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गुरुवार, 1 नवंबर 2012

कौन सुनेगा...किसको सुनाएं ?


कौन सुनेगा...किसको सुनाए...इसलिए चुप रहते हैं...किशोर कुमार का ये मशहूर गाना आपने जरुर सुना होगा...ये गाना बिल्कुल फिट बैठता है हमारे देश के मतदाताओं पर जो राजनेताओं के झूठे वादों से त्रस्त आकर चुनाव से पहले एक रहस्यमयी चुप्पी साधने लगे हैं। हिमाचल प्रदेश विधानसभा के लिए 04 नवंबर 2012 को मतदान होना है...ऐसे में ऐसा ही कुछ हाल आजकल हिमाचल प्रदेश के मतदाताओं का भी है। मतदान में चंद दिन शेष रह गए हैं...मतदाताओं को रिझाने के लिए प्रत्याशियों ने पूरी ताकत झोंक दी है...लेकिन मतदाता एकदम खामोश है। मानो मन ही मन ये गाना गुनगुना रहे होंकौन सुनेगा किसको सुनाए…इसलिए चुप रहते हैंकिशोर कुमार की ये पंक्तियां इस लिहाज से भी मतदाताओं पर सटीक बैठती हैं क्योंकि इससे पहले के चुनावों पर नज़र डाल लें तो सामने आता है कि चुनाव से पहले राजनीतिक दल अपने घोषणापत्र में जनता से बड़े-बड़े वादे तो करते हैं और उन्हें पूरा करने का दम भी भरते हैं...लेकिन चुनाव जीतने के बाद या सत्ता में आ जाने के बाद उनके ये दावे सिर्फ दावे ही रह जाते हैं। मतदान करने के बाद जनता ठगी रह जाती है और नेता ये समझते हैं कि उन्हें पांच साल का लाईसेंस जनता ने दिया है लूट खसोट मचाने के लिए...जो हम देखते भी आए हैं। वैसे देखें तो अपने जनप्रतिनिधि से जनता की अपेक्षाएं क्या होती हैं...? सिर्फ इतना ही कि उसके क्षेत्र का समुचित विकास हो...उसे बिजली मिले...पानी मिले और उसके इलाके की सड़कें दुरुस्त हो...जिन पर से होकर वो रोज दफ्तार जाता है, व्यापार करने जाता है या बाजार जाता है। मुझे नहीं लगता इससे ज्यादा कोई अपेक्षा जनता की अपने जनप्रतिनिधि से रहती हैं। लेकिन हमारे राजनेता चुनाव जीतने के बाद शायद ये भूल जाते हैं कि उसे जनता ने सेवा करने के लिए चुना है मेवा खाने के लिए नहीं...लेकिन नेता जी मेवा खाने में ही इतने व्यस्त रहते हैं कि उन्हें अपने क्षेत्र की जनता की परवाह ही नहीं रहती। एक फिल्म का दृश्य मेरे जेहन में ताजा हो रहा है, जो इस प्रकार है...एक व्यक्ति अपनी समस्या लेकर अपने क्षेत्र के विधायक के पास पहुंचता है...वहां का नजारा कुछ इस प्रकार है- नेता जी का मुंह पान से लाल है...दो चेले नेता जी की सेवा में लगे हैं...और नेता जी पान चबाते चबाते किसी को फोन पर गलिया रहे हैं। वह व्यक्ति नेता जी के कान से फोन हटते ही अपनी समस्या रखता है कि उसके बेटे को पुलिस ने गलत आरोप में पकड़ लिया है...तो वे उसकी मदद करें और चलकर पुलिसवालों से बात करें...लेकिन नेता जी व्यक्ति को ये कहकर दुत्कार देते हैं कि उसके बेटा चोर होगा...व्यक्ति एक बार फिर से नेता जी से आग्रह करता है कि उसने उनको वोट दिया है...ऐसे में अपने क्षेत्र की जनता के साथ उनको देना चाहिए...इतना सुनते ही नेता जी का पारा चढ़ जाता है और वे उस व्यक्ति को गलियाते हुए कहते हैं कि- मुझे वोट दिया है तो क्या मैं तेरे घर पर आकर झाडू लगाउं। उस व्यक्ति के पास इस बात का कोई जवाब नहीं होता है...और इसके बाद वह व्यक्ति निराश होकर वहां से लौट जाता है। ये फिल्म का दृश्य हमारे आजकल के अधिकतर नेताओं के चरित्र से मेल खाता दिखाई देता है। नेता जी आपको चुनने वाला आपसे ये कतई नहीं चाहता कि आप उसके घर पर आकर झाड़ू लगाएं...लेकिन इतना जरूर चाहता है कि उसकी हर परेशानी में तो कम से कम आप उसके साथ खड़े रहें...क्या आपको ऐसा नहीं लगता...नेता जी इसका जवाब अगर नहीं है तो आपको बधाई...आप राजनीति के रंग में पूरी तरह रंग गए हैं औऱ एक पक्के राजनीतिज्ञ बन गए हैं। हिमाचल की जनता की खामोशी भी आजकल शायद कुछ ऐसा ही कह रही है...शायद इसलिए मतदान से चंद दिन पहले हिमाचल में एक खामोशी सी पसरी हुई है। ऐसे में देखना ये होगा कि मतदाताओं की ये खामोशी हिमाचल में क्या गुल खिलाती है। हिमाचल की रवायत की अगर बात करें तो वहां की रवायत सत्ता परिवर्तन की है...और हर पांच साल में जनता सत्ता परिवर्तन कर देती है...लेकिन इस बार मतदान से पहले की मतदाताओं की रहस्यमयी खामोशी कुछ और ही कहानी बयां कर रही है...और साफ ईशारा कर रही है कि हिमाचल में इस बार कुछ नया होगा...और आसानी से किसी को भी हिमाचल की सत्ता में राज करने का मौका नहीं मिलने वाला...चाहे वो सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी हो या फिर हिमाचल की रवायत के सहारे सत्ता में वापसी की उम्मीद लगाए बैठी कांग्रेस पार्टी। बहरहाल ये चुप्पी 04 नवंबर को टूट जाएगी...और 20 दिसंबर को ईवीएम खुलने के साथ ही साफ हो जाएगा कि ये चुप्पी क्या राज्य की भाजपा सरकार के खिलाफ थी या फिर केन्द्र में काबिज होते हुए भ्रष्टाचार औऱ घोटालों के कई आरोपों से घिरी कांग्रेस के खिलाफ। फिलहाल तो मतदाता खामोश है...और चुनाव लड़ रहे विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रत्याशी बेचैन।
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सोनिया कहती नहीं...करके दिखाती हैं


हिमाचल प्रदेश में चुनाव प्रचार के लिए एक सप्ताह में सोनिया गांधी दो बार पहुंची...पहली बार मंडी और दूसरी बार शिमला और कांगड़ा...सोनिया के पास कहने के लिए कुछ नया नहीं था...ऐसे में सोनिया दोनों ही बार मंच से ये कहती जरूर सुनाई दी कि राज्य की धूमल सरकार ने केन्द्र के पैसे का दुरुपयोग किया है...साथ ही ये कि भाजपा भ्रष्टाचार के बाद चुप बैठ जाती है और भ्रष्टाचार करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करती। गौर कीजिए ये बात यूपीए अध्यक्ष सोनिया कह रही हैं...जिनकी यूपीए सरकार के करीब एक दर्जन से ज्यादा मंत्री गंभीर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हैं...जिनके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर खुद कोयला घोटाले में लिप्त होने का आरोप लगा है। सोनिया जी ये नहीं बताती कि उन्होंने उनकी सरकार में शामिल भ्रष्टाचारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की अलबत्ता वो करके दिखाती हैं भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे सलमान खुर्शीद जैसे मंत्री का प्रमोशन करके। मैं कोई भाजपा की विचारधारा से प्रभावित शख्स नहीं हूं और न ही कांग्रेस का विरोधी...लेकिन शिमला में सोनिया गांधी का ये बयान सुनने के बाद लिखे बिना रहा भी ही गया। खैर ये तो राजनेताओं को चरित्र है...खुद पर आरोप लगे तो कोई दिक्कत नहीं...विपक्षी पर आरोप लगे तो उसे घेरने का कोई मौका मत छोड़ो। सोनिया भी शायद ऐसा ही कुछ कर रही हैं। सोनिया ने शिमला में एक और मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ी...जो शायद इस वक्त कांग्रेस की नैया डुबाने में सबसे बड़ी भूमिका निभा सकता है। वो मुद्दा है महंगाई का...सोनिया शायद उत्तराखंड का टिहरी उपचुनाव और पश्चिम बंगाल का जंगीपुर उपचुनाव नहीं भूली होंगी...टिहरी उपचुनाव में जहां कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी थी और मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के बेटे साकेत बहुगुणा को करारी हार का सामना करना पड़ा और जंगीपुर में 2009 में कराब सवा लाख की जीत का वोटों का अंतर ढाई हजार में सिमट कर रह गया था...और राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के बेटे अभीजीत मुखर्जी बमुश्किल अपनी हार टाल पाए थे। इन दो उपचुनाव के नतीजे शायद सोनिया को महंगाई पर मुहं खोलने के लिए मजबूर कर गए। हालांकि सोनिया यहां भी सिर्फ महंगाई के मुद्दे पर चिंता जताते हुए इस पर विचार करने की बात कहकर ही लोगों को आश्वासन ही देती दिखाई दीं। खैर सोनिया गांधी भी ये बात तो अच्छी तरह समझती होंगी कि महंगाई जैसे ज्वलंत मुद्दे पर सिर्फ आश्वासन से तो कम से कम जनता का काम चलने वाला नहीं है...यानि कि हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में सोनिया अगर सोच रही हैं कि महंगाई पर चिंता जताकर या इस पर सरकार के गंभीर होने की बात कहकर वे कांग्रेस की नैया हिमाचल में पार लगाने में सफल होंगी तो शायद ये सोनिया और कांग्रेस दोनों की गलतफहमी ही होगी। बहरहाल दामन हिमाचल में कांग्रेस की मुख्य प्रतिद्वंदि भाजपा का भी पाक साफ नहीं है और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी के साथ ही राज्य की धूमल सरकार पर भी भ्रष्टाचार के बड़े आरोप लगे हैं...यानि की हिमाचल में राह भाजपा और कांग्रेस दोनों की आसान नहीं है।

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रविवार, 28 अक्टूबर 2012

‘हिंदी’ में बोले मनमोहन सिंह



हिमाचल में विधानसभा चुनाव के लिए चुनाव प्रचार चरम पर है...ऐसे में राज्य के दोनों प्रमुख दल कांग्रेस और भाजपा ने 2014 के आम चुनाव से पहले का सेमिफाइनल माने जा रहे इस चुनाव में जीत के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। 28 अक्टूबर को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कांग्रेस के लिए वोट मांगने हिमाचल प्रदेश के ऊना पहुंचे। मनमोहन सिंह के पहुंचने के बाद उनकी जनसभा में सुखद एहसास ये रहा कि मनमोहन सिंह साहब हिंदी में बोले। इसे सुखद एहसास इसलिए था क्योंकि हमारे पीएम साहब साल में दो ही बार हिंदी बोलते हैं...या तो 15 अगस्त को या फिर 26 जनवरी को...ऐसे में मौका न तो स्वतंत्रता दिवस का था और न ही गणतंत्र दिवस का...फिर भी पीएम साहब की हिंदी सुनकर सुखद एहसास तो होना ही था। मनमोहन सिंह ने हिमाचल प्रदेश में विकास की रफ्तार थमने की बात कहते हुए राज्य की भाजपा सरकार पर जमकर निशाना साधा। जिस समय देश के पीएम मनमोहन सिंह भाजपा को कोस रहे थे...ठीक उसी वक्त ऊना में ही एक और पीएमइन वेटिंग की उपाधि से सजे भाजपा के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी हिमाचल में विकास की बयार बहाने पर मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल की पीठ ठोंक रहे थे। आडवाणी ने केन्द्र की कांग्रेस सरकार को कोसते हुए यहां तक कहा कि 2014 का चुनाव वक्त से पहले होगा और भाजपा की सत्ता की राह हिमाचल से ही प्रशस्त होगी। हिमाचल में जहां भाजपा के लिए अपनी सत्ता बचाने की चुनौती है तो कांग्रेस के लिए हिमाचल की सत्ता में वापसी करने की चुनौती। वैसे हिमाचल की रवायत है कि यहां पर हर पांच साल में यहां की जनता सरकार बदल देती है...लेकिन इस बार देश के हालात कुछ ज्यादा ही जुदा है...और सत्ता में वापसी का ख्वाब संजोए बैठी कांग्रेस भी शायद ये अच्छी तरह से जानती है कि केन्द सरकार के फैसलों से जनता की नाराजगी उसे भारी पड़ सकती है...लिहाजा कांग्रेस ने इस चुनाव में पूरी ताकत झोंक दी है। सोनिया गांधी से लेकर राहुल गांधी हिमाचल में जनसभाएं कर चुके हैं तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी मैदान में उतर गए हैं...भाजपा की अगर बात करें तो हिमाचल और गुजरात के रास्ते केन्द्र की सत्ता की चाबी हासिल करने का ख्वाब देख रही भाजपा भी हर हाल में इन राज्यों में अपनी सत्ता को खोना नहीं चाहती...लिहाजा भाजपा से भी नितिन गडकरी से लेकर सुषमा स्वराज और अरूण जेटली तक राज्य में सभाएं कर चुके हैं...यानि मुकाबला कांटे हैं। कांटे के इस मुकाबले का फैसला भी जनता ने ही करना है...ऐसे में देखना ये होगा कि जनता हिमाचल में एक बार फिर से कमल लहराती है...या फिर हाथ का साथ देती है।


मंगलवार, 23 अक्टूबर 2012

शर्म करो महाराज !


सतपाल महाराज...इस नाम से तो वाकिफ ही होंगे आप...पेशे से राजनीतिज्ञ हैं...लेकिन टीवी पर अक्सर आपको लोगों को ज्ञान बांटते दिखाई दे जाएंगे। उत्तराखंड की पौड़ी संसदीय सीट से सांसद महाराज अपने संसदीय क्षेत्र के विकास की बजाए लोगों के मन के विकास को ज्यादा तरजीह देते हैं। इनके संसदीय क्षेत्र में आप इनको खोजेंगे तो शायद ये आपको न मिलें...लेकिन टीवी पर धार्मिक चैनलों में आप इनके प्रवचन जरुर सुन सकते हैं। टीवी पर इनके प्रवचन सुनने का मौका मिले तो जरुर सुनिएगा...क्योंकि टीवी पर लोगों को सादगी भरा जीवन जीने का उपदेश देने वाले महाराज की जिस हकीकत से मैं आपको रुबरु कराने जा रहा हैं...उसके बाद शायद आपको मेरी बातों पर विश्वास न हो कि सादा जीवन जीने की बात करने वाले महाराज खुद के जीवन में कितना इसे उतारते हैं। दरअसल 23 अक्टूबर 2012 को महाराज के बेटे श्रद्धेय का विवाह था...विवाह समारोह हरिद्वार में रखा गया था...हम भी महाराज और उनके बेटे को सुखी वैवैहिक जीवन की शुभकामनाएं देते हैं...लेकिन इस शादी में महाराज ने जो किया उसने माहाराज की कथनी और करनी का फर्क साफ जाहिर कर दिया। सादगी पसंद महाराज ने अपने बेटे की शादी को शाही बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अनुमान के मुताबिक सादगी पसंद महाराज ने अपने बेटे की शादी में करीब 100 करोड़ रूपए पानी की तरह बहा दिए। शादी में सिर्फ बिजली पर ही एक करोड़ रूपए खर्च कर दिए...यही नहीं हरिद्वार प्रशासन ने भी महाराज के दरबार में खूब शीश नवाया और जी जान से नियमों को ताक पर रखकर हरिद्वार की जनता के कष्टों की परवाह न करते हुए सारी सुविधाएं मुहैया कराई। हरिद्वार प्रशासन ऐसा करता भी क्यों न सतपाल महाराज की धर्मपत्नी अमृता रावत उत्तराखंड की कैबिनेट मंत्री जो ठहरी। जनता को बिजली मिले या न मिले लेकिन शादी में बिजली की कोई कमी नहीं छोड़ी गई। इसी तरह सजावट, खाने और अन्य चीजों पर भी महाराज ने करोड़ों रूपए पानी की तरह बहा दिए। शाही शादी में शामिल होने के लिए हरिद्वार में देश के तमाम वीआईपी से लेकर राजनेता पहुंचें थे...और हर कोई सादगी पसंद महाराज के शाही तामझाम का लुत्फ उठाने में मशगूल था। सतपाल महाराज ने मेहमानों के लिए अस्थाई टॉयलेट का निर्माण करवाया था...और आपको जानकर हैरानी होगी की गंगा के नाम पर नाम कमाने वाले...गंगा की स्वच्छता की बड़ी बड़ी बातें करने वाले सतपाल महाराज के बेटे की शादी में पंडाल के आसपास बने अस्थाई टॉयलेट का सारा मल मूत्र सीधे गंगा में विसर्जित कर दिया गया। सतपाल महाराज के बेटे की शादी ऐसे वक्त में हुई जब उनके संसदीय क्षेत्र के कई इलाके दैविय आपदा से जूझ रहे हैं...आपदा से जहां कई लोगों को मौत हो चुकी है...वहीं लोगों को घर बार सब आपदा की भेंट चढ़ गया। एक तरफ लोग जहां उनके संसदीय क्षेत्र में दाने दाने को मोहताज थे...वहीं हरिद्वार में जनता के जनप्रतिनिधि अपने बेटे की शाही शादी में करोड़ों रूपए लुटाने में मशगूल थे। अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि सांसद और धर्मगुरु सतपाल महाराज के व्यक्तित्व और कथनी – करनी में कितना फर्क है। सतपाल महाराज की सादगी को पोल ये कोई पहली बार नहीं खुली थी...इससे पहले भी अपने जन्मदिन पर सतपाल महाराज ने हरिद्वार में ऐसा ही तामझाम किया था। बड़ा सवाल ये है कि जब एक राजनेता शादी जैसे समारोह में करोड़ों रूपए लुटाता है उस वक्त हमारे देश की तमाम एजेंसियां कहां छिपी बैठी रहती हैं। आयकर विभाग से लेकर दूसरे तमाम विभागों को ये तामझाम क्या दिखाई नहीं देता...या फिर इसलिए नहीं दिखाई दिया कि राज्य और केन्द्र दोनों जगह कांग्रेस की सरकार है...और सतपाल महाराज भी कांग्रेस से ही ताल्लुक रखते हैं। दिल्ली में बाबा रामदेव या अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन करते हैं तो ये एजेंसियां इनसे आंदोलन में हुए खर्चे का हिसाब किताब मांगने पहुंच जाती हैं...लेकिन सतपाल महाराज जैसे नेता जब शादी में करोड़ों लुटाते हैं तो सब जाने कहां चले जाती हैं। हैरत की बात तो ये भी है कि इस सब के बाद भी सतपाल महाराज जैसे नेता इस सब को गलत नहीं बताते...उन्हें शर्म नहीं आती कि उनके क्षेत्र की जनता दाने दाने को मोहताज हैं...और वो करोड़ों सिर्फ शान ओ शौकत की खातिर लुटा रहे हैं...महाराज को शर्म भले ही न आती हो...लेकिन हमें शर्म जरूर आती है कि ये हमारे जनप्रतिनिधि हैं जो देश की सर्वोच्च संस्था संसद में देश की जनता के कल्याण के लिए फैसले लेते हैं...अब ऐसे नेता जनता का कितना कल्याण सोचते होंगे...ये बताने की जरूरत तो कम से कम अब नहीं बची।
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गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012

सुर्खियों के लिए केजरीवाल की जल्दबाजी


राजनीति में रहना है तो खबरों में बने रहना बहुत जरुरी है। सरकारी अधिकारी से पहले समाजसेवी बने और फिर समाजसेवी से राजनीतिज्ञ बने अरविंद केजरीवाल को शायद ये बात समझ में आ गयी है। इसलिए शायद अब केजरीवाल सुर्खियों में बने रहने के लिए हर वो काम कर रहे हैं जो उन्हें देश की जनता के बीच जिंदा रख सके। लेकिन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी पर लगाए गए आरोपों के बाद कहीं न कहीं लगता है कि केजरीवाल ने इस बार जल्दबाजी कर दी और इस बार उनकी प्रेस कांफ्रेस में वो धार भी नहीं दिखाई दी...जिसके लिए आमतौर पर केजरीवाल जाने जाते हैं। न ही केजरीवाल कोई इतना बड़ा धमाका गडकरी के खिलाफ कर पाए कि गडकरी के साथ ही देश की मुख्य विपक्षी पार्टी मुश्किलों में घिरती नजर आती। उस पर उस किसान गजानन घड़गे का पहले प्रेस कांफ्रेंस के बाद गायब हो जाना और फिर ये बयान देना की उसका गडकरी से कोई विवाद नहीं है...औऱ ये कहना कि गडकरी जी ने मेरी मदद की है...ने केजरीवाल एंड कंपनी पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे में केजरीवाल और दमानिया के दूसरे आरोप कि महाराष्ट्र में गडकरी और अजीत पवार की सांठगांठ का आरोप है...इस बात का खुलासा तो केजरीवाल और अंजलि उस वक्त ही कर चुकी थी जब सिंचाई घोटाले को उठाने के लिए गडकरी के पास जाने की बात कही थी। जिस बड़े खुलासे का दावा प्रेस कांफ्रेस से तीन चार दिन पहले तक किया जा रहा था...और जितनी उत्सुक्ता भाजपा से ज्यादा कांग्रेस को और आम लोगों को इस प्रेस कांफ्रेंस को लेकर थी वो प्रेस कांफ्रेंस शुरु होती ही निराशा में बदल गई। क्योंकि प्रचार खुलासे को लेकर प्रेस कांफ्रेस से पहले किया गया था उससे जहां कांग्रेस ये मानकर बैठी थी कि अब उसके हाथ भाजपा के खिलाफ बड़ा मुद्दा लग सकता है...लेकिन ऐसा हुआ नहीं...औऱ वैसे भी कांग्रेस महाराष्ट्र में एनसीपी के सहयोग से सरकार चला रही है...और महाराष्ट्र सरकार के तत्कालीन सिंचाई मंत्री जो एनसीपी से ताल्लुक रखते हें...उनसे सांठगांठ का आरोप गडकरी पर लगाया गया तो कांग्रेस तो चाहकर भी इस मुद्दे को नहीं भुना सकती...क्योंकि माहाराष्ट्र और केन्द्र में दोनों जगह एनसीपी कांग्रेस की बैसाखी बनी हुई है। अऱविंद केजरीवाल के जिस जल्दबाजी में बिना बहुत कुछ साक्ष्य जुटाए वही पुराने आरोप गडकरी के खिलाफ दोहराए तो उससे तो यही लगता है कि केजरीवाल अखबार और टीवी की सुर्खियां बने रहना चाहते हैं...वैसे देखा जाए तो खुद के राजनीतिक वजूद को जिंदा रखने के लिए केजरीवाल को कुछ न कुछ ऐसा करना ही होगा...और बड़े राजनेताओं पर आरोप लगाकर इससे अच्छा तरीका दूसरा तो कई और नहीं हो सकता...लेकिन जो भी आरोप या खुलासा करने का दावा केजरीवाल एंड कंपनी करती है निश्चित ही तौर पर उसमें उतना ही दम भी होना चाहिए...या उन चीजों को बार बार दोहराने से केजरीवाल को बचना चाहिए। क्योंकि देश भर में जिस माहौल के बीच अरविंद केजरीवाल ने अन्ना के साथ मिलकर भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का आगाज़ किया था...उससे लोगों को उम्मीदें उनकी औऱ उनकी टीम से बढ़ गई थी...लेकिन अन्ना के अलग होने के बाद औऱ केजरीवाल के राजनीति में प्रवेश के बाद लोगों का केजरीवाल एंड कंपनी से मोह भंग भी हुआ है...हालांकि इसके बाद भी केजरीवाल के आंदोलनों में बड़ी संख्या में जिस तरह से लोग उनका साथ देने पहुंच रहे हैं उससे लगता है कि लोगों का एक बड़ा वर्ग केजरीवाल के राजनीति के फैसले से इत्तेफाक रखता है। ऐसे में वक्त में केजरीवाल को निश्चित ही चुनाव तक लोगों के जेहन में बने तो रहना होगा...लेकिन उसके लिए रोज रोज वो बड़े-बड़े खुलासे करें या नेताओं पर हमला करने के लिए खुद को पूरी तरह झोंक दें ये न तो संभव है और न ही केजरीवाल के लिए ठीक है। ऐसे में लंबे समय तक टिके रहने के लिए केजरीवाल एंड कंपनी को एक निश्चित अंतराल पर ही सही लेकिन पूरे दमखम और पुख्ता साक्ष्यों के साथ सीना ठोक कर भ्रष्ट नेताओं को घेरने पर काम करना चाहिए ताकि न तो ऐसा लगे की केजरीवाल की धार कुंद हुई है...और न ही उनके आरोपों को कोई सिरे से नकार सके...और सामने वालों को इसका जवाब देना पड़े।  

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बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

अब जनता कहेगी- ‘सत्ता से जाओगे, दोबारा वापस नहीं आ पाओगे’

देश का कानून मंत्री जब खुलेआम गुंडई पर उतर आए तो क्या कहेंगे...खुर्शीद साहब माना आपको इस बात का दर्द जरूर होगा कि बड़े बड़े घोटालों का किसी को कानों कान पता नहीं चला और सिर्फ 71 लाख रुपए के घालमेल में ईज्जत चली गयी...इसका मतलब ये तो नहीं कि आप ये भूल जाएं कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में निर्वाचित सरकार में कानून मंत्री हैं। जिस कानून मंत्री से लोगों का न्याय की आस रहती है...लेकिन आपने तो जनता को दिखा दिया की कानून मंत्री क्या कर सकता है। अपके इस बयान से तो कम से कम यही प्रतीत होता है...जो आपने केजरीवाल के संबंध में दिया। आप कहते हैं केजरीवाल फर्रुखाबाद जाकर वहां से लौटकर दिखाएं...आप कहते हैं कि अब मैं कलम की जगह लहू से काम लूंगा...आप कहते हैं कि आप जवाब सुनो और सवाल पूछना भूल जाओआपके इस बयान से तो यही लगता है कि हम किसी तानाशाह का बयान सुन रहे हों...जैसे हम आजाद भारत में नहीं बल्कि 1947 से पहले के भारत में रह रहे हों। हैरानी तो तब होती है जब इतना सब होने के बाद सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी मौन हैं। माना मनमोहन सिंह को तो मौन रहने की आदत है...लेकिन सोनिया जी आज तो सुन रही हैं न...क्या कह दिया आपके लाडले कानून मंत्री जी ने। मानसून सत्र में लाल कृष्ण आडवाणी ने जब यूपीए 2 सरकार को नाजायज कहा तो उस वक्त तो आपको खूब गुस्सा आया...लेकिन अब आपको क्या हो गया ? क्या आपको कानून मंत्री की गुंडई नहीं दिखाई देती ? जो सिर्फ इस बात पर बार बार अपना आपा खो देते हैं कि उन पर लगे आरोपों का एक आम आदमी उनसे जवाब मांगता है। क्या जो आम आदमी अपने नेता को चुनता है...वो उस आम आदमी के प्रति नेताओं की जवाबदेही नहीं बनती...अब कानून मंत्री को ये बात समझानी पड़े तो बाकी नेताओं की तो बात ही करनी बेकार है। सलमान साहब अगर आप पाक साफ हैं...आपके ट्रस्ट किसी घालमेल में लिप्त नहीं है तो डरते क्यों हो ? सवाल पूछने पर बार बार बौखलाते क्यों हो ? पेश कर दो मिसाल कि आप पाक साफ हो...दे दो इस्तीफा अपने पद से...लेकिन ये सब करने के लिए कलेजा चाहिए खुर्शीद साहब कलेजा...आप तो ये मानकर शायद कुर्सी पर बैठे हैं कि क्या पता दोबारा मौका मिले न मिले...दोबारा जनता आपको चुने या न चुने...इसलिए जितनी ऐश काटनी है अभी काट लो...कोई कुछ कहने वाला नहीं है...क्योंकि सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह साहब को तो सबकुछ जानने के बाद भी मौनी बाबा बने रहने में आनंद की अनुभूति होती है लगता है...या फिर इसे उनकी मजबूरी कहें। जहां तक बात है यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी कि उनको शायद 2014 के आम चुनाव में यूपी के अल्पसंख्यक वोटर नजर आते हैं...औऱ वैसे भी सलमान खुर्शीद साहब उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का बड़ा अल्पसंख्यक चेहरा माना जाता है। ऐसे में उन पर कितने ही आरोप लगें...वो कुछ भी बोलें...आप उनको नहीं छेड़ेंगी...क्योंकि सोनिया को डर है कि कहीं आगामी चुनाव में सरकार को अल्पसंख्याक मतदाताओं के वोट से हाथ न धोना पड़े। यानि कि मनमोहन मौन हैं और सोनिया गांधी को 2014 के आम चुनाव की चिंता है...ऐसे में सिर्फ सलमान खुर्शीद ही क्यों इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा कुछ भी बकबक करते रहे आप उनको भी नहीं छेड़ सकती क्योंकि गोंडा में बेनी बाबू आपके तुरुप का इक्का हैं। लेकिन ये मत भूलिए कि जनता के समर्थन के बिना नेता और नेतागिरी कुछ नहीं...सरकार बनाना तो दूर की बात है...इसलिए वक्त है अभी भी चेत जाओ...नहीं तो अगर चुनाव में जतना ने ठान लिया तो फिर जनता खुर्शीद साहब की भाषा दोहराएगी और कहेगी- सत्ता से तो जाओगे.. दोबारा कभी वापस सत्ता में नहीं आ पाओगे।

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

ये भ्रष्टाचार और घोटालों का स्टेंडर्ड है


केन्द्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने आखिर इस बात पर तो मुहर लगा ही दी कि हमारे नेता या मंत्री भ्रष्टाचार या घोटाले अपने कद के हिसाब से करते हैं। राज्य का कोई मंत्री होता है तो उसका मुहं छोटा होता है...और सेंट्रल का कोई मिनिस्टर हो तो उसका मुंह राज्य के मंत्री से बड़ा। ये सिर्फ राज्य और केन्द्र के नेताओं औऱ मंत्रियों पर ही लागू नहीं होता बल्कि वार्ड स्तर से लेकर केन्द्र के मंत्री तक सब पर लागू होता है। समाज में जिस तरह स्टेंडर्ड और स्टेटस का ख्याल रखा जाता है ठीक उसी तरह राजनीति में भी भ्रष्टाचार और घोटाले भी स्टेंडर्ड और स्टेटस के हिसाब से किए जाते हैं। केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद के ट्रस्ट के मामले में खुर्शीद के सहयोगी बेनी प्रसाद वर्मा भले ही भ्रष्टाचार और घोटालों में नेताओं के स्टेंडर्ड का खुलासा करके अब अपनी बात से पलट गए हों...लेकिन बड़बोले बेनी प्रसाद वर्मा जी ने जो कहा वो राजनीति के गलियारों की वो कड़वी सच्चाई है...जिसे सुनकर नेताओं को भले ही कोई फर्क न पड़े लेकिन इन नेताओं को इस लायक बनाने वाली आम जनता का खून जरूर खौल उठा है। पहले सलमान खर्शीद के ट्रस्ट पर लगे 71 लाख के घोटाले के आरोप को मामूली बात बताते हुए इस पर गंभीर न होने की बात करने वाले बेनी प्रसाद वर्मा हालांकि बाद में ये कहते दिखाई दिए कि 1 रुपए का हेरफेर भी गलत है...लेकिन पहले वे करोड़ों के हेरफेर को ही भ्रष्टाचार या घोटाला मानते थे। बड़े शर्म की बात है कि पहले ये नेता घोटाले करते हैं फिर कहते हैं कि 71 करोड़ का होता तो गंभीरता दिखाते। वैसे देखा जाए तो भ्रष्टाचार औऱ घोटालों में लिप्त होने के बाद भी सीना ठोक कर खुद को पाक साफ बताने वाले नेता और मंत्रियों की पीछे की ताकत कहीं न कहीं आम जनता ही है...जो भ्रष्टाचार और घोटालों में लिप्त होने के बाद भी बार बार चुनाव में इन नेताओं को वोट देकर दोबारा से खुलकर उन्हें लूटने का लायसेंस दे देती है। ये नेता भी शायद यही समझते हैं कि चुनाव जीतने के बाद वे कम से कम पांच साल का लायसेंस लेकर विधानसभा या संसद में पहुंचे हैं...और अब वो चाहे जो करें उन्हें देखने वाला...रोकने वाला कोई नहीं है। शायद यही वजह है कि कई राज्यों में मुख्यमंत्री और उनके मंत्री भ्रष्टाचार के आरोप में लिप्त हैं...केन्द्र में प्रधानमंत्री पर आरोप लगते हैं...और उनके एक दर्जन से ज्यादा मंत्रियों पर विभिन्न घोटालों में लिप्त होने का आरोप हैं...लेकिन इसके बाद भी वे सीना ठोक कर कहते हैं कि हम किसी भी जांच के लिए तैयार हैं...हमने कुछ गलत नहीं किया है...ये पांच साल के लायसेंस की ताकत नहीं तो और क्या है कि ये नेता, मंत्री अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझते हैं...वे जांच के लिए तैयार होने की बात तो करते हैं...लेकिन निडर होकर इतने विश्वास से इसलिए कि उन्हें पता है कि जांच एजेंसियां तो सरकार के हाथ में ही हैं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि नेताओं को भ्रष्टाचार और घोटालों के लिए जिम्मेदार ठहराने वाली जनता अपनी ताकत को कब पहचानेगी। अगर जनता अपनी ताकत को पहचान जाए और पांच साल में एक बार आने वाले लोकतंत्र के पर्व में भ्रष्टाचारियों को सबक सिखाने की ठान ले तो न कोई सलमान खुर्शीद नेता भविष्य में भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद प्रेस कांफ्रेंस करने की हिम्मत जुटा पाएगा और न ही बेनी प्रसाद वर्मा जैसे मंत्री ये कहने की जुर्रत कर पाएंगे कि 71 लाख का घोटाला सेंट्रल मिनिस्टर के लेवल का नहीं है...71 करोड़ होते तो हम सीरियस होते।   
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सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

ओम प्रकाश चौटाला ले लें बलात्कार रोकने की गारंटी


अपराधों की कई श्रेणियां है...लेकिन अपराध कोई भी हो क्षमा योग्य तो नहीं कहा जा सकता और वो भी बलात्कार जैसा घिनौना अपराध तो कतई क्षमायोग्य नहीं होना चाहिए...क्योंकि बलात्कार के बाद न सिर्फ पीड़ित बल्कि पीड़ित का परिवार के लिए भी समाज का समना करना मुश्किल हो जाता है। कई मामलों में पीडित या तो आत्महत्या कर लेतीं हैं या फिर घुट घुट कर अपना जीवन बिताती है...हालांकि कुछ एक मामलों में पीड़ित एक नए जीवन की शुरुआत तो करते हैं...लेकिन ऐसे मामले गिनती के ही होते हैं। हरियाणा में बलात्कार की एक के बाद एक घटनाओं के बाद खाप पंचायतों की सोच कि कम उम्र में लड़कियों का विवाह करके उन्हें बलात्कार की घटनाओं से बचाया जा सकता है किसी भी नजर से सार्थक नहीं दिखाई देती...क्योंकि समाज में हम सब के बीच में भेष बदलकर घूमते हवस के भेड़िये सिर्फ अपनी हवस का शिकार सिर्फ अविवाहित लड़कियां ही नहीं होती बल्कि अधिकतर मामलों में विवाहित महिलाएं भी बलात्कार की शिकार होती आयी हैं...ऐसे में कम उम्र में विवाह इसका समाधान तो कतई नहीं हो सकता। जहां तक खाप पांचायतों की बात है तो खाप के पूर्व में अलग अलग मामलों में आने वाले फैसलों में कहीं न कहीं महिलाओं को रुढ़ीवादी परंपराओं में बांधने पर विश्वास रखते हैं ऐसा प्रतीत होता है। जो स्त्रियों की आत्मनिर्भरता को बाधित तो करते ही हैं...साथ ही स्त्रियों के सामाजिक औऱ शैक्षिक विकास को भी बाधित करते हैं...ऐसे में ओम प्रकाश चौटाला जैसे राजनीतिज्ञ जो खाप पंचायतों के फैसलों का समर्थन करते हैं कहीं न हीं उनकी विचारधारा पर भी संदेह होता है कि क्या कोई पूर्व मुख्यमंत्री भी स्त्रियों के सामाजिक और शैक्षिक विकास की बजाए उनकी आत्मनिर्भरता को बाधित कैसे कर सकता है...लेकिन ओम प्रकाश चौटाला के मामले में तो यही प्रतीत होता है। जहां तक कम उम्र में लड़कियों के विवाह की बात है तो निश्चित ही कम उम्र में विवाह लड़कियों के अधिकारों और उनकी अपेक्षाओं के साथ अन्याय प्रतीत होता है क्योंकि हर लड़की वो भी आज के समय में पढ़ना चाहती है और देश दुनिया में विभिन्न क्षेत्रों में नाम कमा रही लड़कियों-महिलाओं की तरह बनना चाहती है...लेकिन परिजनों औऱ नाते रिश्तेदारों के दबाव में कम उम्र में विवाह उनके अधिकारों पर अतिक्रमण तो है ही साथ ही उनके सपनों और जीवन में कुछ कर गुजरने की अपेक्षाओं के साथ अन्याय भी है। जहां तक बात है हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला की...तो चौटाला साहब जब हरियाणा के मुख्यमंत्री थे तब क्या उनके कार्यकाल में बलात्कार की घटनाएं नहीं हुई थी...तब भी अपराध हो  रहे थे...विवाहितों महिलाओं के साथ बलात्कार के सैंकड़ों घटनाएं हुई थी...लेकिन तब वो प्रदेश के मुखिया होने के बावजूद इन घटनाओं पर लगाम नहीं कस पाए। ऐसे में अब वो इस मामले में गारंटी लेना तो दूर की बात है...वे तो खाप पंचायतों की राय पर उसका समर्थन करने के अपने ही बयान से पलटते नजर आए थे...और कहते दिखे थे कि वे खाप के किसी फैसले या राय का न तो समर्थन करते हैं और न ही विरोध...यानि मूक सहमति तो उनकी खाप के साथ थी...लेकिन कहने से बच जरुर रहे थे। वैसे हमारे राजनेता विपक्ष में रहते हुए गारंटी तो हर चीज की ले लेते हैं...लेकिन सत्ता में आने के साथ ही ये गारंटी भी एक्सपायर भी उतनी ही जल्दी हो जाती है...जितने विश्वास के साथ नेता इसे लेते हैं।

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रविवार, 14 अक्टूबर 2012

क्या खुर्शीद साहब नेताओं का रेट ही गिरा दिया !


आजतक ने सलमान खुर्शीद के चैरेटेबिल ट्रस्ट के खिलाफ ऑपरेशन धृतराष्ट्र में लाखों के घालमेल का पुलिंदा क्या खोला...केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद सफाई देते देते थक गए लेकिन फिर भी सफाई देने में नाकामयाब ही दिखाई पड़ रहे हैं। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में सम्मानित होने के बाद रविवार को लंदन से लौटे खुर्शीद अपने ट्रस्ट पर लगे आरोपों पर सफाई देने से पहले आम आदमी को अपमानित करने से नहीं चूके। मीडिया से मुखातिब होने से पहले खुर्शीद साहब कहते हैं कि वे सड़क पर खड़े किसी आदमी के सवालों का जवाब नहीं देंगे...जाहिर है उनका ईशारा उनके इस्तीफे की मांग को लेकर उनके खिलाफ मोर्चा खोल कर बैठे अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी की तरफ था...लेकिन खुर्शीद साहब आप ये क्यों भूल गए कि जिस पैसे के घालमेल का आरोप आपके ट्रस्ट पर लगा है वो पैसा तो सड़क पर घूमने वाले, सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले, धरना प्रदर्शन करने वाले आम आदमी का ही तो है...और आम आदमी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ सड़क पर ही तो उठाएगा...मोर्चा सड़क पर ही तो खोलेगा...ऐसे में आप आम आदमी के सवालों का जवाब क्यों नहीं देंगे...सिर्फ इसलिए कि आम आदमी ने आपको चुना या फिर इसलिए कि आप केन्द्रीय कानून मंत्री हैं। आपने भले ही अरविंद केजरीवाल की ओर ईशारा करते हुए ये बात कही...लेकिन सवाल तो आपने आम आदमी पर भी खड़े कर दिए। ऐसे में आपके ट्रस्ट में घालेमल हुआ या नहीं हुआ ये तो अलग बात है...लेकिन आप आम आदमी के प्रति अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते...क्योंकि ये तो आप भी अच्छी तरह समझते होंगे कि आम आदमी अगर आपको चुन कर संसद में भेज सकता है तो आम आदमी अगले चुनाव में आपकी जमानत भी जब्त करवा सकता है। लगता है प्रेस कांफ्रेंस शुरु होने से पहले लंदन में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में सम्मानित होने की इतराहट आप में बाकी थी...शायद इसलिए ही आप ऐसा बोल गए...वरना जनता का जनप्रतिनिधि...आम आदमी का जनप्रतिनिधि कम से कम आम आदमी के लिए ऐसी बात तो कतई नहीं करता। आप जिस पद पर बैठे हैं...वहां पर भी आपकी पहली जवाबदेही आम आदमी के प्रति...इस देश की जनता के प्रति ही बनती है...और इसे आप चाहकर भी नकार नहीं सकते...क्योंकि आम आदमी ठान ले तो...किसी का भी खासकर नेताओं, मंत्रियों का वक्त बदलते देर नहीं लगती...वैसे भी चुनाव में अब वक्त ही कितना रह गया है...इसलिए इससे पहले जनता आपकी जवाबदेही तय करने की सोचे...आप जवाबदेह बन जाओ...वरना अर्श से फर्श पर आते देर नहीं लगेगी। वैसे सलमान साहब आप पर लगे आरोपों में कितनी सच्चाई है ये तो आप और आपके ट्रस्ट से जुड़े लोग ही बेहतर जानते होंगे...लेकिन जब से आप पर ये आरोप लगे हैं...समूचे विपक्ष के साथ ही दबी जुबान में ये बात भी सुनने को मिल रही है कि...मंत्री जी ने नेताओं को रेट ही खराब कर दिया...चर्चाएं ये भी हैं कि अगर घालमाल करना ही था तो नेताओं के स्टेटस का तो कम से कम ख्याल रखते...करोड़ों में तो घालमेल करते...क्या लाखों में ही मामला निपटा लिया।
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शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

न तो वोट पेड़ पर लगते हैं...और न ही जनता की याददाश्त कमजोर है


केन्द्र सरकार के कड़े फैसलों के बाद देशभर की दो संसदीय सीटों पश्चिम बंगाल की जांगीपुर और उत्तराखंड की टिहरी सीट पर देशभर की निगाहें थे। जांगीपुर में देश के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के बेटे और कांग्रेस प्रत्य़ाशी अभिजीत मुखर्जी की किस्मत दांव पर थी तो टिहरी में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के बेटे और कांग्रेस प्रत्याशी साकेत बहुगुणा के भाग्य के साथ ही सीएम बहुगुणा की प्रतिष्ठा भी दांव पर थी...लेकिन दोनों ही उपचुनाव के नतीजे कांग्रेस के लिए मायूसी ही लेकर आए। भले ही जांगीपुर में कांग्रेस ने जीत दर्ज की लेकिन जीत का अंतर कांग्रेस के माथे पर बल लाने के लिए काफी है...वो भी तब जब टीएमसी ने जांगीपुर सीट पर अपना प्रत्याशी नहीं उतारा था। जिस सीट पर 2009 में कांग्रेस के टिकट पर प्रणव मुखर्जी करीब सवा लाख से अधिक मतों से जीते हों...उस सीट पर उनका बेटा सिर्फ 2536 वोटों से ही जीत दर्ज कर पाया। उत्तराखंड के टिहरी की अगर बात करें तो इस सीट पर अपने बेटे साकेत के लिए तमाम विरोधों और विवादों के बीच सीएम आलाकमान से जीत की गारंटी के साथ टिकट लेकर आए थे...और इसके लिए मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कोई कसर भी नहीं छोड़ी थी। लेकिन जब ईवीएम ने नतीजे बाहर फेंके तो मुख्यमंत्री बहुगुणा के चेहरे का रंग भी उड़ गया। भाजपा प्रत्याशी महारानी राज्य लक्ष्मी शाह ने कांग्रेस प्रत्याशी साकेत बहुगुणा को 22 हजार 431 वोट से करारी शिकस्त दी। पश्चिम बंगाल के जांगीपुर की बात हो या फिर उत्तराखंड की टिहरी की दोनों ही सीटों पर जनता ने कांग्रेस को बता दिया कि न तो वोट पेड़ पर लगते हैं और न ही जनता की याददाश्त कमजोर होती है...जो कि सरकार के घोटालों को जल्द भूल जाए। यहां पर हमारे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री का बयान याद दिलाना चाहूंग...जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश के नाम संबोधन में कहा था कि- पैसे पेड़ पर नहीं लगते...साथ ही हमारे गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कोयला घोटाले पर कहा था कि- बफोर्स की तरह जनता कोयला घोटाला भी भूल जाएगी। इसके साथ ही इन दो उपचुनाव की नतीजों के पीछे जिसका सबसे बड़ा हाथ है वो शायद रसोई गैस सिलेंडर है...जिसे सरकार के एक फैसले ने आम आदमी की पहुंच से दूर कर दिया। पेट्रोल के दाम या खाद्य सामग्री के दाम बढ़ते हैं तो जनता को उतनी तकलीफ नहीं होती क्योंकि ये चीजें महंगी भले ही हो जाएं...लेकिन जनता को आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं...जबकि एक - एक गैस सिलेंडर के लिए आमजन को नाको चने चबाने पड़ते हैं...और उस पर भी सिलेंडर के दाम बढ़ाने के साथ ही रसोई गैस सिलेंडर का कोटा फिक्स करने के केन्द्र की कांग्रेस नीत सरकार के फैसले ने पहले से ही महंगाई से त्रस्त आम जनता के गुस्से में घी का काम किया और नतीजा सबके सामने है। उत्तराखंड में जहां राज्य मे कांग्रेस सरकार होने के बाद भी कांग्रेस को करारी हार झेलनी पड़ी...वहीं पश्चिम बंगाल में कांग्रेस बमुश्किल हारते हारते बची। उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल के उपचुनाव भले ही केन्द्र की यूपीए सरकार के लिए सदन में संख्या के लिहाज से बहुत मायने नहीं रखते हों...लेकिन देश में केन्द्र सरकार के फैसलों के बाद बने माहौल का असर इन दोनों उपचुनाव में साफ देखने को मिला है। जिसका बड़ा असर नवंबर में हिमाचल प्रदेश औऱ दिसंबर में गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनाव में साफ तौर पर देखने को मिलेगा। दोनों ही राज्यों में वर्तमान में भाजपा की सरकार है...और कांग्रेस दोनों ही राज्यों में वापसी का दावा कर रही है...लेकिन कांग्रेस की राह कितनी आसान है इन दो उपचुनाव के नतीजों ने इसका आभास भी करा दिया है। बहरहाल जनता ने उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल के उपचुनाव में जता दिया कि कहीं न कहीं केन्द्र के फैसले के खिलाफ ये उसका गुस्सा है...जिसे सही वक्त पर सरकार ने नहीं पहचाना तो आने वाले चुनावों में कांग्रेस का सफाया हो सकता है। इसका ये मतलब बिल्कुल भी नहीं कि जनता का रूझान देश के मुख्य विपक्षी दल भाजपा या किसी दूसरी पार्टी की तरफ है...क्योंकि अगर जनता भाजपा के साथ होती तो इन फैसलों के खिलाफ खुलकर मतदान करती। उत्तराखंड की टिहर सीट पर हुए उपचुनाव में टिहरी की कुल 43 फीसदी जनता वोट देने पोलिंग बूथ तक पहुंची तो पश्चिम बंगाल के जांगीपुर सीट पर ये आंकड़ा 60 फीसदी रहा। हालांकि 60 फीसदी मतदान ठीक ठाक माना जाता रहा है...लेकिन इस सीट पर 2009 में 84.71 प्रतिशत मतदान हुआ था...जिसके मुकाबले इसे ठीक ठाक तो नहीं माना जा सकता। इसका सीधा मतलब ये निकलता है कि जनता ये समझ चुकी है कि सत्ता में कोई भी रहे न तो भ्रष्टाचार और घोटाले रूकेंगे और न ही आमजन की मुश्किलें कम होंगी...इसलिए शायद उत्तराखंड की टिहरी सीट पर 57 फीसदी जनता तो पश्चिम बंगाल की जांगीपुर सीट पर 40 फीसदी जनता पोलिंग बूथ तक पहुंची ही नहीं। ये न सिर्फ दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए बल्कि उन राजनीतिक दलों के लिए खतरे की घंटी है जो ये सोचते हैं कि वोट पेड़ पर लगते हैं और जनता की याददाश्त भी कमजोर होती है। खैर समझने वालों के लिए ईशारा काफी होता है...और जनता ने ईशारा कर दिया है...देखना ये होगा कि कितने समझदार ये ईशारा समझते हैं।

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शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012

रामदेव पर सरकार का ब्रह्मास्त्र


योगगुरु बाबा रामदेव के गुरु शंकरदेव के रहस्यमंय ढंग से लापता होने की गुत्थी अब सीबीआई सुलझाएगी...वही सीबीआई जिस पर बाबा रामदेव आरोप लगाते हैं कि ये केन्द्र सरकार की सबसे बड़ी ताकत है...और इसका इस्तेमाल सरकार अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने में करती है...अगर बाबा की बात में दम है तो इसका मतलब सीबीआई के सहारे अब सरकार ने क्या रामदेव की घेराबंदी शुरू कर दी है। वैसे बाबा इस बात को चाह कर भी नहीं कह सकते...क्योंकि ये उनके गुरु शंकरदेव का जो मामला है...और उन पर हरिद्वार के ही कई संतों के साथ कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने भी अपने गुरु को गायब करवाकर उनकी हत्या करने तक का आरोप मढ़ा है। ऐसे में बाबा कैसे सीबीआई जांच के सरकार के फैसले के खिलाफ बोल सकते हैं। अगर संतों के और दिग्विजय सिंह के आरोप झूठे हैं और बाबा रामदेव पाक साफ हैं तो बाबा तो निश्चय ही सरकार के इस फैसले का स्वागत करंगे। लेकिन क्या सच्चाई यही है...या कुछ और…? बाबा रामदेव के गुरु की शंकरदेव की अगर बात करें तो शंकरदेव 14 जुलाई 2007 को हरिद्वार के कृपालुबाग आश्रम कनखल से रहस्यमय तरीके से लापता हो गए थे...जिस पर 16 जुलाई को रामदेव के सहयोगी आचार्य बालकृष्ण ने कनखल थाने में रिपोट दर्ज कराई थी। 10 अप्रेल 2012 को पुलिस ने इस मामले में फाइनल रिपोर्ट लगाकर फाइल को बंद कर दिया था। इस दौरान बाबा रामदेव ने कभी भी अपने गुरु शंकरदेव को तलाश करने के लिए पुलिस पर न तो दबाव बनाया और न ही कोई प्रयास कि...जो निश्चित तौर पर चौंकाने वाली बात है...और इस दौरान रामदेव पर अपने गुरु को गायब करवाने के भी आरोप लगे। अपने गुरु के प्रति रामदेव के उदासीन रवैये को देखकर रामदेव सवालों के घेरे में तो आते ही हैं...और शायद रामदेव के केन्द्र सरकार पर लगातार हमले से बौखलाई केन्द्र सरकार ने राज्य की कांग्रेस सरकार के कंधे पर बंदूक रखकर मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी है...जो रामदेव को घेरने की सरकार की रणनीति का ही एक हिस्सा दिखाई देता है। इससे पहले भी सरकार विभिन्न एजेंसियों के माध्यम से रामदेव को नोटिस पर नोटिस भेज कर बाबा का जीना हराम कर ही चुकी है...और अब शंकरदेव के लापता होने के मामले की जांच सीबीआई को रामदेव के पीछे छोड़कर सरकार ने अपने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया है। सरकार का रामदेव के खिलाफ ये दांव कितना सफल होगा...ये तो वक्त ही बताएगा...लेकिन ऐसा भी लगता है कि सरकार ने अपने ब्रह्मास्त्र को छोड़ने में कुछ ज्यादा ही जल्दी कर दी और वो भी ऐसे समय में जब रामदेव अपने आंदोलनों के जरिए केन्द्र सरकार की नाक में दम किए बैठे हैं...ऐसे वक्त पर सरकार के इस फैसले से तो यही संदेश सबके बीच जाएगा कि बौखलाई सरकार ने रामदेव को जबरन घेरने के लिए ही ये कदम उठाया है...यानि कि रामदेव को इसका नुकसान होने की बजाए फायदा ही पहुंचता दिखाई दे रहा है। क्योंकि ऐसे में रामदेव के समर्थकों को विश्वास उनके प्रति कम नहीं होगा बल्कि और भी बढ़ेगा...जो रामदेव की ताकत को और बढ़ाएगा। बहरहाल रामदेव के एक के बाद एक सरकार पर वार के बाद सरकार ने रामदेव के खिलाफ राज्य की कांग्रेस सरकार के जरिए ब्रह्मास्त्र तो फेंका है...लेकिन देखना ये होगा कि आर पार की इस लड़ाई में जीत किसकी होती है...रामदेव की या फिर सरकार की।
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गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

आबरु लुटे तो लुटे...इन्हें फर्क नहीं पड़ता


हरियाणा में एक महीने में बलात्कार की 16 घटनाएं हो जाती हैं...पुलिस ज्यादातर मामलों में आरोपियों को गिरफ्तार करने में भी नाकाम साबित होती है...ऐसे में यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी जो कि खुद एक महिला हैं...हरियाणा के जींद में एक पीड़ित दलित परिवार के घर पहुंचती है...सोनिया पीड़ित परिवार को ढ़ांढ़स तो बंधाती हैं...लेकिन घर से बाहर निकलते ही वे भूल जाती हैं कि वे भी शायद एक महिला हैं...ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि बाहर निकलकर सोनिया गांधी से तो कम से कम एक इतने संवेदनशील मुद्दे पर ऐसे बयान की उम्मीद कतई नहीं थी। सोनिया इन घटनाओं के लिए राज्य की कांग्रेस सरकार...जो कि उनकी ही पार्टी की है...पर ये कहते हुए पर्दा डालने की कोशिश करती हैं...कि बलात्कार की घटनाएं तो देशभर में हो रही हैं...खैर सोनिया ने ये कहा सो कहा...सोनिया के इस बयान के बाद से इस मुद्दे पर राजनीति गर्मा जाती है...और तमाम विपक्षी दल सोनिया के इस बयान की आलोचना करते हैं...लेकिन योगगुरु बाबा रामदेव जिनकी कर्मभूमि भले ही हरिद्वार हो लेकिन उनकी जन्मभूमि तो हरियाणा हैं...लगता है इस बयान से कुछ ज्यादा ही आहत हो गए...और सोनिया पर ये कहकर वार करते हैं कि...सोनिया जी अगर ये घटना आपकी बेटी के साथ होती तो क्या तब भी आप ऐसा ही बयान देती। अब रामदेव के इस बयान के पीछे की वजह सिर्फ और सिर्फ सोनिया का बयान ही था या फिर केन्द्र सरकार के खिलाफ उनकी बौखलाहट ये तो आप भी बेहतर समझ गए होंगे। बहरहाल सोनिया के बयान के बाद उठे बवाल को रामदेव ने ये कहकर उबाल जरूर दे दिया...अबकी बार रामदेव ने सीधा सोनिया गांधी पर हमला बोला था...वो भी तीखा तो कांग्रेसी कहां पीछे रहने वाले थे। एक एक कर केन्द्र सरकार के मंत्री और कांग्रेसी नेता रामदेव पर बरस पड़ते हैं...औऱ रामदेव के योगगुरु होने पर ही सवाल खड़े कर देते हैं। बड़ा सवाल ये भी है कि रामदेव के जिस बयान पर कांग्रेस बौखलाई हुई है...शायद कांग्रेस ये भूल गई कि ऐसा ही कुछ बयान कांग्रेस नेता रीता बहुगुणा ने करीब ढाई साल पहले दिया था...जब रीता ने बुलंदशहर में सरेआम एक सभा में कहा था कि उत्तर प्रदेश में अपराध का बोलबाला है और यूपी में लड़कियों की ईज्जत लूटी जा रही है...और बसपा सरकार तसल्ली के लिए मुआवजा बांट रही हैं...इसलिए मैं कहती हूं की दो लाख रूपए मुझ से ले लो और कर दो मायावती का बलात्कार फिर देखते हैं क्या होता है। रीत बहुगुणा जोशी के इस बयान के बाद बसपा कार्यकर्ताओं ने रीता के घर में आग लगा दी थी...लेकिन आज रामदेव सोनिया गांधी पर कुछ ऐसा ही बयान देते हैं तो कांग्रेस बौखला जाती है। राजनीति को इसी लिए सियूटिब्लयूटी का खेल कहा जाता है...जो अपने पर सूट करे वो तो सही है...जो न करे उस पर सामने वाले की जमकर खबर ले लो। बयानों की इस जंग के बीच इनेलो के ओम प्रकाश चौटाला साहब खाप पंचायतों के उस फैसले का समर्थन करते दिखाई देते हैं...जिसमें खाप पंचायतें कहती हैं...कि लड़कियों की शादी 15 वर्ष की उम्र तक कर देनी चाहिए ताकि बलात्कार की घटनाओं को कम किया जा सके। एक नई जुबानी जंग शुरू  जाती है...लेकिन हरियाणा में एक महीने में हुई बलात्कार की घटनाओं के पीड़ित औऱ उनके परिवार पर क्या गुजर रही होगी...इसका ख्याल किसी को नहीं है। विडंबना तो ये है कि पीडितों के हिमायती बनने वाले ये राजनीतिक दल किसी भी घटना के बाद घड़ियाली आंसू बहाते तो दिखाई दे जाते हैं...लेकिन इन घटनाओं को कम करने या रोकने के लिए...और आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए कोई सख्त कदम उठाने के लिए पहल करते नहीं दिखाई देते। इसे देश का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि हमारे राजनेता हर घटना पर राजनीति करने से बाज नहीं आते फिर चाहे किसी की बहू – बेटी की इज्जत आबरू की क्यों न दांव पर लगी हो। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ें तो इसकी भयावहता खुद बयां करते नजर आते हैं कि वाकई में देशभर में महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं। हरियाणा की ही अगर बात कर लें तो औसतन यहां रोज दो लड़कियां बलात्कार की शिकार हो रही हैं। पुलिस के आंकड़ें कहते हैं कि 2012 में हरियाणा में अब तक करीब 460 बलात्कार की घटनाएं हो चुकी हैं। जबकि 2011 में ये संख्या 733 थी। ये तो महज वे आंकड़ें हैं जो दर्ज हैं...ऐसे सैंकड़ों मामले और भी हैं जो किसी सरकारी रजिस्टर में लोक लाज के भय से या फिर दबंगों के डर से दर्ज नहीं हो पाते...यानि कि ये घटनाएं जितनी सामने आती हैं...उससे कही ज्यादा होती हैं। ऐसे में सवाल यही उठता है कि आखिर कब भले मानस का लबादा ओढ़कर हमारे बीच में घूम रहे ऐसे वह्शी दरिंदों के खिलाफ पुलिस और राज्य सरकारें उनके रसूख औऱ राजनीतिक कनेक्शन को दरकिनार करते हुए दबंगई से उनके खिलाफ कार्रवाई करेंगी...और उन्हें जेल की सलाखों के पीछे भेजेंगी ताकि युवतियां – महिलाएं बैखौफ होकर घर से बाहर निकल सकें...हालांकि ऐसा तब तो कम से कम संभव नहीं दिखाई देता जब तक सरकार में बैठे लोग भाई भतीजावाद और अपनी कुर्सी की महत्वकांक्षा को त्याग कर काम नहीं करेंगे। उम्मीद करते हैं कि अगली बार देश के जिम्मेदार नेताओं और लोगों से तो कम से कम ऐसे बयान सुनने को न ही मिले...जिनसे लोगों को बड़ी उम्मीदें हैं। उम्मीद तो ये भी कर सकते हैं कि ऐसी घटनाएं ही हमें सुनने को न मिले...हालांकि ऐसी बातें तो हमारे राजनेता भी बखूबी कर लेते हैं...लेकिन कहते हैं न अच्छा सोचना और अच्छा करना दोनों में बड़ा फर्क है...बस जरूरत है तो इस बात को समझने कि...देखते हैं इस चीज को समझने वाले हमारे देश में कितने लोग हैं।
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सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

पल पल क्यों बदल रहे हैं अन्ना ?


अगस्त के पहले सप्ताह में दिल्ली के जंतर मंतर पर जब अन्ना हजारे ने अपनी टीम के साथ चुनावी विकल्प देने के वादे के साथ अचानक अनशन समाप्त करने की घोषणा की थी...तो कहा जाने लगा था कि इस आंदोलन की भ्रूण हत्या हो गई है...एक लंबे सन्नाटे के बाद फिर से सुगबुगाहट शुरु होती है और बीते एक महीने के भीतर ही अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल में राजनीतिक दल गठन पर मतभेद की खबरें सुर्खियां बनती हैं...और इसी बीच अन्ना केजरीवाल से किनारा कर लेते हैं...और अपना नाम और फोटो तक के इस्तेमाल न करने हिदायत देते हैं...अन्ना यहीं नहीं रूकते इसके बाद लगातार कभी अपने बलॉग के जरिए तो कभी मीडिया के सवालों के जवाब में केजरीवाल पर निशाना साधने से नहीं चूकते...इस दौरान अन्ना राजनीति को गंदा कहते हुए इस रास्ते के चयन पर केजरीवाल को जमकर कोसते भी हैं...इस बीच लोगों तक भी ये संदेश जाता है कि अन्ना और केजरीवाल के रास्ते अलग अलग हैं...और अन्ना नई टीम के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ एक नया जनांदोलन खड़ा करेंगे...लेकिन 01 अक्टूबर को सुबह अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया से मुलाकात के बाद अचानक अन्ना शाम को केजरीवाल के राजनीति के रास्ते को सही ठहराते हुए चुनाव लड़ने पर न सिर्फ केजरीवाल का समर्थन करने का ऐलान करते हैं बल्कि केजरीवाल से दिल्ली के चांदनी चौक से कपिल सिब्बल के खिलाफ चुनाव लड़ने की सलाह देते हुए उनके पक्ष में चुनाव प्रचार करने पर भी हामी भरते दिखाई देते हैं। इस सब घटनाक्रम के बीच न सिर्फ अन्ना के समर्थक बल्कि आम जनता भी असमंजस में जरूर होगी कि आखिर बीते एक महीने में क्यों अन्ना अपनी बात पर कायम नहीं सके। क्यों पल पल अन्ना ने अपने बयान और फैसले बदले...आखिर सुबह केजरीवाल और सिसौदिया के बीच ऐसी क्या गुफ्तगु हुई कि एक दिन पहले तक केजरीवाल को कोसने वाले अन्ना अचानक उनके साथ खड़े होते दिखाई दिए। हालांकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि डेढ़ साल पहले शुरू हुई जनलोकपाल की इस लड़ाई में अन्ना के साथ केजरीवाल और उनके दूसरे सहयोगी कंधा से कंधा मिलाकर खड़े रहे और इस आंदोलन की सफलता का श्रेय इनको भी उतना ही जाता है जितना कि अन्ना हजारे को। लेकिन डेढ़ साल तक जो टीम एक साथ कंधा से कंधा मिलाकर खड़ी थी...वो टीम बीते एक महीने में ताश के पत्तों की माफिक बिखर गई। अन्ना के केजरीवाल के समर्थन करने के बयान के बाद अब लगने लगा है कि शायद फिर से आने वाले वक्त पर ये सभी लोग एक मंच पर दिखाई दे सकते हैं। लेकिन सवाल बना हुआ है कि आखिर अन्ना के पल पल बदलते बयानों के पीछे कोई गुस्सा या नाराजगी थी...या फिर कुछ औऱ। अन्ना के केजरीवाल से किनारा करने के बाद जहां उनके समर्थक भी दो गुटों में बंट गए थे...तो वहीं आमजन का मिजाज भी सामने दो रास्ते देख बदलने लगा था...लेकिन अन्ना के बदलते बयानों के बाद अब फिर से संशय गहराने लगा है कि आखिर अन्ना की मंशा क्या है...क्यों अन्ना एक पल तो केजरीवाल के राजनीति के रास्ते को गलत ठहराते हैं और दूसरे ही पल केजरीवाल के रास्ते को सही ठहराते हुए उनके समर्थन की बात करते हैं। क्या इस तरह अन्ना हजारे अपनी इस लड़ाई में अपने समर्थकों के साथ ही लंबे समय तक आमजन का भरोसा बनाए रखने में कामयाब रह पाएंगे। बहरहाल अन्ना और केजरीवाल के बनते बिगड़ते रिश्तों के बीच उनके समर्थकों के साथ ही आमजन असमंजस में है कि आखिर वो करें तो क्या करें...अन्ना को चाहिए कि ऐसी संशय की स्थिति को पैदा होने से रोकें...ताकि उनके समर्थकों और आमजन का विश्वास उन पर बना रहे और एक अच्छे मकसद के लिए शुरु हुई लडाई अपने अंजाम तक पहुंच सके...और इस देश की जनता को भ्रष्टाचार से 100 प्रतिशत नहीं तो कम से कम कुछ हद तक तो राहत मिल सके।

deepaktiwari555@gmail.com

रविवार, 30 सितंबर 2012

झूठा कौन – अन्ना हजारे या अरविंद केजरीवाल ?



जिस आंदोलन ने सरकार की चूलें हिला दी थी...उस आंदोलन को खड़ी करने वाली टीम एक झटके में बिखर गई...ऐसे में जाहिर है इसका दर्द इतने जल्दी दिल से नहीं जाएगा...गाहे बगाहे इसके पीछे की दास्तां और इसका दर्द जुबां पर आ ही जाता है...19 सितंबर 2012 को केजरीवाल से राजनीतिक दल के गठन पर मतभेद के बाद अपने सहयोगियों से किनारा कर जब अन्ना दिल्ली से रालेगण सिद्धी लौटे तो उसके बाद से कभी अन्ना ने अपने बलॉग के जरिए तो कभी पत्रकारों के सवाल देते हुए इस दर्द को जाहिर किया और अपरोक्ष रूप से इसके लिए केजरीवाल पर भी निशाना साधा। ब्लॉग के जरिए जहां अन्ना ने राजनीति को आंदोलन का बंटाधार करने के लिए जिम्मेदार ठहराया तो साथ ही ये भी कहा कि राजजीतिक दल गठन के फैसले के समर्थन में वे कभी रहे ही नहीं...अन्ना के इस बयान के बाद ये भी सवाल उठता है कि जब अगस्त में जंतर मंतर में अन्ना हजारे और उनकी टीम ने जनता को चुनावी विकल्प देने की जरूरत बताते हुए अपना अनशन समाप्त किया तो उस वक्त क्यों नहीं अन्ना ने इसका विरोध किया...आखिर क्यों अन्ना ने अनशन के समाप्त होने के कुछ दिनों बाद अपनी मंशा स्पष्ट करते हुए किसी राजनीतिक दल के गठन और उसके साथ जुड़ने के खिलाफ होने की बात कही। अन्ना अगर राजनीति में आने के पक्षधर नहीं थे...जैसा वे कह रहे हैं तो इसका सीधा मतलब ये निकलता है कि अन्ना पर जंतर मंतर पर अनशन समाप्त करने के वक्त या उससे पहले अपने कुछ सहयोगियों का चुनावी विकल्प के फैसले का समर्थन करने का भारी दबाव था। हालांकि अरविंद का ताजा बयान इसको झुठलाते हुए नजर आता है...जिसमें अरविंद ने कहा है कि राजनीतिक दल गठन के इस फैसले के समर्थन में अन्ना भी थे, लेकिन अब न जाने क्यों वे इस बात से इंकार कर रहे हैं। कई ऐसे सवाल हैं जो लगातार जेहन में उठ रहे हैं कि आखिर कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ...लेकिन अन्ना जिस तरह से लगातार अब बड़े ही तल्ख लहजे में राजनीतिक दल गठन करने के फैसले का विरोध करते हुए अपने पूर्व सहयोगियों को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं उससे तो फिलहाल ये साफ होता दिख रहा है कि चुनावी विकल्प के फैसले पर अन्ना पर अपने कुछ सहयोगियों का भारी दबाव था...किरण बेदी के इस बयान के बाद भी इस पर मुहर लगती दिखती है...जिसमें वे ये कहती हैं कि जिन लोगों को राजनीति बेहतर विकल्प लगा वे अपने रास्ते चले गए हैं...और जो लोग आंदोलन के साथ थे...वो अन्ना हजारे के साथ खड़े हैं। बहरहाल देर सबेर इस पर से भी पर्दा उठ ही जाएगा...लेकिन फिलहाल अन्ना ने साफ कर दिया है कि जनलोकपाल के समर्थन में आंदोलन जारी रहेगा और आंदोलन ही एकमात्र रास्ता है जो भ्रष्टाचार मिटाने के लिए जनलोकपाल की लड़ाई को उसके अंजाम तक पहुंचाएगा। इसके लिए दिल्ली में अन्ना अब नई टीम बनाने की कवायद में भी जुट गए हैं...जिसमें स्वयं सेवकों के साथ ही रिटायर आईएएस, आईएफएस और आईपीएस अधिकारियों के साथ ही कई बड़े नाम शामिल हो सकते हैं...लेकिन यहां पर भी सवाल ये खड़ा उठता है कि क्या नई टीम के साथ भी अन्ना का आंदोलन उस ऊर्जा...उस धार के साथ आगे बढ़ पाएगा...और अपने अंजाम तक पहुंच पाएगा। 

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