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गुरुवार, 10 जनवरी 2013

बलात्कार की ये कौन सी सभ्यता ?


बलात्कार एक बड़ा और संवेदनशील मुद्दा है...बलात्कारियों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाना चाहिए लेकिन दिल्ली गैंगरेप के 6 आरोपियों ने चलती बस में जिस हैवानियत का खेल खेला उसके बाद से बलात्कार औऱ बलात्कारियों को सजा को लेकर एक बहस छिड़ गई है। इस बहस के बीच में कुछ ऐसे बयान भी सामने आए जिनका इस बहस से कोई लेना देना नहीं था लेकिन ये बयान फिर भी सुर्खियां बटोरते रहे क्योंकि ये बयान उन नेताओं या लोगों के थे जिनकी हमारे समाज में एक पहचान है(भले ही किसी भी कारण से हो)। इस कड़ी में कई नाम शामिल हैं लेकिन संघ प्रमुख मोहन भागवत ने बलात्कार की घटनाओं को भारत और इंडिया से जोड़कर एक नई बहस को जन्म दे दिया। मोहन भागवत कहते हैं कि बलात्कार की घटनाएं ग्रामीण क्षेत्रों(भारत) की बजाए शहरी क्षेत्रों(इंडिया) में अधिक होती हैं। भागवत साहब ने ये कह तो दिया लेकिन क्या कभी ऐसा होता है कि अपराधी बलात्कार छोड़िए किसी भी अपराध को करने से पहले ये देखता है कि वो अपराध शहर में कर रहा है या गांव में..! मैंने तो ऐसे कभी न देखा न सुना कि अपराधी अपराध के लिए गांव की बजाए शहर को मुफीद जगह समझता है। अपराधी प्रवृत्ति का व्यक्ति घटिया मानसिकता का व्यक्ति अपने घर में भी अपराध करता है..और घर से बाहर भी। घटिया मानसिकता या घटिया सोच जगह की मोहताज नहीं होती...वो आदमी के दिमाग में होती है चाहे वो आदमी गांव में रह रहा हो या फिर शहर में...ऐसे में भागवत साहब का ये बयान तो किसी भी दृष्टि से तर्कसंगत नहीं लगता।
जहां तक बात है कि शहरी क्षेत्रों में (जिसे भागवत साहब इंडिया कहते हैं) संस्कार और परंपरा और उनके मूल्य समाप्ति की ओर अग्रसर हैं...तो हम ये नहीं कह सकते कि शहरी क्षेत्रों में रहने वाले सभी लोग संस्कारों और परंपराओं को त्याग चुके हैं...या उनमें ये नहीं बचे हैं क्योंकि शहरी क्षेत्रों में भी ऐसे लोग ऐसे परिवार मौजूद हैं(सभी शामिल नहीं) जिनमें आपको परंपराएं और संस्कार साफ दिखाई दे जाएंगे। जबकि इसके विपरित आप गांवों में चले जाईए तो हैरानी होगी की गांवों में जहां कहा जाता है कि संस्कार और परंपराएं निभाई जाती हैं उनका मूल्य समझा जाता है वहां पर कई लोगों में कई परिवारों में(सभी शामिल नहीं) आपको ये चीजें नगण्य मिलेंगी यानि मेरा कहने का आशय है कि व्यक्ति के रहने के स्थान से किसी चीज को लेकर हम न तो अनुमान लगा सकते हैं और न किसी तरह का कोई दावा कर सकते हैं। मानने वाले लोग समझने वाले लोग चाहे वो शहर में रह रहे हों या फिर गांवों में परंपराओं और संस्कारों का मूल्य समझते हैं और उनको निभाते भी हैं।
मुझे लगता है कि मोहन भागवत ने बलात्कार के संदर्भ में भारत और इंडिया का जिक्र कर कहीं न कहीं पश्चिमी सभ्यता का...वहां के रहन सहन का...तौर तरीकों पर विरोध प्रकट किया है लेकिन भागवत साहब ने उदाहरण गलत पेश कर दिया इससे न सिर्फ उनका बयान सुर्खियां बना बल्कि उन पर भारत और इंडिया के नाम पर देश को दो हिस्सों नें बांटने तक का आरोप लगा और उनकी जमकर आलोचना हो रही है जो होनी भी चाहिए क्योंकि तर्कसंगत तो उनका बयान कहीं से नहीं लगता।
ये कहना कि महिलाओं के पहनावे और पश्चिमी सभ्यता के कारण बलात्कार की घटनाएं ज्यादा हो रही हैं...ये मेरी समझ से तो परे है। इसके पीछे पहला उदाहरण तो क्रिमिनिल लॉ जर्नल में प्रकाशित आंकड़ों का ही देना चाहूंगा जो आंकड़ें बताते हैं कि हाई कोर्ट में 80 फीसदी और सुप्रीम कोर्ट में 75 फीसदी रेप केस ग्रामीण इलाकों से दर्ज थे जबकि वहीं गैंग रेप के मामलों में ये फीसदी 75 और 68 है। दूसरा अगर वाकई में ऐसा होता कि महिलाओं के पहनावे और पश्चिमी सभ्यता के कारण बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही हैं तो फिर ग्रामीण इलाकों में तो बलात्कार की एक भी घटना नहीं होनी चाहिए जबकि अनाधिकारिक तौर पर पुलिस थानों तक नहीं पहुंचने वाली बलात्कार के मामलों की तादाद दर्ज मामलों की तादाद में कहीं ज्यादा है। शहरों में तो कम से कम जागरूक महिलाएं शिकायत दर्ज कराने की लड़ने की हिम्मत जुटा लेती हैं लेकिन ग्रामीण इलाकों में ऐसा देखने को नहीं मिलता क्योंकि ऐसा करने पर बलात्कार करने वाले उन्हें डरा धमकाकर रखते हैं और पुलिस का रवैया भी वहां पर पीड़ित के प्रति बहुत सहयोगात्मक नहीं रहता है...ऐसे तमाम उदाहरण समय समय पर उजागर भी होते आए हैं। इसके साथ ही ग्रामीण और शहरी इलाकों में घरों में होने वाले बलात्कार के मामले न तो थाने तक पहुंचते हैं और न ही मीडिया की सुर्खियां बनते हैं क्योंकि बलात्कार करने वाले कई बार पीड़ित का पिता होता है...तो कई बार चाचा-ताऊ या भाई और मामा या फिर कोई और रिश्तेदार। अब इन्हें कौन सभ्यता का माना जाए गांव की...शहर की या फिर विदेशी सभ्यता। कुल मिलाकर अपराधी हर जगह अपराध करता है चाहे वो बलात्कार कर रहा हो या फिर कोई और अपराध...अब जहां घटिया मानसिकता के लोग...विकृत मानसिकता के लोग ज्यादा तादाद में होंगे जाहिर है वहां ये अपराध ज्यादा होंगे फिर चाहे वो शहर हो या फिर गांव...वहां महिलाएं कैसे कपड़े पहनती हैं या फिर वहां किस सभ्यता का बोलबाला है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

deepaktiwari555@gmail.com  

बुधवार, 9 जनवरी 2013

मनमोहन को जगाओ, देश बचाओ !


देश की राजधानी दिल्ली में में दिल दहला देने वाले गैंगरेप की घटना...देश के आधा दर्जन राज्यों में बेखौफ नक्सलियों का आंतक और देश की सीमा पर पाकिस्तान का अमानवीय चेहरा...लेकिन हमारी सरकार खामोश है। गैंगरेप पर सरकार कहती है कि कड़े कानून बनाए जाएंगे ताकि दोबारा से ऐसी घटना न हो लेकिन दिल्ली गैंगरेप के तुरंत बाद देशभर से गैंगरेप और महिलाओं की हत्या की खबर आती है। झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा समेत तमाम राज्यों में नक्सली आए दिन उत्पात मचाते हैं और निर्दोष आदिवासियों के साथ ही भारतीय जवानों के खून की होली खेलते हैं लेकिन सरकार कहती है कि नक्सली हमारे ही बीच के लोग हैं और हम शांति से बातचीत से कोई हल निकालने का प्रयास करेंगे। पाकिस्तान सारी हदें पार कर भारत की सीमा में घुसकर भारतीय जवानों की हत्या कर उनके शव के साथ अमानवीय कृत्य करते हैं और हमारी सरकार पाकिस्तान से जवाब मांगती है और मामले की जांच की मांग करती है। सरकार पाकिस्तान से उम्मीद करती है कि पाकिस्तान इस घटना को लेकर गंभीरता दिखाएगा और सकारात्मक रवैया दिखाएगा। प्रधानमंत्री जी कब तक सोते रहोगे..? कब तक पकिस्तान से जवाब मांगते रहोगे..? पाकिस्तान लगातार कुछ समय के अंतराल पर अपनी नापाक ईरादों को जाहिर कर हमारे जवानों की हत्या करता आ रहा है और आप पाकिस्तान से जवाब मांग रहे हो..? अरे महाराज ये वक्त जवाब मांगने का नहीं है...ये वक्त है मुंहतोड़ जवाब देने का..! वरना आप जवाब ही मांगते रह जाओगे और वे एक – एक कर हमारे जवानों को हमारे घर में घुसकर मारते रहेंगे..! क्या आज तक ऐसा नहीं होता आया है..? क्या इससे पहले पाकिस्तान ने हमारे सैनिकों की हत्या कर उनके साथ अमानवीय व्यवहार नहीं किया है..? कारगिल युद्ध के शहीद कैप्टन सौरभ कालिया का केस तो आपको याद ही होगा...सुप्रीम कोर्ट को उस पर सरकार से जवाब तलब भी कर चुका है। सौरभ कालिया केस के बाद ही अगर सरकार चेत गई होती तो शायद पाक सैनिक अपने नापाक ईरादे दोहराने से पहले सौ बार सोचते...लेकिन अफसोस न तो उस वक्त सरकार जागी और न ही इस बार सरकार बहुत ज्यादा गंभीर दिखाई दे रही है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ सीमा पर ही पाक के नापाक ईरादे उजागर होते रहे हैं। मुंबई हमला हो या देश में होने वाली दूसरी आतंकी घटनाएं...इनको अंजाम देने वाले कहां से आए..? ये कौन थे..? ये किसी से छिपा नहीं है फिर भी आप बार – बार पाकिस्तान से जवाब मांगते हो..! उनके विदेश मंत्री हमारे देश में आकर हम पर ही सवाल खड़ा करके चले जाते हैं और आप फिर भी कुछ नहीं बोलते। महाराज ये वक्त है पाकिस्तान को उसके घर में घुसकर सबक सिखाने का है वरना प्रधानमंत्री जी आप सोते रह जाओगे और पहले पाकिस्तान और उसके बाद चीन अपने नापाक ईरादों में कामयाब हो जाएगा। वैसे आपसे बहुत ज्यादा उम्मीद तो है नहीं क्योंकि आपको तो कुछ बोलने से पहले और कुछ बोलने के बाद भी पूछते हो “”ठीक है

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मंगलवार, 8 जनवरी 2013

कुर्सी की दौड़ में पिछड़ा झारखंड..!


एक राज्य...12 साल में 8 सरकारें और 8 मुख्यमंत्री...10 बार सत्ता परिवर्तन...2 बार राष्ट्रपति शासन और एक बार फिर से कुर्सी की लड़ाई में वही सब...शायद यही अब झारखंड की नियति बन गई है। एक बार फिर से नेताओं की कुर्सी की लालसा राज्य के लोगों के सपनों पर भारी पड़ गई और कुर्सी न मिली तो झारखंड मुक्ति मोर्चा ने अर्जुन मुंडा सरकार से समर्थन वापस ले लिया। दरअसल जेएमएम की दलील है कि उसने राज्य की भाजपा सरकार को इस शर्त पर समर्थन दिया था कि 5 साल के कार्यकाल में 28 महीने भाजपा का मुख्यमंत्री रहेगा और 28 महीने जेएमएम का लेकिन भाजपा ने 28 माह पूरे होने के बाद सीएम की कुर्सी खाली करने से इंकार कर दिया जबकि भाजपा का जेएमएम के साथ ऐसे किसी समझौते से इंकार कर रही है। जो भी हो ये वाक्या ये बताने के लिए काफी है कि झारखंड के नेता सिर्फ राजनीति पर ही विश्वास करते हैं उन्हें राज्य से राज्य की जनता के सरोकारों से कोई सरोकार नहीं है। झारखंड में नेता सिर्फ कुर्सी के लिए चुनाव लड़ते हैं और चुनाव जीतने के बाद कुर्सी के लिए मारामारी का खेल झारखंड में राज्य गठन के बाद से ही चल रहा है। ये झारखंड का दुर्भाग्य ही है कि राज्य गठन के बाद से कोई सरकार अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी। अलग राज्य गठन के बाद जिस झारखंड का सपना वहां के लोगों ने देखा था वो 12 साल बाद भी साकार नहीं हो पाया। सपना था झारखंड को विकास के पथ पर ले जाने का...झारखंड में बेरोजगारी को दूर करने का...सपना था आदिवासियों के विकास का...सपना था अपने संसाधनों के बल पर झारखंड को समृद्ध राज्य बनाने का लेकिन झारखंड के कथित भाग्य विधाताओं ने अपनी सृमद्धि की कहानी तो लिखी लेकिन जिस राज्य की जनता के बल पर वे यहां तक पहुंचे उन्हें वे कुर्सी के नशे में भूल गए। झारखंड में या कहें देश में मधु कोड़ा से बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है जो निर्दलीय विधायक होने के बाद सीएम की कुर्सी तक पहुंचा लेकिन कुर्सी मिलने के बाद मधु कोड़ा ने झारखंड के इतिहास में ऐसा काला अध्याय जोड़ा जिसने आम जनता के रहे सहे भरोसे को भी तोड़ दिया। मधु कोड़ा ने जनता के उस भरोसे का भी खून किया जो राष्ट्रीय और क्षेत्रिय दलों से निराश होने के बाद जनता अपने बीच के किसी शख्स पर कर सकती थी। झारखंड में राजनीतिक अस्थिरता के लिए देखा जाए तो कई कारक जिम्मेदार हैं। अलग राज्य बनने के बाद भी प्रदेश की जनता ने न तो पूरी तरह से राष्ट्रीय दलों का ही हाथ थामा और न ही क्षेत्रीय दलों का दामन। नतीजा ये हुआ कि अपनी अपनी महत्वकांक्षाओं को पूरा करने के लिए एक – दूसरे की नाव पर सवार राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी इसका भरपूर फायदा उठाया। राज्य में राजनीतिक अस्थिरता के बाद एक बार फिर से झारखंड उसी मुहाने पर खड़ा है...जिसने 12 सालों में झारखंड को विकास के पथ पर ले जाने की बजाए कई कदम पीछे धकेल दिया। राज्य में फिर से चुनाव होते हैं तो जनता के पास एक बार फिर से मौका होगा अपने नए निजाम को चुनने का...अपने भाग्य विधाताओं को चुनने का...झारखंड के भाग्य विधाता को चुनने का..! ऐसे में झारखंड की जनता को अबकी बार ये तय करना होगा कि क्या वे फिर से झारखंड में 12 सालों के इतिहास को दोहराते हुए देखना चाहेंगे..? या फिर चाहेंगे कि झारखंड को ऐसे हाथों में सौंपे जो सिर्फ कुर्सी की रेस में नहीं झारखंड को विकास की रेस में आगे लेकर जाने का सपना देखता हो। उम्मीद करते हैं कि जिस मकसद के लिए एक अलग राज्य का गठन 12 साल पहले हुए था उस मकसद के लिए झारखंड की जनता अबकी बार सुरक्षित हाथों में झारखंड का भविष्य सौंपेगी लेकिन ये उम्मीद उस वक्त धुंधली पड़ जाती है जब आभास होता है कि जनता का पाला तो हर बार की तरह फिर से ऐसे ही नेताओं की जमात से पलने वाला है जिनका सपना सिर्फ कुर्सी तक ही सीमित है।

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सोमवार, 7 जनवरी 2013

दिल्ली गैंगरेप- “राम-राम” आसाराम !


नाम है आसाराम बापू लेकिन बापू जी को शर्म नहीं आती। आसाराम जी अपने नाम के साथ जुड़े राम शब्द का ही मान रख लेते...आपने तो ऐसा बोल दिया कि लोग राम-राम करने लगे हैं। नशे में धुत छह शैतान अपने खौफनाक ईरादे लिए बस में सवार होकर दिल्ली की सड़कों पर अपनी हैवानियत को अंजाम देने के लिए घूम रहे होते हैं और मौका मिलते ही एक हंसती खेलती लड़की का जीवन तबाह कर देते हैं। 13 दिनों तक असहनीय दर्द को झेलने के बाद मासूम दुनिया को अलविदा कह देती है...और आप कहते हैं कि ताली एक हाथ से नहीं बजती..! अरे महाराज आप तो हाईटेक बाबा हो आपको इतना तो पता ही होगा कि बस में एक हाथ नहीं 12 हाथ 6 शैतानी दिमाग के ईशारे पर हैवानियत का खेल खेल रहे थे। उन्हें ये होश नहीं था कि वे क्या कर रहे हैं..? किसके साथ कर रहे हैं..? इसका अंजाम क्या होगा..? और आप कहते हैं कि पीड़ित लड़की किसी एक शैतान को अपना भाई बना लेती..! खुद के अबला होने का हवाला देकर इस खौफनाक वाक्ये को होने से रोक सकती थी। गजब करते हो महाराज हर कोई व्यक्ति आप की तरह साधु तो होता नहीं कि किसी ने सामने हाथ जोड़ लिए और कर दिया उसे माफ..! आप तो खुद को संत कहते हो...महात्मा कहते हो...लोगों को सत्कर्म की सीख देते हो...आप से तो इस तरह के बोल की उम्मीद नहीं थी...लेकिन लगता है कि आपने भी इसे दूसरे बयानवीर नेताओं की तरह जल्द सुर्खियों में छाने की बहती गंगा समझ लिया और विवादित बयान देकर धो डाले अपने हाथ..! पूरा देश चलती बस में हैवानियत का खेल खेलने वाले शैतानों को फांसी देने की मांग कर रहा है और आप कहते हो कि दिल्ली गैंगरेप घटना के लिए पीड़ित भी जिम्मेदार है..! अरे महाराज किसी के दुख में उसके सहभागी न बन सको न सही लेकिन किसी के जख्मों को कुरेदो तो मत। एक तरफ पीड़ित को ही घटना के लिए जिम्मेदार ठहरा देते हो और दूसरी तरफ पीड़ित के परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हो। ये कैसा आपका दोहरा चरित्र है कि आप एक जघन्य अपराध के लिए अपराधियों की बजाए उल्टा पीड़ित को ही दोषी ठहरा रहे हो। देश बलात्कार के खिलाफ कड़े कानून की मांग कर रहा है और आप ये कहकर बलात्कारियों का मनोबल बढ़ा रहे हो कि कड़े कानून मर्दों के लिए मुसीबत बन जाएगा...महिलाएं इसका दुरुपयोग करेंगी। गजब करते हो महाराज अभी तो कानून बना भी नहीं कि आपने इस पर सवाल खड़े कर दिए..! ऐसे में तो बन गया कानून और रूक गए बलात्कार..! आसाराम जी प्रवचन और बयानबाजी से न बलात्कार रूकते हैं और न अपराध...आपके आश्रम में तो खुद कई बार बच्चों को रहस्यमयी मौत और बच्चों को प्रताड़ित करने की खबरें सुर्खियां बनती रही हैं..! आपके आश्रम में तो झाड़-फूंक और जादू-टोना तक होने तक की खबरें उछलती रही हैं..! जब आपके आश्रम में ये सब हुआ उस वक्त तो आप चुप थे लेकिन 6 दरिंदे एक मासूम के साथ हैवानियत का खेल खेलते हैं तो आप दूसरों को नसीहत दे रहे हैं..! दूसरों पर कीचड़ उछालने से पहले अपने गिरेबां में भी झांक लीजिए। एसी गाडियों में घूमने और एसी चैंबर में बैठकर दूसरों को सादगी का प्रवचन देने से कुछ नहीं होता महाराज..! जब गैंगरेप के खिलाफ देश में आक्रोश था...आरोपियों को फांसी की मांग को लेकर लोग सड़कों पर आवाज बुलंद कर रहे थे उस वक्त तो आप कहीं नजर नहीं आए और आज कहते हो कि ताली एक हाथ से नहीं बजती..! इससे अच्छा तो था कि आप चुप ही रहते...वैसे भी नेताओं और बाबाओं से देश के लोगों को बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं हैं लेकिन अफसोस फिर भी इनकी बातों में देश की जनता आ ही जाती है..!

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रविवार, 6 जनवरी 2013

धोनी ने करवाया सहवाग को बाहर..?


पहले टेस्ट सीरीज में घर में अंग्रेजों ने धोया...उसके बाद चिर प्रतिद्वंदी पाकिस्तान ने नए साल में घर में घुसकर वन डे सीरीज में रही सही कसर पूरी कर दी लेकिन भारतीय चयनकर्ताओं को फिर भी अपने कप्तान और खिलाड़ियों पर पूरा भरोसा है। अंग्रेजों के खिलाफ 11 जनवरी से शुरु हो रही 5 वन डे मैचों की सीरीज के लिए भारतीय क्रिकेट टीम के ऐलान से पहले लग रहा था कि शायद इस बार भारतीय चयनकर्ता कुछ साहस दिखाएंगे और टीम में अपना स्थान पक्का समझने वाले खिलाड़ियों को टीम से बाहर का रास्ता दिखाकर ये संदेश देने की कोशिश करेंगे कि अच्छा प्रदर्शन करने वाला ही टीम में बना रहेगा लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ और एक बार फिर से चयनकर्ताओं ने सिर्फ टीम चयन की औपचारिकता निभाई। हालांकि चयनकर्ताओं ने बड़ी ही चालाकी से ये औपचारिकता न लगे इसके लिए सिर्फ एक खिलाड़ी वीरेन्द्र सहवाग को टीम से बाहर का रास्ता जरूर दिखा दिया। इसके साथ ही अंग्रेजों के खिलाफ टेस्ट सीरीज में और घरेलू क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन करने वाले चेतेश्वर पुजारा के साथ अमित मिश्रा को पहले 3 वन डे के लिए टीम में शामिल किया गया। सहवाग और धोनी के बीच की तनातनी जग जाहिर है ऐसे में सिर्फ सहवाग को टीम से बाहर करना अपने आप में कई सवाल खड़े कर गया। क्या एक बार फिर से कप्तान धोनी के दबाव में धोनी को टीम से बाहर का रास्ता दिखाया गया है..? या फिर पिछले मैचों में प्रदर्शन के आधार पर सहवाग की टीम से छुट्टी की गयी है..? अगर धोनी के दबाव में सहवाग को बाहर नहीं किया गया है तो फिर प्रदर्शन के आधार पर बाकी खिलाड़ियों पर चयनकर्ताओं ने आशीर्वाद क्यों बरसाया..? ज्यादा पीछे नहीं जाते हैं तो सिर्फ पाकिस्तान के खिलाफ खत्म हुई तीन वन डे मैचों की सीरीज पर ही नजर डाल लें तो तस्वीर साफ हो जाती है कि चयनकर्ताओं ने अंग्रेजों के खिलाफ जिस टीम का चयन किया है उसमें खिलाड़ियों के पिछले प्रदर्शन को कितनी तरजीह दी है। सबसे पहले सहवाग की ही अगर बात करें तो सहवाग ने 2 मैचों में (4+31)35 रन बनाए, गंभीर ने तीन मैचों में सिर्फ 34(8+11+15) रन बनाए तो युवराज ने 3 मैचों में (2+9+23)34 रन और कोहली ने 3 मैचों में सिर्फ 13(0+6+7) रन ही बनाए जबकि रैना ने तीन मैचों में (43+18+31)92 रन तो धोनी ने 3 मैचों में सर्वाधिक (113+54+36)213 रन बनाए और रोहित शर्मा ने 1 मैच में सिर्फ 4 रन ही बनाए। खिलाड़ियों के प्रदर्शन को ही पैमाना माना गया होता तो धोनी और कुछ हद तक सुरैश रैना के अलावा कोई तीसरा खिलाड़ी अंग्रेजों के खिलाफ टीम में रहने का हकदार नहीं होना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हुआ और सिर्फ सहवाग को बाहर कर चयनकर्ताओं ने चयन की औपचारिकता पूरी कर ली। माना चयनकर्ता पूरी टीम को एक बार में नहीं बदल सकते और ऐसा होना भी नहीं चाहिए लेकिन जो खिलाड़ी लगातार खुद को मैदान में साबित नहीं कर पा रहा है कम से कम उसे टीम से बाहर करने का साहस तो चयनकर्ताओं को दिखाना ही चाहिए। कागजों में मजबूत टीम की बजाए जरूरत है ऐसे खिलाड़ियों से भरी टीम की जो युवा हों और देश के लिए खेलें और अपने प्रदर्शन के दम पर भारत को विजयपथ पर वापस लेकर आएं। भुवनेश्वर कुमार और शमी अहमद ने न के बराबर अंतर्राष्ट्रीय मैचों का अऩुभव होने के बाद भी दवाब से भरपूर मैच में 167 रनों के एक छोटे से स्कोर को बचाने के लिए जो जी जान लगाई उससे कहीं से ये नहीं लग रहा था कि युवा खिलाड़ी दबाव में बिखर जाते हैं या अंतर्राष्ट्रीय मैचों का कम अनुभव उनके प्रदर्शन के आड़े आता है। ऐसे खिलाड़ियों को बस इंतजार रहता है एक मौके का जो दुर्भाग्य से भारत में युवा खिलाड़ियों को बहुत ज्यादा नहीं मिलता। हां सीनियर खिलाड़ियों को चयनकर्ता खूब मौके देते हैं फिर चाहे उनका प्रदर्शन कैसा भी रहा हो। ऐसा तो नहीं है कि हिंदुस्तान में जहां क्रिकेट धर्म से कम नहीं है वहां पर आपके पास बढ़िया युवा खिलाड़ी नहीं है लेकिन उन्हें देश के लिए खेलने का मौका नहीं मिलता या कहें कि नहीं दिया जाता..! खैर सहवाग पर अविश्वास और दूसरी खिलाड़ियों का चयनकर्ताओं का विश्वास क्या रंग लाता है ये तो 11 जनवरी से शुरु होने वाले भारत – इंग्लैंड वनडे सीरीज में भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन की तय करेगा। हम तो यही उम्मीद करेंगे कि भारत वन डे सरीज पर 5-0 से कब्जा कर टेस्ट में मिली करारी हार का बदला लेकर 2013 में नए जोश से आगे बढ़े।

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सोच बदल लो वर्ना बन जाओगे इतिहास !


राजनीति जो न कराए वो कम है...अपनी राजनीति चमकाने के लिए वर्ग विशेष के वोटबैंक को साधने के लिए नेता किस हद तक जा सकते हैं ये मनसे प्रमुख राज ठाकरे के बयान से एक बार फिर से जाहिर हो गया। कहीं का तार कहीं जोड़कर कैसे वोटबैंक को साधा जाए ये कोई राज ठाकरे से सीखे। मराठियों का हिमायती होने का दावा करने वाले राज ठाकरे ने दिल्ली गैंगरेप जैसे मुद्दे पर भी अपना सियासी फायदा खोज ही लिया और एक बार फिर से निशाना लगाया बिहारियों पर। गैंगरेप की घटना दिल्ली में होती है...लेकिन राज ठाकरे मुंबई में बैठकर ये कहकर बवाल खड़ा कर देते हैं कि इस घटना को अंजाम देने वाले लोग बिहारी थे। बिहारियों पर राज ठाकरे पहले भी निशाना साधते रहे हैं...मुंबई में बिहार से आकर रहने वाले बिहारियों का मसला हो या फिर 13 जुलाई 2001 को मुंबई में हुए सिलसिलेवार हमलों के सिलसिले में बिहार से कुछ संदिग्धों की गिरफ्तारी का मामला। राज ठाकरे ने हमेशा ही मराठियों के कंधों पर बंदूक रखकर बिहारियों पर निशाना साधने में कोई कसर नहीं छोड़ी। दिल्ली गैंगरेप के मुद्दे पर जहां सारा देश सड़कों पर उतर आरोपियों को फांसी की मांग कर रहा है तो राज ठाकरे यहां भी राजनीति की बिसात पर बिहारी राग अलाप पर अपनी घटिया मानसिकता दर्शाते हुए नजर आ रहे हैं। राज ठाकरे साहब दिल्ली की घटना को बिहार के आरोपियों को महाराष्ट्र में बैठकर जोड़ने से आप क्या हासिल करना चाहते हैं..? इस घटना के खिलाफ देश भर में गुस्सा दिखा...देशभर में लोग एकजुट होकर आरोपियों को फांसी की मांग के साथ ही महिलाओं की सुरक्षा के मसले पर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं...लेकिन आपने यहां पर भी लोगों को बांटने का खेल शुरु कर दिया..! ये तो वक्त था राजनीति से ऊपर उठकर आम आदमी की आवाज को और बुलंद करने का ताकि न सिर्फ दिल्ली गैंगरेप को अंजाम देने वाले हैवानों को मौत की सजा मिले बल्कि समाज में महिलाएं सुरक्षित रह सकें और भविष्य में कोई शख्स किसी महिला के साथ बलात्कार करना तो दूर ऐसे सोचने से भी घबराए। लेकिन अफसोस आपको इस सब से कोई सरोकार नहीं है क्योंकि आपको तो यहां भी बिहारियों को गलिया के मराठियों को साधने का मौका दिखाई दे रहा है। आप एक देश में दो राज्यों के लोगों को अलग – अलग नजरों से देखकर क्या साबित करना चाहते हैं..? क्या महाराष्ट्र भारत का हिस्सा नहीं हैं या फिर बिहार भारत का हिस्सा नहीं है..? माना आप मुंबई में बैठकर क्षेत्रिय राजनीति में सक्रिय हैं लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि मराठियों के हितों के आगे आप दूसरे लोगों के हितों पर अतिक्रमण करें..! ठाकरे साहब आपको तो महाराष्ट्र में रहने वाले सभी लोगों को साथ लेकर चलना चाहिए क्योंकि महाराष्ट्र भी तो भारत का ही अभिन्न अंग है और उतना ही अभिन्न अंग बिहार भी भारत का है। दूसरे राज्यों के लोग महाराष्ट्र में रह रहे हैं तो क्या महाराष्ट्र के लोग दूसरे राज्यों में नहीं रह रहे हैं..? व्यक्ति किसी भी राज्य का हो लेकिन आखिर में वो है तो भारतीय ही...फिर चाहे वो मराठी हो या बिहारी हो या फिर किसी और राज्य से ताल्लुक रखता हो। आप दिल्ली गैंगरेप के आरोपियों के बिहारी होने की बात कर क्या साबित करना चाहते हैं...? ठाकरे साहब अपराधी की कोई जाति नहीं होती और न ही वो किसी राज्य या देश का होता है। अपराधी सिर्फ अपराधी होता है क्योंकि वो अपराध करने से पहले ये नहीं देखता कि वो जिसके साथ अपराध कर रहा है वो कौन है..? जिस जगह अपराध कर रहा है वो जगह उसके गली मोहल्ले में है या देश के किसी दूसरे कोने में। ठाकरे साहब अपराधी अपने परिवार में भी अपराध करता है...अपने गली मोहल्ले में भी...अपने शहर और राज्य में भी और जहां वो उस वक्त मौजूद है वहां पर भी चाहे वह किसी भी देश में क्यों न हो। ऐसे में आप ये कैसे कह सकते हो कि दिल्ली गैंगरेप के आरोपी बिहार से हैं ये सबको जानना जरूरी है। क्या महाराष्ट्र के लोग अपराध नहीं करते या फिर महाराष्ट्र में अपराध नहीं होते..? ठाकरे साहब वोट बढ़ाने के लिए बांटों और राज करो की राजनीति का इतिहास भले ही सफल दिखाई देता हो लेकिन अब वक्त बदल चुका है और लोग राज ठाकरे टाइप लोगों की सोच को भी पहचान गए हैं इसलिए अभी भी वक्त है अपनी सोच बदल लो वरना कहीं ऐसा न हो कि वक्त के साथ जनता आपकी राजनीति का गणित - भूगोल सब बिगाड़ दे और आपको राजनीति में इतिहास का हिस्सा बनने पर मजबूर कर दे। ।।जय भारत।।

deepaktiwari555@gmail.com

शनिवार, 5 जनवरी 2013

बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा..!


करूणानिधी के 18 सांसदों वाली द्रविड़ मुनेत्र कषगम पार्टी (द्रमुक) भले ही केन्द्र की यूपीए सरकार की बैसाखी बनी हुई हो लेकिन द्रमुक के उत्तराधिकार को लेकर करूणानिधी के दो बेटों की लड़ाई से द्रमुक पर ही संकट खड़ा हो गया है। द्रमुक के सर्वेसर्वा करूणानिधि ने भले ही अपने छोटे बेटे स्टालिन को पार्टी की बागडोर देने के संकेत दिए हों लेकिन करूणानिधि के बड़े बेटे एम. के. आलागिरी को अपने पिता का ये फैसला रास नहीं आ रहा है और अलागिरी ने पिता के इस फैसले के खिलाफ ताल ठोक दी है। अलागिरी ने ये कह दिया है कि पार्टी कोई मठ नहीं है जो इसके उत्तराधिकारी की नियुक्ति की जाए।
वैसे देखा जाए तो राजनीति में परिवारवाद नई बात नहीं है और हिंदुस्तान में ऐसे बड़े - बड़े उदाहरण मौजूद हैं जो ये साबित करते हैं कि राजनीति में प्रवेश करने का सबसे आसान रास्ता विरासत की सियासत ही है। देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस से बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है जहां पर परिवारवाद ही हावी है।
1991 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद लगा था कि अब ये परंपरा टूटेगी लेकिन सोनिया गांधी ने पार्टी को नेतृत्व प्रदान कर न सिर्फ कांग्रेस को उबारा बल्कि परिवारवाद की परंपरा को भी आगे बढ़ाया...इसे एक बार फिर से सोनिया गांधी के सुपुत्र राहुल गांधी आगे बढ़ा रहे हैं। कांग्रेस के ही कई बड़े नेताओं के सुपुत्र जो कम समय में नाम कमा चुके हैं उनका पारिवारिक इतिहास पर नजर डालें तो ये तस्वीर और साफ हो जाती है। फिर चाहे माधव राव सिंधिया के सुपुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया हो या फिर राजेश पायलट के बेटे सचिन पायलट ये सब परिवारवाद की ही उपज हैं। करूणानिधि के बेटे भी इसी की उपज हैं लेकिन एक ही परिवार में पार्टी की सत्ता को लेकर आपस में तलवारें खिंच जाना रोचक हैं।
तमिलनाडु में द्रमुक की लोकप्रियता ही शायद करूणानिधि के दोनों बेटों के बीच पैदा हो रही दरार की मुख्य वजह ही है क्योंकि वर्तमान में केन्द्रीय मंत्री एम. के. आलागिरी तब तक ही मंत्री हैं जब तक केन्द्र में यूपीए की सरकार है, उसके बाद अलागिरी को पूछने वाला भी कोई नहीं होगा। अलागिरी को फिर से सत्ता का स्वाद भविष्य में तमिलनाडु में ही नसीब हो सकता है, वो भी तब जब द्रमुक तमिलनाडु में सत्ता पर काबिज हो और वो द्रमुक के सर्वमान्य नेता हो...लेकिन अलागिरी के पिता और फिलहाल द्रमुक के सर्वेसर्वा करूणानिधि का प्यार बड़े बेटे अलागिरी की बजाए छोटे बेटे स्टालिन पर ज्यादा छलक रहा है जो अलागिरी को रास नहीं आ रहा है।
जाहिर है अलागिरी की मंशा है कि करूणानिधि के बाद द्रमुक के सर्वेसर्वा वे खुद हों न कि स्टालिन। अलागिरी को द्रमुक के सर्वेसर्वा बनने के बाद भविष्य में कभी द्रमुक के सत्ता में आने के बाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री की कुर्सी भी नजर आ रही होगी शायद इसलिए ही पिता के फैसले पर वे कहते हैं कि पार्टी कोई मठ नहीं है। खैर द्रमुक में पैदा हो रही दरार की असली वजह सब जानते ही हैं लेकिन बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या सिर्फ राजनीतिक दल के सर्वेसर्वा की कुर्सी पर बैठकर ही जनता की सेवा या गरीबों का उत्थान किया जा सकता है..? क्योंकि करूणानिधी कहते हैं कि उनके बाद उनका छोटा बेटा द्रमुक की कुर्सी संभालने के बाद इस काम को करेगा यानि कि बिना कुर्सी के करूणानिधि के मुताबिक जनता की सेवा नहीं होती..!
करूणानिधि की इसी सोच को ही अब उनके बेटे आगे बढ़ा रहे हैं और जनता की सेवा के लिए पार्टी का सर्वेसर्वा बनने के लिए दोनों के बीच उजागर हुए मतभेद पूरी कहानी बयां कर रहे हैं कि उनके दिल में जनता की सेवा करने का जज्बा कितना गहरा है और कुर्सी को पाने की लालसा कितनी जोर मार रही है। जब तमिलनाडु में सत्ता में न रहते हुए द्रमुक के सर्वेसर्वा करूणानिधि के बेटों में पार्टी के उत्तराधिकार को लेकर तलवारें खिंच गई हैं तो अगर कभी भविष्य में द्रमुक सत्ता में आ गई तो फिर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए दोनों भाइयों में कितनी जूतम पैजार होगी इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

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गुरुवार, 3 जनवरी 2013

सिर्फ 20 रूपए में बेच दिया ईमान !


बात 29 दिसंबर 2011 की है...देहरादून से रात को काठगोदाम जाने वाली काठगोदाम-देहरादून एक्सप्रेस 12 घंटे लेट थी तो ट्रेन सुबह करीब साढ़े 11 बजे देहारादून से काठगोदाम के लिए चली। बाहर कोहरा था तो ट्रेन धीरे धीरे रूकते रुकाते अपने गंतव्य की ओर बढ़ रही थी। ट्रेन में पेंट्री नहीं थी ऐसे में जहां जहां ट्रेन रुकती वहां वहां यात्रियों को चाय-नाश्ता बेचने के लिए कुछ लोग ट्रेन में चढ़ जाते और ट्रेन चलते ही उतर रहे थे। मैं ट्रेन के बी-1 कोच में अपने भांजे के साथ यात्रा कर रहा था।
ट्रेन रामपुर स्टेशन से बस चली ही थी कि हाथ में गर्म चाय की केतली लिए एक युवक जिसकी उम्र करीब 30 वर्ष रही होगी हमारी बोगी से बड़ी तेजी से बाहर निकल रहा था उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था। युवक के पीछे एक पुलिसकर्मी जिसकी उम्र भी करीब 30 वर्ष के आस पास होगी भी तेजी से हमारी बोगी से बाहर निकला। चाय वाले को देखकर चाय लेने मैं भी बोगी से बाहर निकला था तो वहां का नजारा कुछ इस तरह था। ट्रेन के दरवाजे के पास पुलिसकर्मी चाय वाले युवक को ट्रेन में चढ़ने पर डपट रहा था और युवक से पूछताछ कर रहा था और उसने उसका परिचय पत्र मांगा। मैंने इसे नजरअंदाज करते हुए युवक से दो ग्लास चाय की मांगी तो वो युवक पुलिसकर्मी के सामने चाय देने से घबराने लगा। हालांकि उसने मुझे दो ग्लास चाय दे दी लेकिन इतने में वो पुलिसकर्मी उस युवक का परिचय पत्र लेकर युवक से ये कहते हुए आगे निकल गया कि तू मुझे आगे आकर मिल। कुल मिलाकर पुलिसकर्मी को चाय वाले युवक से पैसे ऐंठने का बहाना मिल गया था।
खैर मैं चाय लेकर अपनी सीट पर पहुंच गया। करीब 5 मिनट बाद वो चाय वाला युवक वापस हमारी बोगी में आया और चाय बेचने लगा इस बार उसके चेहरे पर कोई डर नहीं था और वो बड़े इत्मीनान से यात्रियों को चाय देने लगा। इस 5 मिनट में चाय वाले युवक के साथ क्या हुआ होगा ये सारा माजरा मेरे समझ में आ गया था लेकिन फिर भी मैं युवक से पूछे बिना नहीं रह पाया। मैंने युवक को आवाज देकर बुलाया और उससे पूछा कि वह पुलिसकर्मी उससे क्या बोल रहा था तो वो पुलिसकर्मी को गाली देते हुए बोला कि साहब- ये तो हमारे साथ रोज ट्रेन में होता है हम दो पैसे कमाने के लिए ट्रेन में चाय बेचने के लिए आते हैं लेकिन मौका मिलते ही ये पुलिस वाले हमें परेशान करते हैं और पैसे वसूलते हैं। आज भी वही हुआ और वो हमसे पैसे मांगने लगा...हम भी क्या करते पैसे देने पड़े। वो बोला कि पुलिसकर्मी को पैसे दिए बगैर चाय बेचेंगे तो पुलिस वाला कहता है कि ये गलत है लेकिन उसको पैसे दे दिए तो सब सही हो जाता है। मैंने पूछा कि ये कितने पैसे मांगते हैं तो उसने जो बोला वो चौंकाने वाला था। वो बोला साहब- ये लोग तो पांच सौ रूपए तक मांगते हैं लेकिन 20-30 रूपए में भी मान जाते हैं। इतनी देर में किसी ने चाय के लिए आवाज दी तो वो चाय देने चला गया।
मैं काफी देर तक बैठकर इस बारे में सोचता रहा वाकई में पुलिस वालों के लिए जो कहा जाता है कि ये सिर्फ कमाई करना जानते हैं और कुछ नहीं(सभी पुलिसकर्मी नहीं)। ट्रेन में हैं तो ये यात्रियों की सुरक्षा के लिए तैनात लेकिन इनकी नजर ऐसे ही चाय वालों पर या लोगों पर रहती है जिनसे मौका मिलते ही ये वसूली शुरु कर देते हैं। मैंने एक हिसाब लगाया कि देहरादून से काठगोदाम तक 336 किलोमीटर के सफर में ट्रेन करीब डेढ़ दर्जन स्टेशनों पर रूकती है। यानि की अगर इस दौरान एक पुलिसकर्मी के हाथ ऐसे 20 चाय वाले भी लग गए और हर चाय वाले से वो कम से कम 30 रूपए भी लेता है तो पुलिसकर्मी करीब 600 रूपए कमा लेता है यानि कि 18 हजार रूपए महीना। हर माह सरकार जो तन्खवाह देगी वो अलग। जब एक पुलिसकर्मी को सैलरी के अलावा करीब 15 से 20 हजार रूपए महीने इस तरह कमाई हो रही हो तो वो भला क्यों ये काम नहीं करेगा(सभी पुलिसकर्मी शामिल नहीं)। अब ट्रेन में यात्रियों का सामान चोरी हो रहा है तो हो जाए...लेकिन इन पुलिसकर्मियों को इससे कोई सरोकार नहीं। खैर ये तो एक छोटा सी घटना थी जो मेरे सामने घटी...इस तरह की हजारों वाक्ये रोज होते हैं जो शायद आपने भी अनुभव किए होंगे।
अंदाजा लगाया जा सकता है कि पुलिसकर्मी कितनी ईमानदारी से अपनी ड्यूटी को अंजाम देते हैं...माना कि चाय वाला भी गलत तरीके से चाय बेच रहा था लेकिन अगर पुलिसकर्मी उसके खिलाफ कार्रवाई करें तो मजाल है कि आगे से कोई चाय वाला इस चरह बगैर लायसेंस के ट्रेन में चाय बेचने के लिए घुसे लेकिन अगर चाय वाले कि हर बार इतनी हिम्मत होती है तो वो इन पुलिसकर्मियों की वजह से ही क्योंकि वे जानते हैं कि 20-30 रूपए में ये पुलिसवाले मान जाएंगे और वे आसानी से बिना रोकटोक ट्रेन में चाय बेच पाएंगे...लेकिन अफसोस हमारे देश में ऐसा होता नहीं है। यहां चोरी करने वाले को पकड़े जाने का डर नहीं क्योंकि उसे मालूम है कि पहले तो पकड़ने वाला ही उसे चंद पैसों पर उसे छोड़ देगा। ये पुलिसकर्मी अगर इमानदारी से अपनी ड्यूटी करें तो क्या नहीं कम होंगे हमारे देश में अपराध..?  जाहिर है पूरी तरह अपराधों पर अंकुश नहीं भी लग पाएगा तो कुछ हद तक अपराध और अपराधियों पर लगाम तो कसेगी लेकिन हमारे देश में जहां नीचे से ऊपर तक सब भ्रष्टाचार में लिप्त हैं वहां ये मुमकिन नहीं लगता।

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बुधवार, 2 जनवरी 2013

शर्म करो नेता जी..!


महिलाओं के हितों की बात हो या फिर उनके साथ घटे अपराध पर उन्हें इंसाफ दिलाने की बात हिंदुस्तान में नेता एक ऐसी कौम हैं, जिन्हें ये सब शायद रास नहीं आता(इसमें सभी नेता शामिल नहीं)। शायद यही वजह है कि जब जब इस से जुड़े मुद्दे उठते हैं...महिलाओं के हक में आवाज उठती है तब - तब महिलाओं को घेरते हुए...उन पर सवाल खड़े करते हुए...उन पर ऊंगली उठाते हुए नेताओं के बेतुके बयान देश के किसी न किसी कोने से जरूर सुनाई दे जाते हैं। जो न सिर्फ पूरे समाज तो आहत करते हैं बल्कि महिलाओं के लिए शर्मनाक स्थिति पैदा कर देते हैं।
दिल्ली गैंगरेप मामले पर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के सांसद बेटे अभिजीत मुखर्जी (हर मुद्दे पर कैंडल मार्च निकालने का फैशन चल पड़ा है, लड़कियां दिन में सज-धज कर कैंडल मार्च निकालती हैं और रात में डिस्को जाती हैं।) का बयान हो या फिर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर दिए गए सीपीएम नेता अनीसुर रहमान (आप(ममता बनर्जी) रेप के लिए कितना चार्ज लेंगी?”) का बयान। ये सिर्फ बयान नहीं है बल्कि ये नेताओं की संकुचित सोच को उजागर करते हैं...और जाहिर करते हैं कि महिलाओं को लेकर नेताओं की सोच कितनी विकसित है।
ये बयान ये बताने के लिए काफी हैं कि महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर नेता संवेदनशील नहीं हैं, और उनको रास नहीं आता अगर कोई महिला किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ रही है या फिर अपने हक के लिए आवाज उठा रही है। शायद ये नेता सोचते हैं कि महिलाओं की जगह उनकी जूती की नोंक के नीचे है...हालांकि ये बात सभी नेताओं पर लागू नहीं की जा सकती लेकिन देश की संसद या राज्यों की विधानसभा में बैठने वाला एक भी नेता अगर ऐसी सोच वाला है तो ये शर्म की बात है...क्योंकि बात सिर्फ अभिजीत मुखर्जी और अनीसुर रहमान की नहीं है...देश के गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे(अभिनेत्री और राज्यसभा सांसद जया बच्चन से- मैडम मैडम जरा ध्यान से सुनिए, यह (असम मुद्दा) कोई फिल्मी इशू नहीं है), एनडीए संयोजक शरद यादव(महिला आरक्षण के मुद्दे पर- इस विधेयक के जरिये आप परकटी महिलाओं को सदन में लाना चाहते हैं..?) और मुलायम सिंह(महिला आरक्षण बिल पर- यह बिल पास होने से सदन में ऐसी महिलाएं भर जाएंगी जिन्हें देखकर लोग सीटियां बजाएंगे) सरीखे नेताओं की ऐसी सोच सोचने पर मजबूर करती है।
वहीं दूसरी तरफ नेताओं के ऐसे बयानों को जनता के सामने रखने वाले मीडिया पर ही कुछ लोग सवाल खड़े करते हैं कि सिर्फ टीआरपी बटोरने के लिए मीडिया ऐसे बयानों को तोड़ मरोड़ कर पेश करता है, लेकिन जब मीडिया नेताओं की वास्तविक सोच(जिससे वो बाद में मुकर जाते हैं) को जनता के सामने पेश करता है तो उसमें सभी पक्षों को भी तो सामने रखता है, जिसमें ऐसे बयान देने वाले नेताओं को भी शामिल किया जाता है ऐसे में इसे ये कैसे मान लिया जाए कि मीडिया सिर्फ अपनी टीआरपी के लिए इन बयानों को तोड़ मरोड़कर पेश करता है। आखिर खबरों के साथ ही इन नेताओं की असली सोच को उन लोगों के सामने उजागर करना भी तो मीडिया का काम है, जिन नेताओं को ये लोग चुनाव में वोट देकर विधानसभा या संसद तक पहुंचाते हैं।
खास बात ये है कि बेतुके बयान देने के बाद इनमें से कुछ नेता तो अपनी बात को जायज ठहराते नजर आते हैं, तो कुछ सफेद झूठ बोलते हुए अपनी बयान से साफ पलट जाते हैं और उल्टा मीडिया पर ही बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश करने का आरोप लगाते हैं। महिलाओं के हितों के मुद्दों पर नेताओं की ऐसे बयान न सिर्फ उनकी संकुचित सोच को बयां करते है बल्कि ये सवाल भी खडे करते हैं कि क्या वाकई में देश की आधी आबादी(महिलाएं) जिन नेताओं को ये सोच कर चुन कर संसद/विधानसभा में पहुंचाती हैं, वे नेता उनके हक के लिए संसद में विधानसभा में कैसे आवाज उठाएंगे और क्यों आवाज उठाएंगे..? क्योंकि ये नेता तो महिला हित से जुड़े मुद्दे पर या महिला अपराध पर इंसाफ के लिए उठने वाली आवाज पर ही अपने बेतुके बयान से सवालिया निशान लगा देते हैं। सब से बड़ी बात तो ये है कि इनमें से कई नेता महिला अपराध (बलात्कार, महिला उत्पीड़न आदि) में शामिल होते हैं...ऐसे में कैसे महिलाओं की स्थिति में सुधार की उम्मीद इन नेताओं के भरोसे की जा सकती है...जाहिर है ऐसे नेता न तो संसद में बैठने के काबिल हैं और न ही विधानसभा में और ये काम अगर देश की हर महिला ठान ले तो चुनाव में ऐसे नेताओँ को सबक सिखा कर आसानी से कर सकती है।

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सोमवार, 31 दिसंबर 2012

वो 2012 की बात थी...


लो 2013 भी आ गया...वक्त है नई शुरुआत की...नई ऊर्जा, नए जोश और नई उमंग से आगे बढ़ने का। बीते हुए कल से कुछ सीख कर आगे बढ़ने का। उन बातों को...झगड़ों को आपसी मनमुटाव को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने का जो जाने आनजाने बीते साल में कुछ कड़वाहट घोल गए। 2011 के बाद 2012 का सफर भी कुछ इसी अंदाज में करने की मैंने भी पूरी कोशिश की थी लेकिन कहते हैं न कि सब कुछ आपके मन मुताबिक हो ऐसा संभव नहीं है। 2011 में नोएडा में नौकरी करने के दौरान देहरादून में नौकरी का बेहतर अवसर मिला। बेहतर अवसर जान 17 जनवरी 2012 को मैंने देहरादून में नेटवर्क 10 समाचार चैनल के साथ एक नई शुरुआत की। 2008 से अपने गृह प्रदेश उत्तराखंड से दूर मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में उसके बाद ग्वालियर और ग्वालियर से दिल्ली तक का सफर तय किया। इस दौरान नए प्रदेश में नए शहर में नए लोगों के बीच काम करने का अनुभव बेमिसाल था। बहुत कुछ जानने- सीखने को मिला और कई नए दोस्त भी बने। 2012 में वापस उत्तराखंड में काम करने का अवसर मिला तो काफी जद्दोजहद के बाद देहरादून में नेटवर्क 10 समाचार चैनल के साथ जुड़ने का फैसला लिया। नए संस्थान में नए लोगों के बीच सामंजस्य बैठाने में समय लगता है लेकिन इसमें मुझे बहुत ज्यादा दिक्कत नहीं हुई। नया चैनल था तो सभी साथियों में जोश था अपने संस्थान को नंबर वन बनाने की ललक थी। काफी हद तक उत्तराखंड में लोगों के दिलों में जगह बनाने में हम सफल भी हो गए। उत्तराखंड का 24 घंटे का एकमात्र समाचार चैनल होने के कारण भी हमको लोगों के बीच अपनी पहचान बनाने में ज्यादा वक्त नहीं लगा और कम समय में हमने एक मुकाम को हासिल किया। दर्शकों का हमें बेपनाह प्यार और साथ भी मिला जिसकी गवाह क्षेत्रीय और राष्ट्रीय मुद्दों पर हमारे विशेष कार्यक्रम में दर्शकों के कभी न बंद होने वाली फोन कॉल्स थी। बस जरूरत थी तो दर्शकों के इस प्यार और विश्वास को बरकरार रखने की जो किसी भी संस्थान के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होता। हम हर तरह की चुनौती का सामना की पूरी कोशिश कर रहे थे लेकिन संस्थान में इस दौरान कई बार हुई प्रबंधकीय उठापठक इस कोशिश को कमजोर कर देती थी। लेकिन हल्के से ठहराव के आगे भविष्य में बेहतरी की उम्मीद लिए सभी कर्मचारी एक बार फिर से अपनी कोशिश को साकार रूप देने में जी जान से जुट जाते थे। इस बीच संस्थान को कई बार खराब आर्थिक हालात का भी सामना करना पड़ा जिसका खामियाजा कर्मचारियों को भी कई बार भुगतना पड़ा लेकिन पहले दिन से संस्थान के साथ जुड़े सभी कर्मचारियों का संस्थान से भावनात्मक लगाव ही था कि इस सब के बाद भी कर्मचारियों का जोश ठंडा नहीं हुआ। स्थितियों में सुधार की उम्मीद के साथ कई लोग संस्थान के साथ जुड़े रहे तो कई लोगों ने इस बीच संस्थान को बॉय बॉय भी कर दिया। 2012 गुजर गया और 2013 का आगमन हो गया लेकिन बीते एक साल में संस्थान ने अपने बहुत ही कम समय में न सिर्फ अपने सर्वोच्च शिखर को छुआ बल्कि कई बार ऐसी स्थितियां आई की लगने लगा कि इसका जीवन सिर्फ 365 दिनों का ही है। बहरहाल 2013 के रूप में नया साल सामने है और नए साल में नई सोच, नई आशा, नई उम्मीद, नए सपने, नए जज्बे के साथ एक नई ऊर्जावान शुरूआत करने के लिए एक बार फिर से कमर कस ली है। इसी उम्मीद के साथ कि बीते साल की तरह मुश्किल दौर भी बीते दिनों की बात हो जाएगी और नया साल 2013 सफलता के नए आयाम गढ़ेगा आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

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शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

क्या लड़की होना उसका कसूर था ?


13 दिनों तक जीवन और मौत से संघर्ष करने के बाद आखिरकार वो चली गई...उसने तो अभी अपने जीवन की ठीक से शुरुआत भी नहीं की थी। उसके सपनों ने तो अभी ठीक तरह से आकार भी नहीं लिया था...लेकिन कुछ दरिंदों के नापाक ईरादों और शैतानी दिमाग ने उसकी जिंदगी को नर्क बना दिया। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी वो फिर भी जीना चाहती थी...उसके जज्बे और ईच्छाशक्ति को देखकर उसका ईलाज करने वाले डॉक्टर भी दंग थे। उसने जिंदगी की जंग जीतने कीमौत को मात देने की पुरजोर कोशिश भी की लेकिन दरिंदों के दिए जख्म आखिरकार जीत गए और वो हमेशा के लिए खामोश हो गई। एक बार फिर जिंदगी हार गई लेकिन जाते जाते कई ऐसे सवाल खड़े कर गई जिनका जवाब शायद भगवान के पास भी नहीं होगा।
कुछ लोगों के ईरादे नापाक थे लेकिन उसका क्या कसूर था ? क्या लड़की के रूप में जन्म लेना उसका कसूर था ? क्या अंधेरा घिरने से पहले घर न लौटना उसका कसूर था ? क्या उसकी ईज्जत को तार-तार करने वालों का विरोध करना उसका कसूर था ?
इस घटना के बाद राजपाथ पर लोगों का गुस्सा खूब उबाल खाया...एक पोस्टर पर लिखी पंक्तियां मुझे याद आता हैं...नजर तेरी बुरी और पर्दा मैं करूं। पहले सवाल का जवाब तो मुझे इन पंक्तियों में ही नजर आता है- वाकई में नजर कुछ दरिंदों की खराब है...नीयत कुछ लोगों की शैतानी है...इरादे कुछ लोगों के नापाक हैं...लेकिन पर्दा लड़कियां करें। क्यों न इन खराब नजर वालों को...शैतानी नीयत वालों को नापाक इरादों वालों को ही सजा मिले...लेकिन इसे देश का दुर्भाग्य कहें या ऐसे लोगों की अच्छी किस्मत...हमारे देश में कई बार हैवानियत का खेल खेलने वालों को सबूत होने के बाद भी कई बार सजा नहीं मिलती या मिलती भी है तो वो अपनी आधी जिंदगी खुली हवा में गुजार चुके होते हैं। कड़ी सजा मिलती भी है तो इससे बचने का ब्रह्मास्त्र(राष्ट्रपति के पास दया याचिका) उनके पास पहले से ही मौजूद है। हमारी पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में रेप के 4 आरोपियों की मौत की सजा माफ कर पहले ही उदाहरण पेश कर चुकी हैं कि ये ब्रह्मास्त्र खाली नहीं जाता।
जहां तक दूसरे सवाल की बात है कि क्या लड़की के रूप में जन्म लेना उसका कसूर था ?
इसका जवाब एक दूसरे पोस्टर में लिखी कुछ पंक्तियां में दिखाई देता है। पंक्तियां कुछ इस प्रकार है- अगले जनम मोहे बिटिया न कीजौ। ये पंक्तियां ऐसी लड़कियों का दर्द बयां करती हैं जो कहीं न कहीं...किसी न किसी रूप में ऐसी ही घटनाओं का शिकार हुई हैं या फिर उत्पीड़न का शिकार हैं। लड़की के रूप में पैदा होने के बाद ऐसी पंक्तियां लिखी तख्ती पकड़े कोई लड़की आवाज़ बुलंद करे तो उसका दर्द समझा जा सकता है।
अंधेरा घिरने से पहले लड़कियां घर नहीं पहुंचती तो परिजनों की बेचैनी बढ़ जाती है...मन में बुरे ख्याल आने लगते हैं...क्या ये बताने के लिए काफी नहीं कि लड़कियां हमारे देश में आज भी सुरक्षित नहीं हैं..?
कुछ दरिंदे किसी लड़की के साथ जबरदस्ती करते हैं और वो अपनी ईज्जत बचाने के लिए इसका विरोध करती है तो दरिंदे पूरी हैवानियत पर उतर आते हैं और न सिर्फ दिल्ली गैंगरेप केस की तरह उसकी बुरी तरह पिटाई कर उसे चलती बस से फेंक देते हैं बल्कि उसके साथ ऐसा कृत्य करते हैं कि सुनने वाले की तक रूह कांप उठे। क्या ये हैवानियत ये बताने के लिए काफी नहीं कि महिलाओं के प्रति उनके मन में क्या भाव हैं..? उनकी सोच कैसी है..? वो महिलाओं को सिर्फ मनोरंजन का साधन समझते हैं और विरोध करने पर हैवानियत पर उतर आते हैं। यानि कि गलत कार्य का विरोध करने पर भी इसे महिलाओं की जुर्रत समझा जाता है और उनकी पिटाई की जाती है। क्या ऐसे लोगों समाज में रहने के हकदार हैं..? क्या गारंटी है कि ऐसे लोग दोबारा किसी के घर की ईज्जत को तार-तार नहीं करेंगे..? क्या गारंटी है कि ऐसे लोग फिर दिल्ली गैंगरेप जैसे घटना तो नहीं दोहराएंगे..? जाहिर है जब तक हमारे समाज में ऐसे लोग जिंदा हैं...तब तक समाज में महिलाएं सुरक्षित कतई नहीं है। जब तक ऐसे लोगों को सरेआम फांसी देकर मौत की नींद नहीं सुलाया जाएगा तब तक ऐसी सोच के...ऐसी मानसिकता के इनके जैसे दूसरे लोग ऐसा अपराध करने से नहीं हिचकिचाएंगे। उम्मीद करते हैं हमारी सरकार ऐसे कड़े फैसले लेने के लिए दिल्ली गैंगरेप जैसे किसी दूसरी घटना का इंतजार नहीं करेगी।

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युवा नेताओं की क्या बिसात..!


दिल्ली गैंगरेप के खिलाफ बीते दिनों राजपथ पर देश का आक्रोश आजादी के बाद का शायद अपने आप में सबसे बड़ा उग्र प्रदर्शन था...लेकिन सही नेतृत्व न होने के चलते ये आंदोलन कहीं न कहीं दिशाहीन होता दिखाई दिया और एक बड़े आंदलन की गर्भावस्था में ही हत्या हो गई। असल मुद्दा कहीं खो गया और इसकी जगह बरसाती मेंढ़कों की तरह उपजे ऐसे मुद्दों ने ले ली जिन पर बहस से कोई सार्थक हल निकलने की कोई उम्मीद नहीं है। जिस वक्त रायसीना को घेरे हजारों युवाओं की टोली पीड़ित के लिए इंसाफ और महिलाओं की सुरक्ष के लिए आवाज बुलंद कर रही थी उस वक्त खुद को युवाओं की पार्टी कहने वाली...युवाओं को नेतृत्व देने की बातें करने वाली कांग्रेस के युवा नेताओं को राजधानी के दिल राजपथ में युवाओं का ये आक्रोश नजर नहीं आया। ऐसे वक्त में देश के राष्ट्रपति ने तक रायसीना हिल्स से बाहर निकलने का साहस नहीं दिखाया तो कांग्रेस के युवा नेताओं की क्या बिसात..! देश के गृहमंत्री को जब ये युवाओं की टोली माओवादी नजर आने लगे तो फिर कांग्रेस के युवा नेताओं की क्या बिसात..! देश के प्रधानमंत्री जब ठीक है बोलने लगे तो फिर कांग्रेस के युवा नेताओं की क्या बिसात..! इन युवा नेताओं के नेता कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी जब राजपथ पहुंचने का साहस नहीं जुटा सके तो कांग्रेस के इन युवा नेताओं की क्या बिसात..! राजपथ देश की युवा शक्ति के गुस्से से दमक रहा था लेकिन कांग्रेस के किसी युवा नेता को इसका सामना करने की शायद हिम्मत नहीं हुई। एक बेहद दुखद घटना से ही उपजा सही लेकिन ये एक मौका था राजपथ पर आक्रोश से भरी युवा शक्ति को एक मजबूत नेतृत्व प्रदान करने का...पार्टी लाइन से ऊपर उठकर इंसाफ की लड़ाई को उसके मुकाम तक ले जाने का लेकिन शायद कांग्रेस के युवा नेताओं में भी दूसरे कांग्रेसी नेताओं की तरह 10 जनपथ की अवमानना करने का साहस नहीं था। राजपथ पर उमड़ा युवाओं का जनसैलाब इनका इंतजार कर रहा था लेकिन ये शायद दिल्ली की सर्दी में गर्म कमरों का मोह नहीं छोड़ पाए या यूं कहें कि 10 जनपथ के खिलाफ आवाज उठाने की इनमें हिम्मत नहीं थी। लाल बत्ती और सरकारी बंगला पा चुके कुछ युवा नेताओं में शायद लाल बत्ती लगी सरकारी गाड़ी और सरकारी बंगला छोड़ने का साहस नहीं था तो भविष्य में लाल बत्ती की लालसा पाले बैठे कुछ युवा नेताओं की लालसा शायद कुछ ज्यादा ही जोर मार रही थी। ये खुद को युवाओं के नेता कहते हैं और युवा शक्ति के दम पर देश की सूरत बदलने की बात करते हैं लेकिन उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होने का साहस शायद इनमें नहीं हैं। ये सच्चाई है इन युवा नेताओं की जो राजनीति की सीढ़ी तो युवाओं के कंधे पर पैर रखकर चढ़ते हैं या फिर अधिकतर को ये विरासत में मिलती है लेकिन राजनीति के गलियारों में प्रवेश करने के बाद इनका खून भी शायद दूसरे नेताओं की तरह पानी हो जाता है। बात सिर्फ केन्द्र की सत्ता में बैठी कांग्रेस के युवा नेताओं की नहीं है बल्कि इस मुद्दे पर विपक्ष में बैठी देश की दूसरी बड़ी पार्टी भाजपा के युवा नेताओं की चुप्पी भी दोनों ही दलों को एक जमात में खड़ा करती है।  


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गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

बेटा बोला लेकिन राष्ट्रपति “पिता” खामोश !


दिल्ली गैंगरेप मामले के खिलाफ देशभर में गुस्से की आग भड़की और ये गुस्सा रायसीना हिल्स तक भी पहुंचा। दो दिनों तक रायसीना हिल्स पर गैंगरेप के आरोपियों को फांसी की मांग को लेकर प्रदर्शनकारियों ने दिल्ली सरकार के साथ ही पुलिस की नींद उड़ा दी लेकिन रायसीना हिल्स से राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी बाहर नहीं निकले और न ही उन्होंने इस घटना पर दुख जताना जरूरी समझा। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी न बोले न सही लेकिन पश्चिम बंगाल की जंगीपुर सीट से उनके सांसद बेटे अभिजीत मुखर्जी ने पिता की इस कमी को पूरी करने में देर नहीं की। कांग्रेस सांसद अभिजीत कहते हैं कि महिलाएं सज-धज कर प्रदर्शन करने आती हैं और कैंडिल मार्च निकालने के बाद डिस्को में जाती है। मुखर्जी साहब यहीं नहीं रूक वे कहते हैं कि कैंडिल मार्च निकालना फैशन हो गया है। बयान पर बवाल मचने के बाद भले ही मुखर्जी ने अपने शब्द वापस ले लिए हों लेकिन फिर भी वे ये कहने से नहीं चूके कि उन्होंने कुछ गलत कहा था। पिता की सीट पर बमुश्किल 2500 वोटों से उपचुनाव जीतकर संसद में पहुंचने वाले अभिजीत मुखर्जी को लगता है सुर्खियों में आने की कुछ ज्यादा ही जल्दी है। शायद यही वजह है कि एक ऐसे मुद्दे पर वे अपना मुंह खोलते हैं जिसको लेकर पहले ही जमकर बवाल मच चुका है। एक संवेदनशील मुद्दे पर राष्ट्रपति मुंह नहीं खोलते लेकिन राष्ट्रपति का सांसद बेटा अगर ऐसा बोलता है तो वाकई में इससे बड़ा दुर्भाग्य इस देश का और क्या हो सकता है। होना तो ये चाहिए था कि राष्ट्रपति को खुद रायसीना हिल्स में बाहर निकलकर लोगों से शांति की अपील करते हुए मामले में दखल देना चाहिए था और सरकार को इस संवेदनशील मुद्दे पर जल्द से जल्द आवश्यक कदम उठाने के निर्देश देने चाहिए थे लेकिन ऐसा नहीं हुआ और रही सही कसर राष्ट्रपति के सांसद बेटे ने पूरी कर दी। आभिजीत मुखर्जी ने तो प्रदर्शनकारियों पर ही सवाल खड़ा कर दिया कि ये प्रदर्शन तो सिर्फ एक दिखावा था। मुखर्जी साहब कभी एसी कमरों से बाहर निकल कर दिल्ली की सर्दी में एक रात छोड़िए एक घंटा बिताकर दिखा दीजिए आंदोलन और फैशन का फर्क आपको शायद समझ में आ जाएगा..! मुखर्जी साहब जिसे आप फैशन बोल रहे हैं ये न सिर्फ एक पीड़ित को इंसाफ दिलाने की लड़ाई है बल्कि महिलाओं के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार करने की ओर महिलाओं की तरफ से बढ़ाया हुआ कदम था लेकिन अफसोस है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए शुरू हुई इस लड़ाई को न तो आपके पिताश्री समझ पाए जबकि वे तो इन प्रदर्शनकारियों से चंद कदम दूर थे और न ही आप। अरे साहब किसी पीड़ित का दर्द नहीं समझ सकते न सही कम से कम उनके जख्मों पर नमक तो मत छिड़किए। आप पीड़ित का दर्द कम नहीं कर सकते तो उसके जख्मों को कुरदने का भी आपको कोई अधिकार नहीं है। कटाक्ष करने के बाद आपने भले ही माफी मांग ली हो लेकिन जुबान से निकला हुई तीर वापस तो नहीं होता न...बोलने से पहले सोच तो लिया करो महाराज कि क्या बोलने जा रहे हैं...अपना न सही अपने पिताजी के पद और गरिमा का तो कम से कम ख्याल रखिए। आपके पिताजी ने तो चुप रहना ही बेहतर समझा लेकिन आपने तो पिताजी की सारी मेहनत पर पानी फेर दिया।

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बुधवार, 26 दिसंबर 2012

एक कुली ईमानदार है लेकिन प्रधानमंत्री नहीं !


ये उस देश की कहानी है...जो बताती है कि उस देश में रेलवे स्टेशन में यात्रियों का सामान उठाकर दो वक्त की रोजी का जुगाड़ करने वाला एक कुली तो ईमानदार है लेकिन देश का प्रधानमंत्री ईमानदार नहीं है..! सुनने में ये अजीब जरूर लग रहा होगा लेकिन ये सौ फीसदी सच है और दुर्भाग्य से ये कहानी हमारे हिंदुस्तान की है। इस बात को कहने के पीछे एक बड़ा वाक्या है जो मेरे साथ घटित हुआ। बात ज्यादा पुरानी नहीं है- दिल्ली के पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से मुझे काठगोदाम के लिए रवाना होना था। आमतौर पर स्टेशन पर मैं कुली की सेवाएं नहीं लेता हूं...लेकिन भाई की शादी के लिए घर लौट रहा था...ऐसे में मेरे पास कुछ ज्यादा ही सामान था। ऐसे में मैंने एक कुली को आवाज दी। कुली मेरा सामान लेकर आगे आगे चल रहा था। कुछ ही आगे बढ़ा था कि मुझे प्लेटफार्म पर इत्तेफाक से मेरा एक मित्र टकरा गया...मैंने कुछ देर रुककर उससे बातचीत करने लगा। लेकिन इस बीच कुली जो मेरा सामान लेकर आगे आगे चल रहा था उसे शायद मेरे रुकने का आभास नहीं हुआ और वह आगे निकल गया। करीब 5 मिनट के बाद मुझे ध्यान आया कि कुली के पास मेरा सामान है। मैंने चारों तरफ देखा मुझे कुली नहीं दिखाई दिया। मुझे लगा कि मेरी लापरवाही का फायदा कुली ने उठा लिया और वो मेरा सामान लेकर चंपत हो गया। मैंने कुली का बिल्ला नंबर भी नहीं देखा था...ऐसे में कुली को ढूंढ़ना मुझे मुश्किल लगने लगा। करीब 15 मनट हो गए लेकिन काफी तलाश करने के बाद भी मुझे कुली नहीं मिला। ट्रेन छूटने में अभी वक्त था ऐसे में मैं कुली को तलाश करते-करते जीआरपी थाने में कुली की शिकायत दर्ज कराने पहुंचा। वहां का नजारा न सिर्फ हैरान करने वाला था बल्कि मेरी चेहरे की सारी शिकन वहां पहुंचकर गायब हो गई। थाने के बाहर वो कुली मेरे सामान के साथ पहले ही मौजूद था। मुझे वहां देखते ही वो मुझ से बोला- साहब मैं सामान लेकर ट्रेन के पास पहुंच गया था...लेकिन पीछे देखा तो आप दिखाई नहीं दिए। फिर मैंने कुछ देर तक तलाशा और फिर में ये सोचकर यहां पर सामान लेकर आ गया कि आप यहां जरूर आएंगे। जिस कुली के लिए मैं पलभर पहले ही पता नहीं क्या क्या सोच रहा था। मन ही मन उस कुली के साथ सभी कुलियों को गालियां दे रहा था...उस कुली को अपने सामान के साथ सामने देखकर कुली के लिए मेरा नजरिया बदल गया। खैर कुली फिर मेरे साथ चल दिया और उसने मेरा सामान ट्रेन में रखा। मैंने कुली को शुक्रिया बोलते हुए उसे तय रूपए के अलावा कुछ पैसे अलग से देने चाहे लेकिन कुली ने तय पैसे से अधिक पैसे मेरे कई बार आग्रह करने के बाद भी नहीं लिए। मैंने एक बार फिर से कुली का शुक्रिया बोला और वो कुली अपने रास्ते चल दिया और कुछ ही मिनटों में ट्रेन भी चल दी। ये सिर्फ एक घटना थी जो हो सकता है कई और लोगों के साथ भी घटित हुई हो लेकिन ये एक घटना अपने आप में कई बातें कह गई। कुली चाहता तो वो सामान लेकर चंपत भी हो सकता था...हालांकि उसमें बहुत कीमती सामान कुछ नहीं था...लेकिन कुली को तो ये बात नहीं पता था कि सामान क्या है..? लेकिन कुली ने ऐसा कुछ नहीं किया। हमारे देश में जहां आज चारों तरफ सिर्फ भ्रष्टाचार की ही गूंज है और पैसे के लिए व्यक्ति कुछ भी कर गुजरने को तैयार है। भाई – भाई का दुश्मन है...बेटा-बाप का दुश्मन है। ऐसे में एक कुली जो दूसरों का बोझा ढो कर अपना और अपने परिवार का पेट पालता है उसकी ये ईमानदारी ऐसे लोगों के मुंह में एक करारा तमाचा है। मैं ये इसलिए भी कह रहा हैं क्योंकि जिस देश का प्रधानमंत्री ईमानदार न हो तो प्रधानमंत्री के सहयोगी मंत्रियों के साथ ही सरकार में शामिल दूसरे लोगों से क्या उम्मीद की जा सकती है। सरकार के मुखिया और सरकार में शामिल तमाम लोगों पर भ्रष्टाचार और घोटाले के आरोप इस बात को सही भी साबित करते हैं कि भारत का प्रधानमंत्री ईमानदार नहीं है लेकिन स्टेशन में सामान उठाने वाला कुली ईमानदार है। एक तरफ ये कुली और उसके जैसे तमाम लोग हैं...जिनका ईमान अभावों में जीवन बसर करने के बाद भी पैसों के आगे कभी नहीं डोलता और दूसरी तरफ हैं हमारे देश के नेता जो सरकारी दामाद की तरह सारी सुख सुविधाओं का उपभोग तो करते ही हैं साथ ही जनता के खून पसीने की कमाई को घोटालों और भ्रष्टाचार के रूप में उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। सलाम है ऐसे कुली की तरह ईमानदारी की मिसाल पेश करने वाले उन सभी लोगों को।  

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सोमवार, 24 दिसंबर 2012

दिल्ली गैंगरेप- “ठीक है” लोग इसे भी भूल जाएंगे !


दिल्ली गैंगरेप में मनमोहन सिंह की चुप्पी टूटती है...लेकिन जिस अंदाज में मनमोहन सिंह ने अपनी चुप्पी तोड़ी और उसके बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पता नही किससे पूछते हैं ठीक है इससे लगता है कि वे मौन ही बने रहते तो ज्यादा अच्छा था। क्या मनमोहन सिंह के सामने कैमरामैन के बाजू में खड़ी सोनिया गांधी से पूछते हैं..?  या फिर जिस किसी ने भी ये स्क्रिप्ट लिखी थी उससे..? जो भी हो लेकिन एक बार फिर इतने संवोदनशील मुद्दे पर प्रधानमंत्री का ऐसा रवैया अपने आप में कई सवाल खड़े करता है..!  एक तरफ मनमोहन सिंह गैंगरेप पर दुख जताते हुए खुद की भी तीन बेटियां होनी की दुहाई देते हैं और आखिर में कहते हैं ठीक है। प्रधानमंत्री जी आपने तो खुद को दी जाने वाले तमाम उपाधियों को आज की घटना के बाद सही ठहरा दिया। यूं ही लोग मनमोहन सिंह को रोबोट नहीं कहते..! यूं ही मनमोहन सिंह को लोग सोनिया के ईशारे पर फैसले लेना वाला नहीं कहते..! यूं ही सोनिया ने पीएम की कुर्सी छोड़कर कई दिग्गज कांग्रेस नेताओं को दरकिनार कर मनमोहन सिंह को दो-दो बार पीएम पद की कुर्सी नहीं सौंपी..! यूं ही बाबा रामदेव आपको मौनी बाबा नहीं कहते..!  यूं ही टाईम मैगजीन के कवर पेज पर दि अंडर अचीवरके टैग के साथ मनमोहन सिंह का फोटो नहीं छपता..! खैर इनके जवाब या तो मनमोहन सिंह खुद दे सकते हैं या फिर सोनिया गांधी। लेकिन दिल्ली गैंगरेप जैसे संवेदनशील मुद्दे पर देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की असंवेदनहीनता ने देशवासियों को एक बार फिर से निराश ही किया है। देश के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे इस मुद्दे को लेकर कितने संवेदनहीन है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वे इंडिया गेट पर गैंगरेप के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों की तुलना माओवादियों से कर देते हैं...वे कहते हैं कल माओवादी प्रदर्शन करें तो वे क्या माओवादियों से भी मिलने जाएं..?  आपको याद दिला दूं कि ये वही शिंदे हैं जो कोयला घोटाले पर कहते हैं कि लोगों की याददाश्त बहुत कमजोर होती है और लोग बफोर्स घोटाले की तरह कोयला घोटाले को भी जल्द भूल जाएंगे। इसका मतलब क्या शिंदे फिर से ये सोच रहे हैं कि दिल्ली गैंगरेप को भी लोग जल्द भूल जाएंगे..? गजब करते हैं शिंदे साहब एक तरफ आप कहते हैं कि आप की भी तीन-तीन बेटियां हैं और आप इस घटना का दर्द समझते हैं और महिलाओं की सुरक्षा के प्रति चिंतित हैं...लेकिन एक तरफ आपका ये असंवेदनहीन बयान..! बढ़िया है शिंदे साहब आप भी अपने प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह के नक्शेकदम पर चल रहे हैं..! वैसे बात चारों तरफ गैंगरेप के आरोपियों को मौत की सजा देने की हो रही है लेकिन हम इस बात को नहीं नकार सकते कि मौत की सजा पाने वाले लोगों के पास इस सजा से बचने की काट भी मौजूद है...और वो काट है राष्ट्रपति भवन। पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल की ही बात कर लें तो उन्होंने अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में 35 कैदियों की मौत की सजा माफ कर दरियादिली दिखाई थी...और खास बात ये है कि इनमें से 5 बलात्कार के बाद पीड़ित की नृशंस हत्या के जुर्म में मौत की सजा पाए हुए थे। मजे की बात तो ये है कि राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने यूपीए सरकार की सलाह पर ही मौत की सजा माफ करने के फैसले लिए थे। अब हम ये कैसे उम्मीद कर लें कि दिल्ली गैंगरेप या ऐसी हैवानियत करने वालों को अगर कानून में संशोधन के बाद मौत की सजा मिल भी जाती है तो वे लोग इसके अंजाम तक भी पहुंचाए जाएंगे। साथ ही ये मत भूलिए कि ये भारत है और इस देश की संसद पर हमला करने वाले आरोपी अफजल गुरु को घटना के 12 साल बाद भी फांसी नहीं दी जाती जबकि सर्वोच्च न्यायालय अफजल को फांसी की सजा सुना चुका है जबकि इसके विपरीत अमेरिका को देखिए चाहे आप अमेरिका की कितनी आलोचना कर लो लेकिन उसने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला करने वाले को उसके घर में घुसकर मारा और भारत में संसद के हमले के आरोपी की सरकार जेल में खातिरदारी कर रही है। 

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रविवार, 23 दिसंबर 2012

दिल्ली गैंगरेप- जय हो मौनी बाबा की...


दिल्ली गैंगरेप पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के देश के नाम संबोधन की खबर आई तो लगा कि अपने पेटेंट दो दिन 15 अगस्त और 26 जनवरी को बोलने वाले मनमोहन सिंह गैंगरेप के विरोध में गुस्से में उबल रहे देश के सामने कोई ऐसी बात करेंगे जिससे शायद लोगो को गुस्सा कम हो...लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ। जैसी की उम्मीद थी मनमोहन सिंह हिंदी की बजाए अंग्रेजी में ही बोले- मनमोहन सिंह की अंग्रेजी इंडिया गेट पर प्रदर्शन करने वाले और महानगरों में रहने वाले तो शायद समझ गए होंगे...लेकिन मनमोहन सिंह उन करोड़ो लोगों तक अपनी बात नहीं पहुंचा पाए जिनके लिए अंग्रेजी बोलने वाले आज भी किसी अंग्रेज से कम नहीं है और कौतहुल का विषय बने रहते हैं। जाहिर है ऐसे लोगों का तादाद लाखों में हैं जो देश में हर रोज बलात्कार के शिकार तो होते हैं लेकिन जब वे अपनी शिकायत लेकर पुलिस थाने में जाते हैं तो उन्हें दुत्कार दिया जाता है। वैसे अच्छा हुआ मनमोहन सिंह देश की भाषा हिंदी की बजाए अंग्रेजी में ही बोले क्योंकि जो कुछ भी मनमोहन सिंह बोले उससे ज्यादा कि उनसे उम्मीद भी नहीं की जा सकती। मनमोहन सिंह को शायद इस घटना के बाद से देश में आया गुस्से का उबाल नहीं दिखाई दिया वर्ना मनमोहन सिंह अपने संबोधन में जिस इंसाफ की मांग देश कर रहा है उस इंसाफ की ओर कुछ कदम बढ़ाते जरूर दिखाते लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ और मनमोहन सिंह गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे की तरह खुद भी बेटियों का बाप होने का हवाला देते हुए घटना पर सिर्फ दुख ही जताते दिखे। इसमें मनमोहन सिंह साहब का भी दोष नहीं है क्योंकि उनके बारे में कहा जाता है कि वे उतना ही बोलते हैं जितना बोलने का उन्हें कहा जाता है...आप सोच रहे होंगे कि आखिर देश के प्रधानमंत्री भी क्या किसी के कहने पर ही बोलते या चुप रहते हैं ! लेकिन चौंकिए मत यहां ऐसा भी होता है...सोचिए अगर ऐसा नहीं होता तो क्या मनमोहन सिंह अपने पेटेंट दो दिनों 15 अगस्त औऱ 26 जनवरी के अलावा किसी और मौके पर आपको बोलते हुए नहीं दिखाई देते। प्रधानमंत्री जी आपको नहीं बोलना है मत बोलिए...लेकिन बिना बोले ही कुछ ऐसा कर जाईये...एक ऐसी नजीर पेश कर दीजिए पीएम साहब कि दिल्ली में क्या देश में दिल्ली जैसी घटना की पुनरावृत्ति फिर न हो...हाथ जोड़कर निवेदन है आपसे।

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दिल्ली गैंगरेप- ओबामा रोते हैं...हम क्यों सोते हैं !



दिल्ली गैंगरेप के खिलाफ शनिवार और रविवार तो इंडिया गेट से लेकर रायसीना हिल्स तक जो हुआ वो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। सरकार और पुलिस के खिलाफ गुस्से का ऐसा ज्वार शायद ही इससे पहले कभी फूटा होगा। गैंगरेप की शिकार पीड़ित के लिए इंसाफ की मांग कर रहे युवा मानो किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। लेकिन एक बार फिर से एक जनांदोलन का दमन करने की कोशिश दिल्ली पुलिस और सरकार ने की...लेकिन दमन की कोशिश ने गुस्से की आग को और ज्यादा भड़का दिया है। अमेरिका में एक स्कूल में एक सिरफिरे की अंधाधुंध फायरिंग 20 बच्चों समेत 28 लोगों की दुखद मौत हो जाती है तो अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा घटना पर दुख जताते हैं...लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के राजा भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी साहब को न तो राष्ट्रपति भवन के बाहर गैंगरेप के खिलाफ हजारों लोगों का जनाक्रोश दिखा और न ही राष्ट्रपति ने इस जघन्य कृत्य की निंदा में दो शब्द ही कहे। मौनी बाबा की उपाधि पा चुके हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एफडीआई के मुद्दे पर तो देश को संबोधित करते हैं लेकिन एक जघन्य अपराध के बाद उसकी निंदा करने का वक्त उनके पास नहीं है। अमेरिका को ऐसे ही दुनिया का सरताज नहीं कहा जाता...9/11 के आरोपियों को अमेरिका उसके घर में घुसकर मारता है तो 26/11 के आरोपी कसाब की सुरक्षा पर भारत करोड़ों रुपए खर्च करता है (फांसी को काफी दवाब के बाद और काफी देर से दी गई) और 26/11 के मास्टरमाइंड अफजल गुरु को हमारे देश के गृहमंत्री श्रीअफजल गुरु कहकर संबोधित करते हैं...शायद यही फर्क है भारत और अमेरिका में। दिल्ली गैंगरेप पीड़ित का ईलाज कर रहे डॉक्टरों का बयान साफ बयां करता है कि चलती बस में लड़की के साथ जो दरिंदगी हुई है वो कम से कम कोई इंसान तो नहीं कर सकते...ये काम सिर्फ शैतान ही कर सकते हैं और ऐसे शैतान कानून के मुताबिक सजा होने के बाद भी समाज के लिए खतरा ही बने रहेंगे...जाहिर है ऐसे हैवानियत करने वालों के लिए मौत की सजा भी कम है। लेकिन अफसोस है कि हमारे देश की सरकार देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों पर एक मासूम के साथ दरिंदगी का खेल खेलने वाले अपराधियों को फांसी के फंदे तक पहुंचाने की बात करने से घबराती हुई नजर आ रही है और दुर्भाग्य देखिए देश का...पहले तो इंसाफ की मांग करने वालों को इंडिया गेट तक पहुंचने से रोकने के लिए मेट्रो स्टेशन के साथ ही इंडिया गेट को जाने वाले सभी रास्ते बंद कर दिए जाते हैं...और इसके बाद भी प्रदर्शनकारी इंडिया गेट पर पहुंच जाते हैं तो उन पर आंसू गैस के गोले छोड़े जाते हैं और लाठियां बरसाई जाती हैं। एक लड़की के साथ हैवानियत का खेल खेला जाता है और उसके लिए इंसाफ की मांग करने वाली लड़कियों पर लोगों की रक्षा करने का बीड़ा उठाने वाली हमारी बहादुर पुलिस लाठियां बरसाती हैं...हालांकि ये बात सभी जानते हैं कि पुलिसवाले भी सरकार के इशारे पर ही ये काम कर रहे थे। इसके बाद भी विडंबना देखिए दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे और कांग्रेस सांसद संदीप दीक्षित जब इंडिया गेट पर पुलिसिया कार्रवाई के लिए दिल्ली पुलिस कमिश्नर को जिम्मेदार ठहराते हुए उन्हें हटाने की मांग करते हैं तो उनकी माता जी उनके सुर में सुर मिलाती हैं...और कमिश्नर के सिर सारा ठीकरा फोड़ देती हैं...और कमिश्नर को हटाने की बात कहती हैं...क्या ऐसा संभव है कि दिल्ली के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले और कड़ी सुरक्षा वाले इलाके में जहां एक तरफ राष्ट्रपति भवन है तो दूसरी तरफ संसद वहां पर हजारों लोग प्रदर्शन करते हैं और उन पर लाठियां बरसती हैं और ये बिना दिल्ली की मुख्यमंत्री की जानकारी के हुआ हो ? लेकिन इसके खिलाफ जब जनाक्रोश भड़कता है तो माननीय मुख्यमंत्री साहिबा इसके लिए दिल्ली पुलिस कमिश्नर को दोषी ठहराती हैं। जाहिर है शीला दीक्षित जानती हैं कि ये जनाक्रोश कहीं 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में उनकी कुर्सी न हिला दे शायद इसलिए पहले शीला दीक्षित के कांग्रेस सांसद बेटे संदीप दीक्षित दिल्ली पुलिस कमिश्नर को हटाने की बात कहते हैं और इसके बाद दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित उनके सुर में सुर मिलाती हैं...लेकिन षीला जी ये भूल गई कि ये पब्लिक है...ये सब जानती है। उम्मीद करते हैं ये आंदोलन अपने अंजाम तक पहुंचे...पीड़ित को इंसाफ मिले और दोषियों को मौत की सजा।

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