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गुरुवार, 31 जनवरी 2013

क्या विश्व देखा पाएगा “विश्वरूपम” का रूप ?


विश्वरूपम को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है और बढ़ते विवाद के चलते ही विश्वरूपम का रूप विश्व के सामने नहीं आ पा रहा है। दक्षिण के बाद अब उत्तर भारत में भी फिल्म के रिलीज पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। मामला मद्रास हाईकोर्ट में है तो इस बीच बयानबाजी के दौर भी जारी है। करूणानिधि ने इसमें भी राजनीति तलाश ली है और वे कहते हैं कि एक कार्यक्रम में कमल हासन ने पी चिदंबरम की तारीफ कर दी...बस इसी से जयललिता नाराज हो गई हैं और फिल्म की रिलीज पर बैन लगा दिया..!
हालांकि जयललिता ने आरोप लगाने वालों पर मानहानि का केस करने के साथ ही फिल्म को लेकर 24 मुस्लिम संगठनों के विरोध को दरकिनार नहीं किए जाने की सरकार की मजबूरी बताकर अपनी सफाई भी पेश कर दी है लेकिन खामियाजा न तो करूणानिधि भुगत रहे हैं और न ही जयललिता...खामियाजा भुगत रहा है एक कलाकार..! कमल हासन के मुताबिक अपना सब कुछ इस फिल्म में दांव पर लगा दिया है।
फिल्म इंडस्ट्री भी कमल हासन के समर्थन में खड़ी है...सलमान लोगों से फिल्म पर बैन के खिलाफ बगावत की अपील कर चुके हैं तो तमाम फिल्मी हस्तियां भी फिल्म में बैन के खिलाफ आवाज बुलंद कर रही हैं लेकिन तमिलनाडु में विश्वरूपम में बैन का ग्रहण फिलहाल छंटता नहीं दिख रहा है..!
बकौल जयललिता सरकार राज्य में 524 थियेटरों को सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकती...इसके पीछे मान लेते हैं कि सरकार की कानून व्यवस्था को लेकर अपनी मजबूरियां हैं...7 करोड़ लोगों पर सिर्फ 87 हजार का पुलिसबल है लेकिन सवाल ये खड़ा होता है कि एक फिल्म जो मनोरंज का साधन होने के साथ ही लोगों के लिए एक संदेश भी छोड़ कर जाती है क्या लोगों को आपस में बांट सकती है या देश की आबोहवा में जहर घोल सकती है..?
जो जानकारी है कि फिल्म अफगानिस्तान में आतंकवाद पर बनी है और भारत का उससे कोई संबंध नहीं हैं लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं निकाला जा सकता कि फिल्म में आतंकवाद को बढ़ावा दिया जा रहा होगा या फिल्म में आतंकवादी बनने का संदेश दिया जा रहा होगा या किसी धार्मिक ग्रंथ का अपमान किया गया होगा...ऐसा होता तो क्या सेंसर बोर्ड जैसी जिम्मेदार संस्था फिल्म को हरी झंडी देती..!
ऐसा होता तो क्या कमल हासन अपना सब कुछ एक फिल्म में दांव पर लगा देते..! कमल हासन एक अच्छे कलाकार हैं और लंबे अरसे से फिल्म इंडस्ट्री में है ऐसे में वे ये अच्छी तरह समझते होंगे कि ऐसा करके वे अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मारने का काम करते और शायद इसलिए कमल हासन मुस्लिमों के लिए फिल्म की अलग से स्क्रीनिंग करने को भी तैयार थे लेकिन इसके बाद भी फिल्म को लेकर कुछ मुस्लिम संगठनों का विरोध नहीं थमा और राज्य सरकार ने उनके कहने पर फिल्म की रिलिज पर बैन लगा दिया..!
बहरहाल अच्छी बात ये है कि कमल हासन फिल्म से उन दृश्यों और डॉयलाग को हटाने पर सहमत हो गए हैं जिन पर आपत्ति जतायी जा रही है और जयललिता ने भी कांटछांट होने पर फिल्म की रिलीज में आपत्ति न होने की बात कही है ऐसे में उम्मीद करते हैं कि विश्वरूपम से विवादरूपम बन चुकी कमल हासन की फिल्म का विवादों से पीछा छूटे और इस विवाद का पटाक्षेप हो और समूचा विश्व “विश्वरूपम” का रूप देखे।  

deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 30 जनवरी 2013

सुपरहिट हुई विश्वरूपम !


कमल हासन की फिल्म विश्वरूपम की रिलीज कानूनी पचड़े में नहीं फंसती तो पता नहीं कि ये फिल्म हिट होती या नहीं लेकिन फिल्म के रिलीज पर बवाल मचने के बाद ये तो तय है कि देर सबेर जब भी ये फिल्म बड़े पर्दे पर आएगी तो फिल्म सुपर हिट जरूर होगी। जाहिर है फिल्म को लेकर लोगों की जिज्ञासा बढ़ गई है और हर कोई फिल्म देखने के लिए ललायित होगा..!
फिल्म में कुछ दृश्यों के साथ ही डॉयलाग को लेकर विरोध हो रहा है...अच्छी बात ये है कि कमल हासन विवादित अंश को फिल्म से हटाने पर सहमत भी हो गए हैं लेकिन फिलहाल मद्रास हाईकोर्ट के फैसले के बाद एक बार फिर से फिल्म रिलीज का मामला सोमवार तक अटक गया है।
बड़ा सवाल ये उठता है कि जब फिल्म के किसी दृश्य पर किसी डॉयलाग पर सेंसर बोर्ड ने आपत्ति नहीं जतायी और फिल्म को हरी झंडी दे दी तो फिर आखिर क्यों राज्य सरकार ने सेंसर बोर्ड के फैसले का सम्मान नहीं किया और फिल्म की रिलीज पर रोक लगा दी..?
अगर राज्य सरकार को ही सब कुछ तय करना है तो फिर सेंसर बोर्ड की जरूरत ही क्या है..?
हालांकि ऐसी फिल्मों को प्रदर्शित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए जिसमें समुदाय विशेष को निशाना बनाया गया हो या फिर ऐसे दृश्य या डॉयलाग हों जो समाज के लिए खतरा हों या समाज में वैमनस्य पैदा करते हों लेकिन सेंसर बोर्ड एक जिम्मेदार संस्था है और जब वह किसी फिल्म को प्रमाणित कर रहा है तो फिर सवाल नहीं उठने चाहिए।
विश्वरूपम मेगा बजट फिल्म है और जैसा सुना है कि विश्वरूपम में करीब 100 करोड़ की लागत से बनी है ऐसे में फिल्म की रिलीज में देरी पर कमल हासन का दर्द समझा जा सकता है...वो भी तब जब कमल ने अपना घर तक फिल्म के लिए गिरवी रख दिया है।
बकौल कमल हासन वे राजनीति का शिकार हो रहे हैं और तमिलनाडु की जयललिता सरकार उन्हें राज्य से भगाना चाहती है...अगर वाकई में ऐसा है तो तमिलनाडु के लिए...इस देश के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य और कुछ नहीं हो सकता कि एक कलाकार को प्रोत्साहन देने की बजाए उसका मनोबल तोड़ने की पूरी कोशिश की जा रही है जबकि फिल्म को सेंसर बोर्ड से हरी झंडी मिल चुकी है..!
बहरहाल फिल्म कानूनी पचड़े में बुरी तरह फंस गयी है और फिलहाल ये विवाद जल्द शांत होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं।
उम्मीद करते हैं कि विश्वरूपम की रिलीज पर लगा ग्रहण जल्द हटेगा और फिल्म को लेकर लोगों के मन में छाया कुहासा भी रिलीज के साथ छंटेगा और वास्तविक स्थिति सबके सामने आएगी।

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मंगलवार, 29 जनवरी 2013

शाहरुख खान- दिल की बात लिखकर क्यों लाए ?


मैं न ही शाहरुख खान के खिलाफ हूं और न ही मेरा ईरादा शाहरुख की आलोचना करने का था...लेकिन पाकिस्तानी गृहमंत्री रहमान मलिक की टिप्पणी पर किंग खान की “बहुत देर” से आई प्रतिक्रिया पर खुद को लिखने से भी नहीं रोक सका। आपने शाहरुख खान की वो प्रतिक्रिया समाचार चैनलों में देखी और सुनी की नहीं पता नहीं और देखी और सुनी भी तो पता नहीं गौर किया की नहीं कि शाहरुख खान साहब जब अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे तो सामने रखे कागज पर पढ़कर अपनी बात बोल रहे थे।
शाहरुख ने कहा मुझे भारतीय होने पर गर्व है और बाहरी लोग सलाह न दें। हालंकि शाहरुख ने अपने लेख पर बेवजह बखेड़ा खड़ा करने का आरोप भी लगाया और भारत में अपनी सुरक्षा की चिंता नहीं होने की बात कही। रहमान मलिक के बयान पर शाहरुख से जवाब की उम्मीद थी जो उन्होंने बहुत देर से ही सही लेकिन आखिरकार दिया।
शाहरुख खान सहाब जब कागज से पढ़कर अपनी बात कह रहे थे तो देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि आखिर जो शाहरुख खान फिल्मों के डॉयलाग बिना पढ़े शानदार तरीके से बोलते हैं...और कई टीवी भी शो भी उन्होंने इसी तरह होस्ट भी किए हैं...उन्हें अपनी दिल की बात कहने के लिए कागज पर लिखकर लाना पड़ा। शाहरुख ने बहुत कुछ नहीं बोला और न ही वे कोई भाषण टाइप दे रहे थे लेकिन फिर भी आखिर क्यों लिखकर लाने की जरूरत पड़ गई और उसमें से ही पढ़कर अपनी बात शाहरुख ने कही..! मुझे तो समझ नहीं आया...आपको आया हो तो बताइएगा जरूर..!

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शाहरुख खान ने बढ़ाया रहमान मलिक का हौसला !


सीमा पार से पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक को भारतीय अभिनेता शाहरुख खान की चिंता खूब सता रहा है लेकिन क्या ये वाकई में रहमान मलिक की चिंता है या कुछ और...? ये बड़ा सवाल है।
ये सवाल इसलिए भी उठता है क्योंकि रहमान मलिक अपने मुल्क के वाशिंदों को तो सुरक्षा मुहैया कराने में नाकाम साबित हुए हैं ऐसे में उनका एक भारतीय को वो भी मुसल्मि की सुरक्षा की चिंता करना गले तो नहीं उतरता।
27 दिसंबर 2007 की तारीख तो रहमान मलिक साहब आपको याद ही होगी जब पाकिस्तान में रावलपिंडी के लियाकत बाग में पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की सरेआम हत्या कर दी गयी थी।
इतना काफी नहीं है तो रहमान मलिक साहब एक और तारीख आपको याद दिला देते हैं- 16 अक्टूबर 1951...याद है ये तारीख…जब रावलपिंडी के लियाकत बाग में ही पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की हत्या कर दी गई थी। उनके हत्यारों को तो आज तक आप पकड़ नहीं पाए..!
इसके अलावा पाकिस्तान में आए दिन होने वाले बम धमाके और गोलीबारी की घटनाओं की गूंज तो रहमान मलिक साहब आपके कानों तक पहुंचती ही होगी...किस तरह हर रोज पाकिस्तान में निर्दोष लोगों को चाहे वे किसी भी जाति या धर्म के क्यों न हो मार दिया जाता है..!
न जाने कितने ही मंदिर, मस्जिद और दरगाहें तोड़ दी जाती हैं...अमन की बात करने वालों को मौत की नींद सुला दिया जाता है लेकिन आप कुछ नहीं कर पाते..!   
आप करोगे भी क्या..?
आपको तो अमन और चैन की भाषा समझ ही नहीं आती..! आप अपना घर तो संभाल नहीं पाए...चले हो दूसरों को नसीहत देने।
1999 में कारगिल में पाकिस्तानी सैनिक लड़ते हैं तो आप ये कहकर पलट जाते हो कि वे आतंकवादी थे...हमारे सैनिक नहीं थे..! ये बात अलग है कि आपकी ही सेना के एक पूर्व कमांडर बाद में आपके झूठ का पर्दाफाश करते हैं।
भारतीय सीमा पर पाकस्तानी सैनिक घुसकर भारतीय सैनिकों के साथ बर्बरता करते हैं तो आप इसको सिरे से खारिज कर देते हैं...ये बात अलग है कि एलओसी के पास भारतीय क्षेत्र में पाकिस्तानी सैनिकों की बिछाई बारुदी सुरंग सारी कहानी खुद बयां कर देती है।
मुंबई हमले का मास्टरमाइंड हाफिज सईद पाकिस्तान में बैठकर कश्मीर की लड़ाई तेज करने की बात करता है और आप कहते हो कि हाफिज के खिलाफ सबूत नहीं हैं।
कितना झूठ बोलोगे मलिक साहब...खैर इसमें आपकी भी गलती नहीं है...दरअसल ये आप जैसे अमन के दुश्मन पाकिस्तानियों के खून में ही है।
अपने मुल्क में तो आप अमन कायम कर नहीं पाते...या कहें कि करना ही नहीं चाहते लेकिन भारत में अमन और शांति आपको बर्दाश्त नहीं होती..! इसलिए ही आप भारत में आते हो तो मुंबई हमले की तुलना बाबरी विध्वंस से करते हो और पाकिस्तान में बैठकर शाहरुख खान की चिंता करते हो।
आप जितनी मर्जी कोशिश कर लो लेकिन आपके नापाक ईरादे कभी पूरे नहीं होने वाले क्योंकि ये पाकिस्तान नहीं हिंदुस्तान है मलिक साहब हिंदुस्तान..!
ये तो रही रहमान मलिक की बात लेकिन इस मामले में शाहरुख खान की चुप्पी समझ नहीं आती...क्या शाहरुख को मलिक के इस बयान का खुद जवाब नहीं देना चाहिए..?
क्या शाहरुख को वाकई में एक ऐसा इंटरव्टयू देने की जरूरत थी...जो रहमान मलिक को ऐसा बयान देने के लिए प्रेरित करता क्योंकि पाकिस्तान तो ताक में रहता है ऐसे बयानों की...जिसके सहारे वह भारत को निशाना बना सके और मुस्लिमों की भावनाओं से खिलवाड़ कर सके।
शाहरुख कहते हैं कि- ‘मैं कभी-कभी राजनीतिज्ञों के लिए एक बेपरवाह वस्तु हो जाता हूं। वे उन सभी चीजों के लिए मुझे एक प्रतीक के रूप में लेते हैं, जिन्हें वे मुस्लिमों के बारे में गलत समझते हैं।’ 
शाहरुख साहब आपको कभी कभी ऐसे बयानों का दर्द हो रहा है लेकिन आपको भारत के 121 करोड़ लोगों को वो प्यार याद नहीं आता जो आपको हिंदुस्तान में मिलता आया है और मिल रहा है..!
आपकी एक एक झलक पाने के लिए आपके करोडों फैंस की दीवानगी आपको नजर नहीं आती खान साहब..!
कुछ तो बोलो खान साहब...देश की जनता आपको सुनना चाहती है...आपके करोड़ों फैंस रहमान मलिक की टिप्पणी पर आपका मन जानना चाहते हैं...कुछ तो बोलो..चुप रहकर तो आप हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरह रहमान मलिक का हौसला ही बढ़ा रहे हो।

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सोमवार, 28 जनवरी 2013

राजनाथ- क्या धुलेगा 2009 का दाग ?


2005 में जब राजनाथ सिंह ने भाजपा की कमान संभाली थी तो भाजपा विपक्ष में थी। आम चुनाव में चार साल का वक्त था और राजनाथ सिंह के कंधे पर भाजपा को 2009 में वापस सत्ता में लाने की जिम्मेदारी थी। राजनाथ सिंह को भी पूरा भरोसा था कि वे 2009 में केन्द्र में एनडीए की सरकार बनाने में सफल होंगे लेकिन जब 2009 में चुनाव नतीजे आए तो भाजपा का सत्ता में आना तो दूर उल्टा भाजपा की सीटों की संख्या 2004 के मुकाबले कम हो गई।
2004 में जहां भाजपा ने 138 सीटों जीती थी वहीं 2009 में भाजपा की सीटों संख्या 116 रह गई यानि सत्ता में आने का ख्वाब देख रही भाजपा को 22 सीटों का बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। ऐसे में एक बार फिर से राजनाथ सिंह के हाथ भाजपा की कमान है तो सवाल ये उठता है कि क्या राजनाथ सिंह 2005 से 2009 तक भाजपा अध्यक्ष रहने के दौरान उन पर 2009 के आम चुनाव में असफलता का जो दाग लगा है उसको 2014 में धो पाने में कामयाब होंगे..? वो भी जब उन्होंने पार्टी की कमान ऐसे वक्त पर संभाली है जब 2014 के आम चुनाव में तकरीबन 15 महीने का ही वक्त है और पार्टी  के सामने चुनाव जीतने से बड़ा सवाल ये उठ रहा है कि आखिर एनडीए की सरकार बनी तो प्रधानमंत्री कौन बनेगा..?
राजनाथ सिंह भले ही पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद 2014 में एनडीए की सरकार बनने का दम भर रहे हों लेकिन राजनाथ के इस दावे की हवा 2009 के आम चुनाव में उनके नेतृत्व में ही भाजपा की करारी हार का जिक्र आते ही निकल जाती है..!
राजनाथ सिंह संघ के भरोसेमंद होने के साथ ही सबको साथ लेकर चलने वाले नेता हो सकते हैं लेकिन उनकी इस योग्यता पर 2009 का आम चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन सवाल खड़ा कर देता है..!
राजनाथ के इस कार्यकाल में उनके लिहाज से अच्छी बात ये है कि उनकी दुश्मन नंबर एक यूपीए सरकार पहले से ही अपने फैसलों को लेकर विवादों के साथ ही उनके मंत्रियों के बयानों को लेकर सवालों में भी है..!
यूपीए-2 सरकार के भ्रष्टाचार, घोटाले राजनाथ सिंह की राह आसान कर देते हैं तो सरकार के खिलाफ अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल और बाबा रामदेव के आंदोलनों से बदली देश की फिजा भी राजनाथ के लिए संजीवनी साबित हो सकती है। लेकिन राजनाथ सिर्फ इन सब के भरोसा 2014 में पार्टी की नैया पार नहीं लगा सकते इसके लिए राजनाथ को पिछली गलतियों से भी सबक लेना होगा कि आखिर 2009 में ऐसी क्या चूक वे कर गए कि भाजपा को फायदा होने की बजाए 22 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा।    
राजनाथ सिंह को पार्टी के नेताओं को भरोसे में लेने के साथ ही एनडीए में भाजपा के सहयोगियों को भी साथ लेकर चलना होगा फिर चाहे वो सहयोगियों के लिए सीटें छोड़ने की बात हो या फिर नेतृत्व को लेकर उठने वाले सवाल। क्योंकि भाजपा अगर अपनी सीटों की संख्या 200 से ऊपर नहीं ले जा पाती है तो फिर ये सहयोगी ही होंगे जो केन्द्र की सत्ता के रास्ते या तो आसान कर सकते हैं या फिर राह में रोड़े अटका सकते हैं। हालांकि इस काम में वे माहिर माने जाते हैं लेकिन सरकार बनने की स्थिति में पीएम की कुर्सी को लेकर एनडीए में अंतर्कलह को थामना उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी।
इसके साथ ही राजनाथ सिंह पर अपने फायदे के लिए पार्टी हितों को बलि चढ़ाने के साथ ही जातिगत पक्षपात के भी आरोप लगते रहे हैं ऐसे में राजनाथ सिंह को पार्टी अध्यक्ष के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल में इस सब से दूर रहते हुए भी खुद को साबित करना होगा।   
समय कम हैं लेकिन चुनौती बड़ी...देखते हैं राजनाथ सिंह इससे पार पा पाएंगे या नहीं..!

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रविवार, 27 जनवरी 2013

मोदी के आगे राजनाथ भी नतमस्तक !

2014 का चुनाव करीब है ऐसे में केन्द्र की सत्ता में काबिज होने को बेचैन भाजपा में ये सवाल जोरों से उठ रहा है कि अगर 2014 में एनडीए की सरकार बन गई तो प्रधानमंत्री कौन बनेगा..? भाजपा के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी की भी इच्छा तो होगी ही लेकिन अफसोस उनकी ये हसरत पूरी तो होगी नहीं..! दौड़ में तो और भी बहुत नेता हैं जिनमें सुषमा स्वराज, अरुण जेटली के अलावा अब राजनाथ सिंह का नाम भी जुड़ गया है लेकिन जिस नाम का जिक्र मैंने अभी तक नहीं किया वही दौड़ में सबसे आगे दिखाई दे रहा है।
बात गुजरात के सीएम नरेन्द्र मोदी की हो रही है। भले ही वे भाजपा के राष्ट्रीय नेता न हों...गुजरात की राजनीति में सक्रिय हों लेकिन इसके बाद भी वे लोकप्रियता के मामले में भाजपा के तमाम दिग्गज राष्ट्रीय नेताओं से दो कदम आगे ही हैं। विरोधियों को छोड़िए अपनी ही पार्टी में भी वे खासा दम रखते हैं...फिर उनके सामने भले ही पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष क्यों न हो..?
नरेन्द्र मोदी दिल्ली में पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह से मिलने और उनको बधाई देने जब राजनाथ सिंह के निवास पर पहुंचे तो राजनाथ सिंह अपने निवास के बाहर मोदी के स्वागत के लिए पलकें बिछाए बैठे थे। ऐसा लग रहा था कि पार्टी का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने पर मोदी राजनाथ सिंह को नहीं बल्कि राजनाथ सिंह मोदी को बधाई दे रहे हों।
ये पार्टी में मोदी का बढ़ता कद नहीं तो और क्या था कि उनकी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष मोदी के स्वागत के लिए अपने निवास के बाहर खड़ा था..!
क्या किसी और भाजपा शासित राज्य का मुख्यमंत्री पार्टी के नए नवेले राष्ट्रीय अध्यक्ष से मिलने पहुंचे तो राजनाथ सिंह इसी तरह उसका स्वागत करेंगे…उसके स्वागत में अपने निवास के बाहर खड़े मिलेंगे..? लेकिन मोदी के मामले में ऐसा हुआ क्योंकि राजनाथ सिंह ये जानते हैं कि 2009 के आम चुनाव में उनके नेतृत्व में भाजपा की हार का जो दाग उनके माथे पर लगा है…वो दाग 2014 में केन्द्र में एनडीए की सरकार बनवाकर कोई शख्स अगर मिटा सकता है तो वो शख्स कोई और नहीं नरेन्द्र मोदी ही है। ऐसे में क्यों न पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष मोदी के स्वागत में पलकें बिछाए अपने निवास के बाहर खड़ा हो। सही कहा न राजनाथ सिंह जी।

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दलित, पिछड़े सबसे भ्रष्ट..!


गणतंत्र दिवस पर समाजशास्त्री आशीष नंदी ने अपने विचारों के गणतंत्र से  नया भूचाल पैदा कर दिया। आशीष नंदी कहते हैं कि भारत में दलित और पिछड़े ही सबसे ज्यादा भ्रष्ट हैं..! नंदी साहब इसके पीछे पश्चिम बंगाल का एक उदाहरण भी देते हुए कहते हैं कि पश्चिम बंगाल में पिछले 100 सालों में दलितों और पिछड़ों को सत्ता के नजदीक आने का मौका नहीं मिला इसलिए वहां पर भ्रष्टाचार कम हैं..!
आशीष नंदी साहब की बात अगर सही है फिर तो इसका एक और मतलब ये निकलता है कि भ्रष्टाचार का जीन तो दलितों और पिछड़ों के खून में है और फिर तो ये बड़ी ही खतरनाक स्थिति है..!
ऐसे में तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को तत्काल अपने मंत्रिमंडल से दलित और पिछड़े वर्ग के मंत्रियों को निकाल बाहर करना चाहिए..!
लोकसभा अध्यक्ष पद से मीरा कुमार को हटा देना चाहिए..!
सरकार को सभी सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को नौकरी से बर्खास्त कर देना चाहिए..!
सरकार को दलितों और पिछड़ों के लिए चलाई जा रही सारी योजनाओं पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा देनी चाहिए..!
आशीष नंदी साहब आपने तो कमाल कर दिया...जिस भ्रष्टाचार रूपी कैंसर को खत्म करने में बड़े-बड़े नाकाम हो गए आपने तो उसकी जड़ ही पकड़ ली..! आपकी बात पर अमल करते हुए सरकार को तो अब भ्रष्टाचार की जड़ को ही उखाड़ फेंकना चाहिए ताकि भारत से भ्रष्टाचार खत्म हो जाए..!
नंदी साहब आप तो समाजशात्री और आलोचक ठहरे...भ्रष्टाचार पर आपने चिंता की बड़ा अच्छा लगा लेकिन आपने तो दलितों और पिछड़ों पर ही सवाल खड़ा कर दिया। माना साहित्य सम्मेलन हर मुद्दे पर खुली चर्चा के लिए होता है लेकिन आपने तो अपनी जुबान कुछ ज्यादा ही खोल दी। आपने सफाई भी पेश कर दी...माफी भी मांग ली लेकिन क्या इतने भर से आपकी जुबान से छूटे दलितों और पिछड़ों के अपमान के तीर वापस हो जाएंगे..?
नंदी साहब भ्रष्टाचार किसी के खून में नहीं होता और न ही इसका किसी धर्म या जाति से कोई लेना देना है। भ्रष्टाचार तो नेता(सभी नहीं) भी करते हैं, अधिकारी- कर्मचारी(सभी नहीं) भी करते हैं, छोटे-बड़े व्यापारी(सभी नहीं) भी करते हैं, आम आदमी(सभी नहीं) भी करते हैं…लेकिन आपने तो भ्रष्टाचार की जाति और वर्ग ही तय कर दिया..!
पैसे पर जिसकी नीयत खराब हो जाती है नंदी साहब वो ही भ्रष्टाचारी हो जाता है बस भ्रष्टाचार करने के तरीके अलग – अलग होते हैं...कोई ज्यादा करता है तो कोई कम करता है।
चलिए नंदी साहब आपने अपने कहे पर सफाई भी दे दी, माफी भी मांग ली, आपके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हो गई...आखिर जयपुर साहित्य सम्मेलन की सारी सुर्खियां भी तो आपने बटोर ही ली...इस बात का तो संतोष होगा ही आपको..! आजकल को ट्रेंड भी इस चीज का।

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2014- नरेन्द्र मोदी बनेंगे प्रधानमंत्री !

2014- नरेन्द्र मोदी बनेंगे प्रधानमंत्री !
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर कोई कुछ बोले लेकिन जब बात 2014 की होती है तो मोदी का जिक्र खुद ब खुद आ जाता है। कांग्रेस में राहुल गांधी को उपाध्यक्ष बनाकर नंबर दो की पोजीशन में बैठा दिया जाता है तो 2014 में मोदी बनाम राहुल पर चर्चा होती है। सोशल नेटवर्किंग साईट्स से लेकर तमाम ओपिनियन पोल मोदी बनाम राहुल पर केन्द्रित दिखाई दे रहे हैं और भाजपा के लिए खुशी की वजह हो सकती है कि मोदी हर जगह राहुल गांधी पर भारी दिखाई देते हैं हालांकि कांग्रेसी इससे इत्तेफाक नहीं रखते लेकिन इससे मुंह मोड़ना कांग्रेसियों के लिए इतना आसान भी नहीं है।
ऐसे में केन्द्र की सत्ता में वापस लौटने को बेताब दिखाई दे रही भाजपा मोदी को निकट भविष्य में इलेक्शन कैंपेन कमेटी का प्रभारी नियुक्त कर दे तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। ये बात सही है कि मोदी सर्वाधिक लोकप्रिय होने के बावजूद एनडीए के साथ ही भाजपा में भी फिलहाल सर्व स्वीकार्य नेता नहीं हैं लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि मोदी फिलहाल राष्ट्रीय राजनीति में न होकर भी तमाम राजनीतिक दलों के राष्ट्रीय नेताओं पर भारी पड़ते हैं।
मोदी के दामन में गोधरा का दाग जरूर है लेकिन गुजरात को बिना रूके विकास के पाथ पर आगे ले जाने का श्रेय भी मोदी के ही पास है। हालिया विधानसभा चुनाव में गुजरात की जनता ने इस पर मुहर लगाकर इस बात को साबित भी कर दिया है कि वे उसी का साथ देंगे जो विकास की बात करेगा।  
2014 के मद्देनजर मोदी को भाजपा अगर इलेक्शन कैंपेन कमेटी का प्रभारी नियुक्त करती है तो इससे न सिर्फ मोदी का कद पार्टी में और बढ़ जाएगा बल्कि ये संकेत भी होगी कि भाजपा ये मान चुकी है कि मोदी के बिना 2014 फतह करना आसान नहीं है। महंगाई, भ्रष्टाचार और घोटालों के साथ ही आर्थिक मोर्चे पर यूपीए 2 सरकार के कई फैसलों के खिलाफ जनता की नाराजगी के बावजूद भी 2014 की राह भाजपा के लिए इतनी आसान नहीं है जितनी वास्तव में दिखाई दे रही है लेकिन माना भाजपा 2014 फतह कर भी लेती है तो सबसे बड़ा सवाल ये खड़ा होगा कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा..?
जाहिर है प्रधानमंत्री भाजपा का ही होगा और नरेन्द्र मोदी का नाम दूसरे नामों से बहुत आगे है लेकिन मोदी के नाम को लेकर भाजपा में अंतर्विरोध छिपा नहीं है ऐसे में एनडीए से पहले भाजपा को पूरी पार्टी को मोदी के नाम पर एकमत करना होगा जो काम आसान तो नहीं है लेकिन बहुत मुश्किल भी नहीं है मतलब मोदी के नाम पर भाजपा में सहमति बन सकती है..! लेकिन भाजपा की मुश्किल यहीं आसान नहीं हो जाती क्योंकि पार्टी के बाद एनडीए में मोदी के नाम पर सर्वसम्मति बनाना ही सबसे बड़ी चुनौती होगी।
यहां पर एनडीए का मुख्य घटक जद यू ही मोदी की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है...बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और मोदी की खटपट किसी से छिपी नहीं है ऐसे में भाजपा के लिए पीएम की कुर्सी के लिए मोदी के नाम पर जद यू को राजी करना ही होगा..!
बहरहाल 2014 में जनता किसका साथ देगी और देश का अगला प्रधानमंत्री कौन बनेगा ये तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन तमाम ओपिनियन पोल और सोशल नेटवर्किंग साईट्स में सिर्फ दो ही नाम चर्चा में हैं...नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी। इन दोनों नामों में भी नरेन्द्र मोदी राहुल गांधी को पीछे छोड़ते नजर आ रहे हैं।   

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शनिवार, 26 जनवरी 2013

ये वही राजपथ है...वही “गण’ ‘तंत्र” है !


चारों तरफ गणतंत्र दिवस की धूम है...हो भी क्यों न आज से 63 साल पहले 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान आज ही के दिन लागू हुआ था। भारत का संविधान अस्तित्व में आने के बाद भारत एक संप्रभु देश बना था। दिल्ली में आज राष्ट्रपति ने तिरंगा फहराया जिसके बाद राजपाथ में जमीन से आसमान तक भारत की बहुमूल्य संस्कृति और सैन्य ताकत का भव्य नजारा दिखाई दिया।
राज्यों की रंग बिरंगी संस्कृति से देश रूबरु हुआ तो विश्व शक्ति बनने की ओर अग्रसर भारत ने दुनिया को अपनी ताकत का एहसास भी कराया। पांच हजार किलोमीटर से अधिक दूरी तक मार करने वाली अग्नि-5 मिसाइल के साथ ही अवॉक्स प्रणाली और पानी के भीतर दुश्मन की निगरानी में सक्षम नौसैनिक सोनार प्रणाली की भी नुमाइश हुई तो अर्जुन टैंक, सर्वत्र पुल, पिनाक मल्टी बैरल रॉकेट लांचर सिस्टम भी नजर आया। वहीं  इस साल नौसेना में शामिल होने वाले विमानवाहक पोत आइएनएस विक्रमादित्य का लघु संस्करण भी परेड में दिखा।
64वें गणतंत्र दिवस पर राजपथ देश प्रेम से ओतप्रोत दिखाई दे रहा था लेकिन इस गणतंत्र दिवस पर हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि जिस राजपथ पर देश की संस्कृति और सैन्य ताकत पर आज हम इठला रहे हैं...इस राजपथ पर दिसंबर में दिल्ली गैंगरेप के खिलाफ देश के युवाओं में जबरदस्त आक्रोश देखने को मिला था। उस वक्त न तो देश के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी राष्ट्रपति भवन से बाहर निकले न ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने युवा आक्रोश को समझने की कोशिश की। देश के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने तो इनकी तुलना नक्सलियों से तक कर दी थी।
राजपाथ पर युवाओं को न सिर्फ अपनी आवाज बुलंद करने से रोका गया बल्कि दिल्ली पुलिस ने तो उन पर पानी की बौछार करने के साथ ही लाठियां भांजने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हालांकि देर से ही सही लेकिन राजपाथ पर उमड़ा युवाओं का आक्रोश रंग भी लाया और सरकार न सिर्फ महिलाओं की सुरक्षा के प्रति संजीदा दिखाई दी बल्कि महिला अपराधों को रोकने के लिए कड़े कदम उठाने की कवायद भी शुरु हुई।
गणतंत्र दिवस से ठीक पहले जनवरी के पहले सप्ताह में सीमा पर पाकिस्तानी सैनिकों की बर्बरता ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था लेकिन उस वक्त पाकिस्तान को मुंहतोड़  जवाब देना तो दूर हमारे प्रधानमंत्री को मुंह खोलने में पूरे एक सप्ताह का वक्त लग गया। इस घटना के बाद भारत के कमजोर और ढीले रवैये ने दुश्मन के हौसले को बढ़ाने का ही काम किया फिर वो एक हफ्ते बाद पीएम की चुप्पी टूटने की बात हो या फिर गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे का गैर जिम्मेदाराना बयान।
अहम मुद्दों पर देर से चुप्पी तोड़ने वाले हमारे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने इस गणतंत्र दिवस पर तमाम मुद्दों के अलावा महिलाओं को सुरक्षा का भरोसा देने के साथ ही पाक की बर्बर कार्रवाई पर पाकिस्तान को चेताया तो है...लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या सिर्फ महिलाओं को सुरक्षा का भरोसा महिलाओं के साथ हो रहे अपराध को कम कर पाएगा या फिर पाकिस्तान को चेतावनी मात्र देने से सीमा पर ऐसी घटनाएं दोबारा नहीं होंगी..?
क्या ये वक्त नहीं है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए सिर्फ जांच कमेटी, रिपोर्टों से आगे बढ़कर इस दिशा में न सिर्फ ठोस कदम उठाए जाएं बल्कि उनका क्रियान्वयन भी हो..? क्या ये वक्त नहीं कि सीमा पर बर्बरता दिखाने वाले पाकिस्तान को सबक सिखाया जाए बजाए इसके कि हमारी सरकार में शामिल लोग हिंदू आतंकवाद जैसे बयान देकर उनकी हौसला अफज़ाई करें..?
उम्मीद करते हैं इस गणतंत्र दिवस के बाद से एक नई शुरुआत होगी...महिलाएं बिना डर के घर से बाहर निकलने की हिम्मत जुटा पाएंगी तो भारत की तरफ पलटकर देखने से पहले पाकिस्तान सौ बार सोचेगा..! हालांकि ये बात सही है कि इसके लिए सिर्फ “तंत्र” को ही नहीं बल्कि “गण” को भी संकल्प लेना होगा इसी उम्मीद के साथ आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।। जय हिंद ।।

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शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

राष्ट्रपति का संबोधन- हिंदी और अफजल गुरु गायब !


26 जनवरी की पूर्व संध्या पर डीडी न्यूज पर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का देश के नाम संबोधन सुना। राष्ट्रपति ने पहले अंग्रेजी में देश को संबोधित किया तो उसके बाद हिंदी में संबोधन की जानकारी टीवी स्क्रीन पर फ्लैश हुई तो पता चला कि प्रणव मुखर्जी साहब हिंदी में भी बोलते हैं लेकिन दुख के साथ ही हैरानी तब हुई जब देखा कि राष्ट्रपति जी अंग्रेजी में ही बोल रहे हैं और दाहिनी तरफ नीचे एक छोटी विंडो में डीडी न्यूज का एक एंकर उसका हिंदी में अनुवाद कर रहा था। देश है हिदुंस्तान लेकिन देश के राष्ट्रपति आम दिन तो छोड़िए गणतंत्र दिवस पर भी हिंदी बोलने से परहेज करते दिखाई दिए।
14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एकमत से यह निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी औऱ तब से ही हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। दुनिया में करीब 60 करोड़ लोग हिंदी बोलते हैं और भारत में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए सरकारी दफ्तरों में भी हिंदी को ही तरजीह देने की बातें की जाती हैं लेकिन जब देश का प्रथम नागरिक गणतंत्र दिवस पर 121 करोड़ भारतीयों के सामने हिंदी को तिलांजलि देकर अंग्रेजी को तरजीह देते हुए दिखाई देता है तो दुख होना लाजिमी है।
चलिए अंग्रेजी के ही सही राष्ट्रपति के संबोधन की अगर बात करें तो वैसे तो ये संबोधन अपने आप में सब कुछ समेटे हुए था लेकिन पूरा सुनने के बाद यहां भी एक उम्मीद धराशायी होती दिखाई दी। राष्ट्रपति ने 1947 से लेकर 2013 तक की बात की। दिल्ली गैंगरेप की घटना पर चिंता जतायी तो सीमा पर पाकिस्तान की बर्बरता पर दुख जताते हुए पाकिस्तान को चेताया भी। प्रणव मुखर्जी ने युवाओं की चिंता की तो साथ ही आने वाले 10 सालों में पिछले 60 सालों से ज्यादा तरक्की और बदलाव की उम्मीद भी जतायी।
राष्ट्रपति ने महत्वपूर्ण मुद्दों पर चिंता जताते हुए लोगों को नया सवेरा होने का भरोसा तो दिलाया लेकिन बड़ा अच्छा लगता अगर राष्ट्रपति अपने भाषण की शुरूआत संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु की दया याचिका खारिज करने की बात के साथ करते। चूंकि 2005 से अफजल की दया याचिका गृह मंत्रालय से राष्ट्रपति भवन के बीच घूम रही है ऐसे में राष्ट्रपति अपने दफ्तर से एक फाइल और देश से एक आतंकी को कम करने की शुरुआत करते तो अच्छा लगता लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ..!
राष्ट्रपति ने आतंकवाद से लेकर नक्सलवाद तक पर चिंता जतायी लेकिन प्रणव मुखर्जी संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु के नाम पर आतंक के अंत का पहला अध्याय गणतंत्र दिवस पर अपने हाथों से लिखते तो शायद देशवासियों की खुशी दोगुनी हो जाती लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ।
राष्ट्रपति ने भारत की चुप्पी को उसकी कमजोरी न समझने की चेतावनी तो पाकिस्तान को दी लेकिन लोकतंत्र के मंदिर पर हमला करने वाले की फांसी का रास्ता साफ करने के साथ प्रणव मुखर्जी पाकिस्तान को चेतावनी देते तो ये ज्यादा असरदार होती लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ।
64वें गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के संबोधन ने देशवासियों की उम्मीदों को नए पंख लगाने की कोशिश तो की लेकिन ये कोशिश वास्तव में कितनी साकार हो पाएगी ये तो वक्त ही बताएगा।
उम्मीद करते हैं आने वाली 15 अगस्त पर राष्ट्रपति का संबोधिन देश को हिंदी में सुनने को मिलेगा और अफजल गुरु की फांसी का रास्ता साफ होने का जिक्र भी राष्ट्रपति के संबोधन में होगा...इसी उम्मीद के साथ आप सभी को 64वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। जय हिंद।

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हेडली पर हल्ला...अफजल पर खामोश क्यों..?


मुंबई आतंकी के हमले में मदद करने के आरोपी डेविड हेडली को अमेरिकी अदालत ने भले ही 35 साल कैद की सजा सुनी दी हो लेकिन भारत सरकार ने हेडली को दी गई सजा को नाकाफी बताते हुए कहा कि हेडली को मृत्युदंड दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही भारत ने अमेरिका से हेडली के प्रत्यपर्ण की भी मांग दोहराई है।
निश्चित तौर पर मुंबई हमला जिसमें 6 अमेरिकी समेत 166 लोगों की मौत हो गई थी में शामिल आतंकी हेडली को बख्शा नहीं जाना चाहिए और उसे मौत की सजा दी जानी चाहिए लेकिन क्या भारत सरकार के साथ ही कांग्रेस के नेताओं को ये कहने का हक है...? ये सवाल आपको भले ही अटपटा लगे लेकिन भारत की संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु को घटना के 12 साल बाद भी फांसी की सजा न होना और अफजल की फांसी को लटकाए रखने के सवाल के बाद शायद आप इस बात से सहमत हों कि सरकार हेडली को मौत की सजा की मांग करने का हक क्यों नहीं है..?
सरकार हेडली के भारत प्रत्यर्पण के बाद भारतीय अदालत में केस चलाने की बात कर रही है लेकिन अफजल को फांसी क्यों नहीं दी गई इसका जवाब हमारी सरकार के पास नहीं है जबकि सुप्रीम कोर्ट 4 अगस्त 2005 को अफजल की फांसी की सजा पर मुहर लगा चुका है। 13 दिसंबर 2012 को हमारे गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा था कि वे 22 दिसंबर 2012 को संसद का शीतकालीन सत्र समाप्त होने के बाद अफजल गुरु की फाइल पढ़ेंगे लेकिन शिंदे के पास हिंदुओं को तो आतंकवादी साबित करने का समय है लेकिन संसद पर हमले के आरोपी अफजल की फाइल पढ़ने का वक्त नहीं है..!
मुंबई हमले के आरोपी कसाब का केस ही ले लें...कसाब की फांसी की फाइल लंबे समय तक राष्ट्रपति और गृहमंत्रालय के बीच घूमती रहती है और आखिरकार लंबी जद्दोजहद के बाद एक दिन गुपचुप कसाब को फांसी दे दी जाती है...हालांकि कहा तो ये तक जा रहा है कि कसाब की मौत डेंगू से हो गई थी..!   
ये सवाल इसलिए भी उठते हैं क्योंकि हमारी सरकार का रवैया सीमा पार से घुसपैठ पर भारत में घुसकर वारदात को अंजाम देने वाले आतंकियों के प्रति तो नरम दिखाई देता है लेकिन हमारे देश के गृहमंत्री हिंदू आतंकवाद के नाम को जन्म देकर दुनिया में ये साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते कि भारत एक आतंकवादी राष्ट्र है..!
हमारी सरकार खुद को हाथ पर हाथ धर कर बैठी है लेकिन अमेरिका में हेडली को सजा सुनाई जाती है तो आप उस पर बयान देने में देर नहीं करते। हम सरकार की इस मांग के साथ हैं कि हेडली का प्रत्यर्पण हो और उसे मौत की सजा मिले लेकिन मन में आशंका भी उत्पन्न होती है कि प्रत्यर्पण के बाद अगर हेडली को फांसी की सजा हो भी गई तो क्या गारंटी है कि हेडली को फांसी पर लटका दिया जाएगा..? क्या गारंटी है कि हेडली देश का दूसरा अफजल गुरु नहीं बनेगा..? जब तक सरकार संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु को फांसी नहीं देगी तब तक सरकार की नीयत पर सवाल उठते रहेंगे।

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गुरुवार, 24 जनवरी 2013

नहीं चाहते दलित गृहमंत्री..!


गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने आंतकवाद को धर्म और जाति से जोड़कर अल्पसंख्यक वोटों के लिए “हिंदू आतंकवाद” के नाम को जन्म क्या दिया मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा ने इसे राष्ट्र अपमान से जुड़ा मुद्दा बताते हुए सड़क से संसद तक आर पार की लड़ाई का एलान कर दिया है। कांग्रेस ने शिंदे के बयान से किनारा जरूर कर लिया है लेकिन विवादित बयान देने में माहिर कांग्रेस के पेटेंट नेता दिग्विजय सिंह ने एक तीर से दो निशाने साधते हुए इस मुद्दे पर आरपार की लड़ाई का एलान कर चुकी भाजपा पर ही दलित विरोधी होने का आरोप लगाते हुए पलटवार कर दिया है।
दिग्विजय सिंह कहते हैं कि भाजपा को एक दलित गृहमंत्री बर्दाश्त नहीं हो रहा है इसलिए भाजपा गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे का इस्तीफा मांग रही है। दिग्विजय सिंह ने न सिर्फ इस बयान के जरिए अल्पसंख्यक वोटबैंक के लिए कांग्रेस की इस चाल का बचाव किया है बल्कि गृहमंत्री शिंदे की जाति के नाम पर भाजपा पर वार करते हुए दलित वोटबैंक पर भी सेंध लगाने की कोशिश की है।
शिंदे की आलोचना के बाद कांग्रेस भले ही गृहमंत्री के बयान से किनारा करते हुए आतंकवाद की कोई धर्म या जाति न होने की बात कर रही हो लेकिन कांग्रेस का दोहरा चरित्र देखिए दिग्विजय सिंह सरीखे नेता बार बार शिंदे के बयान का समर्थन करते हैं। यानि कांग्रेस ने शिंदे बयान से किनारा भी कर लिया और अपने कुछ नेताओं को इसका समर्थन करने के लिए खुला छोड़ कर इसके बहाने अल्पसंख्यक वोटबैंक को झपटने की भी कोशिश कांग्रेस कर रही है। दिग्विजय सिंह तो दो कदम आगे निकलकर अब दलित वोटबैंक पर भी नजरें गड़ा दी हैं।
इस सब से ये तो जाहिर होता ही है कि राजनीतिक दल और उनके नेता वोटबैंक के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं और इसके लिए नैतिक अनैतिक हथकंडे अपनाने से भी परहेज नहीं करते। 2014 के आम चुनाव से पहले जयपुर में कांग्रेस के चिंतन शिविर में गृहमंत्री के श्रीमुख से निकला हिंदू आतंकवाद शब्द भी इसकी एक कड़ी है...जिसे आगे बढ़ाया दिग्विजय सिंह सरीखे नेताओं ने।
बहरहाल “हिंदू आतंकवाद” के शब्द को जन्म देने वाले गृहमंत्री शिंदे के बयान को कहीं से भी सही नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि आतंकवाद की न तो कोई जाति होती और न ही धर्म...ऐसे में शिंदे के साथ ही उनके बयान का समर्थन करने वाले कांग्रेसी नेताओं मणिशंकर अय्यर, कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और सलमान खुर्शीद जैसे दूसरे तमाम कांग्रेसी नेताओं की सोच पर तरस आता है और इससे भी ज्यादा तरस आता है इस देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी कहलाने वाले कांग्रेस पर..!
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सरकार बनी तो देख लेंगे..!


भाजपा अध्यक्ष पद पर गडकरी की दोबारा ताजपोशी करने के लिए भाजपा ने पार्टी के संविधान में तक संशोधन कर डाला लेकिन गडकरी के सितारे कुछ ज्यादा ही गर्दिश में थे जिसके चलते आखिरी वक्त में गडकरी की कुर्सी खिसक गई और राजनाथ सिंह बन गए भाजपा अध्यक्ष। कुर्सी जाने के अगले ही दिन नागपुर में गडकरी का नया रंग भी देखने को मिला। गडकरी न सिर्फ खुद के निर्दोष होने के दावा करते हैं बल्कि पूर्ति ग्रुप की सहयोगी कंपनियों पर आयकर सर्वे को साजिश करार देते हैं।
गडकरी यहां रूक जाते तो ठीक था लेकिन गडकरी ने तो आयकर विभाग के अधिकारियों को खुली धमकी दे डाली और कहने लगे कि अगर भाजपा सत्ता में आ गई तो उन्हें बचाने सोनिया गांधी या पी चिदंबरम नहीं आने वाले। गडकरी ने कांग्रेस पर प्रहार करते हुए ये तक कह डाला कि कांग्रेस में एक मालकिन हैं और बाकी सब नौकर। अध्यक्ष न बनने पर गडकरी का दर्द समझा जा सकता है लेकिन ये दर्द 24 घंटों में ही बौखलाहट के रूप में निकल कर सामने आएगा इसकी उम्मीद नहीं थी।
जाहिर है भाजपा अध्यक्ष पद की कुर्सी को लेकर गडकरी का दर्द इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि गडकरी की कुर्सी उस वक्त पर खिसकी जब शायद गडकरी ये मान कर निश्चिंत हो गए होंगे की उनकी राह अब आसान है लेकिन ऐन वक्त पर पूर्ति ग्रुप से जुड़ी कंपनियों पर आयकर विभाग के सर्वे ने सारा खेल बिगाड़ दिया ऐसे में गडकरी को गुस्सा तो आना ही था..! अब ये अलग बात है कि गडकरी की ये बौखलाहट नागपुर में अपने समर्थकों के सामने बाहर आई।
नागपुर में गडकरी भले ही अब अध्यक्ष पद की मर्यादा में न बंधे होने की बात कहते हुए विरोधियों को सबक सिखाने की बात कर रहे हैं लेकिन भाजपा अध्यक्ष रहते हुए...मर्यादा में बंधे रहते हुए भी गडकरी ने शायद ही कभी इस मर्यादा को निभाया हो क्योंकि ये गडकरी ही हैं जिन्होंने स्वामी विवेकानंद की तुलना अंडरवर्लड डॉन दाऊद इब्राहम से कर दी थी।
ये गडकरी ही थे जिन्होंने भदोही की औराई विधानसभा सीट में चुनाव प्रचार के दौरान रैली को संबोधित करते हुए विरोधी पार्टियों के नेताओं के लिए कहा था कि...‘इधर गधे-उधर गधे, सब तरफ गधे ही गधे, अच्छे घोड़ों को नहीं घास और गधे खा रहे हैं च्यवनप्राश’। 
ये गडकरी ही थे जिन्होंने संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु को कांग्रेस के दामाद कहकर बवाल मचा दिया था। इसके अलावा भी कई बार गडकरी अपनी जबान नहीं संभाल पाए थे। 
अब तो गडकरी अध्यक्ष रहे नहीं...गडकरी के हिसाब से वे अब पद की मर्यादा में भी नहीं बंधे हैं ऐसे में देखना ये होगा कि आने वाले दिनों में गडकरी अपनी जुबान संभाल पाते हैं या फिर उनकी फिसलन भरी जुबान समय समय पर सियासी भूचाल पैदा करती रहेगी। 
बहरहाल गडकरी की इस बयान से इतना जरूर साबित हो गया है कि सत्ता में रहने पर नेता अधिकारियों पर किस कदर रौब जमाते होंगे और नेताओं का आज्ञाकारी न बनने पर सरकारी अधिकारियों कर्मचारियों की क्या हालत होती होगी क्योंकि जब विपक्ष में रहकर गडकरी जैसे नेता आयकर विभाग के अधिकारियों को खुलेआम धमका सकते हैं तो गलती से सत्ता में आने पर वे क्या गुल नहीं खिलाएंगे।  

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बुधवार, 23 जनवरी 2013

लोकतंत्र की हत्या..!


भारतीय जनता पार्टी को आखिर राजनाथ सिंह के रूप में नया राष्ट्रीय अध्यक्ष मिल ही गया। पार्टी विद डिफरेंस और आंतरिक लोकतंत्र की बात करने वाली भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चयन भले ही निर्विरोध हुआ हो लेकिन ये चयन अपने आप में कई सवाल खड़े कर गया..! क्या पार्टी का कोई भी नेता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का इच्छुक नहीं था..? क्या गडकरी के चुनाव लड़ने इंकार करने के बाद क्या राजनाथ सिंह वाकई में अपनी मर्जी से पार्टी अध्यक्ष बनना चाहते थे..?
जाहिर है ऐसा नहीं रहा होगा और कई भाजपा नेताओं के मन में पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का सपना रहा होगा या कहें अभी भी जिंदा होगा लेकिन फिर सवाल उठता है कि इंटरनल डेमोक्रेसी की बात करने वाली भाजपा ने क्यों 2009 में गडकरी की तरह इस बार गडकरी के नाम पर विरोध के बाद राजनाथ सिंह को अध्यक्ष बना दिया। क्यों पार्टी ने अध्यक्ष पद के लिए चुनाव कराकर भी एक तरह से नहीं कराया..? हालांकि इस सवाल का जवाब भाजपा नेता कुछ यूं देंगे कि किसी भी नेता ने नामांकन ही नहीं कराया ऐसे में राजनाथ को निर्विरोध चुना गया और ये चुनावी प्रक्रिया के तहत हुआ है लेकिन क्या वास्तव में ऐसा ही हुआ है जैसा दिख रहा है या भाजपा द्वारा दिखाया जा रहा है..!
भाजपा नेता कुछ भी कहें लेकिन पर्दे की पीछे की सच्चाई भाजपा के इंटरनल डेमोक्रेसी के दावे को खोखला बनाती नजर आती है और ये सब संचालित हो रहा है एक्सटरनल ताकतों(आरएसएस) के द्वारा। दरअसल ये सौ फीसदी सच है कि भाजपा में वही होता है जो संघ चाहता है...वही 2009 में गडकरी को अध्यक्ष भी बनाता है और वही 2013 में भी गडकरी को दोबारा अध्यक्ष बनाना चाहता था...इसके लिए बकायदा पार्टी के संविधान में संशोधन भी होता है लेकिन गडकरी की कंपनी पर घालमेल के आरोप पर भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के विरोध के चलते गडकरी दोबारा अध्यक्ष नहीं बन पाए लेकिन इसके बाद भी राजनाथ सिंह का अध्यक्ष बनना भी संघ की मर्जी से ही संभव हुआ है।
बात सिर्फ राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी तक ही सीमित रहती तो समझ में आता है लेकिन अमूमन यही हाल भाजपा में प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव से लेकर तमाम छोटे बड़े पदों पर नेताओं की नियुक्ति पर भी होता है। ज्यादा दूर या पीछे जाए बिना अगर उत्तराखंड राज्य का ही उदाहरण ले लें तो तस्वीर साफ हो जाती है कि भाजपा में इंटरनल डेमोक्रेसी की कैसे पार्टी का शीर्ष नेतृत्व खुद धज्जियां उड़ाता है। उत्तराखंड प्रदेश अध्यक्ष का मसला चुनाव की तारीख घोषित होने के बाद भी नहीं तय हो पाया है क्योंकि कुर्सी के लिए एक नाम पर सहमति नहीं है और दो नेता अध्यक्ष का चुनाव लड़ना चाहते थे।
दोनों नेताओं तीरथ सिंह रावत और त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने बकायदा नामांकन भी दाखिल कर दिया लेकिन पार्टी ने चुनाव कराने की बजाए नाम वापस लेने की तारीख आगे बढ़ा दी ताकि दोनों पर नाम वापस लेने के लिए दबाव बनाया जा सके और दोनों के नाम वापस लेने के बाद आलाकमान अपनी पसंद के व्यक्ति को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठा सके। आखिर में यही हुआ और दोनों ने अपना नाम वापस ले लिया और अब सबको इंतजार है आलाकमान की पसंद के प्रदेश अध्यक्ष का..! समझा जा सकता है कि भाजपा में इंटरनल डेमोक्रेसी को कैसे एक्सटरनल ताकतें(संघ) कंट्रोल कर रही हैं और पार्टी नेता चाहकर भी मुंह नहीं खोल पाते।
ऐसा नहीं है कि ये हाल सिर्फ भाजपा में ही है...देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस में भी कुछ ऐसा ही है वहां पर एक्सटरनल ताकत एक परिवार है और वो है गांधी परिवार जो कांग्रेस का पर्याय भी है। शुरु से परिवारवाद ही पार्टी में हावी रहा है। यहां पर एक ही परिवार पूरा पार्टी को चलाता है इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी के उदाहरण हमारे सामने हैं। जाहिर है इच्छाएं यहां भी नेताओं की कुलाचें भरती होंगे लेकिन आलाकमान के फैसले के आगे सब मौन हो जाते हैं। पार्टी के शीर्ष पद पर पहुंचने वाले नेताओं की संख्या ऊंगलियों में गिनी जा सकती है जो इस बात को खुद ब खुद साबित करती है।
बहरहाल जो भी हो लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में देश की दो सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों में लोकतंत्र की ये हालत अपने आप में कई सवाल खड़े करती है और मजबूर करती है ये सोचना पर कि क्या ये पार्टियां वाकई में देश चलाने लायक हैं। जिस पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अपनी ही पार्टी के लोकतंत्र की हत्या कर देता है उस पार्टी के नेताओं से कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की रक्षा करेंगे..?

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गडकरी नपे...वाड्रा बचे..!


चारों ओर चर्चा तो भाजपा अध्यक्ष पद से नितिन गडकरी की कुर्सी खिसकने और राजनाथ सिंह के सिर अध्यक्ष पद का ताज सजने की है लेकिन 22 जनवरी 2013 को चंद घंटों के बीच भाजपा में पल पल बदलते समीकरण के पीछे की कहानी की शुरूआत तो दरअसल आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने दो महीने पहले ही कर दी थी जिसका क्लाइमैक्स गडकरी समर्थकों की आंखों में आंसू दे गया तो राजनाथ सिंह समर्थकों के चेहरे पर जीत की खुशी। अंजलि दमानिया के साथ केजरीवाल ने बीते साल अक्टूबर में गडकरी पर किसानों की जमीन हड़पने का गंभीर आरोप लगाया था इसके बाद गडकरी की कंपनी पूर्ति लिमिटेड पर ही सवाल उठ खड़े हुए और गडकरी की कंपनी में निवेश करने वाली कंपनियों के पते ही फर्जी निकले।
आयकर विभाग ने मामले की जांच शुरु की और 22 जनवरी 2को आयकर विभाग के ताजा सर्वे के बाद अध्यक्ष पद पर गडकरी की दोबारा ताजपोशी के बीच गडकरी के खिलाफ विरोध के झंडे बुलंद होने लगे और आखिरकार शाम होते होते गडकरी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और नए अध्यक्ष के रूप में राजनाथ सिंह की ताजपोशी हो गई। हालांकि संघ की मंशा थी कि 2014 का आम चुनाव भाजपा गडकरी के नेतृत्व में ही लड़े और इसके लिए हरियाणा के सूरजकुंड में बीते साल 28 सितंबर 2012 को भाजपा राष्ट्रीय परिषद की बैठक में गडकरी के दूसरे कार्यकाल के लिए बकायदा पार्टी के संविधान में तक संशोधन किया गया लेकिन गडकरी के ये खुशी ज्यादा दिन नही रह पाई और आईएसी कार्यकर्ता अंजलि दमानिया ने केजरीवाल संग गडकरी पर महाराष्ट्र में किसानों की जमीन हड़पने के संगीन आरोप लगा दिए।
भाजपा से पहले से ही खार खाए बैठी केन्द्र सरकार ने भी हाथ आए इस मौके को लपक कर गडकरी की कंपनियों की जांच के आदेश दे दिए जिसके बाद गडकरी धीरे धीरे भ्रष्टाचार के मकड़जाल में घिरते चले गए।
ये बात अलग है कि केजरीवाल ने सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा पर भी गंभीर आरोप लगाए थे लेकिन वाड्रा तो क्लीन चिट मिल गई तो गडकरी पर आयकर विभाग ने शिकंजा कस लिया। सवाल यहां पर भी खड़ा उठता है कि आखिर कैसे यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी के दाबाद राबर्ट वाड्रा को बहुत ही कम समय में क्लीन चिट दे दी जाती है और गडकरी की कंपनी के ठिकानों पर एक के बाद एक छापेमारी की जाती है..! 
क्या इसे महज एक इत्तेफाक माना जाए या कुछ और..? खैर सच्चाई जो भी हो लेकिन गडकरी की भाजपा अध्यक्ष पद की कुर्सी खिसकने के बाद गडकरी के विरोधियों से ज्यादा खुशी केजरीवाल एंड कंपनी को ही हो रही होगी क्योंकि केजरीवाल एंड कंपनी ने जिन जिन लोगों पर अपने बांउसर फेंके उनमें पहली सफलता उन्हें गडकरी के रूप में ही मिली है।

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मंगलवार, 22 जनवरी 2013

ऐसे शिक्षकों को भी तो मिले सजा..!


हरियाणा के जेबीटी घोटाले में पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला…उनके बेटे अजय चौटाला और दो आईएएस अधिकारियों को 10 -10 साल की सजा और दूसरे छोटे बड़े 51 अधिकारियों को सजा सिर्फ भ्रष्टाचार के मामले में दोषियों के सजा नहीं है बल्कि ये सीबीआई कोर्ट का ये फैसला एक नजीर है उन लोगों के लिए जो पैसे और ताकत के बल पर कानून को अपनी बपौती समझते हैं और आम जनता की गाढ़ी कमाई को भ्रष्टाचार और घोटालों में हजम कर जाते हैं। 
1999-2000 में हुए इस घोटाले में फैसला आने में भले ही 13 साल का लंबा वक्त लग गया लेकिन यहां से भारतीय न्याय व्यवस्था के प्रति लोगों में उम्मीद की एक नई किरण भी जगी है। हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री चौटाला और भिवानी से उनके सासंद बेटे ने शायद ये कभी नहीं सोचा होगा कि उनका एक दिन ये हश्र होगा। अपने लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए जेबीटी घोटेले में 3206 शिक्षकों से इन लोगों ने उनकी हैसियत के हिसाब से 3 से 7 लाख रूपए तक वसूल कर जमकर वारे न्यारे किए।
ये तो वो घोटाला है जो खुल गया...इसके अलावा क्या चौटाला ने और घोटालों को अंजाम नहीं दिया होगा..? जाहिर है ऐसे कितने ही घोटाले चौटाला ने चार बार हरियाणा का मुख्यमंत्री रहते हुए अंजाम दिए होंगे..! खैर जो घोटाला उजागर हुआ उसमें चौटाला समेत 55 लोगों को दोषी सजा का एलान होना अपने आप में बड़ी बात है क्योंकि अमूमन भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोप से घिरे मामले या तो कोर्ट में सालों से लंबित पड़े हैं या फिर अधिकतर मामलों में सबूतों के अभाव में भ्रष्टाचारी आसानी से बच निकलते हैं।
इस घोटाले में दो आईएएस समेत 51 छोटे बड़े अधिकारियों को भी सजा सुनाई गई है जो कहीं न कहीं ऐसे सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए भी एक सबक हैं जो कई बार भ्रष्टाचार में लिप्त होते हैं या घोटालों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल होते हैं लेकिन कई बार आसानी से बच निकलते हैं। किसी राज्य का मुख्यमंत्री या फिर उसके मंत्री या विभिन्न पदों पर आसीन कोई नेता अगर भ्रष्टाचार कर रहा है या घोटाले को अंजाम दे रहा है तो ऐसा तो संभव नहीं है कि संबधित विभाग के मुखिया या विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों को इसकी भनक न लगे कि यहां कुछ गड़बड़ हो रही है..!
कई बार गडबड़ी से भरी फाइलें इन अधिकारियों और कर्मचारियों की टेबल से गुजरती होंगी लेकिन ये लोग सब कुछ जानकर भी अंजान बने रहते हैं और कई बार जानबूझकर विभागीय अधिकारी गड़बड़ी भरी फाइलों पर दस्तखत कर भ्रष्टाचार और घोटाले का मार्ग प्रशस्त करते हैं...लेकिन इसके खिलाफ आवाज कोई नहीं उठाता...जाहिर है इनका दामन भी पाक साफ नहीं है..! ये लोग अगर ईमानदारी से काम करें तो भ्रष्टाचार को कम करना और घोटालों को होने से रोकना संभव है लेकिन अफसोस ऐसा नहीं होता। हालांकि इसके लिए एक आम आदमी भी उतनी ही जिम्मेदार है जितना कि ये लोग क्योंकि वे लोग भी अपने कामों के लिए रिश्वत देने से परहेज नहीं करते। 
जेबीटी घोटाले में भर्ती हुए शिक्षकों का नौकरी के लिए रिश्वत देना इसका प्रमाणित भी करता है। कोर्ट को ऐसे लोगों को भी कड़ी सजा सुनानी चाहिए जिन्होंने नौकरी के लिए रिश्वत दी और भर्ती होने के बाद मजे से सरकारी तनख्वाह पर ऐश कर रहे हैं। इन्होंने रिश्वत देकर अपना वर्तमान और भविष्य तो बना लिया लेकिन ये स्कूलों में बच्चों का भविष्य खराब कर रहे हैं। जिस शिक्षक ने रिश्वत देकर नौकरी पाई हो वो बच्चों को क्या सीख देगा..?

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सोमवार, 21 जनवरी 2013

आतंकवादी राष्ट्र है भारत..!


भारत की सीमा में घुसकर भारत के दो सैनिकों के सिर कलम करके भारत को ललकारने वाले पाकिस्तान पर तो हमारे गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने मुंह नहीं खोला। भारत के खिलाफ जहर उगलने वाले पाक और उसकी नापाक हरकतों पर शिंदे खामोश रहते हैं। वे चुप्पी तोड़ते हैं तो मुंबई हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद को “श्री” और “मिस्टर” लगाकर संबोधित करते हैं...वे बोलते हैं तो हिंदुओं को आतंकवादी बोलते हैं..! 
वे बोलते हैं तो हिंदुओं पर आतंकी घटनाओं को अंजाम देकर आल्पसंख्यकों को बदनाम करने का आरोप लगाते हैं। सीमा पार से हो रही आतंकियों की घुसपैठ पर उन्हें कोई खुफिया जानकारी या रिपोर्ट नहीं मिलती लेकिन भारत में हिंदु आतंकवाद पनप रहा है और भाजपा और आरएसएस आतंकी शिविर चला रहे हैं इसकी पूरी खुफिया रिपोर्ट गृहमंत्री जी के पास है। अरे शिंदे साहब देश में सीमा पार से हो रही घुसपैठ और आतंकी घटनाएं न रोक सको तो समझ में आता है लेकिन कम से कम अल्पसंख्यक वोटबैंक के चक्कर में देश की सीमा पर विपरित परिस्थितियों में मुस्तैद बैठे हमारे जांबाज सैनिकों का मनोबल तो मत गिराओ। 
आपको तो पाक की नापाक हरकतों पर पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देना था लेकिन आप तो सीमा पार बैठे आतंक के आकाओं को मनोबल बढ़ाने में लगे हो। आपके इस बयान ने तो सीमा पार आराम से बैठे मुंबई हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद को निर्दोष साबित कर दिया क्योंकि आप कहते हो कि भारत में आतंकी घटनाएं हिंदु आतंकवाद की देन है और अल्पसंख्यकों को बेवजह बदनाम किया जा रहा है।
आपके कड़े तेवर देख तो सीमा पार बैठे आतंक के आकाओं को कांप जाना चाहिए था कि कहीं उसका हाल भी कभी ओसामा बिन लादेन की तरह न हो जाए लेकिन आपने तो अपने ही लोगों पर सवाल खड़े करके भारत में तबाही मचाने के बाद सीमा पार आराम से बैठे आतंकियों को क्लीन चिट दे दी।
नतीजा आपके सामने है...यही हाफिज सईद अब पाकिस्तान में हो रहे आतंकवाद के भारत को जिम्मेदार ठहरा रहा है और तो और भारत पर पाकिस्तान के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा देने का दुष्प्रचार करने का भी आरोप लगा रहा है। इतना छोड़िए हाफिज सईद की हिम्मत देखिए पाकिस्तान से मांग कर रहा है कि वो कोशिश करे कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत आतंकवादी राष्ट्र घोषित कर दिया जाए।
ये हिम्मत हाफिज सईद में आई कहां से...आपके ही बयान से न शिंदे साहब। आप करते रहिए वोटबैंक की राजनीति और दिलवा कर छोडिए भारत को आतंकवादी राष्ट्र का दर्जा तभी आपका गृहमंत्री की कुर्सी पर बैठना सार्थक होगा..!  आपके बयान से आज एक और बात समझ में आ गई कि आखिर संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु को आजतक फांसी क्यों नहीं दी गई...वो भी कहीं आपके वोटबैंक का हिस्सा तो नहीं..! 
वैसे भी जब तक आप जैसी सोच वाले नेता गृहमंत्री जैसी महत्वपूर्ण कुर्सी पर बैठे रहेंगे और ऐसे बयान देते रहेंगे तो हाफिज सईद और अफजल गुरु जैसे आतंकियों का सिर गर्व से ऊंचा उठता रहेगा और अपने ही देश में हिंदुस्तानियों का सिर शर्म से झुकता रहेगा..! पता नहीं आप जैसे लोग अपने घरों में अपने परिवार के साथ कैसे रहते हैं..?

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