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बुधवार, 21 नवंबर 2012

कसाब की मौत का सच


मुंबई हमले के आतंकी कसाब की फांसी को लेकर तमाम सवाल उठ रहे हैं। खासकर सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर कसाब को फांसी की खबरें खूब तैर रही हैं...भारतवासी खुशी का ईजहार कर रहे हैं तो कई ऐसे कमेंट भी इन साइट्स में तैरते हुए नजर आए जो कसाब की फांसी पर सवालिया निशान लगाते दिखे। खासकर क्या कसाब की मौत डेंगू से हुई है...? जैसे पोस्ट ने कहीं न कहीं लोगों को ये सोचने पर जरूर मजबूर कर दिया है कि आखिर कसाब की मौत का सच क्या है...? क्या सरकार ने डेंगू से कसाब की मौत होने के बाद उसे फांसी का रूप देने की कोशिश की गई और शायद इसलिए ही फांसी को पूरी तरह से गुपचुप रखा गया। ये सवाल इसलिए भी उठता है क्योंकि कहीं न कहीं कसाब और उसके जैसे कई लोगों को फांसी की सजा मुकर्रर होने के बाद भी लंबे समय तक उन्हें फांसी पर नहीं लटकाया गया। खैर ऐसे कई सवाल और भी हैं मसलन संसद पर हमले के आरोपी अफज़ल गुरु का क्या होगा...? उसे कब कसाब की तरह फांसी देकर उसके अंजाम तक पहुंचाया जाएगा। देर सबरे कसाब को गुपचुप दी गई फांसी और अफजल गुरु को कब फांसी पर लटकाया जाएगा इसका जवाब भी सामने आ ही जाएगा। कसाब की फांसी को दूसरे पहलू से देखें तो एक और सवाल उठता है कि अगर वाकई में कसाब की मौत डेंगू से नहीं बल्कि उसे फांसी दी गई है तो फिर सरकार ने कसाब को फांसी देने के लिए शीतकालीन सत्र से ठीक पहले का वक्त क्यों चुना...? इस वक्त को सिर्फ शीतकालीन सत्र से पहले के वक्त के तौर पर न देखा जाए...क्योंकि ये वक्त 2014 के आम चुनाव से ठीक पहले का भी वक्त है। क्या यूपीए सरकार ने 2014 के आम चुनाव में कसाब की फांसी के बहाने देश की जनता की सहानुभूति बटोरने की कोशिश करते हुए वोटों को साधने की कवायद तो नहीं की है...? इन सारे पहलुओं को जोड़ा जाए तो सामने आता है कि वर्तमान में यूपीए सरकार अपने कुछ फैसलों को लेकर खासी मुश्किलें में घिरी हुई है और जिसमें भ्रष्टाचार, घोटाले, एफडीआई और महंगाई खास हैं। 22 नवंबर से शुरु हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र में जहां विपक्षी दलों ने सरकार को एफडीआई के मुद्दे पर घेरने की पूरी तैयारी कर ली है वहीं अविश्वास प्रस्ताव की तलवार भी सरकार के सिर पर लटक रही है। ऐसे में क्या शीतकालीन सत्र से ठीक पहले मुंबई हमले के दोषी आतंकी कसाब को फांसी देने का सरकार का फैसला क्या इन मुद्दों से विपक्ष और जनता का ध्यान हटाने की कवायद तो नहीं है...?
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मंगलवार, 20 नवंबर 2012

“अविश्वास” का नफ़ा नुकसान


संसद के शीतकालीन सत्र से पहले अविश्वास प्रस्ताव को लेकर हंगामा मचा है। कभी सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी ने मानो सरकार को गिराने की ठान ली है। एफडीआई के मुद्दे पर सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की बात कहते हुए ममता ने इसके लिए कवायद तो तेज कर दी है...लेकिन विपक्षी दलों में आपस में ही अविश्वास के चलते ममता की कवायद फिलहाल रंग लाती नहीं दिखाई दे रही है। मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा के साथ ही तमाम राजनीतिक दल अविश्वास प्रस्ताव में अपने नफे नुकसान का आंकलन कर रहे हैं...शायद यही वजह है कि अविश्वास प्रस्ताव पर किसी ने भी खुलकर अपने पत्ते नहीं खोले हैं। एनडीए ने एफडीआई के विरोध में मत विभाजन का प्रस्ताव लाने की बात कहते हुए अविश्वास प्रस्ताव पर भी अपने विकल्प खुले रखे हैं...यानि कि अविश्वास प्रस्ताव को लेकर एनडीए के पत्ते अभी पूरी तरह खुले नहीं हैं। कुछ ऐसा ही हाल सरकार को बाहर से समर्थन दे रही सपा और बसपा का भी है और दोनों ने अभी तक अविश्वास प्रस्ताव पर चुप्पी साध रखी है तो डीएमके ने भी इस पर सस्पेंस बरकरार रखा है। लेफ्ट की अगर बात करें तो लेफ्ट भी अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में फिलहाल नहीं दिखाई दे रहा है। एनडीए की अगर बात करें तो जाहिर सी बात है कि अगर सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर एनडीए ममता के साथ जाता है और अविश्वास प्रस्ताव सदन में गिर जाता है तो इससे न सिर्फ ममता के साथ ही एनडीए की किरकिरी होगी बल्कि सरकार भी मजबूत होगी और ऐसे समय में एनडीए कतई ये नहीं चाहेगा कि सरकार फिलहाल किसी मुश्किल से बाहर निकले और मजबूत हो। वहीं लेफ्ट अपने नफ़े नुकसान का आंकलन कर रहा है...लेफ्ट शायद अभी चुनाव के लिए तैयार नहीं है क्योंकि लेफ्ट नेता इतनी जल्दी पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव को नहीं भूले होंगे और जानते हैं कि ममता की हवा पश्चिम बंगाल में मध्यावधि चुनाव होने की स्थिति में उसका गणित बिगाड़ सकते हैं। जबकि ममता इसलिए अविश्वास प्रस्ताव के लिए जोर भर रही हैं ताकि पश्चिम बंगाल में टीएमसी के पक्ष में बनी हवा को भुनाया जा सके और ज्यादा से ज्यादा सीटों पर विजय पताका फहराई जा सके। लेफ्ट की जैसी स्थिति में उत्तर प्रदेश में बसपा की दिख रही है तो पश्चिम बंगाल की तरह टीएमसी की स्थिति में सपा उत्तर प्रदेश में नजर आ रही है और दोनों ही दल यहां भी अपने अपने नफा नुकसान के गणित में उलझे नजर आ रहे हैं। सपा जहां टीएमसी की तरह विधानसभा चुनाव की हवा के साथ आम चुनाव की नैया पार कराने की फिराक में है तो बसपा इस हवा का प्रतिरोध करने की स्थिति में नहीं है। कुल मिलाकर विपक्षी दलों के अविश्वास औऱ नफा नुकसान की गणित में फिलहाल कांग्रेस को कुछ हद तक राहत मिलती दिखाई दे रही है...लेकिन ये राहत कब आफत में बदल जाए कहा नहीं जा सकता क्योंकि राजनीति में सब कुछ संभव है और हर मिनट में न सिर्फ राजनीतिक दलों के नेताओं के बयान बदलते हैं बल्कि उनका चरित्र भी बदलते हमने देखा है...ऐसे में तो फिलहाल यही कहा जा सकता है कि एफडीआई के मसले पर मुश्किल का सामना कर रही सरकार के लिए संसद का शीतकालीन सत्र हंगामे की गर्माहट से भरपूर होगा।

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भारत में बैन हों सभी सोशल नेटवर्किंग साइट्स


सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने बीते कुछ समय में बहुत तेजी से लोकप्रिय हुई हैं...और इनका इस्तेमाल करने वाले लोगों को संख्या में भी तेजी से ईजाफा हुआ है...लेकिन बाल ठाकरे के निधन के बाद मुंबई बंद पर फेसबुक पर एक लड़की की टिप्पणी पर मुंबई की ठाणे पुलिस ने जिस तेजी से लड़की और उस कमेंट को लाइक करने वाली उसकी सहेली को गिरफ्तार किया उससे तो कम से कम यही जाहिर होता है कि ये बहुत बड़ा अपराध था...इसे मैं बहुत बड़ा अपराध इसलिए कह रहा हूं क्योंकि कई संगीन वारदातें होने के बाद तमाम तरह की बयान बाजियों के बाद भी कभी पुलिस इतनी सक्रिय नहीं दिखाई दी...जितनी सक्रियता पुलिस ने इस मामले में दिखाई उससे तो यही प्रतीत होता है। पुलिस की इस कार्यप्रणाली पर तमाम तरह के मतलब निकालते हैं...पहला तो ये कि लड़की को गिरफ्तार करने वाले पुलिसकर्मी शिवसैनिकों की तरह बाल ठाकरे के अंधभक्त थे...और बाल ठाकरे के खिलाफ ये टिप्पणी बर्दाश्त नहीं कर सके...! दूसरा ये कि शिवसैनिकों के खौफ के आगे पुलिस ने घुटने टेकते हुए ये कार्रवाई की है…! खैर ठाणे पुलिस की इस कार्रवाई का अर्थ समझने वाले समझ ही गए...लेकिन इससे अलग हटकर बात करें तो इससे भी आपत्तिजनक पोस्ट राजनेताओं की सामने आती हैं जिसमें वे अपने पद और गरिमा की मर्यादा का ख्याल न करते हुए अपने विरोधियों को निशाने पर लेते हैं लेकिन तब पुलिस ने इतनी सक्रियता कभी नहीं दिखाई और किसी राजनेता को गिरफ्तार करने की हिम्मत नहीं जुटाई। इस घटना ने तमाम और सवाल खड़े किए हैं कि क्या आम आदमी को सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अपनी बात को अभिव्यक्त करना गलत और गैरकानूनी है...? अगर इसका जवाब हां है तो सरकार को पहले तो सभी सोशल नेटवर्किंग साइट्स को भारत में तत्काल बैन कर देना चाहिए और साथ सही इनका इस्तेमाल कर रहे लोगों में से 90 फीसदी लोगों को भी तत्काल गिरफ्तार कर लेना चाहिए क्योंकि सोशल नेटवर्किंग साईट्स में 90 फीसदी लोगों की पोस्ट कुछ इसी तरह की या कहें कि इससे भी ज्यादा आपत्तिजनक होती है और देश के तमाम राजनीतिक हस्तियों के साथ ही अन्य लोगों के खिलाफ अपना गुस्सा वे इस तरह जाहिर करते हैं। हम लोकतंत्र की बात करते हैं और लोकतंत्र में सबको समान अधिकार होने के साथ ही अपनी बात को अभिव्यक्त करने की आजाद हर किसी के पास हैऐसे में पुलिस की इस कार्रवाई को वाजिब को बिल्कुल भी नहीं ठहराया जा सकता।

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रविवार, 18 नवंबर 2012

हारे हुए घोड़े पर कांग्रेस का दांव !


कांग्रेस ने राहुल गांधी को चुनाव समन्वय समिति का अध्यक्ष बनाकर राहुल गांधी को 2014 के लिए कांग्रेस का चेहरा प्रोजेक्ट करने की कोशिश की है...और जिस तरह राहुल को चुनाव समन्वय समिति का अध्यक्ष बनाने के बाद जिस तरह एक बार फिर से कांग्रेस नेता चाटुकारिता की हदें पार कर रहे हैं उससे तो कम से कम यही जाहिर होता है कि 2014 में कांग्रेस की कमान राहुल गांधी के हाथों में ही रहेगी और मनमोहन सिंह के रिटायरमेंट के बाद पीएम की कुर्सी राहुल गांधी ही संभालेंगे (अगर कांग्रेस महंगाई और भ्रष्टाचार पर जनता के कोप से बच गई तो)। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आखिर सोनिया गांधी ने बिहार और उत्तर प्रदेश में राहुल के नेतृत्व में करारी शिकस्त के बाद एक बार फिर से क्यों हारे हुए खिलाड़ी (कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी) पर दांव खेला है। कहीं कांग्रेस ये तो नहीं सोच रही कि राहुल गांधी के ऊर्जावान और युवा (जो कांग्रेसी कहते हैं) चेहरे के पीछे यूपीए सरकार पर लगे काले धब्बे (भ्रष्टाचार, घोटाले, महंगाई आदि) छिप जाएंगे और राहुल के बहाने युवा वोटरों को साधकर यूपीए सरकार अपनी हैट्रिक पूरी कर लेगी। खैर इसका जवाब को अगले आम चुनाव (2014 में प्रस्तावित) में देश की जनता ही देगी...लेकिन देश के वर्तमान हालात और महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों का गुस्सा देखकर तो यह अंदाजा लग रहा है कि यूपीए सरकार अपनी हैट्रिक पूरी करे न करे...लेकिन बिहार और उत्तर प्रदेश में राहुल के नेतृत्व में करारी शिकस्त के बाद राहुल गांधी भरी जवानी में सत्ता का स्वाद चखे बिना (अन ऑफिशियली सत्ता को राहुल और सोनिया के हाथ में ही है) राहुल अपने नेतृत्व में करारी शिकस्त का रिकार्ड जरूर बना देंगे। राहुल के इस नए रिकार्ड को बनाने में सोनिया ने कोई कसर नहीं छोड़ी है और कांग्रेस के बयानवीर दिग्विजय सिंह को भी राहुल के साथ लगा दिया है (सोनिया ने तो कुछ और ही सोचा होगा)। कुछ भी हो लेकिन एक बात तो माननी पड़ेगी कि सोनिया गांधी के लाल राहुल गांधी में दम तो है...राहुल भले ही राजनीति के नवजात हों...लेकिन दशकों से राजनीति कर रहे कांग्रेस के दिग्गज से दिग्गज नेता भी राहुल की प्रशंसा करते नहीं अघाते...लगता है इन दिग्गजों की तेज आंखों को पूत(राहुल गांधी) के पांव पालने में ही दिखाई दे गए हैं...साथ ही इन कांग्रेसी दिग्गजों की गांधी खानदान की इस चाटुकारिता को अपने बुढ़ापे को संवारने की कवायद के रूप में भी देखा जा सकता है...क्योंकि कांग्रेस में चाटुकारों को गांधी परिवार की सेवा औऱ भक्ती का ईनाम जरूर मिलता है...अब देश की पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल(इनके बारे में मैंने कहीं पढ़ा था कि ये सोनिया गांधी की सास और भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लिए खाना बनाती थी) या फिर हाल में उत्तराखंड के राज्यपाल बने अज़ीज़ कुरैशी साहब का ही उदाहरण देख लेते हैं (उत्तराकंड का राज्यपाल बनते ही इन्होंने खुद कहा था कि गांधी खानदान की वफादारी का ईनाम उन्हें मिला है) या फिर सबसे ताजा उदाहरण केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद साहब का ही ले लेते हैं...जिन्हें सोनिया भक्ति पर सोनिया गांधी ने ईनाम देते हुए भ्रष्टाचार के तमाम आरोप लगने के बाद भी प्रमोट कर विदेश मंत्री बना दिया। बहरहाल राजनीति में ये कोई नई बात नहीं है...मुद्दा वही है कि क्या राहुल गांधी यूपीए सरकार की हैट्रिक लगवा पाएंगे या फिर बिहार और उत्तर प्रदेश के बाद जाने अनजाने खुद की हैट्रिक लगा लेंगे। कई लोगों को मेरे विचार पढ़ने के बाद शायद लग रहा होगा कि ये साहब तो कांग्रेस से खार खाए बैठे हैं...इसलिए जमकर कांग्रेस के खिलाफ कलम घिस रहे हैं (ऐसा है नहीं)...अगर ऐसा सोच रहे हैं तो एक सवाल आप से भी क्या यूपीए सरकार की तमाम उपलब्धियां (भ्रष्टाचार, महंगाई, घोटाले और भी जाने क्या क्या) ये सब बयां नहीं कर रही जो मैंने लिखने की कोशिश की है। मन में कुछ हो तो विनम्र आग्रह है कि अपने विचार (कमेंट बॉक्स) में प्रकट करने से चूकिएगा मत।

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बुधवार, 14 नवंबर 2012

क्यों बेशर्म है पुलिस ?


बलात्कार एक ऐसी घटना है जो कहीं न कहीं पीड़िता और उसके परिजनों के लिए समाज के बीच में एक दीवार खड़ी कर देता है...जबकि दोष पीड़िता और उसके परिजनों का नहीं बल्कि समाज में मनुष्य के भेष में घूम रहे ऐसे भेड़ियों का होता है...जो किसी मानसिक विकृति के शिकार होते हैं। बलात्कार के मामले में पीड़िता के साथ ही पीड़िता के परिजनों को भी न सिर्फ मुश्किल बल्कि शर्मनाक दौर से गुजरना पड़ता है। ऐसे में अक्सर इन सब चीजों से बचने के लिए अधिकतर मामलों में पीड़िता और पीड़िता के परिजन पुलिस में शिकायत करने से भी घबराते हैं। जो लोग शिकायत करने भी पुलिस के पास जाने की हिम्मत जुटाते हैं तो रही सही कसर हमारी पुलिस पूरी कर देती है। पुलिस का रवैया शर्मनाक ही नहीं बल्कि बहुत आपत्तिजनक होता है...वे दोषियों को पकड़ने में कम बल्कि ऐसे ऐसे सवाल पीड़िता और पीड़िता के परिजनों से करते हैं मानो अपराध बलात्कारियों ने नहीं बल्कि पीड़िता और उसके परिजनों ने किया हो...कुछ एक अपवाद छोड़ दें तो अधिकतर मामलों में तस्वीर कुछ ऐसी ही होती है। कुछ एक मामलों में पुलिस का रवैया अत्यंत सहयोगात्मक भी देखने को मिला है...जो मैंने अपनी पत्रकारिता के दौरान महसूस किया है। खैर बड़ी संख्या में ये स्थिति देखने तो नहीं मिलती है। बलात्कार के अधिकतर मामलों में आरोपी बड़े परिवार से संबंध रखने वाले होते हैं...और समाज के साथ ही राजनीति में भी उनका खासा रसूख देखने को मिलता है....ऐसे में कहीं न कहीं इनके आगे पुलिस भी घुटने टेकते नजर आती है। बलात्कार के मामलों में रसूखदारों के आगे पुलिस की एक नहीं चलती या यूं कहें कि पैसे और ताकत के आगे पुलिस गांधी जी के तीन बंदरों की समान हो जाती है और पुलिस की नाक, कान और आंख सब बंद हो जाती है। अगर गहराई से देखें तो किसी थाने का थानेदार अगर चाहे तो उसके इलाके में अपराध 90 प्रतिशत तक कम हो सकते हैं....बशर्ते वह ऐसा चाहे...लेकिन अफसोस ऐसा होता नहीं है। खासकर बलात्कार के मामलों में तो पीड़िता आसानी से दोषियों की पहचान कर सकती है...लेकिन पुलिस इन मामलों में हाथ पर हाथ धरे बैठे रहती है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि बलात्कार के कुछ एक मामलों में बलात्कार की पीड़िता झूठे आरोप लगाकार कुछ लोगं को फंसाने की कोशिश करती हैं...या कहें अपने फायदे के लिए ऐसे आरोप लगाती हैं...लेकिन ये मामले इतने कम देखने में आते हैं कि ऊंगलियों में गिने जा सकते हैं। बलात्कार की घटना पीड़िता के जीवन में घटित एक ऐसी घटना है कि मैं तो कम से कम ये नहीं मानता कि कोई पीड़िता जानबूझकर अपने फायदे के लिए खुद बलात्कार की पीड़िता कहलाना पसंद करेगी...ये सब कुछ पीड़िता के सामाजिक चरित्र पर भी निर्भर करता है...वो क्या करती है और समाज में उसकी कैसी छवि है....ये सब जानने के बाद ही हम इस बारे में कुछ पूर्वानुमान लगा सकते हैं कि वाकई में जो बलात्कार के आरोप उसने किसी पर लगाए हैं उनमें कितना दम हो सकता है। ये बात सही है कि पुलिस बिना जांच पड़ताल के मामले में दोषी को गिरफ्तार कर ले...या आगे की कार्रवाई करे...जांच  पड़ताल किसी भी घटना का एक बहुत अहम हिस्सा है...लेकिन जिस तरह शिकायत करने पर पुलिस का पहला रिएक्शन रहता है वो कहीं न कहीं पीड़िता के मन से पुलिस का विश्वास डिगाने का काम करता है...ऐसे मामलों में कहीं न कहीं पुलिस का रवैया सहयोगात्मक होना बहुत जरूरी है...माना पुलिस को लगता है कि शिकायत पीड़िता जानबूझकर फंसाने के लिए कर रहा है तो पुलिस को फिर भी पीड़िता की बात को सुनकर उसे कार्रवाई का आश्वासन देना चाहिए...और जांच पड़ताल में पुलिस को लगता है कि शिकायत फर्जी है तो फिर पुलिस शिकायत करने वाले के खिलाफ सख्ती से पेश आते हुए उल्टा उसके खिलाफ कार्रवाई करे...इससे न सिर्फ पुलिस की एक स्वच्छ और सहयोगात्मक छवि आम लोगों के बीच में जाएगी बल्कि अपने फायदे के लिए झूठी शिकायत करने वाले भी ऐसा करने से पहले सौ बार सोचेंगे। बहरहाल वर्तमान स्थिति और पुलिस का रवैया तो कहीं न कहीं पुलिस को सवालों के घेरे में खड़ा तो करता ही है...जो पुलिस के लिए शर्मनाक है और यही स्थिति शायद इसीलिए किसी न्यायाधीश को ये टिप्पणी करने पर मजबूर करती है कि – “बलात्कार के केस में पुलिस पीड़िता के दर्द और उसकी परेशानियों को नजरअंदाज कर देती है...जब तक खुद उनके परिवार में किसी के साथ यह हादसा घटित नहीं होगा तब तक उन्हें बलात्कार के दर्द का एहसास नहीं होगा

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रविवार, 11 नवंबर 2012

ऑटो में आउटिंग


सप्ताहांत में आउटिंग करने का अलग लुत्फ है। जो परिवार वाले हैं वे परिवार के साथ इस पल का आनंद उठाते हैं तो युवा अपने दोस्तों की मंडली के साथ जमकर मस्ती करते हैं। ये हमारे जीवन का आम होने के साथ ही अहम पल होता है। ये पल हर किसी की जिंदगी में आता है...बस इस पल को सेलिब्रेट करने का तरीका अलग है। कुछ लोग सब कुछ होने के बावजूद अपनी रोज की परेशानियों में इस तरह घिरे रहते हैं कि वे इस पल का लुत्फ ही नहीं उठा पाते तो कुछ पैसा कमाने की दौड़ में इस तरह भाग रहे होते हैं कि ये पल उन्हें फिजूल लगते हैं। लेकिन इस सब के बीच कुछ लोग ऐसे होते हैं जो तमाम परेशानियों और अभावों के बावजूद अपने व्यस्तता के बीच ऐसे पल निकाल लेते हैं और इसका जमकर लुत्फ उठाते हैं। एक वाक्या जिसने मुझे इस पर लिखने को मजबूर किया आपके साथ साझा कर रहा हूं। शनिवार का दिन था देहरादून के इंदिरा नगर में दैनिक जागरण के दफ्तर के पास मैं अपने एक मित्र का इंतजार कर रहा था..जो कुछ ही देर में वहां पहुंचने वाला था। जिस स्थान पर मैं खड़ा था वहीं पास में एक व्यक्ति ठेले पर चाऊमीन, मोमो और सूप बेच रहा था। इसी बीच वहां पर आए एक ऑटो आखर रूका तो ऑटो में पीछे की सीट पर एक महिला और दो बच्चे बैठे थे। महिला की उम्र करीब 35 साल रही होगी तो दोनों बच्चों की उम्र 8 और 12 साल रही होगी। ऑटो चालक ऑटो रोककर उसमें बैठी महिला और बच्चों से पूछता है कि उन्हें क्या खाना है...जिस तरह से बच्चे पापा पापा कहते हुए अपनी पसंद की चीजें बता रहे थे उससे ये समझ आ गया था कि ऑटो में उस ऑटो चालक का परिवार था...और ऑटो चालक अपने परिवार को आउटिंग पर लेकर आया था...जिसका जिक्र मैंने ऊपर किया था कि फुर्सत के पलों में या सप्ताहांत में अक्सर लोग आउटिंग पर निकलते हैं। हर कोई अपनी जेब और सुविधा के अनुसार इन पलों का आनंद लेता है और शायद ऑटो चालक की जेब और सुविधा के हिसाब से ये पल उसके जीवन में खास थे...और ये उसका अपना तरीका था परिवार के साथ हफ्ते में कुछ पल बाहर बिताने का या बाहर खाना खाने का। इस वाक्ये से एक बात तो समझ में आती है कि आज की भागदौड़ और आपाधापी से भरी जिंदगी में जहां लोग सिर्फ और सिर्फ पैसे के पीछे भाग रहे हैं और उनके पास अपनों के लिए वक्त नहीं होता...और जो व्यक्ति शायद जितना अमीर होता है शायद ये समस्या उसके साथ उतनी ही ज्यादा है...और शायद वे लोग ज्यादा परेशान भी रहते हैं। यहां पर ये स्पष्ट करना चाहूंगा कि ये बात सौ प्रतिशत लोगों पर लागू हो...ये नहीं कहा जा सकता। जिन लोगों के पास जितना कम पैसा और सीमित आय के साधन होते हैं और जो लोग रोज सुबह घर से बाहर निकलकर दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करते हैं...उनमें अधिकतर लोग अपने लिए अपने परिवार के लिए वक्त निकाल लेते हैं...और परिवार के साथ इस पल का जमकर आनंद लेते हैं और जीवन में खुश भी रहते हैं...या यूं कहें की अभावों और रोजमर्रा की समस्याओं से भरी जिंदगी में वे दो पल खुशी के निकाल लेते हैं। हर किसी के लिए इस वाक्ये के मतलब हो सकता हैं अलग अलग हों...या कुछ लोग इससे सहमत न हों...लेकिन कहीं न कहीं देखा जाए तो ये वाक्या बताता है कि एक आम आदमी जो अभावों में जीवन व्यतीत करता है...कहीं न कहीं कुछ हद तक दूसरे लोगों से ज्यादा खुश देखा जाता है, जबकि जिस व्यक्ति का कद जितना बड़ा होता जाता है शायद ये पल उसके जीवन में उतने कम होते जाते हैं। इस वाक्ये के बाद कम से कम मैंने तो ये महसूस किया कि परिवार के साथ सप्ताहांत में फुर्सत के दों पलों का मतलब सिर्फ ये नहीं कि आपके जेब पैसों से भरी हो और आपके पास के बड़ी गाड़ी हो जिसमें आप अपने परिवार के साथ आउटिंग के लिए निकले और किसी बढ़िया रेस्तरां में खाना खाने जाएं।
  
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शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

Give & Take का खेल


अरविंद केजरीवाल इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि 2013 में 9 राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव के साथ ही 2014 के आम चुनाव में भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मुद्दा रहेगा। ऐसे में अपनी ताकत सूचना के अधिकार का इस्तेमाल कर केजरीवाल अब राजनेताओं के साथ ही उद्योगपतियों की घेराबंदी में जुट गए हैं। अपने चौथे खुलासे में अरविंद केजरीवाल ने राजनीति दलों के साथ ही जिस तरह से उद्योग घरानों और उद्योगपतियों की घेराबंदी की है...उससे तो यही लगता है कि केजरीवाल के निशाने पर चुनाव में राजनीतिक दलों को बड़ी आर्थिक मदद करने वाले उद्योग घराने और उद्योगपति भी हैं। यानि कि केजरीवाल इन पर निशाना साध कर राजनीतिक दलों की कमर तोड़ने की तैयारी में हैं ताकि चुनाव में वे इन से मिलने वाली आर्थिक मदद से वंचित हों और जनता के पैसे से चुनाव लड़ने का दावा करने वाली केजरीवाल एंड कंपनी इन राजनीतिक दलों को कड़ी टक्कर दे सके। ये बात जग जाहिर है कि चुनाव में उद्योग घराने और उद्योगपति राजनीतिक दलों को बड़े पैमाने पर फंडिंग करते हैं जिसका इस्तेमाल राजनीतिक दल चुनाव में करते हैं। इसके बदले सत्ता में आने पर राजनीतिक दल इन उद्योग घरानों और उद्योगपतियों को तमाम तरह के कॉन्ट्रेक्ट देने के साथ ही तमाम तरह की छूट देते हैं...जिससे ये लोग मोटा पैसा बनाते हैं। यानि कि इसे हम सीधे तौर पर Give & Take का धंधा कह सकते हैं। वैसे काले धन को लेकर हो हल्ला तो लंबे समय से मचता रहा है और इससे पहले योगगुरु बाबा रामदेव काले धन को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल चुके हैं...और रामदेव ने तो खुलकर कांग्रेस के खिलाफ नाम लेकर जंग का ऐलान भी कर दिया है। लेकिन सरकार काले धन के मुद्दे पर कार्रवाई की बात कहकर सिर्फ आश्वासन ही देती नजर आई...जिससे सरकार की मंशा पर भी सवाल खड़े उठते हैं...शायद यही वजह है कि अरविंद केजरीवाल ने खुद के पास जुटाई गई जानकारी के आधार पर कुछ बड़े उद्योग घरानों, उद्योगपतियों और नेताओं को बेनकाब करने की कोशिश की है...औऱ बकायदा ये भी बताने की कोशिश की है कि किसका कितना काला धन विदेशी बैंकों में जमा है। हालांकि जिन पर आरोप लगे हैं वे इन्हें निराधार बताते हुए किसी प्रकार का काला धन न होने की बात कर रहे हैं...लेकिन केजरीवाल का ये दावा कि ये जानकारी उन्हें भाजपा और कांग्रेस के राजनेताओं ने नाम न छापने की तर्ज पर ही उपलब्ध कराई है ये इस बात पर सोचने के लिए जरूर मजबूर करता है कि कहीं न कहीं केजरीवाल के दावों में दम जरूर है। वैसे भी जिस तरह हमारे राजनेता भ्रष्टाचार और घोटाले में लिप्त हैं और जिस तरह सरकार ने देश के संसाधनों की बंदरबांट बड़े बड़े उद्योग घरानों को की है...उससे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि ये लोग काले धन के मालिक न हों। बहरहाल काले धन पर बाबा रामदेव के बाद केजरीवाल के खुलासे ने एक बार फिर से सरकार पर तमाम सवाल खड़े कर दिए हैं...ऐसे में देखना ये होगा कि कभी दिल्ली के रामलीला मैदान में तो कभी हरियाणा के सूरजकुंड में मंथन कर और अपनी मजबूरियां बताकर अपना दामन पाक साफ बताने की कोशिश में लगी सरकार अब कालेधन पर आगे क्या स्टैंड लेती है। क्या सरकार काले धन के मुद्दे पर किसी के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई करती है या फिर अपने भ्रष्ट मंत्रियों और नेताओं की तरह इनको भी पूरा संरक्षण देती है ?

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गुरुवार, 8 नवंबर 2012

क्या सच बोल रहे हैं आडवाणी ?


 देर से ही लेकिन कम से कम भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने खुद पर लगे पीएम इन वेटिंग के तमगे को धो ही डाला। इसके लिए आडवाणी ने मौका भी बेहतरीन चुना और अपने 85वें जन्मदिन पर ये कहकर इन अटकलों पर विराम लगाया कि भाजपा और देश ने उन्हें बहुत कुछ दिया है...और ये प्रधानमंत्री की कुर्सी से भी बढ़कर है। इससे पहले आडवाणी को लेकर सियासी गलियारों में ये चर्चाएं गर्म रहती थी कि आडवाणी आजीवन पीएम इन वेटिंग ही रहेंगे। चार बार राज्यसभा और पांच बार लोकसभा सांसद रहे आडवाणी प्रधानमंत्री न बन पाए तो क्या हुआ 29 जून 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में आडवाणी उप प्रधानमंत्री तो बन ही गए। कोशिश इसके बाद भी उन्होंने काफी की लेकिन ये सुनहरा अवसर आडवाणी के राजनीतिक जीवन में नहीं आया। खैर उम्र के साथ ही राजनीति के अंतिम पड़ाव में खड़े आडवाणी शायद इस बात को अच्छी तरह समझ गए होंगे कि पीएम की दौड़ शायद अब उनके बस की नहीं रही क्योंकि भाजपा में ही उनके पीछे उनकी तरह ऊंची राजनीतिक महत्वकांक्षाओं वाले नेताओं की फौज खड़ी है जो राजनीति के सर्वोच्च शिखर देश का प्रधानमंत्री बनने का सपना संजोए बैठे हैं...और आडवाणी के राजनीति से रिटायरमेंट का इंतजार में बैठे हैं। जिसमें सबसे आगे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम लिया जा रहा है...इसके अलावा सुषमा स्वराज, अरूण जेटली सरीखे तमाम और नेता हैं जो मन में एनडीए की सरकार बनने पर पीएम बनने के सपना संजए बैठे हैं। ऐसे में आडवाणी को अपने 85वें जन्मदिन पर शायद ये बेहतर मौका लगा कि कम से कम राजनीति के अंतिम पड़ाव में अपने ऊपर उपहास उड़ाते सरीखे लगे तमगे को धो दिया जाए। आडवाणी भले ही अब कह रहे हों कि प्रधानमंत्री पद से ज्यादा उनको भाजपा और देश ने दिया...लेकिन आडवाणी की पीएम बनने की चाहत किसी से छिपी नहीं है...ज्यादा पीछे न जाएं तो 2009 के आम चुनाव को ही ले लें...तो देखने में आया था कि किस तरह आम चुनाव से पहले आडवाणी ने देशव्यापी रथयात्रा निकाली थी। लेकिन आडवाणी के दुर्भाग्य से कहें कि 2009 में जनता ने यूपीए सरकार पर ही भरोसा जताया और आडवाणी का पीएम बनने का सपना एक बार फिर बिखर गया। 2009 में भाजपा की पराजय के बाद से ही उतार पर आए आडवाणी के राजनीतिक करियर का ही असर कहें की आडवाणी ने अपने 85वें जन्मदिन में एक तरह से राजनीति से संन्यास लेने का ऐलान कर दिया...और ये कहकर पीएम इन वेटिंग के तमगे को धो दिया कि उन्हें पार्टी और देश ने इससे कहीं ज्यादा दिया है...आडवाणी भले ही पीएम पद की लालसा न होने की बात कह गए हों...लेकिन कहीं न कहीं आडवाणी के दिल में इसकी कसक जरूर रही होगी। खैर हम तो यही कह सकते हैं देर आए दुरुस्त आए।

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बुधवार, 7 नवंबर 2012

...और उसने रिक्शा पंचर कर दिया


सोमवार का दिन था...रोज की तरह घर से ऑफिस के लिए निकला...वही सड़क थी...और वही रोज का ट्रैफिक जाम...हर कोई ऑफिस जाने या अपने काम पर जाने की जल्दी में था...कई गाड़ियां आढ़ी -  टेढ़ी खड़ी थी...ये वो गाडियों थी जिनके चालक जल्दी के चक्कर में कई लोगों को इस जाम में फंसा चुके थे...कुछ एक रिक्शा चालक भी इस जल्दबाजी में निकलने की पुरजोर कोशिश में लगे थे। इसी बीच गाड़ियों के इंजन के शोर के बीच अचानक ट्रैफिक को व्यवस्थित करने की कोशिश कर रहे ट्रैफिक पुलिस के जवान की चिल्लाने की आवाज ने ध्यान उसकी तरफ खींचा तो नजारा कुछ अलग था। टैफिक पुलिस का जवान हाथ में लोहे का एक नुकीला सा उपकरण लिए एक रिक्शा चालक पर चिल्ला रहा था..उसने पहले रिक्शा चालक को दो चार थप्पड़ रसीद किए और फिर उस नुकीले उपकरण से रिक्शे के आगे के पहिए को पंचर कर दिया। रिक्शा चालक शायद इस बात की जल्दी में था कि जल्दी जाम से निकल जाएगा तो शाम तक दो – चार सवारियां ज्यादा ढ़ो कर कुछ ज्यादा पैसे कमा लेगा...लेकिन ट्रैफिक पुलिस के जवान ने उसकी जल्दी को देरी में तो बदला ही साथ ही सुबह से कमाए कुछ पैसों को रिक्शे के पंचर जोड़ने में खर्च कराने का इंतजाम भी कर दिया। ये महज एक घटना थी...जो अक्सर आपने भी देखी होगी...लेकिन शायद इस पर गौर न किया हो। ये घटना अपने आप में कई सवाल खड़े करती है। क्या ट्रैफिक जाम के लिए सिर्फ वो रिक्शा वाला ही जिम्मेदार था या फिर चमचमाती दो – चार कारें जो जल्दी निकलने के चक्कर में आढ़ी – तिरछी खड़ी थी...और पूरे ट्रैफिक को जाम कर रही थी...या फिर वो भी उतनी ही जिम्मेदार थी। जाहिर है जवाब होगा कि शायद चमचमाती लंबी कारों के चालक भी उतने ही दोषी थे...लेकिन फिर सवाल ये उठता है कि ट्रैफिक पुलिस के उस जवान ने या कहें आधिकतर जवान अलग – अलग जगहों पर ऐसी स्थिति में सिर्फ रिक्शा चालक पर ही क्यों अपना गुस्सा उतारते हैं। शायद इसलिए कि उन्हें रिक्शा चालक अपना गुस्सा उतारने का आसान तरीका लगता है और वे ये सोचते हैं कि रिक्शा चालक कम से कम उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। ट्रैफिक को जाम कर बैठी किसी चमचमाती लंबी गाड़ी के चालक को अगर टोकने या रोकने का प्रयास किया तो शायद उस गाड़ी वाले की पहुंच या फिर रसूख कहीं उसका तबादला या उसे सस्पेंड न करवा दे। हालांकि ऐसा नहीं है कि सभी ट्रैफिक पुलिसकर्मी ऐसे सोचते हैं या ऐसा करते हैं...कुछ एक अपवाद भी हमें देखने को मिलते हैं जो सिर्फ अपनी ड्यूटी निभाते हैं और नियम तोड़ रही चाहे वो चमचमाती लंबी गाड़ी हो या फिर रिक्शा या ऑटो चालक वे सभी को एक तराजू में तोलते हैं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर ऐसे ट्रैफिक पुलिस कर्मी जिनकी बड़ी तादाद रिक्शे को पंचर करने में विश्वास रखती है..आखिर उनके ऐसा करने की बड़ी वजह क्या है। वैसे शायद ये हमारे सिस्टम में ही है कि गरीब, लाचार और बेसहारा लोगों पर जुल्म कर लो...क्योंकि उनकी सुनने वाला कोई नहीं है...और यही तो होता आ रहा है...हर जगह बेसहारा, गरीब और लाचार दबाए जा रहे हैं...जबकि चमचमाती लंबी गाड़ी वाले...ऊंची पहुंच वाले रसूखदारों को हर जगह पहली पंक्ति में जगह मिलती है...और बिना पंक्ति में लगे ही उनके सारे काम अंदरखाने हो जाते हैं। आप सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान का उदाहरण ले लें या फिर ड्राईविंग लाईसेंस बनवाने पहुंच जाएं...हर जगह ऐसा ही होता है...शायद अधिकतर लोगों ने इसको महसूस भी किया होगा। सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान खोलने के पीछे की भावना शायद यही थी कि गरीबों को बाजार से कम मूल्य पर सस्ती दर पर राशन मिल सके...लेकिन गरीबों के लिए आने वाला आधे से ज्यादा राशन ब्लैक हो जाता है। ऐसा एक नहीं तमाम उदाहरण हैं। ऊपर से लेकर नीचे तक मंत्रियों से नेता तक, अफसरों से लेकर बाबू तक हर कोई कहीं न कहीं...किसी न किसी रूप में इस सब के लिए जिम्मेदार हैं...मंत्री और आला अफसर सोचते तो हैं कि बाबू और कर्मचारी अपना काम ईमानदारी से करें...लेकिन खुद पर अपनी कही बातों को लागू नहीं करते। छत में अगर छेद होने से लीकेज हो रहा है तो...जाहिर है कि लीकेज ठत का छेद ऊपर से बंद करने पर ही रूकेगा न कि नीचे से बंद करने पर...लेकिन हमारे मंत्री, नेता, अफसर सोचते हैं कि छेद नीचे से बंद हो न कि ऊपर से। क्योंकि शायद वे जानते हैं कि छेद ऊपर से बंद कर दिया तो लीकेज की तरह होने वाली उनकी कमाई भी बंद हो जाएगी। बहरहाल बात रिक्शा पंचर होने के दृश्य से निकली थी...इसकी गूंज बहुत दूर तक जाती है...आम आदमी इस पर सोचकर परेशान भी होता है...लेकिन शायद इन नेताओं और अफसरों के कानों तक ये गूंज नहीं पहुंचती...इनकी आंखे शायद इस दृश्य को देखकर अनदेखा कर देती हैं...और यही वजह है कि एक ट्रैफिक पुलिसकर्मी रिक्शा चालाक को थप्पड़ मारने से गुरेज नहीं करता...उसका रिक्शा पंचर करने से भी नहीं हिचकिचाता...और हिचकिचाता है तो बस रिक्शे के साथ ही ट्रैफिक को जाम कर रही उस लंबी चमचमाती गाड़ी की तरफ देखने से...उस गाड़ी में सवार रसूखदार से कुछ कहने से।

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मंगलवार, 6 नवंबर 2012

‘राज’नीति



ज्यादा दिन नहीं हुए जब हरियाणा के सूरजकुंड में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में नितिन गडकरी के दोबारा भाजपा अध्यक्ष बनने का रास्ता साफ हो गया था...और कार्यसमिति के सभी सदस्यों ने हाथ उठाकर इसका अनुमोदन किया था...दरअसल संघ की मंशा थी कि भाजपा हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा चुनाव के साथ ही 2013 में 9 राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव और 2014 के आम चुनाव को गडकरी के नेतृत्व में लड़े...लेकिन गडकरी पर उठी एक ऊंगली ने भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दे पर मिशन 2014 की तैयारी में लगी भाजपा की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। पहले कांग्रेस की नींद उड़ा चुके सामाजिक कार्यकर्ता से राजनेता बने अरविंद केजरीवाल की एक प्रेस कांफ्रेंस ने भाजपा के मिशन 2014 के सपनों पर मानो कुठाराघात कर दिया...रही सही कसर पूरी कर दी उन मीडिया रिपोर्टों ने जिसमें गडकरी की कंपनी में फर्जी कंपनियों के हुए निवेश को उजागर किया गया। भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोपों से घिरी कांग्रेस को तो मानो गडकरी पर आरोप लगने के बाद संजीवनी मिल गयी। पहले कांग्रेस ने घेरा तो भाजपा ने जमकर अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष का बचाव किया...लेकिन इसके बाद गडकरी अपनी ही पार्टी में घिरते चले गए। हालात ऐसे हो गए कि गडकरी पर इस्तीफे का दबाव बढ़ता गया और कई बड़े भाजपा नेता गडकरी से किनारा करने लगे...हालांकि खुलकर किसी भी भाजपा नेता ने इस बात को नहीं कहा सिवाए राम जेठमलानी और उनके बेटे महेश जेठमलानी के...लेकिन अपने ही घर में गडकरी बुरी तरह घिर गए। राजनीति में सियासी दलों और नेताओं की चाल, चरित्र और चेहरे कैसे बदल जाते हैं, इसका अंदाजा गडकरी के मामले से आसानी से लगाया जा सकता है। गडकरी पर उठी एक ऊंगली ने गडकरी को अर्श से फर्श पर पहुंचाने की पूरी रूप रेखा तय कर दी...जो पार्टी अपने निजाम के साथ कदम से कदम मिलाकर भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान शुरु करने का दम भरते हुए सत्ता में लौटने का ख्वाब देख रही थी...उस पार्टी के निजाम ही भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर गए तो ऐसा होना ही था। लेकिन आखिर में दिनभर की जद्दोजहद के बाद आखिरकार भाजपा ने खुद ही गडकरी को क्लीन चिट देते हुए गडकरी के नेतृत्व पर पूरा भरोसा होने का ऐलान करने के साथ ही गडकरी के इस्तीफे की अटकलों को खारिज कर दिया। सवाल ये भी है कि जो पार्टी विपक्ष में रहते हुए विरोधियों पर आरोप लगने पर उनके इस्तीफे की मांग करती है वो पार्टी अपने ऊपर बात आने पर अपने नेता को पूरा संरक्षण देते हुए खुद ही उसे क्लीन चिट दे देती है। शायद यही राजनीति है...राज करना है तो समय के साथ अपनी सुविधानुसार नीति को ही बदल डालो और राज करो...वैसे गौर कीजिए भाजपा हो या कांग्रेस या कोई और राजनीतिक दल सभी जगह तो यही हो रहा है।
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सोमवार, 5 नवंबर 2012

ये कैसी नैतिकता…?


 केन्द्र की कांग्रेस नीत सरकार पर लगे भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोपों को लेकर मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा समेत तमाम विरोधी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ ही आरोपों से घिरे उनके मंत्रियों से इस्तीफे का मांग कर रहे हैं...लेकिन जब यही आरोप देश की मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पर लगता है तो उनकी ही पार्टी उनका खुलकर बचाव करती है। विरोधियों पर भ्रष्टाचार के आरोपों पर उनसे इस्तीफा मांगने वाले खुद के दामन पर छींटे पड़ने पर चुप्पी साध लेते हैं। हालांकि कुछ एक नेता ऐसे हैं जो अपनी ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पर सवाल खड़े करते हुए इस्तीफा मांगते हैं...लेकिन ये गिनती में ही हैं। माना सोनिया गांधी ने भ्रष्टाचार और घोटालों से घिरे अपने मंत्रियों का बचाव करते हुए उनकी पीठ थपथपाते हुए उन्हें प्रमोशन दे दिया...तो क्या आप भी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सोनिया के कदमों पर ही चलेंगे। हालात तो कुछ ऐसा ही बयां कर रहे हैं...जिस तरह गडकरी के भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर ताजपोशी का रास्ता गडकरी का बचाव कर साफ किया जा रहा है...उससे इस पर मुहर लगती भी दिखाई दे रही है। भाजपा दूसरों को तो नैतिकता का पाठ पढ़ाती है लेकिन जब उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष पर जब भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं तो भाजपा की नैतिकता जाने कहां चली जाती है। एक तरफ तो आप भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान छेड़ने के बात कहते हुए 2014 में देश की सत्ता पर काबिज होने का ख्वाब देखते हैं...लेकिन आपके शीर्ष नेता पर आरोपों पर आप चुप्पी साध लेते हैं। भ्रष्टाचार और घोटालों के खिलाफ आप प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांगते हुए संसद ठप कर देते हैं, लेकिन जब खुद पर बन आती है तो आप आरोपों को ही नकारते नजर आते हैं। साफ है कि भ्रष्टाचार को कैंसर बताते हुए कांग्रेस और भाजपा इसे जड़ से खत्म करने के साथ ही भ्रष्टाचारियों को सजा दिलाने की बात करते हैं...लेकिन खुद गले तक भ्रष्टाचार के दलदल में डूबे हुए हैं...ऐसे में कैसे ये दोनों पार्टियां भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए कारगर कदम उठाएंगी...ये बड़ा सवाल है। सवाल इसलिए भी क्योंकि दोनों ही पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं...और दोनों ही पार्टियों के नेता भ्रष्टाचार में घिरे साथी नेताओं का न सिर्फ खुलकर बचाव करते हैं बल्कि सीना ठोक पर उन्हें निर्दोष बताते हैं। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देश के दोनों ही प्रमुख दलों का ये रवैये निश्चित ही दुर्भाग्यपूर्ण हैं। सत्ताधारी दल के नेता सत्ता के लालच में गंभीर आरोप लगने के बाद भी जहां कुर्सी छोड़ने से कतराते हैं तो वहीं मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा का भी कुछ ऐसा ही हाल है। न तो मनमोहन सिंह और उनकी टीम के दागी मंत्री नैतिकता के नाम पर इस्तीफा देने की हिम्मत जुटा पाते हैं और न ही दूसरों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाली भाजपा के नेताओं में ही पद छोड़ने का साहस है। भारतीय राजनीति में एक दौर वो भी था जब सिर्फ ऊंगली मात्र उठ जाने पर नेता पद और कुर्सी का मोह छोड़ इस्तीफा दे देते थे...लेकिन अब वक्त बदल गया है, नैतिकता राजनीति से गायब हो गयी है...या यूं कहें कि नेताओं ने नैतिकता की हत्या कर दी है। नेता अब सिर्फ और सिर्फ कुर्सी के लिए...लाल बत्ती के लिए जीते हैं...उन पर तमाम ऊंगलियां उठे लेकिन उन्हें किसी की कोई परवाह नहीं है...शायद वे ये समझते हैं कि जनता ने उन्हें चुनकर पांच साल का ऐश परमिट दे दिया है...इसलिए जितनी ऐश करनी है कर लो...क्या पता फिर मौका मिले न मिले सत्ता में आने का।   

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रविवार, 4 नवंबर 2012

ये राजनीति है...


एफडीआई और महंगाई पर सरकार के फैसलों के साथ ही भ्रष्टाचार और तमाम घोटालों के आरोप से घिरी कांग्रेस ने न सिर्फ दिल्ली के रामलीला मैदान से देश की जनता को सफाई देने की कोशिश की बल्कि कड़े फैसलों के पीछे सरकार की मजबूरी का भी बखान किया। दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस की सर्वेसर्वा सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ ही कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने जनता के सामने न सिर्फ एक के बाद एक सरकार के फैसलों पर सफाई दी बल्कि मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा पर जमकर हल्ला बोला। एफडीआई के मुद्दे पर तो सरकार के तमाम मंत्री दर्जनों बार सफाई दे चुके थे...लेकिन महंगाई पर आज पहली बार सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह ने बात की। हालांकि महंगाई पर ये लोग सिर्फ सरकार की मजबूरी ही सामने रख सके...लेकिन महंगाई से निकट भविष्य में आम जनता को राहत देने जैसी कोई बात इन्होंने नहीं की। हां भ्रष्टाचार को लेकर सोनिया गांधी ने खूब हुंकार भरी और जैसा वो करती आई हैं ठीक उसी तरह भ्रष्टाचार में लिप्त सरकार के नुमाइंदों का बचाव करती दिखाई दी। लेकिन अपनों को बचाने के साथ ही विपक्षियों पर भ्रष्टाचार को लेकर निशाना साधने से सोनिया नहीं चूकी। अच्छा लगा जब एफडीआई और बढ़ती महंगाई पर सरकार का पक्ष रखने कांग्रेस आगे आई...भ्रष्टाचार पर सोनिया का रवैया और तेवर तो काबिले तारीफ थे...लेकिन भ्रष्टाचार की कालिख से अपनों को बचाना और दूसरों पर ताने मारना ये समझ से परे था। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि भ्रष्टाचार सिर्फ कांग्रेस ही नहीं बल्कि अधिकतर राजनीतिक दल और राजनेता इस दलदल में गले तक डूबे हुए हैं...और किसी का भी दामन पाक साफ नहीं कहा जा सकता...लेकिन सोनिया गांधी का ये कौन सा पैमाना है कि खुद के लोगों पर आरोप साबित होने तक वो दोषी नहीं है और दूसरों को आप चिल्ला चिल्ला कर दोषी ठहराएं। वैसे आपके लिए अपने लोग कितने महत्वपूर्ण हैं वो तो आप भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे अपने प्रिय सलमान खुर्शीद को प्रमोशन दे जता ही चुकी हैं...ऐसे में आप जनता के सामने ये चिल्ला चिल्ला कर भले ही कह लें कि भ्रष्टाचार कैंसर की तरह है और आप भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई करेंगी...लेकिन आपके दोहरे रवैये तो देख आप से कम से कम ये उम्मीद करना तो बेईमानी ही होगी कि भ्रष्टाचारियों के खिलाफ आप कोई कार्रवाई करेंगी। खैर इसमें दोष आपका भी नहीं है कमबख्त राजनीति चीज ही ऐसी है कि ये सब करे बिना काम भी तो नहीं चलता।
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शनिवार, 3 नवंबर 2012

पापा का सपना पूरा करेगा सीएम बेटा !


केन्द्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा वैसे तो अपने अजीबो गरीब बयान के लिए चर्चा में ज्यादा रहते हैं...लेकिन इस बार बेनी बाबू ने जो बोला उस पर सहसा विश्वास नहीं होता कि बेनी प्रसाद वर्मा ऐसा भी सोचते हैं। बेनी प्रसाद वर्मा ने उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार के फैसलों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि सपा सरकार मुसलमानों के वोटों के लिए उत्तर प्रदेश में सिर्फ मुसलमानों में कृपा बरसा रहा है। दरअसल बेनी बाबू को अखिलेश सरकार के उस फैसले पर एतराज है जिसमें सपा सरकार ने राज्य के मुसलमान परिवार की बेटियों के विवाह और पढ़ाई के लिए 30 – 30 हजार रूपए बांट रही है। बेनी बाबू का कहना है कि क्या सिर्फ मुसलमान ही गरीब हैं ? बेनी साहब ये भी कहते हैं कि अगर 70 फीसदी मुसलमान गरीब हैं तो फिर 95 फीसदी अनुसूचित जाति, 25 फीसदी पिछड़े और 10 फीसदी सामान्य वर्ग के लोग भी बेहद गरीबी का जीवन जी रहे हैं...ऐसे में सरकार सिर्फ मुसलमानों पर ही नेमत क्यों बरसा रही है। उत्तर प्रदेश की सपा सरकार के फैसले पर ऊंगली उठाने वाले ये वही बेनी बाबू हैं जो कुछ दिन पहले तक सपा सरकार को सौ में से सौ नंबर दे चुके हैं। वैसे मंत्री जी के सपा सरकार को 100 नंबर देने पर ज्यादा अचरज नहीं हुआ था...क्योंकि बेनी बाबू के श्रीमुख से ऐसे ही बयानों की उम्मीद की जाती रही है। लेकिन मुसलमानों के साथ ही दूसरे वर्ग के गरीबों पर बेनी बाबू की चिंता ने बहस का नया विषय तो खड़ा कर ही दिया है। लेकिन देखने वाली बात ये है कि क्या ये सिर्फ बेनी प्रसाद वर्मा जी का सिर्फ एक बयान है या फिर 2014 के आम चुनाव को ध्यान में रखते हुए दिया गया बयान। बेनी बाबू कांग्रेस से ताल्लुक रखते हैं और हालिया विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस युवराज राहुल गांधी के पूरी ताकत झोंकने के बाद भी कांग्रेस की हालत किसी से छुपी नहीं है...ऐसे में विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटों को साधने में नाकाम रही कांग्रेस कहीं 2014 में अन्य वर्ग के वोटों को साधने की तैयारी में तो नहीं है...! मंत्री जी का बयान इस ओर भी ईशारा करता दिखाई दे रहा है। बहरहाल मुद्दे की अगर बात करें तो मुद्दा बेहद गंभीर है और इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि उत्तर प्रदेश क्या देशभर में मुसलमानों के अलावा भी जो आबादी है उसका भी एक बहुत बड़ा वर्ग बेहद गरीब है...ऐसे उत्तर प्रदेश के लिहाज से ही अगर बात करें तो यहां पर स्थिति वाकई में गंभीर है और सिर्फ मुसलमानों के अलावा भी बड़ा वर्ग गरीबी में जीवन व्यतीत कर रहा है। ऐसे में अगर अखिलेश सरकार सिर्फ मुसलमानों को फायदा पहुंचाती है या कोई योजना शुरु करती है तो सवाल खड़े उठने लाजिमी है। वैसे सपा सरकार के इस फैसले के पीछे की वजह खोजने की कोशिश की जाए तो स्पष्ट होता है कि सपा की निगाहें भी 2014 के आम चुनाव पर ही है...और देश की राजनीति तय करने वाले सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश के रास्ते दिल्ली की सत्ता में तीसरे मोर्चे के सहारे काबिज होने का मुलायम सिंह का पुराना सपना साफ नजर आता है...और हालिया घटनाक्रमों के बाद इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता कि मुलायम सिंह इसमें कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते। कांग्रेस इस पर इसलिए भी सवाल उठा रही है कि वो अच्छी तरह जानती है कि उसे केन्द्र की सत्ता में तीसरी बार काबिज होना है कि उत्तर प्रदेश में अपनी स्थ्ति सुधारनी होगी। बहरहाल विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को सिर आंखों में बैठाने वाली उत्तर प्रदेश की जनता 2014 में प्रस्तावित केन्द्र की सत्ता की लड़ाई की चाबी सौंपने लायक किसे बनाएगी ये तो भविष्य के गर्भ में है...लेकिन इस चाबी को हासिल करने के लिए सियासी जंग शुरु  जरुर हो चुकी है और जो खासी रोचक होने की भी पूरी उम्मीद है।


शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

क्या राहुल गांधी बुद्धू हैं ?


कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी जिन्हें कांग्रेस देश का भावी प्रधानमंत्री कहती है क्या वे बुद्धू हैं ?  जनता दल के अध्यक्ष सुब्रहमण्यम स्वामी के राहुल गांधी और सोनिया गांधी पर आरोप के बाद...राहुल ने मानहानि का मुकदमा करने की जो धमकी स्वामी को दी...उसके बाद स्वामी का ट्विट तो यही कहता है कि राहुल गांधी बुद्धू हैं। स्वामी के इस ट्विट के बाद सियासी गलियारों में भी ये चर्चाएं गर्म हैं कि राहुल गांधी कहीं सच में बुद्धू तो नहीं! अगर इसका जवाब हां में है तो फिर कांग्रेसियों को राहुल गांधी के बारे में अब आगे से बहुत सोच समझकर बोलना चाहिए। स्वामी के इस बयान के बाद खुद की एक गंभीर युवा नेता की छवि पेश करने की कोशिश करने वाले राहुल गांधी को झटका जरुर लगा होगा। राहुल ने शायद ही ये कभी सोचा होगा कि कोई उनको बुद्धू तक की उपाधि दे सकता है। वैसे राहुल ने जिस तेजी से स्वामी के आरोपों पर पलटवार करते हुए कानूनी कार्रवाई करने के साथ ही मानहानि की धमकी दी थी...उससे तो यही लगा था कि राहुल गांधी खुद की छवि पर दूसरे कांग्रेसियों की तरह कोई दाग नहीं लगने देना चाहते...लेकिन जिन दस्तावेजी सबूतों के साथ स्वामी ने राहुल गांधी और सोनिया गांधी की घेराबंदी की है...उससे इन आरोपों से पाक साफ बच निकलना फिलहाल राहुल और सोनिया के लिए आसान तो नहीं दिखाई दे रहा। और अब जबकि कांग्रेस ने इस बात को स्वीकार कर लिया है कि कांग्रेस ने नेश्नल हेराल्ड और कौमी आवाज़ आखबार निकालने वाली कंपनी एसोसिएट जर्नल्स (एजीपीएल) को 90 करोड़ रूपए बिना ब्याज पर कर्ज दिया था...ऐसे में स्वामी के आरोप औऱ मजबूत होते दिखाई दे रहे हैं। हालांकि कांग्रेस ये कहते हुए अपना पल्ला बचाने की कोशिश कर रही है कि नेशनल हेराल्ड ने देश के स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाई थी...ऐसे में नेशनल हेराल्ड को कर्ज देना कांग्रेस के लिए गर्व की बात है...लेकिन नियम कहते हैं कि राजनीतिक पार्टी राजनीतिक उद्देश्यों के लिए जुटाए धन को किसी कंपनी को कर्ज नहीं दे सकती...ऐसे में स्वामी के आरोप अब सोनिया और राहुल की गले की फांस बनते जा रहे हैं...और समूचे विपक्ष ने इसको लेकर सोनिया और राहुल को घेरना शुरु कर दिया है। बहरहाल हालात देखकर तो फिलहाल यही लगता है कि कांग्रेस के साथ ही गांधी खानदान के सितारे भी गर्दिश में चल रहे हैं। पहले सरकार में एक के बाद एक घोटाले उजागर होते हैं...प्रधानमंत्री समेत तमाम मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं...उसके बाद गांधी खानदान के दामद राबर्ट वाड्रा पर ऊंगलिया उठती हैं और अब गांधी परिवार की मुखिया सोनिया गांधी और युवराज राहुल गांधी पर भ्रष्टाचार के आरोप लग गए हैं...यानि कि गांधी परिवार फिलहाल तो मुश्किल में नजर आ रहा है। अब देखना ये होगा कि एक के बाद एक आरोपों की बौछार से गांधी परिवार खुद को कैसे बचाता है और पाक साफ साबित करता है। वैसे सोनिया गांधी ने भ्रष्टाचार में घिरे अपने मंत्री की तो पीठ थपथपाकर उन्हें प्रमोशन दे दिया लेकिन खुद के दामन में लगे दाग पर सोनिया क्या कदम उठाती हैं...ये देखने वाली बात होगी...साथ ही स्वामी से बुद्धू की उपाधि पाए राहुल कैसे साबित करेंगे कि वे बुद्धू नहीं हैं...ये देखना भी रोचक होगा।
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गुरुवार, 1 नवंबर 2012

अब जनता फोड़ेगी भ्रष्टाचार का घड़ा


सोनिया गांधी की कृपा से प्रमोशन पाकर कानून मंत्री से विदेश बनने वाले सलमान खुर्शीद के घर फर्रुखाबाद में अरविंद केजरीवाल की रैली ने कुछ हो न हो खुर्शीद की नींद तो जरुर उड़ा दी होगी। खुर्शीद भले ही इस रैली को नजरअंदाज करनी की कोशिश कर रहे हों...लेकिन जिस तेवर के साथ खुर्शीद ने कानून मंत्री रहते हुए केजरीवाल को फर्रुखाबाद आकर वहां से सही सलामत लौटने की चेतावनी दी थी...उससे तो ये उसी दिन साफ हो गया था कि खुर्शीद केजरीवाल की रैली को लेकर बेचैन भी थे और खुद के घर में अपनी घेराबंदी से परेशान भी...हालांकि खुर्शीद के चंद समर्थकों ने केजरीवाल एंड कंपनी को रोकने की पूरी कोशिश भी कि लेकिन उनके मंसूबे कामयाब नहीं हो पाए और केजरीवाल ने न सिर्फ खुर्शीद के घर फर्रुखाबाद में उनकी और उनके एनजीओ की कारगुजारियों की पोल खोली बल्कि मंच से खुलकर चुनौती भी दी...लेकिन खुर्शीद और उनके समर्थक मन ही मन केजरीवाल को कोसने के अलावा कुछ और नहीं कर पाए। केजीरवाल ने खुर्शीद के खिलाफ हल्ला बोलते हुए वहां की जनता से अगले चुनाव में खुर्शीद को सबक सिखाने की अपील तो की है...लेकिन हैरानी होती है कि भ्रष्चाचार के खिलाफ बोलने वाली सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह उनको संरक्षण देते नजर आते हैं। भ्रष्टाचार पर बोलते हुए हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में जनसभा में सोनिया ने भाजपा पर भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ कोई कार्रवाई न करने का आरोप तो लगाया...लेकिन सोनिया गांधी ये कैसे भूल गई कि वे खुद भ्रष्टाचार के सांपों को अपने आस्तीन में पाल रही हैं...न सिर्फ पाल रही हैं बल्कि उन्हें खूब दूध भी पिला रही हैं। बात सलमान खुर्शीद की ही हो रही है...जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगने के बाद सोनिया उन्हें प्रमोशन दे देती हैं। हालांकि इसके पीछे एक तर्क नजर आता है कि सोनिया गांधी को वफादार लोग शायद ज्यादा पसंद हैं। भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद सलमान खुर्शीद का एक बयान याद आता है जब वे कहते हैं कि वे सोनिया गांधी के लिए जान तक दे सकते हैं...सोनिया को इससे बढ़िया वफादार कहां मिल सकता था...जो सिर्फ उनकी ही सुने...उनकी ही बात करे...तो सोनिया ने भी खुर्शीद को तत्काल ईनाम दे डाला और कानून मंत्री से प्रमोशन देकर बना डाला विदश मंत्री। ऐसे में खुर्शीद और उन जैसे सोनिया के वफादार नेताओं पर भ्रष्टाचार के कितने ही आरोप क्यों न लग जाएं...उकी कुर्सी तो उनसे कोई नहीं छीन सकता। हालांकि केजरीवाल ने खुर्शीद और उन जैसे भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ लड़ाई जारी रखने का ऐलान किया है...ऐसे में उम्मीद करते हैं देर सबेर ही सही इन नेताओं का...इनको संरक्षण देने वालों के भ्रष्टाचार का घड़ा एक दिन जरुर फूटेगा...और देश की जनता से बेहतर इस काम को कोई और नहीं कर सकता।

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राहुल को गुस्सा क्यों आता है ?


राहुल गांधी कोई इन्हें कांग्रेस का युवराज कहता है तो कोई देश का भावी प्रधानमंत्री...कांग्रेसी नेताओं के लिए राहुल ही सबकुछ हैं...और इनके मुताबिक तो राहुल ही प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालकर देश का कल्याण कर सकते हैं। हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी लगता है कि राहुल उनकी टीम का हिस्सा बनेंगे तो ही देश का उद्धार हो पाएगा। मनमोहन सिंह कह कहकर थक गए लेकिन राहुल गांधी कैबिनेट में शामिल नहीं हुए तो नहीं हुए। राहुल गांधी ने कई राज्यों में कांग्रेस की नैया पार लगाने की कोशिश की लेकिन असफल ही रहे। इस दौरान कभी भी राहुल गांधी को गुस्से में नहीं देखा...वे हर बार कभी दलित के घर खाना खाकर जमीन से जुड़े होने का एहसास जनता को कराते रहे तो कभी हिंसा पीड़ितों से मुलाकात करते हुए दिखाई दिए। आमतौर पर चुनावी जनसभाओं में राहुल के तेवर थोड़े उग्र जरुर दिखाई दिए...अब 31 अक्टूबर की उनकी हिमाचल प्रदेश में जनसभा ही देख लें...राहुल भाजपा पर जमकर बरसे। लेकिन 01 नवंबर को जनता दल के अध्यक्ष सुब्रहमण्यम स्वामी की प्रेस कांफ्रेंस ने राहुल को आग बबूला कर दिया। राहुल ने स्वामी को न सिर्फ कानूनी कार्रवाई करने की धमकी दी बल्कि ये तक कह डाला की ये अभिव्यक्ति की आजादी का दुरुपयोग है। राहुल गांधी को इतने गुस्से में तो पहले कभी नहीं देखा था...लेकिन स्वामी के शब्द बाण लगता है राहुल के दिल पर गहरा असर कर गए। वैसे राहुल गुस्सा करें भी क्यों न केन्द्र सरकार के पीछे पहले से ही पड़े स्वामी ने इस बार राहुल के साथ ही राहुल की मां सोनिया गांधी पर जो निशाना साधा। स्वामी ने न सिर्फ राहुल के नाम बेनामी संपत्ति होने का आऱोप लगाया बल्कि कहा कि यंग इंडिया नामक कंपनी में राहुल और सोनिया के 76 फीसदी शेयर हैं और दोनों का कंपनी पर मालिकाना हक है लेकिन राहुल गांधी ने चुनाव आयोग को कभी इस संबंध में कोई जानकारी नहीं दी। राहुल गांधी और उनकी मां पर सीधा तीर स्वामी ने छोड़ा था तो राहुल कहां चुप रहने वाले थे...राहुल का गुस्सा फूट पड़ा। आमतौर पर शालीन दिखने वाले राहुल गांधी स्वामी के आरोपों पर क्यों इतने तिलमिला उठे ये सोचने वाली बात है। राहुल की बात करें तो राहुल पर सीधे इस तरह के आरोप पहले कभी नहीं लगे और राहुल अपनी एक अलग छवि बनाकर सक्रिय राजनीति से थोड़ी दूरी बनाकर अपना काम करते देखे गए हैं। हां राहुल ऐसे किसी मौके पर चूकते हुए भी नहीं दिखाई दिए जहां से उन्हें लोगों से सीधे जुड़ने का मौका मिलता हो...लेकिन इस सब के बाद भी राहुल का करिश्मा कांग्रेस के लिए बहुत ज्यादा काम करता नहीं दिखाई दिया। राहुल की उपस्थिति भले ही लोगों की भीड़ को इकट्ठा करती दिखाई दी हो लेकिन ये भीड़ कभी भी राहुल से प्रभावित नहीं दिखी...ऐसा होता तो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, और बिहार जैसे राज्यों में कांग्रेस की स्थिति कुछ और ही होती। आरोप लगने पर राहुल का गुस्सा कहीं न कहीं ये ईशारा भी करती है कि कहीं ये राहुल की खीज तो नहीं जो उनकी बेदाग छवि (जैसा कांग्रेसी बखान करते हैं) पर आरोप लगने के बाद गुस्से के रूप में बाहर आई है। और शायद एक वजह ये भी कि स्वामी ने राहुल के साथ ही उनकी मां सोनिया गांधी को भी आरोपों के घेरे में ला खड़ा किया। बहरहाल वजह चाहे जो भी हो लेकिन स्वामी के आरोपों पर राहुल के तेवर से ये साफ हो गया है कि राहुल अब राजनीति के छात्र नहीं रहे बल्कि राजनीति की पाठशाला से बाहर निकलकर राजनीति में पूरी तरह सक्रिय हो गए हैं...वैसे हो भी क्यों न कांग्रेसियों ने पूरी तैयारी जो कर ली है राहुल गांधी को मनमोहन सिंह के बाद देश का अगला प्रधानमंत्री बनाने के लिए...लेकिन ये सवाल अपनी जगह है कि आखिर राहुल का नंबर कब आएगा ?

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कौन सुनेगा...किसको सुनाएं ?


कौन सुनेगा...किसको सुनाए...इसलिए चुप रहते हैं...किशोर कुमार का ये मशहूर गाना आपने जरुर सुना होगा...ये गाना बिल्कुल फिट बैठता है हमारे देश के मतदाताओं पर जो राजनेताओं के झूठे वादों से त्रस्त आकर चुनाव से पहले एक रहस्यमयी चुप्पी साधने लगे हैं। हिमाचल प्रदेश विधानसभा के लिए 04 नवंबर 2012 को मतदान होना है...ऐसे में ऐसा ही कुछ हाल आजकल हिमाचल प्रदेश के मतदाताओं का भी है। मतदान में चंद दिन शेष रह गए हैं...मतदाताओं को रिझाने के लिए प्रत्याशियों ने पूरी ताकत झोंक दी है...लेकिन मतदाता एकदम खामोश है। मानो मन ही मन ये गाना गुनगुना रहे होंकौन सुनेगा किसको सुनाए…इसलिए चुप रहते हैंकिशोर कुमार की ये पंक्तियां इस लिहाज से भी मतदाताओं पर सटीक बैठती हैं क्योंकि इससे पहले के चुनावों पर नज़र डाल लें तो सामने आता है कि चुनाव से पहले राजनीतिक दल अपने घोषणापत्र में जनता से बड़े-बड़े वादे तो करते हैं और उन्हें पूरा करने का दम भी भरते हैं...लेकिन चुनाव जीतने के बाद या सत्ता में आ जाने के बाद उनके ये दावे सिर्फ दावे ही रह जाते हैं। मतदान करने के बाद जनता ठगी रह जाती है और नेता ये समझते हैं कि उन्हें पांच साल का लाईसेंस जनता ने दिया है लूट खसोट मचाने के लिए...जो हम देखते भी आए हैं। वैसे देखें तो अपने जनप्रतिनिधि से जनता की अपेक्षाएं क्या होती हैं...? सिर्फ इतना ही कि उसके क्षेत्र का समुचित विकास हो...उसे बिजली मिले...पानी मिले और उसके इलाके की सड़कें दुरुस्त हो...जिन पर से होकर वो रोज दफ्तार जाता है, व्यापार करने जाता है या बाजार जाता है। मुझे नहीं लगता इससे ज्यादा कोई अपेक्षा जनता की अपने जनप्रतिनिधि से रहती हैं। लेकिन हमारे राजनेता चुनाव जीतने के बाद शायद ये भूल जाते हैं कि उसे जनता ने सेवा करने के लिए चुना है मेवा खाने के लिए नहीं...लेकिन नेता जी मेवा खाने में ही इतने व्यस्त रहते हैं कि उन्हें अपने क्षेत्र की जनता की परवाह ही नहीं रहती। एक फिल्म का दृश्य मेरे जेहन में ताजा हो रहा है, जो इस प्रकार है...एक व्यक्ति अपनी समस्या लेकर अपने क्षेत्र के विधायक के पास पहुंचता है...वहां का नजारा कुछ इस प्रकार है- नेता जी का मुंह पान से लाल है...दो चेले नेता जी की सेवा में लगे हैं...और नेता जी पान चबाते चबाते किसी को फोन पर गलिया रहे हैं। वह व्यक्ति नेता जी के कान से फोन हटते ही अपनी समस्या रखता है कि उसके बेटे को पुलिस ने गलत आरोप में पकड़ लिया है...तो वे उसकी मदद करें और चलकर पुलिसवालों से बात करें...लेकिन नेता जी व्यक्ति को ये कहकर दुत्कार देते हैं कि उसके बेटा चोर होगा...व्यक्ति एक बार फिर से नेता जी से आग्रह करता है कि उसने उनको वोट दिया है...ऐसे में अपने क्षेत्र की जनता के साथ उनको देना चाहिए...इतना सुनते ही नेता जी का पारा चढ़ जाता है और वे उस व्यक्ति को गलियाते हुए कहते हैं कि- मुझे वोट दिया है तो क्या मैं तेरे घर पर आकर झाडू लगाउं। उस व्यक्ति के पास इस बात का कोई जवाब नहीं होता है...और इसके बाद वह व्यक्ति निराश होकर वहां से लौट जाता है। ये फिल्म का दृश्य हमारे आजकल के अधिकतर नेताओं के चरित्र से मेल खाता दिखाई देता है। नेता जी आपको चुनने वाला आपसे ये कतई नहीं चाहता कि आप उसके घर पर आकर झाड़ू लगाएं...लेकिन इतना जरूर चाहता है कि उसकी हर परेशानी में तो कम से कम आप उसके साथ खड़े रहें...क्या आपको ऐसा नहीं लगता...नेता जी इसका जवाब अगर नहीं है तो आपको बधाई...आप राजनीति के रंग में पूरी तरह रंग गए हैं औऱ एक पक्के राजनीतिज्ञ बन गए हैं। हिमाचल की जनता की खामोशी भी आजकल शायद कुछ ऐसा ही कह रही है...शायद इसलिए मतदान से चंद दिन पहले हिमाचल में एक खामोशी सी पसरी हुई है। ऐसे में देखना ये होगा कि मतदाताओं की ये खामोशी हिमाचल में क्या गुल खिलाती है। हिमाचल की रवायत की अगर बात करें तो वहां की रवायत सत्ता परिवर्तन की है...और हर पांच साल में जनता सत्ता परिवर्तन कर देती है...लेकिन इस बार मतदान से पहले की मतदाताओं की रहस्यमयी खामोशी कुछ और ही कहानी बयां कर रही है...और साफ ईशारा कर रही है कि हिमाचल में इस बार कुछ नया होगा...और आसानी से किसी को भी हिमाचल की सत्ता में राज करने का मौका नहीं मिलने वाला...चाहे वो सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी हो या फिर हिमाचल की रवायत के सहारे सत्ता में वापसी की उम्मीद लगाए बैठी कांग्रेस पार्टी। बहरहाल ये चुप्पी 04 नवंबर को टूट जाएगी...और 20 दिसंबर को ईवीएम खुलने के साथ ही साफ हो जाएगा कि ये चुप्पी क्या राज्य की भाजपा सरकार के खिलाफ थी या फिर केन्द्र में काबिज होते हुए भ्रष्टाचार औऱ घोटालों के कई आरोपों से घिरी कांग्रेस के खिलाफ। फिलहाल तो मतदाता खामोश है...और चुनाव लड़ रहे विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रत्याशी बेचैन।
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सोनिया कहती नहीं...करके दिखाती हैं


हिमाचल प्रदेश में चुनाव प्रचार के लिए एक सप्ताह में सोनिया गांधी दो बार पहुंची...पहली बार मंडी और दूसरी बार शिमला और कांगड़ा...सोनिया के पास कहने के लिए कुछ नया नहीं था...ऐसे में सोनिया दोनों ही बार मंच से ये कहती जरूर सुनाई दी कि राज्य की धूमल सरकार ने केन्द्र के पैसे का दुरुपयोग किया है...साथ ही ये कि भाजपा भ्रष्टाचार के बाद चुप बैठ जाती है और भ्रष्टाचार करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करती। गौर कीजिए ये बात यूपीए अध्यक्ष सोनिया कह रही हैं...जिनकी यूपीए सरकार के करीब एक दर्जन से ज्यादा मंत्री गंभीर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हैं...जिनके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर खुद कोयला घोटाले में लिप्त होने का आरोप लगा है। सोनिया जी ये नहीं बताती कि उन्होंने उनकी सरकार में शामिल भ्रष्टाचारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की अलबत्ता वो करके दिखाती हैं भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे सलमान खुर्शीद जैसे मंत्री का प्रमोशन करके। मैं कोई भाजपा की विचारधारा से प्रभावित शख्स नहीं हूं और न ही कांग्रेस का विरोधी...लेकिन शिमला में सोनिया गांधी का ये बयान सुनने के बाद लिखे बिना रहा भी ही गया। खैर ये तो राजनेताओं को चरित्र है...खुद पर आरोप लगे तो कोई दिक्कत नहीं...विपक्षी पर आरोप लगे तो उसे घेरने का कोई मौका मत छोड़ो। सोनिया भी शायद ऐसा ही कुछ कर रही हैं। सोनिया ने शिमला में एक और मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ी...जो शायद इस वक्त कांग्रेस की नैया डुबाने में सबसे बड़ी भूमिका निभा सकता है। वो मुद्दा है महंगाई का...सोनिया शायद उत्तराखंड का टिहरी उपचुनाव और पश्चिम बंगाल का जंगीपुर उपचुनाव नहीं भूली होंगी...टिहरी उपचुनाव में जहां कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी थी और मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के बेटे साकेत बहुगुणा को करारी हार का सामना करना पड़ा और जंगीपुर में 2009 में कराब सवा लाख की जीत का वोटों का अंतर ढाई हजार में सिमट कर रह गया था...और राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के बेटे अभीजीत मुखर्जी बमुश्किल अपनी हार टाल पाए थे। इन दो उपचुनाव के नतीजे शायद सोनिया को महंगाई पर मुहं खोलने के लिए मजबूर कर गए। हालांकि सोनिया यहां भी सिर्फ महंगाई के मुद्दे पर चिंता जताते हुए इस पर विचार करने की बात कहकर ही लोगों को आश्वासन ही देती दिखाई दीं। खैर सोनिया गांधी भी ये बात तो अच्छी तरह समझती होंगी कि महंगाई जैसे ज्वलंत मुद्दे पर सिर्फ आश्वासन से तो कम से कम जनता का काम चलने वाला नहीं है...यानि कि हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में सोनिया अगर सोच रही हैं कि महंगाई पर चिंता जताकर या इस पर सरकार के गंभीर होने की बात कहकर वे कांग्रेस की नैया हिमाचल में पार लगाने में सफल होंगी तो शायद ये सोनिया और कांग्रेस दोनों की गलतफहमी ही होगी। बहरहाल दामन हिमाचल में कांग्रेस की मुख्य प्रतिद्वंदि भाजपा का भी पाक साफ नहीं है और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी के साथ ही राज्य की धूमल सरकार पर भी भ्रष्टाचार के बड़े आरोप लगे हैं...यानि की हिमाचल में राह भाजपा और कांग्रेस दोनों की आसान नहीं है।

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रविवार, 28 अक्टूबर 2012

‘हिंदी’ में बोले मनमोहन सिंह



हिमाचल में विधानसभा चुनाव के लिए चुनाव प्रचार चरम पर है...ऐसे में राज्य के दोनों प्रमुख दल कांग्रेस और भाजपा ने 2014 के आम चुनाव से पहले का सेमिफाइनल माने जा रहे इस चुनाव में जीत के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। 28 अक्टूबर को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कांग्रेस के लिए वोट मांगने हिमाचल प्रदेश के ऊना पहुंचे। मनमोहन सिंह के पहुंचने के बाद उनकी जनसभा में सुखद एहसास ये रहा कि मनमोहन सिंह साहब हिंदी में बोले। इसे सुखद एहसास इसलिए था क्योंकि हमारे पीएम साहब साल में दो ही बार हिंदी बोलते हैं...या तो 15 अगस्त को या फिर 26 जनवरी को...ऐसे में मौका न तो स्वतंत्रता दिवस का था और न ही गणतंत्र दिवस का...फिर भी पीएम साहब की हिंदी सुनकर सुखद एहसास तो होना ही था। मनमोहन सिंह ने हिमाचल प्रदेश में विकास की रफ्तार थमने की बात कहते हुए राज्य की भाजपा सरकार पर जमकर निशाना साधा। जिस समय देश के पीएम मनमोहन सिंह भाजपा को कोस रहे थे...ठीक उसी वक्त ऊना में ही एक और पीएमइन वेटिंग की उपाधि से सजे भाजपा के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी हिमाचल में विकास की बयार बहाने पर मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल की पीठ ठोंक रहे थे। आडवाणी ने केन्द्र की कांग्रेस सरकार को कोसते हुए यहां तक कहा कि 2014 का चुनाव वक्त से पहले होगा और भाजपा की सत्ता की राह हिमाचल से ही प्रशस्त होगी। हिमाचल में जहां भाजपा के लिए अपनी सत्ता बचाने की चुनौती है तो कांग्रेस के लिए हिमाचल की सत्ता में वापसी करने की चुनौती। वैसे हिमाचल की रवायत है कि यहां पर हर पांच साल में यहां की जनता सरकार बदल देती है...लेकिन इस बार देश के हालात कुछ ज्यादा ही जुदा है...और सत्ता में वापसी का ख्वाब संजोए बैठी कांग्रेस भी शायद ये अच्छी तरह से जानती है कि केन्द सरकार के फैसलों से जनता की नाराजगी उसे भारी पड़ सकती है...लिहाजा कांग्रेस ने इस चुनाव में पूरी ताकत झोंक दी है। सोनिया गांधी से लेकर राहुल गांधी हिमाचल में जनसभाएं कर चुके हैं तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी मैदान में उतर गए हैं...भाजपा की अगर बात करें तो हिमाचल और गुजरात के रास्ते केन्द्र की सत्ता की चाबी हासिल करने का ख्वाब देख रही भाजपा भी हर हाल में इन राज्यों में अपनी सत्ता को खोना नहीं चाहती...लिहाजा भाजपा से भी नितिन गडकरी से लेकर सुषमा स्वराज और अरूण जेटली तक राज्य में सभाएं कर चुके हैं...यानि मुकाबला कांटे हैं। कांटे के इस मुकाबले का फैसला भी जनता ने ही करना है...ऐसे में देखना ये होगा कि जनता हिमाचल में एक बार फिर से कमल लहराती है...या फिर हाथ का साथ देती है।


मंगलवार, 23 अक्टूबर 2012

शर्म करो महाराज !


सतपाल महाराज...इस नाम से तो वाकिफ ही होंगे आप...पेशे से राजनीतिज्ञ हैं...लेकिन टीवी पर अक्सर आपको लोगों को ज्ञान बांटते दिखाई दे जाएंगे। उत्तराखंड की पौड़ी संसदीय सीट से सांसद महाराज अपने संसदीय क्षेत्र के विकास की बजाए लोगों के मन के विकास को ज्यादा तरजीह देते हैं। इनके संसदीय क्षेत्र में आप इनको खोजेंगे तो शायद ये आपको न मिलें...लेकिन टीवी पर धार्मिक चैनलों में आप इनके प्रवचन जरुर सुन सकते हैं। टीवी पर इनके प्रवचन सुनने का मौका मिले तो जरुर सुनिएगा...क्योंकि टीवी पर लोगों को सादगी भरा जीवन जीने का उपदेश देने वाले महाराज की जिस हकीकत से मैं आपको रुबरु कराने जा रहा हैं...उसके बाद शायद आपको मेरी बातों पर विश्वास न हो कि सादा जीवन जीने की बात करने वाले महाराज खुद के जीवन में कितना इसे उतारते हैं। दरअसल 23 अक्टूबर 2012 को महाराज के बेटे श्रद्धेय का विवाह था...विवाह समारोह हरिद्वार में रखा गया था...हम भी महाराज और उनके बेटे को सुखी वैवैहिक जीवन की शुभकामनाएं देते हैं...लेकिन इस शादी में महाराज ने जो किया उसने माहाराज की कथनी और करनी का फर्क साफ जाहिर कर दिया। सादगी पसंद महाराज ने अपने बेटे की शादी को शाही बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अनुमान के मुताबिक सादगी पसंद महाराज ने अपने बेटे की शादी में करीब 100 करोड़ रूपए पानी की तरह बहा दिए। शादी में सिर्फ बिजली पर ही एक करोड़ रूपए खर्च कर दिए...यही नहीं हरिद्वार प्रशासन ने भी महाराज के दरबार में खूब शीश नवाया और जी जान से नियमों को ताक पर रखकर हरिद्वार की जनता के कष्टों की परवाह न करते हुए सारी सुविधाएं मुहैया कराई। हरिद्वार प्रशासन ऐसा करता भी क्यों न सतपाल महाराज की धर्मपत्नी अमृता रावत उत्तराखंड की कैबिनेट मंत्री जो ठहरी। जनता को बिजली मिले या न मिले लेकिन शादी में बिजली की कोई कमी नहीं छोड़ी गई। इसी तरह सजावट, खाने और अन्य चीजों पर भी महाराज ने करोड़ों रूपए पानी की तरह बहा दिए। शाही शादी में शामिल होने के लिए हरिद्वार में देश के तमाम वीआईपी से लेकर राजनेता पहुंचें थे...और हर कोई सादगी पसंद महाराज के शाही तामझाम का लुत्फ उठाने में मशगूल था। सतपाल महाराज ने मेहमानों के लिए अस्थाई टॉयलेट का निर्माण करवाया था...और आपको जानकर हैरानी होगी की गंगा के नाम पर नाम कमाने वाले...गंगा की स्वच्छता की बड़ी बड़ी बातें करने वाले सतपाल महाराज के बेटे की शादी में पंडाल के आसपास बने अस्थाई टॉयलेट का सारा मल मूत्र सीधे गंगा में विसर्जित कर दिया गया। सतपाल महाराज के बेटे की शादी ऐसे वक्त में हुई जब उनके संसदीय क्षेत्र के कई इलाके दैविय आपदा से जूझ रहे हैं...आपदा से जहां कई लोगों को मौत हो चुकी है...वहीं लोगों को घर बार सब आपदा की भेंट चढ़ गया। एक तरफ लोग जहां उनके संसदीय क्षेत्र में दाने दाने को मोहताज थे...वहीं हरिद्वार में जनता के जनप्रतिनिधि अपने बेटे की शाही शादी में करोड़ों रूपए लुटाने में मशगूल थे। अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि सांसद और धर्मगुरु सतपाल महाराज के व्यक्तित्व और कथनी – करनी में कितना फर्क है। सतपाल महाराज की सादगी को पोल ये कोई पहली बार नहीं खुली थी...इससे पहले भी अपने जन्मदिन पर सतपाल महाराज ने हरिद्वार में ऐसा ही तामझाम किया था। बड़ा सवाल ये है कि जब एक राजनेता शादी जैसे समारोह में करोड़ों रूपए लुटाता है उस वक्त हमारे देश की तमाम एजेंसियां कहां छिपी बैठी रहती हैं। आयकर विभाग से लेकर दूसरे तमाम विभागों को ये तामझाम क्या दिखाई नहीं देता...या फिर इसलिए नहीं दिखाई दिया कि राज्य और केन्द्र दोनों जगह कांग्रेस की सरकार है...और सतपाल महाराज भी कांग्रेस से ही ताल्लुक रखते हैं। दिल्ली में बाबा रामदेव या अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन करते हैं तो ये एजेंसियां इनसे आंदोलन में हुए खर्चे का हिसाब किताब मांगने पहुंच जाती हैं...लेकिन सतपाल महाराज जैसे नेता जब शादी में करोड़ों लुटाते हैं तो सब जाने कहां चले जाती हैं। हैरत की बात तो ये भी है कि इस सब के बाद भी सतपाल महाराज जैसे नेता इस सब को गलत नहीं बताते...उन्हें शर्म नहीं आती कि उनके क्षेत्र की जनता दाने दाने को मोहताज हैं...और वो करोड़ों सिर्फ शान ओ शौकत की खातिर लुटा रहे हैं...महाराज को शर्म भले ही न आती हो...लेकिन हमें शर्म जरूर आती है कि ये हमारे जनप्रतिनिधि हैं जो देश की सर्वोच्च संस्था संसद में देश की जनता के कल्याण के लिए फैसले लेते हैं...अब ऐसे नेता जनता का कितना कल्याण सोचते होंगे...ये बताने की जरूरत तो कम से कम अब नहीं बची।
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