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गुरुवार, 24 जनवरी 2013

नहीं चाहते दलित गृहमंत्री..!


गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने आंतकवाद को धर्म और जाति से जोड़कर अल्पसंख्यक वोटों के लिए हिंदू आतंकवाद के नाम को जन्म क्या दिया मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा ने इसे राष्ट्र अपमान से जुड़ा मुद्दा बताते हुए सड़क से संसद तक आर पार की लड़ाई का एलान कर दिया है। कांग्रेस ने शिंदे के बयान से किनारा जरूर कर लिया है लेकिन विवादित बयान देने में माहिर कांग्रेस के पेटेंट नेता दिग्विजय सिंह ने एक तीर से दो निशाने साधते हुए इस मुद्दे पर आरपार की लड़ाई का एलान कर चुकी भाजपा पर ही दलित विरोधी होने का आरोप लगाते हुए पलटवार कर दिया है।
दिग्विजय सिंह कहते हैं कि भाजपा को एक दलित गृहमंत्री बर्दाश्त नहीं हो रहा है इसलिए भाजपा गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे का इस्तीफा मांग रही है। दिग्विजय सिंह ने न सिर्फ इस बयान के जरिए अल्पसंख्यक वोटबैंक के लिए कांग्रेस की इस चाल का बचाव किया है बल्कि गृहमंत्री शिंदे की जाति के नाम पर भाजपा पर वार करते हुए दलित वोटबैंक पर भी सेंध लगाने की कोशिश की है।
शिंदे की आलोचना के बाद कांग्रेस भले ही गृहमंत्री के बयान से किनारा करते हुए आतंकवाद की कोई धर्म या जाति न होने की बात कर रही हो लेकिन कांग्रेस का दोहरा चरित्र देखिए दिग्विजय सिंह सरीखे नेता बार बार शिंदे के बयान का समर्थन करते हैं। यानि कांग्रेस ने शिंदे बयान से किनारा भी कर लिया और अपने कुछ नेताओं को इसका समर्थन करने के लिए खुला छोड़ कर इसके बहाने अल्पसंख्यक वोटबैंक को झपटने की भी कोशिश कांग्रेस कर रही है। दिग्विजय सिंह तो दो कदम आगे निकलकर अब दलित वोटबैंक पर भी नजरें गड़ा दी हैं।
इस सब से ये तो जाहिर होता ही है कि राजनीतिक दल और उनके नेता वोटबैंक के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं और इसके लिए नैतिक अनैतिक हथकंडे अपनाने से भी परहेज नहीं करते। 2014 के आम चुनाव से पहले जयपुर में कांग्रेस के चिंतन शिविर में गृहमंत्री के श्रीमुख से निकला हिंदू आतंकवाद शब्द भी इसकी एक कड़ी है...जिसे आगे बढ़ाया दिग्विजय सिंह सरीखे नेताओं ने।
बहरहाल हिंदू आतंकवाद के शब्द को जन्म देने वाले गृहमंत्री शिंदे के बयान को कहीं से भी सही नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि आतंकवाद की न तो कोई जाति होती और न ही धर्म...ऐसे में शिंदे के साथ ही उनके बयान का समर्थन करने वाले कांग्रेसी नेताओं मणिशंकर अय्यर, कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और सलमान खुर्शीद जैसे दूसरे तमाम कांग्रेसी नेताओं की सोच पर तरस आता है और इससे भी ज्यादा तरस आता है इस देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी कहलाने वाले कांग्रेस पर..!
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सरकार बनी तो देख लेंगे..!


भाजपा अध्यक्ष पद पर गडकरी की दोबारा ताजपोशी करने के लिए भाजपा ने पार्टी के संविधान में तक संशोधन कर डाला लेकिन गडकरी के सितारे कुछ ज्यादा ही गर्दिश में थे जिसके चलते आखिरी वक्त में गडकरी की कुर्सी खिसक गई और राजनाथ सिंह बन गए भाजपा अध्यक्ष। कुर्सी जाने के अगले ही दिन नागपुर में गडकरी का नया रंग भी देखने को मिला। गडकरी न सिर्फ खुद के निर्दोष होने के दावा करते हैं बल्कि पूर्ति ग्रुप की सहयोगी कंपनियों पर आयकर सर्वे को साजिश करार देते हैं।
गडकरी यहां रूक जाते तो ठीक था लेकिन गडकरी ने तो आयकर विभाग के अधिकारियों को खुली धमकी दे डाली और कहने लगे कि अगर भाजपा सत्ता में आ गई तो उन्हें बचाने सोनिया गांधी या पी चिदंबरम नहीं आने वाले। गडकरी ने कांग्रेस पर प्रहार करते हुए ये तक कह डाला कि कांग्रेस में एक मालकिन हैं और बाकी सब नौकर। अध्यक्ष न बनने पर गडकरी का दर्द समझा जा सकता है लेकिन ये दर्द 24 घंटों में ही बौखलाहट के रूप में निकल कर सामने आएगा इसकी उम्मीद नहीं थी।
जाहिर है भाजपा अध्यक्ष पद की कुर्सी को लेकर गडकरी का दर्द इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि गडकरी की कुर्सी उस वक्त पर खिसकी जब शायद गडकरी ये मान कर निश्चिंत हो गए होंगे की उनकी राह अब आसान है लेकिन ऐन वक्त पर पूर्ति ग्रुप से जुड़ी कंपनियों पर आयकर विभाग के सर्वे ने सारा खेल बिगाड़ दिया ऐसे में गडकरी को गुस्सा तो आना ही था..! अब ये अलग बात है कि गडकरी की ये बौखलाहट नागपुर में अपने समर्थकों के सामने बाहर आई।
नागपुर में गडकरी भले ही अब अध्यक्ष पद की मर्यादा में न बंधे होने की बात कहते हुए विरोधियों को सबक सिखाने की बात कर रहे हैं लेकिन भाजपा अध्यक्ष रहते हुए...मर्यादा में बंधे रहते हुए भी गडकरी ने शायद ही कभी इस मर्यादा को निभाया हो क्योंकि ये गडकरी ही हैं जिन्होंने स्वामी विवेकानंद की तुलना अंडरवर्लड डॉन दाऊद इब्राहम से कर दी थी।
ये गडकरी ही थे जिन्होंने भदोही की औराई विधानसभा सीट में चुनाव प्रचार के दौरान रैली को संबोधित करते हुए विरोधी पार्टियों के नेताओं के लिए कहा था कि...इधर गधे-उधर गधे, सब तरफ गधे ही गधे, अच्छे घोड़ों को नहीं घास और गधे खा रहे हैं च्यवनप्राश 
ये गडकरी ही थे जिन्होंने संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु को कांग्रेस के दामाद कहकर बवाल मचा दिया था। इसके अलावा भी कई बार गडकरी अपनी जबान नहीं संभाल पाए थे। 
अब तो गडकरी अध्यक्ष रहे नहीं...गडकरी के हिसाब से वे अब पद की मर्यादा में भी नहीं बंधे हैं ऐसे में देखना ये होगा कि आने वाले दिनों में गडकरी अपनी जुबान संभाल पाते हैं या फिर उनकी फिसलन भरी जुबान समय समय पर सियासी भूचाल पैदा करती रहेगी। 
बहरहाल गडकरी की इस बयान से इतना जरूर साबित हो गया है कि सत्ता में रहने पर नेता अधिकारियों पर किस कदर रौब जमाते होंगे और नेताओं का आज्ञाकारी न बनने पर सरकारी अधिकारियों कर्मचारियों की क्या हालत होती होगी क्योंकि जब विपक्ष में रहकर गडकरी जैसे नेता आयकर विभाग के अधिकारियों को खुलेआम धमका सकते हैं तो गलती से सत्ता में आने पर वे क्या गुल नहीं खिलाएंगे।  

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बुधवार, 23 जनवरी 2013

लोकतंत्र की हत्या..!


भारतीय जनता पार्टी को आखिर राजनाथ सिंह के रूप में नया राष्ट्रीय अध्यक्ष मिल ही गया। पार्टी विद डिफरेंस और आंतरिक लोकतंत्र की बात करने वाली भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चयन भले ही निर्विरोध हुआ हो लेकिन ये चयन अपने आप में कई सवाल खड़े कर गया..! क्या पार्टी का कोई भी नेता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का इच्छुक नहीं था..? क्या गडकरी के चुनाव लड़ने इंकार करने के बाद क्या राजनाथ सिंह वाकई में अपनी मर्जी से पार्टी अध्यक्ष बनना चाहते थे..?
जाहिर है ऐसा नहीं रहा होगा और कई भाजपा नेताओं के मन में पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने का सपना रहा होगा या कहें अभी भी जिंदा होगा लेकिन फिर सवाल उठता है कि इंटरनल डेमोक्रेसी की बात करने वाली भाजपा ने क्यों 2009 में गडकरी की तरह इस बार गडकरी के नाम पर विरोध के बाद राजनाथ सिंह को अध्यक्ष बना दिया। क्यों पार्टी ने अध्यक्ष पद के लिए चुनाव कराकर भी एक तरह से नहीं कराया..? हालांकि इस सवाल का जवाब भाजपा नेता कुछ यूं देंगे कि किसी भी नेता ने नामांकन ही नहीं कराया ऐसे में राजनाथ को निर्विरोध चुना गया और ये चुनावी प्रक्रिया के तहत हुआ है लेकिन क्या वास्तव में ऐसा ही हुआ है जैसा दिख रहा है या भाजपा द्वारा दिखाया जा रहा है..!
भाजपा नेता कुछ भी कहें लेकिन पर्दे की पीछे की सच्चाई भाजपा के इंटरनल डेमोक्रेसी के दावे को खोखला बनाती नजर आती है और ये सब संचालित हो रहा है एक्सटरनल ताकतों(आरएसएस) के द्वारा। दरअसल ये सौ फीसदी सच है कि भाजपा में वही होता है जो संघ चाहता है...वही 2009 में गडकरी को अध्यक्ष भी बनाता है और वही 2013 में भी गडकरी को दोबारा अध्यक्ष बनाना चाहता था...इसके लिए बकायदा पार्टी के संविधान में संशोधन भी होता है लेकिन गडकरी की कंपनी पर घालमेल के आरोप पर भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के विरोध के चलते गडकरी दोबारा अध्यक्ष नहीं बन पाए लेकिन इसके बाद भी राजनाथ सिंह का अध्यक्ष बनना भी संघ की मर्जी से ही संभव हुआ है।
बात सिर्फ राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी तक ही सीमित रहती तो समझ में आता है लेकिन अमूमन यही हाल भाजपा में प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव से लेकर तमाम छोटे बड़े पदों पर नेताओं की नियुक्ति पर भी होता है। ज्यादा दूर या पीछे जाए बिना अगर उत्तराखंड राज्य का ही उदाहरण ले लें तो तस्वीर साफ हो जाती है कि भाजपा में इंटरनल डेमोक्रेसी की कैसे पार्टी का शीर्ष नेतृत्व खुद धज्जियां उड़ाता है। उत्तराखंड प्रदेश अध्यक्ष का मसला चुनाव की तारीख घोषित होने के बाद भी नहीं तय हो पाया है क्योंकि कुर्सी के लिए एक नाम पर सहमति नहीं है और दो नेता अध्यक्ष का चुनाव लड़ना चाहते थे।
दोनों नेताओं तीरथ सिंह रावत और त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने बकायदा नामांकन भी दाखिल कर दिया लेकिन पार्टी ने चुनाव कराने की बजाए नाम वापस लेने की तारीख आगे बढ़ा दी ताकि दोनों पर नाम वापस लेने के लिए दबाव बनाया जा सके और दोनों के नाम वापस लेने के बाद आलाकमान अपनी पसंद के व्यक्ति को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठा सके। आखिर में यही हुआ और दोनों ने अपना नाम वापस ले लिया और अब सबको इंतजार है आलाकमान की पसंद के प्रदेश अध्यक्ष का..! समझा जा सकता है कि भाजपा में इंटरनल डेमोक्रेसी को कैसे एक्सटरनल ताकतें(संघ) कंट्रोल कर रही हैं और पार्टी नेता चाहकर भी मुंह नहीं खोल पाते।
ऐसा नहीं है कि ये हाल सिर्फ भाजपा में ही है...देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस में भी कुछ ऐसा ही है वहां पर एक्सटरनल ताकत एक परिवार है और वो है गांधी परिवार जो कांग्रेस का पर्याय भी है। शुरु से परिवारवाद ही पार्टी में हावी रहा है। यहां पर एक ही परिवार पूरा पार्टी को चलाता है इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी के उदाहरण हमारे सामने हैं। जाहिर है इच्छाएं यहां भी नेताओं की कुलाचें भरती होंगे लेकिन आलाकमान के फैसले के आगे सब मौन हो जाते हैं। पार्टी के शीर्ष पद पर पहुंचने वाले नेताओं की संख्या ऊंगलियों में गिनी जा सकती है जो इस बात को खुद ब खुद साबित करती है।
बहरहाल जो भी हो लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में देश की दो सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों में लोकतंत्र की ये हालत अपने आप में कई सवाल खड़े करती है और मजबूर करती है ये सोचना पर कि क्या ये पार्टियां वाकई में देश चलाने लायक हैं। जिस पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अपनी ही पार्टी के लोकतंत्र की हत्या कर देता है उस पार्टी के नेताओं से कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की रक्षा करेंगे..?

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गडकरी नपे...वाड्रा बचे..!


चारों ओर चर्चा तो भाजपा अध्यक्ष पद से नितिन गडकरी की कुर्सी खिसकने और राजनाथ सिंह के सिर अध्यक्ष पद का ताज सजने की है लेकिन 22 जनवरी 2013 को चंद घंटों के बीच भाजपा में पल पल बदलते समीकरण के पीछे की कहानी की शुरूआत तो दरअसल आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने दो महीने पहले ही कर दी थी जिसका क्लाइमैक्स गडकरी समर्थकों की आंखों में आंसू दे गया तो राजनाथ सिंह समर्थकों के चेहरे पर जीत की खुशी। अंजलि दमानिया के साथ केजरीवाल ने बीते साल अक्टूबर में गडकरी पर किसानों की जमीन हड़पने का गंभीर आरोप लगाया था इसके बाद गडकरी की कंपनी पूर्ति लिमिटेड पर ही सवाल उठ खड़े हुए और गडकरी की कंपनी में निवेश करने वाली कंपनियों के पते ही फर्जी निकले।
आयकर विभाग ने मामले की जांच शुरु की और 22 जनवरी 2को आयकर विभाग के ताजा सर्वे के बाद अध्यक्ष पद पर गडकरी की दोबारा ताजपोशी के बीच गडकरी के खिलाफ विरोध के झंडे बुलंद होने लगे और आखिरकार शाम होते होते गडकरी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और नए अध्यक्ष के रूप में राजनाथ सिंह की ताजपोशी हो गई। हालांकि संघ की मंशा थी कि 2014 का आम चुनाव भाजपा गडकरी के नेतृत्व में ही लड़े और इसके लिए हरियाणा के सूरजकुंड में बीते साल 28 सितंबर 2012 को भाजपा राष्ट्रीय परिषद की बैठक में गडकरी के दूसरे कार्यकाल के लिए बकायदा पार्टी के संविधान में तक संशोधन किया गया लेकिन गडकरी के ये खुशी ज्यादा दिन नही रह पाई और आईएसी कार्यकर्ता अंजलि दमानिया ने केजरीवाल संग गडकरी पर महाराष्ट्र में किसानों की जमीन हड़पने के संगीन आरोप लगा दिए।
भाजपा से पहले से ही खार खाए बैठी केन्द्र सरकार ने भी हाथ आए इस मौके को लपक कर गडकरी की कंपनियों की जांच के आदेश दे दिए जिसके बाद गडकरी धीरे धीरे भ्रष्टाचार के मकड़जाल में घिरते चले गए।
ये बात अलग है कि केजरीवाल ने सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा पर भी गंभीर आरोप लगाए थे लेकिन वाड्रा तो क्लीन चिट मिल गई तो गडकरी पर आयकर विभाग ने शिकंजा कस लिया। सवाल यहां पर भी खड़ा उठता है कि आखिर कैसे यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी के दाबाद राबर्ट वाड्रा को बहुत ही कम समय में क्लीन चिट दे दी जाती है और गडकरी की कंपनी के ठिकानों पर एक के बाद एक छापेमारी की जाती है..! 
क्या इसे महज एक इत्तेफाक माना जाए या कुछ और..? खैर सच्चाई जो भी हो लेकिन गडकरी की भाजपा अध्यक्ष पद की कुर्सी खिसकने के बाद गडकरी के विरोधियों से ज्यादा खुशी केजरीवाल एंड कंपनी को ही हो रही होगी क्योंकि केजरीवाल एंड कंपनी ने जिन जिन लोगों पर अपने बांउसर फेंके उनमें पहली सफलता उन्हें गडकरी के रूप में ही मिली है।

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मंगलवार, 22 जनवरी 2013

ऐसे शिक्षकों को भी तो मिले सजा..!


हरियाणा के जेबीटी घोटाले में पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला…उनके बेटे अजय चौटाला और दो आईएएस अधिकारियों को 10 -10 साल की सजा और दूसरे छोटे बड़े 51 अधिकारियों को सजा सिर्फ भ्रष्टाचार के मामले में दोषियों के सजा नहीं है बल्कि ये सीबीआई कोर्ट का ये फैसला एक नजीर है उन लोगों के लिए जो पैसे और ताकत के बल पर कानून को अपनी बपौती समझते हैं और आम जनता की गाढ़ी कमाई को भ्रष्टाचार और घोटालों में हजम कर जाते हैं। 
1999-2000 में हुए इस घोटाले में फैसला आने में भले ही 13 साल का लंबा वक्त लग गया लेकिन यहां से भारतीय न्याय व्यवस्था के प्रति लोगों में उम्मीद की एक नई किरण भी जगी है। हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री चौटाला और भिवानी से उनके सासंद बेटे ने शायद ये कभी नहीं सोचा होगा कि उनका एक दिन ये हश्र होगा। अपने लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए जेबीटी घोटेले में 3206 शिक्षकों से इन लोगों ने उनकी हैसियत के हिसाब से 3 से 7 लाख रूपए तक वसूल कर जमकर वारे न्यारे किए।
ये तो वो घोटाला है जो खुल गया...इसके अलावा क्या चौटाला ने और घोटालों को अंजाम नहीं दिया होगा..? जाहिर है ऐसे कितने ही घोटाले चौटाला ने चार बार हरियाणा का मुख्यमंत्री रहते हुए अंजाम दिए होंगे..! खैर जो घोटाला उजागर हुआ उसमें चौटाला समेत 55 लोगों को दोषी सजा का एलान होना अपने आप में बड़ी बात है क्योंकि अमूमन भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोप से घिरे मामले या तो कोर्ट में सालों से लंबित पड़े हैं या फिर अधिकतर मामलों में सबूतों के अभाव में भ्रष्टाचारी आसानी से बच निकलते हैं।
इस घोटाले में दो आईएएस समेत 51 छोटे बड़े अधिकारियों को भी सजा सुनाई गई है जो कहीं न कहीं ऐसे सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए भी एक सबक हैं जो कई बार भ्रष्टाचार में लिप्त होते हैं या घोटालों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल होते हैं लेकिन कई बार आसानी से बच निकलते हैं। किसी राज्य का मुख्यमंत्री या फिर उसके मंत्री या विभिन्न पदों पर आसीन कोई नेता अगर भ्रष्टाचार कर रहा है या घोटाले को अंजाम दे रहा है तो ऐसा तो संभव नहीं है कि संबधित विभाग के मुखिया या विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों को इसकी भनक न लगे कि यहां कुछ गड़बड़ हो रही है..!
कई बार गडबड़ी से भरी फाइलें इन अधिकारियों और कर्मचारियों की टेबल से गुजरती होंगी लेकिन ये लोग सब कुछ जानकर भी अंजान बने रहते हैं और कई बार जानबूझकर विभागीय अधिकारी गड़बड़ी भरी फाइलों पर दस्तखत कर भ्रष्टाचार और घोटाले का मार्ग प्रशस्त करते हैं...लेकिन इसके खिलाफ आवाज कोई नहीं उठाता...जाहिर है इनका दामन भी पाक साफ नहीं है..! ये लोग अगर ईमानदारी से काम करें तो भ्रष्टाचार को कम करना और घोटालों को होने से रोकना संभव है लेकिन अफसोस ऐसा नहीं होता। हालांकि इसके लिए एक आम आदमी भी उतनी ही जिम्मेदार है जितना कि ये लोग क्योंकि वे लोग भी अपने कामों के लिए रिश्वत देने से परहेज नहीं करते। 
जेबीटी घोटाले में भर्ती हुए शिक्षकों का नौकरी के लिए रिश्वत देना इसका प्रमाणित भी करता है। कोर्ट को ऐसे लोगों को भी कड़ी सजा सुनानी चाहिए जिन्होंने नौकरी के लिए रिश्वत दी और भर्ती होने के बाद मजे से सरकारी तनख्वाह पर ऐश कर रहे हैं। इन्होंने रिश्वत देकर अपना वर्तमान और भविष्य तो बना लिया लेकिन ये स्कूलों में बच्चों का भविष्य खराब कर रहे हैं। जिस शिक्षक ने रिश्वत देकर नौकरी पाई हो वो बच्चों को क्या सीख देगा..?

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सोमवार, 21 जनवरी 2013

आतंकवादी राष्ट्र है भारत..!


भारत की सीमा में घुसकर भारत के दो सैनिकों के सिर कलम करके भारत को ललकारने वाले पाकिस्तान पर तो हमारे गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने मुंह नहीं खोला। भारत के खिलाफ जहर उगलने वाले पाक और उसकी नापाक हरकतों पर शिंदे खामोश रहते हैं। वे चुप्पी तोड़ते हैं तो मुंबई हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद को श्रीऔर मिस्टर लगाकर संबोधित करते हैं...वे बोलते हैं तो हिंदुओं को आतंकवादी बोलते हैं..! 
वे बोलते हैं तो हिंदुओं पर आतंकी घटनाओं को अंजाम देकर आल्पसंख्यकों को बदनाम करने का आरोप लगाते हैं। सीमा पार से हो रही आतंकियों की घुसपैठ पर उन्हें कोई खुफिया जानकारी या रिपोर्ट नहीं मिलती लेकिन भारत में हिंदु आतंकवाद पनप रहा है और भाजपा और आरएसएस आतंकी शिविर चला रहे हैं इसकी पूरी खुफिया रिपोर्ट गृहमंत्री जी के पास है। अरे शिंदे साहब देश में सीमा पार से हो रही घुसपैठ और आतंकी घटनाएं न रोक सको तो समझ में आता है लेकिन कम से कम अल्पसंख्यक वोटबैंक के चक्कर में देश की सीमा पर विपरित परिस्थितियों में मुस्तैद बैठे हमारे जांबाज सैनिकों का मनोबल तो मत गिराओ। 
आपको तो पाक की नापाक हरकतों पर पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देना था लेकिन आप तो सीमा पार बैठे आतंक के आकाओं को मनोबल बढ़ाने में लगे हो। आपके इस बयान ने तो सीमा पार आराम से बैठे मुंबई हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद को निर्दोष साबित कर दिया क्योंकि आप कहते हो कि भारत में आतंकी घटनाएं हिंदु आतंकवाद की देन है और अल्पसंख्यकों को बेवजह बदनाम किया जा रहा है।
आपके कड़े तेवर देख तो सीमा पार बैठे आतंक के आकाओं को कांप जाना चाहिए था कि कहीं उसका हाल भी कभी ओसामा बिन लादेन की तरह न हो जाए लेकिन आपने तो अपने ही लोगों पर सवाल खड़े करके भारत में तबाही मचाने के बाद सीमा पार आराम से बैठे आतंकियों को क्लीन चिट दे दी।
नतीजा आपके सामने है...यही हाफिज सईद अब पाकिस्तान में हो रहे आतंकवाद के भारत को जिम्मेदार ठहरा रहा है और तो और भारत पर पाकिस्तान के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा देने का दुष्प्रचार करने का भी आरोप लगा रहा है। इतना छोड़िए हाफिज सईद की हिम्मत देखिए पाकिस्तान से मांग कर रहा है कि वो कोशिश करे कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत आतंकवादी राष्ट्र घोषित कर दिया जाए।
ये हिम्मत हाफिज सईद में आई कहां से...आपके ही बयान से न शिंदे साहब। आप करते रहिए वोटबैंक की राजनीति और दिलवा कर छोडिए भारत को आतंकवादी राष्ट्र का दर्जा तभी आपका गृहमंत्री की कुर्सी पर बैठना सार्थक होगा..!  आपके बयान से आज एक और बात समझ में आ गई कि आखिर संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु को आजतक फांसी क्यों नहीं दी गई...वो भी कहीं आपके वोटबैंक का हिस्सा तो नहीं..
वैसे भी जब तक आप जैसी सोच वाले नेता गृहमंत्री जैसी महत्वपूर्ण कुर्सी पर बैठे रहेंगे और ऐसे बयान देते रहेंगे तो हाफिज सईद और अफजल गुरु जैसे आतंकियों का सिर गर्व से ऊंचा उठता रहेगा और अपने ही देश में हिंदुस्तानियों का सिर शर्म से झुकता रहेगा..! पता नहीं आप जैसे लोग अपने घरों में अपने परिवार के साथ कैसे रहते हैं..?

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“जहर” और “भावुकता”- कांग्रेस की रणनीति तो नहीं..!


कांग्रेसी कार्यकर्ताओं पर बड़ा करम हो गया कि सोनिया गांधी ने राहुल गांधी को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाते हुए नंबर दो की पोजिशन पर काबिज कर दिया हालांकि ये अलग बात है कि राहुल इससे पहले भी सोनिया के बाद कांग्रेस में नंबर दो ही थे। बकौल राहुल इससे एक दिन पहले उनके पास पहुंची सोनिया गांधी ने रोते हुए ये बताया कि पॉवरजहर के समान है। ये बात सही है कि सोनिया की इस बात का गहरा निहितार्थ है क्योंकि सोनिया ने पराए देश में बहु बनकर आने के बाद अपनी सास और देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और अपने पति और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को सत्ता में रहते हुए खोया है। ऐसे में राहुल को पार्टी उपाध्यक्ष बनाने के बाद भावुकता में अपने बेटे राहुल को ये बात बताना कि पॉवरजहर के समान है कहीं न कहीं सोनिया गांधी के सालों पुराने उस दर्द को ताजा करता है कि जब 31 अक्टूबर 1984 को सोनिया ने अपनी सास इंदिरा गांधी और 21 मई 1991 को अपने पति राजीव गांधी को असमय खोया था। सोनिया ने इस दर्द को करीब से महसूस किया है क्योंकि राजीव गांधी की हत्या के वक्त उनके बच्चों राहुल गांधी की उम्र सिर्फ 21 साल तो प्रियंका गांधी की उम्र 20 साल थी। सोनिया ने कहीं न कहीं राहुल को ये एहसास कराने की कोशिश की कि सत्ता ने उनके परिवार को न सिर्फ तोड़ा है बल्कि एक तरह से तहस नहस कर दिया है। ऐसे में इसके बाद भी राहुल को बड़ी जिम्मेदारी देकर 2014 की जिम्मेदारी सौंपना सोनिया के लिए आसान फैसला नहीं था लेकिन सोनिया ने इसके बाद भी न सिर्फ खुद इस जहर के प्याले को हाथ में उठाया बल्कि अपने बेटे राहुल गांधी को भी इस प्याले को तस्तरी में सजाकर देने की कोशिश की। 2014 के आम चुनाव से पहले चिंतन शिविर में राहुल गांधी को उपाध्यक्ष घोषित कर कांग्रेस ने अघोषित तौर पर राहुल गांधी को 2014 में कांग्रेस का पीएम उम्मीदवार भी घोषित कर दिया ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या राहुल का अपने भाषण में अपनी मां के रोने का जिक्र करना 2014 तक कांग्रेस के प्रति अपने प्रति एक भावुक माहौल तैयार कर सत्ता हासिल करने की ओर एक कदम है..? कांग्रेस का 2014 से ऐन पहले राहुल को प्रोजेक्ट किया जाना...राहुल का भावुक्ता भरा भाषण और यूपीए की हैट्रिक की चिंता वो भी ऐसे वक्त पर जब यूपीए-2 का कार्यकाल भ्रष्टाचार, घोटलों और विवादों से भरपूर रहा है...जाहिर है ये राह आसान तो बिल्कुल भी नहीं हैं...तो क्या राहुल का भावुकता भरा भाषण किसी रणनीति का तो हिस्सा नहीं था..! खैर राहुल ने कमान संभाल ली है और फैसला देश की जनता को करना है...ऐसे में ये देखना रोचक होगा कि देश की आवाम 2014 में वोट करने वक्त यूपीए – 2 का कार्यकाल अपने जेहन में रखती है या फिर सोनिया का रोना और राहुल का भावुक भाषण। हम तो बस बड़ी जिम्मेदारी के साथ नई पारी की शुरुआत करने पर राहुल गांधी को बधाई और शुभकामनाएं ही दे सकते हैं।

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रविवार, 20 जनवरी 2013

चिंतन शिविर- चिंता कम हुई या बढ़ गयी..?


कांग्रेस का चिंतन शिविर राहुल गांधी को कांग्रेस में आधिकारिक रूप से नंबर दो की पोजीशन में पहुंचाने के साथ खत्म हुआ हालांकि राहुल गांधी सोनिया के बाद पहले भी नंबर दो थे ऐसे में चिंतन शिविर की खोज उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर किसी को आश्चर्य तो नहीं ही हुआ होगा। लेकिन बडा सवाल ये है कि क्या जयपुर में तीन दिन तक चले चिंतन शिविर के बाद वाकई में कांग्रेस की चिंता कम हुई है या फिर बढ़ गई है..!  चिंतन शिविर के पहले दिन सोनिया गांधी ने कांग्रेस के खिसकते वोटबैंक पर चिंता जताई तो दूसरे दिन पूरा माहौल राहुलमय दिखाई दिया और कांग्रेसियों को पार्टी के खिसकते वोटबैंक को बचाने और 2014 में यूपीए की हैट्रिक के लिए राहुल से बेहतर विकल्प नहीं दिखा लिहाजा कांग्रेस कोर कमेटी ने भी देरी नहीं कि और राहुल गांधी को महासचिव की कुर्सी से उपाध्यक्ष की कुर्सी पर बैठा दिया। दरअसल भ्रष्टाचार, महंगाई और सरकार के कई फैसलों को लेकर सवालों में घिरी मनमोहन सरकार के लिए 2014 का चुनाव आसान तो बिल्कुल नहीं कहा जा सकता ऐसे में कांग्रेस ने बडी ही चालाकी से राहुल गांधी के नाम पर युवा वोटरों को रिझाने की कोशिश की है और युवाओं के दम पर यूपीए की हैट्रिक लगाने की तैयारी कर ली है। राहुल को आधिकारिक तौर पर पार्टी में नंबर दो की पोजीशन में बैठाना इसकी शुरूआत है। 8 साल के राजनीतिक जीवन में तीन बडे राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को जीत न दिला पाना भी राहुल चैप्टर का हिस्सा रहा तो 2009 में उत्तर प्रदेश में पार्टी की सीटों की संख्या 9 से 21 तक पहुंचाना राहुल की एकमात्र उपलब्धि के तौर पर गिना जाता है। हालांकि इन 8 सालों में राहुल ने ताकत तो पूरी लगाई लेकिन इसका ठीकरा सीधे सीधे राहुल के सिर नहीं फूटा क्योंकि वे हमेशा पर्दे के पीछे से ही कांग्रेस की नैया को पार लगाने की कोशिश करते रहे लेकिन अब की बार तस्वीर जुदा है और राहुल को अब फ्रंट फुट पर आकर बैटिंग करनी है। 2014 के आम चुनाव से पहले 2013 में 9 राज्यों के विधानसभा चुनाव राहुल के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। राहुल के लिए इससे भी बड़ी चुनौती युवाओं का भरोसा जीतने की है क्योंकि बीते कुछ समय में देश से जुड़े कई अहम और संवेदनशील मुद्दों पर राहुल की खामोशी ने कई सवाल खडे किए हैं जिसने राहुल की एक नकारात्मक छवि युवाओं के बीच पैदा हुई है ऐसे में राहुल को इस छवि से बाहर निकलने के लिए खासी मेहनत करनी पड़ेगी। कुल मिलाकर राहुल को उपाध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेसी भले ही कांग्रेस की चिंता कम होने की बात कह रहे हों लेकिन वास्तव में कांग्रेस के साथ ही राहुल की भी चिंता बढ़ गई है क्योंकि 42 वर्ष के हो चुके राहुल गांधी के लिए 2014 का चुनाव ही सब कुछ है। 2014 में राहुल का जादू नहीं चला तो फिर राहुल को भी पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी की जमात में आने में देर नहीं लगेगी। चितंन शिविर के तीसरे दिन हालांकि राहुल ने उपाध्यक्ष बनने के बाद पहली बार भाषण देते हुए युवाओं को साथ लेकर आगे बढने की बात कहने के साथ मजे - मजे में सत्ता हासिल करने का दम तो भरा है लेकिन राहुल गांधी भी इस बात को जानते हैं कि ये काम इतना आसान होता तो जयपुर चिंतन शिविर की जरूरत ही नहीं पडती। तीसरे दिन राहुल गांधी के अलावा सत्ता की राह को आसान बनाने के लिए हिंदु आतंकवाद के नाम को जन्म देने वाले गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे को  कैसे भूल सकते हैं जिन्होंने अलंपसंख्यक वोटों के लिए हिंदुओं पर सवाल खड़े कर दिए और हिंदुओं पर अल्पसंख्यकों को बदनाम करने का आऱोप मढ़ डाला। दरअसल ये शिंदे साहब की भी गलती नहीं है...वे बेचारे तो सोनिया की उस चिंता को कम कर रहे थे जो सोनिया ने चिंतन शिविर के पहले दिन जताई थी कि पार्टी का पारंपरिक वोटबैंक खिसक रहा है। अब शिंदे साहब ठहरे कांग्रेस भक्त कैसे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया की चिंता को कम करने के लिए कुछ न करते सो अल्पसंख्यक वोटों को साधने के लिए हिंदु आतंकवाद के नाम को ही जन्म दे दिया।  

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आतंकवादी हैं हिंदु..!


पी चिदंबरम के बाद ये फिर से एक कांग्रेसी ही है और देश के गृहमंत्री की कुर्सी पर ही विराजमान हैं...जो आतंकवाद को धर्म और जाति से जोड़ते हैं। पहले तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम ये कारनामा करते हैं और भगवा आतंकवादके नए नाम को जन्म देते हैं और अब देश के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे हिंदु आतंकवाद के नाम को जन्म देते हैं। शिंदे साहब आप राजनीति में हैं...जाहिर है सत्ता तक पहुंचना आपका एकमात्र मकसद रहता है और वोटों का खिसकना आपके माथे पर बल डाल देता है लेकिन वोट बैंक के लिए आप इतना गिर जाएंगे कि आंतकवाद को जाति और धर्म से जोडने लगे। शिंदे साहब देश की सीमा से भारत में घुसपैठ कर रहे आतंकी आपको नहीं दिखाई देते..! हमारे सैनिकों का हमारी सीमा में घुसकर सिर कलम करने वाले पाकिस्तानी सैनिक आपको नहीं दिखाई देते..! संसद में हमला करने वाले आतंकी आपको नहीं दिखाई देते..! 26/11 को मुंबई को दहलाने वाले आपको नहीं दिखाई देते..! इसके साथ ही देश में अलग – अलग हिस्सों में हुई आतंकवादी घटनाएं आपको नहीं दिखाई देते..! आपको दिखाई दे रहा है तो हिंदु आतंकवाद। गजब करते हो महाराज आतंकी हमले करने वाले आतंकवादी क्या किसी घटना को अंजाम देने से पहले वहां मौजूद लोगों की जाति देखते हैं या फिर आतंकी हमले में सिर्फ किसी जाति विशेष के ही लोग ही मारे जाते हैं..? ऐसा तो नहीं है न फिर आप कैसे आतंकवाद को किसी धर्म से किसी जाति से जोड़ सकते हो..! आपने कहा ये अल्पसंख्यकों को बदनाम करने की साजिश है...इसका मतलब तो ये हुआ शिंदे साहब कि आप पहले से ही ये मानकर बैठे हैं कि सिर्फ अल्पसंख्यक ही आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देते हैं। शिंदे साहब आतंकवाद की न कोई जाति होती है और न कोई धर्म...वे किसी भी घटना को अंजाम देने से पहले...किसी को मारने से पहले ये नहीं सोचते कि मरने वाले किस जाति के हैं..? वे सिर्फ मानवता के दुश्मन होते हैं और किसी भी मुल्क में अमन और चैन इन्हें बर्दाश्त नहीं होता। इनका सिर्फ एक ही मकसद होता है और वो है सिर्फ तबाही। शिंदे साहब आपके कंधे पर तो देश की सुरक्षा की...देश के लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है और आप ही आतंकवाद को धर्म और जाति से जोड़कर देश को बांटने का काम कर रहे हैं..! शर्म करो शिंदे साहब शर्म करो वोटबैंक के लिए देश के दो टुकड़े तो मत करो। शर्म करो..शर्म करो..!!

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शनिवार, 19 जनवरी 2013

वाह री कांग्रेस- पार्टी की चिंता...देश की नहीं !


पाकिस्तान हमारी सीमा में दाखिल होकर हमारे सैनिकों के सिल कलम कर देता है लेकिन हमारी सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस पर अपनी प्रतिक्रिया देने में एक सप्ताह का वक्त लगा देते हैं। अब मनमोहन सिंह मामले के ठंडे होने का इंतजार कर रहे थे या फिर उनका खून भी उनकी उम्र के साथ ठंडा पड़ गया है ये तो वे ही बेहतर बता सकते हैं।
हद तो तब हो गयी जब कांग्रेस पार्टी देशहित से जुड़े इस संवेदनशील मुद्दे पर ठोस कार्रवाई करने की बजाए जयपुर में चितंन शिविर में 2014 की चिंता में डूब जाती है। उन्हें देश की सीमा पर तैनात अपने जांबाज सैनिकों की चिंता नहीं है..! उन्हें देश के दुश्मन पाकिस्तान की नापाक इरादों की भनक नहीं है..! उन्हें सीमा पार घुसपैठ की फिराक में घात लगाकर बैठे आतंकियों से देश को बचाने की चिंता नहीं है..!
उन्हें चिंता है तो पार्टी से छिटक रहे उनके पारंपरिक वोट बैंक को बचाने की..! उन्हें चिंता है तो 2014 में तीसरी बार केन्द्र की सत्ता में आने की..! उन्हें चिंता है तो पार्टी के नेताओं में तालमेल की कमी की..! उन्हें चिंता है तो राहुल गांधी को बड़ी जिम्मेदारी देने की..! उन्हें चिंता है तो राहुल गांधी को देश का प्रधानमंत्री बनाने की..!
ये देश की सबसे बड़ी पार्टी है और इस पार्टी का नारा है...कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ। क्या वाकई में कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ है तो फिर इस पार्टी के लोग दुश्मन को सबक सिखाने की हिम्मत क्यों नहीं दिखा पाते हैं..! वो भी तब जब हमारे दो सैनिकों का सिर पाकिस्तानी सैनिक सीमा में घुसकर कलम कर देते हैं...और खुलेआम भारत को चुनौती देते हैं।
इस पार्टी की मुखिया सोनिया गांधी के साथ ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस के पीएम इन वेटिंग राहुल गांधी के पास नेताओं की बेटे-बेटियों की शाही शादियों में शरीक होने का वक्त है..! इनके पास पचमढ़ी और शिमला जैसे हिल स्टेशनों के साथ ही जयपुर में चल रहे चिंतन शिविर में 2014 में सत्ता हासिल करने के साथ ही राहुल गांधी को प्रधानमंत्री कैसे बनाए इसकी चिंता करने का तो वक्त है लेकिन देश के लिए अपनी जान कुर्बान करने वाले वीर सैनिकों के परिवार मिलने का वक्त नहीं है..!
ये छोड़िए इनके पास देश के दुश्मनों से कैसे निपटा जाए इसकी चिंता करने तक का वक्त नहीं है...शायद इसलिए सोनिया और राहुल गांधी पाकिस्तानी सैनिकों की बर्बर कार्रवाई पर चुप रहते हैं और मनमोहन सिंह अपना मुंह खोलने में एक सप्ताह का वक्त लगा देते हैं। सोनिया जी ये वक्त पार्टी की चिंता करने का नहीं देश की चिंता करने का है। ये वक्त सीमा पर विपरीत परिस्थितियों में विपरीत मौसम में मुस्तैदी से तैनात जाबांज सैनिकों की चिंता करने का है। ये वक्त देश को एक मजबूत और दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब देने वाली सरकार होने का भरोसा देश की जनता को देने का है। सोनिया जी...काश आप समझ पाती..!

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शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

गैरसैंण- सरकार का पिकनिक स्पॉट..!


9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड राज्य गठन के साथ ही देहरादून को उत्तराखंड की अस्थाई राजधानी घोषित कर दिया गया। राज्य बने हुए 12 साल का वक्त गुजर गया है लेकिन उत्तराखंड को आज तक स्थाई राजधानी नहीं मिल पाई। पहाड़ी राज्य की राजधानी पहाड़ में होने के तर्क के साथ कुमाऊं और गढ़वाल के केन्द्र बिंदु गैरसैंण को प्रदेश की राजधानी बने की मांग शुरु से उठती रही है ताकि पहाड़ में राजधानी होने से विकास की दौड़ में पीछे छूट गए पहाड़ का...पहाड़ में रहने वालों का विकास हो लेकिन अफसोस राज्य गठन के 12 साल बाद भी ये सिर्फ एक सपना ही है।
बहुगुणा सरकार ने भले ही गैरसैंण में कैबिनेट की बैठक कर गैरसैंण में विधानभवन बनाने का ऐलान करते हुए गैरसैंण में विधानभवन की नींव भी रख दी हो लेकिन इसके बाद भी प्रदेश की स्थाई राजधानी का सवाल जहां का तहां खड़ा है क्योंकि सरकार ने प्रदेश की स्थाई राजधानी के मसले पर अपना मुहं नहीं खोला है और न ही गैरसैँण को प्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने की ही बात कही है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि जब बहुगुणा सरकार को गैरसैंण को न प्रदेश की स्थाई राजधानी ही बनाना था और न ही ग्रीष्मकालीन राजधानी तो आखिर गैरसैंण में विधानभवन की नींव क्यों रखी गई..? गैरसैंण में जनता के करोड़ों रूपए खर्च क्यों किए जा रहे हैं...?
गैरसैंण में विधानभवन के साथ ही विधायक ट्रांजिट हॉस्टल और अधिकारी कर्मचारी हॉस्टल निर्माण का साफ मतलब ये है कि विधानभवन बनने के बाद गैरसैंण में विधानसभा सत्र तो होगा लेकिन क्या मात्र 2 या 3 दिन का विधानसभा सत्र पहाड़ में कर लेने से पहाड़ का विकास हो पाएगा..? गैरसैंण तक पहुंचने के लिए हवाई मार्ग को तरजीह देने वाले हमारे मुख्यमंत्री और मंत्रीगण क्या हवाई मार्ग से गैरसैंण पहुंचकर पहाड़ के पहाड़ से जीवन का दर्द और पहाड़ के लोगों का मर्म समझ पाएंगे..? विधानभवन बनने के बाद क्या सिर्फ 2 या 3 दिन का सत्र गैरसैंण में करना क्या सच में सरकार की पहाड़ के विकास के प्रति प्रतिबद्धता  है या फिर सत्र के बहाने गैरसैंण बनेगा करोड़ों की लागत से सरकार का एक सरकारी पिकनिक स्पॉट..?
ये सवाल उठने इसलिए भी लाजिमी हैं क्योंकि सरकार ने विधानभवन के निर्माण का ऐलान तो किया लेकिन गैरसैंण को स्थाई तो छोड़िए प्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी के सवाल पर सरकार चुप है। विपक्ष के साथ ही कांग्रेस के ही कई नेता और विधायक के साथ ही विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल भी गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने की पैरवी कर चुके हैं लेकिन मुख्यमंत्री ने मुंह नहीं खोला। 12 साल बाद गैरसैंण में विधानभवन के निर्माण की खबर से प्रदेशवासियों में खुशी की लहर थी लेकिन ये खुशी स्थाई राजधानी और ग्रीष्मकालीन राजधानी के सवाल पर सरकार की चुप्पी से पलभर में ही काफिर हो गई
स्थाई राजधानी के मसले पर सरकार की चुप्पी साबित करती है कि हमारे नेता चाहे वे किसी भी पार्टी के क्यों न हो ये नहीं चाहते कि सुगम मैदानी इलाके देहरादून की बजाए किसी दुर्गम पहाड़ी इलाके में प्रदेश की स्थाई राजधानी बने क्योंकि दुर्गम इलाके में राजधानी का मतलब है कि नेता और विधायकों को वहीं रहना होगा जो कि सुगम देहरादून में ऐशो आराम के आदि हो चुके हमारे नेताओं की आदत में नहीं है या कहें कि बस में ही नहीं है। वाकई में पहाड़ी राज्य  राजधानी पहाड़ में...चाहे वो गैरसैंण हो या कोई और जगह बनाना अगर हमारे विधायक और नेतागण दिल से चाहते तो शायद राज्य गठन के वक्त स्थाई न सही अस्थाई राजधानी देहरादून की बजाए गैरसैंण में बना दी गई होती तो स्थाई राजधानी के मसले को सुलझाया जा सकता था लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ क्योंकि ये लोग ऐसा कभी चाहते ही नहीं थे। गैरसैंण को 12 वर्ष पूर्व राज्य गठन के वक्त प्रदेश का केन्द बिंदु होने के नाते अस्थाई राजधानी ही बना दिया गया होता तो आज शायद गैरसैंण या कहें कि दुर्गम पहाड़ी इलाकों की तस्वीर कुछ और होती..!
यहां एक सवाल ये भी उठता है कि क्या वाकई में राज्य की राजधानी कहां है इससे प्रदेश के दूसरे इलाकों के विकास की तकदीर तय होती है..?  किसी भी प्रदेश की राजधानी कहीं भी हो लेकिन है तो वो पूरे प्रदेश की राजधानीऐसे में विकास का हक सिर्फ राजधानी और उसके आसपास के इलाकों को ही क्यों मिले..?
राजधानी से दूर दुर्गम और पिछड़े इलाकों के विकास के लिए सरकार और क्षेत्रीय विधायक अगर प्रतिबद्धता दिखाएं तो क्या उन इलाकों की तस्वीर नहीं बदल सकती..? क्या फर्क पड़ता है राजधानी देहरादून में हैगैरसैंण में है या फिर पिथौरागढ़ या उत्तरकाशी में...विकास की गंगा तो राजधानी से पूरे प्रदेश में बहनी चाहिए बस जरूरत है तो पूरे प्रदेश के विकास की सोच की...चाहे वो धारचूला हो या फिर उत्तरकाशी। जरूरत है अंतिम पंक्ति के हर व्यक्ति की तरक्की की सोच की लेकिन अफसोस हमारे राजनेताओं की सोच यहां पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देती है।

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गुरुवार, 17 जनवरी 2013

राहत का झुनझुना...


बढ़ती महंगाई के बीच यूपीए सरकार ने भले ही सब्सिडी वाले रसोई गैस सिलेंडरों की संख्या को 6 से बढ़ाकर 9 कर आमजन को राहत देनी की कोशिश की हो लेकिन डीजल के कीमतें तय करने का अधिकार तेल कंपनियों को देने का फैसला आने वाले दिनों में आम आदमी की जेब पर चौतरफा वार ही करेगा। पेट्रोलियम कंपनियों के अऩुसार उन्हें वर्तमान में डीजल पर 9 रूपए प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है। पेट्रोलियम कंपनियां सरकार से लंबे समय से डीजल के दाम बढ़ाने की मांग कर रही थी ऐसे में जब सरकार ने तेल कंपनियों को इसका अधिकार दे ही दिया है तो निश्चित है कि तेल कंपनियां एक झटके में न सही लेकिन धीरे धीरे डीजल के दाम बढ़ाकर आम आदमी को हलाल करेंगी यानि की आने वाले समय में या यूं कहें कि आने वाले कुछ घंटों या कुछ दिनों में ही डीजल कंपनियां दाम बढ़ाकर अपना घाटा पूरा करने की पूरी कोशिश करेंगी। डीजल के साथ दिक्कत ये है कि डीजल के दाम बढ़ने से सिर्फ डीजल महंगा नहीं होगा बल्कि डीजल से उपयोग होने वाली या डीजल से जुड़ी तमाम चीजों के दामों पर इसका असर पड़ेगा। जिसमें माल ढुलाई के साथ ही खेती, परिवहन, बिजली मुख्य रूप से शामिल हैं। तेल कंपनियां जैसे जैसे अपना घाटा पूरा करेंगी वैसे वैसे आम आदमी की जेब खाली होती जाएगी। जिस प्रकार सरकार का सब्सिडी वाले रसोई गैस सिलेंडर की बढ़ी हुई संख्या का लोगों को तुरंत फायदा मिलेगा उसी तरह तेल कंपनियों के हाथ में डीजल के दाम तय करने का सरकार का फैसला लंबे समय तक लोगों की जेब काटता रहेगा। सरकार में शामिल लोग या कांग्रेसी भले ही रसोई गैस सिलेंडरों की बढ़ी हुई संख्या पर वाहवाही लूटते हुए इसे सरकार की उपलब्धि वाली किताब में इसका उल्लेख कर रहे हों लेकिन आम आदमी ये कैसे भूल सकता है कि सब्सिडी वाले रसोई गैस सिलेंडरों की संख्या 6 तक सीमित करने का फैसला भी इसी सरकार का है। ये तो वही बात हुई कि पहले किसी चीज के दाम 10 रूपए बढ़ा दो और विरोध हो तो उसके दाम 5 रूपए कम कर दो...और फिर दाम कम करने का श्रेय ले लो...अऱे महाराज पांच रुपए तो फिर भी दाम बढ़े न। वैसे भी यूपीए सरकार रसोई गैस पर लोगों को राहत देने के लिए सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या में ईजाफा नहीं करती तो ये गैस सिलेंडर की आंच यूपीए को 2013 में 9 राज्यों में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव और 2014 के आम चुनाव में बुरी तरह झुलसा सकती थी ऐसे में यूपीए ने जल्द ही इस पर राहत देने का फैसला लेने में ही शायद गनीमत समझी। कुल मिलाकर यूपीए सरकार ने आम आदमी को राहत के नाम पर सिर्फ झुनझुना ही थमाया है।

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बुधवार, 16 जनवरी 2013

भ्रष्टाचारियों के लिए सबक


चार बार हरियाणा के मुख्यमंत्री रह चुके इनेलो प्रमुख ओम प्रकाश चौटाला ने सत्ता में रहते हुए शायद ही कभी सोचा होगा कि उनका आखिरी वक्त जेल की सलाखों के पीछे गुजरेगा। 1999-2000 में सत्ता में रहते हुए ये सत्ता का नशा ही था कि चौटाला ने करीब तीन हजार शिक्षकों की फर्जी भर्ती करा दी लेकिन कहते हैं कि पाप का घड़ा एक न एक दिन जरूर फूटता है और इस केस में भी ऐसा ही हुआ और आखिरकार 13 साल के बाद अदालत ने ओम प्रकाश चौटाला और उनके बेटे अजय चौटाला समेत 55 लोगों को इस घोटाले में दोषी माना है।
इस केस को 13 साल का लंबा वक्त जरूर लगा लेकिन इस केस ने लोगों में न्यायपालिका के प्रति एक नया विश्वास पैदा किया है। आज जबकि छोटे से छोटे सरकारी कर्मचारी(सभी नहीं) से लेकर बड़े से बड़ा राजनेता(सभी नहीं) भ्रष्टाचार के समुद्र में गोते लगा रहा हैं और कई बार हमने न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार के मामले देखे हैं जिसने न्यायपालिका पर भी लोगों का विश्वास कम होने लगा था...ऐसे वक्त में एक ऐसे प्रभावशाली राजनीतिक शख्सियत को दोषी ठहराया जाना जो चार बार किसी राज्य का मुख्यमंत्री रहा हो वाकई में अदालत का बड़ा फैसला है और ये फैसला निश्चित ही भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में मील का पत्थर साबित होगा।
अदालत का फैसला ये भी साबित करता है कि गलत काम करने वाला भले ही कितना प्रभावशाली क्यों न हो...उसका वर्तमान और इतिहास कुछ भी रहा हो लेकिन उसके गलत काम उसका भविष्य बिगाड़ने के लिए काफी हैं। चौटाला ने भी ताउम्र सत्ता के नशे में चूर होकर अपनी जिंदगी गुजारी लेकिन अदालत का ये फैसला चौटाला के गलत कामों का ही नतीजा है। इस फैसले से न्यायपालिका में लोगों को भरोसा जरूर मजबूत हुआ है लेकिन इसके बाद भी एक कसक मन में रह जाती है कि चौटाला ने जो काम 1999-2000 में किया था उसका दोष सिद्ध होने में 13 साल का वक्त क्यों लग गया..?
शायद वर्तमान में यही हमारी न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी है कि अदालत में केस सालों तक लंबित रहता है और फैसला आने में सालों लग जाते हैं। कई बार तो ट्रायल के दौरान लोगों की मौत तक हो जाती है लेकिन ट्रायल खत्म नहीं होता। इस केस को ही देख लें तो इस केस में भी ट्रायल के दौरान 6 लोगों की मौत हो गई।
देश की सर्वोच्च अदालत की ही अगर बात करें तो एक आंकड़े के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या करीब 60 हजार के करीब है तो देशभर के विभिन्न उच्च न्यायालयों में वर्ष 2011 तक लंबित मामलों की संख्या करीब 43 लाख 22 हजार है। इससे देशभर की विभिन्न अदालतों में लंबित मामलों की संख्या का अंदाजा भी आसानी से लगाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश के 31 पदों में से 6 रिक्त हैं तो देशभर के उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के 895 में से 281 पद खाली पड़े हैं जो कि न्यायालयों में लंबित मामलों की एक वजह है।
लंबित मामलों में अदालतें अगर तेजी दिखाएं और अदालतों में रिक्त पदों को भर दिया जाए तो निश्चित ही न सिर्फ लंबित मामलों में गिरावट आएगी बल्कि लोगों का विश्वास न्याय व्यवस्था के प्रति और गहरा होगा क्योंकि आज भी हमारे देश में बड़ी संख्या में लोग अदालतों में जाने से घबराते हैं। वे ये मानकर बैठे हैं कि कोर्ट में केस जाने पर उसका निपटारा होने में सालों लग जाएंगे और उन्हें कोर्ट के ही चक्कर काटने पड़ेंगे और इसमें उनका समय और पैसा दोनों खर्च होगा जिसका फायदा शातिर किस्म के लोग उठाते हैं। चौटाल के केस से हमारी न्याय व्यवस्था रोशन हुई है और ये उन नेताओं के साथ ही उन प्रभावशाली लोगों के लिए भी सबक है जो ये सोचते हैं कि कानून और व्यवस्था उनकी जेब में है और गलत काम करने पर भी कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। इसी उम्मीद के साथ कि अदालतें लंबित मामलों को लेकर गंभीर होंगी और सभी भ्रष्टाचारी एक दिन सलाखों के पीछे होंगे भारतीय न्याय व्यवस्था को सलाम।

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खंडूड़ी होंगे भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष..!


ये राजनीति की ही विडंबना है कि जिस नेता को एक दिन पहले तक पार्टी और कार्यकर्ता सिर आंखों पर बैठाने को तैयार रहते हैं वही नेता अगर सत्ता की राह में रोड़ा बनता दिखाई देता है या इसका जरा सा आभास भी होता है तो उसे किनारे होने में ज्यादा वक्त नहीं लगता..! भाजपा में गडकरी चैप्टर का क्लाइमैक्स भी कुछ ऐसा ही दिखाई दे रहा है और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में गडकरी का दूसरा कार्यकाल भी इसकी भेंट चढ़ सकता है..!
भाजपा 2014 में केन्द्र की सत्ता में आने को बेकरार है लेकिन भाजपा की ये बेकरारी पार्टी के नए अध्यक्ष को लेकर अब बेचैनी में बदल गई है। वजह साफ है जिस गडकरी के दूसरे कार्यकाल को मूर्त रूप देने के लिए भाजपा ने अपने संविधान में संशोधन तक कर डाला वहीं गडकरी अब भाजपा की गले की हड्डी बन गए हैं..! गडकरी के लिए सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था लेकिन गडकरी के भाजपा अध्यक्ष के रूप में दूसरे कार्यकाल पर गड़बड़ी उस वक्त शुरु हुई जब गडकरी की कंपनी पूर्ति लिमिटेड में बड़ा घालमेल होने की बात उजागर हुई। गडकरी की अपनी ही कंपनी उनके अध्यक्ष के दूसरे कार्यकाल में सबसे बड़ा रोड़ा बन गई और यूपीए सरकार को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरने वाली भाजपा अपनी ही पार्टी के अध्यक्ष के चलते बैकफुट पर आ गई।
दरअसल 2014 के चुनाव में भ्रष्टाचार बड़ा अहम मुद्दा रहेगा और भाजपा यूपीए टू में हुए भ्रष्टाचार और घोटाले को मुद्दा बनाकर कांग्रेस को मात देने की तैयारी कर रही है ऐसे में भाजपा ये कभी नहीं चाहेगी कि जिस मुद्दे को लेकर वो कांग्रेस को मात देने की तैयारी कर रही है वही मुद्दा उसके अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के चलते उस पर भारी पड़ जाए..! ऐसे में भाजपा के अधिकतर नेता भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे गडकरी की बजाए किसी ऐसे चेहरे को अध्यक्ष के रूप में चाहते हैं जो न सिर्फ ईमानदार और स्वच्छ छवि का हो बल्कि पार्टी में जिसकी सर्व स्वीकार्यता भी है।
राजनीति में ऐसे नेता तो ढूंढ़ना भूसे के ढेर में सुई ढूंढ़ने के बराबर है ऐसे में भाजपा के अंदर सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर वो नाम कौन होगा जो पार्टी में गडकरी की जगह ले सकता है..? ये सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि जो भी नेता इस कुर्सी पर विराजमान होगा उसका कद एकाएक बढ़ जाएगा।
बहरहाल भाजपा के अगले राष्ट्रीय अध्यक्ष को लेकर सस्पेंस बरकरार है लेकिन इसी बीच सूत्रों के हवाले से अंदर की खबर ये है कि इस कुर्सी के लिए भाजपा में दो नामों उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी और हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार के नाम पर भी मंथन हुआ है..! खबर ये भी है कि इस दौड़ में भ्रष्टाचार के आरोपों से अछूते रहे...ईमानदार और स्वच्छ छवि के माने जाने वाले बीसी खंडूड़ी आगे चल रहे हैं और सब कुछ ठीक ठाक रहा तो गडकरी के बाद बीसी खंडूड़ी भाजपा के अगले राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी पर विराजमान हो सकते हैं..!

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मंगलवार, 15 जनवरी 2013

लेकिन इनका खून नहीं खौलता..!


कांग्रेस में दो चीजें खास हैं मनमोहन सिंह और राहुल गांधी...दोनों में भी एक चीज खास है...मनमोहन सिंह देश के पीएम हैं तो राहुल गांधी कांग्रेसियों के पीएम इन वेटिंग। देश में कुछ हो जाए मनमोहन सिंह मुंह नहीं खोलते और राहुल गांधी मुंह नहीं दिखाते। दोनों अचानक से जाने कहां अंर्तधान हो जाते हैं। मौनी बाबा की आवाज सुनने को लोग तरस जाते हैं लेकिन मौनी बाबा का मौन नहीं टूटता और राहुल गांधी तो ढूंढ़े नहीं मिलते। गनीमत है सीमा पर भारतीय सैनिकों के साथ पाकिस्तान की बर्बरता पर पूरे एक सप्ताह बाद मनमोहन सिंह को बोलने अनुमति मिली। मनमोहन सिंह अपना मौन इस घटना के तुरंत बाद तोड़ लेते तो और ज्यादा प्रसन्नता होती। खैर देर आए दुरुस्त आए और पाकिस्तान के खिलाफ आपकी कठोर वाणी सुनकर अच्छा लगा लेकिन कांग्रेस युवराज राहुल गांधी को लगता है अभी तक फुर्सत नहीं मिली है। वो शायद अभी भी अंदरखाने कांग्रेस को मजबूत करने में लगे हैं..! वैसे राहुल जड़ों तक जाकर कांग्रेस को कितना मजबूत कर रहे हैं इसका नतीजा हम पहले बिहार, फिर उत्तर प्रदेश और गुजरात के विधानसभा चुनाव में देख चुके हैं। खैर राहुल गांधी कुछ ज्यादा ही व्यस्त हैं और ये व्यस्तता उनके लिए लगता है देश से भी बढ़कर है..! राहुल गांधी केन्द्र सरकार की योजनाओं का तो खूब बखान करते हैं लेकिन देश के लिए वे मुंह नहीं खोलते..! वे यूपीए सरकार में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे मंत्रियों की तो खूब पैरवी करते हैं लेकिन देश के लिए शहीद सैनिकों की शहादत पर मुंह नहीं खोलते..! वे विपक्ष पर भ्रष्टाचार के आरोपों पर तो खूब बरसते हैं लेकिन हमारे सैनिकों का सिर कलम करने वाले पड़ोसी पाकिस्तान के खिलाफ वे कुछ नहीं बोलते..! कांग्रेस पर कोई आरोप लगाए तो राहुल गांधी खूब गुर्राते हैं लेकिन देश की सरहद में घुसकर पाकिस्तानी भारत पर वार करते हैं तो राहुल गांधी का खून नहीं खौलता..! प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तो रिमोट संचालित हैं और उनकी चुप्पी समझ में आती है..! लेकिन राहुल गांधी के मामले में मेरा सामान्य ज्ञान लगता है थोड़ा कमजोर हैं..! राहुल गांधी क्या चीज है समझने की बहुत कोशिश की लेकिन समझ में नहीं आया..! इतना जरूर समझ आया कि इनके लिए देशभक्ति मायने नहीं रखती..! आपके पास जवाब हो तो जरूर शेयर कीजिएगा

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सोमवार, 14 जनवरी 2013

“लातों के भूत बातों से नहीं मानते”


पता नहीं क्यों लेकिन पाकिस्तान की एक - एक हरकत में उसका दोहरा चरित्र और हिंदुस्तान के प्रति नफरत ही झलकती है...जो किसी भी हिंदुस्तानी का खून खौलाने के लिए काफी है। पाकिस्तान आज भले ही हिंदुस्तानियों की नजर में भारत का दुश्मन नंबर एक हो लेकिन इस बात को नहीं नकारा जा सकता कि पाकिस्तान का जन्म हिंदुस्तान के गर्भ से ही हुआ था। पाकिस्तान की नसों में हिंदुस्तान के प्रति इतना जहर किसने भरा..? क्या ये पाकिस्तान में बैठे भारत के दुश्मन हैं या फिर पाकिस्तान में बैठे पाकिस्तान के ही दुश्मन हैं..? ये अपने आप में बड़ा सवाल है लेकिन इसका जवाब बहुत सीधा सा है कि ये लोग न तो भारत के दुश्मन हैं और न ही पाकिस्तान के दुश्मन हैं..! ये लोग अमन के दुश्मन हैं जो पाकिस्तानी हुकमुरानों की नसों में रह रहकर भारत के खिलाफ नफरत का जहर भरते रहते हैं। ये अमन के दुश्मन कभी नहीं चाहते कि पाकिस्तान और भारत के संबंध मधुर हों और शायद जब जब ऐसी कोई कोशिश भारत की तरफ से की जाती है...तो यही अमन के दुश्मन किसी न किसी ऐसा नापाक हरकत को अंजाम दे देते हैं कि दोनों देशों की बीच की जो खाई इन्होंने तैयार की है वह और चौड़ी हो जाती है। 1947 के बाद से ही लगातार कई बार पाकिस्तान ने अपनी नापाक हरकतों से जाहिर कर दिया कि पाकिस्तान के साथ अमन की उम्मीद करना बेमानी है लेकिन भारत सरकार ने इसके बाद भी आजादी के बाद से ही लगातार अमन की उम्मीदों के दीए जो जलाए रखा लेकिन पाकिस्तान ने हर बार सिर्फ पीठ पर वार ही किया है। पाकिस्तान की नापाक हरकतें इस कहावत को चरितार्थ करती है कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते यानि कि बर्दाश्त की हद से बाहर निकलकर अब वक्त आ गया है कि पाकिस्तान को उसकी भाषा में सबक सिखाया जाए। ज्यादा नहीं तो कम से कम जिस - जिस पोस्ट पर पाकिस्तानी सैनिक सीजफायर का उल्लंघन करें उस पोस्ट को नेस्तानाबूद कर पाकिस्तान को सबक सिखाया जाए कि हिंदुस्तानी सैनिकों की बंदूकों और तोपों में भी असली गोला बारूद भरा है। घटना के बाद पाकिस्तान का इस घटना अंजाम देने से इंकार करना उसकी पुरानी फितरत है...ऐसे में भारत को पाकिस्तान की बातों पर विश्वास कभी नहीं करना चाहिए। सीमा पर सैनिकों के साथ बर्बरता को शरारती तत्वों की हरकतें मानकर इसे नजरअंदाज करना न सिर्फ शहीदों का बल्कि पूरी भारतीय सेना और देश की आवाम का भी अपमान होगा। पाकिस्तान को न सिर्फ जैसे को तैसे की तर्ज पर सबक सिखाया जाना चाहिए बल्कि भारत को पाकिस्तान के साथ सभी प्रकार के कूटनीतिक संबंध भी खत्म कर देने चाहिए ताकि पाकिस्तान को ये एहसास हो कि भारत अपना और अपने वीर सैनिकों का अपमान कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता चाहे इसके लिए उसे अपने पड़ोसी से सभी मोर्चों पर मुंह क्यों न फेरना पड़े। पाकिस्तान के साथ ये सब इसलिए भी जरूरी है क्योंकि पाकिस्तान ने शांति वार्ता को हमेशा भारत की कमजोरी समझा है और जब – जब भारत ने अमन की उम्मीद को शांती के दीपों से रोशन करने की कोशिश की है तब तब पाकिस्तान ने कभी सीमा पर अपने सैनिकों के जरिए तो कभी आतंक के सौदागरों के जरिए भारत में खून की होली खेलकर भारत के कई परिवारों को कभी न खत्म होने वाले अंधेरे में धकेलने का काम किया है...ऐसे पाकिस्तान से अमन और शांती की उम्मीद करना बेमानी ही होगी।

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रविवार, 13 जनवरी 2013

बेबस मुख्यमंत्री बेबस सरकार..!


दिल्ली गैंगरेप के बाद से ही महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बहस छिड़ी है। संकुचित दिमाग के कुछ लोग महिलाओं के काम करने को ही गलत ठहरा रहे हैं तो कुछ कह रहे हैं कि महिलाओं को नाईट शिफ्ट में काम नहीं करना चाहिए..! इसमें एक और नाम शामिल हो गया है...उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा का..! बहुगुणा साहब कहते हैं कि महिलाएं शाम 6 बजे बाद घर से न निकलें। बहुगुणा साहब के इतिहास पर नजर डालें तो ये पता चलता है कि नेता होने से पहले विजय बहुगुणा जज हुआ करते थे। जो व्यक्ति जज रह चुका होवो महिलाओं को लेकर अगर इस तरह की बयानबाजी करता होऐसी सोच रखता हो कि महिलाओं को डर कर घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए तो निश्चित ही ऐसी व्यक्ति की सोच और काबिलियत पर शक होता है। वैसे भी बहुगुणा साहब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री है और सिर्फ महिलाओं की नहीं पूरे प्रदेश के हर एक शख्स की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उनके कंधे पर है, लेकिन वे महिलाओं को सुरक्षा मुहैया उपलब्ध कराने की बजाएउत्तराखंड में भयमुक्त वातावरण बनाने की बजाए महिलाओं को ही घर से बाहर न निकलने की नसीहत देते दिखाई दे रहे हैं। बहुगुणा साहब का ये बयान न सिर्फ उनकी संकुचित सोच को बयां करता है बल्कि ये भी साबित करता है कि उत्तराखंड की बहुगुणा सरकार प्रदेशवासियों को खासकर महिलाओं को सुरक्षा मुहैया कराने में नाकाम साबित हो रही है। शायद यही वजह है कि एक प्रदेश के मुख्यमंत्री को ऐसे बोल बोलने पड़ रहे हैं। वो भी एक ऐसे प्रदेश में जिसे देव भूमि माना जाता है और अन्य प्रदेशों की तुलना में उत्तराखंड में अपराध का ग्राफ भी बहुत ऊंचा नहीं है। यहां भी अगर सरकार महिलाओं को सुरक्षा मुहैया कराने में नामाक साबित हो रही है, प्रदेश में भय मुक्त वातावरण बनाने में नाकाम साबित हो रही है तो धिक्कार है ऐसी सरकार पर। बात यहीं तक रहती तो ठीक थी...प्रदेश की एक महिला मंत्री अमृता रावत तो अपने मुख्यमंत्री से दो कदम आगे ही निकल गई। ये कहती हैं कि महिलाओं को नाईट शिफ्ट में काम नहीं करना चाहिए और महिलाएं घर के कामकाज में ध्यान दें। आपको जानकर हैरानी होगी कि ये उत्तराखंड की महिला सशक्तीकरण मंत्री हैं जिनके कंधे पर महिलाओं को सशक्त करने की जिम्मेदारी भी है। अब आप समझ सकते हैं कि ये महिला मंत्री अपनी जिम्मेदारी कितनी संजीदगी से निभा रही होंगी जब ये महिला होकर महिलाओं के प्रति ऐसी सोच रखती हैं। प्रदेश में अपराधियों पर लगाम कसने में बहुगुणा सरकार नाकाम है, एक भय मुक्त वातावरण बनाने में सरकार नाकाम है और सजा भुगतें यहां की महिलाएं...घर में कैद होकर, घर से बाहर न निकल कर, अपनी आजादी को दबाकर, अपने सपनों को छिपाकर, अपनी उम्मीदों का गला घोंटकर। वाह मुख्यमंत्री साहब वाह...महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहन नहीं दे सकते न सही, सुरक्षा नहीं दे सकते तो न सही...कम से कम उनकी आजादी पर तो ग्रहण मत लगाइए। अपराधियों पर तो अपका बस चलता नहीं तो महिलाओं को ही नसीहत देकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर ली। अरे साहब आप तो जज रहे हो वर्तमान में प्रदेश के मुखिया हो आपसे तो कम से कम ये उम्मीद नहीं थी...ये सब बोलने से पहले अपने पद और गरिमा का ही ख्याल रख लेते। उम्मीद करते हैं आप भविष्य में अपनी कुर्सी के साथ ही प्रदेश की महिलाओं का मान रखेंगे और अगली बार कुछ बोलकर नहीं कुछ ऐसा करके दिखाएंगे जिससे लोग आपकी थू-थू करने की बजाए आपकी तारीफ करें।

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शनिवार, 12 जनवरी 2013

39 वर्ष का "बड़ा" जीवन


सिर्फ 39 वर्ष 5 महीने और 24 दिन का छोटा सा जीवन लेकिन कद इतना बड़ा की विश्व में करोड़ों लोग स्वामी विवेकानंद को न सिर्फ अपना आदर्श मानते हैं बल्कि उनके दिखाए मार्ग पर चलते हैं। मनुष्य अपनी आयु पूरी करे तो भी उसे लगता है कि ये जीवन छोटा है। अपने जीवनकाल में मनुष्य सिर्फ अपनी व अपने परिवार की परेशानियों में ही उलझा रहता है कि समाज से उसे कुछ लेना देना नहीं होता है, लेकिन स्वामी विवेकानंद ने इस सब से परे न सिर्फ भारतवासियों के मन में भारत की गौरवशाली परंपरा और संस्कृति के प्रति आत्मविश्वास और आत्मसम्मान का संचार किया बल्कि समूचे विश्व में भारतीय आध्यात्म का परचम भी लहराया। भले ही आजादी से 45 साल पहले सन 1902 में ही स्वामी विवेकानंद का निधन हो गया लेकिन आजादी की लड़ाई में स्वामी विवेकानंद के योगदान को कोई कैसे भूल सकता है। वे विवेकानंद ही थे, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में भारत वासियों में एक नई ऊर्जा का संचार किया। समाज को स्वाभिमान, साहस और कर्म की प्रेरणा देने वाले स्वामी विवेकानंद के मंत्र से ही मूर्छित समाज में नई ऊर्जा का संचार हुआ।
उठो जागो और तब तक मत रुको, जब तक लक्ष्य को प्राप्त न कर लो कहने वाले स्वामी जी ने 25 वर्ष की आयु में संन्यास लेने के बाद सिर्फ 14 वर्षों में ही बिना किसी साधन औऱ सुविधा के सिर्फ एक महान संकल्प के बल पर भारत का मान बढ़ाया। विवेकानंद का जीवन बताता है कि कैसे बिना किसी साधन और सुविधा के सिर्फ एक संकल्प के बल पर युवा समाज की देश की सोच बदल सकते हैं।
आज भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा युवा हैं। 70 फीसदी भारतीय 35 साल से कम के हैं। युवाओं के दम पर ही विश्व में भारत के सर्वशक्तिमान बनने की बातें की जाती हैं लेकिन ये बातें तब तक साकार रूप नहीं लेंगी जब तक भारत की युवा आबादी नई सोच और सकारात्मक ऊर्जा से भरी नहीं होगी। आज जरूरत है युवाओं को...युवाओं की ऊर्जा को सकारात्मक सोच और दिशा देने की। आज जरूरत है युवाओं को एक ऐसे नेतृत्व की जो स्वामी विवेकानंद की तरह ऊर्जावान हो और सबसे बड़ी बात कि सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर हो। लेकिन ये देश का दुर्भाग्य ही है कि युवा आबादी आज नेतृत्व विहिन है।
देश के जो युवा नेता नेतृत्व देने की स्थिति में हैं भी वे भी अपने निजि हितों को साधने के काम में लगे हुए हैं। बीते कुछ सालों में मुझे ऐसा कोई मौका याद नहीं आता चुनाव को छोड़कर जब इन कथित युवा नेताओं ने युवाओं के लिए कुछ करने की बात की हो या युवा शक्ति के बल पर कुछ करने की ठानी हो। ज्यादा पीछे न भी जाएं तो दिल्ली गैंगरेप के बाद राजपथ पर युवाओं के आंदोलन को ही देख लें। राजपथ पर युवाओं का गुस्सा चरम पर था और जरूरत थी ऐसे वक्त पर एक युवा नेतृत्व की जो सकारात्मक सोच के साथ आंदोलन को सही दिशा की ओर लेकर जाए लेकिन यहां भी हमें ऐसा देखने को नहीं मिला। देश के किसी भी कथित युवा नेता ने निजि स्वार्थों से ऊपर उठकर, पार्टी लाइन से ऊपर उठकर इंसाफ की लड़ाई के लिए शुरु हुए युवाओं के इस आंदोलन को नेतृत्व प्रदान करना तो दूर वहां पहुंचने की हिम्मत नहीं दिखाई। ऐसे वक्त पर एक सक्षम, ऊर्जावान और नेतृत्व की कमी साफ झलकती है और लगता है कि काश एक बार फिर से हमारे बीच पैदा हों एक और स्वामी विवेकानंद। स्वामी जी की 150वीं जयंती पर कोटि कोटि नमन।

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बलात्कार- 1971 से लगातार..!


हिंदुस्तान में जैसे जैसे लोग साक्षर होते गए...देश की साक्षरता दर बढ़ती गई वैसे वैसे भारत में अपराधों का ग्राफ भी चढ़ता गया। 15 अगस्त 1947 को आजादी के वक्त भारत की सक्षरता दर करीब 12 फीसदी थी जो 2011 में बढ़कर 74.04 फीसदी तक पहुंच गई है। जबकि देश में अलग-अलग अपराधों का ग्राफ 193.8 फीसदी से लेकर 873.3 फीसदी तक बढ़ा है। साक्षरता दर और अपराधों का बढ़ता ग्राफ ये दोनों ही आंकड़ें सरकारी हैं इसलिए आप इसे नकार नहीं सकते।
साक्षरता दर में जहां सरकारी कर्मचारियों ने जनगणना के दौरान घर - घर जाकर पूरा डाटा तैयार किया है...तो अपराधों के ग्राफ का ये वो आंकड़ा है, जिसे एनसीआरबी यानि राष्ट्रीय अपराध नियंत्रण ब्यूरो देशभर से एकत्र करता है और इसमें वही अपराध की घटनाएं शामिल हैं, जिनकी शिकायत देश के किसी न किसी पुलिस थाने में कभी न कभी दर्ज हुई है, यानि कि इसमें हजारों – लाखों अपराधों की वो लंबी फेरहिस्त शामिल नहीं है, जिन मामलों की शिकायत अपराध होने के बाद थाने तक पहुंचते ही नहीं या यूं कहें कि उन्हें पहुंचने ही नहीं दिया जाता या अगर किसी तरह पहुंच गए तो थाने के रजिस्टर में वे शिकायत दर्ज की नहीं की जाती..!
दिल्ली गैंगरेप के बाद बलात्कार को लेकर हो हल्ला मचा है लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या इस घटना से पहले किसी के साथ कोई बलात्कार नहीं हुआ..? या किसी महिला की अस्मत इससे पहले नहीं लूटी गई..?  आजादी के बाद से देश में किसी एक अपराध के ग्राफ में 800 फीसदी का ईजाफा हुआ है, तो वो बलात्कार है।
एनसीआरबी के 1953 से लेकर 2011 तक के अपराध के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। 1953 के बाद से चोरी के मामलों में करीब 193.8 फीसदी का ईजाफा दर्ज किया गया तो हत्या के मामले 250 फीसदी तक बढ़े। इसके साथ ही देशभर में दंगे भड़कने की घटनाएं 233.7 फीसदी तक बढ़ी तो अपहरण और बहला फुसला कर भगा ले जाने की घटनाओं में 749 फीसदी का ईजाफा दर्ज किया गया। एनसीआरबी 1953 से देशभर में अपराधों का रिकार्ड एकत्र कर रहा है, लेकिन एनसीआरबी ने बलात्कार के आंकड़ें 1971 से एकत्र करना शुरु किया। 1971 के बाद से देश में बलात्कार की घटनाएं 873.3 फीसदी तक बढ़ी हैं। 1971 में जहां देशभर में 2 हजार 487 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए...वहीं 2011 में 24 हजार 206 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए। इसके अलावा उन मामलों की फेरहिस्त भी काफी लंबी है जिनकी शिकायत थाने तक पहुंचने ही नहीं या पहुंचने ही नहीं दी गई..! बलात्कार 1971 से पहले भी होते थे और आजादी से पहले भी...उसका भले ही कोई पूर्ण आधिकारिक आंकड़ा एक जगह नहीं हो लेकिन सच तो ये है कि महिला की अस्मत पहले भी लूटी जाती थी और आज भी तार तार होती है।
बलात्कार के मामलों  में 40 साल में करीब 800 फीसदी तक का ईजाफा हैरान करने वाला है और कई सवाल खड़े करता है..! हम कैसे लोगों के बीच रह रहे हैं..? हम कैसे समाज में रह रहे हैं..? क्या ऐसे वातावरण में हमारी मां, बहन, बेटियां सुरक्षित हैं..? क्या वे बेखौफ होकर अकेले घर से बाहर निकल सकती हैं..? इसका जवाब है- नहीं..! आज भले ही हम सभ्य और साक्षर समाज में रहने की बात करते हों, लेकिन सच्चाई तो यही है कि महिलाएं देश के किसी भी कोने में सुरक्षित नहीं हैं फिर चाहे वो देश की राजधानी दिल्ली हो या फिर किसी राज्य का कोई छोटा सा गांव या कस्बा..! बलात्कार जैसे अपराध को अंजाम देने वाले मानसिक विकृति से ग्रसित लोग हर जगह मौजूद हैं और अपनी हवस को पूरी करने के लिए महिलाओं की ईज्जत को तार – तार करने का कोई मौका नहीं छोड़ते।
सबसे बड़ी बात ये है कि बलात्कार करने वाले सिर्फ अनपढ़ या कम पढ़े लिखे लोग ही नहीं हैं बल्कि शिक्षित लोग(सभी शामिल नहीं) भी बलात्कार की घटनाओं को खूब अंजाम दे रहे हैं। जाहिर है...अपराध...वो भी बलात्कार जैसा अपराध करने वाला शख्स स्वस्थ मानसिकता का तो नहीं हो सकता। वो एक गंभीर मानसिक विकृति का शिकार होता है फिर चाहे वो कितना ही पढ़ - लिख क्यों न ले लेकिन महिलाओं के प्रति उसकी सोच नहीं बदलती। समाज में रह रहे ऐसे शख्स किसी न किसी रूप में कभी न कभी मौका मिलने पर ऐसा अपराध करते हैं। साक्षरता को अपराध से जोड़ने का मेरा मंतव्य ये था कि अगर सभी लोग साक्षर हो भी जाएं तो भी ऐसा नहीं है कि अपराध खासकर बलात्कार जैसे अपराध रूक जाएंगे या कम हो जाएंगे।
जरूरत है सोच बदलने की...जब तक व्यक्ति की सोच नहीं बदलेगी महिलाओं के लिए उसके दिल में अपनी मां, बहन, बेटी जैसा प्यार और सम्मान नहीं पैदा होगा तब तक बलात्कार जैसी घटनाएं कम नहीं होंगी। इसके लिए जरूरत है एक स्वस्थ समाज के निर्माण की और इसकी शुरुआत हमें अपने घर से...अपने दफ्तर से...अपने गली-मोहल्ले, शहर से करनी होगी और अपने आस पास एक ऐसा वातावरण तैयार करना होगा जहां महिलाएं बेखौफ होकर घर से बाहर निकल सकें...सभी से मिल सकें...आईए संकल्प लें ऐसे स्वस्थ समाज के निर्माण का।

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