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रविवार, 20 जनवरी 2013

चिंतन शिविर- चिंता कम हुई या बढ़ गयी..?


कांग्रेस का चिंतन शिविर राहुल गांधी को कांग्रेस में आधिकारिक रूप से नंबर दो की पोजीशन में पहुंचाने के साथ खत्म हुआ हालांकि राहुल गांधी सोनिया के बाद पहले भी नंबर दो थे ऐसे में चिंतन शिविर की खोज उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर किसी को आश्चर्य तो नहीं ही हुआ होगा। लेकिन बडा सवाल ये है कि क्या जयपुर में तीन दिन तक चले चिंतन शिविर के बाद वाकई में कांग्रेस की चिंता कम हुई है या फिर बढ़ गई है..!  चिंतन शिविर के पहले दिन सोनिया गांधी ने कांग्रेस के खिसकते वोटबैंक पर चिंता जताई तो दूसरे दिन पूरा माहौल राहुलमय दिखाई दिया और कांग्रेसियों को पार्टी के खिसकते वोटबैंक को बचाने और 2014 में यूपीए की हैट्रिक के लिए राहुल से बेहतर विकल्प नहीं दिखा लिहाजा कांग्रेस कोर कमेटी ने भी देरी नहीं कि और राहुल गांधी को महासचिव की कुर्सी से उपाध्यक्ष की कुर्सी पर बैठा दिया। दरअसल भ्रष्टाचार, महंगाई और सरकार के कई फैसलों को लेकर सवालों में घिरी मनमोहन सरकार के लिए 2014 का चुनाव आसान तो बिल्कुल नहीं कहा जा सकता ऐसे में कांग्रेस ने बडी ही चालाकी से राहुल गांधी के नाम पर युवा वोटरों को रिझाने की कोशिश की है और युवाओं के दम पर यूपीए की हैट्रिक लगाने की तैयारी कर ली है। राहुल को आधिकारिक तौर पर पार्टी में नंबर दो की पोजीशन में बैठाना इसकी शुरूआत है। 8 साल के राजनीतिक जीवन में तीन बडे राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को जीत न दिला पाना भी राहुल चैप्टर का हिस्सा रहा तो 2009 में उत्तर प्रदेश में पार्टी की सीटों की संख्या 9 से 21 तक पहुंचाना राहुल की एकमात्र उपलब्धि के तौर पर गिना जाता है। हालांकि इन 8 सालों में राहुल ने ताकत तो पूरी लगाई लेकिन इसका ठीकरा सीधे सीधे राहुल के सिर नहीं फूटा क्योंकि वे हमेशा पर्दे के पीछे से ही कांग्रेस की नैया को पार लगाने की कोशिश करते रहे लेकिन अब की बार तस्वीर जुदा है और राहुल को अब फ्रंट फुट पर आकर बैटिंग करनी है। 2014 के आम चुनाव से पहले 2013 में 9 राज्यों के विधानसभा चुनाव राहुल के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। राहुल के लिए इससे भी बड़ी चुनौती युवाओं का भरोसा जीतने की है क्योंकि बीते कुछ समय में देश से जुड़े कई अहम और संवेदनशील मुद्दों पर राहुल की खामोशी ने कई सवाल खडे किए हैं जिसने राहुल की एक नकारात्मक छवि युवाओं के बीच पैदा हुई है ऐसे में राहुल को इस छवि से बाहर निकलने के लिए खासी मेहनत करनी पड़ेगी। कुल मिलाकर राहुल को उपाध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेसी भले ही कांग्रेस की चिंता कम होने की बात कह रहे हों लेकिन वास्तव में कांग्रेस के साथ ही राहुल की भी चिंता बढ़ गई है क्योंकि 42 वर्ष के हो चुके राहुल गांधी के लिए 2014 का चुनाव ही सब कुछ है। 2014 में राहुल का जादू नहीं चला तो फिर राहुल को भी पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी की जमात में आने में देर नहीं लगेगी। चितंन शिविर के तीसरे दिन हालांकि राहुल ने उपाध्यक्ष बनने के बाद पहली बार भाषण देते हुए युवाओं को साथ लेकर आगे बढने की बात कहने के साथ मजे - मजे में सत्ता हासिल करने का दम तो भरा है लेकिन राहुल गांधी भी इस बात को जानते हैं कि ये काम इतना आसान होता तो जयपुर चिंतन शिविर की जरूरत ही नहीं पडती। तीसरे दिन राहुल गांधी के अलावा सत्ता की राह को आसान बनाने के लिए हिंदु आतंकवाद के नाम को जन्म देने वाले गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे को  कैसे भूल सकते हैं जिन्होंने अलंपसंख्यक वोटों के लिए हिंदुओं पर सवाल खड़े कर दिए और हिंदुओं पर अल्पसंख्यकों को बदनाम करने का आऱोप मढ़ डाला। दरअसल ये शिंदे साहब की भी गलती नहीं है...वे बेचारे तो सोनिया की उस चिंता को कम कर रहे थे जो सोनिया ने चिंतन शिविर के पहले दिन जताई थी कि पार्टी का पारंपरिक वोटबैंक खिसक रहा है। अब शिंदे साहब ठहरे कांग्रेस भक्त कैसे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया की चिंता को कम करने के लिए कुछ न करते सो अल्पसंख्यक वोटों को साधने के लिए हिंदु आतंकवाद के नाम को ही जन्म दे दिया।  

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आतंकवादी हैं हिंदु..!


पी चिदंबरम के बाद ये फिर से एक कांग्रेसी ही है और देश के गृहमंत्री की कुर्सी पर ही विराजमान हैं...जो आतंकवाद को धर्म और जाति से जोड़ते हैं। पहले तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम ये कारनामा करते हैं और भगवा आतंकवादके नए नाम को जन्म देते हैं और अब देश के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे हिंदु आतंकवाद के नाम को जन्म देते हैं। शिंदे साहब आप राजनीति में हैं...जाहिर है सत्ता तक पहुंचना आपका एकमात्र मकसद रहता है और वोटों का खिसकना आपके माथे पर बल डाल देता है लेकिन वोट बैंक के लिए आप इतना गिर जाएंगे कि आंतकवाद को जाति और धर्म से जोडने लगे। शिंदे साहब देश की सीमा से भारत में घुसपैठ कर रहे आतंकी आपको नहीं दिखाई देते..! हमारे सैनिकों का हमारी सीमा में घुसकर सिर कलम करने वाले पाकिस्तानी सैनिक आपको नहीं दिखाई देते..! संसद में हमला करने वाले आतंकी आपको नहीं दिखाई देते..! 26/11 को मुंबई को दहलाने वाले आपको नहीं दिखाई देते..! इसके साथ ही देश में अलग – अलग हिस्सों में हुई आतंकवादी घटनाएं आपको नहीं दिखाई देते..! आपको दिखाई दे रहा है तो हिंदु आतंकवाद। गजब करते हो महाराज आतंकी हमले करने वाले आतंकवादी क्या किसी घटना को अंजाम देने से पहले वहां मौजूद लोगों की जाति देखते हैं या फिर आतंकी हमले में सिर्फ किसी जाति विशेष के ही लोग ही मारे जाते हैं..? ऐसा तो नहीं है न फिर आप कैसे आतंकवाद को किसी धर्म से किसी जाति से जोड़ सकते हो..! आपने कहा ये अल्पसंख्यकों को बदनाम करने की साजिश है...इसका मतलब तो ये हुआ शिंदे साहब कि आप पहले से ही ये मानकर बैठे हैं कि सिर्फ अल्पसंख्यक ही आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देते हैं। शिंदे साहब आतंकवाद की न कोई जाति होती है और न कोई धर्म...वे किसी भी घटना को अंजाम देने से पहले...किसी को मारने से पहले ये नहीं सोचते कि मरने वाले किस जाति के हैं..? वे सिर्फ मानवता के दुश्मन होते हैं और किसी भी मुल्क में अमन और चैन इन्हें बर्दाश्त नहीं होता। इनका सिर्फ एक ही मकसद होता है और वो है सिर्फ तबाही। शिंदे साहब आपके कंधे पर तो देश की सुरक्षा की...देश के लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है और आप ही आतंकवाद को धर्म और जाति से जोड़कर देश को बांटने का काम कर रहे हैं..! शर्म करो शिंदे साहब शर्म करो वोटबैंक के लिए देश के दो टुकड़े तो मत करो। शर्म करो..शर्म करो..!!

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शनिवार, 19 जनवरी 2013

वाह री कांग्रेस- पार्टी की चिंता...देश की नहीं !


पाकिस्तान हमारी सीमा में दाखिल होकर हमारे सैनिकों के सिल कलम कर देता है लेकिन हमारी सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस पर अपनी प्रतिक्रिया देने में एक सप्ताह का वक्त लगा देते हैं। अब मनमोहन सिंह मामले के ठंडे होने का इंतजार कर रहे थे या फिर उनका खून भी उनकी उम्र के साथ ठंडा पड़ गया है ये तो वे ही बेहतर बता सकते हैं।
हद तो तब हो गयी जब कांग्रेस पार्टी देशहित से जुड़े इस संवेदनशील मुद्दे पर ठोस कार्रवाई करने की बजाए जयपुर में चितंन शिविर में 2014 की चिंता में डूब जाती है। उन्हें देश की सीमा पर तैनात अपने जांबाज सैनिकों की चिंता नहीं है..! उन्हें देश के दुश्मन पाकिस्तान की नापाक इरादों की भनक नहीं है..! उन्हें सीमा पार घुसपैठ की फिराक में घात लगाकर बैठे आतंकियों से देश को बचाने की चिंता नहीं है..!
उन्हें चिंता है तो पार्टी से छिटक रहे उनके पारंपरिक वोट बैंक को बचाने की..! उन्हें चिंता है तो 2014 में तीसरी बार केन्द्र की सत्ता में आने की..! उन्हें चिंता है तो पार्टी के नेताओं में तालमेल की कमी की..! उन्हें चिंता है तो राहुल गांधी को बड़ी जिम्मेदारी देने की..! उन्हें चिंता है तो राहुल गांधी को देश का प्रधानमंत्री बनाने की..!
ये देश की सबसे बड़ी पार्टी है और इस पार्टी का नारा है...कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ। क्या वाकई में कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ है तो फिर इस पार्टी के लोग दुश्मन को सबक सिखाने की हिम्मत क्यों नहीं दिखा पाते हैं..! वो भी तब जब हमारे दो सैनिकों का सिर पाकिस्तानी सैनिक सीमा में घुसकर कलम कर देते हैं...और खुलेआम भारत को चुनौती देते हैं।
इस पार्टी की मुखिया सोनिया गांधी के साथ ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस के पीएम इन वेटिंग राहुल गांधी के पास नेताओं की बेटे-बेटियों की शाही शादियों में शरीक होने का वक्त है..! इनके पास पचमढ़ी और शिमला जैसे हिल स्टेशनों के साथ ही जयपुर में चल रहे चिंतन शिविर में 2014 में सत्ता हासिल करने के साथ ही राहुल गांधी को प्रधानमंत्री कैसे बनाए इसकी चिंता करने का तो वक्त है लेकिन देश के लिए अपनी जान कुर्बान करने वाले वीर सैनिकों के परिवार मिलने का वक्त नहीं है..!
ये छोड़िए इनके पास देश के दुश्मनों से कैसे निपटा जाए इसकी चिंता करने तक का वक्त नहीं है...शायद इसलिए सोनिया और राहुल गांधी पाकिस्तानी सैनिकों की बर्बर कार्रवाई पर चुप रहते हैं और मनमोहन सिंह अपना मुंह खोलने में एक सप्ताह का वक्त लगा देते हैं। सोनिया जी ये वक्त पार्टी की चिंता करने का नहीं देश की चिंता करने का है। ये वक्त सीमा पर विपरीत परिस्थितियों में विपरीत मौसम में मुस्तैदी से तैनात जाबांज सैनिकों की चिंता करने का है। ये वक्त देश को एक मजबूत और दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब देने वाली सरकार होने का भरोसा देश की जनता को देने का है। सोनिया जी...काश आप समझ पाती..!

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शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

गैरसैंण- सरकार का पिकनिक स्पॉट..!


9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड राज्य गठन के साथ ही देहरादून को उत्तराखंड की अस्थाई राजधानी घोषित कर दिया गया। राज्य बने हुए 12 साल का वक्त गुजर गया है लेकिन उत्तराखंड को आज तक स्थाई राजधानी नहीं मिल पाई। पहाड़ी राज्य की राजधानी पहाड़ में होने के तर्क के साथ कुमाऊं और गढ़वाल के केन्द्र बिंदु गैरसैंण को प्रदेश की राजधानी बने की मांग शुरु से उठती रही है ताकि पहाड़ में राजधानी होने से विकास की दौड़ में पीछे छूट गए पहाड़ का...पहाड़ में रहने वालों का विकास हो लेकिन अफसोस राज्य गठन के 12 साल बाद भी ये सिर्फ एक सपना ही है।
बहुगुणा सरकार ने भले ही गैरसैंण में कैबिनेट की बैठक कर गैरसैंण में विधानभवन बनाने का ऐलान करते हुए गैरसैंण में विधानभवन की नींव भी रख दी हो लेकिन इसके बाद भी प्रदेश की स्थाई राजधानी का सवाल जहां का तहां खड़ा है क्योंकि सरकार ने प्रदेश की स्थाई राजधानी के मसले पर अपना मुहं नहीं खोला है और न ही गैरसैँण को प्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने की ही बात कही है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि जब बहुगुणा सरकार को गैरसैंण को न प्रदेश की स्थाई राजधानी ही बनाना था और न ही ग्रीष्मकालीन राजधानी तो आखिर गैरसैंण में विधानभवन की नींव क्यों रखी गई..? गैरसैंण में जनता के करोड़ों रूपए खर्च क्यों किए जा रहे हैं...?
गैरसैंण में विधानभवन के साथ ही विधायक ट्रांजिट हॉस्टल और अधिकारी कर्मचारी हॉस्टल निर्माण का साफ मतलब ये है कि विधानभवन बनने के बाद गैरसैंण में विधानसभा सत्र तो होगा लेकिन क्या मात्र 2 या 3 दिन का विधानसभा सत्र पहाड़ में कर लेने से पहाड़ का विकास हो पाएगा..? गैरसैंण तक पहुंचने के लिए हवाई मार्ग को तरजीह देने वाले हमारे मुख्यमंत्री और मंत्रीगण क्या हवाई मार्ग से गैरसैंण पहुंचकर पहाड़ के पहाड़ से जीवन का दर्द और पहाड़ के लोगों का मर्म समझ पाएंगे..? विधानभवन बनने के बाद क्या सिर्फ 2 या 3 दिन का सत्र गैरसैंण में करना क्या सच में सरकार की पहाड़ के विकास के प्रति प्रतिबद्धता  है या फिर सत्र के बहाने गैरसैंण बनेगा करोड़ों की लागत से सरकार का एक सरकारी पिकनिक स्पॉट..?
ये सवाल उठने इसलिए भी लाजिमी हैं क्योंकि सरकार ने विधानभवन के निर्माण का ऐलान तो किया लेकिन गैरसैंण को स्थाई तो छोड़िए प्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी के सवाल पर सरकार चुप है। विपक्ष के साथ ही कांग्रेस के ही कई नेता और विधायक के साथ ही विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल भी गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने की पैरवी कर चुके हैं लेकिन मुख्यमंत्री ने मुंह नहीं खोला। 12 साल बाद गैरसैंण में विधानभवन के निर्माण की खबर से प्रदेशवासियों में खुशी की लहर थी लेकिन ये खुशी स्थाई राजधानी और ग्रीष्मकालीन राजधानी के सवाल पर सरकार की चुप्पी से पलभर में ही काफिर हो गई
स्थाई राजधानी के मसले पर सरकार की चुप्पी साबित करती है कि हमारे नेता चाहे वे किसी भी पार्टी के क्यों न हो ये नहीं चाहते कि सुगम मैदानी इलाके देहरादून की बजाए किसी दुर्गम पहाड़ी इलाके में प्रदेश की स्थाई राजधानी बने क्योंकि दुर्गम इलाके में राजधानी का मतलब है कि नेता और विधायकों को वहीं रहना होगा जो कि सुगम देहरादून में ऐशो आराम के आदि हो चुके हमारे नेताओं की आदत में नहीं है या कहें कि बस में ही नहीं है। वाकई में पहाड़ी राज्य  राजधानी पहाड़ में...चाहे वो गैरसैंण हो या कोई और जगह बनाना अगर हमारे विधायक और नेतागण दिल से चाहते तो शायद राज्य गठन के वक्त स्थाई न सही अस्थाई राजधानी देहरादून की बजाए गैरसैंण में बना दी गई होती तो स्थाई राजधानी के मसले को सुलझाया जा सकता था लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ क्योंकि ये लोग ऐसा कभी चाहते ही नहीं थे। गैरसैंण को 12 वर्ष पूर्व राज्य गठन के वक्त प्रदेश का केन्द बिंदु होने के नाते अस्थाई राजधानी ही बना दिया गया होता तो आज शायद गैरसैंण या कहें कि दुर्गम पहाड़ी इलाकों की तस्वीर कुछ और होती..!
यहां एक सवाल ये भी उठता है कि क्या वाकई में राज्य की राजधानी कहां है इससे प्रदेश के दूसरे इलाकों के विकास की तकदीर तय होती है..?  किसी भी प्रदेश की राजधानी कहीं भी हो लेकिन है तो वो पूरे प्रदेश की राजधानीऐसे में विकास का हक सिर्फ राजधानी और उसके आसपास के इलाकों को ही क्यों मिले..?
राजधानी से दूर दुर्गम और पिछड़े इलाकों के विकास के लिए सरकार और क्षेत्रीय विधायक अगर प्रतिबद्धता दिखाएं तो क्या उन इलाकों की तस्वीर नहीं बदल सकती..? क्या फर्क पड़ता है राजधानी देहरादून में हैगैरसैंण में है या फिर पिथौरागढ़ या उत्तरकाशी में...विकास की गंगा तो राजधानी से पूरे प्रदेश में बहनी चाहिए बस जरूरत है तो पूरे प्रदेश के विकास की सोच की...चाहे वो धारचूला हो या फिर उत्तरकाशी। जरूरत है अंतिम पंक्ति के हर व्यक्ति की तरक्की की सोच की लेकिन अफसोस हमारे राजनेताओं की सोच यहां पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देती है।

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गुरुवार, 17 जनवरी 2013

राहत का झुनझुना...


बढ़ती महंगाई के बीच यूपीए सरकार ने भले ही सब्सिडी वाले रसोई गैस सिलेंडरों की संख्या को 6 से बढ़ाकर 9 कर आमजन को राहत देनी की कोशिश की हो लेकिन डीजल के कीमतें तय करने का अधिकार तेल कंपनियों को देने का फैसला आने वाले दिनों में आम आदमी की जेब पर चौतरफा वार ही करेगा। पेट्रोलियम कंपनियों के अऩुसार उन्हें वर्तमान में डीजल पर 9 रूपए प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है। पेट्रोलियम कंपनियां सरकार से लंबे समय से डीजल के दाम बढ़ाने की मांग कर रही थी ऐसे में जब सरकार ने तेल कंपनियों को इसका अधिकार दे ही दिया है तो निश्चित है कि तेल कंपनियां एक झटके में न सही लेकिन धीरे धीरे डीजल के दाम बढ़ाकर आम आदमी को हलाल करेंगी यानि की आने वाले समय में या यूं कहें कि आने वाले कुछ घंटों या कुछ दिनों में ही डीजल कंपनियां दाम बढ़ाकर अपना घाटा पूरा करने की पूरी कोशिश करेंगी। डीजल के साथ दिक्कत ये है कि डीजल के दाम बढ़ने से सिर्फ डीजल महंगा नहीं होगा बल्कि डीजल से उपयोग होने वाली या डीजल से जुड़ी तमाम चीजों के दामों पर इसका असर पड़ेगा। जिसमें माल ढुलाई के साथ ही खेती, परिवहन, बिजली मुख्य रूप से शामिल हैं। तेल कंपनियां जैसे जैसे अपना घाटा पूरा करेंगी वैसे वैसे आम आदमी की जेब खाली होती जाएगी। जिस प्रकार सरकार का सब्सिडी वाले रसोई गैस सिलेंडर की बढ़ी हुई संख्या का लोगों को तुरंत फायदा मिलेगा उसी तरह तेल कंपनियों के हाथ में डीजल के दाम तय करने का सरकार का फैसला लंबे समय तक लोगों की जेब काटता रहेगा। सरकार में शामिल लोग या कांग्रेसी भले ही रसोई गैस सिलेंडरों की बढ़ी हुई संख्या पर वाहवाही लूटते हुए इसे सरकार की उपलब्धि वाली किताब में इसका उल्लेख कर रहे हों लेकिन आम आदमी ये कैसे भूल सकता है कि सब्सिडी वाले रसोई गैस सिलेंडरों की संख्या 6 तक सीमित करने का फैसला भी इसी सरकार का है। ये तो वही बात हुई कि पहले किसी चीज के दाम 10 रूपए बढ़ा दो और विरोध हो तो उसके दाम 5 रूपए कम कर दो...और फिर दाम कम करने का श्रेय ले लो...अऱे महाराज पांच रुपए तो फिर भी दाम बढ़े न। वैसे भी यूपीए सरकार रसोई गैस पर लोगों को राहत देने के लिए सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या में ईजाफा नहीं करती तो ये गैस सिलेंडर की आंच यूपीए को 2013 में 9 राज्यों में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव और 2014 के आम चुनाव में बुरी तरह झुलसा सकती थी ऐसे में यूपीए ने जल्द ही इस पर राहत देने का फैसला लेने में ही शायद गनीमत समझी। कुल मिलाकर यूपीए सरकार ने आम आदमी को राहत के नाम पर सिर्फ झुनझुना ही थमाया है।

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बुधवार, 16 जनवरी 2013

भ्रष्टाचारियों के लिए सबक


चार बार हरियाणा के मुख्यमंत्री रह चुके इनेलो प्रमुख ओम प्रकाश चौटाला ने सत्ता में रहते हुए शायद ही कभी सोचा होगा कि उनका आखिरी वक्त जेल की सलाखों के पीछे गुजरेगा। 1999-2000 में सत्ता में रहते हुए ये सत्ता का नशा ही था कि चौटाला ने करीब तीन हजार शिक्षकों की फर्जी भर्ती करा दी लेकिन कहते हैं कि पाप का घड़ा एक न एक दिन जरूर फूटता है और इस केस में भी ऐसा ही हुआ और आखिरकार 13 साल के बाद अदालत ने ओम प्रकाश चौटाला और उनके बेटे अजय चौटाला समेत 55 लोगों को इस घोटाले में दोषी माना है।
इस केस को 13 साल का लंबा वक्त जरूर लगा लेकिन इस केस ने लोगों में न्यायपालिका के प्रति एक नया विश्वास पैदा किया है। आज जबकि छोटे से छोटे सरकारी कर्मचारी(सभी नहीं) से लेकर बड़े से बड़ा राजनेता(सभी नहीं) भ्रष्टाचार के समुद्र में गोते लगा रहा हैं और कई बार हमने न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार के मामले देखे हैं जिसने न्यायपालिका पर भी लोगों का विश्वास कम होने लगा था...ऐसे वक्त में एक ऐसे प्रभावशाली राजनीतिक शख्सियत को दोषी ठहराया जाना जो चार बार किसी राज्य का मुख्यमंत्री रहा हो वाकई में अदालत का बड़ा फैसला है और ये फैसला निश्चित ही भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में मील का पत्थर साबित होगा।
अदालत का फैसला ये भी साबित करता है कि गलत काम करने वाला भले ही कितना प्रभावशाली क्यों न हो...उसका वर्तमान और इतिहास कुछ भी रहा हो लेकिन उसके गलत काम उसका भविष्य बिगाड़ने के लिए काफी हैं। चौटाला ने भी ताउम्र सत्ता के नशे में चूर होकर अपनी जिंदगी गुजारी लेकिन अदालत का ये फैसला चौटाला के गलत कामों का ही नतीजा है। इस फैसले से न्यायपालिका में लोगों को भरोसा जरूर मजबूत हुआ है लेकिन इसके बाद भी एक कसक मन में रह जाती है कि चौटाला ने जो काम 1999-2000 में किया था उसका दोष सिद्ध होने में 13 साल का वक्त क्यों लग गया..?
शायद वर्तमान में यही हमारी न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी है कि अदालत में केस सालों तक लंबित रहता है और फैसला आने में सालों लग जाते हैं। कई बार तो ट्रायल के दौरान लोगों की मौत तक हो जाती है लेकिन ट्रायल खत्म नहीं होता। इस केस को ही देख लें तो इस केस में भी ट्रायल के दौरान 6 लोगों की मौत हो गई।
देश की सर्वोच्च अदालत की ही अगर बात करें तो एक आंकड़े के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या करीब 60 हजार के करीब है तो देशभर के विभिन्न उच्च न्यायालयों में वर्ष 2011 तक लंबित मामलों की संख्या करीब 43 लाख 22 हजार है। इससे देशभर की विभिन्न अदालतों में लंबित मामलों की संख्या का अंदाजा भी आसानी से लगाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश के 31 पदों में से 6 रिक्त हैं तो देशभर के उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के 895 में से 281 पद खाली पड़े हैं जो कि न्यायालयों में लंबित मामलों की एक वजह है।
लंबित मामलों में अदालतें अगर तेजी दिखाएं और अदालतों में रिक्त पदों को भर दिया जाए तो निश्चित ही न सिर्फ लंबित मामलों में गिरावट आएगी बल्कि लोगों का विश्वास न्याय व्यवस्था के प्रति और गहरा होगा क्योंकि आज भी हमारे देश में बड़ी संख्या में लोग अदालतों में जाने से घबराते हैं। वे ये मानकर बैठे हैं कि कोर्ट में केस जाने पर उसका निपटारा होने में सालों लग जाएंगे और उन्हें कोर्ट के ही चक्कर काटने पड़ेंगे और इसमें उनका समय और पैसा दोनों खर्च होगा जिसका फायदा शातिर किस्म के लोग उठाते हैं। चौटाल के केस से हमारी न्याय व्यवस्था रोशन हुई है और ये उन नेताओं के साथ ही उन प्रभावशाली लोगों के लिए भी सबक है जो ये सोचते हैं कि कानून और व्यवस्था उनकी जेब में है और गलत काम करने पर भी कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। इसी उम्मीद के साथ कि अदालतें लंबित मामलों को लेकर गंभीर होंगी और सभी भ्रष्टाचारी एक दिन सलाखों के पीछे होंगे भारतीय न्याय व्यवस्था को सलाम।

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खंडूड़ी होंगे भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष..!


ये राजनीति की ही विडंबना है कि जिस नेता को एक दिन पहले तक पार्टी और कार्यकर्ता सिर आंखों पर बैठाने को तैयार रहते हैं वही नेता अगर सत्ता की राह में रोड़ा बनता दिखाई देता है या इसका जरा सा आभास भी होता है तो उसे किनारे होने में ज्यादा वक्त नहीं लगता..! भाजपा में गडकरी चैप्टर का क्लाइमैक्स भी कुछ ऐसा ही दिखाई दे रहा है और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में गडकरी का दूसरा कार्यकाल भी इसकी भेंट चढ़ सकता है..!
भाजपा 2014 में केन्द्र की सत्ता में आने को बेकरार है लेकिन भाजपा की ये बेकरारी पार्टी के नए अध्यक्ष को लेकर अब बेचैनी में बदल गई है। वजह साफ है जिस गडकरी के दूसरे कार्यकाल को मूर्त रूप देने के लिए भाजपा ने अपने संविधान में संशोधन तक कर डाला वहीं गडकरी अब भाजपा की गले की हड्डी बन गए हैं..! गडकरी के लिए सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था लेकिन गडकरी के भाजपा अध्यक्ष के रूप में दूसरे कार्यकाल पर गड़बड़ी उस वक्त शुरु हुई जब गडकरी की कंपनी पूर्ति लिमिटेड में बड़ा घालमेल होने की बात उजागर हुई। गडकरी की अपनी ही कंपनी उनके अध्यक्ष के दूसरे कार्यकाल में सबसे बड़ा रोड़ा बन गई और यूपीए सरकार को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरने वाली भाजपा अपनी ही पार्टी के अध्यक्ष के चलते बैकफुट पर आ गई।
दरअसल 2014 के चुनाव में भ्रष्टाचार बड़ा अहम मुद्दा रहेगा और भाजपा यूपीए टू में हुए भ्रष्टाचार और घोटाले को मुद्दा बनाकर कांग्रेस को मात देने की तैयारी कर रही है ऐसे में भाजपा ये कभी नहीं चाहेगी कि जिस मुद्दे को लेकर वो कांग्रेस को मात देने की तैयारी कर रही है वही मुद्दा उसके अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के चलते उस पर भारी पड़ जाए..! ऐसे में भाजपा के अधिकतर नेता भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे गडकरी की बजाए किसी ऐसे चेहरे को अध्यक्ष के रूप में चाहते हैं जो न सिर्फ ईमानदार और स्वच्छ छवि का हो बल्कि पार्टी में जिसकी सर्व स्वीकार्यता भी है।
राजनीति में ऐसे नेता तो ढूंढ़ना भूसे के ढेर में सुई ढूंढ़ने के बराबर है ऐसे में भाजपा के अंदर सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर वो नाम कौन होगा जो पार्टी में गडकरी की जगह ले सकता है..? ये सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि जो भी नेता इस कुर्सी पर विराजमान होगा उसका कद एकाएक बढ़ जाएगा।
बहरहाल भाजपा के अगले राष्ट्रीय अध्यक्ष को लेकर सस्पेंस बरकरार है लेकिन इसी बीच सूत्रों के हवाले से अंदर की खबर ये है कि इस कुर्सी के लिए भाजपा में दो नामों उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी और हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार के नाम पर भी मंथन हुआ है..! खबर ये भी है कि इस दौड़ में भ्रष्टाचार के आरोपों से अछूते रहे...ईमानदार और स्वच्छ छवि के माने जाने वाले बीसी खंडूड़ी आगे चल रहे हैं और सब कुछ ठीक ठाक रहा तो गडकरी के बाद बीसी खंडूड़ी भाजपा के अगले राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी पर विराजमान हो सकते हैं..!

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मंगलवार, 15 जनवरी 2013

लेकिन इनका खून नहीं खौलता..!


कांग्रेस में दो चीजें खास हैं मनमोहन सिंह और राहुल गांधी...दोनों में भी एक चीज खास है...मनमोहन सिंह देश के पीएम हैं तो राहुल गांधी कांग्रेसियों के पीएम इन वेटिंग। देश में कुछ हो जाए मनमोहन सिंह मुंह नहीं खोलते और राहुल गांधी मुंह नहीं दिखाते। दोनों अचानक से जाने कहां अंर्तधान हो जाते हैं। मौनी बाबा की आवाज सुनने को लोग तरस जाते हैं लेकिन मौनी बाबा का मौन नहीं टूटता और राहुल गांधी तो ढूंढ़े नहीं मिलते। गनीमत है सीमा पर भारतीय सैनिकों के साथ पाकिस्तान की बर्बरता पर पूरे एक सप्ताह बाद मनमोहन सिंह को बोलने अनुमति मिली। मनमोहन सिंह अपना मौन इस घटना के तुरंत बाद तोड़ लेते तो और ज्यादा प्रसन्नता होती। खैर देर आए दुरुस्त आए और पाकिस्तान के खिलाफ आपकी कठोर वाणी सुनकर अच्छा लगा लेकिन कांग्रेस युवराज राहुल गांधी को लगता है अभी तक फुर्सत नहीं मिली है। वो शायद अभी भी अंदरखाने कांग्रेस को मजबूत करने में लगे हैं..! वैसे राहुल जड़ों तक जाकर कांग्रेस को कितना मजबूत कर रहे हैं इसका नतीजा हम पहले बिहार, फिर उत्तर प्रदेश और गुजरात के विधानसभा चुनाव में देख चुके हैं। खैर राहुल गांधी कुछ ज्यादा ही व्यस्त हैं और ये व्यस्तता उनके लिए लगता है देश से भी बढ़कर है..! राहुल गांधी केन्द्र सरकार की योजनाओं का तो खूब बखान करते हैं लेकिन देश के लिए वे मुंह नहीं खोलते..! वे यूपीए सरकार में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे मंत्रियों की तो खूब पैरवी करते हैं लेकिन देश के लिए शहीद सैनिकों की शहादत पर मुंह नहीं खोलते..! वे विपक्ष पर भ्रष्टाचार के आरोपों पर तो खूब बरसते हैं लेकिन हमारे सैनिकों का सिर कलम करने वाले पड़ोसी पाकिस्तान के खिलाफ वे कुछ नहीं बोलते..! कांग्रेस पर कोई आरोप लगाए तो राहुल गांधी खूब गुर्राते हैं लेकिन देश की सरहद में घुसकर पाकिस्तानी भारत पर वार करते हैं तो राहुल गांधी का खून नहीं खौलता..! प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तो रिमोट संचालित हैं और उनकी चुप्पी समझ में आती है..! लेकिन राहुल गांधी के मामले में मेरा सामान्य ज्ञान लगता है थोड़ा कमजोर हैं..! राहुल गांधी क्या चीज है समझने की बहुत कोशिश की लेकिन समझ में नहीं आया..! इतना जरूर समझ आया कि इनके लिए देशभक्ति मायने नहीं रखती..! आपके पास जवाब हो तो जरूर शेयर कीजिएगा

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सोमवार, 14 जनवरी 2013

“लातों के भूत बातों से नहीं मानते”


पता नहीं क्यों लेकिन पाकिस्तान की एक - एक हरकत में उसका दोहरा चरित्र और हिंदुस्तान के प्रति नफरत ही झलकती है...जो किसी भी हिंदुस्तानी का खून खौलाने के लिए काफी है। पाकिस्तान आज भले ही हिंदुस्तानियों की नजर में भारत का दुश्मन नंबर एक हो लेकिन इस बात को नहीं नकारा जा सकता कि पाकिस्तान का जन्म हिंदुस्तान के गर्भ से ही हुआ था। पाकिस्तान की नसों में हिंदुस्तान के प्रति इतना जहर किसने भरा..? क्या ये पाकिस्तान में बैठे भारत के दुश्मन हैं या फिर पाकिस्तान में बैठे पाकिस्तान के ही दुश्मन हैं..? ये अपने आप में बड़ा सवाल है लेकिन इसका जवाब बहुत सीधा सा है कि ये लोग न तो भारत के दुश्मन हैं और न ही पाकिस्तान के दुश्मन हैं..! ये लोग अमन के दुश्मन हैं जो पाकिस्तानी हुकमुरानों की नसों में रह रहकर भारत के खिलाफ नफरत का जहर भरते रहते हैं। ये अमन के दुश्मन कभी नहीं चाहते कि पाकिस्तान और भारत के संबंध मधुर हों और शायद जब जब ऐसी कोई कोशिश भारत की तरफ से की जाती है...तो यही अमन के दुश्मन किसी न किसी ऐसा नापाक हरकत को अंजाम दे देते हैं कि दोनों देशों की बीच की जो खाई इन्होंने तैयार की है वह और चौड़ी हो जाती है। 1947 के बाद से ही लगातार कई बार पाकिस्तान ने अपनी नापाक हरकतों से जाहिर कर दिया कि पाकिस्तान के साथ अमन की उम्मीद करना बेमानी है लेकिन भारत सरकार ने इसके बाद भी आजादी के बाद से ही लगातार अमन की उम्मीदों के दीए जो जलाए रखा लेकिन पाकिस्तान ने हर बार सिर्फ पीठ पर वार ही किया है। पाकिस्तान की नापाक हरकतें इस कहावत को चरितार्थ करती है कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते यानि कि बर्दाश्त की हद से बाहर निकलकर अब वक्त आ गया है कि पाकिस्तान को उसकी भाषा में सबक सिखाया जाए। ज्यादा नहीं तो कम से कम जिस - जिस पोस्ट पर पाकिस्तानी सैनिक सीजफायर का उल्लंघन करें उस पोस्ट को नेस्तानाबूद कर पाकिस्तान को सबक सिखाया जाए कि हिंदुस्तानी सैनिकों की बंदूकों और तोपों में भी असली गोला बारूद भरा है। घटना के बाद पाकिस्तान का इस घटना अंजाम देने से इंकार करना उसकी पुरानी फितरत है...ऐसे में भारत को पाकिस्तान की बातों पर विश्वास कभी नहीं करना चाहिए। सीमा पर सैनिकों के साथ बर्बरता को शरारती तत्वों की हरकतें मानकर इसे नजरअंदाज करना न सिर्फ शहीदों का बल्कि पूरी भारतीय सेना और देश की आवाम का भी अपमान होगा। पाकिस्तान को न सिर्फ जैसे को तैसे की तर्ज पर सबक सिखाया जाना चाहिए बल्कि भारत को पाकिस्तान के साथ सभी प्रकार के कूटनीतिक संबंध भी खत्म कर देने चाहिए ताकि पाकिस्तान को ये एहसास हो कि भारत अपना और अपने वीर सैनिकों का अपमान कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता चाहे इसके लिए उसे अपने पड़ोसी से सभी मोर्चों पर मुंह क्यों न फेरना पड़े। पाकिस्तान के साथ ये सब इसलिए भी जरूरी है क्योंकि पाकिस्तान ने शांति वार्ता को हमेशा भारत की कमजोरी समझा है और जब – जब भारत ने अमन की उम्मीद को शांती के दीपों से रोशन करने की कोशिश की है तब तब पाकिस्तान ने कभी सीमा पर अपने सैनिकों के जरिए तो कभी आतंक के सौदागरों के जरिए भारत में खून की होली खेलकर भारत के कई परिवारों को कभी न खत्म होने वाले अंधेरे में धकेलने का काम किया है...ऐसे पाकिस्तान से अमन और शांती की उम्मीद करना बेमानी ही होगी।

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रविवार, 13 जनवरी 2013

बेबस मुख्यमंत्री बेबस सरकार..!


दिल्ली गैंगरेप के बाद से ही महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बहस छिड़ी है। संकुचित दिमाग के कुछ लोग महिलाओं के काम करने को ही गलत ठहरा रहे हैं तो कुछ कह रहे हैं कि महिलाओं को नाईट शिफ्ट में काम नहीं करना चाहिए..! इसमें एक और नाम शामिल हो गया है...उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा का..! बहुगुणा साहब कहते हैं कि महिलाएं शाम 6 बजे बाद घर से न निकलें। बहुगुणा साहब के इतिहास पर नजर डालें तो ये पता चलता है कि नेता होने से पहले विजय बहुगुणा जज हुआ करते थे। जो व्यक्ति जज रह चुका होवो महिलाओं को लेकर अगर इस तरह की बयानबाजी करता होऐसी सोच रखता हो कि महिलाओं को डर कर घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए तो निश्चित ही ऐसी व्यक्ति की सोच और काबिलियत पर शक होता है। वैसे भी बहुगुणा साहब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री है और सिर्फ महिलाओं की नहीं पूरे प्रदेश के हर एक शख्स की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उनके कंधे पर है, लेकिन वे महिलाओं को सुरक्षा मुहैया उपलब्ध कराने की बजाएउत्तराखंड में भयमुक्त वातावरण बनाने की बजाए महिलाओं को ही घर से बाहर न निकलने की नसीहत देते दिखाई दे रहे हैं। बहुगुणा साहब का ये बयान न सिर्फ उनकी संकुचित सोच को बयां करता है बल्कि ये भी साबित करता है कि उत्तराखंड की बहुगुणा सरकार प्रदेशवासियों को खासकर महिलाओं को सुरक्षा मुहैया कराने में नाकाम साबित हो रही है। शायद यही वजह है कि एक प्रदेश के मुख्यमंत्री को ऐसे बोल बोलने पड़ रहे हैं। वो भी एक ऐसे प्रदेश में जिसे देव भूमि माना जाता है और अन्य प्रदेशों की तुलना में उत्तराखंड में अपराध का ग्राफ भी बहुत ऊंचा नहीं है। यहां भी अगर सरकार महिलाओं को सुरक्षा मुहैया कराने में नामाक साबित हो रही है, प्रदेश में भय मुक्त वातावरण बनाने में नाकाम साबित हो रही है तो धिक्कार है ऐसी सरकार पर। बात यहीं तक रहती तो ठीक थी...प्रदेश की एक महिला मंत्री अमृता रावत तो अपने मुख्यमंत्री से दो कदम आगे ही निकल गई। ये कहती हैं कि महिलाओं को नाईट शिफ्ट में काम नहीं करना चाहिए और महिलाएं घर के कामकाज में ध्यान दें। आपको जानकर हैरानी होगी कि ये उत्तराखंड की महिला सशक्तीकरण मंत्री हैं जिनके कंधे पर महिलाओं को सशक्त करने की जिम्मेदारी भी है। अब आप समझ सकते हैं कि ये महिला मंत्री अपनी जिम्मेदारी कितनी संजीदगी से निभा रही होंगी जब ये महिला होकर महिलाओं के प्रति ऐसी सोच रखती हैं। प्रदेश में अपराधियों पर लगाम कसने में बहुगुणा सरकार नाकाम है, एक भय मुक्त वातावरण बनाने में सरकार नाकाम है और सजा भुगतें यहां की महिलाएं...घर में कैद होकर, घर से बाहर न निकल कर, अपनी आजादी को दबाकर, अपने सपनों को छिपाकर, अपनी उम्मीदों का गला घोंटकर। वाह मुख्यमंत्री साहब वाह...महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहन नहीं दे सकते न सही, सुरक्षा नहीं दे सकते तो न सही...कम से कम उनकी आजादी पर तो ग्रहण मत लगाइए। अपराधियों पर तो अपका बस चलता नहीं तो महिलाओं को ही नसीहत देकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर ली। अरे साहब आप तो जज रहे हो वर्तमान में प्रदेश के मुखिया हो आपसे तो कम से कम ये उम्मीद नहीं थी...ये सब बोलने से पहले अपने पद और गरिमा का ही ख्याल रख लेते। उम्मीद करते हैं आप भविष्य में अपनी कुर्सी के साथ ही प्रदेश की महिलाओं का मान रखेंगे और अगली बार कुछ बोलकर नहीं कुछ ऐसा करके दिखाएंगे जिससे लोग आपकी थू-थू करने की बजाए आपकी तारीफ करें।

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शनिवार, 12 जनवरी 2013

39 वर्ष का "बड़ा" जीवन


सिर्फ 39 वर्ष 5 महीने और 24 दिन का छोटा सा जीवन लेकिन कद इतना बड़ा की विश्व में करोड़ों लोग स्वामी विवेकानंद को न सिर्फ अपना आदर्श मानते हैं बल्कि उनके दिखाए मार्ग पर चलते हैं। मनुष्य अपनी आयु पूरी करे तो भी उसे लगता है कि ये जीवन छोटा है। अपने जीवनकाल में मनुष्य सिर्फ अपनी व अपने परिवार की परेशानियों में ही उलझा रहता है कि समाज से उसे कुछ लेना देना नहीं होता है, लेकिन स्वामी विवेकानंद ने इस सब से परे न सिर्फ भारतवासियों के मन में भारत की गौरवशाली परंपरा और संस्कृति के प्रति आत्मविश्वास और आत्मसम्मान का संचार किया बल्कि समूचे विश्व में भारतीय आध्यात्म का परचम भी लहराया। भले ही आजादी से 45 साल पहले सन 1902 में ही स्वामी विवेकानंद का निधन हो गया लेकिन आजादी की लड़ाई में स्वामी विवेकानंद के योगदान को कोई कैसे भूल सकता है। वे विवेकानंद ही थे, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में भारत वासियों में एक नई ऊर्जा का संचार किया। समाज को स्वाभिमान, साहस और कर्म की प्रेरणा देने वाले स्वामी विवेकानंद के मंत्र से ही मूर्छित समाज में नई ऊर्जा का संचार हुआ।
उठो जागो और तब तक मत रुको, जब तक लक्ष्य को प्राप्त न कर लो कहने वाले स्वामी जी ने 25 वर्ष की आयु में संन्यास लेने के बाद सिर्फ 14 वर्षों में ही बिना किसी साधन औऱ सुविधा के सिर्फ एक महान संकल्प के बल पर भारत का मान बढ़ाया। विवेकानंद का जीवन बताता है कि कैसे बिना किसी साधन और सुविधा के सिर्फ एक संकल्प के बल पर युवा समाज की देश की सोच बदल सकते हैं।
आज भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा युवा हैं। 70 फीसदी भारतीय 35 साल से कम के हैं। युवाओं के दम पर ही विश्व में भारत के सर्वशक्तिमान बनने की बातें की जाती हैं लेकिन ये बातें तब तक साकार रूप नहीं लेंगी जब तक भारत की युवा आबादी नई सोच और सकारात्मक ऊर्जा से भरी नहीं होगी। आज जरूरत है युवाओं को...युवाओं की ऊर्जा को सकारात्मक सोच और दिशा देने की। आज जरूरत है युवाओं को एक ऐसे नेतृत्व की जो स्वामी विवेकानंद की तरह ऊर्जावान हो और सबसे बड़ी बात कि सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर हो। लेकिन ये देश का दुर्भाग्य ही है कि युवा आबादी आज नेतृत्व विहिन है।
देश के जो युवा नेता नेतृत्व देने की स्थिति में हैं भी वे भी अपने निजि हितों को साधने के काम में लगे हुए हैं। बीते कुछ सालों में मुझे ऐसा कोई मौका याद नहीं आता चुनाव को छोड़कर जब इन कथित युवा नेताओं ने युवाओं के लिए कुछ करने की बात की हो या युवा शक्ति के बल पर कुछ करने की ठानी हो। ज्यादा पीछे न भी जाएं तो दिल्ली गैंगरेप के बाद राजपथ पर युवाओं के आंदोलन को ही देख लें। राजपथ पर युवाओं का गुस्सा चरम पर था और जरूरत थी ऐसे वक्त पर एक युवा नेतृत्व की जो सकारात्मक सोच के साथ आंदोलन को सही दिशा की ओर लेकर जाए लेकिन यहां भी हमें ऐसा देखने को नहीं मिला। देश के किसी भी कथित युवा नेता ने निजि स्वार्थों से ऊपर उठकर, पार्टी लाइन से ऊपर उठकर इंसाफ की लड़ाई के लिए शुरु हुए युवाओं के इस आंदोलन को नेतृत्व प्रदान करना तो दूर वहां पहुंचने की हिम्मत नहीं दिखाई। ऐसे वक्त पर एक सक्षम, ऊर्जावान और नेतृत्व की कमी साफ झलकती है और लगता है कि काश एक बार फिर से हमारे बीच पैदा हों एक और स्वामी विवेकानंद। स्वामी जी की 150वीं जयंती पर कोटि कोटि नमन।

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बलात्कार- 1971 से लगातार..!


हिंदुस्तान में जैसे जैसे लोग साक्षर होते गए...देश की साक्षरता दर बढ़ती गई वैसे वैसे भारत में अपराधों का ग्राफ भी चढ़ता गया। 15 अगस्त 1947 को आजादी के वक्त भारत की सक्षरता दर करीब 12 फीसदी थी जो 2011 में बढ़कर 74.04 फीसदी तक पहुंच गई है। जबकि देश में अलग-अलग अपराधों का ग्राफ 193.8 फीसदी से लेकर 873.3 फीसदी तक बढ़ा है। साक्षरता दर और अपराधों का बढ़ता ग्राफ ये दोनों ही आंकड़ें सरकारी हैं इसलिए आप इसे नकार नहीं सकते।
साक्षरता दर में जहां सरकारी कर्मचारियों ने जनगणना के दौरान घर - घर जाकर पूरा डाटा तैयार किया है...तो अपराधों के ग्राफ का ये वो आंकड़ा है, जिसे एनसीआरबी यानि राष्ट्रीय अपराध नियंत्रण ब्यूरो देशभर से एकत्र करता है और इसमें वही अपराध की घटनाएं शामिल हैं, जिनकी शिकायत देश के किसी न किसी पुलिस थाने में कभी न कभी दर्ज हुई है, यानि कि इसमें हजारों – लाखों अपराधों की वो लंबी फेरहिस्त शामिल नहीं है, जिन मामलों की शिकायत अपराध होने के बाद थाने तक पहुंचते ही नहीं या यूं कहें कि उन्हें पहुंचने ही नहीं दिया जाता या अगर किसी तरह पहुंच गए तो थाने के रजिस्टर में वे शिकायत दर्ज की नहीं की जाती..!
दिल्ली गैंगरेप के बाद बलात्कार को लेकर हो हल्ला मचा है लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या इस घटना से पहले किसी के साथ कोई बलात्कार नहीं हुआ..? या किसी महिला की अस्मत इससे पहले नहीं लूटी गई..?  आजादी के बाद से देश में किसी एक अपराध के ग्राफ में 800 फीसदी का ईजाफा हुआ है, तो वो बलात्कार है।
एनसीआरबी के 1953 से लेकर 2011 तक के अपराध के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। 1953 के बाद से चोरी के मामलों में करीब 193.8 फीसदी का ईजाफा दर्ज किया गया तो हत्या के मामले 250 फीसदी तक बढ़े। इसके साथ ही देशभर में दंगे भड़कने की घटनाएं 233.7 फीसदी तक बढ़ी तो अपहरण और बहला फुसला कर भगा ले जाने की घटनाओं में 749 फीसदी का ईजाफा दर्ज किया गया। एनसीआरबी 1953 से देशभर में अपराधों का रिकार्ड एकत्र कर रहा है, लेकिन एनसीआरबी ने बलात्कार के आंकड़ें 1971 से एकत्र करना शुरु किया। 1971 के बाद से देश में बलात्कार की घटनाएं 873.3 फीसदी तक बढ़ी हैं। 1971 में जहां देशभर में 2 हजार 487 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए...वहीं 2011 में 24 हजार 206 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए। इसके अलावा उन मामलों की फेरहिस्त भी काफी लंबी है जिनकी शिकायत थाने तक पहुंचने ही नहीं या पहुंचने ही नहीं दी गई..! बलात्कार 1971 से पहले भी होते थे और आजादी से पहले भी...उसका भले ही कोई पूर्ण आधिकारिक आंकड़ा एक जगह नहीं हो लेकिन सच तो ये है कि महिला की अस्मत पहले भी लूटी जाती थी और आज भी तार तार होती है।
बलात्कार के मामलों  में 40 साल में करीब 800 फीसदी तक का ईजाफा हैरान करने वाला है और कई सवाल खड़े करता है..! हम कैसे लोगों के बीच रह रहे हैं..? हम कैसे समाज में रह रहे हैं..? क्या ऐसे वातावरण में हमारी मां, बहन, बेटियां सुरक्षित हैं..? क्या वे बेखौफ होकर अकेले घर से बाहर निकल सकती हैं..? इसका जवाब है- नहीं..! आज भले ही हम सभ्य और साक्षर समाज में रहने की बात करते हों, लेकिन सच्चाई तो यही है कि महिलाएं देश के किसी भी कोने में सुरक्षित नहीं हैं फिर चाहे वो देश की राजधानी दिल्ली हो या फिर किसी राज्य का कोई छोटा सा गांव या कस्बा..! बलात्कार जैसे अपराध को अंजाम देने वाले मानसिक विकृति से ग्रसित लोग हर जगह मौजूद हैं और अपनी हवस को पूरी करने के लिए महिलाओं की ईज्जत को तार – तार करने का कोई मौका नहीं छोड़ते।
सबसे बड़ी बात ये है कि बलात्कार करने वाले सिर्फ अनपढ़ या कम पढ़े लिखे लोग ही नहीं हैं बल्कि शिक्षित लोग(सभी शामिल नहीं) भी बलात्कार की घटनाओं को खूब अंजाम दे रहे हैं। जाहिर है...अपराध...वो भी बलात्कार जैसा अपराध करने वाला शख्स स्वस्थ मानसिकता का तो नहीं हो सकता। वो एक गंभीर मानसिक विकृति का शिकार होता है फिर चाहे वो कितना ही पढ़ - लिख क्यों न ले लेकिन महिलाओं के प्रति उसकी सोच नहीं बदलती। समाज में रह रहे ऐसे शख्स किसी न किसी रूप में कभी न कभी मौका मिलने पर ऐसा अपराध करते हैं। साक्षरता को अपराध से जोड़ने का मेरा मंतव्य ये था कि अगर सभी लोग साक्षर हो भी जाएं तो भी ऐसा नहीं है कि अपराध खासकर बलात्कार जैसे अपराध रूक जाएंगे या कम हो जाएंगे।
जरूरत है सोच बदलने की...जब तक व्यक्ति की सोच नहीं बदलेगी महिलाओं के लिए उसके दिल में अपनी मां, बहन, बेटी जैसा प्यार और सम्मान नहीं पैदा होगा तब तक बलात्कार जैसी घटनाएं कम नहीं होंगी। इसके लिए जरूरत है एक स्वस्थ समाज के निर्माण की और इसकी शुरुआत हमें अपने घर से...अपने दफ्तर से...अपने गली-मोहल्ले, शहर से करनी होगी और अपने आस पास एक ऐसा वातावरण तैयार करना होगा जहां महिलाएं बेखौफ होकर घर से बाहर निकल सकें...सभी से मिल सकें...आईए संकल्प लें ऐसे स्वस्थ समाज के निर्माण का।

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गुरुवार, 10 जनवरी 2013

बलात्कार की ये कौन सी सभ्यता ?


बलात्कार एक बड़ा और संवेदनशील मुद्दा है...बलात्कारियों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाना चाहिए लेकिन दिल्ली गैंगरेप के 6 आरोपियों ने चलती बस में जिस हैवानियत का खेल खेला उसके बाद से बलात्कार औऱ बलात्कारियों को सजा को लेकर एक बहस छिड़ गई है। इस बहस के बीच में कुछ ऐसे बयान भी सामने आए जिनका इस बहस से कोई लेना देना नहीं था लेकिन ये बयान फिर भी सुर्खियां बटोरते रहे क्योंकि ये बयान उन नेताओं या लोगों के थे जिनकी हमारे समाज में एक पहचान है(भले ही किसी भी कारण से हो)। इस कड़ी में कई नाम शामिल हैं लेकिन संघ प्रमुख मोहन भागवत ने बलात्कार की घटनाओं को भारत और इंडिया से जोड़कर एक नई बहस को जन्म दे दिया। मोहन भागवत कहते हैं कि बलात्कार की घटनाएं ग्रामीण क्षेत्रों(भारत) की बजाए शहरी क्षेत्रों(इंडिया) में अधिक होती हैं। भागवत साहब ने ये कह तो दिया लेकिन क्या कभी ऐसा होता है कि अपराधी बलात्कार छोड़िए किसी भी अपराध को करने से पहले ये देखता है कि वो अपराध शहर में कर रहा है या गांव में..! मैंने तो ऐसे कभी न देखा न सुना कि अपराधी अपराध के लिए गांव की बजाए शहर को मुफीद जगह समझता है। अपराधी प्रवृत्ति का व्यक्ति घटिया मानसिकता का व्यक्ति अपने घर में भी अपराध करता है..और घर से बाहर भी। घटिया मानसिकता या घटिया सोच जगह की मोहताज नहीं होती...वो आदमी के दिमाग में होती है चाहे वो आदमी गांव में रह रहा हो या फिर शहर में...ऐसे में भागवत साहब का ये बयान तो किसी भी दृष्टि से तर्कसंगत नहीं लगता।
जहां तक बात है कि शहरी क्षेत्रों में (जिसे भागवत साहब इंडिया कहते हैं) संस्कार और परंपरा और उनके मूल्य समाप्ति की ओर अग्रसर हैं...तो हम ये नहीं कह सकते कि शहरी क्षेत्रों में रहने वाले सभी लोग संस्कारों और परंपराओं को त्याग चुके हैं...या उनमें ये नहीं बचे हैं क्योंकि शहरी क्षेत्रों में भी ऐसे लोग ऐसे परिवार मौजूद हैं(सभी शामिल नहीं) जिनमें आपको परंपराएं और संस्कार साफ दिखाई दे जाएंगे। जबकि इसके विपरित आप गांवों में चले जाईए तो हैरानी होगी की गांवों में जहां कहा जाता है कि संस्कार और परंपराएं निभाई जाती हैं उनका मूल्य समझा जाता है वहां पर कई लोगों में कई परिवारों में(सभी शामिल नहीं) आपको ये चीजें नगण्य मिलेंगी यानि मेरा कहने का आशय है कि व्यक्ति के रहने के स्थान से किसी चीज को लेकर हम न तो अनुमान लगा सकते हैं और न किसी तरह का कोई दावा कर सकते हैं। मानने वाले लोग समझने वाले लोग चाहे वो शहर में रह रहे हों या फिर गांवों में परंपराओं और संस्कारों का मूल्य समझते हैं और उनको निभाते भी हैं।
मुझे लगता है कि मोहन भागवत ने बलात्कार के संदर्भ में भारत और इंडिया का जिक्र कर कहीं न कहीं पश्चिमी सभ्यता का...वहां के रहन सहन का...तौर तरीकों पर विरोध प्रकट किया है लेकिन भागवत साहब ने उदाहरण गलत पेश कर दिया इससे न सिर्फ उनका बयान सुर्खियां बना बल्कि उन पर भारत और इंडिया के नाम पर देश को दो हिस्सों नें बांटने तक का आरोप लगा और उनकी जमकर आलोचना हो रही है जो होनी भी चाहिए क्योंकि तर्कसंगत तो उनका बयान कहीं से नहीं लगता।
ये कहना कि महिलाओं के पहनावे और पश्चिमी सभ्यता के कारण बलात्कार की घटनाएं ज्यादा हो रही हैं...ये मेरी समझ से तो परे है। इसके पीछे पहला उदाहरण तो क्रिमिनिल लॉ जर्नल में प्रकाशित आंकड़ों का ही देना चाहूंगा जो आंकड़ें बताते हैं कि हाई कोर्ट में 80 फीसदी और सुप्रीम कोर्ट में 75 फीसदी रेप केस ग्रामीण इलाकों से दर्ज थे जबकि वहीं गैंग रेप के मामलों में ये फीसदी 75 और 68 है। दूसरा अगर वाकई में ऐसा होता कि महिलाओं के पहनावे और पश्चिमी सभ्यता के कारण बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही हैं तो फिर ग्रामीण इलाकों में तो बलात्कार की एक भी घटना नहीं होनी चाहिए जबकि अनाधिकारिक तौर पर पुलिस थानों तक नहीं पहुंचने वाली बलात्कार के मामलों की तादाद दर्ज मामलों की तादाद में कहीं ज्यादा है। शहरों में तो कम से कम जागरूक महिलाएं शिकायत दर्ज कराने की लड़ने की हिम्मत जुटा लेती हैं लेकिन ग्रामीण इलाकों में ऐसा देखने को नहीं मिलता क्योंकि ऐसा करने पर बलात्कार करने वाले उन्हें डरा धमकाकर रखते हैं और पुलिस का रवैया भी वहां पर पीड़ित के प्रति बहुत सहयोगात्मक नहीं रहता है...ऐसे तमाम उदाहरण समय समय पर उजागर भी होते आए हैं। इसके साथ ही ग्रामीण और शहरी इलाकों में घरों में होने वाले बलात्कार के मामले न तो थाने तक पहुंचते हैं और न ही मीडिया की सुर्खियां बनते हैं क्योंकि बलात्कार करने वाले कई बार पीड़ित का पिता होता है...तो कई बार चाचा-ताऊ या भाई और मामा या फिर कोई और रिश्तेदार। अब इन्हें कौन सभ्यता का माना जाए गांव की...शहर की या फिर विदेशी सभ्यता। कुल मिलाकर अपराधी हर जगह अपराध करता है चाहे वो बलात्कार कर रहा हो या फिर कोई और अपराध...अब जहां घटिया मानसिकता के लोग...विकृत मानसिकता के लोग ज्यादा तादाद में होंगे जाहिर है वहां ये अपराध ज्यादा होंगे फिर चाहे वो शहर हो या फिर गांव...वहां महिलाएं कैसे कपड़े पहनती हैं या फिर वहां किस सभ्यता का बोलबाला है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

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बुधवार, 9 जनवरी 2013

मनमोहन को जगाओ, देश बचाओ !


देश की राजधानी दिल्ली में में दिल दहला देने वाले गैंगरेप की घटना...देश के आधा दर्जन राज्यों में बेखौफ नक्सलियों का आंतक और देश की सीमा पर पाकिस्तान का अमानवीय चेहरा...लेकिन हमारी सरकार खामोश है। गैंगरेप पर सरकार कहती है कि कड़े कानून बनाए जाएंगे ताकि दोबारा से ऐसी घटना न हो लेकिन दिल्ली गैंगरेप के तुरंत बाद देशभर से गैंगरेप और महिलाओं की हत्या की खबर आती है। झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा समेत तमाम राज्यों में नक्सली आए दिन उत्पात मचाते हैं और निर्दोष आदिवासियों के साथ ही भारतीय जवानों के खून की होली खेलते हैं लेकिन सरकार कहती है कि नक्सली हमारे ही बीच के लोग हैं और हम शांति से बातचीत से कोई हल निकालने का प्रयास करेंगे। पाकिस्तान सारी हदें पार कर भारत की सीमा में घुसकर भारतीय जवानों की हत्या कर उनके शव के साथ अमानवीय कृत्य करते हैं और हमारी सरकार पाकिस्तान से जवाब मांगती है और मामले की जांच की मांग करती है। सरकार पाकिस्तान से उम्मीद करती है कि पाकिस्तान इस घटना को लेकर गंभीरता दिखाएगा और सकारात्मक रवैया दिखाएगा। प्रधानमंत्री जी कब तक सोते रहोगे..? कब तक पकिस्तान से जवाब मांगते रहोगे..? पाकिस्तान लगातार कुछ समय के अंतराल पर अपनी नापाक ईरादों को जाहिर कर हमारे जवानों की हत्या करता आ रहा है और आप पाकिस्तान से जवाब मांग रहे हो..? अरे महाराज ये वक्त जवाब मांगने का नहीं है...ये वक्त है मुंहतोड़ जवाब देने का..! वरना आप जवाब ही मांगते रह जाओगे और वे एक – एक कर हमारे जवानों को हमारे घर में घुसकर मारते रहेंगे..! क्या आज तक ऐसा नहीं होता आया है..? क्या इससे पहले पाकिस्तान ने हमारे सैनिकों की हत्या कर उनके साथ अमानवीय व्यवहार नहीं किया है..? कारगिल युद्ध के शहीद कैप्टन सौरभ कालिया का केस तो आपको याद ही होगा...सुप्रीम कोर्ट को उस पर सरकार से जवाब तलब भी कर चुका है। सौरभ कालिया केस के बाद ही अगर सरकार चेत गई होती तो शायद पाक सैनिक अपने नापाक ईरादे दोहराने से पहले सौ बार सोचते...लेकिन अफसोस न तो उस वक्त सरकार जागी और न ही इस बार सरकार बहुत ज्यादा गंभीर दिखाई दे रही है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ सीमा पर ही पाक के नापाक ईरादे उजागर होते रहे हैं। मुंबई हमला हो या देश में होने वाली दूसरी आतंकी घटनाएं...इनको अंजाम देने वाले कहां से आए..? ये कौन थे..? ये किसी से छिपा नहीं है फिर भी आप बार – बार पाकिस्तान से जवाब मांगते हो..! उनके विदेश मंत्री हमारे देश में आकर हम पर ही सवाल खड़ा करके चले जाते हैं और आप फिर भी कुछ नहीं बोलते। महाराज ये वक्त है पाकिस्तान को उसके घर में घुसकर सबक सिखाने का है वरना प्रधानमंत्री जी आप सोते रह जाओगे और पहले पाकिस्तान और उसके बाद चीन अपने नापाक ईरादों में कामयाब हो जाएगा। वैसे आपसे बहुत ज्यादा उम्मीद तो है नहीं क्योंकि आपको तो कुछ बोलने से पहले और कुछ बोलने के बाद भी पूछते हो “”ठीक है

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मंगलवार, 8 जनवरी 2013

कुर्सी की दौड़ में पिछड़ा झारखंड..!


एक राज्य...12 साल में 8 सरकारें और 8 मुख्यमंत्री...10 बार सत्ता परिवर्तन...2 बार राष्ट्रपति शासन और एक बार फिर से कुर्सी की लड़ाई में वही सब...शायद यही अब झारखंड की नियति बन गई है। एक बार फिर से नेताओं की कुर्सी की लालसा राज्य के लोगों के सपनों पर भारी पड़ गई और कुर्सी न मिली तो झारखंड मुक्ति मोर्चा ने अर्जुन मुंडा सरकार से समर्थन वापस ले लिया। दरअसल जेएमएम की दलील है कि उसने राज्य की भाजपा सरकार को इस शर्त पर समर्थन दिया था कि 5 साल के कार्यकाल में 28 महीने भाजपा का मुख्यमंत्री रहेगा और 28 महीने जेएमएम का लेकिन भाजपा ने 28 माह पूरे होने के बाद सीएम की कुर्सी खाली करने से इंकार कर दिया जबकि भाजपा का जेएमएम के साथ ऐसे किसी समझौते से इंकार कर रही है। जो भी हो ये वाक्या ये बताने के लिए काफी है कि झारखंड के नेता सिर्फ राजनीति पर ही विश्वास करते हैं उन्हें राज्य से राज्य की जनता के सरोकारों से कोई सरोकार नहीं है। झारखंड में नेता सिर्फ कुर्सी के लिए चुनाव लड़ते हैं और चुनाव जीतने के बाद कुर्सी के लिए मारामारी का खेल झारखंड में राज्य गठन के बाद से ही चल रहा है। ये झारखंड का दुर्भाग्य ही है कि राज्य गठन के बाद से कोई सरकार अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी। अलग राज्य गठन के बाद जिस झारखंड का सपना वहां के लोगों ने देखा था वो 12 साल बाद भी साकार नहीं हो पाया। सपना था झारखंड को विकास के पथ पर ले जाने का...झारखंड में बेरोजगारी को दूर करने का...सपना था आदिवासियों के विकास का...सपना था अपने संसाधनों के बल पर झारखंड को समृद्ध राज्य बनाने का लेकिन झारखंड के कथित भाग्य विधाताओं ने अपनी सृमद्धि की कहानी तो लिखी लेकिन जिस राज्य की जनता के बल पर वे यहां तक पहुंचे उन्हें वे कुर्सी के नशे में भूल गए। झारखंड में या कहें देश में मधु कोड़ा से बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है जो निर्दलीय विधायक होने के बाद सीएम की कुर्सी तक पहुंचा लेकिन कुर्सी मिलने के बाद मधु कोड़ा ने झारखंड के इतिहास में ऐसा काला अध्याय जोड़ा जिसने आम जनता के रहे सहे भरोसे को भी तोड़ दिया। मधु कोड़ा ने जनता के उस भरोसे का भी खून किया जो राष्ट्रीय और क्षेत्रिय दलों से निराश होने के बाद जनता अपने बीच के किसी शख्स पर कर सकती थी। झारखंड में राजनीतिक अस्थिरता के लिए देखा जाए तो कई कारक जिम्मेदार हैं। अलग राज्य बनने के बाद भी प्रदेश की जनता ने न तो पूरी तरह से राष्ट्रीय दलों का ही हाथ थामा और न ही क्षेत्रीय दलों का दामन। नतीजा ये हुआ कि अपनी अपनी महत्वकांक्षाओं को पूरा करने के लिए एक – दूसरे की नाव पर सवार राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी इसका भरपूर फायदा उठाया। राज्य में राजनीतिक अस्थिरता के बाद एक बार फिर से झारखंड उसी मुहाने पर खड़ा है...जिसने 12 सालों में झारखंड को विकास के पथ पर ले जाने की बजाए कई कदम पीछे धकेल दिया। राज्य में फिर से चुनाव होते हैं तो जनता के पास एक बार फिर से मौका होगा अपने नए निजाम को चुनने का...अपने भाग्य विधाताओं को चुनने का...झारखंड के भाग्य विधाता को चुनने का..! ऐसे में झारखंड की जनता को अबकी बार ये तय करना होगा कि क्या वे फिर से झारखंड में 12 सालों के इतिहास को दोहराते हुए देखना चाहेंगे..? या फिर चाहेंगे कि झारखंड को ऐसे हाथों में सौंपे जो सिर्फ कुर्सी की रेस में नहीं झारखंड को विकास की रेस में आगे लेकर जाने का सपना देखता हो। उम्मीद करते हैं कि जिस मकसद के लिए एक अलग राज्य का गठन 12 साल पहले हुए था उस मकसद के लिए झारखंड की जनता अबकी बार सुरक्षित हाथों में झारखंड का भविष्य सौंपेगी लेकिन ये उम्मीद उस वक्त धुंधली पड़ जाती है जब आभास होता है कि जनता का पाला तो हर बार की तरह फिर से ऐसे ही नेताओं की जमात से पलने वाला है जिनका सपना सिर्फ कुर्सी तक ही सीमित है।

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सोमवार, 7 जनवरी 2013

दिल्ली गैंगरेप- “राम-राम” आसाराम !


नाम है आसाराम बापू लेकिन बापू जी को शर्म नहीं आती। आसाराम जी अपने नाम के साथ जुड़े राम शब्द का ही मान रख लेते...आपने तो ऐसा बोल दिया कि लोग राम-राम करने लगे हैं। नशे में धुत छह शैतान अपने खौफनाक ईरादे लिए बस में सवार होकर दिल्ली की सड़कों पर अपनी हैवानियत को अंजाम देने के लिए घूम रहे होते हैं और मौका मिलते ही एक हंसती खेलती लड़की का जीवन तबाह कर देते हैं। 13 दिनों तक असहनीय दर्द को झेलने के बाद मासूम दुनिया को अलविदा कह देती है...और आप कहते हैं कि ताली एक हाथ से नहीं बजती..! अरे महाराज आप तो हाईटेक बाबा हो आपको इतना तो पता ही होगा कि बस में एक हाथ नहीं 12 हाथ 6 शैतानी दिमाग के ईशारे पर हैवानियत का खेल खेल रहे थे। उन्हें ये होश नहीं था कि वे क्या कर रहे हैं..? किसके साथ कर रहे हैं..? इसका अंजाम क्या होगा..? और आप कहते हैं कि पीड़ित लड़की किसी एक शैतान को अपना भाई बना लेती..! खुद के अबला होने का हवाला देकर इस खौफनाक वाक्ये को होने से रोक सकती थी। गजब करते हो महाराज हर कोई व्यक्ति आप की तरह साधु तो होता नहीं कि किसी ने सामने हाथ जोड़ लिए और कर दिया उसे माफ..! आप तो खुद को संत कहते हो...महात्मा कहते हो...लोगों को सत्कर्म की सीख देते हो...आप से तो इस तरह के बोल की उम्मीद नहीं थी...लेकिन लगता है कि आपने भी इसे दूसरे बयानवीर नेताओं की तरह जल्द सुर्खियों में छाने की बहती गंगा समझ लिया और विवादित बयान देकर धो डाले अपने हाथ..! पूरा देश चलती बस में हैवानियत का खेल खेलने वाले शैतानों को फांसी देने की मांग कर रहा है और आप कहते हो कि दिल्ली गैंगरेप घटना के लिए पीड़ित भी जिम्मेदार है..! अरे महाराज किसी के दुख में उसके सहभागी न बन सको न सही लेकिन किसी के जख्मों को कुरेदो तो मत। एक तरफ पीड़ित को ही घटना के लिए जिम्मेदार ठहरा देते हो और दूसरी तरफ पीड़ित के परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हो। ये कैसा आपका दोहरा चरित्र है कि आप एक जघन्य अपराध के लिए अपराधियों की बजाए उल्टा पीड़ित को ही दोषी ठहरा रहे हो। देश बलात्कार के खिलाफ कड़े कानून की मांग कर रहा है और आप ये कहकर बलात्कारियों का मनोबल बढ़ा रहे हो कि कड़े कानून मर्दों के लिए मुसीबत बन जाएगा...महिलाएं इसका दुरुपयोग करेंगी। गजब करते हो महाराज अभी तो कानून बना भी नहीं कि आपने इस पर सवाल खड़े कर दिए..! ऐसे में तो बन गया कानून और रूक गए बलात्कार..! आसाराम जी प्रवचन और बयानबाजी से न बलात्कार रूकते हैं और न अपराध...आपके आश्रम में तो खुद कई बार बच्चों को रहस्यमयी मौत और बच्चों को प्रताड़ित करने की खबरें सुर्खियां बनती रही हैं..! आपके आश्रम में तो झाड़-फूंक और जादू-टोना तक होने तक की खबरें उछलती रही हैं..! जब आपके आश्रम में ये सब हुआ उस वक्त तो आप चुप थे लेकिन 6 दरिंदे एक मासूम के साथ हैवानियत का खेल खेलते हैं तो आप दूसरों को नसीहत दे रहे हैं..! दूसरों पर कीचड़ उछालने से पहले अपने गिरेबां में भी झांक लीजिए। एसी गाडियों में घूमने और एसी चैंबर में बैठकर दूसरों को सादगी का प्रवचन देने से कुछ नहीं होता महाराज..! जब गैंगरेप के खिलाफ देश में आक्रोश था...आरोपियों को फांसी की मांग को लेकर लोग सड़कों पर आवाज बुलंद कर रहे थे उस वक्त तो आप कहीं नजर नहीं आए और आज कहते हो कि ताली एक हाथ से नहीं बजती..! इससे अच्छा तो था कि आप चुप ही रहते...वैसे भी नेताओं और बाबाओं से देश के लोगों को बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं हैं लेकिन अफसोस फिर भी इनकी बातों में देश की जनता आ ही जाती है..!

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रविवार, 6 जनवरी 2013

धोनी ने करवाया सहवाग को बाहर..?


पहले टेस्ट सीरीज में घर में अंग्रेजों ने धोया...उसके बाद चिर प्रतिद्वंदी पाकिस्तान ने नए साल में घर में घुसकर वन डे सीरीज में रही सही कसर पूरी कर दी लेकिन भारतीय चयनकर्ताओं को फिर भी अपने कप्तान और खिलाड़ियों पर पूरा भरोसा है। अंग्रेजों के खिलाफ 11 जनवरी से शुरु हो रही 5 वन डे मैचों की सीरीज के लिए भारतीय क्रिकेट टीम के ऐलान से पहले लग रहा था कि शायद इस बार भारतीय चयनकर्ता कुछ साहस दिखाएंगे और टीम में अपना स्थान पक्का समझने वाले खिलाड़ियों को टीम से बाहर का रास्ता दिखाकर ये संदेश देने की कोशिश करेंगे कि अच्छा प्रदर्शन करने वाला ही टीम में बना रहेगा लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ और एक बार फिर से चयनकर्ताओं ने सिर्फ टीम चयन की औपचारिकता निभाई। हालांकि चयनकर्ताओं ने बड़ी ही चालाकी से ये औपचारिकता न लगे इसके लिए सिर्फ एक खिलाड़ी वीरेन्द्र सहवाग को टीम से बाहर का रास्ता जरूर दिखा दिया। इसके साथ ही अंग्रेजों के खिलाफ टेस्ट सीरीज में और घरेलू क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन करने वाले चेतेश्वर पुजारा के साथ अमित मिश्रा को पहले 3 वन डे के लिए टीम में शामिल किया गया। सहवाग और धोनी के बीच की तनातनी जग जाहिर है ऐसे में सिर्फ सहवाग को टीम से बाहर करना अपने आप में कई सवाल खड़े कर गया। क्या एक बार फिर से कप्तान धोनी के दबाव में धोनी को टीम से बाहर का रास्ता दिखाया गया है..? या फिर पिछले मैचों में प्रदर्शन के आधार पर सहवाग की टीम से छुट्टी की गयी है..? अगर धोनी के दबाव में सहवाग को बाहर नहीं किया गया है तो फिर प्रदर्शन के आधार पर बाकी खिलाड़ियों पर चयनकर्ताओं ने आशीर्वाद क्यों बरसाया..? ज्यादा पीछे नहीं जाते हैं तो सिर्फ पाकिस्तान के खिलाफ खत्म हुई तीन वन डे मैचों की सीरीज पर ही नजर डाल लें तो तस्वीर साफ हो जाती है कि चयनकर्ताओं ने अंग्रेजों के खिलाफ जिस टीम का चयन किया है उसमें खिलाड़ियों के पिछले प्रदर्शन को कितनी तरजीह दी है। सबसे पहले सहवाग की ही अगर बात करें तो सहवाग ने 2 मैचों में (4+31)35 रन बनाए, गंभीर ने तीन मैचों में सिर्फ 34(8+11+15) रन बनाए तो युवराज ने 3 मैचों में (2+9+23)34 रन और कोहली ने 3 मैचों में सिर्फ 13(0+6+7) रन ही बनाए जबकि रैना ने तीन मैचों में (43+18+31)92 रन तो धोनी ने 3 मैचों में सर्वाधिक (113+54+36)213 रन बनाए और रोहित शर्मा ने 1 मैच में सिर्फ 4 रन ही बनाए। खिलाड़ियों के प्रदर्शन को ही पैमाना माना गया होता तो धोनी और कुछ हद तक सुरैश रैना के अलावा कोई तीसरा खिलाड़ी अंग्रेजों के खिलाफ टीम में रहने का हकदार नहीं होना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हुआ और सिर्फ सहवाग को बाहर कर चयनकर्ताओं ने चयन की औपचारिकता पूरी कर ली। माना चयनकर्ता पूरी टीम को एक बार में नहीं बदल सकते और ऐसा होना भी नहीं चाहिए लेकिन जो खिलाड़ी लगातार खुद को मैदान में साबित नहीं कर पा रहा है कम से कम उसे टीम से बाहर करने का साहस तो चयनकर्ताओं को दिखाना ही चाहिए। कागजों में मजबूत टीम की बजाए जरूरत है ऐसे खिलाड़ियों से भरी टीम की जो युवा हों और देश के लिए खेलें और अपने प्रदर्शन के दम पर भारत को विजयपथ पर वापस लेकर आएं। भुवनेश्वर कुमार और शमी अहमद ने न के बराबर अंतर्राष्ट्रीय मैचों का अऩुभव होने के बाद भी दवाब से भरपूर मैच में 167 रनों के एक छोटे से स्कोर को बचाने के लिए जो जी जान लगाई उससे कहीं से ये नहीं लग रहा था कि युवा खिलाड़ी दबाव में बिखर जाते हैं या अंतर्राष्ट्रीय मैचों का कम अनुभव उनके प्रदर्शन के आड़े आता है। ऐसे खिलाड़ियों को बस इंतजार रहता है एक मौके का जो दुर्भाग्य से भारत में युवा खिलाड़ियों को बहुत ज्यादा नहीं मिलता। हां सीनियर खिलाड़ियों को चयनकर्ता खूब मौके देते हैं फिर चाहे उनका प्रदर्शन कैसा भी रहा हो। ऐसा तो नहीं है कि हिंदुस्तान में जहां क्रिकेट धर्म से कम नहीं है वहां पर आपके पास बढ़िया युवा खिलाड़ी नहीं है लेकिन उन्हें देश के लिए खेलने का मौका नहीं मिलता या कहें कि नहीं दिया जाता..! खैर सहवाग पर अविश्वास और दूसरी खिलाड़ियों का चयनकर्ताओं का विश्वास क्या रंग लाता है ये तो 11 जनवरी से शुरु होने वाले भारत – इंग्लैंड वनडे सीरीज में भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन की तय करेगा। हम तो यही उम्मीद करेंगे कि भारत वन डे सरीज पर 5-0 से कब्जा कर टेस्ट में मिली करारी हार का बदला लेकर 2013 में नए जोश से आगे बढ़े।

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सोच बदल लो वर्ना बन जाओगे इतिहास !


राजनीति जो न कराए वो कम है...अपनी राजनीति चमकाने के लिए वर्ग विशेष के वोटबैंक को साधने के लिए नेता किस हद तक जा सकते हैं ये मनसे प्रमुख राज ठाकरे के बयान से एक बार फिर से जाहिर हो गया। कहीं का तार कहीं जोड़कर कैसे वोटबैंक को साधा जाए ये कोई राज ठाकरे से सीखे। मराठियों का हिमायती होने का दावा करने वाले राज ठाकरे ने दिल्ली गैंगरेप जैसे मुद्दे पर भी अपना सियासी फायदा खोज ही लिया और एक बार फिर से निशाना लगाया बिहारियों पर। गैंगरेप की घटना दिल्ली में होती है...लेकिन राज ठाकरे मुंबई में बैठकर ये कहकर बवाल खड़ा कर देते हैं कि इस घटना को अंजाम देने वाले लोग बिहारी थे। बिहारियों पर राज ठाकरे पहले भी निशाना साधते रहे हैं...मुंबई में बिहार से आकर रहने वाले बिहारियों का मसला हो या फिर 13 जुलाई 2001 को मुंबई में हुए सिलसिलेवार हमलों के सिलसिले में बिहार से कुछ संदिग्धों की गिरफ्तारी का मामला। राज ठाकरे ने हमेशा ही मराठियों के कंधों पर बंदूक रखकर बिहारियों पर निशाना साधने में कोई कसर नहीं छोड़ी। दिल्ली गैंगरेप के मुद्दे पर जहां सारा देश सड़कों पर उतर आरोपियों को फांसी की मांग कर रहा है तो राज ठाकरे यहां भी राजनीति की बिसात पर बिहारी राग अलाप पर अपनी घटिया मानसिकता दर्शाते हुए नजर आ रहे हैं। राज ठाकरे साहब दिल्ली की घटना को बिहार के आरोपियों को महाराष्ट्र में बैठकर जोड़ने से आप क्या हासिल करना चाहते हैं..? इस घटना के खिलाफ देश भर में गुस्सा दिखा...देशभर में लोग एकजुट होकर आरोपियों को फांसी की मांग के साथ ही महिलाओं की सुरक्षा के मसले पर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं...लेकिन आपने यहां पर भी लोगों को बांटने का खेल शुरु कर दिया..! ये तो वक्त था राजनीति से ऊपर उठकर आम आदमी की आवाज को और बुलंद करने का ताकि न सिर्फ दिल्ली गैंगरेप को अंजाम देने वाले हैवानों को मौत की सजा मिले बल्कि समाज में महिलाएं सुरक्षित रह सकें और भविष्य में कोई शख्स किसी महिला के साथ बलात्कार करना तो दूर ऐसे सोचने से भी घबराए। लेकिन अफसोस आपको इस सब से कोई सरोकार नहीं है क्योंकि आपको तो यहां भी बिहारियों को गलिया के मराठियों को साधने का मौका दिखाई दे रहा है। आप एक देश में दो राज्यों के लोगों को अलग – अलग नजरों से देखकर क्या साबित करना चाहते हैं..? क्या महाराष्ट्र भारत का हिस्सा नहीं हैं या फिर बिहार भारत का हिस्सा नहीं है..? माना आप मुंबई में बैठकर क्षेत्रिय राजनीति में सक्रिय हैं लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि मराठियों के हितों के आगे आप दूसरे लोगों के हितों पर अतिक्रमण करें..! ठाकरे साहब आपको तो महाराष्ट्र में रहने वाले सभी लोगों को साथ लेकर चलना चाहिए क्योंकि महाराष्ट्र भी तो भारत का ही अभिन्न अंग है और उतना ही अभिन्न अंग बिहार भी भारत का है। दूसरे राज्यों के लोग महाराष्ट्र में रह रहे हैं तो क्या महाराष्ट्र के लोग दूसरे राज्यों में नहीं रह रहे हैं..? व्यक्ति किसी भी राज्य का हो लेकिन आखिर में वो है तो भारतीय ही...फिर चाहे वो मराठी हो या बिहारी हो या फिर किसी और राज्य से ताल्लुक रखता हो। आप दिल्ली गैंगरेप के आरोपियों के बिहारी होने की बात कर क्या साबित करना चाहते हैं...? ठाकरे साहब अपराधी की कोई जाति नहीं होती और न ही वो किसी राज्य या देश का होता है। अपराधी सिर्फ अपराधी होता है क्योंकि वो अपराध करने से पहले ये नहीं देखता कि वो जिसके साथ अपराध कर रहा है वो कौन है..? जिस जगह अपराध कर रहा है वो जगह उसके गली मोहल्ले में है या देश के किसी दूसरे कोने में। ठाकरे साहब अपराधी अपने परिवार में भी अपराध करता है...अपने गली मोहल्ले में भी...अपने शहर और राज्य में भी और जहां वो उस वक्त मौजूद है वहां पर भी चाहे वह किसी भी देश में क्यों न हो। ऐसे में आप ये कैसे कह सकते हो कि दिल्ली गैंगरेप के आरोपी बिहार से हैं ये सबको जानना जरूरी है। क्या महाराष्ट्र के लोग अपराध नहीं करते या फिर महाराष्ट्र में अपराध नहीं होते..? ठाकरे साहब वोट बढ़ाने के लिए बांटों और राज करो की राजनीति का इतिहास भले ही सफल दिखाई देता हो लेकिन अब वक्त बदल चुका है और लोग राज ठाकरे टाइप लोगों की सोच को भी पहचान गए हैं इसलिए अभी भी वक्त है अपनी सोच बदल लो वरना कहीं ऐसा न हो कि वक्त के साथ जनता आपकी राजनीति का गणित - भूगोल सब बिगाड़ दे और आपको राजनीति में इतिहास का हिस्सा बनने पर मजबूर कर दे। ।।जय भारत।।

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