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शनिवार, 5 जनवरी 2013

बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा..!


करूणानिधी के 18 सांसदों वाली द्रविड़ मुनेत्र कषगम पार्टी (द्रमुक) भले ही केन्द्र की यूपीए सरकार की बैसाखी बनी हुई हो लेकिन द्रमुक के उत्तराधिकार को लेकर करूणानिधी के दो बेटों की लड़ाई से द्रमुक पर ही संकट खड़ा हो गया है। द्रमुक के सर्वेसर्वा करूणानिधि ने भले ही अपने छोटे बेटे स्टालिन को पार्टी की बागडोर देने के संकेत दिए हों लेकिन करूणानिधि के बड़े बेटे एम. के. आलागिरी को अपने पिता का ये फैसला रास नहीं आ रहा है और अलागिरी ने पिता के इस फैसले के खिलाफ ताल ठोक दी है। अलागिरी ने ये कह दिया है कि पार्टी कोई मठ नहीं है जो इसके उत्तराधिकारी की नियुक्ति की जाए।
वैसे देखा जाए तो राजनीति में परिवारवाद नई बात नहीं है और हिंदुस्तान में ऐसे बड़े - बड़े उदाहरण मौजूद हैं जो ये साबित करते हैं कि राजनीति में प्रवेश करने का सबसे आसान रास्ता विरासत की सियासत ही है। देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस से बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है जहां पर परिवारवाद ही हावी है।
1991 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद लगा था कि अब ये परंपरा टूटेगी लेकिन सोनिया गांधी ने पार्टी को नेतृत्व प्रदान कर न सिर्फ कांग्रेस को उबारा बल्कि परिवारवाद की परंपरा को भी आगे बढ़ाया...इसे एक बार फिर से सोनिया गांधी के सुपुत्र राहुल गांधी आगे बढ़ा रहे हैं। कांग्रेस के ही कई बड़े नेताओं के सुपुत्र जो कम समय में नाम कमा चुके हैं उनका पारिवारिक इतिहास पर नजर डालें तो ये तस्वीर और साफ हो जाती है। फिर चाहे माधव राव सिंधिया के सुपुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया हो या फिर राजेश पायलट के बेटे सचिन पायलट ये सब परिवारवाद की ही उपज हैं। करूणानिधि के बेटे भी इसी की उपज हैं लेकिन एक ही परिवार में पार्टी की सत्ता को लेकर आपस में तलवारें खिंच जाना रोचक हैं।
तमिलनाडु में द्रमुक की लोकप्रियता ही शायद करूणानिधि के दोनों बेटों के बीच पैदा हो रही दरार की मुख्य वजह ही है क्योंकि वर्तमान में केन्द्रीय मंत्री एम. के. आलागिरी तब तक ही मंत्री हैं जब तक केन्द्र में यूपीए की सरकार है, उसके बाद अलागिरी को पूछने वाला भी कोई नहीं होगा। अलागिरी को फिर से सत्ता का स्वाद भविष्य में तमिलनाडु में ही नसीब हो सकता है, वो भी तब जब द्रमुक तमिलनाडु में सत्ता पर काबिज हो और वो द्रमुक के सर्वमान्य नेता हो...लेकिन अलागिरी के पिता और फिलहाल द्रमुक के सर्वेसर्वा करूणानिधि का प्यार बड़े बेटे अलागिरी की बजाए छोटे बेटे स्टालिन पर ज्यादा छलक रहा है जो अलागिरी को रास नहीं आ रहा है।
जाहिर है अलागिरी की मंशा है कि करूणानिधि के बाद द्रमुक के सर्वेसर्वा वे खुद हों न कि स्टालिन। अलागिरी को द्रमुक के सर्वेसर्वा बनने के बाद भविष्य में कभी द्रमुक के सत्ता में आने के बाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री की कुर्सी भी नजर आ रही होगी शायद इसलिए ही पिता के फैसले पर वे कहते हैं कि पार्टी कोई मठ नहीं है। खैर द्रमुक में पैदा हो रही दरार की असली वजह सब जानते ही हैं लेकिन बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या सिर्फ राजनीतिक दल के सर्वेसर्वा की कुर्सी पर बैठकर ही जनता की सेवा या गरीबों का उत्थान किया जा सकता है..? क्योंकि करूणानिधी कहते हैं कि उनके बाद उनका छोटा बेटा द्रमुक की कुर्सी संभालने के बाद इस काम को करेगा यानि कि बिना कुर्सी के करूणानिधि के मुताबिक जनता की सेवा नहीं होती..!
करूणानिधि की इसी सोच को ही अब उनके बेटे आगे बढ़ा रहे हैं और जनता की सेवा के लिए पार्टी का सर्वेसर्वा बनने के लिए दोनों के बीच उजागर हुए मतभेद पूरी कहानी बयां कर रहे हैं कि उनके दिल में जनता की सेवा करने का जज्बा कितना गहरा है और कुर्सी को पाने की लालसा कितनी जोर मार रही है। जब तमिलनाडु में सत्ता में न रहते हुए द्रमुक के सर्वेसर्वा करूणानिधि के बेटों में पार्टी के उत्तराधिकार को लेकर तलवारें खिंच गई हैं तो अगर कभी भविष्य में द्रमुक सत्ता में आ गई तो फिर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए दोनों भाइयों में कितनी जूतम पैजार होगी इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

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गुरुवार, 3 जनवरी 2013

सिर्फ 20 रूपए में बेच दिया ईमान !


बात 29 दिसंबर 2011 की है...देहरादून से रात को काठगोदाम जाने वाली काठगोदाम-देहरादून एक्सप्रेस 12 घंटे लेट थी तो ट्रेन सुबह करीब साढ़े 11 बजे देहारादून से काठगोदाम के लिए चली। बाहर कोहरा था तो ट्रेन धीरे धीरे रूकते रुकाते अपने गंतव्य की ओर बढ़ रही थी। ट्रेन में पेंट्री नहीं थी ऐसे में जहां जहां ट्रेन रुकती वहां वहां यात्रियों को चाय-नाश्ता बेचने के लिए कुछ लोग ट्रेन में चढ़ जाते और ट्रेन चलते ही उतर रहे थे। मैं ट्रेन के बी-1 कोच में अपने भांजे के साथ यात्रा कर रहा था।
ट्रेन रामपुर स्टेशन से बस चली ही थी कि हाथ में गर्म चाय की केतली लिए एक युवक जिसकी उम्र करीब 30 वर्ष रही होगी हमारी बोगी से बड़ी तेजी से बाहर निकल रहा था उसके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था। युवक के पीछे एक पुलिसकर्मी जिसकी उम्र भी करीब 30 वर्ष के आस पास होगी भी तेजी से हमारी बोगी से बाहर निकला। चाय वाले को देखकर चाय लेने मैं भी बोगी से बाहर निकला था तो वहां का नजारा कुछ इस तरह था। ट्रेन के दरवाजे के पास पुलिसकर्मी चाय वाले युवक को ट्रेन में चढ़ने पर डपट रहा था और युवक से पूछताछ कर रहा था और उसने उसका परिचय पत्र मांगा। मैंने इसे नजरअंदाज करते हुए युवक से दो ग्लास चाय की मांगी तो वो युवक पुलिसकर्मी के सामने चाय देने से घबराने लगा। हालांकि उसने मुझे दो ग्लास चाय दे दी लेकिन इतने में वो पुलिसकर्मी उस युवक का परिचय पत्र लेकर युवक से ये कहते हुए आगे निकल गया कि तू मुझे आगे आकर मिल। कुल मिलाकर पुलिसकर्मी को चाय वाले युवक से पैसे ऐंठने का बहाना मिल गया था।
खैर मैं चाय लेकर अपनी सीट पर पहुंच गया। करीब 5 मिनट बाद वो चाय वाला युवक वापस हमारी बोगी में आया और चाय बेचने लगा इस बार उसके चेहरे पर कोई डर नहीं था और वो बड़े इत्मीनान से यात्रियों को चाय देने लगा। इस 5 मिनट में चाय वाले युवक के साथ क्या हुआ होगा ये सारा माजरा मेरे समझ में आ गया था लेकिन फिर भी मैं युवक से पूछे बिना नहीं रह पाया। मैंने युवक को आवाज देकर बुलाया और उससे पूछा कि वह पुलिसकर्मी उससे क्या बोल रहा था तो वो पुलिसकर्मी को गाली देते हुए बोला कि साहब- ये तो हमारे साथ रोज ट्रेन में होता है हम दो पैसे कमाने के लिए ट्रेन में चाय बेचने के लिए आते हैं लेकिन मौका मिलते ही ये पुलिस वाले हमें परेशान करते हैं और पैसे वसूलते हैं। आज भी वही हुआ और वो हमसे पैसे मांगने लगा...हम भी क्या करते पैसे देने पड़े। वो बोला कि पुलिसकर्मी को पैसे दिए बगैर चाय बेचेंगे तो पुलिस वाला कहता है कि ये गलत है लेकिन उसको पैसे दे दिए तो सब सही हो जाता है। मैंने पूछा कि ये कितने पैसे मांगते हैं तो उसने जो बोला वो चौंकाने वाला था। वो बोला साहब- ये लोग तो पांच सौ रूपए तक मांगते हैं लेकिन 20-30 रूपए में भी मान जाते हैं। इतनी देर में किसी ने चाय के लिए आवाज दी तो वो चाय देने चला गया।
मैं काफी देर तक बैठकर इस बारे में सोचता रहा वाकई में पुलिस वालों के लिए जो कहा जाता है कि ये सिर्फ कमाई करना जानते हैं और कुछ नहीं(सभी पुलिसकर्मी नहीं)। ट्रेन में हैं तो ये यात्रियों की सुरक्षा के लिए तैनात लेकिन इनकी नजर ऐसे ही चाय वालों पर या लोगों पर रहती है जिनसे मौका मिलते ही ये वसूली शुरु कर देते हैं। मैंने एक हिसाब लगाया कि देहरादून से काठगोदाम तक 336 किलोमीटर के सफर में ट्रेन करीब डेढ़ दर्जन स्टेशनों पर रूकती है। यानि की अगर इस दौरान एक पुलिसकर्मी के हाथ ऐसे 20 चाय वाले भी लग गए और हर चाय वाले से वो कम से कम 30 रूपए भी लेता है तो पुलिसकर्मी करीब 600 रूपए कमा लेता है यानि कि 18 हजार रूपए महीना। हर माह सरकार जो तन्खवाह देगी वो अलग। जब एक पुलिसकर्मी को सैलरी के अलावा करीब 15 से 20 हजार रूपए महीने इस तरह कमाई हो रही हो तो वो भला क्यों ये काम नहीं करेगा(सभी पुलिसकर्मी शामिल नहीं)। अब ट्रेन में यात्रियों का सामान चोरी हो रहा है तो हो जाए...लेकिन इन पुलिसकर्मियों को इससे कोई सरोकार नहीं। खैर ये तो एक छोटा सी घटना थी जो मेरे सामने घटी...इस तरह की हजारों वाक्ये रोज होते हैं जो शायद आपने भी अनुभव किए होंगे।
अंदाजा लगाया जा सकता है कि पुलिसकर्मी कितनी ईमानदारी से अपनी ड्यूटी को अंजाम देते हैं...माना कि चाय वाला भी गलत तरीके से चाय बेच रहा था लेकिन अगर पुलिसकर्मी उसके खिलाफ कार्रवाई करें तो मजाल है कि आगे से कोई चाय वाला इस चरह बगैर लायसेंस के ट्रेन में चाय बेचने के लिए घुसे लेकिन अगर चाय वाले कि हर बार इतनी हिम्मत होती है तो वो इन पुलिसकर्मियों की वजह से ही क्योंकि वे जानते हैं कि 20-30 रूपए में ये पुलिसवाले मान जाएंगे और वे आसानी से बिना रोकटोक ट्रेन में चाय बेच पाएंगे...लेकिन अफसोस हमारे देश में ऐसा होता नहीं है। यहां चोरी करने वाले को पकड़े जाने का डर नहीं क्योंकि उसे मालूम है कि पहले तो पकड़ने वाला ही उसे चंद पैसों पर उसे छोड़ देगा। ये पुलिसकर्मी अगर इमानदारी से अपनी ड्यूटी करें तो क्या नहीं कम होंगे हमारे देश में अपराध..?  जाहिर है पूरी तरह अपराधों पर अंकुश नहीं भी लग पाएगा तो कुछ हद तक अपराध और अपराधियों पर लगाम तो कसेगी लेकिन हमारे देश में जहां नीचे से ऊपर तक सब भ्रष्टाचार में लिप्त हैं वहां ये मुमकिन नहीं लगता।

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बुधवार, 2 जनवरी 2013

शर्म करो नेता जी..!


महिलाओं के हितों की बात हो या फिर उनके साथ घटे अपराध पर उन्हें इंसाफ दिलाने की बात हिंदुस्तान में नेता एक ऐसी कौम हैं, जिन्हें ये सब शायद रास नहीं आता(इसमें सभी नेता शामिल नहीं)। शायद यही वजह है कि जब जब इस से जुड़े मुद्दे उठते हैं...महिलाओं के हक में आवाज उठती है तब - तब महिलाओं को घेरते हुए...उन पर सवाल खड़े करते हुए...उन पर ऊंगली उठाते हुए नेताओं के बेतुके बयान देश के किसी न किसी कोने से जरूर सुनाई दे जाते हैं। जो न सिर्फ पूरे समाज तो आहत करते हैं बल्कि महिलाओं के लिए शर्मनाक स्थिति पैदा कर देते हैं।
दिल्ली गैंगरेप मामले पर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के सांसद बेटे अभिजीत मुखर्जी (हर मुद्दे पर कैंडल मार्च निकालने का फैशन चल पड़ा है, लड़कियां दिन में सज-धज कर कैंडल मार्च निकालती हैं और रात में डिस्को जाती हैं।) का बयान हो या फिर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर दिए गए सीपीएम नेता अनीसुर रहमान (आप(ममता बनर्जी) रेप के लिए कितना चार्ज लेंगी?”) का बयान। ये सिर्फ बयान नहीं है बल्कि ये नेताओं की संकुचित सोच को उजागर करते हैं...और जाहिर करते हैं कि महिलाओं को लेकर नेताओं की सोच कितनी विकसित है।
ये बयान ये बताने के लिए काफी हैं कि महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर नेता संवेदनशील नहीं हैं, और उनको रास नहीं आता अगर कोई महिला किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ रही है या फिर अपने हक के लिए आवाज उठा रही है। शायद ये नेता सोचते हैं कि महिलाओं की जगह उनकी जूती की नोंक के नीचे है...हालांकि ये बात सभी नेताओं पर लागू नहीं की जा सकती लेकिन देश की संसद या राज्यों की विधानसभा में बैठने वाला एक भी नेता अगर ऐसी सोच वाला है तो ये शर्म की बात है...क्योंकि बात सिर्फ अभिजीत मुखर्जी और अनीसुर रहमान की नहीं है...देश के गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे(अभिनेत्री और राज्यसभा सांसद जया बच्चन से- मैडम मैडम जरा ध्यान से सुनिए, यह (असम मुद्दा) कोई फिल्मी इशू नहीं है), एनडीए संयोजक शरद यादव(महिला आरक्षण के मुद्दे पर- इस विधेयक के जरिये आप परकटी महिलाओं को सदन में लाना चाहते हैं..?) और मुलायम सिंह(महिला आरक्षण बिल पर- यह बिल पास होने से सदन में ऐसी महिलाएं भर जाएंगी जिन्हें देखकर लोग सीटियां बजाएंगे) सरीखे नेताओं की ऐसी सोच सोचने पर मजबूर करती है।
वहीं दूसरी तरफ नेताओं के ऐसे बयानों को जनता के सामने रखने वाले मीडिया पर ही कुछ लोग सवाल खड़े करते हैं कि सिर्फ टीआरपी बटोरने के लिए मीडिया ऐसे बयानों को तोड़ मरोड़ कर पेश करता है, लेकिन जब मीडिया नेताओं की वास्तविक सोच(जिससे वो बाद में मुकर जाते हैं) को जनता के सामने पेश करता है तो उसमें सभी पक्षों को भी तो सामने रखता है, जिसमें ऐसे बयान देने वाले नेताओं को भी शामिल किया जाता है ऐसे में इसे ये कैसे मान लिया जाए कि मीडिया सिर्फ अपनी टीआरपी के लिए इन बयानों को तोड़ मरोड़कर पेश करता है। आखिर खबरों के साथ ही इन नेताओं की असली सोच को उन लोगों के सामने उजागर करना भी तो मीडिया का काम है, जिन नेताओं को ये लोग चुनाव में वोट देकर विधानसभा या संसद तक पहुंचाते हैं।
खास बात ये है कि बेतुके बयान देने के बाद इनमें से कुछ नेता तो अपनी बात को जायज ठहराते नजर आते हैं, तो कुछ सफेद झूठ बोलते हुए अपनी बयान से साफ पलट जाते हैं और उल्टा मीडिया पर ही बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश करने का आरोप लगाते हैं। महिलाओं के हितों के मुद्दों पर नेताओं की ऐसे बयान न सिर्फ उनकी संकुचित सोच को बयां करते है बल्कि ये सवाल भी खडे करते हैं कि क्या वाकई में देश की आधी आबादी(महिलाएं) जिन नेताओं को ये सोच कर चुन कर संसद/विधानसभा में पहुंचाती हैं, वे नेता उनके हक के लिए संसद में विधानसभा में कैसे आवाज उठाएंगे और क्यों आवाज उठाएंगे..? क्योंकि ये नेता तो महिला हित से जुड़े मुद्दे पर या महिला अपराध पर इंसाफ के लिए उठने वाली आवाज पर ही अपने बेतुके बयान से सवालिया निशान लगा देते हैं। सब से बड़ी बात तो ये है कि इनमें से कई नेता महिला अपराध (बलात्कार, महिला उत्पीड़न आदि) में शामिल होते हैं...ऐसे में कैसे महिलाओं की स्थिति में सुधार की उम्मीद इन नेताओं के भरोसे की जा सकती है...जाहिर है ऐसे नेता न तो संसद में बैठने के काबिल हैं और न ही विधानसभा में और ये काम अगर देश की हर महिला ठान ले तो चुनाव में ऐसे नेताओँ को सबक सिखा कर आसानी से कर सकती है।

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सोमवार, 31 दिसंबर 2012

वो 2012 की बात थी...


लो 2013 भी आ गया...वक्त है नई शुरुआत की...नई ऊर्जा, नए जोश और नई उमंग से आगे बढ़ने का। बीते हुए कल से कुछ सीख कर आगे बढ़ने का। उन बातों को...झगड़ों को आपसी मनमुटाव को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने का जो जाने आनजाने बीते साल में कुछ कड़वाहट घोल गए। 2011 के बाद 2012 का सफर भी कुछ इसी अंदाज में करने की मैंने भी पूरी कोशिश की थी लेकिन कहते हैं न कि सब कुछ आपके मन मुताबिक हो ऐसा संभव नहीं है। 2011 में नोएडा में नौकरी करने के दौरान देहरादून में नौकरी का बेहतर अवसर मिला। बेहतर अवसर जान 17 जनवरी 2012 को मैंने देहरादून में नेटवर्क 10 समाचार चैनल के साथ एक नई शुरुआत की। 2008 से अपने गृह प्रदेश उत्तराखंड से दूर मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में उसके बाद ग्वालियर और ग्वालियर से दिल्ली तक का सफर तय किया। इस दौरान नए प्रदेश में नए शहर में नए लोगों के बीच काम करने का अनुभव बेमिसाल था। बहुत कुछ जानने- सीखने को मिला और कई नए दोस्त भी बने। 2012 में वापस उत्तराखंड में काम करने का अवसर मिला तो काफी जद्दोजहद के बाद देहरादून में नेटवर्क 10 समाचार चैनल के साथ जुड़ने का फैसला लिया। नए संस्थान में नए लोगों के बीच सामंजस्य बैठाने में समय लगता है लेकिन इसमें मुझे बहुत ज्यादा दिक्कत नहीं हुई। नया चैनल था तो सभी साथियों में जोश था अपने संस्थान को नंबर वन बनाने की ललक थी। काफी हद तक उत्तराखंड में लोगों के दिलों में जगह बनाने में हम सफल भी हो गए। उत्तराखंड का 24 घंटे का एकमात्र समाचार चैनल होने के कारण भी हमको लोगों के बीच अपनी पहचान बनाने में ज्यादा वक्त नहीं लगा और कम समय में हमने एक मुकाम को हासिल किया। दर्शकों का हमें बेपनाह प्यार और साथ भी मिला जिसकी गवाह क्षेत्रीय और राष्ट्रीय मुद्दों पर हमारे विशेष कार्यक्रम में दर्शकों के कभी न बंद होने वाली फोन कॉल्स थी। बस जरूरत थी तो दर्शकों के इस प्यार और विश्वास को बरकरार रखने की जो किसी भी संस्थान के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होता। हम हर तरह की चुनौती का सामना की पूरी कोशिश कर रहे थे लेकिन संस्थान में इस दौरान कई बार हुई प्रबंधकीय उठापठक इस कोशिश को कमजोर कर देती थी। लेकिन हल्के से ठहराव के आगे भविष्य में बेहतरी की उम्मीद लिए सभी कर्मचारी एक बार फिर से अपनी कोशिश को साकार रूप देने में जी जान से जुट जाते थे। इस बीच संस्थान को कई बार खराब आर्थिक हालात का भी सामना करना पड़ा जिसका खामियाजा कर्मचारियों को भी कई बार भुगतना पड़ा लेकिन पहले दिन से संस्थान के साथ जुड़े सभी कर्मचारियों का संस्थान से भावनात्मक लगाव ही था कि इस सब के बाद भी कर्मचारियों का जोश ठंडा नहीं हुआ। स्थितियों में सुधार की उम्मीद के साथ कई लोग संस्थान के साथ जुड़े रहे तो कई लोगों ने इस बीच संस्थान को बॉय बॉय भी कर दिया। 2012 गुजर गया और 2013 का आगमन हो गया लेकिन बीते एक साल में संस्थान ने अपने बहुत ही कम समय में न सिर्फ अपने सर्वोच्च शिखर को छुआ बल्कि कई बार ऐसी स्थितियां आई की लगने लगा कि इसका जीवन सिर्फ 365 दिनों का ही है। बहरहाल 2013 के रूप में नया साल सामने है और नए साल में नई सोच, नई आशा, नई उम्मीद, नए सपने, नए जज्बे के साथ एक नई ऊर्जावान शुरूआत करने के लिए एक बार फिर से कमर कस ली है। इसी उम्मीद के साथ कि बीते साल की तरह मुश्किल दौर भी बीते दिनों की बात हो जाएगी और नया साल 2013 सफलता के नए आयाम गढ़ेगा आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

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शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

क्या लड़की होना उसका कसूर था ?


13 दिनों तक जीवन और मौत से संघर्ष करने के बाद आखिरकार वो चली गई...उसने तो अभी अपने जीवन की ठीक से शुरुआत भी नहीं की थी। उसके सपनों ने तो अभी ठीक तरह से आकार भी नहीं लिया था...लेकिन कुछ दरिंदों के नापाक ईरादों और शैतानी दिमाग ने उसकी जिंदगी को नर्क बना दिया। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी वो फिर भी जीना चाहती थी...उसके जज्बे और ईच्छाशक्ति को देखकर उसका ईलाज करने वाले डॉक्टर भी दंग थे। उसने जिंदगी की जंग जीतने कीमौत को मात देने की पुरजोर कोशिश भी की लेकिन दरिंदों के दिए जख्म आखिरकार जीत गए और वो हमेशा के लिए खामोश हो गई। एक बार फिर जिंदगी हार गई लेकिन जाते जाते कई ऐसे सवाल खड़े कर गई जिनका जवाब शायद भगवान के पास भी नहीं होगा।
कुछ लोगों के ईरादे नापाक थे लेकिन उसका क्या कसूर था ? क्या लड़की के रूप में जन्म लेना उसका कसूर था ? क्या अंधेरा घिरने से पहले घर न लौटना उसका कसूर था ? क्या उसकी ईज्जत को तार-तार करने वालों का विरोध करना उसका कसूर था ?
इस घटना के बाद राजपाथ पर लोगों का गुस्सा खूब उबाल खाया...एक पोस्टर पर लिखी पंक्तियां मुझे याद आता हैं...नजर तेरी बुरी और पर्दा मैं करूं। पहले सवाल का जवाब तो मुझे इन पंक्तियों में ही नजर आता है- वाकई में नजर कुछ दरिंदों की खराब है...नीयत कुछ लोगों की शैतानी है...इरादे कुछ लोगों के नापाक हैं...लेकिन पर्दा लड़कियां करें। क्यों न इन खराब नजर वालों को...शैतानी नीयत वालों को नापाक इरादों वालों को ही सजा मिले...लेकिन इसे देश का दुर्भाग्य कहें या ऐसे लोगों की अच्छी किस्मत...हमारे देश में कई बार हैवानियत का खेल खेलने वालों को सबूत होने के बाद भी कई बार सजा नहीं मिलती या मिलती भी है तो वो अपनी आधी जिंदगी खुली हवा में गुजार चुके होते हैं। कड़ी सजा मिलती भी है तो इससे बचने का ब्रह्मास्त्र(राष्ट्रपति के पास दया याचिका) उनके पास पहले से ही मौजूद है। हमारी पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में रेप के 4 आरोपियों की मौत की सजा माफ कर पहले ही उदाहरण पेश कर चुकी हैं कि ये ब्रह्मास्त्र खाली नहीं जाता।
जहां तक दूसरे सवाल की बात है कि क्या लड़की के रूप में जन्म लेना उसका कसूर था ?
इसका जवाब एक दूसरे पोस्टर में लिखी कुछ पंक्तियां में दिखाई देता है। पंक्तियां कुछ इस प्रकार है- अगले जनम मोहे बिटिया न कीजौ। ये पंक्तियां ऐसी लड़कियों का दर्द बयां करती हैं जो कहीं न कहीं...किसी न किसी रूप में ऐसी ही घटनाओं का शिकार हुई हैं या फिर उत्पीड़न का शिकार हैं। लड़की के रूप में पैदा होने के बाद ऐसी पंक्तियां लिखी तख्ती पकड़े कोई लड़की आवाज़ बुलंद करे तो उसका दर्द समझा जा सकता है।
अंधेरा घिरने से पहले लड़कियां घर नहीं पहुंचती तो परिजनों की बेचैनी बढ़ जाती है...मन में बुरे ख्याल आने लगते हैं...क्या ये बताने के लिए काफी नहीं कि लड़कियां हमारे देश में आज भी सुरक्षित नहीं हैं..?
कुछ दरिंदे किसी लड़की के साथ जबरदस्ती करते हैं और वो अपनी ईज्जत बचाने के लिए इसका विरोध करती है तो दरिंदे पूरी हैवानियत पर उतर आते हैं और न सिर्फ दिल्ली गैंगरेप केस की तरह उसकी बुरी तरह पिटाई कर उसे चलती बस से फेंक देते हैं बल्कि उसके साथ ऐसा कृत्य करते हैं कि सुनने वाले की तक रूह कांप उठे। क्या ये हैवानियत ये बताने के लिए काफी नहीं कि महिलाओं के प्रति उनके मन में क्या भाव हैं..? उनकी सोच कैसी है..? वो महिलाओं को सिर्फ मनोरंजन का साधन समझते हैं और विरोध करने पर हैवानियत पर उतर आते हैं। यानि कि गलत कार्य का विरोध करने पर भी इसे महिलाओं की जुर्रत समझा जाता है और उनकी पिटाई की जाती है। क्या ऐसे लोगों समाज में रहने के हकदार हैं..? क्या गारंटी है कि ऐसे लोग दोबारा किसी के घर की ईज्जत को तार-तार नहीं करेंगे..? क्या गारंटी है कि ऐसे लोग फिर दिल्ली गैंगरेप जैसे घटना तो नहीं दोहराएंगे..? जाहिर है जब तक हमारे समाज में ऐसे लोग जिंदा हैं...तब तक समाज में महिलाएं सुरक्षित कतई नहीं है। जब तक ऐसे लोगों को सरेआम फांसी देकर मौत की नींद नहीं सुलाया जाएगा तब तक ऐसी सोच के...ऐसी मानसिकता के इनके जैसे दूसरे लोग ऐसा अपराध करने से नहीं हिचकिचाएंगे। उम्मीद करते हैं हमारी सरकार ऐसे कड़े फैसले लेने के लिए दिल्ली गैंगरेप जैसे किसी दूसरी घटना का इंतजार नहीं करेगी।

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युवा नेताओं की क्या बिसात..!


दिल्ली गैंगरेप के खिलाफ बीते दिनों राजपथ पर देश का आक्रोश आजादी के बाद का शायद अपने आप में सबसे बड़ा उग्र प्रदर्शन था...लेकिन सही नेतृत्व न होने के चलते ये आंदोलन कहीं न कहीं दिशाहीन होता दिखाई दिया और एक बड़े आंदलन की गर्भावस्था में ही हत्या हो गई। असल मुद्दा कहीं खो गया और इसकी जगह बरसाती मेंढ़कों की तरह उपजे ऐसे मुद्दों ने ले ली जिन पर बहस से कोई सार्थक हल निकलने की कोई उम्मीद नहीं है। जिस वक्त रायसीना को घेरे हजारों युवाओं की टोली पीड़ित के लिए इंसाफ और महिलाओं की सुरक्ष के लिए आवाज बुलंद कर रही थी उस वक्त खुद को युवाओं की पार्टी कहने वाली...युवाओं को नेतृत्व देने की बातें करने वाली कांग्रेस के युवा नेताओं को राजधानी के दिल राजपथ में युवाओं का ये आक्रोश नजर नहीं आया। ऐसे वक्त में देश के राष्ट्रपति ने तक रायसीना हिल्स से बाहर निकलने का साहस नहीं दिखाया तो कांग्रेस के युवा नेताओं की क्या बिसात..! देश के गृहमंत्री को जब ये युवाओं की टोली माओवादी नजर आने लगे तो फिर कांग्रेस के युवा नेताओं की क्या बिसात..! देश के प्रधानमंत्री जब ठीक है बोलने लगे तो फिर कांग्रेस के युवा नेताओं की क्या बिसात..! इन युवा नेताओं के नेता कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी जब राजपथ पहुंचने का साहस नहीं जुटा सके तो कांग्रेस के इन युवा नेताओं की क्या बिसात..! राजपथ देश की युवा शक्ति के गुस्से से दमक रहा था लेकिन कांग्रेस के किसी युवा नेता को इसका सामना करने की शायद हिम्मत नहीं हुई। एक बेहद दुखद घटना से ही उपजा सही लेकिन ये एक मौका था राजपथ पर आक्रोश से भरी युवा शक्ति को एक मजबूत नेतृत्व प्रदान करने का...पार्टी लाइन से ऊपर उठकर इंसाफ की लड़ाई को उसके मुकाम तक ले जाने का लेकिन शायद कांग्रेस के युवा नेताओं में भी दूसरे कांग्रेसी नेताओं की तरह 10 जनपथ की अवमानना करने का साहस नहीं था। राजपथ पर उमड़ा युवाओं का जनसैलाब इनका इंतजार कर रहा था लेकिन ये शायद दिल्ली की सर्दी में गर्म कमरों का मोह नहीं छोड़ पाए या यूं कहें कि 10 जनपथ के खिलाफ आवाज उठाने की इनमें हिम्मत नहीं थी। लाल बत्ती और सरकारी बंगला पा चुके कुछ युवा नेताओं में शायद लाल बत्ती लगी सरकारी गाड़ी और सरकारी बंगला छोड़ने का साहस नहीं था तो भविष्य में लाल बत्ती की लालसा पाले बैठे कुछ युवा नेताओं की लालसा शायद कुछ ज्यादा ही जोर मार रही थी। ये खुद को युवाओं के नेता कहते हैं और युवा शक्ति के दम पर देश की सूरत बदलने की बात करते हैं लेकिन उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होने का साहस शायद इनमें नहीं हैं। ये सच्चाई है इन युवा नेताओं की जो राजनीति की सीढ़ी तो युवाओं के कंधे पर पैर रखकर चढ़ते हैं या फिर अधिकतर को ये विरासत में मिलती है लेकिन राजनीति के गलियारों में प्रवेश करने के बाद इनका खून भी शायद दूसरे नेताओं की तरह पानी हो जाता है। बात सिर्फ केन्द्र की सत्ता में बैठी कांग्रेस के युवा नेताओं की नहीं है बल्कि इस मुद्दे पर विपक्ष में बैठी देश की दूसरी बड़ी पार्टी भाजपा के युवा नेताओं की चुप्पी भी दोनों ही दलों को एक जमात में खड़ा करती है।  


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गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

बेटा बोला लेकिन राष्ट्रपति “पिता” खामोश !


दिल्ली गैंगरेप मामले के खिलाफ देशभर में गुस्से की आग भड़की और ये गुस्सा रायसीना हिल्स तक भी पहुंचा। दो दिनों तक रायसीना हिल्स पर गैंगरेप के आरोपियों को फांसी की मांग को लेकर प्रदर्शनकारियों ने दिल्ली सरकार के साथ ही पुलिस की नींद उड़ा दी लेकिन रायसीना हिल्स से राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी बाहर नहीं निकले और न ही उन्होंने इस घटना पर दुख जताना जरूरी समझा। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी न बोले न सही लेकिन पश्चिम बंगाल की जंगीपुर सीट से उनके सांसद बेटे अभिजीत मुखर्जी ने पिता की इस कमी को पूरी करने में देर नहीं की। कांग्रेस सांसद अभिजीत कहते हैं कि महिलाएं सज-धज कर प्रदर्शन करने आती हैं और कैंडिल मार्च निकालने के बाद डिस्को में जाती है। मुखर्जी साहब यहीं नहीं रूक वे कहते हैं कि कैंडिल मार्च निकालना फैशन हो गया है। बयान पर बवाल मचने के बाद भले ही मुखर्जी ने अपने शब्द वापस ले लिए हों लेकिन फिर भी वे ये कहने से नहीं चूके कि उन्होंने कुछ गलत कहा था। पिता की सीट पर बमुश्किल 2500 वोटों से उपचुनाव जीतकर संसद में पहुंचने वाले अभिजीत मुखर्जी को लगता है सुर्खियों में आने की कुछ ज्यादा ही जल्दी है। शायद यही वजह है कि एक ऐसे मुद्दे पर वे अपना मुंह खोलते हैं जिसको लेकर पहले ही जमकर बवाल मच चुका है। एक संवेदनशील मुद्दे पर राष्ट्रपति मुंह नहीं खोलते लेकिन राष्ट्रपति का सांसद बेटा अगर ऐसा बोलता है तो वाकई में इससे बड़ा दुर्भाग्य इस देश का और क्या हो सकता है। होना तो ये चाहिए था कि राष्ट्रपति को खुद रायसीना हिल्स में बाहर निकलकर लोगों से शांति की अपील करते हुए मामले में दखल देना चाहिए था और सरकार को इस संवेदनशील मुद्दे पर जल्द से जल्द आवश्यक कदम उठाने के निर्देश देने चाहिए थे लेकिन ऐसा नहीं हुआ और रही सही कसर राष्ट्रपति के सांसद बेटे ने पूरी कर दी। आभिजीत मुखर्जी ने तो प्रदर्शनकारियों पर ही सवाल खड़ा कर दिया कि ये प्रदर्शन तो सिर्फ एक दिखावा था। मुखर्जी साहब कभी एसी कमरों से बाहर निकल कर दिल्ली की सर्दी में एक रात छोड़िए एक घंटा बिताकर दिखा दीजिए आंदोलन और फैशन का फर्क आपको शायद समझ में आ जाएगा..! मुखर्जी साहब जिसे आप फैशन बोल रहे हैं ये न सिर्फ एक पीड़ित को इंसाफ दिलाने की लड़ाई है बल्कि महिलाओं के लिए सुरक्षित वातावरण तैयार करने की ओर महिलाओं की तरफ से बढ़ाया हुआ कदम था लेकिन अफसोस है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए शुरू हुई इस लड़ाई को न तो आपके पिताश्री समझ पाए जबकि वे तो इन प्रदर्शनकारियों से चंद कदम दूर थे और न ही आप। अरे साहब किसी पीड़ित का दर्द नहीं समझ सकते न सही कम से कम उनके जख्मों पर नमक तो मत छिड़किए। आप पीड़ित का दर्द कम नहीं कर सकते तो उसके जख्मों को कुरदने का भी आपको कोई अधिकार नहीं है। कटाक्ष करने के बाद आपने भले ही माफी मांग ली हो लेकिन जुबान से निकला हुई तीर वापस तो नहीं होता न...बोलने से पहले सोच तो लिया करो महाराज कि क्या बोलने जा रहे हैं...अपना न सही अपने पिताजी के पद और गरिमा का तो कम से कम ख्याल रखिए। आपके पिताजी ने तो चुप रहना ही बेहतर समझा लेकिन आपने तो पिताजी की सारी मेहनत पर पानी फेर दिया।

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बुधवार, 26 दिसंबर 2012

एक कुली ईमानदार है लेकिन प्रधानमंत्री नहीं !


ये उस देश की कहानी है...जो बताती है कि उस देश में रेलवे स्टेशन में यात्रियों का सामान उठाकर दो वक्त की रोजी का जुगाड़ करने वाला एक कुली तो ईमानदार है लेकिन देश का प्रधानमंत्री ईमानदार नहीं है..! सुनने में ये अजीब जरूर लग रहा होगा लेकिन ये सौ फीसदी सच है और दुर्भाग्य से ये कहानी हमारे हिंदुस्तान की है। इस बात को कहने के पीछे एक बड़ा वाक्या है जो मेरे साथ घटित हुआ। बात ज्यादा पुरानी नहीं है- दिल्ली के पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से मुझे काठगोदाम के लिए रवाना होना था। आमतौर पर स्टेशन पर मैं कुली की सेवाएं नहीं लेता हूं...लेकिन भाई की शादी के लिए घर लौट रहा था...ऐसे में मेरे पास कुछ ज्यादा ही सामान था। ऐसे में मैंने एक कुली को आवाज दी। कुली मेरा सामान लेकर आगे आगे चल रहा था। कुछ ही आगे बढ़ा था कि मुझे प्लेटफार्म पर इत्तेफाक से मेरा एक मित्र टकरा गया...मैंने कुछ देर रुककर उससे बातचीत करने लगा। लेकिन इस बीच कुली जो मेरा सामान लेकर आगे आगे चल रहा था उसे शायद मेरे रुकने का आभास नहीं हुआ और वह आगे निकल गया। करीब 5 मिनट के बाद मुझे ध्यान आया कि कुली के पास मेरा सामान है। मैंने चारों तरफ देखा मुझे कुली नहीं दिखाई दिया। मुझे लगा कि मेरी लापरवाही का फायदा कुली ने उठा लिया और वो मेरा सामान लेकर चंपत हो गया। मैंने कुली का बिल्ला नंबर भी नहीं देखा था...ऐसे में कुली को ढूंढ़ना मुझे मुश्किल लगने लगा। करीब 15 मनट हो गए लेकिन काफी तलाश करने के बाद भी मुझे कुली नहीं मिला। ट्रेन छूटने में अभी वक्त था ऐसे में मैं कुली को तलाश करते-करते जीआरपी थाने में कुली की शिकायत दर्ज कराने पहुंचा। वहां का नजारा न सिर्फ हैरान करने वाला था बल्कि मेरी चेहरे की सारी शिकन वहां पहुंचकर गायब हो गई। थाने के बाहर वो कुली मेरे सामान के साथ पहले ही मौजूद था। मुझे वहां देखते ही वो मुझ से बोला- साहब मैं सामान लेकर ट्रेन के पास पहुंच गया था...लेकिन पीछे देखा तो आप दिखाई नहीं दिए। फिर मैंने कुछ देर तक तलाशा और फिर में ये सोचकर यहां पर सामान लेकर आ गया कि आप यहां जरूर आएंगे। जिस कुली के लिए मैं पलभर पहले ही पता नहीं क्या क्या सोच रहा था। मन ही मन उस कुली के साथ सभी कुलियों को गालियां दे रहा था...उस कुली को अपने सामान के साथ सामने देखकर कुली के लिए मेरा नजरिया बदल गया। खैर कुली फिर मेरे साथ चल दिया और उसने मेरा सामान ट्रेन में रखा। मैंने कुली को शुक्रिया बोलते हुए उसे तय रूपए के अलावा कुछ पैसे अलग से देने चाहे लेकिन कुली ने तय पैसे से अधिक पैसे मेरे कई बार आग्रह करने के बाद भी नहीं लिए। मैंने एक बार फिर से कुली का शुक्रिया बोला और वो कुली अपने रास्ते चल दिया और कुछ ही मिनटों में ट्रेन भी चल दी। ये सिर्फ एक घटना थी जो हो सकता है कई और लोगों के साथ भी घटित हुई हो लेकिन ये एक घटना अपने आप में कई बातें कह गई। कुली चाहता तो वो सामान लेकर चंपत भी हो सकता था...हालांकि उसमें बहुत कीमती सामान कुछ नहीं था...लेकिन कुली को तो ये बात नहीं पता था कि सामान क्या है..? लेकिन कुली ने ऐसा कुछ नहीं किया। हमारे देश में जहां आज चारों तरफ सिर्फ भ्रष्टाचार की ही गूंज है और पैसे के लिए व्यक्ति कुछ भी कर गुजरने को तैयार है। भाई – भाई का दुश्मन है...बेटा-बाप का दुश्मन है। ऐसे में एक कुली जो दूसरों का बोझा ढो कर अपना और अपने परिवार का पेट पालता है उसकी ये ईमानदारी ऐसे लोगों के मुंह में एक करारा तमाचा है। मैं ये इसलिए भी कह रहा हैं क्योंकि जिस देश का प्रधानमंत्री ईमानदार न हो तो प्रधानमंत्री के सहयोगी मंत्रियों के साथ ही सरकार में शामिल दूसरे लोगों से क्या उम्मीद की जा सकती है। सरकार के मुखिया और सरकार में शामिल तमाम लोगों पर भ्रष्टाचार और घोटाले के आरोप इस बात को सही भी साबित करते हैं कि भारत का प्रधानमंत्री ईमानदार नहीं है लेकिन स्टेशन में सामान उठाने वाला कुली ईमानदार है। एक तरफ ये कुली और उसके जैसे तमाम लोग हैं...जिनका ईमान अभावों में जीवन बसर करने के बाद भी पैसों के आगे कभी नहीं डोलता और दूसरी तरफ हैं हमारे देश के नेता जो सरकारी दामाद की तरह सारी सुख सुविधाओं का उपभोग तो करते ही हैं साथ ही जनता के खून पसीने की कमाई को घोटालों और भ्रष्टाचार के रूप में उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। सलाम है ऐसे कुली की तरह ईमानदारी की मिसाल पेश करने वाले उन सभी लोगों को।  

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सोमवार, 24 दिसंबर 2012

दिल्ली गैंगरेप- “ठीक है” लोग इसे भी भूल जाएंगे !


दिल्ली गैंगरेप में मनमोहन सिंह की चुप्पी टूटती है...लेकिन जिस अंदाज में मनमोहन सिंह ने अपनी चुप्पी तोड़ी और उसके बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पता नही किससे पूछते हैं ठीक है इससे लगता है कि वे मौन ही बने रहते तो ज्यादा अच्छा था। क्या मनमोहन सिंह के सामने कैमरामैन के बाजू में खड़ी सोनिया गांधी से पूछते हैं..?  या फिर जिस किसी ने भी ये स्क्रिप्ट लिखी थी उससे..? जो भी हो लेकिन एक बार फिर इतने संवोदनशील मुद्दे पर प्रधानमंत्री का ऐसा रवैया अपने आप में कई सवाल खड़े करता है..!  एक तरफ मनमोहन सिंह गैंगरेप पर दुख जताते हुए खुद की भी तीन बेटियां होनी की दुहाई देते हैं और आखिर में कहते हैं ठीक है। प्रधानमंत्री जी आपने तो खुद को दी जाने वाले तमाम उपाधियों को आज की घटना के बाद सही ठहरा दिया। यूं ही लोग मनमोहन सिंह को रोबोट नहीं कहते..! यूं ही मनमोहन सिंह को लोग सोनिया के ईशारे पर फैसले लेना वाला नहीं कहते..! यूं ही सोनिया ने पीएम की कुर्सी छोड़कर कई दिग्गज कांग्रेस नेताओं को दरकिनार कर मनमोहन सिंह को दो-दो बार पीएम पद की कुर्सी नहीं सौंपी..! यूं ही बाबा रामदेव आपको मौनी बाबा नहीं कहते..!  यूं ही टाईम मैगजीन के कवर पेज पर दि अंडर अचीवरके टैग के साथ मनमोहन सिंह का फोटो नहीं छपता..! खैर इनके जवाब या तो मनमोहन सिंह खुद दे सकते हैं या फिर सोनिया गांधी। लेकिन दिल्ली गैंगरेप जैसे संवेदनशील मुद्दे पर देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की असंवेदनहीनता ने देशवासियों को एक बार फिर से निराश ही किया है। देश के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे इस मुद्दे को लेकर कितने संवेदनहीन है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वे इंडिया गेट पर गैंगरेप के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों की तुलना माओवादियों से कर देते हैं...वे कहते हैं कल माओवादी प्रदर्शन करें तो वे क्या माओवादियों से भी मिलने जाएं..?  आपको याद दिला दूं कि ये वही शिंदे हैं जो कोयला घोटाले पर कहते हैं कि लोगों की याददाश्त बहुत कमजोर होती है और लोग बफोर्स घोटाले की तरह कोयला घोटाले को भी जल्द भूल जाएंगे। इसका मतलब क्या शिंदे फिर से ये सोच रहे हैं कि दिल्ली गैंगरेप को भी लोग जल्द भूल जाएंगे..? गजब करते हैं शिंदे साहब एक तरफ आप कहते हैं कि आप की भी तीन-तीन बेटियां हैं और आप इस घटना का दर्द समझते हैं और महिलाओं की सुरक्षा के प्रति चिंतित हैं...लेकिन एक तरफ आपका ये असंवेदनहीन बयान..! बढ़िया है शिंदे साहब आप भी अपने प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह के नक्शेकदम पर चल रहे हैं..! वैसे बात चारों तरफ गैंगरेप के आरोपियों को मौत की सजा देने की हो रही है लेकिन हम इस बात को नहीं नकार सकते कि मौत की सजा पाने वाले लोगों के पास इस सजा से बचने की काट भी मौजूद है...और वो काट है राष्ट्रपति भवन। पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल की ही बात कर लें तो उन्होंने अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में 35 कैदियों की मौत की सजा माफ कर दरियादिली दिखाई थी...और खास बात ये है कि इनमें से 5 बलात्कार के बाद पीड़ित की नृशंस हत्या के जुर्म में मौत की सजा पाए हुए थे। मजे की बात तो ये है कि राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने यूपीए सरकार की सलाह पर ही मौत की सजा माफ करने के फैसले लिए थे। अब हम ये कैसे उम्मीद कर लें कि दिल्ली गैंगरेप या ऐसी हैवानियत करने वालों को अगर कानून में संशोधन के बाद मौत की सजा मिल भी जाती है तो वे लोग इसके अंजाम तक भी पहुंचाए जाएंगे। साथ ही ये मत भूलिए कि ये भारत है और इस देश की संसद पर हमला करने वाले आरोपी अफजल गुरु को घटना के 12 साल बाद भी फांसी नहीं दी जाती जबकि सर्वोच्च न्यायालय अफजल को फांसी की सजा सुना चुका है जबकि इसके विपरीत अमेरिका को देखिए चाहे आप अमेरिका की कितनी आलोचना कर लो लेकिन उसने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला करने वाले को उसके घर में घुसकर मारा और भारत में संसद के हमले के आरोपी की सरकार जेल में खातिरदारी कर रही है। 

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रविवार, 23 दिसंबर 2012

दिल्ली गैंगरेप- जय हो मौनी बाबा की...


दिल्ली गैंगरेप पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के देश के नाम संबोधन की खबर आई तो लगा कि अपने पेटेंट दो दिन 15 अगस्त और 26 जनवरी को बोलने वाले मनमोहन सिंह गैंगरेप के विरोध में गुस्से में उबल रहे देश के सामने कोई ऐसी बात करेंगे जिससे शायद लोगो को गुस्सा कम हो...लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ। जैसी की उम्मीद थी मनमोहन सिंह हिंदी की बजाए अंग्रेजी में ही बोले- मनमोहन सिंह की अंग्रेजी इंडिया गेट पर प्रदर्शन करने वाले और महानगरों में रहने वाले तो शायद समझ गए होंगे...लेकिन मनमोहन सिंह उन करोड़ो लोगों तक अपनी बात नहीं पहुंचा पाए जिनके लिए अंग्रेजी बोलने वाले आज भी किसी अंग्रेज से कम नहीं है और कौतहुल का विषय बने रहते हैं। जाहिर है ऐसे लोगों का तादाद लाखों में हैं जो देश में हर रोज बलात्कार के शिकार तो होते हैं लेकिन जब वे अपनी शिकायत लेकर पुलिस थाने में जाते हैं तो उन्हें दुत्कार दिया जाता है। वैसे अच्छा हुआ मनमोहन सिंह देश की भाषा हिंदी की बजाए अंग्रेजी में ही बोले क्योंकि जो कुछ भी मनमोहन सिंह बोले उससे ज्यादा कि उनसे उम्मीद भी नहीं की जा सकती। मनमोहन सिंह को शायद इस घटना के बाद से देश में आया गुस्से का उबाल नहीं दिखाई दिया वर्ना मनमोहन सिंह अपने संबोधन में जिस इंसाफ की मांग देश कर रहा है उस इंसाफ की ओर कुछ कदम बढ़ाते जरूर दिखाते लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ और मनमोहन सिंह गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे की तरह खुद भी बेटियों का बाप होने का हवाला देते हुए घटना पर सिर्फ दुख ही जताते दिखे। इसमें मनमोहन सिंह साहब का भी दोष नहीं है क्योंकि उनके बारे में कहा जाता है कि वे उतना ही बोलते हैं जितना बोलने का उन्हें कहा जाता है...आप सोच रहे होंगे कि आखिर देश के प्रधानमंत्री भी क्या किसी के कहने पर ही बोलते या चुप रहते हैं ! लेकिन चौंकिए मत यहां ऐसा भी होता है...सोचिए अगर ऐसा नहीं होता तो क्या मनमोहन सिंह अपने पेटेंट दो दिनों 15 अगस्त औऱ 26 जनवरी के अलावा किसी और मौके पर आपको बोलते हुए नहीं दिखाई देते। प्रधानमंत्री जी आपको नहीं बोलना है मत बोलिए...लेकिन बिना बोले ही कुछ ऐसा कर जाईये...एक ऐसी नजीर पेश कर दीजिए पीएम साहब कि दिल्ली में क्या देश में दिल्ली जैसी घटना की पुनरावृत्ति फिर न हो...हाथ जोड़कर निवेदन है आपसे।

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दिल्ली गैंगरेप- ओबामा रोते हैं...हम क्यों सोते हैं !



दिल्ली गैंगरेप के खिलाफ शनिवार और रविवार तो इंडिया गेट से लेकर रायसीना हिल्स तक जो हुआ वो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। सरकार और पुलिस के खिलाफ गुस्से का ऐसा ज्वार शायद ही इससे पहले कभी फूटा होगा। गैंगरेप की शिकार पीड़ित के लिए इंसाफ की मांग कर रहे युवा मानो किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। लेकिन एक बार फिर से एक जनांदोलन का दमन करने की कोशिश दिल्ली पुलिस और सरकार ने की...लेकिन दमन की कोशिश ने गुस्से की आग को और ज्यादा भड़का दिया है। अमेरिका में एक स्कूल में एक सिरफिरे की अंधाधुंध फायरिंग 20 बच्चों समेत 28 लोगों की दुखद मौत हो जाती है तो अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा घटना पर दुख जताते हैं...लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के राजा भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी साहब को न तो राष्ट्रपति भवन के बाहर गैंगरेप के खिलाफ हजारों लोगों का जनाक्रोश दिखा और न ही राष्ट्रपति ने इस जघन्य कृत्य की निंदा में दो शब्द ही कहे। मौनी बाबा की उपाधि पा चुके हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एफडीआई के मुद्दे पर तो देश को संबोधित करते हैं लेकिन एक जघन्य अपराध के बाद उसकी निंदा करने का वक्त उनके पास नहीं है। अमेरिका को ऐसे ही दुनिया का सरताज नहीं कहा जाता...9/11 के आरोपियों को अमेरिका उसके घर में घुसकर मारता है तो 26/11 के आरोपी कसाब की सुरक्षा पर भारत करोड़ों रुपए खर्च करता है (फांसी को काफी दवाब के बाद और काफी देर से दी गई) और 26/11 के मास्टरमाइंड अफजल गुरु को हमारे देश के गृहमंत्री श्रीअफजल गुरु कहकर संबोधित करते हैं...शायद यही फर्क है भारत और अमेरिका में। दिल्ली गैंगरेप पीड़ित का ईलाज कर रहे डॉक्टरों का बयान साफ बयां करता है कि चलती बस में लड़की के साथ जो दरिंदगी हुई है वो कम से कम कोई इंसान तो नहीं कर सकते...ये काम सिर्फ शैतान ही कर सकते हैं और ऐसे शैतान कानून के मुताबिक सजा होने के बाद भी समाज के लिए खतरा ही बने रहेंगे...जाहिर है ऐसे हैवानियत करने वालों के लिए मौत की सजा भी कम है। लेकिन अफसोस है कि हमारे देश की सरकार देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों पर एक मासूम के साथ दरिंदगी का खेल खेलने वाले अपराधियों को फांसी के फंदे तक पहुंचाने की बात करने से घबराती हुई नजर आ रही है और दुर्भाग्य देखिए देश का...पहले तो इंसाफ की मांग करने वालों को इंडिया गेट तक पहुंचने से रोकने के लिए मेट्रो स्टेशन के साथ ही इंडिया गेट को जाने वाले सभी रास्ते बंद कर दिए जाते हैं...और इसके बाद भी प्रदर्शनकारी इंडिया गेट पर पहुंच जाते हैं तो उन पर आंसू गैस के गोले छोड़े जाते हैं और लाठियां बरसाई जाती हैं। एक लड़की के साथ हैवानियत का खेल खेला जाता है और उसके लिए इंसाफ की मांग करने वाली लड़कियों पर लोगों की रक्षा करने का बीड़ा उठाने वाली हमारी बहादुर पुलिस लाठियां बरसाती हैं...हालांकि ये बात सभी जानते हैं कि पुलिसवाले भी सरकार के इशारे पर ही ये काम कर रहे थे। इसके बाद भी विडंबना देखिए दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे और कांग्रेस सांसद संदीप दीक्षित जब इंडिया गेट पर पुलिसिया कार्रवाई के लिए दिल्ली पुलिस कमिश्नर को जिम्मेदार ठहराते हुए उन्हें हटाने की मांग करते हैं तो उनकी माता जी उनके सुर में सुर मिलाती हैं...और कमिश्नर के सिर सारा ठीकरा फोड़ देती हैं...और कमिश्नर को हटाने की बात कहती हैं...क्या ऐसा संभव है कि दिल्ली के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले और कड़ी सुरक्षा वाले इलाके में जहां एक तरफ राष्ट्रपति भवन है तो दूसरी तरफ संसद वहां पर हजारों लोग प्रदर्शन करते हैं और उन पर लाठियां बरसती हैं और ये बिना दिल्ली की मुख्यमंत्री की जानकारी के हुआ हो ? लेकिन इसके खिलाफ जब जनाक्रोश भड़कता है तो माननीय मुख्यमंत्री साहिबा इसके लिए दिल्ली पुलिस कमिश्नर को दोषी ठहराती हैं। जाहिर है शीला दीक्षित जानती हैं कि ये जनाक्रोश कहीं 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में उनकी कुर्सी न हिला दे शायद इसलिए पहले शीला दीक्षित के कांग्रेस सांसद बेटे संदीप दीक्षित दिल्ली पुलिस कमिश्नर को हटाने की बात कहते हैं और इसके बाद दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित उनके सुर में सुर मिलाती हैं...लेकिन षीला जी ये भूल गई कि ये पब्लिक है...ये सब जानती है। उम्मीद करते हैं ये आंदोलन अपने अंजाम तक पहुंचे...पीड़ित को इंसाफ मिले और दोषियों को मौत की सजा।

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शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

दिल्ली गैंगरेप- यार ये लड़की ऐसी ही होगी !


बात आज सुबह की ही है...एक तरफ दिल्ली में राजपथ पर गैंगरेप के विरोध में हजारों युवाओं का आक्रोश अपने चरम पर था और पीड़ित को इंसाफ दिलाने के लिए युवा किसी भी हद को पार करने के लिए तैयार थे...दूसरी तरफ एक वाक्या जो मेरे सामने घटित हुआ वो वाकई में सोचने पर मजबूर कर देता है कि क्या इंसाफ की मांग को लेकर...आरोपियों की फांसी की मांग को लेकर जो हजारों युवा किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं...उनका आक्रोश क्या दोबारा ऐसी ही घटनाओं को होने से रोकने के लिए काफी है ? क्या वाकई में ऐसी घटनाएं दोबारा नहीं होंगी ? एक राष्ट्रीय समाचार चैनल पर राजपाथ पर युवाओं का आक्रोश देखने के बाद कुछ देर के लिए घर के पास ही एक बार्बर की शॉप पर मैं सेविंग करवाने पहुंचा। अपनी बारी का इंतजार कर रहा था इसी बीच वहीं पहुंचे दो युवाओं की बातों ने अंदर तक झकझोर के रख दिया था। दोनों की जुबान पर भी दिल्ली गैंगरेप की चर्चा थी...लेकिन सोच का फर्क साफ दिखाई दिया। घटना को याद करते हुए उनमें से एक युवा दिल्ली गैंगरेप पीड़ित के बारे में अभद्र टिप्पणी करता है। वो अपने साथी से कहता है कि यार वो लड़की ऐसी ही रही होगी...ऐसी लड़कियों के साथ ऐसा ही होना चाहिए। मैंने इस पर आपत्ति जताई और उनसे कहा कि कैसे आप किसी के लिए ऐसा सोच सकते हो वे उल्टा इस पर बहस करने लगे और अपनी बात को सही ठहराने लगे। इस वाक्ये से कई सवाल जेहन में उठते हैं जिनका जवाब ढ़ूंढा जाना बेहद जरूरी है...मसलन क्या सिर्फ कड़े कानून बनाए जाने से और आरोपियों को फांसी देने से देशभर में सड़कों पर आक्रोश जताना इस बात की गारंटी होगी कि आगे कोई और लड़की इस तरह के वहशीपन का शिकार नहीं होगी...या कोई और बलात्कार किसी लड़की के साथ नहीं होगा ? क्या इस सब से इंसानों के बीच में समाज में रह रहे भेड़िए जो मौका मिलते ही इस वहशीपन को अंजाम देते हैं उनकी सोच में उनकी मानसिकता में बदलाव आ पाएगा ? जाहिर है सिर्फ कानून कड़े करने से...आरोपियों को सख्त से सख्त सजा देने से ऐसे अपराध नहीं रूकेंगे और समय समय पर ऐसी घटनाएं जो कि दुर्भाग्यपूर्ण हैं आगे भी घटित होती रहेंगी। जब तक लोगों की सोच में बदलाव नहीं आएगा...उनकी मानसिकता में बदलाव नहीं आएगा ऐसे अपराधों को रोकना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। ये घटिया सोच नहीं तो और क्या है कि जहां एक तरफ दिल्ली में लड़की के साथ हुए वहशीपन के खिलाफ देश सड़कों पर उतरकर अपना आक्रोश जता रहा था तो दूसरी तरफ कुछ ऐसी सोच वाले लोग भी थे जो इस वहशीपन के लिए भी पीड़ित को ही जिम्मेदार ठहरा रहे थे। जब तक ये सोच नहीं बदलेगी हालात नहीं सुधरेंगे और आश्चर्य नहीं होना चाहिए अगर अंदर तक झकझोर देने वाले दिल्ली गैंगरेप जैसे जघन्य कृत्य आगे हमें सुनने को मिलें...क्योंकि हमारे समाज में ऐसे लोग मौजूद हैं जो लड़कियों/महिलाओं को सिर्फ और सिर्फ सेक्स की नजरों से देखते हैं और मनोरंजन का सामान समझते हैं और ये वही लोग हैं जो कभी गुवाहाटी में तो कभी दिल्ली में न सिर्फ महिलाओं की ईज्जत को तार – तार करते हैं बल्कि उनका जीवन नर्क बना देते हैं। ये लोग इतना तक नहीं सोचते कि जिसने इनको जन्म दिया है वो भी एक महिला है औऱ इनके घर में भी मां-बहनें हैं...काश ये चीजें इनको समझ में आती। आखिर मैं कहना चाहूंगा कि दिल्ली गैंगरेप पीड़ित को जल्द से जल्द इंसाफ मिले और इस जघन्य कृत्य को अंजाम देने वाले आरोपियों के लिए फांसी की सजा भी कम होगी क्योंकि फांसी से उन्हें तो एक बार में मौत मिल जाएगी...लेकिन इन आरोपियों ने पीड़ित को जो जख्म दिए हैं वो शायद ही कभी भर पाएंगे।

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गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

मोदी पीएम बनें न बनें राहुल गांधी जरूर बनेंगे


2014 का सेमिफाइनल माने जा रहे गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों ने जहां गुजरात में भाजपा को मुस्कुराने की वजह दे दी है तो हिमाचल में कांग्रेसियों के चेहरे चमक रहे हैं। ये चुनाव अपने आप मे काफी अहम थे और नतीजे आने से पहले नरेन्द्र मोदी की हैट्रिक की बातें तो की ही जा रही थी...लेकिन मोदी के साथ ही एक और चेहरा इस चुनाव के नतीजों के बाद से चर्चा में है...जिसने गुजरात चुनाव में मोदी के साथ ही एक अनोखी हैट्रिक पूरी की है। ये शख़्स और कोई नहीं बल्कि कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी हैं...जिन्होंने बिहार और उत्तर प्रदेश के बाद गुजरात में भी हैट्रिक पूरी की लेकिन ये हैट्रिक जीत की नहीं बल्की हार की है। बिहार और यूपी के बाद गुजरात में भी राहुल गांधी का जादू नहीं चला और मोदी के कद के आगे राहुल गांधी बौने नजर आए। मोदी और राहुल दोनों की हैट्रिक के साथ ही दोनों में एक बात और खास है कि गुजरात में जीत की हैट्रिक लगाने वाले मोदी भी 2014 में प्रधानमंत्री की कुर्सी के प्रबल दावेदार हैं और गुजरात चुनाव के नतीजों के बाद हार की हैट्रिक लगाने वाले कांग्रेस युवराज राहुल गांधी भी इस कुर्सी के प्रबल क्या कांग्रेस में एकमात्र दावेदार हैं। यहां पर राजनीति का गणित देखिए जीत के हैट्रिक लगाने वाले मोदी की राहें...हार की हैट्रिक लगाने वाले राहुल गांधी से कहीं ज्यादा कठिन है। 2014 में पीएम की कुर्सी के लिए अपने दम पर गुजरात में भाजपा को सत्ता में लाने वाले मोदी के नाम पर जहां उनकी पार्टी के नेताओं में ही आम राय नहीं हैं तो वहीं राहुल गांधी के तमाम राजनीति के टेस्ट में फेल होने के बाद भी कांग्रेस में हर कोई नेता राहुल गांधी के गुणगान करते नहीं थकता और राहुल को ही कांग्रेस में पीएम की कुर्सी का सर्वश्रेष्ठ दावेदार बताता है...अब इसके पीछे क्या वजह है ये तो आप अच्छे से समझते ही होंगे। कुल मिलाकर देखा जाए तो एक बात तो तय है कि नरेन्द्र मोदी जीत की हैट्रिक लगाने के बाद भी कभी प्रधानमंत्री बनें या न बनें...लेकिन कांग्रेस युवराज जरूर एक दिन प्रधानमंत्री की कुर्सी पर जरूर विराजेंगे...चाहे आगे भी कितने ही टेस्ट में राहुल फेल क्यों न हो जाएं।
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मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

24 घंटे में 66 बलात्कार


भूख के कई रूप हैं...एक है पेट की भूख...जो इंसान को कुछ भी करने को मजबूर कर देती है...कुछ लोग इस भूख को नजरअंदाज करने की कोशिश करते हैं लेकिन बार बार लौट पर आने वाली भूख कई बार इंसान पर भारी पड़ती है और आखिर में इंसान को ही खा जाती है...भारत में हर रोज भूख से होने वाली होने वाली करीब 5 हजार मौतें ये बताने के लिए काफी है। भूख का एक और रूप है जो इंसान की जान तो नहीं लेता लेकिन जिस पर ये भूख टूटती है वो एक जिंदा लाश बनकर रह जाती है। उसे अपना जीवन खुद पर बोझ लगने लगता है...और कई बार हमने देखा है कि इस भूख की शिकार महिलाएं, युवतियां इस बोझ को नहीं ढ़ो पाती और खुद मौत को गले लगा लेती हैं। भूख के इस दूसरे रूप को हवसके नाम से भी जाना जाता है। दिल्ली रविवार रात चलती बस में जो हुआ वो भूख का ही दूसरा रूप था या कहें कि एक वहशीपन था जिसे कोई शैतान ही अंजाम दे सकता है। पुलिस ने भले ही 6 में से 4 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया हो...और माना इनको सजा भी हो जाएगी...क्योकि इन्होंने जघन्य अपराध किया है...लेकिन जिस लड़की के साथ ये घटित हुई या होती आयी है...उसे तो दोषियों से भी बड़ी सजा मिलती है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर कब तक इस तरह की घटनाएं होती रहेंगी और आखिर क्यों हर बार पुलिस और सरकार इन घटनाओं के होने के बाद ही हरकत में आती हैं और इन घटनाओं को रोकने के लिए इस पर मंथन होता है ? देश में पहले भी ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं लेकिन सवाल वहीं का वहीं है कि उसके बाद की जाने वाली बड़ी बड़ी बातें सिर्फ बातों तक ही सीमित रह जाती हैं और उन पर अमल नहीं होता और इसका नतीजा ये होता है कि कुछ अंतराल के बाद ऐसी ही घटनाओं की गूंज तन बदन को झकझोर कर रख देती है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के सिर्फ 2011 के आंकड़ों पर ही नजर डाल लें तो तस्वीर काफी हद तक साफ हो जाती है कि आखिर महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं। महिलाओं के साथ बलात्कार, शारीरिक उत्पीड़न और छेड़छाड़ के साथ ही महिलाओं के अपहरण और घर में पति या रिश्तेदारों के उत्पीड़न के मामलों की लिस्ट काफी लंबी है। साल 2011 में हर रोज 66 महिलाएं बलात्कार की शिकार हुई। एनसीआरबी के अऩुसार 2011 में बलात्कार के 24 हजार 206 मामले दर्ज हुए जिनमें से सजा सिर्फ 26.4 फीसदी लोगों को ही हुई जबकि महिलाओं के साथ बलात्कार के अलावा उनके शारीरिक उत्पीड़न, छेड़छाड़ के साथ ही उनके उत्पीड़न के 2 लाख 28 हजार 650 मामले दर्ज किए गए जिसमें से सजा सिर्फ 26.9 फीसदी लोगों को ही हुई। ये वो आंकड़ें हैं जिनमें की हिम्मत करके पीड़ित ने दोषियों के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई...इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि असल में ऐसी कितनी घटनाएं घटित हुई होंगी क्योंकि आधे से ज्यादा मामलों में पीड़ित समाज में लोक लाज या फिर दबंगों के डर से पुलिस में शिकायत ही नहीं करती या उन्हें पुलिस स्टेशन तक पहुंचने ही नहीं दिया जाता है। सबसे बड़ी बात ये है कि आंकड़ें इस पर से पर्दा हटाते हैं कि इन मामलों में कार्रवाई का प्रतिशत सिर्फ 25 है...यानि कि 75 फीसदी मामले में या तो आरोपी बच निकले या फिर ये मामले सालों तक कोर्ट में लंबित पड़े रहते हैं और आरोपी जमानत पर खुली हवा में सांस ले रहा होता है। शायद यही वजह है कि इंसान के रूप में समाज में घूम रहे ऐसे वहशी दरिंदे कानून की इन खामियों का फायदा उठाते हैं और सरेआम ऐसे जघन्य अपराध करने से भी नहीं चूकते क्योंकि वे उन्हें लगता है कि आसानी से कानून की इन खामियों का फायदा उठाकर वे बच निकलेंगे। मैंने अपने आसपास कुछ महिलाओं और लड़कियों से ऐसे अपराधियों को सजा देने पर उनकी राय जाननी चाही तो उनके चेहरा जवाब देते वक्त गुस्से से लाल था और उनके मन से जो आवाज निकली वो थी कि ऐसे अपराधियों का जिंदा रहना समाज के हित में नहीं है और इन्हें मौत की सजा की सबने वकालत की। कोई चौराहे पर फांसी देने की बात कह रही थी तो कोई सरेआम गोलियों से भून देने की बात कर रही थी। संसद में दिल्ली गैंगरेप के बाद ऐसे आरोपियों को फांसी की सजा देने की बात उठी और गृहमंत्री ने भी सख्त से सख्त कार्रवाई का भरोसा तो दिलाया है...लेकिन इसके बाद भी सच ये है कि महिलाएं खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रही हैं। जरूरत इस बात कि है कि दिल्ली की इस घटना के बाद जो बड़ी बड़ी बातें की जा रही हैं...सरकार के साथ ही पुलिस भी उन पर अमल करे और इन घटनाओं को रोकने के साथ ही महिलाओं की सुरक्षा के लिए सरकार गंभीर कदम उठाने पर तत्काल फैसला ले। इसके साथ ही बलात्कार जैसे जघन्य अपराध करने वालों को कड़ी से कड़ी सजा देने के प्रावधान पर सरकार पूरी गंभीरता से विचार करे...एक ऐसी सजा जिसके बारे में सोचने पर ही अपराध करने से पहले अपराधी हजार बार सोचे।

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सोमवार, 17 दिसंबर 2012

दो गेंदबाजों ने लगाई टीम इंडिया की वॉट


भारत और इंग्लैंड के बीच टेस्ट सीरीज शुरु होने से पहले इसे बदले की सीरीज कहा जा रहा था क्योंकि 2011 में इंग्लैंड के दौरे पर गई टीम इंडिया को अंग्रेजों ने टेस्ट सीरीज में 4-0 से करारी मात दी थी। भारतीय क्रिकेट प्रेमियों को उम्मीद थी कि भारत अंग्रेजों को 4-0 से मात देकर 2011 की हार का बदला ले लेगा। सीरीज शुरु हुई तो अहमदाबाद टेस्ट में भारत की 9 विकेट से जीत के बाद ये लगने भी लगा था। लेकिन मुंबई में लय में लौटे अंग्रेजों ने भारत को 10 विकेट से करारी मात देकर न सिर्फ सीरीज में जोरदार वापसी की बल्कि भारतीय खिलाड़ियों की अहमदाबाद जीत की खुमारी भी उतार दी। कोलकाता में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला और अंग्रेजों ने भारत को 7 विकेट से हराकर सीरीज में 2-1 की बढ़त बना ली जो निर्णायक भी साबित हुई। पुजारा पहले और दूसरे टेस्ट मैच में तो दीवार बने लेकिन बाद के दो टेस्ट मैच में अंग्रेजों ने पुजारा का भी तोड़ ढ़ूंढ लिया। नागपुर टेस्ट में कोहली और धोनी का बल्ले की खामोशी तो टूटी लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और अंग्रेज भारत के सीरीज जीतने के सपने को चकनाचूर कर चुके थे। भारतीय गेंदबाज स्पिन खेलने में परांगत कहे जाते हैं लेकिन पूरी सीरीज में यही भारतीय बल्लेबाज अपने घर में ही अंग्रेज स्पिनरों के आगे घुटने टेकते नजर आए। पूरी सीरीज में सिर्फ दो अंग्रेज स्पिनरों ने भारतीय बल्लेबाजों पर कैसे नकेल कसी इसका अंदाजा महज इस बात से लगाया जा सकता है कि पनेसर और स्वान ने मिलकर सीरीज के 4 टेस्ट मैचों में 37 विकेट झटके जिसमें से स्वान ने 4 मैचों में 20 तो पनेसर ने 3 मैच में 17 विकेट झटके। यानि कि स्पिन गेंदबाजों को खेलने में महारत हासिल रखने वाले भारतीय बल्लेबाज स्वान और पनेसर की फिरकी में ऐसे उलझे की एक के बाद एक पवेलियन लौटते चले गए। सिर्फ दो स्पिन गेंदबाजों ने ही भारतीय टीम की वॉट लगा के रख दी। बाउंस होती विदेशी पिचों पर भारतीय बल्लेबाज सीमर्स को नहीं खेल पाते ये तो समझ में आता था लेकिन अपने ही देश में घरेलु परिस्थितियों में फिरकी में उलझ जाना ये समझ से परे है। स्वान और पनेसर के अलावा तेज गेंदबाज एंडरसन के आगे भी भारतीय बल्लेबाज संघर्ष करते नजर आए। हालांकि एंडरसन 4 टेस्ट मैच में सिर्फ 12 ही विकेट ले सके लेकिन अंग्रेजों की जीत में एंडरसन की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। स्वान, पनेसर और एंडरसन ने पूरी सीरीज में 49 विकेट लेकर 28 साल बाद भारत में अपनी टीम की सीरीज जीत की पटकथा लिख दी थी। जबकि भारत के 5 फिरकी गेंदबाज ओझा, अश्विन, हरभजन, चावला और जडेजा पूरी सीरीज में अंग्रेजों के सिर्फ 43 विकेट ही ले सके। भारतीय बल्लेबाज जिस पिच पर ताश के पत्तों की तरह ढ़हते नजर आए उसी पिच पर अंग्रेज बल्लेबाजों ने जिस तरह बल्लेबाजी कि उसकी जितनी तारीफ की जाए कम है। खासकर अंग्रेज कप्तान कुक ने पूरी सीरीज में जो बल्लेबाजी की वो वाकई में दर्शनीय थी। हालांकि पीटरसन, ट्राट, कॉम्पटन और बेल ने भी जरूरत के वक्त अपने बल्ले की चमक बिखेरी और इंग्लैड का भारत में 28 साल बाद सीरीज जीतने के सपने को पूरा किया। कुल मिलाकर देखा जाए तो अंग्रेज खिलाड़ियों ने एक संगठित टीम की तरह खेल दिखाया औऱ सभी खिलाड़ियों ने हर मैच में अपना पूरा योगदान दिया...और नतीजा सबके सामने हैं...जबकि भारतीय टीम में ये कमी साफ तौर पर नजर आई। भारत की हार के बाद आलोचनाओं का बाजार गर्म है और टीम के पोस्टमार्टम के साथ ही धोनी की कप्तानी पर भी सवाल उठने लगे हैं। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि चयनकर्ताओं को अपने चयन पर सोचने के साथ ही कुछ कड़े फैसले लेने का साहस जुटाना चाहिए ताकि ये मिथक टूटे की भारतीय चयनकर्ता खिलाड़ी के प्रदर्शन नहीं बल्कि खिलाड़ी के कद को देखकर टीम का चयन करते हैं। साथ ही हर खिलाड़ी को अपने प्रदर्शन का आत्म अवलोकन करना चाहिए कि क्या वाकई में उसने अपने नाम के अनुरुप प्रदर्शन किया है ?

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शीला जी दिल्ली में भूख से क्यों होती है मौत ?


दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित कहती हैं कि 5 लोगों का परिवार 600 रूपए महीने में पेट आसानी से भर जाता है...यानि की शीला जी के अनुसार सिर्फ 4 रूपए में एक व्यक्ति का पेट भर जाता है। ये बयान उस शीला दीक्षित का है जिनके राज में दिल्ली में हर हफ्ते एक व्यक्ति भूख की वजह से दम तोड़ देता है। दिल्ली में कांग्रेस सरकार के 14 साल के कार्यकाल में 737 लोगों की मौत की वजह भूख और गरीबी रही। ये जानकारी एक आरटीआई के जवाब में दिल्ली पुलिस मुख्यालय ने ही दी है। लेकिन शीला जी कहती हैं कि 4 रूपए में एक आदमी आसानी से दाल रोटी खा सकता है...अगर शीला जी ऐसा होता तो आपकी दिल्ली में कम से कम भूख से तो कोई मौत नहीं होनी चाहिए। आपकी दिल्ली में ही क्यों भारत में भूख से कोई मौत नहीं होनी चाहिए जहां विश्व के करीब 95 करोड़ भूखे लोगों में से करीब 45 करोड़ भारत में ही हैं। क्योंकि 4 रूपए का जुगाड़ तो आदमी मेहनत, मजदूरी करके या फिर भीख मांग कर भी कर लेता है...लेकिन इसके बाद भी भारत में रोज हजारों लोगों की मौत की वजह सिर्फ भूख है। अब शीला दीक्षित ने ये गणित कैसे बैठाया ये तो वही जानें लेकिन शीला के इस बयान ने एक बार फिर से जाहिर कर दिया है कि वाकई में गरीबों के हित की बात करने वाले राजनेताओं की सोच में कितना फर्क है। ये वही राजनेता हैं जो विधानसभा और संसद में उन्हें मिल रहे वेतन भत्ते को बढ़ाने को नाकाफी बताते हुए उसे समय समय पर बढ़ाने की मांग को लेकर खूब हो हल्ला मचाते हैं लेकिन एक 5 लोगों के गरीब परिवार की एक महीने की रोजी रोटी के लिए इन्हें 600 रूपए काफी लगते हैं। ये राजनेता जिन गाड़ियों में चलते हैं उसका एवरेज प्रति किलोमीटर लगभग 5 से 6 का होता है...यानि कि एक किलोमीटर चलने में ये लोग 40 से 50 रूपए खर्च कर देते हैं...दिन के और महीने के इनके और इनके परिवार के खाने का खर्चा की तो बात ही क्या। ये हिंदुस्तान है यहां कुछ भी हो सकता है यहां योजना आयोग भोजन पर शहर में 32 रूपए रोज और गावों में 26 रूपए रोज खर्च करने वालों को गरीब नहीं मानता लेकिन योजना आयोग के दफ्तर में 35 लाख रूपए टॉयलेट बनाने पर खर्च कर देता है...अब दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने 600 रूपए महीने अगर 5 लोगों के परिवार की महीने भर की दाल रोटी के लिए पर्याप्त बता दिया तो कल कोई और अपने अनोखे बयान से गरीबों को उपहास उड़ाएगा...क्या फर्क पड़ता है ? फर्क तो उस दिन पड़ेगा जिस दिन ये गरीब अपने वोट की ताकत को पहचानेंगे और अपने वोट से ऐसे नेताओं को सबक सिखाएंगे।

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रविवार, 16 दिसंबर 2012

प्रमोशन में आरक्षण ने बना दिया दुश्मन !


प्रमोशन में आरक्षण बिल को लेकर महाभारत थमने का नाम नहीं ले रहा है। राजनीतिक दल इस बिल के सहारे एक बार फिर से अपनी अपनी रोटियां सेंकने में जुट गए हैं। बिल को लेकर विरोध की चिंगारी इतनी तेज हो गई है जो कभी भी बड़ी आग का रूप ले सकती है...लेकिन सरकार ने संविधान संशोधन बिल पारित करने की पूरी तैयारी कर ली है। राजनीतिक दलों की नजर 2014 के आम चुनाव पर है और वोटों के लिए ये लोग किसी भी हद तक जाने को तैयार दिखाई दे रहे हैं। ये वही राजनीतिक दल और राजनेता हैं जो अपने भाषणों में तो सभी के हिमायती होने का दावा करते हैं....देश से जात-पात के अंतर को खत्म करने की बात करते हैं....लेकिन प्रमोशन में आरक्षण बिल ये बताने के लिए काफी है कि इनकी कथनी और करनी में कितना फर्क है। बिल ने एक ही छत के नीचे साथ साथ बैठकर काम करने वाले सरकारी कर्मचारियों को एक दूसरे का दुश्मन बना दिया है। एक वर्ग बिल के विरोध में सड़कों पर उतर कर आंदोलन कर रहा है तो दूसरा वर्ग बिल के समर्थन में अपनी निर्धारित 8 घंटे की ड्यूटी से भी ज्यादा काम करने को तैयार हैं। बिल को लेकर अलग अलग लोगों की व्यक्तिगत राय अलग अलग हो सकती है लेकिन मेरा व्यक्तिगत तौर पर मानना है कि प्रमोशन में आरक्षण बिल दो वर्गों के बीच एक गहरी खाई पैदा करने का ही कार्य करेगा जो कि बिल्कुल भी सही नहीं है। किसी को सिर्फ जाति के आधार पर उसे उसके सहकर्मी से ऊपर प्रमोट कर दिया जाना कहां तक सही है  ? अगर ऐसा किया जाता है तो क्या दूसरी जाति के कर्मचारी के मन में हीन भावना उतपन्न नहीं होगी ? वह कैसे अपने कार्य को पूरे मन से कर पाएगा...क्योंकि उसके सहकर्मी को तो प्रमोशन दे दिया जाएगा...लेकिन वह सालों तक उसी जगह पर कार्य करता रह जाएगा। क्या इससे उसके कार्यक्षमता पर फर्क नहीं पड़ेगा ? इसका नुकसान किसे होगा...जाहिर है वह अपने साथ ही दूसरों का भी नुकसान करेगा। इससे बेहतर क्या ये नहीं कि प्रमोशन के लिए कर्मचारी की कार्यकुशलता और उसके प्रदर्शन के साथ ही उसके व्यवहार को पैमाना बनाया जाए ? अगर ऐसा किया जाता है तो जाहिर है प्रमोशन पाने के लिए कर्मचारी पूरे मन से काम करेगा और काम में लापरवाही नहीं बरतेगा। उसके काम का आउटपुट बढ़ेगा और इसका फायदा न सिर्फ संबंधित विभाग को होगा बल्कि उस कर्मचारी को प्रमोशन भी मिलेगा। जिस कर्मचारी को प्रमोशन नहीं मिल पाएगा क्या वो प्रमोशन के लिए और अधिक मेहनत से कार्य नहीं करेगा ? जाहिर है तरक्की हर किसी को अच्छी लगती है और तरक्की के लिए कर्मचारी अच्छा कार्य करेगा। इसके साथ ही जिस पद पर प्रमोशन होना है क्यों न उस पद के लिए उसकी योग्यता मापने के लिए विभागीय परीक्षा आयोजित की जाए ? सभी कर्मचारी उस विभागीय परीक्षा में शामिल हों और अपनी योग्यता के आधार पर प्रमोशन पाएं। किसी को उसकी कार्यकुशलता और पद की  योग्यता के बाद भी सिर्फ उसकी जाति के आधार पर प्रमोशन न मिलना या देर से मिलना क्या उस मेहनती कर्मचारी के साथ अन्याय नहीं होगा ?  इसका ये मतलब न निकाला जाए कि दूसरी जाति के कर्मचारी काबिल नहीं है। साथ ही किसी को कार्यकुशल न होने के बाद भी सिर्फ जाति के आधार पर प्रमोशन दिया जाना भी तर्कसंगत तो कहीं से नहीं है। प्रमोशन हर किसी कर्मचारी का हक भी है और उसे मिलना भी चाहिए...लेकिन इसे जल्दी पाने के लिए किसी कर्मचारी के जाति विशेष के होने की दीवार खड़ी करना कहीं से भी सही नहीं होगा। सोचिए जब एक ही छत के नीचे साथ बैठकर काम करने वाले कर्मचारी इस बिल की आहट मात्र से एक दूसरे के खिलाफ तलवार खींच कर बैठ गए हों...तो इसके लागू होने के बाद सरकारी दफ्तरों के अंदर का नजारा क्या होगा ? राजनीतिक दलों को भी इस संवेदनशील मुद्दे पर राजनीति से परे हटकर सोचना होगा ताकि पहले से ही आम जनता को परेशान करने के लिए बदनाम सरकारी दफ्तरों में बेहतर काम का माहौल बनाया जा सके...और इस माहौल का लाभ आम आदमी के साथ ही देश को मिल सके।

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शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

क्यों रूठ गई है कुदरत ?


देहरादून में सुबह आंख खुली तो बाहर कड़कड़ाती ठंड थी। बर्फीली हवाओं ने एहसास करा दिया था कि इस बार कुदरत दिसंबर में बही मेहरबान हो रही है। देर रात मसूरी में हुई बर्फबारी का ही नतीजा था कि देहरादून की फिज़ाओं में  बर्फीली ठंडक घुल गई थी। छत पर जाकर देखा तो नजारा मन को मोह लेने वाले था। मसूरी की ऊंची चोटियां बर्फ की सफेद चादर से ढ़की हुई थी...और सूर्य की किरणें सुनहरी चमक बिखेर रही थी। मसूरी से बह रही ठंडी हवाएं दिसंबर की शुरुआत में ही जनवरी की कड़कड़ाती ठंड का एहसास करा रही थी। सुना है दशकों पहले सर्दियों में कभी देहरादून में भी बर्फ के दीदार हो जाया करते थे....लेकिन मसूरी को जाने वाले राजपुर रोड ईलाके के लिए ये बात ज्यादा पुरानी नहीं है और बीते कुछ सालों तक राजपुर रोड का कुछ ईलाका भी मामूली बर्फबारी के लिए पहचाना जाता था...लेकिन बढ़ते शहरीकरण के बाद न सिर्फ कुदरत देहरादून से रूठ गई बल्कि राजपुर रोड़ के इलाके को भी बर्फ के दीदार के लिए तरसा दिया। कम होती हरियाली और खत्म होते जंगलों के बीच तेजी से फैलते कंक्रीट के जंगल का ही असर है कि मसूरी में भी बर्फबारी का मौसम खिसक कर जनवरी तक पहुंच गया...और अक्सर जनवरी या फरवरी में ही मसूरी में बर्फ के दीदार होते हैं...लेकिन इस बार दिसंबर की शुरुआत में मसूरी में बर्फबारी ने मसूरी जिसके लिए जाना जाता था उसकी याद फिर से ताजा कर दी। खुद मसूरी में रहने वाले लोगों के लिए दिसंबर में बर्फबारी इस बार किसी चमत्कार से कम नहीं है। हालांकि ये बर्फबारी हल्की ही थी...लेकिन दिसंबर में बर्फ फिर भी यहां के पुराने दिनों की याद ताजा करा गया। कंक्रीट का फैलता जंगल और कटते वनों के साथ ही बढ़ता प्रदूषण निश्चित ही बदलते मौसम का मुख्य कारक है...देहरादून की ही अगर बात करें तो इस ईलाके की हरियाली मन को मोह लेती थी...और देहरादून में सालों से रह रहे लोग भी कहते हैं कि देहरादून की हरियाली विकास की अंधी दौड़ की भेंट चढ़ गयी। बेतरतीब होते विकास ने जहां न सिर्फ एक खूबसूरत शहर से उसकी सुंदरता यानि की हरियाली छीन ली बल्कि यहां का सदाबहार मौसम भी पहले जैसा नहीं रहा। देहरादून से मसूरी को जाने वाले रास्ते पर जहां पहले हरे भरे पहाड़ सीना तान कर खड़े रहते थे...वहां अब हरियाली के बीच में तेजी से फैलता कंक्रीट का जाल आसानी से देखा जा सकता है...और ये बेतरतीब तरीके से जारी है। ये हाल सिर्फ देहरादून का ही नहीं है बल्कि पूरे उत्तराखंड में अमूमन ऐसे ही हालात है...फिर चाहे नैनीताल हो या फिर रानीखेत या फिर देश का कोई और शहर...कंक्रीट का फैलता जाल धीरे धीरे हरियाली को चट करता जा रहा है। आंकड़ें कहते हैं कि देश में हर साल 30 से 35 हजार हेक्टेयर वन क्षेत्र विकास की भेंट चढ़ता है लेकिन इसका सिर्फ एक तिहाई हिस्से की ही भरपाई हो पाती है। 1980 में बना देश का वन संरक्षण कानून भी कहता है कि एक पेड़ काटने पर उसके बदले तीन पेड़ लगाने पड़ते हैं...लेकिन आप ने अपने आस पास ही इसको महसूस किया होगा कि वाकई में क्या ऐसा हो पाता है ? पर्यावरण मंत्रायल का अध्ययन कहता है कि देश में उत्सर्जित होने वाली 11.25 फीसदी ग्रीन हाउस गैसों यानि करीब 13.38 करोड़ टन कार्बन आक्साईड गैसों को वन सोखते हैं। वन तो कम हो रहे हैं लेकिन ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है...आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर ये सिलसिला इसी तरह जारी रहा तो जलवायु में कितना परिवर्तन आएगा। राष्ट्रीय वन नीति कहती है की देश के भू-भाग के 33 फीसदी हिस्से पर वन होने चाहिए लेकिन हिंदुस्तान में सिर्फ 21.02 फीसदी हिस्से पर ही वन हैं जबकि 2.82 फीसदी भू-भाग पर पेड़ हैं...और अगर इनको भी वनों का हिस्सा मान लिया जाए तो देश का कुल वन क्षेत्रफल 23.83 फीसदी ही होता है...यानि कि वन नीती के मुताबिक अभी और वनों को विकसित करने की जरूरत है न कि विकास के लिए पेड़ों की बलि ली जाए। दिसंबर में बर्फबारी के बहाने बात निकली है तो आईए एक संकल्प लें पेड़ों को लगाने का और वनों को बचाने का।

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