कुल पेज दृश्य

सोमवार, 3 दिसंबर 2012

गैस त्रासदी- स्कूल किताब से हकीकत तक


भोपाल गैस त्रासदी...एक ऐसा सच जिसका सामना करने की हिम्मत शायद किसी में नहीं है...न इस त्रासदी का शिकार हुए लोगों में(क्योंकि ये काला सच आज भी रोंगटे खड़े कर देता है) और न ही मध्य प्रदेश और न ही केन्द्र सरकार में (त्रासदी के वक्त 1984 से लेकर अब तक की)। वजह बिल्कुल साफ है...त्रासदी को 28 बरस पूरे हो गए हैं...लेकिन न तो इस त्रासदी के जिम्मेदार वॉरेन एंडरसन को सजा हुई और न ही पीड़ितों को इंसाफ मिल पाया। मुआवजे के नाम पर करोड़ों रूपए रेवड़ियों की तरह बांटे गए लेकिन वास्तविक रूप में ऐसे लोगों को संख्या भी कम नहीं जिन्हें मुआवजा तक नहीं मिल पाया..इसके उल्ट ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं जिन्होंने मुआवजे के नाम पर खूब चांदी काटी और गैस पीड़ित का तमगा लगाए ये लोग लखपति बन बैठे। गैस पीड़ितों के हक में आवाज़ उठाने वाले करीब एक दर्जन से ज्यादा गैस पीड़ित संगठन दावा तो गैस पीड़ितों के हिमायती होने का करते हैं और मौका लगने पर धरना प्रदर्शन कर खूब सुर्खियां बटोरते हैं...लेकिन गैस पीड़ितों के नाम पर बटोरे गए देश विदेश से करोड़ों की चंदे की रकम को कितना इनके कल्याण पर खर्च करते हैं...इसका अंदाजा गैस पीड़ितों की हालत और गैस पीड़ित संगठनों के आकाओं के आलीशान घर और रहन सहन को देखकर लगाया जा सकता है(सभी गैस संगठन इसमें शामिल नहीं)। जून 2008 से लेकर 2010 तक भोपाल में पत्रकारिता के दौरान इन चीजों को मैंने खुद महसूस भी किया। बचपन में किताबों में जब भोपाल गैस त्रासदी के बारे में पढ़ाई करते हुए हाथ में बच्चे को पकड़े एक महिला की मूर्ति देखते वक्त ये कभी नहीं सोचा था कि एक वक्त ऐसा भी आएगा जब मुझे गैस पीड़ितों पर काम करने का मौका मिलेगा। सोचा ये भी नहीं था कि इस दौरान ऐसी हकीकत से भी रूबरू होना पड़ेगा जिसके बारे में कल्पना तक नहीं की थी। त्रासदी के ठीक बाद से ही केन्द्र औऱ राज्य सरकार ने पूरी ईमानदारी के साथ अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई। मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर तो इस त्रासदी के मुख्य आरोपी वॉरेन एंडरसन को विदेश भगाने तक का आरोप लगा। हालांकि कांग्रेस इसका हमेशा खंडन करती रही है...लेकिन वॉरेन एंडरसन को भोपाल के जिलाधिकारी की सरकारी गाड़ी में एयरपोर्ट पहुंचाना और वहां से सरकारी विमान से दिल्ली पहुंचाना ये सवाल खड़े करता है कि अर्जुन सिंह और राजीव गांधी की भूमिका इस मामले में संदिग्ध थी। भोपाल में चीजें आज भी नहीं बदली हैं...यूनियान कार्बाइड फैक्ट्री आज भी लोगों को मौत बांट रही है। 2-3 दिसंबर 1984 की दरम्यानी रात ये मौत मिथाईल आइसोसायनाइट के रूप में हवा में घुलकर लोगों को तड़पा तड़पा कर मार रही थी...तो आज फैक्ट्री में मौजूद करीब 18 हजार मीट्रिक कचरा जहरीला रसायनिक कचरा भोपाल की हवा, पानी में घुलकर लोगों को बीमारियों की सौगात दे रहा है। आश्चर्य उस वक्त होता है जब मौत बांट रहे इस रसायनिक कचरे के निष्पादन की बजाए इस पर राजनीति होती है। इससे भी बड़ा आश्चर्य ये जानकर होता है कि ये राजनीति करने वाले राजनीतिक दल नहीं बल्कि वो गैस पीड़ित संगठन हैं जो नहीं चाहते कि ये रसायनिक कचरा फैक्ट्री परिसर से निकाल कर इसे नष्ट किया जाए। अगर ऐसा नहीं होता तो जबरलपुर हाईकोर्ट के इस कचरे को गुजरात के अंकलेश्वर में नष्ट करने के आदेश के बाद ये कचरा कब का नष्ट किया जा चुका होता। लेकिन ये कहा जाता है कि भोपाल के गैस पीड़ित संगठनों ने गुजरात के कुछ एनजीओ के साथ मिलकर गुजरात में इसका विरोध करवाना शुरु कर दिया...जिसके बाद गुजरात सरकार ने अंकलेश्वर में कचरा नष्ट किए जाने से इंकार कर दिया। इसके बाद इंदौर के निकट पीथमपुर में जब इस कचरे को नष्ट किया जाने लगा तो एक बार फिर से इसका विरोध शुरु हो गया। कुछ गैस पीड़ित संगठन दलील देते है कि इस कचरे को डाउ कैमिकल अपने देश लेकर जाए और वहीं इसे नष्ट किया जाए। इसके खिलाफ तो वे विरोध प्रदर्शन करते हैं लेकिन इससे भोपाल की हवा और पानी में हो रहे प्रदूषण से बीमार हो रहे लोगों की इनको चिंता नहीं है। देखा जाए तो सिर्फ गैस पीड़ित संगठन ही इसके लिए जिम्मेदार नहीं है बल्कि कहीं न कहीं सरकार का गैर जिम्मेदार रवैया भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है। राजनीति से ऊपर उठकर सरकार ने राजनीतिक ईच्छाशक्ति दिखाई होती तो शायद 28 साल बाद भी कम से कम भोपाल की फिज़ा में ये जहर नहीं घुल रहा होता। उम्मीद करते हैं अगले साल जब ये त्रासदी 29 साल पूरे कर चुकी होगी तो कम से कम फैक्ट्री परिसर में बिखरे पड़े हजारों टन जहरीले रसायनिक कचरे का निष्पादन हो चुका होगा।

deepaktiwari555@gmail.com

रविवार, 2 दिसंबर 2012

पीएम इन वेटिंग...बड़ी आत्म संतुष्टि


आत्म संतुष्टि बड़ी चीज है...हमारे देश में कोई प्रधानमंत्री बने या न बने...लेकिन पीएम इन वेटिंग बनकर राजनेता संतुष्ट हो जाया करते हैं...अब देखिए 2014 के आम चुनाव में करीब 16 महीने का वक्त है...सत्ता में कौन आएगा इसका पता नहीं ! नेता चुनाव जीत पाएंगे या नहीं इस पर प्रश्न चिन्ह बरकरार है ??? लेकिन पीएम की कुर्सी के लिए दावेदारी में कोई कसर बाकी नहीं है। कुछ खुद दावेदारी कर रहे हैं तो कुछ को आगे किया जा रहा है...भाजपाई गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम को हवा दे रहे हैं तो कांग्रेस में राहुल गांधी से बड़ा नेता नहीं है (जो कांग्रेसी कहते हैं)...लेकिन द इकोनॉमिस्ट ने ये कहकर कांग्रेस में हड़कंप मचा दिया है कि पी चिदंबरम 2014 में पीएम की कुर्सी के लिए राहुल गांधी से बड़े दावेदार हैं। इस फेरहिस्त में एक और नाम जुड़ गया है मुलायम सिंह यादव का...खास बात ये है कि मुलायम के नाम को आगे बढ़ाया है दिग्गज कांग्रेसी नेता नारायण दत्त तिवारी ने। अब कांग्रेस में तिवारी की पूछ हो न हो...लेकिन मुलायम का तिवारी प्रेम खूब हिलोरें मार रहा है...और तिवारी ने भी अपने समाजवादी प्रेम को ये कहकर जाहिर कर दिया कि वे पुराने समाजवादी हैं। खैर बात पीएम इन वेटिंग की हो रही है...और तीन – तीन राजनीतिक दलों के नेता भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्णा आडवाणी की तरह पीएम इन वेटिंग का खिताब हासिल करने इस ओर बढ़ रहे हैं या कहें कि हासिल कर चुके हैं। सवाल ये है कि इन तीनों दलों की सरकार बनने की स्थिति में (अगर ये स्थिति आती है) क्या वे वेटिंग से उनकी पीएम की कुर्सी की लिए सीट कन्फर्म हो पाएगी या फिर कोई दूसरा नेता इस बाजी को मार ले जाएगा। पहले भाजपा की बात करें तो अगर एनडीए सत्ता में आता है तो मोदी फिलहाल भाजपा में वेटिंग में सबसे आगे खड़े हैं...और प्रबल दावेदार भी हैं...लेकिन मोदी के नाम पर एनडीए में एकराय न होना और खासकर एनडीए की अहम सहयोगी जद यू के नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से उनकी तल्खियां उनकी राह का रोड़ा बन सकती है...ऐसे में एनडीए का सबसे बड़ा दल होने के नाते किसी और भाजपा नेता के मोदी की रेखा को पार कर इस कुर्सी पर काबिज होने की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। यानि की आडवाणी के बाद 2014 के बाद अगले आम चुनाव तक ही सही लेकिन मोदी ऐसा दूसरा नाम हो सकते हैं जो इस खिताब को हासिल कर सकते हैं। अब बात कांग्रेस की करें तो पीएम की कुर्सी का ख्वाब तो कई दिग्गज कांग्रेसी नेताओं के मन में है...लेकिन आलाकमान के आगे मुंह खोलने की हिम्मत शायद कांग्रेसी नहीं रखते...इसलिए ही पीएम के दावेदार के लिए जब भी मुंह खोलते हैं तो कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के आलावा दूसरा कोई नाम किसी नेता की जुबान से नहीं सुनाई देता। इसकी बानगी फिर देखने को मिली जब मशहूर पत्रिका द इकोनॉमिस्ट ने पी चिदंबरम का नाम राहुल गांधी से आगे बताया तो कांग्रेसी इसको बकवास करार देते नजर आए। राहुल का ये सपना 100 प्रतिशत साकार हो सकता है लेकिन शर्त है कि 2014 में यूपीए की हैट्रिक हो...लेकिन यूपीए 2 के कर्म और राजनीतिक हालात तो जनता को इसकी ईज़ाज़त देते नहीं दिखाई दे रहे हैं। पीएम इन वेटिंग में लंबे वक्त से खड़े एक और शख्स सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह की अगर बात करें तो इस दौड़ में लंबे समय से शामिल मुलायम का ये सपना 2014 के आम चुनाव में उत्तर प्रदेश में सपा के प्रदर्शन और तीसरे मोर्चे के गठन पर निर्भर करता है...जिसके लिए मुलायम कोशिश तो भरसक कर रहे हैं...हर सियासी चाल चल रहे हैं...लेकिन इसके बाद भी मुलायम के इस सपने के साकार होने के आसार बहुत कम हैं...यानि कि आडवाणी की तरह पीएम इन वेटिंग का खिताब आजीवन मुलायम के पास रहने के प्रबल आसार हैं। खैर आम चुनाव में अभी वक्त है और पीएम की कुर्सी का ख्वाब संजोए कई नेता भी इसी उम्मीद में जिए जा रहे हैं कि 2014 में न सही...कभी तो नंबर आएगा।

deepaktiwari555@gmail.com

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

यूपी के ब्राह्मणों का दम !


मुलाकात हुई क्या बात हुई...देश की सियासत में सबसे अहम स्थान रखने वाले उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में यूपी की सियासत के पुराने चावल और वरिष्ठ कांग्रेस नेता एनडी तिवारी से मिलने जब राज्य की सत्तारूढ़ दल के सुप्रीमो मुलायम सिंह पहुंचे तो सियासी गलियारों में कुछ ऐसी ही चर्चाएं आम थी। ये चर्चाएं बेवजह नहीं थी...इस मुलाकात ने न सिर्फ देश की सियासत में गर्मी ला दी है...बल्कि कहीं न कहीं यूपी में अपनी खोई जमीन को वापस पाने की कोशिश में लगी कांग्रेस के माथे पर भी बल ला दिए हैं...और ऊपर से मुलायम से मुलाकात के बाद तिवारी का ये बयान की देश की निगाहें मुलायम सिंह की तरफ देख रही हैं...ये समझने के लिए काफी है कि आने वाले दिनों में ये मुलाकात कोई न कोई सियासी रंग जरूर दिखाएगी। वैसे मुलायम सिंह की अगर बात करें तो मुलायम सिंह का पीएम बनने का सपना किसी से छिपा नहीं है...और मुलायम की जोड़तोड़ ये ईशारा भी कर रही है कि मुलायम इस कुर्सी को पाने के लिए हर तिकड़म आजमा रहे हैं। केन्द्र के साथ रिश्तों पर मुलायम सिंह का पल पल बदलता बयान और केन्द्र सरकार के साथ रहने या न रहने पर असमंजस भी ये जाहिर करता है कि मुलायम की ये ईच्छा खूब हिलोरें मार रही है। वैसे एनडी के साथ मुलायम सिंह की मुलाकात की पीछे एक और सवाल जेहन में आता है कि क्या मुलायम सिंह खुद को एनडी के साथ दिखाकर यूपी के ब्राह्म्ण वोटर्स को साधने की कोशिश तो नहीं कर रहे हैं ? इस बात में दम इसलिए भी है क्योंकि यूपी में एनडी तिवारी से बड़ा कोई नेता नहीं है...और यूपी में ब्राह्मण वोटों की तादाद करीब 21 फीसदी है...जो यूपी में किसी भी पार्टी के साथ हो जाएं तो दूसरी पार्टियों के सियासी समीकरण तो बिगाड़ ही सकते हैं। यूपी का इतिहास भी इस बात का गवाह है कि यूपी में ब्राह्मणों ने खूब राज किया है और यूपी के अब तक के 19 मुख्यमंत्रियों में से सबसे ज्यादा 6 मुख्यमंत्री ब्राह्मण थे...जिनमें एनडी तिवारी का भी नाम है...और इन ब्राह्मण मुख्यमंत्रियों ने यूपी में 23 साल तक शासन किया। यूपी के राजनीति के सूरमा मुलायम सिंह से बेहतर इस बात को कौन समझ सकता है कि अगर तीसरे मोर्चे की शक्ल में केन्द्र की सत्ता में पहुंचना है तो आगामी आम चुनाव में यूपी में सपा को अपने बूते कम से कम 40 से 50 सीटें तो हासिल करनी ही होंगी...तभी जाकर उनका ये सपना आकार ले सकता है। मुलायम ये भी जानते हैं कि उनके इस सपने को आकार देने में यूपी के ब्राह्म्ण वोटर्स महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं...और इस वक्त यूपी में सबसे बड़ा ब्राह्म्ण नेता एनडी तिवारी के अलावा कोई दूसरा नहीं हैं...और एनडी के सहारे ही ब्राह्म्ण वोटर्स को साधा जा सकता है। सवाल ये भी उठता है कि अगर वाकई में एनडी तिवारी सबसे बड़े ब्राह्म्ण नेता हैं तो क्यों नहीं कांग्रेस ने एनडी के सहारे यूपी में अपनी नैया को पार लगाने की कोशिश की...? क्या कांग्रेस आलाकमान को कई मौके पर अपनी साख खो चुके एनडी तिवारी पर भरोसा नहीं था या फिर कांग्रेस आलाकमान नहीं चाहता कि पीएम की कुर्सी की दौड़ में राहुल गांधी के आगे कोई कद्दावर नेता खड़ा हो ? ये सवाल इसलिए भी क्योंकि अगर एनडी तिवारी का चुनाव में पूरा उपयोग कांग्रेस करती तो कांग्रेस में उनके कद का कोई दूसरा बड़ा नेता नहीं है और तिवारी का अनुभव और वरिष्ठता भी सभी नेताओं पर भारी पड़ती है। ऐसे में फिर तिवारी कहीं न कहीं कांग्रेस के सत्ता में आने की स्थिति में प्रधानमंत्री की कुर्सी की स्वाभाविक दावेदार हो जाते और राहुल गांधी को कुछ और साल इंतजार करना पड़ता। खैर सियासत में जो न हो वो कम है...कांग्रेस ने तिवारी पर भरोसा नहीं किया कहें या फिर तिवारी को राहुल की राह का रोड़ा समझा...लेकिन तीसरे मोर्चे के सहारे पीएम पद की कुर्सी पर काबिज होने का सपना देख रहे मुलायम ने जरूर एनडी तिवारी के सहारे यूपी में ब्राह्मण वोटरों को साधने का खेल शुरु कर दिया है...अब मुलायम के इस खेल के सूत्रधार और कौन कौन नेता बनते हैं..ये तो वक्त ही बताएगा।

deepaktiwari555@gmail.com

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

मनमोहन पर भारी “M”


एफडीआई पर सरकार भले ही अपनी सुविधानुसार अपने सहयोगियों का नरम रूख देखते हुए दोनों सदनों में बहस के साथ ही वोटिंग के लिए तैयार हो गई हो...लेकिन मनमोहन सिंह पर एक बार फिर से एम फैक्टर भारी पड़ता दिखाई दे रहा है। एम फैक्टर में सरकार से अलग हो चुकी ममता बनर्जी के साथ ही सरकार की बैसाखी बने मुलायम सिंह और मायावती का पल पल बदलता रूख मनमोहन सिंह की बेचैनी बढ़ाने के लिए काफी है। एफडीआई पर गतिरोध समाप्त होने से पहले तक किसी भी नियम के तहत वोटिंग के लिए तैयार होने की बात करने वाली सपा और बसपा का रूख बदलने से सरकार की मुश्किल बढ़ गई है। मुलायम सिंह की सपा ने जहां राज्यसभा में एफडीआई पर नियम 168 के तहत बहस के बाद वोटिंग में जहां सरकार के खिलाफ वोट करने का ऐलान कर दिया है तो लोकसभा में अपना रूख अभी तक स्पष्ट नहीं किया है। ऐसा ही कुछ हाल बसपा का भी है। सरकार से अलग हो चुकी एक और एम यानि ममता बनर्जी एफडीआई का पहले ही खुलकर विरोध कर रही है। ऐसे में सरकार के पास राहत के नाम पर सिर्फ एक ही एम मौजूद है...ये हैं सरकार के सबसे बड़े सहयोगी एम करूणनिधि...जिनके 18 सांसद ही फिलहाल सदन में सरकार की इज्जत बचाने के लिए सामने आते दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि क्या सरकार के सहयोगियों के दोहरे चेहरे का दावा करने वाली भाजपा की बात एफडीआई पर वोटिंग के दौरान सामने आ जाएगी या फिर फिलहाल मनमोहन सरकार की मुश्किल बने एम फैक्टर मुलायम और मायावती सरकार के लिए एक बार फिर से संकटमोचक की भूमिका निभाएंगे...हालांकि इसकी उम्मीद कम है...लेकिन अगर ऐसा हो भी जाता है तो बड़ा सवाल ये है कि लोकसभा में तो सरकार की लाज बच जाएगी...लेकिन राज्यसभा में सरकार का क्या होगा ?

deepaktiwari555@gmail.com

सुनो सचिन...ये आलोचक नहीं प्रशंसक हैं


इसमें कोई शक नहीं कि ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान रिकी पॉन्टिंग एक बेहतरीन खिलाड़ी हैं। पॉन्टिंग के वन डे क्रिकेट के बाद अब टेस्ट क्रिकेट से भी संन्यास की घोषणा के बाद ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट के एक सुनहर युग का अंत हो गया है। 1999 में स्टीव वॉ की कप्तानी में विश्व कप जीतने के बाद पॉन्टिंग की कप्तानी में ही ऑस्ट्रेलिया ने 2003 और 2007 का विश्व कप खिताब अपनी झोली में डालकर विश्व कप खिताब जीतने की हैट्रिक पूरी की थी। लेकिन रिकी पॉन्टिंग के संन्यास को दुनिया के सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट खिलाड़ी भारत के सचिन तेंदुलकर के संन्यास से जोडना कहीं से भी तर्कसंगत नहीं लगता। ये बात सही है कि सचिन का बल्ला जिसने अनगिनत रिकार्ड उगले हैं...बीते कुछ समय से शांत है...ऐसे में इसका ये मतलब तो नहीं कि सचिन अब वो सचिन नहीं रहे...जिसके आगे गेंदबाजी करने में बड़े से बड़ा गेंदबाज भी कांपता था। सचिन ने हर बार अपने आलोचकों को अपने बल्ले से कड़ा जवाब दिया है...और पूरी उम्मीद है कि एक बार सचिन फिर से अपने बल्ले से करारा जवाब अपने आलोचकों को देंगे। वैसे आलोचक चाहें किसी के भी हों...लेकिन असल में आलोचक ही वे लोग होते हैं जो आपको आगे बढ़ने के लिए अच्छा करने के लिए प्रोत्साहित करते रहते हैं....वे आपको याद दिलाते रहते हैं कि आप का लक्ष्य क्या है...यानि कि वे आपके आलोचक होते हुए भी आपके सबसे बड़े शुभचिंतक और प्रशंसक हैं। सिर्फ इसलिए सचिन के संन्यास पर हो हल्ला मचा है क्योंकि ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी पॉन्टिंग ने क्रिकेट को अलविदा कह दिया है तो ये गलत है। रिकी पॉन्टिंग खुद इस बात को स्वीकार कर चुके हैं कि वे बल्ले से अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन टीम के लिए नहीं कर पा रहे हैं...और इसलिए वे क्रिकेट को अलविदा कह रहे है...यानि की पॉन्टिंग ये मान चुके हैं कि वे उनके अंदर अब और ज्यादा क्रिकेट नहीं बचा है। सचिन की अगर बात करें तो माना सचिन का बल्ला बीते कुछ समय से शांत रहा है लेकिन मैदान पर आज भी सचिन का आत्मविश्वास गजब का रहता है और सचिन की मौजूदगी टीम के बाकी सदस्यों के लिए ऊर्जा का काम करती है तो विपक्षी कप्तान और गेंदबाजों की मुश्किल। वैसे में सचिन कई मौके पर संन्यास की बात को नकारते हुए अभी और क्रिकेट खेलने की ईच्छा जाहिर कर चुके हैं और तो और हाल ही में ऑस्ट्रेलिया के सर्वश्रेष्ठ सम्मान ऑर्डर ऑफ ऑस्ट्रेलिया सम्मान से सम्मानित होने के दौरान सचिन ने फिर से ऑस्ट्रेलिया दौरे पर जाने की इच्छा जतायी थी...यानि कि सचिन को पता है कि अभी उनके अंदर क्रिकेट बची है और वे शारीरिक रूप से फिट और मानसिक रूप से इसके लिए तैयार भी हैं। क्या लगता है सचिन जैसा खिलाड़ी जिसे क्रिकेट के खेल में भगवान का दर्जा दिया जाता है...वो खुद कभी चाहेगा कि क्रिकेट से उसकी विदाई निराशाजनक हो...शायद नहीं न...फिर चिंता किस बात कि खेलने दीजिए सचिन को और खेलते हुए देखिए सचिन को...सचिन का बल्ला बोलेगा और अपने बल्ले से सचिन एक बार फिर अपने आलोचकों को माफ करना प्रशंसकों को करारा जवाब देंगे।

deepaktiwari555@gmail.com



अफसोस...फिर हंगामे की भेंट चढ़ेंगे करोड़ों !


देर से ही सही आखिर संसद में एफडीआई पर बना गतिरोध समाप्त हो ही गया। लोकसभा में जहां नियम 184 के तहत एफडीआई पर विपक्ष की मांग को स्पीकर ने स्वीकार कर लिया है तो वहीं राज्यसभा में बहस के साथ ही वोटिंग के प्रावधान वाले नियम 168 के तहत एफडीआई पर चर्चा के लिए सरकार ने सहमति जता दी है। एफडीआई पर गतिरोध समाप्त होने के बाद भी सदन के दोनों सदनों में कार्यवाही सुचारु रूप से चल पाएगी इस पर संशय बरकरार है। हालांकि भाजपा ने सदन को सुचारु रूप से चलने देने का भरोसा तो दिलाया है...लेकिन सरकार के खार खाए बैठी तृणमूल कांग्रेस क्या सदन में चुप बैठेगी ये बड़ा सवाल है...जो आज गुरुवार को देखने को भी मिला जब लोकसभा में नियम 184 के तहत चर्चा के स्पीकर के निर्देश क बाद भी टीएमसी ने जमकर हंगामा किया और सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। ठीक इसी तरह यूपी में कानून व्यवस्था की स्थिति को लेकर बसपा का हंगामा तो गैस सिलेंडर पर सपा का हंगामा एफडीआई के मुद्दे से अलग सामने आ चुका है...ऐसे में शीतकालीन सत्र आगे भी सुचारु रूप से चल पाएगा इस पर सवाल बने हुए हैं। वैसे नियम लोकसभा में नियम 184 के तहत और राज्यसभा में नियम 168 के तहत एफडीआई पर बहस और वोटिंग के बाद की स्थिति पर भी काफी कुछ सदन की कार्यवाही निर्भर करेगी। अगर वोटिंग में सरकार को पर्याप्त समर्थन मिलता है...जैसी कि उम्मीद है तो क्या उसके बाद विपक्षी दलों की बौखलाहट बाहर निकल कर नहीं आएगी...?  ऐसे में क्या वे सदन में एफडीआई पर फिर हंगामा नहीं करेंगे इसकी क्या गारंटी है…? यानि की विपक्ष की मांग भले ही स्वीकार कर ली गई हो...लेकिन इसके बाद भी शीतकालीन सत्र के आगे सुचारु रूप से चलने के आसार बहुत ज्यादा नजर नहीं आ रहे हैं। एफडीआई के अलावा कई और ऐसे बड़े मुद्दे हैं जिनको लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में विपक्ष हैं तो सरकार लोकपाल बिल, भूमि अधिग्रहण बिल, खाद्य सुरक्षा कानून और बीमा और पेंशन सुधार बिल समेत कई अहम बिल सरकार इस सत्र में पास कराना चाहती है...लेकिन सरकार की ये हसरत तभी पूरी होगी जब सदन में हंगामा न हो और सरकार पहली और सबसे बड़ी बाधा एफडीआई से संसद में पार पा ले। बीते मानसून सत्र हंगामे का एक दौर सदन में हम देख चुके हैं...ऐसे में शीतकालीन सत्र में एफडीआई पर गतिरोध समाप्त होने के बाद भी सत्र के सुचारु रूप से चलने की उम्मीद बहुत कम ही है...जिससे एक बार फिर से सदन की कार्यवाही पर खर्च होने वाले करोड़ों रूपए की बर्बादी साफ नजर आ रही है...लेकिन अफसोस न तो सरकार और न ही विपक्ष को इसकी कोई चिंता है।   

deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 28 नवंबर 2012

मौत पर जश्न सही या गलत ???


कसाब को फांसी से ज्यादा ये जानना जरूरी है कि कसाब को फांसी क्यों दी गई? 26 नवंबर 2008 के पाकिस्तान से समुद्र के रास्ते सवार होकर मुंबई पहुंचे जिन 10 आतंकियों ने हिंदुस्तान को जो जख़्म दिया उसमें से एकमात्र जिंदा बचा आतंकी कसाब ही था। 166 लोगों की मौत के दोषी इस नरसंहार में जीवित पकड़े गए आतंकी ने पकड़े जाने के बाद ये कहने में कोई संकोच नहीं किया कि अगर उसके पास और गोला बारूद होता तो वह और कत्लेआम मचाता और ज्यादा से ज्यादा लोगों की जान ले लेता। अब अगर ऐसे क्रूर हत्यारे की मौत पर अगर इस हमले से पीड़ित और इस हमले में अपनो को खो चुके लोग जश्न मना रहे हैं तो ये इंसानियत पर आघात कैसे हो गया। बड़ा सवाल ये है कि क्या ऐसा व्यक्ति मनुष्य कहलाने के योग्य है…? अगर ये मनुष्य होता तो ऐसा अमानवीय काम कभी नहीं करता और सिर्फ अपने आकाओं के एक ऐसे मकसद के लिए कत्लेआम न मचाता...जिस मकसद का रास्ता निर्दोष इंसानों की लाशों से होकर गुजरता है। और ये बात कहां तक जायज है कि निर्दोष लोगों को मारकर मानवता के ये क्रूर दुश्मन तो जमकर जश्न मनाते हैं...लेकिन जब इनकी मौत पर जश्न होता है तो इसे इंसानियत पर आघात कैसे कहा जा सकता है !!! ऐसा तो नहीं था कि कसाब को गिरफ्त में लेने के बाद सीधे मौत की सजा सुना दी गई। कसाब को तो हिंदुस्तान के कानून के मुताबिक अपने बचाव का पूरा मौका दिया गया...इसके बाद दोषी पाए जाने पर ही उसे फांसी पर लटकाया गया। ऐसे दुर्दांत अपराधी की मौत पर गम करना उन पीडितों के साथ निश्चित तौर पर अन्याय कहलाएगा...जिन्होंने इस आतंकी हमले में अपनों को खोया है...किसी ने अपने माता- पिता को खोया तो किसी ने अपने भाई- बहिन को...जिसकी कमी शायद ही कभी पूरी हो पाएगी...असमय ही किसी अपने को खोने का गम क्या होता है ये तो वही बता सकता है जिस पर बीतती है। जहां तक इंसानियत के नाम पर व्यक्तिगत भावनाओं को दरकिनार करने की बात है...तो पहली चीज तो ये है कि इंसानियत से बड़ा धर्म कोई नहीं है....जो व्यक्ति दूसरों के सुख दुख को न समझे...और बेवजह एक ऐसे मकसद के लिए कत्लेआम कर जो अमानवीय हो और निर्दोष लोगों की लाशों से होकर गुजरता है तो ऐसे व्यक्ति की भावनाएं व्यक्तिगत नहीं होती बल्कि ये भावनाएं एक अविकसित दिमाग से होकर उपजती हैं...और ये भावनाएं जब किसी के आंगन का सुख चैन छीनने में आमादा हो तो इंसानियत के नाम पर इन्हें दरकिनार करना ही समस्या का समाधान है। लेकिन अगर ये व्यक्तिगत भावनाएं मुंबई हमले जैसे किसी पीड़ित परिवार के सदस्य या राष्ट्र की हैं...जो कसाब जैसे गुनहगारों की फांसी की वकालत करते हैं तो और उसकी फांसी पर जश्न मनाते हैं तो इसे इंसिनायत पर न तो आघात कहा जएगा औऱ न ही इंसानियत के  खिलाफ क्योंकि कसाब जैसे लोगों को इंसान कहलाने का कोई हक नहीं है...और जिसे इंसान कहलाने का कोई हक नहीं है उसकी व्यक्तिगत भावनाएं को दरकिनार करना ही समझदारी है क्योंकि ये भावनाएं किसी का अहित ही करेंगी।

deepaktiwari555@gmail.com

मंगलवार, 27 नवंबर 2012

जब मनमोहन सिंह बने शोले के गब्बर सिंह !


राजनीति में नेताओं का चरित्र इतनी तेजी से बदलता है...जितनी तेजी से शायद गिरगिट भी रंग न बदल पाती हो। संसद के शीतकालीन सत्र का ही उदाहरण सामने है...विपक्ष लगातार नियम 184 के तहत एफडीआई पर चर्चा की मांग कर रहा था तो वोटिंग से घबराई सरकार नियम 193 पर बहस के लिए तैयार थी...जिसमें वोटिंग का प्रावधान नहीं है। तब शायद सरकार को इस बात का डर था कि अपने पत्ते बंद करके बैठे उनके सहयोगी 184 के तहत चर्चा के बाद वोटिंग में अपना पाला न बदल लें...इसलिए ही सरकार नियम 184 से बचना चाह रही थी...लेकिन जैसे ही सरकार की सबसे बड़ी सहयोगी द्रमुक ने एफडीआई पर सरकार के साथ आने की बात कही और सपा- बसपा ने भी वोटिंग की बजाए सिर्फ चर्चा पर जोर दिया तो सरकार को मानो ऑक्सीजन मिल गई और बदल गई सरकार के मंत्रियों की जुबान। कहने लगे सरकार एफडीआई पर किसी भी नियम के तहत चर्चा के लिए तैयार है। और तो और खामोश रहने वाले हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी शोले फिल्म के गब्बर सिंह की तरह दहाड़ते नजर आए- हमारे पास नंबर है अब ये नंबर एक दिन पहले तक होने के बावजूद सरकार के पास नहीं था...या यूं कहें कि सरकार को खुद के साथ ही अपने सहयोगियों पर भरोसा नहीं था...तो नियम 193 पर ही एफडीआई पर संसद में सरकार बहस के लिए तैयार थी...लेकिन जैसे ही सहयोगी दलों के रूख में एफडीआई पर नरमी हुआ सरकार की जुबान के साथ ही बॉडी लेंग्वेज में गर्मी आ गयी...और सरकार पूरे विश्वास के साथ किसी भी नियम के तहत चर्चा के लिए राजी हो गई। सहयोगियों की नरमी से सरकार भले ही किसी भी नियम के तहत चर्चा के लिए तैयार हो गई हो...लेकिन एफडीआई पर सहयोगियों की नाराजगी अभी भी बनी हुई है। सरकार को बाहर से समर्थन दे रही सपा जहां एफडीआई पर कड़ा रूख अख़्तियार किए हुए है तो सरकार की सबसे बड़ी सहयोगी द्रमुक सिर्फ इसलिए इस मुद्दे पर सरकार के साथ आई है ताकि भाजपा की ताकत न बढ़े...यानि कि सपा और द्रमुक सदन में वोटिंग की स्थिति में कभी भी अपना पाला बदल सकती हैं...हालांकि इसकी संभावना काफी कम है लेकिन ये राजनीति है...यहां अपने सियासी फायदे के लिए कब कौन किसका दोस्त बन जाए....कब कौन किसका दुश्मन बन जाए...कुछ नहीं कहा जा सकता। अब टीएमसी से बड़ा उदाहरण और क्या होगा...कुछ दिन पहले तक सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली टीएमसी को आज इससे ज्यादा खराब सरकार नजर ही नहीं आती।
deepaktiwari555@gmail.com

जेठमलानी ने क्या गलत कहा ?


भाजपा के राम यानि राम जेठमलानी के तेवर फिलहाल ढीले पड़ते नहीं दिखाई दे रहे हैं। भाजपा की तरफ से कारण बताओ नोटिस जारी होने के बाद जेठमलानी के तेवर और उग्र हो गए हैं और अब जेठमलानी ने ये कहकर खुद की भाजपा से विदाई पर मुहर लगा दी है कि वे नोटिस का...अगर उन्हें वाजिब लगेगा तो जवाब देंगे नहीं तो नोटिस को कूड़ेदान में फेंक देंगे। वहीं भाजपा ने गडकरी को लिखे जेठमलानी के पत्र को भी जवाब न देने लायक कहते हुए इससे पल्ला झाड़ने की कोशिश की है। गौरतलब है कि जेठमलानी ने कहा था कि उन्होंने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष गडकरी को एक पत्र लिखा है...और गडकरी चाहें तो खत का मजमून सार्वजनिक करें...जेठमलानी ने खत में क्या लिखा था इसका खुलासा उन्होंने नहीं किया। खैर जेठमलानी के तेवरों में कोई बदलाव न होने के बाद अब ये लगभग तय माना जा रहा है कि नोटिस की अवधि समाप्त होने के बाद भाजपा जेठमलानी को पार्टी से बर्खास्त कर देगी। वैसे देखा जाए तो राम जेठमलानी ने वही बातें कही जो आरोपों से घिरे किसी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से कही जानी चाहिए...लेकिन जब खुद की ही पार्टी के अध्यक्ष इन आरोपों के घेरे में हों तो राजनीति और पार्टी का अनुशासन कहता है कि आप अपने नेता का बचाव करो और उन पर लगे आरोपों को झूठा साबित कर दो, भले ही वे आरोप कितने ही गंभीर क्यों न हों...बस जेठमलानी यही नहीं कर पाए...वर्ना दम तो जेठमलानी की बातों में था। इसका मतलब कहीं न कहीं जेठमलानी को सच बोलने का साहस करने की ही सजा मिली...और ये सच इसलिए भी ज्यादा अहम हो जाता है क्योंकि ये सच जेठमलानी ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के खिलाफ बोल दिया...औऱ अमूमन सच बोलने का साहस नेता नहीं जुटा पाते हैं...वो भी अपनी ही पार्ट के खिलाफ। सच बोलने के बाद जिस तरह जेठमलानी ने भाजपा की चेतावनी और कार्रवाई की धमकी के बाद भी अपने तेवरों में कोई बदलाव नहीं किया उससे ये जाहिर होता है कि जेठमलानी भी कहीं न कहीं जान गए हैं कि वे अब बहुत आगे निकल गए हैं और अब इस राह पर वापस लौटना उनके बस से बाहर है। वैसे भी जेठमलानी के तेवरों को देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि अगर भाजपा जेठमलानी की बातों को तूल देगी तो कहीं न कहीं फजीहत भाजपा की ही होगी...शायद भाजपा भी अब नोटिस अवधि समाप्त होने का इंतजार कर रही है ताकि जेठमलानी की पार्टी से बर्खास्तगी की कार्रवाई को पूरा किया जा सके। बहरहाल अब देखना ये होगा कि जेठमलानी नोटिस अवधि के दौरान यू टर्न लेते हैं या फिर भाजपा वर्सेस राम जेठमलानी का चैप्टर जेठमलानी की बर्खास्तगी के साथ क्लोज हो जाएगा।
deepaktiwari555@gmail.com

सोमवार, 26 नवंबर 2012

मुद्दा नियम नहीं...मुद्दा है कि बहस हो


संसद के शीतकालीन सत्र में एफडीआई पर विपक्ष के हंगामे की बर्फ पिघलने का नाम नहीं ले रही है। एफडीआई पर नियम 184 के तहत चर्चा और वोटिंग कराने की मांग पर अड़ी मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा अपने स्टैंड से पीछे हटने को तैयार नहीं हैऐसे में सवाल ये उठने लगा है कि क्या शीतकालीन सत्र का हाल भी मानसून सत्र की तरह ही होगा या फिर एफडीआई पर बना गतिरोध दूर होगा। खैर गतिरोध को दूर करने की कवायद जारी हैदेखते हैं ये कवायद क्या रंग लाती है। जिस एफडीआई को लेकर हो हल्ला मचा है उसकी ही बात करें तो सरकार इसे आर्थिक सुधारों के तहत लिया गया फैसला बता रही रही तो इसका विरोध कर रहे समूचे विपक्ष के साथ ही सरकार के कुछ सहयोगियों को एफडीआई पर सरकार का ये फैसला रास नहीं आ रहा है। किसी भी चीज के दो पक्ष होते हैंएक सकारात्मक पक्ष और दूसरा नकारात्मक पक्षबस जरूरत इस बात की है कि आप उसे किस नजर से देख रहे हैं। ठीक इसी तरह हर चीज की तरह एफडीआई के भी दो पक्ष हैंएक सकारात्मक और दूसरा नकारात्मक। सरकार को एफडीआई का सकारात्मक पक्ष दिखाई दे रहा हैजो बताता है कि एफडीआई देश के आर्थिक सुधारों की दिशा में एक बड़ा फैसला हैसाथ ही एफडीआई से रोजगार के अवसर बढ़ेंगेबिचौलियों की भूमिका खत्म होने से सीधे किसानों को उनकी उपज का उचित दाम मिलेगाउत्पादों के भंडारण में मदद मिलने से उत्पाद जल्द खराब नहीं होंगे। विदेशी कंपनियों को कम से कम 30 फीसदी सामान भारतीय बाजार से ही लेना होगाइससे देश में नई तकनीक आएगीऔर लोगों की आय बढ़ेगी। उत्पाद सस्ते होने से उपभोक्ताओं को इसका सीधा फायद मिलेगा। वहीं विपक्ष को एफडीआई का नकारात्मक पक्ष दिखाई दे रहा है जो बताता है किएफडीआई के आने से छोटे और मझले व्यापारी खत्म हो जाएंगेविदेशी कंपनियां सस्ते दामों पर सामान बेचेंगे, जिससे छोटे और मझले व्यापारी इनसे मुकाबला नहीं कर पाएंगे और उनके लिए रोजी रोटी का संकट खड़ा हो जाएगाइसके साथ विदेशी कंपनियां अपने बाजार से सामान खरीदेंगीऐसे में घरेलू बाजार से नौकरियां छिनने का खतरा पैदा हो जाएगाविदेशी कंपनियां बाजार का विस्तार करने की बजाए मौजूदा बाजार पर काबिज हो जाएंगी, जिससे खुदरा बाजार से जुड़े 4 करोड़ लोगों पर इसका असर पड़ेगा। ऐसे और तमाम कारक हैं जिसकी वजह से एफडीआई को लेकर बहस छिड़ी है कि ये हिंदुस्तान के लिए फायदेमंद है या नुकसानदायक। बड़ा सवाल ये है कि अगर हर चीज के नकारात्मक पक्ष को देखा जाए तो फिर तो कोई नई चीज भले ही उसके अच्छे फायदे भी हों वो आकार ले ही नहीं सकतीफिर एफडीआई क्या चीज है। दुर्भाग्य ये है कि एफडीआई के सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों को जानने की बजाएउस पर बहस होने की बजाएहमारी सरकार और विपक्ष इस बात को लेकर लड़ रहे हैं कि बहस किस नियम के तहत होइन सबको शायद बहस से ज्यादा चिंता अपने राजनीतिक फायदे की है। विपक्ष 184 के तहत वोटिंग वाले प्रावधान पर बहस पर ये सोचकर अड़ा है कि शायद ये तीर निशाने पर लग जाए और सरकार को अस्थिर करने की कोशिश की जाएजबकि सरकार 193 पर बहस के लिए तैयार दिखाई देती है क्योंकि उसमें वोटिंग का प्रावधान नहीं हैयानि सरकार सिर्फ बहस कराकर ही बचना चाह रही है और वोटिंग का सामना करने के लिए तैयार नहीं है। अगर संसद में एफडीआई पर बहस होती है तो एफडीआई के कई ऐसे पहलू निकल कर सामने आ सकते हैं कि जिससे शायद देश की जनता अब तक अंजान होयानि कि बहस होना पहली शर्त है न कि ये कि बहस किस नियम के तहत हो।

deepaktiwari555@gmail.com

रविवार, 25 नवंबर 2012

ये पब्लिक है...सब जानती है


राम के नाम पर राजनीति करने वाली भाजपा ने आखिर राम को ही राम राम बोल दिया। भाजपा ने जिस राम को बाय बाय बोला वो राम पार्टी की नैया पार लगाने की बजाए पार्टी की नैया डुबाने में लगे हुए थे...ऐसे में मिशन 2014 की तैयारी में लगी भाजपा ने नैया डुबाने वाले राम(जेठमलानी) को बाय बाय बोलने में ही भलाई समझी। भाजपा के लिए अपने बयानों से कांग्रेस नेताओं ने उतनी मुश्किल खड़ी नहीं कि उनकी पार्टी के ही वरिष्ठ नेता राम जेठमलानी ने। राम जेठमलानी ने भाजपा के किसी नेता पर नहीं बल्कि सीधे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पर ही ऊंगली उठाते हुए इस्तीफे का मांग कर डाली। गडकरी के बचाव में एक तरफ संघ के साथ पूरी भाजपा खड़ी थी तो दूसरी तरफ गडकरी का इस्तीफा मांगकर जेठमलानी ने पार्टी की जमकर किरकिरी कराई। जेठमलानी यहीं नहीं रूके...उन्होंने सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा की नियुक्ति का विरोध कर रही भाजपा के खिलाफ जाकर सिन्हा की नियुक्ति को सही ठहराते हुए पार्टी नेताओं की ही आलोचना शुरु कर दी। यहां तक तो पार्टी ने बर्दाश्त कर लिया लेकिन जेठमलानी कुछ ज्यादा ही ताव में आ गए और उन्होंने पार्टी को उनके खिलाफ कार्रवाई करने की चुनौती देते हुए कह डाला कि- भाजपा के किसी नेता में उनके खिलाफ कार्रवाई करने का साहस ही नहीं है...अब पानी सिर के ऊपर से निकल गया तो भाजपा ने जेठमलानी को राम राम करने में ही भलाई समझी। भाजपा ने भले ही अनुशासन तोड़ने...पार्टी लाइन के खिलाफ बयान देने के साथ ही पार्टी के अध्यक्ष गडकरी पर ऊंगली उठाने पर जेठमलानी को राम राम बोला हो...लेकिन इसके साथ ही कई और सवालों ने जन्म ले लिया है कि क्या भाजपा जेठमलानी के खिलाफ ही कार्रवाई करेगी या फिर यशवंत सिन्हा और शत्रुघन सिन्हा सरीखे नेताओं के खिलाफ भी कोई एक्शन लेगी...जिन्होंने जेठमलानी के सुर में सुर मिलाए थे...? वैसे लगता नहीं कि भाजपा इतना साहस जुटा पाएगी कि जेठमलानी के साथ यशवंत सिन्हा और शत्रुघन सिन्हा जैसे पार्टी के दिग्गज नेताओं पर कार्रवाई करे...वो भी ऐसे वक्त पर जब पार्टी की निगाहें मिशन 2014 पर हैं। लेकिन अनुशासित पार्टी होने का दम भरने वाली भाजपा अगर ऐसा कदम उठाती है और अध्यक्ष के खिलाफ बोलने वालों को पार्टी से बाय बाय बोलती है तो सवाल ये भी उठता है की भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी की कीमत पर पार्टी आखिर कितने नेताओं की बलि लेगी...वो भी सिर्फ इसलिए कि गडकरी पर संघ का आशीर्वाद जमकर बरस रहा है। खैर ये सब पार्टी के खिलाफ, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के खिलाफ बोलने वाले उन नेताओं पर भी निर्भर करता है कि क्या वे जेठमलानी चैप्टर से सबक लेते हैं या नहीं। जेठमलानी की विदाई के साथ ही एक और प्रश्न खड़ा होता है कि राजनीति में खुद पर लगे आरोपों पर तो आप पर्दा डालते हैं...जबकि विपक्षियों पर ऐसे ही आरोप लगने पर आप बवंडर खड़ा कर देते हैं…? जेठमलानी के भाजपा से निष्कासन के बाद तो कम से कम ऐसा ही लगता है। भाजपा अध्यक्ष पर लगे आरोपों पर पार्टी का ही कोई नेता सवाल उठाता है तो आपको ये बर्दाश्त नहीं होता...और आप उसको निष्कासित कर देते हैं...लेकिन आपके विपक्षी पर ये आरोप लगते हैं तो आप जमकर हो हल्ला मचाते हैं...ऐसे में आप में और सामने वाले में फर्क ही क्या रह गया…? खैर ये राजनीति है इसे जितना समझने की कोशिश करेंगे उतना उलझते जाएंगे क्योंकि राजनीति में नेताओं की चाल औऱ चरित्र हर पल बदलते रहते है...बस इन्हें आपना फायदा नजर आना चाहिएलेकिन नेता जी ये मत भूलिए ये पब्लिक है...ये सब जानती है...आज नहीं तो क्या वक्त आने पर चुनाव में आपको सब समझा देगी।

deepaktiwari555@gmail.com

शनिवार, 24 नवंबर 2012

आगाज़ शानदार...अंज़ाम क्या होगा ?


अन्ना के साथ 15 अगस्त 2011 में अरविंद केजरीवाल का भ्रष्टाचार के खिलाफ और लोकपाल के समर्थन में आगाज़ शानदार था...और इसे देशभर में अपार जनसमर्थन भी मिला। 2 अक्टूबर 2012 को अन्ना से राहें अलग हो जाने के बाद भी केजरीवाल ने किसी न किसी बहाने राजनीतिक दलों पर निशाना साधकर खुद को खबरों में जिंदा रखा हुआ है। अब जबकि केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी के गठन के साथ राजनीतिक दलों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मुद्दे पर नई लड़ाई का आगाज़ राजनीति में ही उतरकर कर दिया है तो ये सवाल भी उठने लगे हैं कि क्या राजनीति के मैदान में सालों से जमे और पारंगत राजनीतिक दलों के नेताओं से आम आदमी पार्टी कैसे और कितना मुकाबला कर पाएगी। इसमें पहला और बड़ा सवाल ये उठता है कि आम आदमी पार्टी के लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ इस लड़ाई में खुद का दामन पाक साफ रखते हुए कितने आगे तक चल पाएंगे...? साथ ही क्या जिस सुराज को लाने की वे बात कर रहे हैं उस मकसद में कामयाब हो पाएंगे...? देश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए तो अरविंद की आम आदमी पार्टी के जरिए ये राह आसान तो बिल्कुल नहीं दिखाई देती। अरविंद के सामने कई चुनौतियां हैं जिसमें सबसे पहली और बड़ी चुनौती लोगों के सामने विकल्प के तौर पर मैदान में उतारने के लिए उन्हें स्वच्छ छवि के उम्मीदवारों को तलाशने की है। अगर अरविंद ये काम कर भी लेते हैं तो दूसरी बड़ी चुनौती अरविंद के साथ ही इन उम्मीदवारों के लिए चुनाव में सालों से राजनीति में सक्रिय राजनीतिक दलों के बाहुबली और पैसे वाले नेताओं से सामना करने का होगा। जनता के भरोसे से अगर आम आदमी पार्टी के लोग चुनाव जीत भी जाते हैं तो भी इनकी संख्या बहुत ज्यादा होने की उम्मीद बहुत कम है...यानि कि अरविंद केजरीवाल की पार्टी का किंग बनने का रास्ता बेहद कठिन है और अगर ये लोग किंग मेकर बनने की स्थिति में आ जाते हैं तो भी ये किसी किंग (राजनीतिक दल) को चाहकर भी समर्थन नहीं दे पाएंगे...क्योंकि ऐसा करने पर कहीं न कहीं ये उन राजनीतिक दलों की जमात में शामिल हो जाएंगे जो इससे पहले इस वादे के साथ जनता के बीच उतरे थे कि वे भ्रष्टाचार के विरोधी हैं...लेकिन बाद में किंग मेकर बनने की स्थिति में आने पर ये लोग अपना स्वार्थ साधते नजर आए थे...और भ्रष्टाचार के सागर में गोते लगाने से भी नहीं चूके थे। बहरहाल राजनीति के पुराने मैदान में पुराने और पारंगत राजनीतिक दिग्गजों के साथ इस नई लड़ाई में अरविंद और उनके योद्धा जनता का भरोसा जीतकर मैदान मारने में कितना कामयाब हो पाते हैं इसका फैसला तो देश की जनता ही करेगी...लेकिन मैदान में उतरने से पहले औऱ उसके बाद जिस तरह अरविंद केजरीवाल ने राजनीतिक दिग्गजों के साथ ही उनको पीछे से समर्थन देने वाले कारपोरेट दिग्गजों की नींद हराम की उससे तो यही लगता है कि बाजी कोई भी मारे लेकिन ये लड़ाई न सिर्फ रोचक होगी बल्कि आने वाले 10 सालों में देश की राजनीति की नई दिशा भी जरूर तय करेगी...उम्मीद करते हैं कि एक नेक मकसद के लिए शुरु हुई ये लड़ाई बिना भटकाव, बिना लालच और बिना स्वार्थ के आगे बढ़े और एक नया इतिहास रचे।

deepaktiwari555@gmail.com

गुरुवार, 22 नवंबर 2012

धर्म नहीं देता जीवन लेने का अधिकार


आयरलैंड में कैथोलिक धर्म के नाम पर डॉक्टर ने जो कुछ वो अपने आप में न सिर्फ दुर्भाग्यपूर्ण हैं बल्कि कई सारे सवालों को इसने जन्म दिया है। सिर्फ धर्म के नाम अगर किसी को अपने जीवन से हाथ धोना पड़ता है तो इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा। हैरानी तब होती है जब ये पता चलता है कि ये काम एक डॉक्टर ने किया है जिसे न सिर्फ भगवान का दूसरा रूप माना जाता है बल्कि डॉक्टर के पास लोग इस उम्मीद से पहुंचते हैं कि डॉक्टर उन्हें एक नया जीवन देगा। लेकिन जब ये डॉक्टर ही धर्म की बेड़ियों में जकड़ा हुआ नजर आए तो फिर क्या किया जा सकता है। इससे बड़ा अन्याय और क्या हो सकता है कि जिसके हाथों में भगवान ने लोगों की जान बचाने की जिम्मेदारी दी है...वही हाथ धर्म के नाम पर किसी व्यक्ति को मौत के मुंह में लेकर जाते हैं। माना की धर्म सर्वोपरी है लेकिन एक डॉक्टर के लिए उसके पेशे से बड़ा धर्म और क्या हो सकता है...? डॉक्टर के लिए अपनी मरीज की जान बचाने से बड़ा धर्म और क्या हो सकता है...? वैसे भी कोई भी धर्म इस बात की ईजाज़त नहीं देता कि धर्म के नाम पर आप किसी की जान ले लें...वो भी अगर एक डॉक्टर ऐसा कर रहा है तो वो तो अपने धर्म के खिलाफ जा रहा है...धर्म का पालन कहां कर रहा है...!!! डॉक्टर के लिए किसी की जान बचाने से बड़ा धर्म और क्या हो सकता है…? इस दुनिया में भिन्न भिन्न तरह के लोग हैं और उनके लिए धर्म ही जीवन का आधार है...और माना इसे न तो नकारा जा सकता है और न ही नजरअंदाज किया जा सकता है...लेकिन मानवता का धर्म कहता है कि किसी की जान बचाने के लिए अगर आपको इस आधार से परे भी जाना पड़े तो आप जाइए क्योंकि किसी की जान बचाने से बड़ा धर्म और कोई नहीं हो सकता...और एक डॉक्टर के लिए तो ये चीजें सबसे पहले लागू होती हैं...क्योंकि उसका पहला धर्म सिर्फ लोगों के प्राणों को बचाने का ही है। जीवन अनमोल है और मनुष्य जीवन बड़ी मुश्किल से प्राप्त होता है (जैसे कहा जाता है) ऐसे में अगर धर्म को मानने वाला किसी की जान बचाने के लिए इसे नकारते हुए और नजरअंदाज करते हुए आगे बढ़ रहा है तो इससे बड़ी बात तो और कोई हो ही नहीं सकती। जहां तक बात है आयरलैंड में हिंदु धर्म की सविता की मौत की तो ये तो कहीं से भी युक्तिसंगत नहीं है कि कैथोलिक धर्म गर्भ में पल रहे बच्चे को गिराने की ईजाज़त नहीं देता तो मां को मरने के लिए छोड़ दिया जाए। यहां न तो धर्म की बात आड़े आने चाहिए और न ही ये कहीं ये युक्तिसंगत है। आयरलैंड के उस डॉक्टर के लिए माना सबसे बड़ा उसका कैथोलिक धर्म है तो डॉक्टर साहब क्या ये बताएंगे कि क्या कैथोलिक धर्म इस बात की ईजाज़त देता है कि आप गर्भ में पल रहे बच्चे को न गिराने का फैसला लेकर मां और बच्चे दोनों की जान ले लो…? डॉक्टर के अबॉर्शन से इंकार करने पर क्या बच्चे की जान बच गई...? डॉक्टर ने एक जान को बचाने के लिए अबॉर्शन से तो इंकार कर दिया लेकिन इसके फेर में तो मां और बच्चे दोनों जान चली गई...न तो आपने बच्चे को ही बचाया और न ही उसको जन्म देने वाली मां को। इस घटना ने न सिर्फ एक बड़ी बहस को जन्म दिया है बल्कि ऐसा सोचने वालों की सोच पर भी ये घटना एक सवालिया निशान लगाती है...खासतौर पर अगर ये सोच एक डॉक्टर की है तो क्योंकि समाज में आमतौर पर कम पढ़े लिखे अंध विश्वास से घिरे लोगों की सोच इस तरह की होती है ऐसा देखने में आता है लेकिन एक डॉक्टर ऐसा सोचता है तो उसे इस पेशे में रहने का कोई हक नहीं है। ये मेरी व्यक्तिगत सोच है...हो सकता है कुछ लोग इससे सहमत हों और कुछ असहमत लेकिन आखिर मैं इतना कहूंगा कि धर्म का आधार बनाकर किसी की जान लेने से बड़ा गुनाह और कई नहीं हो सकता।

deepaktiwari555@gmail.com

सही हो तो डर किस बात का...


संसद के शीतकालीन सत्र में एफडीआई पर सरकार के फैसले को लेकर घमासान मचा है। शीतकालीन सत्र के गर्म आगाज़ ने एहसास करा दिया है कि मानसून सत्र की कहानी एक बार फिर से दोहराने की पूरी पटकथा तैयार हो गई है। एफडीआई को लेकर हो हल्ला मचा है। सरकार कहती है कि एफडीआई पर फैसला देशहित में जनता की भलाई के लिए लिया गया है...जबकि विपक्ष कह रहा है कि सरकार ने विदेशी ताकतों के दबाव में इस फैसले को लिया है और इससे खुदरा व्यापारी सड़क पर आ जाएंगे। सरकार के इस फैसले के खिलाफ ममता बनर्जी अविश्वास प्रस्ताव लाती हैं(जो जरूरी सदस्यों के समर्थन न होने पर नामंजूर हो गया) तो मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा नियम 184 के तहत चर्चा और वोटिंग कराने की मांग करती है...लेकिन सरकार धारा 193 के तहत बहस के लिए तैयार है...जिसमें वोटिंग का प्रावधान नहीं है...यानि की सरकार वोटिंग से बचना चाहती है। बड़ा सवाल ये उठता है कि अगर सरकार कह रही है कि एफडीआई पर फैसला देशहित में है तो सरकार क्यों नियम 184 के तहत चर्चा पर राजी नहीं है...? और अगर भाजपा को लगता है कि सरकार के फैसले गलत हैं और उसके आरोपों में दम है तो क्यों भाजपा धारा 193 के तहत बहस से पीछे हट रही है...? ये साफ जाहिर करता है की सत्तापक्ष को जहां सत्ता के जाने का डर सता रहा है तो मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा के नेताओं में भी कहीं न कहीं कॉन्फिडेंस की कमी है। एफडीआई का विरोध कर रहे विपक्ष का एकजुट न होना भी कहीं न कहीं ये सवाल खड़ा करता है कि क्या विपक्ष को वाकई में जनता के हित की देशहित की चिंता है और वे इसलिए एफडीआई पर सरकार के फैसले का विरोध कर रहे हैं...या फिर आने वाले आण चुनाव के लिहाज से अपने अपने राजनीति फायदे देख रहे हैं। ऐसे वक्त में जब समूचा विपक्ष एफडीआई पर सरकार के फैसले के खिलाफ है तो क्या मुख्य विपक्षी पार्टी होने के नाते भारतीय जनता पार्टी की ये जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे इस मुद्दे पर सरकार को घेरने के लिए दूसरे विपक्षी दलों को एकजुट कर सदन में सरकार को घेरने के लिए सामूहिक रणनीति बनाए...लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि भाजपा शायद अपने दम पर सरकार को घेरने की फिराक में लगी है...और शायद ये नहीं चाहती कि इसका क्रेडिट किसी और दल को भी मिले...शायद यही वजह है कि भाजपा ने ममता के अविश्वास प्रस्ताव से किनारा करते हुए नियम 184 के तहत चर्चा और वोटिंग की मांग कर अलग रास्ता चुना। अब भाजपा इसके पीछे भले ही सदन में ऐसे लोगों को बेनकाब करने की बात कह रही हो...जो सरकार के साथ होने का दम तो भरते हैं...लेकिन कहीं न कहीं सरकार के फैसलों पर आंखे तरेरते हैं...लेकिन भाजपा का ये तर्क फिलहाल तो गले नहीं उतरता। बहरहाल शीतकालीन सत्र का पहला दिन जिस तरह विपक्ष के हंगामे की गर्मी में झुलसता हुआ दिखाई दिया...उससे तो यहीं लग रहा है कि शीतकालीन सत्र में आगे की राह सरकार के लिए आसान तो बिल्कुल नहीं है।
deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 21 नवंबर 2012

कसाब की मौत का सच


मुंबई हमले के आतंकी कसाब की फांसी को लेकर तमाम सवाल उठ रहे हैं। खासकर सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर कसाब को फांसी की खबरें खूब तैर रही हैं...भारतवासी खुशी का ईजहार कर रहे हैं तो कई ऐसे कमेंट भी इन साइट्स में तैरते हुए नजर आए जो कसाब की फांसी पर सवालिया निशान लगाते दिखे। खासकर क्या कसाब की मौत डेंगू से हुई है...? जैसे पोस्ट ने कहीं न कहीं लोगों को ये सोचने पर जरूर मजबूर कर दिया है कि आखिर कसाब की मौत का सच क्या है...? क्या सरकार ने डेंगू से कसाब की मौत होने के बाद उसे फांसी का रूप देने की कोशिश की गई और शायद इसलिए ही फांसी को पूरी तरह से गुपचुप रखा गया। ये सवाल इसलिए भी उठता है क्योंकि कहीं न कहीं कसाब और उसके जैसे कई लोगों को फांसी की सजा मुकर्रर होने के बाद भी लंबे समय तक उन्हें फांसी पर नहीं लटकाया गया। खैर ऐसे कई सवाल और भी हैं मसलन संसद पर हमले के आरोपी अफज़ल गुरु का क्या होगा...? उसे कब कसाब की तरह फांसी देकर उसके अंजाम तक पहुंचाया जाएगा। देर सबरे कसाब को गुपचुप दी गई फांसी और अफजल गुरु को कब फांसी पर लटकाया जाएगा इसका जवाब भी सामने आ ही जाएगा। कसाब की फांसी को दूसरे पहलू से देखें तो एक और सवाल उठता है कि अगर वाकई में कसाब की मौत डेंगू से नहीं बल्कि उसे फांसी दी गई है तो फिर सरकार ने कसाब को फांसी देने के लिए शीतकालीन सत्र से ठीक पहले का वक्त क्यों चुना...? इस वक्त को सिर्फ शीतकालीन सत्र से पहले के वक्त के तौर पर न देखा जाए...क्योंकि ये वक्त 2014 के आम चुनाव से ठीक पहले का भी वक्त है। क्या यूपीए सरकार ने 2014 के आम चुनाव में कसाब की फांसी के बहाने देश की जनता की सहानुभूति बटोरने की कोशिश करते हुए वोटों को साधने की कवायद तो नहीं की है...? इन सारे पहलुओं को जोड़ा जाए तो सामने आता है कि वर्तमान में यूपीए सरकार अपने कुछ फैसलों को लेकर खासी मुश्किलें में घिरी हुई है और जिसमें भ्रष्टाचार, घोटाले, एफडीआई और महंगाई खास हैं। 22 नवंबर से शुरु हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र में जहां विपक्षी दलों ने सरकार को एफडीआई के मुद्दे पर घेरने की पूरी तैयारी कर ली है वहीं अविश्वास प्रस्ताव की तलवार भी सरकार के सिर पर लटक रही है। ऐसे में क्या शीतकालीन सत्र से ठीक पहले मुंबई हमले के दोषी आतंकी कसाब को फांसी देने का सरकार का फैसला क्या इन मुद्दों से विपक्ष और जनता का ध्यान हटाने की कवायद तो नहीं है...?
deepaktiwari555@gmail.com

मंगलवार, 20 नवंबर 2012

“अविश्वास” का नफ़ा नुकसान


संसद के शीतकालीन सत्र से पहले अविश्वास प्रस्ताव को लेकर हंगामा मचा है। कभी सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी ने मानो सरकार को गिराने की ठान ली है। एफडीआई के मुद्दे पर सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की बात कहते हुए ममता ने इसके लिए कवायद तो तेज कर दी है...लेकिन विपक्षी दलों में आपस में ही अविश्वास के चलते ममता की कवायद फिलहाल रंग लाती नहीं दिखाई दे रही है। मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा के साथ ही तमाम राजनीतिक दल अविश्वास प्रस्ताव में अपने नफे नुकसान का आंकलन कर रहे हैं...शायद यही वजह है कि अविश्वास प्रस्ताव पर किसी ने भी खुलकर अपने पत्ते नहीं खोले हैं। एनडीए ने एफडीआई के विरोध में मत विभाजन का प्रस्ताव लाने की बात कहते हुए अविश्वास प्रस्ताव पर भी अपने विकल्प खुले रखे हैं...यानि कि अविश्वास प्रस्ताव को लेकर एनडीए के पत्ते अभी पूरी तरह खुले नहीं हैं। कुछ ऐसा ही हाल सरकार को बाहर से समर्थन दे रही सपा और बसपा का भी है और दोनों ने अभी तक अविश्वास प्रस्ताव पर चुप्पी साध रखी है तो डीएमके ने भी इस पर सस्पेंस बरकरार रखा है। लेफ्ट की अगर बात करें तो लेफ्ट भी अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में फिलहाल नहीं दिखाई दे रहा है। एनडीए की अगर बात करें तो जाहिर सी बात है कि अगर सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर एनडीए ममता के साथ जाता है और अविश्वास प्रस्ताव सदन में गिर जाता है तो इससे न सिर्फ ममता के साथ ही एनडीए की किरकिरी होगी बल्कि सरकार भी मजबूत होगी और ऐसे समय में एनडीए कतई ये नहीं चाहेगा कि सरकार फिलहाल किसी मुश्किल से बाहर निकले और मजबूत हो। वहीं लेफ्ट अपने नफ़े नुकसान का आंकलन कर रहा है...लेफ्ट शायद अभी चुनाव के लिए तैयार नहीं है क्योंकि लेफ्ट नेता इतनी जल्दी पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव को नहीं भूले होंगे और जानते हैं कि ममता की हवा पश्चिम बंगाल में मध्यावधि चुनाव होने की स्थिति में उसका गणित बिगाड़ सकते हैं। जबकि ममता इसलिए अविश्वास प्रस्ताव के लिए जोर भर रही हैं ताकि पश्चिम बंगाल में टीएमसी के पक्ष में बनी हवा को भुनाया जा सके और ज्यादा से ज्यादा सीटों पर विजय पताका फहराई जा सके। लेफ्ट की जैसी स्थिति में उत्तर प्रदेश में बसपा की दिख रही है तो पश्चिम बंगाल की तरह टीएमसी की स्थिति में सपा उत्तर प्रदेश में नजर आ रही है और दोनों ही दल यहां भी अपने अपने नफा नुकसान के गणित में उलझे नजर आ रहे हैं। सपा जहां टीएमसी की तरह विधानसभा चुनाव की हवा के साथ आम चुनाव की नैया पार कराने की फिराक में है तो बसपा इस हवा का प्रतिरोध करने की स्थिति में नहीं है। कुल मिलाकर विपक्षी दलों के अविश्वास औऱ नफा नुकसान की गणित में फिलहाल कांग्रेस को कुछ हद तक राहत मिलती दिखाई दे रही है...लेकिन ये राहत कब आफत में बदल जाए कहा नहीं जा सकता क्योंकि राजनीति में सब कुछ संभव है और हर मिनट में न सिर्फ राजनीतिक दलों के नेताओं के बयान बदलते हैं बल्कि उनका चरित्र भी बदलते हमने देखा है...ऐसे में तो फिलहाल यही कहा जा सकता है कि एफडीआई के मसले पर मुश्किल का सामना कर रही सरकार के लिए संसद का शीतकालीन सत्र हंगामे की गर्माहट से भरपूर होगा।

deepaktiwari555@gmail.com

भारत में बैन हों सभी सोशल नेटवर्किंग साइट्स


सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने बीते कुछ समय में बहुत तेजी से लोकप्रिय हुई हैं...और इनका इस्तेमाल करने वाले लोगों को संख्या में भी तेजी से ईजाफा हुआ है...लेकिन बाल ठाकरे के निधन के बाद मुंबई बंद पर फेसबुक पर एक लड़की की टिप्पणी पर मुंबई की ठाणे पुलिस ने जिस तेजी से लड़की और उस कमेंट को लाइक करने वाली उसकी सहेली को गिरफ्तार किया उससे तो कम से कम यही जाहिर होता है कि ये बहुत बड़ा अपराध था...इसे मैं बहुत बड़ा अपराध इसलिए कह रहा हूं क्योंकि कई संगीन वारदातें होने के बाद तमाम तरह की बयान बाजियों के बाद भी कभी पुलिस इतनी सक्रिय नहीं दिखाई दी...जितनी सक्रियता पुलिस ने इस मामले में दिखाई उससे तो यही प्रतीत होता है। पुलिस की इस कार्यप्रणाली पर तमाम तरह के मतलब निकालते हैं...पहला तो ये कि लड़की को गिरफ्तार करने वाले पुलिसकर्मी शिवसैनिकों की तरह बाल ठाकरे के अंधभक्त थे...और बाल ठाकरे के खिलाफ ये टिप्पणी बर्दाश्त नहीं कर सके...! दूसरा ये कि शिवसैनिकों के खौफ के आगे पुलिस ने घुटने टेकते हुए ये कार्रवाई की है…! खैर ठाणे पुलिस की इस कार्रवाई का अर्थ समझने वाले समझ ही गए...लेकिन इससे अलग हटकर बात करें तो इससे भी आपत्तिजनक पोस्ट राजनेताओं की सामने आती हैं जिसमें वे अपने पद और गरिमा की मर्यादा का ख्याल न करते हुए अपने विरोधियों को निशाने पर लेते हैं लेकिन तब पुलिस ने इतनी सक्रियता कभी नहीं दिखाई और किसी राजनेता को गिरफ्तार करने की हिम्मत नहीं जुटाई। इस घटना ने तमाम और सवाल खड़े किए हैं कि क्या आम आदमी को सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अपनी बात को अभिव्यक्त करना गलत और गैरकानूनी है...? अगर इसका जवाब हां है तो सरकार को पहले तो सभी सोशल नेटवर्किंग साइट्स को भारत में तत्काल बैन कर देना चाहिए और साथ सही इनका इस्तेमाल कर रहे लोगों में से 90 फीसदी लोगों को भी तत्काल गिरफ्तार कर लेना चाहिए क्योंकि सोशल नेटवर्किंग साईट्स में 90 फीसदी लोगों की पोस्ट कुछ इसी तरह की या कहें कि इससे भी ज्यादा आपत्तिजनक होती है और देश के तमाम राजनीतिक हस्तियों के साथ ही अन्य लोगों के खिलाफ अपना गुस्सा वे इस तरह जाहिर करते हैं। हम लोकतंत्र की बात करते हैं और लोकतंत्र में सबको समान अधिकार होने के साथ ही अपनी बात को अभिव्यक्त करने की आजाद हर किसी के पास हैऐसे में पुलिस की इस कार्रवाई को वाजिब को बिल्कुल भी नहीं ठहराया जा सकता।

deepaktiwari555@gmail.com



रविवार, 18 नवंबर 2012

हारे हुए घोड़े पर कांग्रेस का दांव !


कांग्रेस ने राहुल गांधी को चुनाव समन्वय समिति का अध्यक्ष बनाकर राहुल गांधी को 2014 के लिए कांग्रेस का चेहरा प्रोजेक्ट करने की कोशिश की है...और जिस तरह राहुल को चुनाव समन्वय समिति का अध्यक्ष बनाने के बाद जिस तरह एक बार फिर से कांग्रेस नेता चाटुकारिता की हदें पार कर रहे हैं उससे तो कम से कम यही जाहिर होता है कि 2014 में कांग्रेस की कमान राहुल गांधी के हाथों में ही रहेगी और मनमोहन सिंह के रिटायरमेंट के बाद पीएम की कुर्सी राहुल गांधी ही संभालेंगे (अगर कांग्रेस महंगाई और भ्रष्टाचार पर जनता के कोप से बच गई तो)। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आखिर सोनिया गांधी ने बिहार और उत्तर प्रदेश में राहुल के नेतृत्व में करारी शिकस्त के बाद एक बार फिर से क्यों हारे हुए खिलाड़ी (कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी) पर दांव खेला है। कहीं कांग्रेस ये तो नहीं सोच रही कि राहुल गांधी के ऊर्जावान और युवा (जो कांग्रेसी कहते हैं) चेहरे के पीछे यूपीए सरकार पर लगे काले धब्बे (भ्रष्टाचार, घोटाले, महंगाई आदि) छिप जाएंगे और राहुल के बहाने युवा वोटरों को साधकर यूपीए सरकार अपनी हैट्रिक पूरी कर लेगी। खैर इसका जवाब को अगले आम चुनाव (2014 में प्रस्तावित) में देश की जनता ही देगी...लेकिन देश के वर्तमान हालात और महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों का गुस्सा देखकर तो यह अंदाजा लग रहा है कि यूपीए सरकार अपनी हैट्रिक पूरी करे न करे...लेकिन बिहार और उत्तर प्रदेश में राहुल के नेतृत्व में करारी शिकस्त के बाद राहुल गांधी भरी जवानी में सत्ता का स्वाद चखे बिना (अन ऑफिशियली सत्ता को राहुल और सोनिया के हाथ में ही है) राहुल अपने नेतृत्व में करारी शिकस्त का रिकार्ड जरूर बना देंगे। राहुल के इस नए रिकार्ड को बनाने में सोनिया ने कोई कसर नहीं छोड़ी है और कांग्रेस के बयानवीर दिग्विजय सिंह को भी राहुल के साथ लगा दिया है (सोनिया ने तो कुछ और ही सोचा होगा)। कुछ भी हो लेकिन एक बात तो माननी पड़ेगी कि सोनिया गांधी के लाल राहुल गांधी में दम तो है...राहुल भले ही राजनीति के नवजात हों...लेकिन दशकों से राजनीति कर रहे कांग्रेस के दिग्गज से दिग्गज नेता भी राहुल की प्रशंसा करते नहीं अघाते...लगता है इन दिग्गजों की तेज आंखों को पूत(राहुल गांधी) के पांव पालने में ही दिखाई दे गए हैं...साथ ही इन कांग्रेसी दिग्गजों की गांधी खानदान की इस चाटुकारिता को अपने बुढ़ापे को संवारने की कवायद के रूप में भी देखा जा सकता है...क्योंकि कांग्रेस में चाटुकारों को गांधी परिवार की सेवा औऱ भक्ती का ईनाम जरूर मिलता है...अब देश की पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल(इनके बारे में मैंने कहीं पढ़ा था कि ये सोनिया गांधी की सास और भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लिए खाना बनाती थी) या फिर हाल में उत्तराखंड के राज्यपाल बने अज़ीज़ कुरैशी साहब का ही उदाहरण देख लेते हैं (उत्तराकंड का राज्यपाल बनते ही इन्होंने खुद कहा था कि गांधी खानदान की वफादारी का ईनाम उन्हें मिला है) या फिर सबसे ताजा उदाहरण केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद साहब का ही ले लेते हैं...जिन्हें सोनिया भक्ति पर सोनिया गांधी ने ईनाम देते हुए भ्रष्टाचार के तमाम आरोप लगने के बाद भी प्रमोट कर विदेश मंत्री बना दिया। बहरहाल राजनीति में ये कोई नई बात नहीं है...मुद्दा वही है कि क्या राहुल गांधी यूपीए सरकार की हैट्रिक लगवा पाएंगे या फिर बिहार और उत्तर प्रदेश के बाद जाने अनजाने खुद की हैट्रिक लगा लेंगे। कई लोगों को मेरे विचार पढ़ने के बाद शायद लग रहा होगा कि ये साहब तो कांग्रेस से खार खाए बैठे हैं...इसलिए जमकर कांग्रेस के खिलाफ कलम घिस रहे हैं (ऐसा है नहीं)...अगर ऐसा सोच रहे हैं तो एक सवाल आप से भी क्या यूपीए सरकार की तमाम उपलब्धियां (भ्रष्टाचार, महंगाई, घोटाले और भी जाने क्या क्या) ये सब बयां नहीं कर रही जो मैंने लिखने की कोशिश की है। मन में कुछ हो तो विनम्र आग्रह है कि अपने विचार (कमेंट बॉक्स) में प्रकट करने से चूकिएगा मत।

deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 14 नवंबर 2012

क्यों बेशर्म है पुलिस ?


बलात्कार एक ऐसी घटना है जो कहीं न कहीं पीड़िता और उसके परिजनों के लिए समाज के बीच में एक दीवार खड़ी कर देता है...जबकि दोष पीड़िता और उसके परिजनों का नहीं बल्कि समाज में मनुष्य के भेष में घूम रहे ऐसे भेड़ियों का होता है...जो किसी मानसिक विकृति के शिकार होते हैं। बलात्कार के मामले में पीड़िता के साथ ही पीड़िता के परिजनों को भी न सिर्फ मुश्किल बल्कि शर्मनाक दौर से गुजरना पड़ता है। ऐसे में अक्सर इन सब चीजों से बचने के लिए अधिकतर मामलों में पीड़िता और पीड़िता के परिजन पुलिस में शिकायत करने से भी घबराते हैं। जो लोग शिकायत करने भी पुलिस के पास जाने की हिम्मत जुटाते हैं तो रही सही कसर हमारी पुलिस पूरी कर देती है। पुलिस का रवैया शर्मनाक ही नहीं बल्कि बहुत आपत्तिजनक होता है...वे दोषियों को पकड़ने में कम बल्कि ऐसे ऐसे सवाल पीड़िता और पीड़िता के परिजनों से करते हैं मानो अपराध बलात्कारियों ने नहीं बल्कि पीड़िता और उसके परिजनों ने किया हो...कुछ एक अपवाद छोड़ दें तो अधिकतर मामलों में तस्वीर कुछ ऐसी ही होती है। कुछ एक मामलों में पुलिस का रवैया अत्यंत सहयोगात्मक भी देखने को मिला है...जो मैंने अपनी पत्रकारिता के दौरान महसूस किया है। खैर बड़ी संख्या में ये स्थिति देखने तो नहीं मिलती है। बलात्कार के अधिकतर मामलों में आरोपी बड़े परिवार से संबंध रखने वाले होते हैं...और समाज के साथ ही राजनीति में भी उनका खासा रसूख देखने को मिलता है....ऐसे में कहीं न कहीं इनके आगे पुलिस भी घुटने टेकते नजर आती है। बलात्कार के मामलों में रसूखदारों के आगे पुलिस की एक नहीं चलती या यूं कहें कि पैसे और ताकत के आगे पुलिस गांधी जी के तीन बंदरों की समान हो जाती है और पुलिस की नाक, कान और आंख सब बंद हो जाती है। अगर गहराई से देखें तो किसी थाने का थानेदार अगर चाहे तो उसके इलाके में अपराध 90 प्रतिशत तक कम हो सकते हैं....बशर्ते वह ऐसा चाहे...लेकिन अफसोस ऐसा होता नहीं है। खासकर बलात्कार के मामलों में तो पीड़िता आसानी से दोषियों की पहचान कर सकती है...लेकिन पुलिस इन मामलों में हाथ पर हाथ धरे बैठे रहती है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि बलात्कार के कुछ एक मामलों में बलात्कार की पीड़िता झूठे आरोप लगाकार कुछ लोगं को फंसाने की कोशिश करती हैं...या कहें अपने फायदे के लिए ऐसे आरोप लगाती हैं...लेकिन ये मामले इतने कम देखने में आते हैं कि ऊंगलियों में गिने जा सकते हैं। बलात्कार की घटना पीड़िता के जीवन में घटित एक ऐसी घटना है कि मैं तो कम से कम ये नहीं मानता कि कोई पीड़िता जानबूझकर अपने फायदे के लिए खुद बलात्कार की पीड़िता कहलाना पसंद करेगी...ये सब कुछ पीड़िता के सामाजिक चरित्र पर भी निर्भर करता है...वो क्या करती है और समाज में उसकी कैसी छवि है....ये सब जानने के बाद ही हम इस बारे में कुछ पूर्वानुमान लगा सकते हैं कि वाकई में जो बलात्कार के आरोप उसने किसी पर लगाए हैं उनमें कितना दम हो सकता है। ये बात सही है कि पुलिस बिना जांच पड़ताल के मामले में दोषी को गिरफ्तार कर ले...या आगे की कार्रवाई करे...जांच  पड़ताल किसी भी घटना का एक बहुत अहम हिस्सा है...लेकिन जिस तरह शिकायत करने पर पुलिस का पहला रिएक्शन रहता है वो कहीं न कहीं पीड़िता के मन से पुलिस का विश्वास डिगाने का काम करता है...ऐसे मामलों में कहीं न कहीं पुलिस का रवैया सहयोगात्मक होना बहुत जरूरी है...माना पुलिस को लगता है कि शिकायत पीड़िता जानबूझकर फंसाने के लिए कर रहा है तो पुलिस को फिर भी पीड़िता की बात को सुनकर उसे कार्रवाई का आश्वासन देना चाहिए...और जांच पड़ताल में पुलिस को लगता है कि शिकायत फर्जी है तो फिर पुलिस शिकायत करने वाले के खिलाफ सख्ती से पेश आते हुए उल्टा उसके खिलाफ कार्रवाई करे...इससे न सिर्फ पुलिस की एक स्वच्छ और सहयोगात्मक छवि आम लोगों के बीच में जाएगी बल्कि अपने फायदे के लिए झूठी शिकायत करने वाले भी ऐसा करने से पहले सौ बार सोचेंगे। बहरहाल वर्तमान स्थिति और पुलिस का रवैया तो कहीं न कहीं पुलिस को सवालों के घेरे में खड़ा तो करता ही है...जो पुलिस के लिए शर्मनाक है और यही स्थिति शायद इसीलिए किसी न्यायाधीश को ये टिप्पणी करने पर मजबूर करती है कि – “बलात्कार के केस में पुलिस पीड़िता के दर्द और उसकी परेशानियों को नजरअंदाज कर देती है...जब तक खुद उनके परिवार में किसी के साथ यह हादसा घटित नहीं होगा तब तक उन्हें बलात्कार के दर्द का एहसास नहीं होगा

deepaktiwari555@gmail.com

रविवार, 11 नवंबर 2012

ऑटो में आउटिंग


सप्ताहांत में आउटिंग करने का अलग लुत्फ है। जो परिवार वाले हैं वे परिवार के साथ इस पल का आनंद उठाते हैं तो युवा अपने दोस्तों की मंडली के साथ जमकर मस्ती करते हैं। ये हमारे जीवन का आम होने के साथ ही अहम पल होता है। ये पल हर किसी की जिंदगी में आता है...बस इस पल को सेलिब्रेट करने का तरीका अलग है। कुछ लोग सब कुछ होने के बावजूद अपनी रोज की परेशानियों में इस तरह घिरे रहते हैं कि वे इस पल का लुत्फ ही नहीं उठा पाते तो कुछ पैसा कमाने की दौड़ में इस तरह भाग रहे होते हैं कि ये पल उन्हें फिजूल लगते हैं। लेकिन इस सब के बीच कुछ लोग ऐसे होते हैं जो तमाम परेशानियों और अभावों के बावजूद अपने व्यस्तता के बीच ऐसे पल निकाल लेते हैं और इसका जमकर लुत्फ उठाते हैं। एक वाक्या जिसने मुझे इस पर लिखने को मजबूर किया आपके साथ साझा कर रहा हूं। शनिवार का दिन था देहरादून के इंदिरा नगर में दैनिक जागरण के दफ्तर के पास मैं अपने एक मित्र का इंतजार कर रहा था..जो कुछ ही देर में वहां पहुंचने वाला था। जिस स्थान पर मैं खड़ा था वहीं पास में एक व्यक्ति ठेले पर चाऊमीन, मोमो और सूप बेच रहा था। इसी बीच वहां पर आए एक ऑटो आखर रूका तो ऑटो में पीछे की सीट पर एक महिला और दो बच्चे बैठे थे। महिला की उम्र करीब 35 साल रही होगी तो दोनों बच्चों की उम्र 8 और 12 साल रही होगी। ऑटो चालक ऑटो रोककर उसमें बैठी महिला और बच्चों से पूछता है कि उन्हें क्या खाना है...जिस तरह से बच्चे पापा पापा कहते हुए अपनी पसंद की चीजें बता रहे थे उससे ये समझ आ गया था कि ऑटो में उस ऑटो चालक का परिवार था...और ऑटो चालक अपने परिवार को आउटिंग पर लेकर आया था...जिसका जिक्र मैंने ऊपर किया था कि फुर्सत के पलों में या सप्ताहांत में अक्सर लोग आउटिंग पर निकलते हैं। हर कोई अपनी जेब और सुविधा के अनुसार इन पलों का आनंद लेता है और शायद ऑटो चालक की जेब और सुविधा के हिसाब से ये पल उसके जीवन में खास थे...और ये उसका अपना तरीका था परिवार के साथ हफ्ते में कुछ पल बाहर बिताने का या बाहर खाना खाने का। इस वाक्ये से एक बात तो समझ में आती है कि आज की भागदौड़ और आपाधापी से भरी जिंदगी में जहां लोग सिर्फ और सिर्फ पैसे के पीछे भाग रहे हैं और उनके पास अपनों के लिए वक्त नहीं होता...और जो व्यक्ति शायद जितना अमीर होता है शायद ये समस्या उसके साथ उतनी ही ज्यादा है...और शायद वे लोग ज्यादा परेशान भी रहते हैं। यहां पर ये स्पष्ट करना चाहूंगा कि ये बात सौ प्रतिशत लोगों पर लागू हो...ये नहीं कहा जा सकता। जिन लोगों के पास जितना कम पैसा और सीमित आय के साधन होते हैं और जो लोग रोज सुबह घर से बाहर निकलकर दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करते हैं...उनमें अधिकतर लोग अपने लिए अपने परिवार के लिए वक्त निकाल लेते हैं...और परिवार के साथ इस पल का जमकर आनंद लेते हैं और जीवन में खुश भी रहते हैं...या यूं कहें की अभावों और रोजमर्रा की समस्याओं से भरी जिंदगी में वे दो पल खुशी के निकाल लेते हैं। हर किसी के लिए इस वाक्ये के मतलब हो सकता हैं अलग अलग हों...या कुछ लोग इससे सहमत न हों...लेकिन कहीं न कहीं देखा जाए तो ये वाक्या बताता है कि एक आम आदमी जो अभावों में जीवन व्यतीत करता है...कहीं न कहीं कुछ हद तक दूसरे लोगों से ज्यादा खुश देखा जाता है, जबकि जिस व्यक्ति का कद जितना बड़ा होता जाता है शायद ये पल उसके जीवन में उतने कम होते जाते हैं। इस वाक्ये के बाद कम से कम मैंने तो ये महसूस किया कि परिवार के साथ सप्ताहांत में फुर्सत के दों पलों का मतलब सिर्फ ये नहीं कि आपके जेब पैसों से भरी हो और आपके पास के बड़ी गाड़ी हो जिसमें आप अपने परिवार के साथ आउटिंग के लिए निकले और किसी बढ़िया रेस्तरां में खाना खाने जाएं।
  
deepaktiwari555@gmail.com