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शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

Give & Take का खेल


अरविंद केजरीवाल इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि 2013 में 9 राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव के साथ ही 2014 के आम चुनाव में भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मुद्दा रहेगा। ऐसे में अपनी ताकत सूचना के अधिकार का इस्तेमाल कर केजरीवाल अब राजनेताओं के साथ ही उद्योगपतियों की घेराबंदी में जुट गए हैं। अपने चौथे खुलासे में अरविंद केजरीवाल ने राजनीति दलों के साथ ही जिस तरह से उद्योग घरानों और उद्योगपतियों की घेराबंदी की है...उससे तो यही लगता है कि केजरीवाल के निशाने पर चुनाव में राजनीतिक दलों को बड़ी आर्थिक मदद करने वाले उद्योग घराने और उद्योगपति भी हैं। यानि कि केजरीवाल इन पर निशाना साध कर राजनीतिक दलों की कमर तोड़ने की तैयारी में हैं ताकि चुनाव में वे इन से मिलने वाली आर्थिक मदद से वंचित हों और जनता के पैसे से चुनाव लड़ने का दावा करने वाली केजरीवाल एंड कंपनी इन राजनीतिक दलों को कड़ी टक्कर दे सके। ये बात जग जाहिर है कि चुनाव में उद्योग घराने और उद्योगपति राजनीतिक दलों को बड़े पैमाने पर फंडिंग करते हैं जिसका इस्तेमाल राजनीतिक दल चुनाव में करते हैं। इसके बदले सत्ता में आने पर राजनीतिक दल इन उद्योग घरानों और उद्योगपतियों को तमाम तरह के कॉन्ट्रेक्ट देने के साथ ही तमाम तरह की छूट देते हैं...जिससे ये लोग मोटा पैसा बनाते हैं। यानि कि इसे हम सीधे तौर पर Give & Take का धंधा कह सकते हैं। वैसे काले धन को लेकर हो हल्ला तो लंबे समय से मचता रहा है और इससे पहले योगगुरु बाबा रामदेव काले धन को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल चुके हैं...और रामदेव ने तो खुलकर कांग्रेस के खिलाफ नाम लेकर जंग का ऐलान भी कर दिया है। लेकिन सरकार काले धन के मुद्दे पर कार्रवाई की बात कहकर सिर्फ आश्वासन ही देती नजर आई...जिससे सरकार की मंशा पर भी सवाल खड़े उठते हैं...शायद यही वजह है कि अरविंद केजरीवाल ने खुद के पास जुटाई गई जानकारी के आधार पर कुछ बड़े उद्योग घरानों, उद्योगपतियों और नेताओं को बेनकाब करने की कोशिश की है...औऱ बकायदा ये भी बताने की कोशिश की है कि किसका कितना काला धन विदेशी बैंकों में जमा है। हालांकि जिन पर आरोप लगे हैं वे इन्हें निराधार बताते हुए किसी प्रकार का काला धन न होने की बात कर रहे हैं...लेकिन केजरीवाल का ये दावा कि ये जानकारी उन्हें भाजपा और कांग्रेस के राजनेताओं ने नाम न छापने की तर्ज पर ही उपलब्ध कराई है ये इस बात पर सोचने के लिए जरूर मजबूर करता है कि कहीं न कहीं केजरीवाल के दावों में दम जरूर है। वैसे भी जिस तरह हमारे राजनेता भ्रष्टाचार और घोटाले में लिप्त हैं और जिस तरह सरकार ने देश के संसाधनों की बंदरबांट बड़े बड़े उद्योग घरानों को की है...उससे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि ये लोग काले धन के मालिक न हों। बहरहाल काले धन पर बाबा रामदेव के बाद केजरीवाल के खुलासे ने एक बार फिर से सरकार पर तमाम सवाल खड़े कर दिए हैं...ऐसे में देखना ये होगा कि कभी दिल्ली के रामलीला मैदान में तो कभी हरियाणा के सूरजकुंड में मंथन कर और अपनी मजबूरियां बताकर अपना दामन पाक साफ बताने की कोशिश में लगी सरकार अब कालेधन पर आगे क्या स्टैंड लेती है। क्या सरकार काले धन के मुद्दे पर किसी के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई करती है या फिर अपने भ्रष्ट मंत्रियों और नेताओं की तरह इनको भी पूरा संरक्षण देती है ?

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गुरुवार, 8 नवंबर 2012

क्या सच बोल रहे हैं आडवाणी ?


 देर से ही लेकिन कम से कम भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने खुद पर लगे पीएम इन वेटिंग के तमगे को धो ही डाला। इसके लिए आडवाणी ने मौका भी बेहतरीन चुना और अपने 85वें जन्मदिन पर ये कहकर इन अटकलों पर विराम लगाया कि भाजपा और देश ने उन्हें बहुत कुछ दिया है...और ये प्रधानमंत्री की कुर्सी से भी बढ़कर है। इससे पहले आडवाणी को लेकर सियासी गलियारों में ये चर्चाएं गर्म रहती थी कि आडवाणी आजीवन पीएम इन वेटिंग ही रहेंगे। चार बार राज्यसभा और पांच बार लोकसभा सांसद रहे आडवाणी प्रधानमंत्री न बन पाए तो क्या हुआ 29 जून 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में आडवाणी उप प्रधानमंत्री तो बन ही गए। कोशिश इसके बाद भी उन्होंने काफी की लेकिन ये सुनहरा अवसर आडवाणी के राजनीतिक जीवन में नहीं आया। खैर उम्र के साथ ही राजनीति के अंतिम पड़ाव में खड़े आडवाणी शायद इस बात को अच्छी तरह समझ गए होंगे कि पीएम की दौड़ शायद अब उनके बस की नहीं रही क्योंकि भाजपा में ही उनके पीछे उनकी तरह ऊंची राजनीतिक महत्वकांक्षाओं वाले नेताओं की फौज खड़ी है जो राजनीति के सर्वोच्च शिखर देश का प्रधानमंत्री बनने का सपना संजोए बैठे हैं...और आडवाणी के राजनीति से रिटायरमेंट का इंतजार में बैठे हैं। जिसमें सबसे आगे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम लिया जा रहा है...इसके अलावा सुषमा स्वराज, अरूण जेटली सरीखे तमाम और नेता हैं जो मन में एनडीए की सरकार बनने पर पीएम बनने के सपना संजए बैठे हैं। ऐसे में आडवाणी को अपने 85वें जन्मदिन पर शायद ये बेहतर मौका लगा कि कम से कम राजनीति के अंतिम पड़ाव में अपने ऊपर उपहास उड़ाते सरीखे लगे तमगे को धो दिया जाए। आडवाणी भले ही अब कह रहे हों कि प्रधानमंत्री पद से ज्यादा उनको भाजपा और देश ने दिया...लेकिन आडवाणी की पीएम बनने की चाहत किसी से छिपी नहीं है...ज्यादा पीछे न जाएं तो 2009 के आम चुनाव को ही ले लें...तो देखने में आया था कि किस तरह आम चुनाव से पहले आडवाणी ने देशव्यापी रथयात्रा निकाली थी। लेकिन आडवाणी के दुर्भाग्य से कहें कि 2009 में जनता ने यूपीए सरकार पर ही भरोसा जताया और आडवाणी का पीएम बनने का सपना एक बार फिर बिखर गया। 2009 में भाजपा की पराजय के बाद से ही उतार पर आए आडवाणी के राजनीतिक करियर का ही असर कहें की आडवाणी ने अपने 85वें जन्मदिन में एक तरह से राजनीति से संन्यास लेने का ऐलान कर दिया...और ये कहकर पीएम इन वेटिंग के तमगे को धो दिया कि उन्हें पार्टी और देश ने इससे कहीं ज्यादा दिया है...आडवाणी भले ही पीएम पद की लालसा न होने की बात कह गए हों...लेकिन कहीं न कहीं आडवाणी के दिल में इसकी कसक जरूर रही होगी। खैर हम तो यही कह सकते हैं देर आए दुरुस्त आए।

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बुधवार, 7 नवंबर 2012

...और उसने रिक्शा पंचर कर दिया


सोमवार का दिन था...रोज की तरह घर से ऑफिस के लिए निकला...वही सड़क थी...और वही रोज का ट्रैफिक जाम...हर कोई ऑफिस जाने या अपने काम पर जाने की जल्दी में था...कई गाड़ियां आढ़ी -  टेढ़ी खड़ी थी...ये वो गाडियों थी जिनके चालक जल्दी के चक्कर में कई लोगों को इस जाम में फंसा चुके थे...कुछ एक रिक्शा चालक भी इस जल्दबाजी में निकलने की पुरजोर कोशिश में लगे थे। इसी बीच गाड़ियों के इंजन के शोर के बीच अचानक ट्रैफिक को व्यवस्थित करने की कोशिश कर रहे ट्रैफिक पुलिस के जवान की चिल्लाने की आवाज ने ध्यान उसकी तरफ खींचा तो नजारा कुछ अलग था। टैफिक पुलिस का जवान हाथ में लोहे का एक नुकीला सा उपकरण लिए एक रिक्शा चालक पर चिल्ला रहा था..उसने पहले रिक्शा चालक को दो चार थप्पड़ रसीद किए और फिर उस नुकीले उपकरण से रिक्शे के आगे के पहिए को पंचर कर दिया। रिक्शा चालक शायद इस बात की जल्दी में था कि जल्दी जाम से निकल जाएगा तो शाम तक दो – चार सवारियां ज्यादा ढ़ो कर कुछ ज्यादा पैसे कमा लेगा...लेकिन ट्रैफिक पुलिस के जवान ने उसकी जल्दी को देरी में तो बदला ही साथ ही सुबह से कमाए कुछ पैसों को रिक्शे के पंचर जोड़ने में खर्च कराने का इंतजाम भी कर दिया। ये महज एक घटना थी...जो अक्सर आपने भी देखी होगी...लेकिन शायद इस पर गौर न किया हो। ये घटना अपने आप में कई सवाल खड़े करती है। क्या ट्रैफिक जाम के लिए सिर्फ वो रिक्शा वाला ही जिम्मेदार था या फिर चमचमाती दो – चार कारें जो जल्दी निकलने के चक्कर में आढ़ी – तिरछी खड़ी थी...और पूरे ट्रैफिक को जाम कर रही थी...या फिर वो भी उतनी ही जिम्मेदार थी। जाहिर है जवाब होगा कि शायद चमचमाती लंबी कारों के चालक भी उतने ही दोषी थे...लेकिन फिर सवाल ये उठता है कि ट्रैफिक पुलिस के उस जवान ने या कहें आधिकतर जवान अलग – अलग जगहों पर ऐसी स्थिति में सिर्फ रिक्शा चालक पर ही क्यों अपना गुस्सा उतारते हैं। शायद इसलिए कि उन्हें रिक्शा चालक अपना गुस्सा उतारने का आसान तरीका लगता है और वे ये सोचते हैं कि रिक्शा चालक कम से कम उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। ट्रैफिक को जाम कर बैठी किसी चमचमाती लंबी गाड़ी के चालक को अगर टोकने या रोकने का प्रयास किया तो शायद उस गाड़ी वाले की पहुंच या फिर रसूख कहीं उसका तबादला या उसे सस्पेंड न करवा दे। हालांकि ऐसा नहीं है कि सभी ट्रैफिक पुलिसकर्मी ऐसे सोचते हैं या ऐसा करते हैं...कुछ एक अपवाद भी हमें देखने को मिलते हैं जो सिर्फ अपनी ड्यूटी निभाते हैं और नियम तोड़ रही चाहे वो चमचमाती लंबी गाड़ी हो या फिर रिक्शा या ऑटो चालक वे सभी को एक तराजू में तोलते हैं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर ऐसे ट्रैफिक पुलिस कर्मी जिनकी बड़ी तादाद रिक्शे को पंचर करने में विश्वास रखती है..आखिर उनके ऐसा करने की बड़ी वजह क्या है। वैसे शायद ये हमारे सिस्टम में ही है कि गरीब, लाचार और बेसहारा लोगों पर जुल्म कर लो...क्योंकि उनकी सुनने वाला कोई नहीं है...और यही तो होता आ रहा है...हर जगह बेसहारा, गरीब और लाचार दबाए जा रहे हैं...जबकि चमचमाती लंबी गाड़ी वाले...ऊंची पहुंच वाले रसूखदारों को हर जगह पहली पंक्ति में जगह मिलती है...और बिना पंक्ति में लगे ही उनके सारे काम अंदरखाने हो जाते हैं। आप सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान का उदाहरण ले लें या फिर ड्राईविंग लाईसेंस बनवाने पहुंच जाएं...हर जगह ऐसा ही होता है...शायद अधिकतर लोगों ने इसको महसूस भी किया होगा। सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान खोलने के पीछे की भावना शायद यही थी कि गरीबों को बाजार से कम मूल्य पर सस्ती दर पर राशन मिल सके...लेकिन गरीबों के लिए आने वाला आधे से ज्यादा राशन ब्लैक हो जाता है। ऐसा एक नहीं तमाम उदाहरण हैं। ऊपर से लेकर नीचे तक मंत्रियों से नेता तक, अफसरों से लेकर बाबू तक हर कोई कहीं न कहीं...किसी न किसी रूप में इस सब के लिए जिम्मेदार हैं...मंत्री और आला अफसर सोचते तो हैं कि बाबू और कर्मचारी अपना काम ईमानदारी से करें...लेकिन खुद पर अपनी कही बातों को लागू नहीं करते। छत में अगर छेद होने से लीकेज हो रहा है तो...जाहिर है कि लीकेज ठत का छेद ऊपर से बंद करने पर ही रूकेगा न कि नीचे से बंद करने पर...लेकिन हमारे मंत्री, नेता, अफसर सोचते हैं कि छेद नीचे से बंद हो न कि ऊपर से। क्योंकि शायद वे जानते हैं कि छेद ऊपर से बंद कर दिया तो लीकेज की तरह होने वाली उनकी कमाई भी बंद हो जाएगी। बहरहाल बात रिक्शा पंचर होने के दृश्य से निकली थी...इसकी गूंज बहुत दूर तक जाती है...आम आदमी इस पर सोचकर परेशान भी होता है...लेकिन शायद इन नेताओं और अफसरों के कानों तक ये गूंज नहीं पहुंचती...इनकी आंखे शायद इस दृश्य को देखकर अनदेखा कर देती हैं...और यही वजह है कि एक ट्रैफिक पुलिसकर्मी रिक्शा चालाक को थप्पड़ मारने से गुरेज नहीं करता...उसका रिक्शा पंचर करने से भी नहीं हिचकिचाता...और हिचकिचाता है तो बस रिक्शे के साथ ही ट्रैफिक को जाम कर रही उस लंबी चमचमाती गाड़ी की तरफ देखने से...उस गाड़ी में सवार रसूखदार से कुछ कहने से।

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मंगलवार, 6 नवंबर 2012

‘राज’नीति



ज्यादा दिन नहीं हुए जब हरियाणा के सूरजकुंड में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में नितिन गडकरी के दोबारा भाजपा अध्यक्ष बनने का रास्ता साफ हो गया था...और कार्यसमिति के सभी सदस्यों ने हाथ उठाकर इसका अनुमोदन किया था...दरअसल संघ की मंशा थी कि भाजपा हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा चुनाव के साथ ही 2013 में 9 राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव और 2014 के आम चुनाव को गडकरी के नेतृत्व में लड़े...लेकिन गडकरी पर उठी एक ऊंगली ने भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दे पर मिशन 2014 की तैयारी में लगी भाजपा की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। पहले कांग्रेस की नींद उड़ा चुके सामाजिक कार्यकर्ता से राजनेता बने अरविंद केजरीवाल की एक प्रेस कांफ्रेंस ने भाजपा के मिशन 2014 के सपनों पर मानो कुठाराघात कर दिया...रही सही कसर पूरी कर दी उन मीडिया रिपोर्टों ने जिसमें गडकरी की कंपनी में फर्जी कंपनियों के हुए निवेश को उजागर किया गया। भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोपों से घिरी कांग्रेस को तो मानो गडकरी पर आरोप लगने के बाद संजीवनी मिल गयी। पहले कांग्रेस ने घेरा तो भाजपा ने जमकर अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष का बचाव किया...लेकिन इसके बाद गडकरी अपनी ही पार्टी में घिरते चले गए। हालात ऐसे हो गए कि गडकरी पर इस्तीफे का दबाव बढ़ता गया और कई बड़े भाजपा नेता गडकरी से किनारा करने लगे...हालांकि खुलकर किसी भी भाजपा नेता ने इस बात को नहीं कहा सिवाए राम जेठमलानी और उनके बेटे महेश जेठमलानी के...लेकिन अपने ही घर में गडकरी बुरी तरह घिर गए। राजनीति में सियासी दलों और नेताओं की चाल, चरित्र और चेहरे कैसे बदल जाते हैं, इसका अंदाजा गडकरी के मामले से आसानी से लगाया जा सकता है। गडकरी पर उठी एक ऊंगली ने गडकरी को अर्श से फर्श पर पहुंचाने की पूरी रूप रेखा तय कर दी...जो पार्टी अपने निजाम के साथ कदम से कदम मिलाकर भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान शुरु करने का दम भरते हुए सत्ता में लौटने का ख्वाब देख रही थी...उस पार्टी के निजाम ही भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर गए तो ऐसा होना ही था। लेकिन आखिर में दिनभर की जद्दोजहद के बाद आखिरकार भाजपा ने खुद ही गडकरी को क्लीन चिट देते हुए गडकरी के नेतृत्व पर पूरा भरोसा होने का ऐलान करने के साथ ही गडकरी के इस्तीफे की अटकलों को खारिज कर दिया। सवाल ये भी है कि जो पार्टी विपक्ष में रहते हुए विरोधियों पर आरोप लगने पर उनके इस्तीफे की मांग करती है वो पार्टी अपने ऊपर बात आने पर अपने नेता को पूरा संरक्षण देते हुए खुद ही उसे क्लीन चिट दे देती है। शायद यही राजनीति है...राज करना है तो समय के साथ अपनी सुविधानुसार नीति को ही बदल डालो और राज करो...वैसे गौर कीजिए भाजपा हो या कांग्रेस या कोई और राजनीतिक दल सभी जगह तो यही हो रहा है।
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सोमवार, 5 नवंबर 2012

ये कैसी नैतिकता…?


 केन्द्र की कांग्रेस नीत सरकार पर लगे भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोपों को लेकर मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा समेत तमाम विरोधी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ ही आरोपों से घिरे उनके मंत्रियों से इस्तीफे का मांग कर रहे हैं...लेकिन जब यही आरोप देश की मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पर लगता है तो उनकी ही पार्टी उनका खुलकर बचाव करती है। विरोधियों पर भ्रष्टाचार के आरोपों पर उनसे इस्तीफा मांगने वाले खुद के दामन पर छींटे पड़ने पर चुप्पी साध लेते हैं। हालांकि कुछ एक नेता ऐसे हैं जो अपनी ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पर सवाल खड़े करते हुए इस्तीफा मांगते हैं...लेकिन ये गिनती में ही हैं। माना सोनिया गांधी ने भ्रष्टाचार और घोटालों से घिरे अपने मंत्रियों का बचाव करते हुए उनकी पीठ थपथपाते हुए उन्हें प्रमोशन दे दिया...तो क्या आप भी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सोनिया के कदमों पर ही चलेंगे। हालात तो कुछ ऐसा ही बयां कर रहे हैं...जिस तरह गडकरी के भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर ताजपोशी का रास्ता गडकरी का बचाव कर साफ किया जा रहा है...उससे इस पर मुहर लगती भी दिखाई दे रही है। भाजपा दूसरों को तो नैतिकता का पाठ पढ़ाती है लेकिन जब उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष पर जब भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं तो भाजपा की नैतिकता जाने कहां चली जाती है। एक तरफ तो आप भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान छेड़ने के बात कहते हुए 2014 में देश की सत्ता पर काबिज होने का ख्वाब देखते हैं...लेकिन आपके शीर्ष नेता पर आरोपों पर आप चुप्पी साध लेते हैं। भ्रष्टाचार और घोटालों के खिलाफ आप प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांगते हुए संसद ठप कर देते हैं, लेकिन जब खुद पर बन आती है तो आप आरोपों को ही नकारते नजर आते हैं। साफ है कि भ्रष्टाचार को कैंसर बताते हुए कांग्रेस और भाजपा इसे जड़ से खत्म करने के साथ ही भ्रष्टाचारियों को सजा दिलाने की बात करते हैं...लेकिन खुद गले तक भ्रष्टाचार के दलदल में डूबे हुए हैं...ऐसे में कैसे ये दोनों पार्टियां भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए कारगर कदम उठाएंगी...ये बड़ा सवाल है। सवाल इसलिए भी क्योंकि दोनों ही पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं...और दोनों ही पार्टियों के नेता भ्रष्टाचार में घिरे साथी नेताओं का न सिर्फ खुलकर बचाव करते हैं बल्कि सीना ठोक पर उन्हें निर्दोष बताते हैं। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देश के दोनों ही प्रमुख दलों का ये रवैये निश्चित ही दुर्भाग्यपूर्ण हैं। सत्ताधारी दल के नेता सत्ता के लालच में गंभीर आरोप लगने के बाद भी जहां कुर्सी छोड़ने से कतराते हैं तो वहीं मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा का भी कुछ ऐसा ही हाल है। न तो मनमोहन सिंह और उनकी टीम के दागी मंत्री नैतिकता के नाम पर इस्तीफा देने की हिम्मत जुटा पाते हैं और न ही दूसरों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाली भाजपा के नेताओं में ही पद छोड़ने का साहस है। भारतीय राजनीति में एक दौर वो भी था जब सिर्फ ऊंगली मात्र उठ जाने पर नेता पद और कुर्सी का मोह छोड़ इस्तीफा दे देते थे...लेकिन अब वक्त बदल गया है, नैतिकता राजनीति से गायब हो गयी है...या यूं कहें कि नेताओं ने नैतिकता की हत्या कर दी है। नेता अब सिर्फ और सिर्फ कुर्सी के लिए...लाल बत्ती के लिए जीते हैं...उन पर तमाम ऊंगलियां उठे लेकिन उन्हें किसी की कोई परवाह नहीं है...शायद वे ये समझते हैं कि जनता ने उन्हें चुनकर पांच साल का ऐश परमिट दे दिया है...इसलिए जितनी ऐश करनी है कर लो...क्या पता फिर मौका मिले न मिले सत्ता में आने का।   

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रविवार, 4 नवंबर 2012

ये राजनीति है...


एफडीआई और महंगाई पर सरकार के फैसलों के साथ ही भ्रष्टाचार और तमाम घोटालों के आरोप से घिरी कांग्रेस ने न सिर्फ दिल्ली के रामलीला मैदान से देश की जनता को सफाई देने की कोशिश की बल्कि कड़े फैसलों के पीछे सरकार की मजबूरी का भी बखान किया। दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस की सर्वेसर्वा सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ ही कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने जनता के सामने न सिर्फ एक के बाद एक सरकार के फैसलों पर सफाई दी बल्कि मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा पर जमकर हल्ला बोला। एफडीआई के मुद्दे पर तो सरकार के तमाम मंत्री दर्जनों बार सफाई दे चुके थे...लेकिन महंगाई पर आज पहली बार सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह ने बात की। हालांकि महंगाई पर ये लोग सिर्फ सरकार की मजबूरी ही सामने रख सके...लेकिन महंगाई से निकट भविष्य में आम जनता को राहत देने जैसी कोई बात इन्होंने नहीं की। हां भ्रष्टाचार को लेकर सोनिया गांधी ने खूब हुंकार भरी और जैसा वो करती आई हैं ठीक उसी तरह भ्रष्टाचार में लिप्त सरकार के नुमाइंदों का बचाव करती दिखाई दी। लेकिन अपनों को बचाने के साथ ही विपक्षियों पर भ्रष्टाचार को लेकर निशाना साधने से सोनिया नहीं चूकी। अच्छा लगा जब एफडीआई और बढ़ती महंगाई पर सरकार का पक्ष रखने कांग्रेस आगे आई...भ्रष्टाचार पर सोनिया का रवैया और तेवर तो काबिले तारीफ थे...लेकिन भ्रष्टाचार की कालिख से अपनों को बचाना और दूसरों पर ताने मारना ये समझ से परे था। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि भ्रष्टाचार सिर्फ कांग्रेस ही नहीं बल्कि अधिकतर राजनीतिक दल और राजनेता इस दलदल में गले तक डूबे हुए हैं...और किसी का भी दामन पाक साफ नहीं कहा जा सकता...लेकिन सोनिया गांधी का ये कौन सा पैमाना है कि खुद के लोगों पर आरोप साबित होने तक वो दोषी नहीं है और दूसरों को आप चिल्ला चिल्ला कर दोषी ठहराएं। वैसे आपके लिए अपने लोग कितने महत्वपूर्ण हैं वो तो आप भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे अपने प्रिय सलमान खुर्शीद को प्रमोशन दे जता ही चुकी हैं...ऐसे में आप जनता के सामने ये चिल्ला चिल्ला कर भले ही कह लें कि भ्रष्टाचार कैंसर की तरह है और आप भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई करेंगी...लेकिन आपके दोहरे रवैये तो देख आप से कम से कम ये उम्मीद करना तो बेईमानी ही होगी कि भ्रष्टाचारियों के खिलाफ आप कोई कार्रवाई करेंगी। खैर इसमें दोष आपका भी नहीं है कमबख्त राजनीति चीज ही ऐसी है कि ये सब करे बिना काम भी तो नहीं चलता।
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शनिवार, 3 नवंबर 2012

पापा का सपना पूरा करेगा सीएम बेटा !


केन्द्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा वैसे तो अपने अजीबो गरीब बयान के लिए चर्चा में ज्यादा रहते हैं...लेकिन इस बार बेनी बाबू ने जो बोला उस पर सहसा विश्वास नहीं होता कि बेनी प्रसाद वर्मा ऐसा भी सोचते हैं। बेनी प्रसाद वर्मा ने उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार के फैसलों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि सपा सरकार मुसलमानों के वोटों के लिए उत्तर प्रदेश में सिर्फ मुसलमानों में कृपा बरसा रहा है। दरअसल बेनी बाबू को अखिलेश सरकार के उस फैसले पर एतराज है जिसमें सपा सरकार ने राज्य के मुसलमान परिवार की बेटियों के विवाह और पढ़ाई के लिए 30 – 30 हजार रूपए बांट रही है। बेनी बाबू का कहना है कि क्या सिर्फ मुसलमान ही गरीब हैं ? बेनी साहब ये भी कहते हैं कि अगर 70 फीसदी मुसलमान गरीब हैं तो फिर 95 फीसदी अनुसूचित जाति, 25 फीसदी पिछड़े और 10 फीसदी सामान्य वर्ग के लोग भी बेहद गरीबी का जीवन जी रहे हैं...ऐसे में सरकार सिर्फ मुसलमानों पर ही नेमत क्यों बरसा रही है। उत्तर प्रदेश की सपा सरकार के फैसले पर ऊंगली उठाने वाले ये वही बेनी बाबू हैं जो कुछ दिन पहले तक सपा सरकार को सौ में से सौ नंबर दे चुके हैं। वैसे मंत्री जी के सपा सरकार को 100 नंबर देने पर ज्यादा अचरज नहीं हुआ था...क्योंकि बेनी बाबू के श्रीमुख से ऐसे ही बयानों की उम्मीद की जाती रही है। लेकिन मुसलमानों के साथ ही दूसरे वर्ग के गरीबों पर बेनी बाबू की चिंता ने बहस का नया विषय तो खड़ा कर ही दिया है। लेकिन देखने वाली बात ये है कि क्या ये सिर्फ बेनी प्रसाद वर्मा जी का सिर्फ एक बयान है या फिर 2014 के आम चुनाव को ध्यान में रखते हुए दिया गया बयान। बेनी बाबू कांग्रेस से ताल्लुक रखते हैं और हालिया विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस युवराज राहुल गांधी के पूरी ताकत झोंकने के बाद भी कांग्रेस की हालत किसी से छुपी नहीं है...ऐसे में विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटों को साधने में नाकाम रही कांग्रेस कहीं 2014 में अन्य वर्ग के वोटों को साधने की तैयारी में तो नहीं है...! मंत्री जी का बयान इस ओर भी ईशारा करता दिखाई दे रहा है। बहरहाल मुद्दे की अगर बात करें तो मुद्दा बेहद गंभीर है और इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि उत्तर प्रदेश क्या देशभर में मुसलमानों के अलावा भी जो आबादी है उसका भी एक बहुत बड़ा वर्ग बेहद गरीब है...ऐसे उत्तर प्रदेश के लिहाज से ही अगर बात करें तो यहां पर स्थिति वाकई में गंभीर है और सिर्फ मुसलमानों के अलावा भी बड़ा वर्ग गरीबी में जीवन व्यतीत कर रहा है। ऐसे में अगर अखिलेश सरकार सिर्फ मुसलमानों को फायदा पहुंचाती है या कोई योजना शुरु करती है तो सवाल खड़े उठने लाजिमी है। वैसे सपा सरकार के इस फैसले के पीछे की वजह खोजने की कोशिश की जाए तो स्पष्ट होता है कि सपा की निगाहें भी 2014 के आम चुनाव पर ही है...और देश की राजनीति तय करने वाले सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश के रास्ते दिल्ली की सत्ता में तीसरे मोर्चे के सहारे काबिज होने का मुलायम सिंह का पुराना सपना साफ नजर आता है...और हालिया घटनाक्रमों के बाद इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता कि मुलायम सिंह इसमें कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते। कांग्रेस इस पर इसलिए भी सवाल उठा रही है कि वो अच्छी तरह जानती है कि उसे केन्द्र की सत्ता में तीसरी बार काबिज होना है कि उत्तर प्रदेश में अपनी स्थ्ति सुधारनी होगी। बहरहाल विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को सिर आंखों में बैठाने वाली उत्तर प्रदेश की जनता 2014 में प्रस्तावित केन्द्र की सत्ता की लड़ाई की चाबी सौंपने लायक किसे बनाएगी ये तो भविष्य के गर्भ में है...लेकिन इस चाबी को हासिल करने के लिए सियासी जंग शुरु  जरुर हो चुकी है और जो खासी रोचक होने की भी पूरी उम्मीद है।


शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

क्या राहुल गांधी बुद्धू हैं ?


कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी जिन्हें कांग्रेस देश का भावी प्रधानमंत्री कहती है क्या वे बुद्धू हैं ?  जनता दल के अध्यक्ष सुब्रहमण्यम स्वामी के राहुल गांधी और सोनिया गांधी पर आरोप के बाद...राहुल ने मानहानि का मुकदमा करने की जो धमकी स्वामी को दी...उसके बाद स्वामी का ट्विट तो यही कहता है कि राहुल गांधी बुद्धू हैं। स्वामी के इस ट्विट के बाद सियासी गलियारों में भी ये चर्चाएं गर्म हैं कि राहुल गांधी कहीं सच में बुद्धू तो नहीं! अगर इसका जवाब हां में है तो फिर कांग्रेसियों को राहुल गांधी के बारे में अब आगे से बहुत सोच समझकर बोलना चाहिए। स्वामी के इस बयान के बाद खुद की एक गंभीर युवा नेता की छवि पेश करने की कोशिश करने वाले राहुल गांधी को झटका जरुर लगा होगा। राहुल ने शायद ही ये कभी सोचा होगा कि कोई उनको बुद्धू तक की उपाधि दे सकता है। वैसे राहुल ने जिस तेजी से स्वामी के आरोपों पर पलटवार करते हुए कानूनी कार्रवाई करने के साथ ही मानहानि की धमकी दी थी...उससे तो यही लगा था कि राहुल गांधी खुद की छवि पर दूसरे कांग्रेसियों की तरह कोई दाग नहीं लगने देना चाहते...लेकिन जिन दस्तावेजी सबूतों के साथ स्वामी ने राहुल गांधी और सोनिया गांधी की घेराबंदी की है...उससे इन आरोपों से पाक साफ बच निकलना फिलहाल राहुल और सोनिया के लिए आसान तो नहीं दिखाई दे रहा। और अब जबकि कांग्रेस ने इस बात को स्वीकार कर लिया है कि कांग्रेस ने नेश्नल हेराल्ड और कौमी आवाज़ आखबार निकालने वाली कंपनी एसोसिएट जर्नल्स (एजीपीएल) को 90 करोड़ रूपए बिना ब्याज पर कर्ज दिया था...ऐसे में स्वामी के आरोप औऱ मजबूत होते दिखाई दे रहे हैं। हालांकि कांग्रेस ये कहते हुए अपना पल्ला बचाने की कोशिश कर रही है कि नेशनल हेराल्ड ने देश के स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाई थी...ऐसे में नेशनल हेराल्ड को कर्ज देना कांग्रेस के लिए गर्व की बात है...लेकिन नियम कहते हैं कि राजनीतिक पार्टी राजनीतिक उद्देश्यों के लिए जुटाए धन को किसी कंपनी को कर्ज नहीं दे सकती...ऐसे में स्वामी के आरोप अब सोनिया और राहुल की गले की फांस बनते जा रहे हैं...और समूचे विपक्ष ने इसको लेकर सोनिया और राहुल को घेरना शुरु कर दिया है। बहरहाल हालात देखकर तो फिलहाल यही लगता है कि कांग्रेस के साथ ही गांधी खानदान के सितारे भी गर्दिश में चल रहे हैं। पहले सरकार में एक के बाद एक घोटाले उजागर होते हैं...प्रधानमंत्री समेत तमाम मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं...उसके बाद गांधी खानदान के दामद राबर्ट वाड्रा पर ऊंगलिया उठती हैं और अब गांधी परिवार की मुखिया सोनिया गांधी और युवराज राहुल गांधी पर भ्रष्टाचार के आरोप लग गए हैं...यानि कि गांधी परिवार फिलहाल तो मुश्किल में नजर आ रहा है। अब देखना ये होगा कि एक के बाद एक आरोपों की बौछार से गांधी परिवार खुद को कैसे बचाता है और पाक साफ साबित करता है। वैसे सोनिया गांधी ने भ्रष्टाचार में घिरे अपने मंत्री की तो पीठ थपथपाकर उन्हें प्रमोशन दे दिया लेकिन खुद के दामन में लगे दाग पर सोनिया क्या कदम उठाती हैं...ये देखने वाली बात होगी...साथ ही स्वामी से बुद्धू की उपाधि पाए राहुल कैसे साबित करेंगे कि वे बुद्धू नहीं हैं...ये देखना भी रोचक होगा।
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गुरुवार, 1 नवंबर 2012

अब जनता फोड़ेगी भ्रष्टाचार का घड़ा


सोनिया गांधी की कृपा से प्रमोशन पाकर कानून मंत्री से विदेश बनने वाले सलमान खुर्शीद के घर फर्रुखाबाद में अरविंद केजरीवाल की रैली ने कुछ हो न हो खुर्शीद की नींद तो जरुर उड़ा दी होगी। खुर्शीद भले ही इस रैली को नजरअंदाज करनी की कोशिश कर रहे हों...लेकिन जिस तेवर के साथ खुर्शीद ने कानून मंत्री रहते हुए केजरीवाल को फर्रुखाबाद आकर वहां से सही सलामत लौटने की चेतावनी दी थी...उससे तो ये उसी दिन साफ हो गया था कि खुर्शीद केजरीवाल की रैली को लेकर बेचैन भी थे और खुद के घर में अपनी घेराबंदी से परेशान भी...हालांकि खुर्शीद के चंद समर्थकों ने केजरीवाल एंड कंपनी को रोकने की पूरी कोशिश भी कि लेकिन उनके मंसूबे कामयाब नहीं हो पाए और केजरीवाल ने न सिर्फ खुर्शीद के घर फर्रुखाबाद में उनकी और उनके एनजीओ की कारगुजारियों की पोल खोली बल्कि मंच से खुलकर चुनौती भी दी...लेकिन खुर्शीद और उनके समर्थक मन ही मन केजरीवाल को कोसने के अलावा कुछ और नहीं कर पाए। केजीरवाल ने खुर्शीद के खिलाफ हल्ला बोलते हुए वहां की जनता से अगले चुनाव में खुर्शीद को सबक सिखाने की अपील तो की है...लेकिन हैरानी होती है कि भ्रष्चाचार के खिलाफ बोलने वाली सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह उनको संरक्षण देते नजर आते हैं। भ्रष्टाचार पर बोलते हुए हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में जनसभा में सोनिया ने भाजपा पर भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ कोई कार्रवाई न करने का आरोप तो लगाया...लेकिन सोनिया गांधी ये कैसे भूल गई कि वे खुद भ्रष्टाचार के सांपों को अपने आस्तीन में पाल रही हैं...न सिर्फ पाल रही हैं बल्कि उन्हें खूब दूध भी पिला रही हैं। बात सलमान खुर्शीद की ही हो रही है...जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगने के बाद सोनिया उन्हें प्रमोशन दे देती हैं। हालांकि इसके पीछे एक तर्क नजर आता है कि सोनिया गांधी को वफादार लोग शायद ज्यादा पसंद हैं। भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद सलमान खुर्शीद का एक बयान याद आता है जब वे कहते हैं कि वे सोनिया गांधी के लिए जान तक दे सकते हैं...सोनिया को इससे बढ़िया वफादार कहां मिल सकता था...जो सिर्फ उनकी ही सुने...उनकी ही बात करे...तो सोनिया ने भी खुर्शीद को तत्काल ईनाम दे डाला और कानून मंत्री से प्रमोशन देकर बना डाला विदश मंत्री। ऐसे में खुर्शीद और उन जैसे सोनिया के वफादार नेताओं पर भ्रष्टाचार के कितने ही आरोप क्यों न लग जाएं...उकी कुर्सी तो उनसे कोई नहीं छीन सकता। हालांकि केजरीवाल ने खुर्शीद और उन जैसे भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ लड़ाई जारी रखने का ऐलान किया है...ऐसे में उम्मीद करते हैं देर सबेर ही सही इन नेताओं का...इनको संरक्षण देने वालों के भ्रष्टाचार का घड़ा एक दिन जरुर फूटेगा...और देश की जनता से बेहतर इस काम को कोई और नहीं कर सकता।

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राहुल को गुस्सा क्यों आता है ?


राहुल गांधी कोई इन्हें कांग्रेस का युवराज कहता है तो कोई देश का भावी प्रधानमंत्री...कांग्रेसी नेताओं के लिए राहुल ही सबकुछ हैं...और इनके मुताबिक तो राहुल ही प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालकर देश का कल्याण कर सकते हैं। हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी लगता है कि राहुल उनकी टीम का हिस्सा बनेंगे तो ही देश का उद्धार हो पाएगा। मनमोहन सिंह कह कहकर थक गए लेकिन राहुल गांधी कैबिनेट में शामिल नहीं हुए तो नहीं हुए। राहुल गांधी ने कई राज्यों में कांग्रेस की नैया पार लगाने की कोशिश की लेकिन असफल ही रहे। इस दौरान कभी भी राहुल गांधी को गुस्से में नहीं देखा...वे हर बार कभी दलित के घर खाना खाकर जमीन से जुड़े होने का एहसास जनता को कराते रहे तो कभी हिंसा पीड़ितों से मुलाकात करते हुए दिखाई दिए। आमतौर पर चुनावी जनसभाओं में राहुल के तेवर थोड़े उग्र जरुर दिखाई दिए...अब 31 अक्टूबर की उनकी हिमाचल प्रदेश में जनसभा ही देख लें...राहुल भाजपा पर जमकर बरसे। लेकिन 01 नवंबर को जनता दल के अध्यक्ष सुब्रहमण्यम स्वामी की प्रेस कांफ्रेंस ने राहुल को आग बबूला कर दिया। राहुल ने स्वामी को न सिर्फ कानूनी कार्रवाई करने की धमकी दी बल्कि ये तक कह डाला की ये अभिव्यक्ति की आजादी का दुरुपयोग है। राहुल गांधी को इतने गुस्से में तो पहले कभी नहीं देखा था...लेकिन स्वामी के शब्द बाण लगता है राहुल के दिल पर गहरा असर कर गए। वैसे राहुल गुस्सा करें भी क्यों न केन्द्र सरकार के पीछे पहले से ही पड़े स्वामी ने इस बार राहुल के साथ ही राहुल की मां सोनिया गांधी पर जो निशाना साधा। स्वामी ने न सिर्फ राहुल के नाम बेनामी संपत्ति होने का आऱोप लगाया बल्कि कहा कि यंग इंडिया नामक कंपनी में राहुल और सोनिया के 76 फीसदी शेयर हैं और दोनों का कंपनी पर मालिकाना हक है लेकिन राहुल गांधी ने चुनाव आयोग को कभी इस संबंध में कोई जानकारी नहीं दी। राहुल गांधी और उनकी मां पर सीधा तीर स्वामी ने छोड़ा था तो राहुल कहां चुप रहने वाले थे...राहुल का गुस्सा फूट पड़ा। आमतौर पर शालीन दिखने वाले राहुल गांधी स्वामी के आरोपों पर क्यों इतने तिलमिला उठे ये सोचने वाली बात है। राहुल की बात करें तो राहुल पर सीधे इस तरह के आरोप पहले कभी नहीं लगे और राहुल अपनी एक अलग छवि बनाकर सक्रिय राजनीति से थोड़ी दूरी बनाकर अपना काम करते देखे गए हैं। हां राहुल ऐसे किसी मौके पर चूकते हुए भी नहीं दिखाई दिए जहां से उन्हें लोगों से सीधे जुड़ने का मौका मिलता हो...लेकिन इस सब के बाद भी राहुल का करिश्मा कांग्रेस के लिए बहुत ज्यादा काम करता नहीं दिखाई दिया। राहुल की उपस्थिति भले ही लोगों की भीड़ को इकट्ठा करती दिखाई दी हो लेकिन ये भीड़ कभी भी राहुल से प्रभावित नहीं दिखी...ऐसा होता तो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, और बिहार जैसे राज्यों में कांग्रेस की स्थिति कुछ और ही होती। आरोप लगने पर राहुल का गुस्सा कहीं न कहीं ये ईशारा भी करती है कि कहीं ये राहुल की खीज तो नहीं जो उनकी बेदाग छवि (जैसा कांग्रेसी बखान करते हैं) पर आरोप लगने के बाद गुस्से के रूप में बाहर आई है। और शायद एक वजह ये भी कि स्वामी ने राहुल के साथ ही उनकी मां सोनिया गांधी को भी आरोपों के घेरे में ला खड़ा किया। बहरहाल वजह चाहे जो भी हो लेकिन स्वामी के आरोपों पर राहुल के तेवर से ये साफ हो गया है कि राहुल अब राजनीति के छात्र नहीं रहे बल्कि राजनीति की पाठशाला से बाहर निकलकर राजनीति में पूरी तरह सक्रिय हो गए हैं...वैसे हो भी क्यों न कांग्रेसियों ने पूरी तैयारी जो कर ली है राहुल गांधी को मनमोहन सिंह के बाद देश का अगला प्रधानमंत्री बनाने के लिए...लेकिन ये सवाल अपनी जगह है कि आखिर राहुल का नंबर कब आएगा ?

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कौन सुनेगा...किसको सुनाएं ?


कौन सुनेगा...किसको सुनाए...इसलिए चुप रहते हैं...किशोर कुमार का ये मशहूर गाना आपने जरुर सुना होगा...ये गाना बिल्कुल फिट बैठता है हमारे देश के मतदाताओं पर जो राजनेताओं के झूठे वादों से त्रस्त आकर चुनाव से पहले एक रहस्यमयी चुप्पी साधने लगे हैं। हिमाचल प्रदेश विधानसभा के लिए 04 नवंबर 2012 को मतदान होना है...ऐसे में ऐसा ही कुछ हाल आजकल हिमाचल प्रदेश के मतदाताओं का भी है। मतदान में चंद दिन शेष रह गए हैं...मतदाताओं को रिझाने के लिए प्रत्याशियों ने पूरी ताकत झोंक दी है...लेकिन मतदाता एकदम खामोश है। मानो मन ही मन ये गाना गुनगुना रहे होंकौन सुनेगा किसको सुनाए…इसलिए चुप रहते हैंकिशोर कुमार की ये पंक्तियां इस लिहाज से भी मतदाताओं पर सटीक बैठती हैं क्योंकि इससे पहले के चुनावों पर नज़र डाल लें तो सामने आता है कि चुनाव से पहले राजनीतिक दल अपने घोषणापत्र में जनता से बड़े-बड़े वादे तो करते हैं और उन्हें पूरा करने का दम भी भरते हैं...लेकिन चुनाव जीतने के बाद या सत्ता में आ जाने के बाद उनके ये दावे सिर्फ दावे ही रह जाते हैं। मतदान करने के बाद जनता ठगी रह जाती है और नेता ये समझते हैं कि उन्हें पांच साल का लाईसेंस जनता ने दिया है लूट खसोट मचाने के लिए...जो हम देखते भी आए हैं। वैसे देखें तो अपने जनप्रतिनिधि से जनता की अपेक्षाएं क्या होती हैं...? सिर्फ इतना ही कि उसके क्षेत्र का समुचित विकास हो...उसे बिजली मिले...पानी मिले और उसके इलाके की सड़कें दुरुस्त हो...जिन पर से होकर वो रोज दफ्तार जाता है, व्यापार करने जाता है या बाजार जाता है। मुझे नहीं लगता इससे ज्यादा कोई अपेक्षा जनता की अपने जनप्रतिनिधि से रहती हैं। लेकिन हमारे राजनेता चुनाव जीतने के बाद शायद ये भूल जाते हैं कि उसे जनता ने सेवा करने के लिए चुना है मेवा खाने के लिए नहीं...लेकिन नेता जी मेवा खाने में ही इतने व्यस्त रहते हैं कि उन्हें अपने क्षेत्र की जनता की परवाह ही नहीं रहती। एक फिल्म का दृश्य मेरे जेहन में ताजा हो रहा है, जो इस प्रकार है...एक व्यक्ति अपनी समस्या लेकर अपने क्षेत्र के विधायक के पास पहुंचता है...वहां का नजारा कुछ इस प्रकार है- नेता जी का मुंह पान से लाल है...दो चेले नेता जी की सेवा में लगे हैं...और नेता जी पान चबाते चबाते किसी को फोन पर गलिया रहे हैं। वह व्यक्ति नेता जी के कान से फोन हटते ही अपनी समस्या रखता है कि उसके बेटे को पुलिस ने गलत आरोप में पकड़ लिया है...तो वे उसकी मदद करें और चलकर पुलिसवालों से बात करें...लेकिन नेता जी व्यक्ति को ये कहकर दुत्कार देते हैं कि उसके बेटा चोर होगा...व्यक्ति एक बार फिर से नेता जी से आग्रह करता है कि उसने उनको वोट दिया है...ऐसे में अपने क्षेत्र की जनता के साथ उनको देना चाहिए...इतना सुनते ही नेता जी का पारा चढ़ जाता है और वे उस व्यक्ति को गलियाते हुए कहते हैं कि- मुझे वोट दिया है तो क्या मैं तेरे घर पर आकर झाडू लगाउं। उस व्यक्ति के पास इस बात का कोई जवाब नहीं होता है...और इसके बाद वह व्यक्ति निराश होकर वहां से लौट जाता है। ये फिल्म का दृश्य हमारे आजकल के अधिकतर नेताओं के चरित्र से मेल खाता दिखाई देता है। नेता जी आपको चुनने वाला आपसे ये कतई नहीं चाहता कि आप उसके घर पर आकर झाड़ू लगाएं...लेकिन इतना जरूर चाहता है कि उसकी हर परेशानी में तो कम से कम आप उसके साथ खड़े रहें...क्या आपको ऐसा नहीं लगता...नेता जी इसका जवाब अगर नहीं है तो आपको बधाई...आप राजनीति के रंग में पूरी तरह रंग गए हैं औऱ एक पक्के राजनीतिज्ञ बन गए हैं। हिमाचल की जनता की खामोशी भी आजकल शायद कुछ ऐसा ही कह रही है...शायद इसलिए मतदान से चंद दिन पहले हिमाचल में एक खामोशी सी पसरी हुई है। ऐसे में देखना ये होगा कि मतदाताओं की ये खामोशी हिमाचल में क्या गुल खिलाती है। हिमाचल की रवायत की अगर बात करें तो वहां की रवायत सत्ता परिवर्तन की है...और हर पांच साल में जनता सत्ता परिवर्तन कर देती है...लेकिन इस बार मतदान से पहले की मतदाताओं की रहस्यमयी खामोशी कुछ और ही कहानी बयां कर रही है...और साफ ईशारा कर रही है कि हिमाचल में इस बार कुछ नया होगा...और आसानी से किसी को भी हिमाचल की सत्ता में राज करने का मौका नहीं मिलने वाला...चाहे वो सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी हो या फिर हिमाचल की रवायत के सहारे सत्ता में वापसी की उम्मीद लगाए बैठी कांग्रेस पार्टी। बहरहाल ये चुप्पी 04 नवंबर को टूट जाएगी...और 20 दिसंबर को ईवीएम खुलने के साथ ही साफ हो जाएगा कि ये चुप्पी क्या राज्य की भाजपा सरकार के खिलाफ थी या फिर केन्द्र में काबिज होते हुए भ्रष्टाचार औऱ घोटालों के कई आरोपों से घिरी कांग्रेस के खिलाफ। फिलहाल तो मतदाता खामोश है...और चुनाव लड़ रहे विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रत्याशी बेचैन।
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सोनिया कहती नहीं...करके दिखाती हैं


हिमाचल प्रदेश में चुनाव प्रचार के लिए एक सप्ताह में सोनिया गांधी दो बार पहुंची...पहली बार मंडी और दूसरी बार शिमला और कांगड़ा...सोनिया के पास कहने के लिए कुछ नया नहीं था...ऐसे में सोनिया दोनों ही बार मंच से ये कहती जरूर सुनाई दी कि राज्य की धूमल सरकार ने केन्द्र के पैसे का दुरुपयोग किया है...साथ ही ये कि भाजपा भ्रष्टाचार के बाद चुप बैठ जाती है और भ्रष्टाचार करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करती। गौर कीजिए ये बात यूपीए अध्यक्ष सोनिया कह रही हैं...जिनकी यूपीए सरकार के करीब एक दर्जन से ज्यादा मंत्री गंभीर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हैं...जिनके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर खुद कोयला घोटाले में लिप्त होने का आरोप लगा है। सोनिया जी ये नहीं बताती कि उन्होंने उनकी सरकार में शामिल भ्रष्टाचारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की अलबत्ता वो करके दिखाती हैं भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे सलमान खुर्शीद जैसे मंत्री का प्रमोशन करके। मैं कोई भाजपा की विचारधारा से प्रभावित शख्स नहीं हूं और न ही कांग्रेस का विरोधी...लेकिन शिमला में सोनिया गांधी का ये बयान सुनने के बाद लिखे बिना रहा भी ही गया। खैर ये तो राजनेताओं को चरित्र है...खुद पर आरोप लगे तो कोई दिक्कत नहीं...विपक्षी पर आरोप लगे तो उसे घेरने का कोई मौका मत छोड़ो। सोनिया भी शायद ऐसा ही कुछ कर रही हैं। सोनिया ने शिमला में एक और मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ी...जो शायद इस वक्त कांग्रेस की नैया डुबाने में सबसे बड़ी भूमिका निभा सकता है। वो मुद्दा है महंगाई का...सोनिया शायद उत्तराखंड का टिहरी उपचुनाव और पश्चिम बंगाल का जंगीपुर उपचुनाव नहीं भूली होंगी...टिहरी उपचुनाव में जहां कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी थी और मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के बेटे साकेत बहुगुणा को करारी हार का सामना करना पड़ा और जंगीपुर में 2009 में कराब सवा लाख की जीत का वोटों का अंतर ढाई हजार में सिमट कर रह गया था...और राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के बेटे अभीजीत मुखर्जी बमुश्किल अपनी हार टाल पाए थे। इन दो उपचुनाव के नतीजे शायद सोनिया को महंगाई पर मुहं खोलने के लिए मजबूर कर गए। हालांकि सोनिया यहां भी सिर्फ महंगाई के मुद्दे पर चिंता जताते हुए इस पर विचार करने की बात कहकर ही लोगों को आश्वासन ही देती दिखाई दीं। खैर सोनिया गांधी भी ये बात तो अच्छी तरह समझती होंगी कि महंगाई जैसे ज्वलंत मुद्दे पर सिर्फ आश्वासन से तो कम से कम जनता का काम चलने वाला नहीं है...यानि कि हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में सोनिया अगर सोच रही हैं कि महंगाई पर चिंता जताकर या इस पर सरकार के गंभीर होने की बात कहकर वे कांग्रेस की नैया हिमाचल में पार लगाने में सफल होंगी तो शायद ये सोनिया और कांग्रेस दोनों की गलतफहमी ही होगी। बहरहाल दामन हिमाचल में कांग्रेस की मुख्य प्रतिद्वंदि भाजपा का भी पाक साफ नहीं है और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी के साथ ही राज्य की धूमल सरकार पर भी भ्रष्टाचार के बड़े आरोप लगे हैं...यानि की हिमाचल में राह भाजपा और कांग्रेस दोनों की आसान नहीं है।

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रविवार, 28 अक्टूबर 2012

‘हिंदी’ में बोले मनमोहन सिंह



हिमाचल में विधानसभा चुनाव के लिए चुनाव प्रचार चरम पर है...ऐसे में राज्य के दोनों प्रमुख दल कांग्रेस और भाजपा ने 2014 के आम चुनाव से पहले का सेमिफाइनल माने जा रहे इस चुनाव में जीत के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। 28 अक्टूबर को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कांग्रेस के लिए वोट मांगने हिमाचल प्रदेश के ऊना पहुंचे। मनमोहन सिंह के पहुंचने के बाद उनकी जनसभा में सुखद एहसास ये रहा कि मनमोहन सिंह साहब हिंदी में बोले। इसे सुखद एहसास इसलिए था क्योंकि हमारे पीएम साहब साल में दो ही बार हिंदी बोलते हैं...या तो 15 अगस्त को या फिर 26 जनवरी को...ऐसे में मौका न तो स्वतंत्रता दिवस का था और न ही गणतंत्र दिवस का...फिर भी पीएम साहब की हिंदी सुनकर सुखद एहसास तो होना ही था। मनमोहन सिंह ने हिमाचल प्रदेश में विकास की रफ्तार थमने की बात कहते हुए राज्य की भाजपा सरकार पर जमकर निशाना साधा। जिस समय देश के पीएम मनमोहन सिंह भाजपा को कोस रहे थे...ठीक उसी वक्त ऊना में ही एक और पीएमइन वेटिंग की उपाधि से सजे भाजपा के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी हिमाचल में विकास की बयार बहाने पर मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल की पीठ ठोंक रहे थे। आडवाणी ने केन्द्र की कांग्रेस सरकार को कोसते हुए यहां तक कहा कि 2014 का चुनाव वक्त से पहले होगा और भाजपा की सत्ता की राह हिमाचल से ही प्रशस्त होगी। हिमाचल में जहां भाजपा के लिए अपनी सत्ता बचाने की चुनौती है तो कांग्रेस के लिए हिमाचल की सत्ता में वापसी करने की चुनौती। वैसे हिमाचल की रवायत है कि यहां पर हर पांच साल में यहां की जनता सरकार बदल देती है...लेकिन इस बार देश के हालात कुछ ज्यादा ही जुदा है...और सत्ता में वापसी का ख्वाब संजोए बैठी कांग्रेस भी शायद ये अच्छी तरह से जानती है कि केन्द सरकार के फैसलों से जनता की नाराजगी उसे भारी पड़ सकती है...लिहाजा कांग्रेस ने इस चुनाव में पूरी ताकत झोंक दी है। सोनिया गांधी से लेकर राहुल गांधी हिमाचल में जनसभाएं कर चुके हैं तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी मैदान में उतर गए हैं...भाजपा की अगर बात करें तो हिमाचल और गुजरात के रास्ते केन्द्र की सत्ता की चाबी हासिल करने का ख्वाब देख रही भाजपा भी हर हाल में इन राज्यों में अपनी सत्ता को खोना नहीं चाहती...लिहाजा भाजपा से भी नितिन गडकरी से लेकर सुषमा स्वराज और अरूण जेटली तक राज्य में सभाएं कर चुके हैं...यानि मुकाबला कांटे हैं। कांटे के इस मुकाबले का फैसला भी जनता ने ही करना है...ऐसे में देखना ये होगा कि जनता हिमाचल में एक बार फिर से कमल लहराती है...या फिर हाथ का साथ देती है।


मंगलवार, 23 अक्टूबर 2012

शर्म करो महाराज !


सतपाल महाराज...इस नाम से तो वाकिफ ही होंगे आप...पेशे से राजनीतिज्ञ हैं...लेकिन टीवी पर अक्सर आपको लोगों को ज्ञान बांटते दिखाई दे जाएंगे। उत्तराखंड की पौड़ी संसदीय सीट से सांसद महाराज अपने संसदीय क्षेत्र के विकास की बजाए लोगों के मन के विकास को ज्यादा तरजीह देते हैं। इनके संसदीय क्षेत्र में आप इनको खोजेंगे तो शायद ये आपको न मिलें...लेकिन टीवी पर धार्मिक चैनलों में आप इनके प्रवचन जरुर सुन सकते हैं। टीवी पर इनके प्रवचन सुनने का मौका मिले तो जरुर सुनिएगा...क्योंकि टीवी पर लोगों को सादगी भरा जीवन जीने का उपदेश देने वाले महाराज की जिस हकीकत से मैं आपको रुबरु कराने जा रहा हैं...उसके बाद शायद आपको मेरी बातों पर विश्वास न हो कि सादा जीवन जीने की बात करने वाले महाराज खुद के जीवन में कितना इसे उतारते हैं। दरअसल 23 अक्टूबर 2012 को महाराज के बेटे श्रद्धेय का विवाह था...विवाह समारोह हरिद्वार में रखा गया था...हम भी महाराज और उनके बेटे को सुखी वैवैहिक जीवन की शुभकामनाएं देते हैं...लेकिन इस शादी में महाराज ने जो किया उसने माहाराज की कथनी और करनी का फर्क साफ जाहिर कर दिया। सादगी पसंद महाराज ने अपने बेटे की शादी को शाही बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अनुमान के मुताबिक सादगी पसंद महाराज ने अपने बेटे की शादी में करीब 100 करोड़ रूपए पानी की तरह बहा दिए। शादी में सिर्फ बिजली पर ही एक करोड़ रूपए खर्च कर दिए...यही नहीं हरिद्वार प्रशासन ने भी महाराज के दरबार में खूब शीश नवाया और जी जान से नियमों को ताक पर रखकर हरिद्वार की जनता के कष्टों की परवाह न करते हुए सारी सुविधाएं मुहैया कराई। हरिद्वार प्रशासन ऐसा करता भी क्यों न सतपाल महाराज की धर्मपत्नी अमृता रावत उत्तराखंड की कैबिनेट मंत्री जो ठहरी। जनता को बिजली मिले या न मिले लेकिन शादी में बिजली की कोई कमी नहीं छोड़ी गई। इसी तरह सजावट, खाने और अन्य चीजों पर भी महाराज ने करोड़ों रूपए पानी की तरह बहा दिए। शाही शादी में शामिल होने के लिए हरिद्वार में देश के तमाम वीआईपी से लेकर राजनेता पहुंचें थे...और हर कोई सादगी पसंद महाराज के शाही तामझाम का लुत्फ उठाने में मशगूल था। सतपाल महाराज ने मेहमानों के लिए अस्थाई टॉयलेट का निर्माण करवाया था...और आपको जानकर हैरानी होगी की गंगा के नाम पर नाम कमाने वाले...गंगा की स्वच्छता की बड़ी बड़ी बातें करने वाले सतपाल महाराज के बेटे की शादी में पंडाल के आसपास बने अस्थाई टॉयलेट का सारा मल मूत्र सीधे गंगा में विसर्जित कर दिया गया। सतपाल महाराज के बेटे की शादी ऐसे वक्त में हुई जब उनके संसदीय क्षेत्र के कई इलाके दैविय आपदा से जूझ रहे हैं...आपदा से जहां कई लोगों को मौत हो चुकी है...वहीं लोगों को घर बार सब आपदा की भेंट चढ़ गया। एक तरफ लोग जहां उनके संसदीय क्षेत्र में दाने दाने को मोहताज थे...वहीं हरिद्वार में जनता के जनप्रतिनिधि अपने बेटे की शाही शादी में करोड़ों रूपए लुटाने में मशगूल थे। अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि सांसद और धर्मगुरु सतपाल महाराज के व्यक्तित्व और कथनी – करनी में कितना फर्क है। सतपाल महाराज की सादगी को पोल ये कोई पहली बार नहीं खुली थी...इससे पहले भी अपने जन्मदिन पर सतपाल महाराज ने हरिद्वार में ऐसा ही तामझाम किया था। बड़ा सवाल ये है कि जब एक राजनेता शादी जैसे समारोह में करोड़ों रूपए लुटाता है उस वक्त हमारे देश की तमाम एजेंसियां कहां छिपी बैठी रहती हैं। आयकर विभाग से लेकर दूसरे तमाम विभागों को ये तामझाम क्या दिखाई नहीं देता...या फिर इसलिए नहीं दिखाई दिया कि राज्य और केन्द्र दोनों जगह कांग्रेस की सरकार है...और सतपाल महाराज भी कांग्रेस से ही ताल्लुक रखते हैं। दिल्ली में बाबा रामदेव या अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन करते हैं तो ये एजेंसियां इनसे आंदोलन में हुए खर्चे का हिसाब किताब मांगने पहुंच जाती हैं...लेकिन सतपाल महाराज जैसे नेता जब शादी में करोड़ों लुटाते हैं तो सब जाने कहां चले जाती हैं। हैरत की बात तो ये भी है कि इस सब के बाद भी सतपाल महाराज जैसे नेता इस सब को गलत नहीं बताते...उन्हें शर्म नहीं आती कि उनके क्षेत्र की जनता दाने दाने को मोहताज हैं...और वो करोड़ों सिर्फ शान ओ शौकत की खातिर लुटा रहे हैं...महाराज को शर्म भले ही न आती हो...लेकिन हमें शर्म जरूर आती है कि ये हमारे जनप्रतिनिधि हैं जो देश की सर्वोच्च संस्था संसद में देश की जनता के कल्याण के लिए फैसले लेते हैं...अब ऐसे नेता जनता का कितना कल्याण सोचते होंगे...ये बताने की जरूरत तो कम से कम अब नहीं बची।
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गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012

सुर्खियों के लिए केजरीवाल की जल्दबाजी


राजनीति में रहना है तो खबरों में बने रहना बहुत जरुरी है। सरकारी अधिकारी से पहले समाजसेवी बने और फिर समाजसेवी से राजनीतिज्ञ बने अरविंद केजरीवाल को शायद ये बात समझ में आ गयी है। इसलिए शायद अब केजरीवाल सुर्खियों में बने रहने के लिए हर वो काम कर रहे हैं जो उन्हें देश की जनता के बीच जिंदा रख सके। लेकिन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी पर लगाए गए आरोपों के बाद कहीं न कहीं लगता है कि केजरीवाल ने इस बार जल्दबाजी कर दी और इस बार उनकी प्रेस कांफ्रेस में वो धार भी नहीं दिखाई दी...जिसके लिए आमतौर पर केजरीवाल जाने जाते हैं। न ही केजरीवाल कोई इतना बड़ा धमाका गडकरी के खिलाफ कर पाए कि गडकरी के साथ ही देश की मुख्य विपक्षी पार्टी मुश्किलों में घिरती नजर आती। उस पर उस किसान गजानन घड़गे का पहले प्रेस कांफ्रेंस के बाद गायब हो जाना और फिर ये बयान देना की उसका गडकरी से कोई विवाद नहीं है...औऱ ये कहना कि गडकरी जी ने मेरी मदद की है...ने केजरीवाल एंड कंपनी पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे में केजरीवाल और दमानिया के दूसरे आरोप कि महाराष्ट्र में गडकरी और अजीत पवार की सांठगांठ का आरोप है...इस बात का खुलासा तो केजरीवाल और अंजलि उस वक्त ही कर चुकी थी जब सिंचाई घोटाले को उठाने के लिए गडकरी के पास जाने की बात कही थी। जिस बड़े खुलासे का दावा प्रेस कांफ्रेस से तीन चार दिन पहले तक किया जा रहा था...और जितनी उत्सुक्ता भाजपा से ज्यादा कांग्रेस को और आम लोगों को इस प्रेस कांफ्रेंस को लेकर थी वो प्रेस कांफ्रेंस शुरु होती ही निराशा में बदल गई। क्योंकि प्रचार खुलासे को लेकर प्रेस कांफ्रेस से पहले किया गया था उससे जहां कांग्रेस ये मानकर बैठी थी कि अब उसके हाथ भाजपा के खिलाफ बड़ा मुद्दा लग सकता है...लेकिन ऐसा हुआ नहीं...औऱ वैसे भी कांग्रेस महाराष्ट्र में एनसीपी के सहयोग से सरकार चला रही है...और महाराष्ट्र सरकार के तत्कालीन सिंचाई मंत्री जो एनसीपी से ताल्लुक रखते हें...उनसे सांठगांठ का आरोप गडकरी पर लगाया गया तो कांग्रेस तो चाहकर भी इस मुद्दे को नहीं भुना सकती...क्योंकि माहाराष्ट्र और केन्द्र में दोनों जगह एनसीपी कांग्रेस की बैसाखी बनी हुई है। अऱविंद केजरीवाल के जिस जल्दबाजी में बिना बहुत कुछ साक्ष्य जुटाए वही पुराने आरोप गडकरी के खिलाफ दोहराए तो उससे तो यही लगता है कि केजरीवाल अखबार और टीवी की सुर्खियां बने रहना चाहते हैं...वैसे देखा जाए तो खुद के राजनीतिक वजूद को जिंदा रखने के लिए केजरीवाल को कुछ न कुछ ऐसा करना ही होगा...और बड़े राजनेताओं पर आरोप लगाकर इससे अच्छा तरीका दूसरा तो कई और नहीं हो सकता...लेकिन जो भी आरोप या खुलासा करने का दावा केजरीवाल एंड कंपनी करती है निश्चित ही तौर पर उसमें उतना ही दम भी होना चाहिए...या उन चीजों को बार बार दोहराने से केजरीवाल को बचना चाहिए। क्योंकि देश भर में जिस माहौल के बीच अरविंद केजरीवाल ने अन्ना के साथ मिलकर भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का आगाज़ किया था...उससे लोगों को उम्मीदें उनकी औऱ उनकी टीम से बढ़ गई थी...लेकिन अन्ना के अलग होने के बाद औऱ केजरीवाल के राजनीति में प्रवेश के बाद लोगों का केजरीवाल एंड कंपनी से मोह भंग भी हुआ है...हालांकि इसके बाद भी केजरीवाल के आंदोलनों में बड़ी संख्या में जिस तरह से लोग उनका साथ देने पहुंच रहे हैं उससे लगता है कि लोगों का एक बड़ा वर्ग केजरीवाल के राजनीति के फैसले से इत्तेफाक रखता है। ऐसे में वक्त में केजरीवाल को निश्चित ही चुनाव तक लोगों के जेहन में बने तो रहना होगा...लेकिन उसके लिए रोज रोज वो बड़े-बड़े खुलासे करें या नेताओं पर हमला करने के लिए खुद को पूरी तरह झोंक दें ये न तो संभव है और न ही केजरीवाल के लिए ठीक है। ऐसे में लंबे समय तक टिके रहने के लिए केजरीवाल एंड कंपनी को एक निश्चित अंतराल पर ही सही लेकिन पूरे दमखम और पुख्ता साक्ष्यों के साथ सीना ठोक कर भ्रष्ट नेताओं को घेरने पर काम करना चाहिए ताकि न तो ऐसा लगे की केजरीवाल की धार कुंद हुई है...और न ही उनके आरोपों को कोई सिरे से नकार सके...और सामने वालों को इसका जवाब देना पड़े।  

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बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

अब जनता कहेगी- ‘सत्ता से जाओगे, दोबारा वापस नहीं आ पाओगे’

देश का कानून मंत्री जब खुलेआम गुंडई पर उतर आए तो क्या कहेंगे...खुर्शीद साहब माना आपको इस बात का दर्द जरूर होगा कि बड़े बड़े घोटालों का किसी को कानों कान पता नहीं चला और सिर्फ 71 लाख रुपए के घालमेल में ईज्जत चली गयी...इसका मतलब ये तो नहीं कि आप ये भूल जाएं कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में निर्वाचित सरकार में कानून मंत्री हैं। जिस कानून मंत्री से लोगों का न्याय की आस रहती है...लेकिन आपने तो जनता को दिखा दिया की कानून मंत्री क्या कर सकता है। अपके इस बयान से तो कम से कम यही प्रतीत होता है...जो आपने केजरीवाल के संबंध में दिया। आप कहते हैं केजरीवाल फर्रुखाबाद जाकर वहां से लौटकर दिखाएं...आप कहते हैं कि अब मैं कलम की जगह लहू से काम लूंगा...आप कहते हैं कि आप जवाब सुनो और सवाल पूछना भूल जाओआपके इस बयान से तो यही लगता है कि हम किसी तानाशाह का बयान सुन रहे हों...जैसे हम आजाद भारत में नहीं बल्कि 1947 से पहले के भारत में रह रहे हों। हैरानी तो तब होती है जब इतना सब होने के बाद सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी मौन हैं। माना मनमोहन सिंह को तो मौन रहने की आदत है...लेकिन सोनिया जी आज तो सुन रही हैं न...क्या कह दिया आपके लाडले कानून मंत्री जी ने। मानसून सत्र में लाल कृष्ण आडवाणी ने जब यूपीए 2 सरकार को नाजायज कहा तो उस वक्त तो आपको खूब गुस्सा आया...लेकिन अब आपको क्या हो गया ? क्या आपको कानून मंत्री की गुंडई नहीं दिखाई देती ? जो सिर्फ इस बात पर बार बार अपना आपा खो देते हैं कि उन पर लगे आरोपों का एक आम आदमी उनसे जवाब मांगता है। क्या जो आम आदमी अपने नेता को चुनता है...वो उस आम आदमी के प्रति नेताओं की जवाबदेही नहीं बनती...अब कानून मंत्री को ये बात समझानी पड़े तो बाकी नेताओं की तो बात ही करनी बेकार है। सलमान साहब अगर आप पाक साफ हैं...आपके ट्रस्ट किसी घालमेल में लिप्त नहीं है तो डरते क्यों हो ? सवाल पूछने पर बार बार बौखलाते क्यों हो ? पेश कर दो मिसाल कि आप पाक साफ हो...दे दो इस्तीफा अपने पद से...लेकिन ये सब करने के लिए कलेजा चाहिए खुर्शीद साहब कलेजा...आप तो ये मानकर शायद कुर्सी पर बैठे हैं कि क्या पता दोबारा मौका मिले न मिले...दोबारा जनता आपको चुने या न चुने...इसलिए जितनी ऐश काटनी है अभी काट लो...कोई कुछ कहने वाला नहीं है...क्योंकि सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह साहब को तो सबकुछ जानने के बाद भी मौनी बाबा बने रहने में आनंद की अनुभूति होती है लगता है...या फिर इसे उनकी मजबूरी कहें। जहां तक बात है यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी कि उनको शायद 2014 के आम चुनाव में यूपी के अल्पसंख्यक वोटर नजर आते हैं...औऱ वैसे भी सलमान खुर्शीद साहब उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का बड़ा अल्पसंख्यक चेहरा माना जाता है। ऐसे में उन पर कितने ही आरोप लगें...वो कुछ भी बोलें...आप उनको नहीं छेड़ेंगी...क्योंकि सोनिया को डर है कि कहीं आगामी चुनाव में सरकार को अल्पसंख्याक मतदाताओं के वोट से हाथ न धोना पड़े। यानि कि मनमोहन मौन हैं और सोनिया गांधी को 2014 के आम चुनाव की चिंता है...ऐसे में सिर्फ सलमान खुर्शीद ही क्यों इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा कुछ भी बकबक करते रहे आप उनको भी नहीं छेड़ सकती क्योंकि गोंडा में बेनी बाबू आपके तुरुप का इक्का हैं। लेकिन ये मत भूलिए कि जनता के समर्थन के बिना नेता और नेतागिरी कुछ नहीं...सरकार बनाना तो दूर की बात है...इसलिए वक्त है अभी भी चेत जाओ...नहीं तो अगर चुनाव में जतना ने ठान लिया तो फिर जनता खुर्शीद साहब की भाषा दोहराएगी और कहेगी- सत्ता से तो जाओगे.. दोबारा कभी वापस सत्ता में नहीं आ पाओगे।

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

ये भ्रष्टाचार और घोटालों का स्टेंडर्ड है


केन्द्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने आखिर इस बात पर तो मुहर लगा ही दी कि हमारे नेता या मंत्री भ्रष्टाचार या घोटाले अपने कद के हिसाब से करते हैं। राज्य का कोई मंत्री होता है तो उसका मुहं छोटा होता है...और सेंट्रल का कोई मिनिस्टर हो तो उसका मुंह राज्य के मंत्री से बड़ा। ये सिर्फ राज्य और केन्द्र के नेताओं औऱ मंत्रियों पर ही लागू नहीं होता बल्कि वार्ड स्तर से लेकर केन्द्र के मंत्री तक सब पर लागू होता है। समाज में जिस तरह स्टेंडर्ड और स्टेटस का ख्याल रखा जाता है ठीक उसी तरह राजनीति में भी भ्रष्टाचार और घोटाले भी स्टेंडर्ड और स्टेटस के हिसाब से किए जाते हैं। केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद के ट्रस्ट के मामले में खुर्शीद के सहयोगी बेनी प्रसाद वर्मा भले ही भ्रष्टाचार और घोटालों में नेताओं के स्टेंडर्ड का खुलासा करके अब अपनी बात से पलट गए हों...लेकिन बड़बोले बेनी प्रसाद वर्मा जी ने जो कहा वो राजनीति के गलियारों की वो कड़वी सच्चाई है...जिसे सुनकर नेताओं को भले ही कोई फर्क न पड़े लेकिन इन नेताओं को इस लायक बनाने वाली आम जनता का खून जरूर खौल उठा है। पहले सलमान खर्शीद के ट्रस्ट पर लगे 71 लाख के घोटाले के आरोप को मामूली बात बताते हुए इस पर गंभीर न होने की बात करने वाले बेनी प्रसाद वर्मा हालांकि बाद में ये कहते दिखाई दिए कि 1 रुपए का हेरफेर भी गलत है...लेकिन पहले वे करोड़ों के हेरफेर को ही भ्रष्टाचार या घोटाला मानते थे। बड़े शर्म की बात है कि पहले ये नेता घोटाले करते हैं फिर कहते हैं कि 71 करोड़ का होता तो गंभीरता दिखाते। वैसे देखा जाए तो भ्रष्टाचार औऱ घोटालों में लिप्त होने के बाद भी सीना ठोक कर खुद को पाक साफ बताने वाले नेता और मंत्रियों की पीछे की ताकत कहीं न कहीं आम जनता ही है...जो भ्रष्टाचार और घोटालों में लिप्त होने के बाद भी बार बार चुनाव में इन नेताओं को वोट देकर दोबारा से खुलकर उन्हें लूटने का लायसेंस दे देती है। ये नेता भी शायद यही समझते हैं कि चुनाव जीतने के बाद वे कम से कम पांच साल का लायसेंस लेकर विधानसभा या संसद में पहुंचे हैं...और अब वो चाहे जो करें उन्हें देखने वाला...रोकने वाला कोई नहीं है। शायद यही वजह है कि कई राज्यों में मुख्यमंत्री और उनके मंत्री भ्रष्टाचार के आरोप में लिप्त हैं...केन्द्र में प्रधानमंत्री पर आरोप लगते हैं...और उनके एक दर्जन से ज्यादा मंत्रियों पर विभिन्न घोटालों में लिप्त होने का आरोप हैं...लेकिन इसके बाद भी वे सीना ठोक कर कहते हैं कि हम किसी भी जांच के लिए तैयार हैं...हमने कुछ गलत नहीं किया है...ये पांच साल के लायसेंस की ताकत नहीं तो और क्या है कि ये नेता, मंत्री अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझते हैं...वे जांच के लिए तैयार होने की बात तो करते हैं...लेकिन निडर होकर इतने विश्वास से इसलिए कि उन्हें पता है कि जांच एजेंसियां तो सरकार के हाथ में ही हैं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि नेताओं को भ्रष्टाचार और घोटालों के लिए जिम्मेदार ठहराने वाली जनता अपनी ताकत को कब पहचानेगी। अगर जनता अपनी ताकत को पहचान जाए और पांच साल में एक बार आने वाले लोकतंत्र के पर्व में भ्रष्टाचारियों को सबक सिखाने की ठान ले तो न कोई सलमान खुर्शीद नेता भविष्य में भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद प्रेस कांफ्रेंस करने की हिम्मत जुटा पाएगा और न ही बेनी प्रसाद वर्मा जैसे मंत्री ये कहने की जुर्रत कर पाएंगे कि 71 लाख का घोटाला सेंट्रल मिनिस्टर के लेवल का नहीं है...71 करोड़ होते तो हम सीरियस होते।   
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सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

ओम प्रकाश चौटाला ले लें बलात्कार रोकने की गारंटी


अपराधों की कई श्रेणियां है...लेकिन अपराध कोई भी हो क्षमा योग्य तो नहीं कहा जा सकता और वो भी बलात्कार जैसा घिनौना अपराध तो कतई क्षमायोग्य नहीं होना चाहिए...क्योंकि बलात्कार के बाद न सिर्फ पीड़ित बल्कि पीड़ित का परिवार के लिए भी समाज का समना करना मुश्किल हो जाता है। कई मामलों में पीडित या तो आत्महत्या कर लेतीं हैं या फिर घुट घुट कर अपना जीवन बिताती है...हालांकि कुछ एक मामलों में पीड़ित एक नए जीवन की शुरुआत तो करते हैं...लेकिन ऐसे मामले गिनती के ही होते हैं। हरियाणा में बलात्कार की एक के बाद एक घटनाओं के बाद खाप पंचायतों की सोच कि कम उम्र में लड़कियों का विवाह करके उन्हें बलात्कार की घटनाओं से बचाया जा सकता है किसी भी नजर से सार्थक नहीं दिखाई देती...क्योंकि समाज में हम सब के बीच में भेष बदलकर घूमते हवस के भेड़िये सिर्फ अपनी हवस का शिकार सिर्फ अविवाहित लड़कियां ही नहीं होती बल्कि अधिकतर मामलों में विवाहित महिलाएं भी बलात्कार की शिकार होती आयी हैं...ऐसे में कम उम्र में विवाह इसका समाधान तो कतई नहीं हो सकता। जहां तक खाप पांचायतों की बात है तो खाप के पूर्व में अलग अलग मामलों में आने वाले फैसलों में कहीं न कहीं महिलाओं को रुढ़ीवादी परंपराओं में बांधने पर विश्वास रखते हैं ऐसा प्रतीत होता है। जो स्त्रियों की आत्मनिर्भरता को बाधित तो करते ही हैं...साथ ही स्त्रियों के सामाजिक औऱ शैक्षिक विकास को भी बाधित करते हैं...ऐसे में ओम प्रकाश चौटाला जैसे राजनीतिज्ञ जो खाप पंचायतों के फैसलों का समर्थन करते हैं कहीं न हीं उनकी विचारधारा पर भी संदेह होता है कि क्या कोई पूर्व मुख्यमंत्री भी स्त्रियों के सामाजिक और शैक्षिक विकास की बजाए उनकी आत्मनिर्भरता को बाधित कैसे कर सकता है...लेकिन ओम प्रकाश चौटाला के मामले में तो यही प्रतीत होता है। जहां तक कम उम्र में लड़कियों के विवाह की बात है तो निश्चित ही कम उम्र में विवाह लड़कियों के अधिकारों और उनकी अपेक्षाओं के साथ अन्याय प्रतीत होता है क्योंकि हर लड़की वो भी आज के समय में पढ़ना चाहती है और देश दुनिया में विभिन्न क्षेत्रों में नाम कमा रही लड़कियों-महिलाओं की तरह बनना चाहती है...लेकिन परिजनों औऱ नाते रिश्तेदारों के दबाव में कम उम्र में विवाह उनके अधिकारों पर अतिक्रमण तो है ही साथ ही उनके सपनों और जीवन में कुछ कर गुजरने की अपेक्षाओं के साथ अन्याय भी है। जहां तक बात है हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला की...तो चौटाला साहब जब हरियाणा के मुख्यमंत्री थे तब क्या उनके कार्यकाल में बलात्कार की घटनाएं नहीं हुई थी...तब भी अपराध हो  रहे थे...विवाहितों महिलाओं के साथ बलात्कार के सैंकड़ों घटनाएं हुई थी...लेकिन तब वो प्रदेश के मुखिया होने के बावजूद इन घटनाओं पर लगाम नहीं कस पाए। ऐसे में अब वो इस मामले में गारंटी लेना तो दूर की बात है...वे तो खाप पंचायतों की राय पर उसका समर्थन करने के अपने ही बयान से पलटते नजर आए थे...और कहते दिखे थे कि वे खाप के किसी फैसले या राय का न तो समर्थन करते हैं और न ही विरोध...यानि मूक सहमति तो उनकी खाप के साथ थी...लेकिन कहने से बच जरुर रहे थे। वैसे हमारे राजनेता विपक्ष में रहते हुए गारंटी तो हर चीज की ले लेते हैं...लेकिन सत्ता में आने के साथ ही ये गारंटी भी एक्सपायर भी उतनी ही जल्दी हो जाती है...जितने विश्वास के साथ नेता इसे लेते हैं।

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रविवार, 14 अक्टूबर 2012

क्या खुर्शीद साहब नेताओं का रेट ही गिरा दिया !


आजतक ने सलमान खुर्शीद के चैरेटेबिल ट्रस्ट के खिलाफ ऑपरेशन धृतराष्ट्र में लाखों के घालमेल का पुलिंदा क्या खोला...केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद सफाई देते देते थक गए लेकिन फिर भी सफाई देने में नाकामयाब ही दिखाई पड़ रहे हैं। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में सम्मानित होने के बाद रविवार को लंदन से लौटे खुर्शीद अपने ट्रस्ट पर लगे आरोपों पर सफाई देने से पहले आम आदमी को अपमानित करने से नहीं चूके। मीडिया से मुखातिब होने से पहले खुर्शीद साहब कहते हैं कि वे सड़क पर खड़े किसी आदमी के सवालों का जवाब नहीं देंगे...जाहिर है उनका ईशारा उनके इस्तीफे की मांग को लेकर उनके खिलाफ मोर्चा खोल कर बैठे अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी की तरफ था...लेकिन खुर्शीद साहब आप ये क्यों भूल गए कि जिस पैसे के घालमेल का आरोप आपके ट्रस्ट पर लगा है वो पैसा तो सड़क पर घूमने वाले, सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले, धरना प्रदर्शन करने वाले आम आदमी का ही तो है...और आम आदमी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ सड़क पर ही तो उठाएगा...मोर्चा सड़क पर ही तो खोलेगा...ऐसे में आप आम आदमी के सवालों का जवाब क्यों नहीं देंगे...सिर्फ इसलिए कि आम आदमी ने आपको चुना या फिर इसलिए कि आप केन्द्रीय कानून मंत्री हैं। आपने भले ही अरविंद केजरीवाल की ओर ईशारा करते हुए ये बात कही...लेकिन सवाल तो आपने आम आदमी पर भी खड़े कर दिए। ऐसे में आपके ट्रस्ट में घालेमल हुआ या नहीं हुआ ये तो अलग बात है...लेकिन आप आम आदमी के प्रति अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते...क्योंकि ये तो आप भी अच्छी तरह समझते होंगे कि आम आदमी अगर आपको चुन कर संसद में भेज सकता है तो आम आदमी अगले चुनाव में आपकी जमानत भी जब्त करवा सकता है। लगता है प्रेस कांफ्रेंस शुरु होने से पहले लंदन में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में सम्मानित होने की इतराहट आप में बाकी थी...शायद इसलिए ही आप ऐसा बोल गए...वरना जनता का जनप्रतिनिधि...आम आदमी का जनप्रतिनिधि कम से कम आम आदमी के लिए ऐसी बात तो कतई नहीं करता। आप जिस पद पर बैठे हैं...वहां पर भी आपकी पहली जवाबदेही आम आदमी के प्रति...इस देश की जनता के प्रति ही बनती है...और इसे आप चाहकर भी नकार नहीं सकते...क्योंकि आम आदमी ठान ले तो...किसी का भी खासकर नेताओं, मंत्रियों का वक्त बदलते देर नहीं लगती...वैसे भी चुनाव में अब वक्त ही कितना रह गया है...इसलिए इससे पहले जनता आपकी जवाबदेही तय करने की सोचे...आप जवाबदेह बन जाओ...वरना अर्श से फर्श पर आते देर नहीं लगेगी। वैसे सलमान साहब आप पर लगे आरोपों में कितनी सच्चाई है ये तो आप और आपके ट्रस्ट से जुड़े लोग ही बेहतर जानते होंगे...लेकिन जब से आप पर ये आरोप लगे हैं...समूचे विपक्ष के साथ ही दबी जुबान में ये बात भी सुनने को मिल रही है कि...मंत्री जी ने नेताओं को रेट ही खराब कर दिया...चर्चाएं ये भी हैं कि अगर घालमाल करना ही था तो नेताओं के स्टेटस का तो कम से कम ख्याल रखते...करोड़ों में तो घालमेल करते...क्या लाखों में ही मामला निपटा लिया।
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