थी जसमें एक गर्भवती महिला की जान भी गई थी। इस घटना के बाद से इरोम मणिपुर से सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून को हटाने की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठी हैं। इसी तरह असम रायफल्स ने 2004 में मणिपुर की मानवाधिकार कार्यकर्ता थांगजाम मनोरमा देवी को गिरफ्तार कर उसके साथ सामूहिक बलात्कार कर उसकी गोली मारकर हत्या कर दी थी।
दरअसल सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून 11 सितंबर 1958 को संसद में पारित किया गया था और इसके तहत सुरक्षाबलों को अशांत क्षेत्रों में शरारती तत्वों को गोली मार देने, बिना वारंट के तलाशी लेने या गिरफ्तार करने के साथ ही संपत्ति जब्त करने या नष्ट करने जैसे विशेषाधिकार प्राप्त हैं। इस कानून की धारा 6 के तहत केन्द्र की अनुमति के बिना सशस्त्र बलों के खिलाफ किसी तरह का अभियोग नहीं लगाया जा सकता। समय – समय पर सुरक्षाबलों पर इस कानून के दुरुपयोग करने के तक आरोप लगते रहे हैं और इरोम 2000 में इंफाल में हुई ऐसी ही घटना के बाद भूख हड़ताल पर बैठी हैं।
अत्याधिक उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में इस कानून को लगाने का मतलब समझ में आता है लेकिन इस पर भी सिर्फ शक के आधार पर किसी को गोली मार देना गले नहीं उतरता। माना सुरक्षा बल अपनी जान हथेली पर लेकर ऐसे इलाकों में तैनात रहते हैं और वे स्थितियों को बेहतर समझ सकते हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि किसी की ये पहचान करने में कि ये उग्रवादी नहीं है वे कभी गलती कर ही नहीं सकते।
एक महिला 12 सालों से भूख हड़ताल पर बैठी है लेकिन उसकी सुध लेने की फुर्सत किसी के पास नहीं है। न ही राज्य सरकार के पास और न ही केन्द्र सरकार के पास। एक दर्जन से ज्यादा महिलाएं निर्वस्त्र होकर असम रायफल्स के हेडक्वार्टर के बाहर 2004 की घटना के विरोध में प्रदर्शन करती हैं लेकिन सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंगती। मनमोहन सरकार में मंत्री रहते हुए अगाथा संगमा इरोमा से मिलकर उनकी आवाज इंफाल से लेकर दिल्ली तक उठाने का दम भरती हैं लेकिन अगाथा का दम भी 24 घंटे में ही फूल जाता है।
माना सरकार की अपनी मजबूरियां हैं और सरकार पूरे राज्य से इस कानून को नहीं हटा सकती लेकिन 12 साल से भूख हड़ताल पर बैठी इरोमा को अपनी और सशस्त्र बलों की मजबूरी बताकर अनशन खत्म करवाने की कोशिश कर सकती थी। भविष्य में इस कानून को हटान पर विचार करने का आश्वासन दे सकती थी लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ..!
इरोमा की ये हालत तब है जब 2004 में मनोरमा दी हत्याकांड की जांच के लिए गठित जीवन रेड्डी कमेटी ने 2005 में अपनी रिपोर्ट में इस कानून को हटाने की सिफारिश की थी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी खुद इस कानून को हटाने के पक्ष में हैं।
12 साल से इरोमा की भूख हड़ताल कई सवाल खड़े करती है... सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून पर..! समय समय पर सशस्त्र बलों की एकतरफा कार्रवाई पर..! और सबसे बड़ा सवाल राज्य और केन्द्र सरकार पर कि आखिर क्यों सरकार ने इरोमा की सुध नहीं ली..? क्यों इरोमा को 12 साल से न तो जीने दिया जा रहा है और न ही मरने..? जबकि इरोमा ने अदालत में खुद ये बात कही कि वो अपनी जिंदगी जीना चाहती है।

deepaktiwari555@gmail.com

छलनी भी बोले जिसमें 72 छेद..!


उत्तर प्रदेश में पुलिस अधिकारी जिया उल हक समेत तीन लोगों की मौत पर जब विपक्षी पार्टी बसपा सरकार पर कानून व्यवस्था को लेकर निशाना साधते हुए यूपी में जंगलराज और गुंडाराज होने की बात कहती हैं तो जवाब में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव कहते हैं- सूप बोले तो बोले, छलनी भी बोले जिसमें बहत्तर छेद। मायावती की सरकार के कई मंत्री और विधायक रेप, भ्रष्टाचार जैसे मामलों में जेल की सजा काट रहे हैं, ऐसे में उन्हें सपा सरकार के बारे में बोलने का कोई हक नहीं है
गजब करते हो मुलायम सिंह साहब उत्तर प्रदेश में पुलिस अधिकारी की हत्या कर दी जाती है...आपकी सरकार के मंत्री रघुराज प्रताप सिंह ऊर्फ राजा भैया पर हत्या कराने का आरोप लगता है और आप ये कहकर संतोष कर रहे हैं कि पिछली सरकार में भी तो ऐसा ही कुछ हुआ था..! पिछली सरकार के कई मंत्री और विधायक ऐसे ही मामलों में जेल की हवा खा रहे हैं..! मतलब जो पिछली सरकार में हुआ अगर वैसा ही सपा सरकार में हो रहा है तो सब ठीक हैये तो वही बात हुई पिछली सरकार में शामिल लोगों ने उत्तर प्रदेश को जमकर लूटा, निर्दोष लोगों की हत्या की है इसलिए हम भी ऐसा ही करेंगे..!
आपकी बात का तो यह मतलब निकलता है कि हम तो यूपी में सुशासन नहीं लाएंगे...हम अपराधियों पर नकेल नहीं कसेंगे...हम भ्रष्टाचारियों और घोटालेबाजों पर लगाम नहीं लगाएंगे क्योंकि यही तो पिछली सरकार ने भी किया था। बड़ा ही शानदार तरीका है आपका तो गलत चीजों को जस्टिफाई करने का..!
वैसे भी यूपी में ऐसी घटनाएं होनी की आशंका उस दन प्रबल हो गयी थी जब प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मंत्रिमंडल विस्तार में दागियों को अपनी टीम में शामिल किया था। (पढ़ें- अखिलेश यादव- तकदीर पर ग्रहण ! )
उत्तर प्रदेश की सबसे युवा मुख्यमंत्री का खिताब हासिल कर चुके अखिलेश यादव के लिए अपने पिता की राजनीतिक दोस्ती का वास्ता रखना हर कदम पर महंगा सौदा साबित हो रहा है। चाहे पिता के करीबी दागी नेताओं को मंत्रिमंडल में शामिल करने की बात हो या फिर दागियों के अपराधों पर पर्दा डालने की बात। एक युवा चेहरे से देश के सबसे बड़े राज्य के लोगों को जो उम्मीद थी वो अपराधों की गर्मी में झुलसती दिखाई दे रही है। इस उम्मीद को हकीकत में बदलता हम तब तक नहीं देख पाएंगे जब तक अखिलेश के पिता मुलायम सिंह का दखल सरकार में कम नहीं होता और अखिलेश पूरी स्वतंत्रता से काम नहीं करते लेकिन अफसोस इस बात का है कि ऐसी उम्मीद करना ठीक उसी तरह है जैसे 2014 में मुलायम सिंह के प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद करना..!

deepaktiwari555@gmail.com

सोमवार, 4 मार्च 2013

फिर से- पाकिस्तान की तो..!


हमारी सीमा में घुसकर पाकिस्तानी सैनिक हमारे सैनिकों का सिर कलम कर देते हैं लेकिन हमारी सरकार कुछ नहीं करती..! बड़ी जद्दोजहद के बाद घटना के एक हफ्ते बाद 14 जनवरी को प्लैग मीटिंग होती है को उल्टा पाकिस्तान बड़ी बेशर्मी से सारे आरोपों को नकार कर भारतीय सेना पर सीज फायर उल्लंघन का आरोप लगा देता है लेकिन हमारी सरकार कुछ नहीं करती..!
एक हफ्ते बाद हमारे प्रधानमंत्री का मौन टूटता है तो वे कड़ी कार्रवाई की बात तो करते हैं लेकिन फिर भी सरकार कुछ नहीं करती..!
हमारे गृहमंत्री हिदूं आतंकवाद का शिगूफा छोड़कर सीमा पार बैठे अमन के दुश्मनों का हौसला बढ़ाते हैं लेकिन अपने सैनिकों का सिर कलम होने पर कोई कार्रवाई नहीं करते..! (पढ़ें- पाकिस्तान की तो..!)
शुक्र है कि पाकिस्तान की तरह भारत में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का खुलेआम मखौल नहीं उड़ाया जाता है इसलिए सीमा पर भारतीय सैनिकों का सिर कलम करने की पाकिस्तानी सैनिकों की बर्बर कार्रवाई पर दायर एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के केन्द्र सरकार को नोटिस पर उम्मीद जगी है कि शायद अब भारत सरकार नींद से जागेगी..!
दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने सर्वा मित्तर की याचिका पर सुनवाई करते हुए केन्द्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है कि भारत सरकार ने इस घटना के बाद क्या कदम उठाए..? मित्तर ने अपनी याचिका में कोर्ट से मांग की है कि पाकिस्तान की बर्बर कर्रवाई जिनेवा कन्वेंशन का उल्लंघन है और कोर्ट सरकार को ये निर्देश दे कि सरकार मामले को आंतर्राष्ट्रीय अपराध कोर्ट में उठाए और पाकिस्तान से शहीद हेमराज का सिर वापस मांगे। (पढ़ें- सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया केंद्र सरकार को नोटिस)
सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करने के साथ ही कारगिल युद्ध में शहीद हुए कैप्टन सौरभ कालिया के संबंध में दायर एक जनहित याचिका का भी जिक्र किया है जिसमें पाकिस्तान से कालिया का क्षत-विक्षत शव लौटाने की मांग की गई थी...ये याचिका भी अभी न्यायालय में लंबित है।
पाकिस्तान सीमा पर अपनी नापाक हरकतों से कभी बाज नहीं आया और जनवरी 2013 में भारतीय सैनिकों का सिर कलम करना भी पाकिस्तान की अमानवीयता को दर्शाता है जबकि 1949 में जिनेवा कन्वेंशन में कहा गया है कि कोई भी देश युद्धबंदियों के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार करेगा और साथ ही किसी दूसरे देश के सैनिक या असैन्य नागरिक के शव के साथ अमानवीय कृत्य या शव पर किसी तरह का परीक्षण नहीं करेगा। लेकिन कारगिल में शहीद कैप्टन सौरभा कालिया और उनके 5 साथियों के शव के साथ ही जनवरी 2013 में भारतीय सीमा में घुसकर शहीद हेमराज और सुधाकर के शव के साथ पाकिस्तान ने अमानवीयता और बर्बरता की सारी हदें पार कर डाली।
इन घटनाओं ने पूरे देश का खून खौला दिया लेकिन हमारी सरकार में शामिल लोगों का खून नहीं खौला..! खौलेगा भी कैसे इनका खून तो लगता है कि देशभक्ति की बजाए भ्रष्टाचार और घोटालों से रंगा हुआ है..! जो देश की रक्षा के लिए होने वाले सौदों में भी अपना फायदा ढूंढ लेता है..! (पढ़ें- लेकिन इनका खून नहीं खौलता..!)
अपने सैनिकों के साथ बर्बरता पर 1999 में कारगिल फतह पर वाहवाही लूटने वाली एनडीए की सरकार का रवैया और वर्तमान में यूपीए सरकार का रवैया एकसमान दिखता है...ऐसे में कैसे इनसे पाकिस्तान की नापाक हरकतों पर जवाबी कार्रवाई की उम्मीद की जा सकती है..!
सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को नोटिस जरूर जारी किया है ऐसे में अब तक कुछ न करने वाली सरकार से बहुत ज्यादा उम्मीद तो नहीं है लेकिन इस जुमले को भी नहीं झुठला सकते कि उम्मीद पर ही दुनिया कायम है
एक उम्मीद है कि शायद अब तो सरकार चेतेगी और ऐसे कदम उठाएगी ताकि कम से कम भविष्य में देश रक्षा के लिए घर परिवार से दूर विपरित परिस्थितियों में सीमा में तैनात हमारे जांबाज सैनिकों के साथ ऐसी बर्बरता फिर न हो। देश रक्षा के लिए खुशी खुशी अपने प्राण न्यौछावर करने वाले सभी वीर शहीदों को मेरा शत शत नमन।।जय हिन्द।।

deepaktiwari555@gmail.com  

रविवार, 3 मार्च 2013

कुछ भी करेंगे 2014 के वास्ते..!


2014 में ज्यादा वक्त नहीं है लिहाजा 2014 में केन्द्र की सत्ता तक पहुंचने के रास्ते तैयार किए जाने लगे हैं तो अपने-अपने विरोधियों को रास्ते में ही धराशायी करने की कोशिशें भी खूब परवान चढ़ रही हैं। 2014 में केन्द्र की सत्ता के वास्ते राजनेता कुछ भी कर गुजरने को तैयार बैठे हैं...फिर चाहे इसके लिए किसी पर कीचड़ उछालने की बात हो या फिर खुद को जनता का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने के लिए किसी भी हद तक जाने की बात..!  
यूपीए सरकार में वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने बजट के जरिए महिलाओं, युवाओं और गरीब तबके के सहारे 2014 की सीढ़ी तैयार करने की कोशिश की तो दिल्ली में भाजपा के राष्ट्रीय अधिवेशन में भाजपा से पीएम पद के प्रबल दावेदार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि भाजपा मिशन के लिए है जबकि कांग्रेस कमीशन के लिए..! मोदी ने यूपीए सरकार के तमाम घोटालों का जिक्र कर कांग्रेस बदरंग छवि प्रस्तुत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
मोदी ने कांग्रेस को दीमक बताते हुए भाजपा कार्यकर्ताओं से अपने मेहनत के पसीने से कांग्रेस को जड़ से उखाड़ फेंकने का आह्वान किया तो मणिशंकर अय्यर ने मोदी को मुसलमानों की हत्या करने वाला और सांप –बिच्छू तक की संज्ञा दे डाली..!
मोदी ने सोनिया – राहुल पर निशाना साधते हुए पर्दे के पीछे से शासन करने का आरोप लगाते हुए मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाकर चौकीदार नियुक्त करने की बात कही तो राजीव शुक्ला ने मोदी को राष्ट्रीय नेता के लिए मोदी की क्षमता पर ही सवाल खड़ा कर दिया..!
मोदी ने 2014 में भाजपा को कांग्रेस के कुशासन का विकल्प बताते हुए कांग्रेस को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया तो राशिद अल्वी ने भाजपा में नेताओं को टोटा बताते हुए कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए प्रणव और लाल बहादुर शास्त्री का नाम लेने की बात कही..!
कुल मिलाकर 2014 में केन्द्र की सत्ता की मंजिल तक पहुंचने के लिए देश की दोनों प्रमुख पार्टियां खूब जोर लगा रही हैं। आपस में जुबानी जंग तेज हो चुकी है और नेताओं में अऩुशासन के साथ ही उनकी भाषा का संयम भी खोता जा रहा है..!
दरअसल लड़ाई सिर्फ अपने बल पर जीत हासिल करने तक होती तो ठीक था लेकिन लड़ाई विरोधियों की राह में ज्यादा से ज्यादा रोड़े अटका कर उनको मंजिल तक पहुंचने से पहले रोकने की भी है। अच्छा खेलकर तो हर कोई भी जीत हासिल कर लेता है लेकिन ये राजनीति है यहां खुद के अच्छा खेलकर जीत हासिल करने की बजाए दूसरे का खेल ज्यादा खराब करके या दिखाकर खुद बिना अच्छा खेले ही जीतने की परंपरा है। लिहाजा 2014 के लिए अपनी जीत का रास्ता तैयार करने के लिए एक बार फिर से इसी परंपरा का सहारा लिया जा रहा है..!
2014 में भ्रष्टाचार अहम मुद्दा है और जिस तरह से मोदी ने आज भाजपा को मिशन के लिए और कांग्रेस को कमीशन के लिए बताते हुए यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार को अपना हथियार बनाया उससे तो यही लगता है कि भाजपा हिंदुत्व के चेहरे के साथ ही भ्रष्टाचार की नाव में सवार यूपीए सरकार की नैया डुबाने में कोई कसर नहीं छोड़ने वाली। लेकिन सबसे अहम बात ये है जो कांग्रेस ने मोदी के कमीशन वाले जुमले पर जवाब में कही कि भाजपा को अपने पूर्व अध्यक्ष बंगारु लक्ष्मण के कारनामे नहीं भूलने चाहिए कि किस तरह फर्जी रक्षा सौदे की डील के दौरान तहलका के स्टिंग ऑपरेशन में बंगारु लक्ष्मण एक लाख रूपए की रिश्वत लेते हुए कैमरे में पकड़े गए थे।
मोदी ने कहा कि देश की जनता के पास भाजपा ही एकमात्र विकल्प है...लेकिन भाजपा का बीता हुआ कल कहीं न कहीं भाजपा को भी कांग्रेस की ही जमात में खड़ा करता है यानि जब – जब दोनों सत्ता में आए तब-तब दोनों ने ही भ्रष्टाचार के सागर में गोते लगाने के कोई मौके नहीं छोड़े...ये बात अलग है कि कांग्रेसी ज्यादा बेहतर गोताखोर साबित हुए हैं..!
फैसला एक बार फिर से जनता को ही करना है लेकिन दामन किसी का भी पाक साफ नहीं है..! सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि जनता के पास भी कोई मजबूत औऱ भरोसेमंद विकल्प नहीं है...ऐसे में देखना ये होगा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ समाजसेवी अन्ना हजारे की मुहिम और योगगुरु बाबा रामदेव का कालेधन के खिलाफ आंदोलन के साथ ही अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी की आम आदमी पार्टी क्या लोगों के दिलों में एक नए विकल्प का दीप जला पाने में कामयाब होगी या फिर एक बार फिर से जनता देश के दोनों बड़े राष्ट्रीय दलों में से किसी एक पर भरोसा जताकर उसके हाथ में देश की बागडोर सौंपेगी..?

deepaktiwari555@gmail.com

क्यों पड़े हो शिंदे के पीछे..?


कुछ लोग कहते हैं कि आप बेवजह गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे के पीछे पड़े हैं...बेवजह शिंदे की आलोचना करते फिरते हो...कुछ लोगों ने ये भी कहा कि शिंदे चूंकि दलित हैं इसलिए भी शिंदे के खिलाफ आप लिखते हो। सच कहूं तो मुझे को ये सारे सवाल ही बेवजह लगते हैं जो शिंदे से सहानुभूति रखते हुए से प्रतीत होते हैं..!
मेरे पास ये कहने के लिए वाजिब वजह भी हैये बात अलग है कि कुछ लोग इससे इतत्फाक न रखते हों..! वैसे भी मैं आपको ज्यादा पीछे नहीं लेकर जा रहा हूं...संसद के बजट सत्र की ही बात कर लेते हैं। गृहमंत्री शिंदे साहब ने राज्यसभा में महाराष्ट्र के भंडारा में तीन सगी बहनों के रेप के मामले में अपना बयान पढ़ते हुए तीनों का नाम लेते हुए उनकी पहचान जाहिर कर दी। हालांकि विपक्ष के हंगामे के बाद गृहमंत्री के इस बयान को सदन की कार्यवाही से हटा दिया गया लेकिन सवाल ये उठता है कि आखिर हर बार माननीय गृहमंत्री साहब ही क्यों गलतियां करते हैं..?
गौरतलब है कि क्रिमिनल लॉ आर्डिनेंस 2013 के मुताबिक रेप पीड़ित की पहचान जाहिर नहीं की जा सकती। ऐसे में गृहमंत्री की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति ऐसी गलती कैसे कर सकता है..? वो भी संसद की कार्यवाही के दौरान जब पूरा देश टीवी पर उसका सीधा प्रसारण देख रहा है..! क्या गृहमंत्री साहब को इतना ज्ञान नहीं है कि रेप पीड़ित की पहचान जाहिर नहीं की जा सकती या फिर गृहमंत्री साहब सिर्फ गृह मंत्रायल से उनके पास आए छपे छपाए बयान को सिर्फ अपनी आवाज दे रहे थे..!
ये पहली बार होता तो समझ में आता लेकिन इससे पहले भी गृहमंत्री ऐसा कर चुके हैं जब संसद में ही मुंबई हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद को शिंदे ने श्री औरमिस्टर कहकर संबोधित किया था।
कोयला घोटाले पर शिंदे के बोल तो याद ही होंगे आपको...जब शिंदे साहब ने कहा था कि बोफोर्स की तरह लोग कोयला घोटाले को भी भूल जाएंगे। जयपुर में कांग्रेस चिंतन शिविर में शिंदे के बयान पर भी खूब बवाल मचा था जब शिंदे ने आतंकवाद को जाति और धर्म से जोड़कर हिंदू आतंकवाद के शब्द को ईजाद किया था ये बात अलग है कि बाद में शिंदे को अपना बयान वापस लेना पड़ा और शिंदे ने माफी मांग ली। (पढ़ें- गृहमंत्री रहने लायक नहीं शिंदे !)
हैदराबाद में बम धमाके होते हैं तो धमाकों के बाद गृहमंत्री कहते हैं कि सरकार को आशंका थी कि धमाके हो सकते हैं लेकिन फिर धमाके क्यों हुए इसका जवाब शिंदे साहब के पास नहीं है। बाद में शिंदे साहब इसे रूटीन अलर्ट कहकर  अपना पल्ला झाड़ते नजर आते हैं..! (पढ़ें- सरकार गरजती है आतंकी बरसते हैं..!)
सुशील कुमार शिंदे देश के गृहमंत्री हैं...देश की सुरक्षा का जिम्मा उनके हवाले हैं ऐसे में हम कैसे उनसे बार – बार गैर जिम्मेदाराना बयान की उम्मीद कर सकते हैं..! सुशील कुमार शिंदे साहब का गैर जिम्मेदार रवैया और बिना सोचे समझे वेवजह की बयानबाजी ही एक मात्र वजह है जो शिंदे की इतनी आलोचना होती है लेकिन हैरत होती है तब जब कुछ दिनों बाद शिंदे की गैर जिम्मेदारी का एक और नमूना सामने आ जाता है। अब शिंदे साहब को ही शर्म नहीं है तो क्या कर सकते हैं...?

deepaktiwari555@gmail.com

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

बजट- 3 चेहरे और 2014 पर निशाना..!


वित्त मंत्री पी चिदंबरम के आम बजट पेश करने से पहले लोगों को बजट से बड़ी उम्मीदें थी लेकिन जैसे – जैसे पी चिदंबरम का बजट भाषण आगे बढ़ता गया सारी उम्मीदें धराशायी होती गयी। आयकर में छूट पर मध्य वर्ग और आम आदमी की राहत की उम्मीदों ने दम तोड़ दिया तो महंगाई डायन से राहत दिलाने के लिए चिदंबरम के पिटारे से कुछ खास नहीं निकला।  
चिदंबरम ने महिलाओं, युवाओं और गरीब तबके को  जरूर भारत का चेहरा बताया और इन तीनों के चेहरे पर खुशी लाने के लिए विशेष जोर देने की बात तो कही लेकिन क्या बड़ा सवाल ये है कि क्या बजट में विशेष प्रावधान के बाद भी इन भारत की महिलाओं, देश के युवा वर्ग और गरीब तबके के चेहरे पर खुशी दिखाई देगी..?
क्या इऩ तीन चेहरों पर खुशी लाने की चिदंबरम की कोशिश 2014 में यूपीए की हैट्रिक के साथ ही राहुल गांधी की राह आसान करने की सियासी चाल तो नहीं है..?
भारत में वर्तमान में खुद को सबसे असुरक्षित महसूस कर रही भारत के पहले चेहरे महिलाओं की अगर बात करें तो वित्त मंत्री चिदंबरम ने महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा का हवाला देते हुए महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की राह खोलते हुए 1,000 करोड़ के निर्भया फंड निधि बनाने का प्रस्ताव दिया है...जिसका संरचना, कार्य क्षेत्र और प्रयोग का खाका तैयार करने का जिम्मा महिला एंव बाल विकास विभाग के पास रहेगा। इस फंड से पीड़ित महिलाओं को तत्काल मदद दी जाएगी। इसके साथ ही बजट में वित्त मंत्री ने महिलाओं के लिए पहला सरकारी महिला बैंक स्थपित करने की घोषणा की है।
लेकिन यहां सवाल ये है कि पीड़ित की क्या सिर्फ आर्थिक मदद से पीड़ित का दर्द कम हो जाएगा..? या फिर देश में महिलाओं की स्थिति में सुधार आ पाएगा..?
युवा वर्ग जिसे चिदंबरम भारत का दूसरा चेहरा मानते हैं वह आज बेरोजगारी का बड़ा दंश झेल रहा है या फिर अपने काबिलियत से समझौता कर औनी पौनी सैलरी पर काम करने को मजबूर है। हालांकि चिदंबरम ने युवा वर्ग को बेरोजगारी के दंश से बाहर निकालने के लिए कौशल विकास की योजनाओं को गति देने की घोषण की है और इसके तहत 1,000 करोड़ रूपए का फंड रखा है। चिदंबरम की मानें तो इसके तहत गरीब युवाओं की दक्षता को समझ कर उन्हें प्रशिक्षण के बजाए सरकारी या गैर सरकारी कंपनियों में नौकरी दिलाई जाएगी। 2013-14 में इसके लिए 90 लाख युवाओं को दक्ष कर नौकरी दिलाने की सरकार की योजना है।
सवाल यहां भी खड़ा होता है कि क्या सिर्फ गरीब युवाओं को दक्ष बनाकर उन्हें नौकरी दिलाने से बेरोजगारी के दंश से निजात मिल पाएगी..?
क्या सिर्फ 90 लाख युवाओं को प्रशिक्षण के बाद रोजगार उपलब्ध कराकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच सकती है..? हालांकि इससे भी युवाओं को ही फायदा होगा लेकिन बेहतर होता सरकार अगर देश के तकरीबन 5 करोड़ बेरोजगारों के विषय में सोचती और युवाओं को प्रशिक्षण के साथ ही रोजगार के नए अवसर सृजन करने की ओर कदम बढ़ाती या बेरोजगार युवाओं को आत्म निर्भर बनाने की दिशा में कोई कदम उठाया जाता।
भारत के तीसरे चेहरे गरीबों की मुस्कान लौटेने के लिए सरकार ने डायरेक्ट कैश ट्रांस्फर स्कीम को पूरे देश में लागू करने की घोषणा की है। इसके तहत हर साल 30 से 40 हजार रूपए सब्सिडी के रूप में गरीबों के खाते में डाल दिया जाएगा। भारत में गरीबों की अगर बात करें तो ये संख्या करीब 42 करोड़ से अधिक है...जिनमें से अधिकतर का बैंकों में खाता नहीं होना और भारत के ग्रामीण इलाकों में बैंकों की शाखाएं न होना भी सरकार की इस महत्वकांक्षी योजना की सफलता पर सवाल खड़े करने के लिए काफी है।  
वित्त मंत्री पी चिदंबरम भले ही बजट से भारत के इन तीनों चेहरों पर मुस्कान लाने की बात कर रहे हैं लेकिन कहीं न कहीं ये चिंता 2014 के आम चुनाव को लेकर ज्यादा दिखाई देती है। देश की तकरीबन 48 करोड़ महिलाओं के साथ ही तकरीबन 5 करोड़ बेरोजगार युवाओं और करीब 42 करोड़ से अधिक गरीबों को साधने की ओर कदम बढ़ाकर चिदंबरम दरअसल 2014 में यूपीए सरकार की हैट्रिक के साथ ही राहुल गांधी की राह आसान करने की एक कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं। शायद यही वजह है कि चिदंबरम ने महिलाओं, युवाओं और गरीबों के लिए तो सरकारी खजाना खोलने की ओर कदम बढ़ाएं हैं लेकिन बड़े सुधारों या सुधारवादी उपाय की घोषण से बचने की कोशिश की है ताकि 2014 में किसी तरह के राजनीतिक नुकसान से बचा जा सके..!

deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

शराब पियो मस्त रहो..!


जैसे तैसे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने विजय बहुगुणा भी अपने जैसे तैसे कारनामों को लेकर ही चर्चा में हैं..! चाटुकारिता की हदें पार करने पर पहले ही दिल्ली में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की फटकार खा चुके बहुगुणा को लगता है राज्य की जनता से कोई सरोकार नहीं है..! है। राहुल गांधी की नसीहत का भी लगता है विजय बहुगुणा पर कोई असर नहीं हुआ जिसमें राहुल ने बहुगुणा को अपने काम में ज्यादा ध्यान लगाने को कहा था..!
तभी तो बहुगुणा सरकार एक तरफ रसोई गैस पर दी जा रही 5 प्रतिशत वैट की छूट को वापस लेकर राज्य की जनता पर महंगाई का अतिरिक्त बोझ डालती है लेकिन शराब के दामों पर 20 प्रतिशत की वैट पर छूट दे देती है। बहुगुणा सरकार के इस फैसले से तो ऐसा लगता है जैसे उत्तराखंड की जनता के लिए रसोई गैस से ज्यादा जरूरी शराब है..! रसोई गैस के मुद्दे पर ही मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के बेटे साकेत बहुगुणा को टिहरी उपचुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा लेकिन इसके बाद भी मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को शायद ये बात समझ में नहीं आई..!
दरअसल बहुगुणा कैबिनेट ने 26 फरवरी 2013 को कैबिनेट की बैठक में नई आबकारी नीति 2013-14 को मंजूरी दे दी। इसके तहत बहुगुणा सरकार ने बीते साल के मुकाबले शराब की बिक्री से 150 करोड़ का अतिरिक्त राजस्व जुटाने का लक्ष्य रखा है। देखा जाए तो वैट में छूट से सरकार को राजस्व में नुकसान झेलना पड़ेगा लेकिन सरकार के तारणहारों ने शराब को सस्ती कर कम कीमत, ज्यादा बिक्री का फार्मूला अपनाया है। इनका सोचना है की शराब सस्ती होगी तो शराब की ज्यादा बिक्री होगी और सरकार के राजस्व में बढ़ोतरी होगी..!
बहुगुणा सरकार का ये फैसला सीधे तौर पर राज्य की जनता के साथ मजाक नहीं तो और क्या है..?
एक तरफ शराब के श्राप से त्रस्त खासकर उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों की महिलाएं शराबबंदी के खिलाफ लामबंद होकर आंदोलन करती हैं तो दूसरी तरफ सरकार शराब सस्ती कर इसे बढ़ावा देने का काम कर रही है..! सरकार को महंगाई के बोझ तले दबी जनता की फिक्र नहीं लेकिन शराब माफियाओं और शराबियों की खूब फिक्र है..!
लोगों के घर में रसोई गैस न होने से चूल्हा जले न जले लेकिन सरकार को फिक्र है कि लोगों को सस्ती शराब कैसे उपलब्ध कराई जाए..!
सरकार रसोई गैस में वैट में 5 प्रतिशत की छूट सिर्फ इसलिए वापस ले लेती है कि सरकार को नुकसान उठाना पड़ रहा है लेकिन शराब में वैट में 20 प्रतिशत की छूट देने में सरकार को कोई परेशानी नहीं है।
बहुगुणा साहब को पहाड़ के लोगों की पहाड़ सी दिक्कतें नहीं दिखाई देतीं..! टूटी हुई सड़कें नहीं दिखाई देती..! पेयजल किल्लत नहीं दिखाई देती..! रोजगार की तलाश में वीरान होते गांव के गांव नहीं दिखाई देते लेकिन शराब माफियाओं के हित सरकार को खूब दिखाई देते हैं।
वैसे भी एक साल के कार्यकाल में राज्य के विकास के लिए..राज्य के लोगों के विकास के लिए कुछ कर पाने में नाकाम रहे बहुगुणा साहब शायद यही चाहते हैं कि शराब पियो और मस्त रहो..! वाह रे बहुगुणा..!

deepaktiwari555@gmail.com

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

ऊंची उड़ान- झुलस न जाएं पंख..!


सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि सूरत बदलनी चाहिए...रेल मंत्री पवन बंसल साहब ने इस शेर के जरिए रल बजट में भारतीय रेल की सूरत बदलने की बात तो कही लेकिन बंसल साहब के रेल बजट का दूर दूर तक इस शेर से कोई वास्ता दिखाई नहीं दिया। इतना जरूर हुआ कि बंसल साहब ने बिना रेल किराए में बढ़ोतरी किए रेल सफर जरूर महंगा कर दिया। बंसल साहब ने फ्यूल सरचार्ज के साथ ही तत्काल टिकट और आरक्षण रद्द कराने के शुल्क में भी बढोतरी करते हुए पिछले दरवाजे से जनता की जेब काटने का इंतजाम जरूर कर दिया। रेल की सूरत बदले न बदले लेकिन बंसल साहब का शेर यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की संसदीय सीट रायबरेली पर एकदम सटीक बैठता है। रायबरेली में तीन नई ट्रेनें देने के साथ ही रायबरेली में रेल कोच फैक्ट्री के बाद अब पहिए बनाने की फैक्ट्री लगाने का एलान तो कम से कम यही कहानी कह रहा है..!
न बहारों की बात करनी है न सितारों की बात करनी है, तैर पर दरिया पार करना है किनारों की बात करनी है...जाहिर है पवन बंसल इस शेर के जरिए 2014 के आम चुनाव का दरिया पार कर यूपीए सरकार की हैट्रिक लगाने की ओर ईशारा कर रहे थे। इसके लिए बकायदा केन्द्र की सत्ता का रास्ता कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश के साथ ही पंजाब औऱ हरियाणा को भी कई योजनाएं देकर रेल मंत्री ने 2014 के लिए सियासी संतुलन साधने की भी कोशिश भी की। लेकिन चुनावी साल में रेल मुसाफिरों को रेल बजट से पहले जनवरी में यात्री किराये में ईजाफे का झटका देने के बाद रेल बजट में पिछले दरवाजे से जेब काटना और मालभाड़े में 5 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी करना रेल मंत्री के दरिया पार करने के ख्वाब पर कहीं पानी न फेर दे..!
पेड़ पर बैठे परिदों को गिरने का भय नहीं, उसे विश्वास है खुद के पंखों पर...इस शेर के जरिए रेल मंत्री पवन बंसल ने यूपीए सरकार के फैसलों पर रेल बजट को लेकर खुद के फैसलों पर पूरा विश्वास होने की बात कहते हुए ईशारों ईशारों में 2014 की चुनावी वैतरणी बिना किसी भय के पार करने का भी दावा किया लेकिन रेल मंत्री शायद ये भूल गए कि ज्यादा ऊंची उड़ान परिदों के परों को झुलसा भी देती है और ऐसे परिदें फिर कभी उड़ान नहीं भर पाते हैं। वैसे भी यूपीए सरकार तो पहले से ही भ्रष्टाचार, घोटाले और महंगाई की ऊंची उड़ान भर रही है ऐसे में रेल बजट में पिछले दरवाजे से महंगाई की एक और बेफ्रिक उड़ान कहीं चुनावी साल में यूपीए सरकार के पंखों को न झुलसा दे..!   

deepaktiwari555@gmail.com

सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

सेक्स एजुकेशन- कितनी कारगर..?


देश की राजधानी में गैंगरेप के बाद जस्टिस जे एस वर्मा समिति ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की है कि स्कूली पाठ्यक्रम में यौन शिक्षा को शामिल किया जाए ताकि बच्चों को सही गलत जैसे व्यवहार और आपसी संबंधों के बारे में जानकारी हो।
सिफारिशों पर गौर करते हुए केन्द्रीय मानव संसाधन एवं विकास मंत्री एम एल पल्लम राजू ने इन सिफारिशों पर सभी राज्यों से बातचीत के बाद इसे अमल में लाने के संकेत भी दिए हैं लेकिन स्कूली पाठ्यक्रम में यौन शिक्षा को शामिल करने को लेकर सवालों की फेरहिस्त काफी लंबी है। मसलन यौन अपराधों पर लगाम कसने के लिए सेक्स एजुकेशन कहां तक सही है...?
सेक्स भारत जैसे देश के लिहाज से आज भी एक तरह से सामान्य बातचीत में न होते हुए भी एक वर्जित शब्द की तरह है और लोग इस पर बात करने से चर्चा करने में संकोच करते हैं..! आज भी देश की बड़ी आबादी ऐसी है जिन्हें इस विषय पर बात करना किसी अपराध करने की तरह लगता है शायद यही वजह है कि स्कूली पाठ्यक्रम में यौन शिक्षा को शामिल करने को लेकर इसके विरोधियों की तादाद अधिक है जबकि शहरीकरण की जद में आए खुले विचारों के लोग या कहें कि बुद्धिजीवी वर्ग इसके पक्ष में दिखाई देते हैं।
जहां तक बात है कि क्या वाकई में सेक्स एजुकेशन से यौन अपराधों में नकेल कस पाएगी तो ये थोड़ा मुश्किल सवाल लगता है क्योंकि जब तक अपराध करने वाले की सोच में मानसिकता में बदलाव नहीं आएगा इस पर रोक लग पाना संभव नहीं लगता।(पढ़ें-दिल्ली गैंगरेप- यार ये लड़की ऐसी ही होगी !)।
हां, इसका इतना फायदा जरूर हो सकता है कि जानकारी के अभाव में जो मामले अब तक सामने नहीं आ पाते थे उन पर से पर्दा हटने में इससे मदद मिलेगी। जो शायद एक वजह बन सकती है कि अपराधी अगर बेनकाब होगा तो वो दोबारा किसी के साथ ऐसी हरकत करने से पहले सौ बार सोचेगा क्योंकि यौन अपराध के पीड़ित की चुप्पी कहीं न कहीं अपराधी का हौसला बढ़ाती हैं। जानकारी होने के बाद जब ज्यादा से ज्यादा मामलों पर से पर्दा हटेगा तो शुरुआत में ऐसा दिखाई देगा कि यौन अपराध के मामले बढ़े हैं। कुल मिलाकर दूरदर्शी परिणाम सकारात्मक होंगे और कुछ हद तक इस पर लगाम कसी जा सकेगी हालांकि सोच और मानसिकता का पैमाना यहां पर भी लागू होता है।
जहां तक सवाल है कि क्या सेक्स एजुकेशन के जरिए भटकते युवा सही मार्ग पर आ सकते हैं तो मुझे नहीं लगता कि सिर्फ सेक्स एजुकेशन से युवाओं का भटकाव कम होगा या खत्म हो जाएगा क्योंकि सेक्स एजुकेशन के साथ ही युवा किस माहौल में...किस परिवेश में रह रहे हैं ये फेक्टर भी ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। (पढ़ें- बलात्कार- 1971 से 2012 तक !)
तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश में यौन शिक्षा को स्कूली पाठ्यक्रम से ज्यादा दिन तक दूर रखना आसान नहीं है...देर सबरे इसे स्कूली पाठ्यक्रम में शमिल करना ही पड़ेगा लेकिन सरकार सिर्फ सेक्स एजुकेशन के लॉलीपाप से महिलाओं को दी जाने वाली सुरक्षा से जुड़ी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती। इसके साथ भी सरकार को महिलाओं की सुरक्षा को लेकर संजीदगी से कदम उठाने ही होंगे।  
ऐसे नहीं है कि महिलाओं के प्रति अपराधों  की रोकथाम के लिए सेक्स एजुकेशन ही एकमात्र रास्ता है क्योंकि अपराधों की रोकथाम के सबसे पहली चीज किसी पीड़ित के अंदर ये विश्वास जगाना ज्यादा महत्वपूर्ण है कि अगर वो अपना दर्द लेकर पुलिस के पास पहुंचती है तो वहां पर उसे अपमानजनक स्थिति का सामना नहीं करना पड़ेगा। उसका मजाक नहीं बनाया जाएगा बल्कि प्राथमिक्ता के आधार पर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का न सिर्फ भरोसा मिलेगा बल्कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई भी होगी।

deepaktiwari555@gmail.com

कृप्या यहां ज्ञान न बांटे...यहां सब ज्ञानी हैं..!


अपने कार्यकाल के दौरान दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भले ही जनता के लिए कुछ न कर पायी हों लेकिन चुनावी साल में शीला दीक्षित ने जनता के लिए सरकारी खजाना तो नहीं खोला लेकिन अपने ज्ञान का पिटारा जरूर खोल दिया है। शीला जी आजकल जहां जा रही हैं बस ज्ञान बांटती फिर रही हैं। दिल्ली में भूख से हो रही मौतों को रोकने में नाकाम रही शीला दीक्षित पहले अपना ज्ञान बघारते हुए कहती हैं कि 600 रूपए महीने में 5 लोगों के परिवार का पेट बड़ी आसानी से भर जाता है यानि कि बकौल शीला एक व्यक्ति 4 रूपए में भरपेट भोजन कर सकता है। लेकिन इसका जवाब उनके पास नहीं होता कि दिल्ली में भूख से हर हफ्ते एक व्यक्ति क्यों दम तोड़ देता है..? (पढ़ें- शीला जी दिल्ली में भूख से क्यों होती है मौत ?)
अब दिल्ली वालों को सस्ती बिजली उपलब्ध कराने में नाकाम शीला जी दिल्ली वालों से कह रही हैं कि ज्यादा बिजली का बिल नहीं भर सकते तो खपत कम करो...शीला जी यहीं नहीं रूकती वे ये भी कहती हैं कि बिल नहीं भर सकते तो कूलर क्यों चलाते हो...कूलर की जगह पंखे चलाओ..!
बिजली दिल्ली वालों को एक के बाद एक झटके दे रहे हैं लेकिन शीला जी के पास इसका कोई ईलाज नहीं है। लेकिन चुनावी साल है ईलाज नहीं कर सकते तो क्या सलाह तो दे ही सकते हैं...शीला दीक्षित ने भी ऐसा ही किया और दिल्लीवालों को खपत कम करके बिजली का बिल कम करने की सलाह दे डाली। अब शीला दीक्षित भले ही उनके बयान का गलत मतलब निकालने के लिए मीडिया के सिर इसका ठीकरा फोड़ कर सफाई देती फिर रही हों लेकिन कहते हैं न दिल की बात तो जुबां पर आ ही जाती है...शीला जी के जुबां पर भी आ गई तो इसमें उनका क्या दोष..?
गनीमत तो ये रही कि प्याज के आसमान चढ़ते दामों पर शीला दीक्षित ने कृषि मंत्री शरद पवार को सिर्फ पत्र लिखकर कीमतों पर नियंत्रण के लिए प्याज का निर्यात कम करने का अऩुरोध किया। दिल्ली वालों से ये नहीं कहा कि प्याज खरीदने की औकात नहीं है तो प्याज खाना छोड़ दो। (पढ़ें- एक प्याज की ताकत)।
शीला जी आप दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं...सरकार चला रही हैं, निश्चित तौर पर आप ज्ञानी होंगी लेकिन आपके लिए एक बिन मांगी सलाह है जो आपका सामान्य ज्ञान भी बढ़ा देगी..! बात ये है कि ये जो जनता है न ये भी बड़ी ज्ञानी है...वो भी दिल्ली की जनता सोचो कितनी ज्ञानी होगी...आपसे अनुरोध है कि आप सरकार की मुखिया होते हुए भूख से हो रही मौत नहीं रोक सकती..! दिल्ली वालों को सस्ती बिजली नहीं उपलब्ध करा सकती तो कृप्या करके अपना ज्ञान भी अपने पास ही रखें। कहीं ऐसा न हो कि चुनावी साल में जनता का अपने सामान्य ज्ञान से आपकी सरकार का गणित और भूगोल सब बिगाड़ दे। 

deepaktiwari555@gmail.com

रविवार, 24 फ़रवरी 2013

इंसाफ- मौत के बाद..!


हैदराबाद बम धमाकों की गूंज के बीच एक ख़बर ऐसी भी थी जो न तो मीडिया की सुर्खियां बन पाई और न ही इस पर बहुत ज्यादा चर्चा हुई लेकिन ये ख़बर देश की निचली अदालतों से लेकर सर्वोच्च अदालतों में वर्षों से लंबित लाखों मामलों से संबंधित करोड़ों लोगों के साथ ही पश्चिम बंगाल के पार्थ सारथी सेन रॉय के परिजनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी। हालांकि पार्थ सारथी सेन रॉय इस दुनिया को अलविदा कह चुके हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पार्थ सारथी सेन रॉय की 32 साल पहले 27 फरवरी 1981 को बामर लॉरी एंड कंपनी लिमिटेड से बर्खास्तगी को गलत ठहराते हुए रॉय के हक में फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कंपनी को रॉय की बर्खास्तगी से लेकर सेवानिवृति तक के वेतन का 60 फीसदी रॉय के वारिस को देना का आदेश दिया है। (पढ़ें- मौत के बाद मिला सुप्रीम कोर्ट से इंसाफ)
दरअसल पार्थ सारथी सेन रॉय मई 1975 में बामर लॉरी एंड कंपनी लिमिटेड में भर्ती हुए थे लेकिन कंपनी ने 27 फरवरी 1981 को रॉय को कंपनी से बर्खास्त कर दिया। रॉय ने अपनी बर्खास्तगी को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी लेकिन कंपनी ने हाईकोर्ट में दलील दी कि वह सरकारी कंपनी नहीं है और हाईकोर्ट को इस मामले में सुनवाई का अधिकार नहीं है। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में केस आने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने पाया का हाईकोर्ट ने इस मामले का मेरिट के आधार पर फैसला नहीं किया और कंपनी को सार्वजनिक उपक्रम मानते हुए रॉय के पक्ष में फैसला दिया।
लंबी कानूनी जंग के बीच रॉय ने दुनिया को अलविदा कह दिया लेकिन मौत के बाद ही सही रॉय को इंसाफ जरूर मिला। रॉय इंसाफ की इस लड़ाई को अधूरा जरूर छोड़कर चले गए लेकिन रॉय का केस अपने आप में भारतीय न्याय व्यवस्था को लेकर कई सवाल खड़े करता है। जिसमें सबसे पहला सवाल सालों लंबी अदालती लड़ाई को लेकर है जो आम आदमी में न्याय व्यवस्था के प्रति एक अविश्वास पैदा करता है..!
हिंदुस्तान में आजादी के 65 साल बाद भी लोग सही होने के बाद भी कानूनी लड़ाई लड़ने से परहेज करते हैं। वजह साफ है- कानूनी लड़ाई का लंबा इतिहास। एक आम आदमी जो सुबह उठने के साथ ही अपनी दो वक्त की रोजी रोटी के जुगाड़ में जुट जाता है अगर किसी कारणवश ऐसी स्थिति में फंसता है कि उसे अदालत तक जाना पड़ सकता है तो वह अपने कदम पीछे खींच लेता है।
वो सालों तक चलने वाली कानूनी लड़ाई के लिए न तो मानसिक रूप से तैयार होता है और न ही आर्थिक रूप से। साथ ही अदालत के चक्कर काटने पर रोजी रोटी का जुगाड़ वो कैसे करेगा ये सवाल भी मुंह बांए उसके सामने हर वक्त खड़ा रहता है।
बात ये नहीं है कि अदालतों से न्याय नहीं मिलता...पार्थ सारथी सेन रॉय का ताजा केस सामने है...रॉय को इंसाफ मिला...रॉय के हक में फैसला हुआ लेकिन एक बहुत लंबी थका देना वाली कानूनी लड़ाई के बाद...ये लड़ाई इतनी लंबी थी कि रॉय ने इस बीच दुनिया को ही अलविदा कह दिया।
एक और ऐसे ही केस का जिक्र करना चाहूंगा...मुंबई के एम यू किणी का जिन्हें 24 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद इंसाफ मिला जब सीबीआई की विशेष अदालत ने यूनियन बैंक ऑफ इंडिया में अधिकारी किणी पर लगाए सभी आरोपों को समाप्त कर उन्हें बरी कर दिया। किणी कहते हैं कि 24 साल की लंबी कानूनी लड़ाई न सिर्फ थकाऊ थी बल्कि ये 24 साल उनके लिए किसी सजा से कम नहीं थे। (पढ़ें- 24 साल बाद  एक बैंक अधिकारी को मिला इंसाफ)
निचली अदालतों को छोड़कर अगर देश के सर्वोच्च अदालत की ही अगर बात करें तो एक आंकड़े के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या करीब 60 हजार के करीब है तो देशभर के विभिन्न उच्च न्यायालयों में वर्ष 2011 तक लंबित मामलों की संख्या करीब 43 लाख 22 हजार है यानि लगभग आधा करोड़। इससे देशभर की विभिन्न अदालतों में लंबित मामलों की संख्या का अंदाजा भी आसानी से लगाया जा सकता है। वहीं सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश के 31 पदों में से 6 रिक्त हैं तो देशभर के उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के 895 में से 281 पद खाली पड़े हैं जो कि न्यायालयों में लंबित मामलों की एक वजह है। (पढ़ें- चौटाला केस- भ्रष्टाचारियों के लिए सबक)
अपने हक के लिए लड़ रहे एक आम आदमी को सालों तक चलने वाली लंबी कानूनी लड़ाई न सिर्फ अंदर से तोड़ देती है बल्कि न्याय व्यवस्था पर लोगों के भरोसे को भी डिगाती है। उसे न्याय मिलता तो है लेकिन कई बार देर से मिला न्याय सजा के समान होता है या फिर इसे पाने के लिए वे अपना सब कुछ गंवा चुके होते हैं...और अधिकतर की स्थिति पार्थ सारथी सेन रॉय और एम यू किणी जैसी ही होती है...जो इस बात पर बार-बार सोचने पर मजबूर करती हैं कि ऐसा न्याय आखिर किस काम का..!

deepaktiwari555@gmail.com