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गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012

सुर्खियों के लिए केजरीवाल की जल्दबाजी


राजनीति में रहना है तो खबरों में बने रहना बहुत जरुरी है। सरकारी अधिकारी से पहले समाजसेवी बने और फिर समाजसेवी से राजनीतिज्ञ बने अरविंद केजरीवाल को शायद ये बात समझ में आ गयी है। इसलिए शायद अब केजरीवाल सुर्खियों में बने रहने के लिए हर वो काम कर रहे हैं जो उन्हें देश की जनता के बीच जिंदा रख सके। लेकिन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी पर लगाए गए आरोपों के बाद कहीं न कहीं लगता है कि केजरीवाल ने इस बार जल्दबाजी कर दी और इस बार उनकी प्रेस कांफ्रेस में वो धार भी नहीं दिखाई दी...जिसके लिए आमतौर पर केजरीवाल जाने जाते हैं। न ही केजरीवाल कोई इतना बड़ा धमाका गडकरी के खिलाफ कर पाए कि गडकरी के साथ ही देश की मुख्य विपक्षी पार्टी मुश्किलों में घिरती नजर आती। उस पर उस किसान गजानन घड़गे का पहले प्रेस कांफ्रेंस के बाद गायब हो जाना और फिर ये बयान देना की उसका गडकरी से कोई विवाद नहीं है...औऱ ये कहना कि गडकरी जी ने मेरी मदद की है...ने केजरीवाल एंड कंपनी पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे में केजरीवाल और दमानिया के दूसरे आरोप कि महाराष्ट्र में गडकरी और अजीत पवार की सांठगांठ का आरोप है...इस बात का खुलासा तो केजरीवाल और अंजलि उस वक्त ही कर चुकी थी जब सिंचाई घोटाले को उठाने के लिए गडकरी के पास जाने की बात कही थी। जिस बड़े खुलासे का दावा प्रेस कांफ्रेस से तीन चार दिन पहले तक किया जा रहा था...और जितनी उत्सुक्ता भाजपा से ज्यादा कांग्रेस को और आम लोगों को इस प्रेस कांफ्रेंस को लेकर थी वो प्रेस कांफ्रेंस शुरु होती ही निराशा में बदल गई। क्योंकि प्रचार खुलासे को लेकर प्रेस कांफ्रेस से पहले किया गया था उससे जहां कांग्रेस ये मानकर बैठी थी कि अब उसके हाथ भाजपा के खिलाफ बड़ा मुद्दा लग सकता है...लेकिन ऐसा हुआ नहीं...औऱ वैसे भी कांग्रेस महाराष्ट्र में एनसीपी के सहयोग से सरकार चला रही है...और महाराष्ट्र सरकार के तत्कालीन सिंचाई मंत्री जो एनसीपी से ताल्लुक रखते हें...उनसे सांठगांठ का आरोप गडकरी पर लगाया गया तो कांग्रेस तो चाहकर भी इस मुद्दे को नहीं भुना सकती...क्योंकि माहाराष्ट्र और केन्द्र में दोनों जगह एनसीपी कांग्रेस की बैसाखी बनी हुई है। अऱविंद केजरीवाल के जिस जल्दबाजी में बिना बहुत कुछ साक्ष्य जुटाए वही पुराने आरोप गडकरी के खिलाफ दोहराए तो उससे तो यही लगता है कि केजरीवाल अखबार और टीवी की सुर्खियां बने रहना चाहते हैं...वैसे देखा जाए तो खुद के राजनीतिक वजूद को जिंदा रखने के लिए केजरीवाल को कुछ न कुछ ऐसा करना ही होगा...और बड़े राजनेताओं पर आरोप लगाकर इससे अच्छा तरीका दूसरा तो कई और नहीं हो सकता...लेकिन जो भी आरोप या खुलासा करने का दावा केजरीवाल एंड कंपनी करती है निश्चित ही तौर पर उसमें उतना ही दम भी होना चाहिए...या उन चीजों को बार बार दोहराने से केजरीवाल को बचना चाहिए। क्योंकि देश भर में जिस माहौल के बीच अरविंद केजरीवाल ने अन्ना के साथ मिलकर भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का आगाज़ किया था...उससे लोगों को उम्मीदें उनकी औऱ उनकी टीम से बढ़ गई थी...लेकिन अन्ना के अलग होने के बाद औऱ केजरीवाल के राजनीति में प्रवेश के बाद लोगों का केजरीवाल एंड कंपनी से मोह भंग भी हुआ है...हालांकि इसके बाद भी केजरीवाल के आंदोलनों में बड़ी संख्या में जिस तरह से लोग उनका साथ देने पहुंच रहे हैं उससे लगता है कि लोगों का एक बड़ा वर्ग केजरीवाल के राजनीति के फैसले से इत्तेफाक रखता है। ऐसे में वक्त में केजरीवाल को निश्चित ही चुनाव तक लोगों के जेहन में बने तो रहना होगा...लेकिन उसके लिए रोज रोज वो बड़े-बड़े खुलासे करें या नेताओं पर हमला करने के लिए खुद को पूरी तरह झोंक दें ये न तो संभव है और न ही केजरीवाल के लिए ठीक है। ऐसे में लंबे समय तक टिके रहने के लिए केजरीवाल एंड कंपनी को एक निश्चित अंतराल पर ही सही लेकिन पूरे दमखम और पुख्ता साक्ष्यों के साथ सीना ठोक कर भ्रष्ट नेताओं को घेरने पर काम करना चाहिए ताकि न तो ऐसा लगे की केजरीवाल की धार कुंद हुई है...और न ही उनके आरोपों को कोई सिरे से नकार सके...और सामने वालों को इसका जवाब देना पड़े।  

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बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

अब जनता कहेगी- ‘सत्ता से जाओगे, दोबारा वापस नहीं आ पाओगे’

देश का कानून मंत्री जब खुलेआम गुंडई पर उतर आए तो क्या कहेंगे...खुर्शीद साहब माना आपको इस बात का दर्द जरूर होगा कि बड़े बड़े घोटालों का किसी को कानों कान पता नहीं चला और सिर्फ 71 लाख रुपए के घालमेल में ईज्जत चली गयी...इसका मतलब ये तो नहीं कि आप ये भूल जाएं कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में निर्वाचित सरकार में कानून मंत्री हैं। जिस कानून मंत्री से लोगों का न्याय की आस रहती है...लेकिन आपने तो जनता को दिखा दिया की कानून मंत्री क्या कर सकता है। अपके इस बयान से तो कम से कम यही प्रतीत होता है...जो आपने केजरीवाल के संबंध में दिया। आप कहते हैं केजरीवाल फर्रुखाबाद जाकर वहां से लौटकर दिखाएं...आप कहते हैं कि अब मैं कलम की जगह लहू से काम लूंगा...आप कहते हैं कि आप जवाब सुनो और सवाल पूछना भूल जाओआपके इस बयान से तो यही लगता है कि हम किसी तानाशाह का बयान सुन रहे हों...जैसे हम आजाद भारत में नहीं बल्कि 1947 से पहले के भारत में रह रहे हों। हैरानी तो तब होती है जब इतना सब होने के बाद सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी मौन हैं। माना मनमोहन सिंह को तो मौन रहने की आदत है...लेकिन सोनिया जी आज तो सुन रही हैं न...क्या कह दिया आपके लाडले कानून मंत्री जी ने। मानसून सत्र में लाल कृष्ण आडवाणी ने जब यूपीए 2 सरकार को नाजायज कहा तो उस वक्त तो आपको खूब गुस्सा आया...लेकिन अब आपको क्या हो गया ? क्या आपको कानून मंत्री की गुंडई नहीं दिखाई देती ? जो सिर्फ इस बात पर बार बार अपना आपा खो देते हैं कि उन पर लगे आरोपों का एक आम आदमी उनसे जवाब मांगता है। क्या जो आम आदमी अपने नेता को चुनता है...वो उस आम आदमी के प्रति नेताओं की जवाबदेही नहीं बनती...अब कानून मंत्री को ये बात समझानी पड़े तो बाकी नेताओं की तो बात ही करनी बेकार है। सलमान साहब अगर आप पाक साफ हैं...आपके ट्रस्ट किसी घालमेल में लिप्त नहीं है तो डरते क्यों हो ? सवाल पूछने पर बार बार बौखलाते क्यों हो ? पेश कर दो मिसाल कि आप पाक साफ हो...दे दो इस्तीफा अपने पद से...लेकिन ये सब करने के लिए कलेजा चाहिए खुर्शीद साहब कलेजा...आप तो ये मानकर शायद कुर्सी पर बैठे हैं कि क्या पता दोबारा मौका मिले न मिले...दोबारा जनता आपको चुने या न चुने...इसलिए जितनी ऐश काटनी है अभी काट लो...कोई कुछ कहने वाला नहीं है...क्योंकि सरकार के मुखिया मनमोहन सिंह साहब को तो सबकुछ जानने के बाद भी मौनी बाबा बने रहने में आनंद की अनुभूति होती है लगता है...या फिर इसे उनकी मजबूरी कहें। जहां तक बात है यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी कि उनको शायद 2014 के आम चुनाव में यूपी के अल्पसंख्यक वोटर नजर आते हैं...औऱ वैसे भी सलमान खुर्शीद साहब उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का बड़ा अल्पसंख्यक चेहरा माना जाता है। ऐसे में उन पर कितने ही आरोप लगें...वो कुछ भी बोलें...आप उनको नहीं छेड़ेंगी...क्योंकि सोनिया को डर है कि कहीं आगामी चुनाव में सरकार को अल्पसंख्याक मतदाताओं के वोट से हाथ न धोना पड़े। यानि कि मनमोहन मौन हैं और सोनिया गांधी को 2014 के आम चुनाव की चिंता है...ऐसे में सिर्फ सलमान खुर्शीद ही क्यों इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा कुछ भी बकबक करते रहे आप उनको भी नहीं छेड़ सकती क्योंकि गोंडा में बेनी बाबू आपके तुरुप का इक्का हैं। लेकिन ये मत भूलिए कि जनता के समर्थन के बिना नेता और नेतागिरी कुछ नहीं...सरकार बनाना तो दूर की बात है...इसलिए वक्त है अभी भी चेत जाओ...नहीं तो अगर चुनाव में जतना ने ठान लिया तो फिर जनता खुर्शीद साहब की भाषा दोहराएगी और कहेगी- सत्ता से तो जाओगे.. दोबारा कभी वापस सत्ता में नहीं आ पाओगे।

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

ये भ्रष्टाचार और घोटालों का स्टेंडर्ड है


केन्द्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने आखिर इस बात पर तो मुहर लगा ही दी कि हमारे नेता या मंत्री भ्रष्टाचार या घोटाले अपने कद के हिसाब से करते हैं। राज्य का कोई मंत्री होता है तो उसका मुहं छोटा होता है...और सेंट्रल का कोई मिनिस्टर हो तो उसका मुंह राज्य के मंत्री से बड़ा। ये सिर्फ राज्य और केन्द्र के नेताओं औऱ मंत्रियों पर ही लागू नहीं होता बल्कि वार्ड स्तर से लेकर केन्द्र के मंत्री तक सब पर लागू होता है। समाज में जिस तरह स्टेंडर्ड और स्टेटस का ख्याल रखा जाता है ठीक उसी तरह राजनीति में भी भ्रष्टाचार और घोटाले भी स्टेंडर्ड और स्टेटस के हिसाब से किए जाते हैं। केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद के ट्रस्ट के मामले में खुर्शीद के सहयोगी बेनी प्रसाद वर्मा भले ही भ्रष्टाचार और घोटालों में नेताओं के स्टेंडर्ड का खुलासा करके अब अपनी बात से पलट गए हों...लेकिन बड़बोले बेनी प्रसाद वर्मा जी ने जो कहा वो राजनीति के गलियारों की वो कड़वी सच्चाई है...जिसे सुनकर नेताओं को भले ही कोई फर्क न पड़े लेकिन इन नेताओं को इस लायक बनाने वाली आम जनता का खून जरूर खौल उठा है। पहले सलमान खर्शीद के ट्रस्ट पर लगे 71 लाख के घोटाले के आरोप को मामूली बात बताते हुए इस पर गंभीर न होने की बात करने वाले बेनी प्रसाद वर्मा हालांकि बाद में ये कहते दिखाई दिए कि 1 रुपए का हेरफेर भी गलत है...लेकिन पहले वे करोड़ों के हेरफेर को ही भ्रष्टाचार या घोटाला मानते थे। बड़े शर्म की बात है कि पहले ये नेता घोटाले करते हैं फिर कहते हैं कि 71 करोड़ का होता तो गंभीरता दिखाते। वैसे देखा जाए तो भ्रष्टाचार औऱ घोटालों में लिप्त होने के बाद भी सीना ठोक कर खुद को पाक साफ बताने वाले नेता और मंत्रियों की पीछे की ताकत कहीं न कहीं आम जनता ही है...जो भ्रष्टाचार और घोटालों में लिप्त होने के बाद भी बार बार चुनाव में इन नेताओं को वोट देकर दोबारा से खुलकर उन्हें लूटने का लायसेंस दे देती है। ये नेता भी शायद यही समझते हैं कि चुनाव जीतने के बाद वे कम से कम पांच साल का लायसेंस लेकर विधानसभा या संसद में पहुंचे हैं...और अब वो चाहे जो करें उन्हें देखने वाला...रोकने वाला कोई नहीं है। शायद यही वजह है कि कई राज्यों में मुख्यमंत्री और उनके मंत्री भ्रष्टाचार के आरोप में लिप्त हैं...केन्द्र में प्रधानमंत्री पर आरोप लगते हैं...और उनके एक दर्जन से ज्यादा मंत्रियों पर विभिन्न घोटालों में लिप्त होने का आरोप हैं...लेकिन इसके बाद भी वे सीना ठोक कर कहते हैं कि हम किसी भी जांच के लिए तैयार हैं...हमने कुछ गलत नहीं किया है...ये पांच साल के लायसेंस की ताकत नहीं तो और क्या है कि ये नेता, मंत्री अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझते हैं...वे जांच के लिए तैयार होने की बात तो करते हैं...लेकिन निडर होकर इतने विश्वास से इसलिए कि उन्हें पता है कि जांच एजेंसियां तो सरकार के हाथ में ही हैं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि नेताओं को भ्रष्टाचार और घोटालों के लिए जिम्मेदार ठहराने वाली जनता अपनी ताकत को कब पहचानेगी। अगर जनता अपनी ताकत को पहचान जाए और पांच साल में एक बार आने वाले लोकतंत्र के पर्व में भ्रष्टाचारियों को सबक सिखाने की ठान ले तो न कोई सलमान खुर्शीद नेता भविष्य में भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद प्रेस कांफ्रेंस करने की हिम्मत जुटा पाएगा और न ही बेनी प्रसाद वर्मा जैसे मंत्री ये कहने की जुर्रत कर पाएंगे कि 71 लाख का घोटाला सेंट्रल मिनिस्टर के लेवल का नहीं है...71 करोड़ होते तो हम सीरियस होते।   
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सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

ओम प्रकाश चौटाला ले लें बलात्कार रोकने की गारंटी


अपराधों की कई श्रेणियां है...लेकिन अपराध कोई भी हो क्षमा योग्य तो नहीं कहा जा सकता और वो भी बलात्कार जैसा घिनौना अपराध तो कतई क्षमायोग्य नहीं होना चाहिए...क्योंकि बलात्कार के बाद न सिर्फ पीड़ित बल्कि पीड़ित का परिवार के लिए भी समाज का समना करना मुश्किल हो जाता है। कई मामलों में पीडित या तो आत्महत्या कर लेतीं हैं या फिर घुट घुट कर अपना जीवन बिताती है...हालांकि कुछ एक मामलों में पीड़ित एक नए जीवन की शुरुआत तो करते हैं...लेकिन ऐसे मामले गिनती के ही होते हैं। हरियाणा में बलात्कार की एक के बाद एक घटनाओं के बाद खाप पंचायतों की सोच कि कम उम्र में लड़कियों का विवाह करके उन्हें बलात्कार की घटनाओं से बचाया जा सकता है किसी भी नजर से सार्थक नहीं दिखाई देती...क्योंकि समाज में हम सब के बीच में भेष बदलकर घूमते हवस के भेड़िये सिर्फ अपनी हवस का शिकार सिर्फ अविवाहित लड़कियां ही नहीं होती बल्कि अधिकतर मामलों में विवाहित महिलाएं भी बलात्कार की शिकार होती आयी हैं...ऐसे में कम उम्र में विवाह इसका समाधान तो कतई नहीं हो सकता। जहां तक खाप पांचायतों की बात है तो खाप के पूर्व में अलग अलग मामलों में आने वाले फैसलों में कहीं न कहीं महिलाओं को रुढ़ीवादी परंपराओं में बांधने पर विश्वास रखते हैं ऐसा प्रतीत होता है। जो स्त्रियों की आत्मनिर्भरता को बाधित तो करते ही हैं...साथ ही स्त्रियों के सामाजिक औऱ शैक्षिक विकास को भी बाधित करते हैं...ऐसे में ओम प्रकाश चौटाला जैसे राजनीतिज्ञ जो खाप पंचायतों के फैसलों का समर्थन करते हैं कहीं न हीं उनकी विचारधारा पर भी संदेह होता है कि क्या कोई पूर्व मुख्यमंत्री भी स्त्रियों के सामाजिक और शैक्षिक विकास की बजाए उनकी आत्मनिर्भरता को बाधित कैसे कर सकता है...लेकिन ओम प्रकाश चौटाला के मामले में तो यही प्रतीत होता है। जहां तक कम उम्र में लड़कियों के विवाह की बात है तो निश्चित ही कम उम्र में विवाह लड़कियों के अधिकारों और उनकी अपेक्षाओं के साथ अन्याय प्रतीत होता है क्योंकि हर लड़की वो भी आज के समय में पढ़ना चाहती है और देश दुनिया में विभिन्न क्षेत्रों में नाम कमा रही लड़कियों-महिलाओं की तरह बनना चाहती है...लेकिन परिजनों औऱ नाते रिश्तेदारों के दबाव में कम उम्र में विवाह उनके अधिकारों पर अतिक्रमण तो है ही साथ ही उनके सपनों और जीवन में कुछ कर गुजरने की अपेक्षाओं के साथ अन्याय भी है। जहां तक बात है हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला की...तो चौटाला साहब जब हरियाणा के मुख्यमंत्री थे तब क्या उनके कार्यकाल में बलात्कार की घटनाएं नहीं हुई थी...तब भी अपराध हो  रहे थे...विवाहितों महिलाओं के साथ बलात्कार के सैंकड़ों घटनाएं हुई थी...लेकिन तब वो प्रदेश के मुखिया होने के बावजूद इन घटनाओं पर लगाम नहीं कस पाए। ऐसे में अब वो इस मामले में गारंटी लेना तो दूर की बात है...वे तो खाप पंचायतों की राय पर उसका समर्थन करने के अपने ही बयान से पलटते नजर आए थे...और कहते दिखे थे कि वे खाप के किसी फैसले या राय का न तो समर्थन करते हैं और न ही विरोध...यानि मूक सहमति तो उनकी खाप के साथ थी...लेकिन कहने से बच जरुर रहे थे। वैसे हमारे राजनेता विपक्ष में रहते हुए गारंटी तो हर चीज की ले लेते हैं...लेकिन सत्ता में आने के साथ ही ये गारंटी भी एक्सपायर भी उतनी ही जल्दी हो जाती है...जितने विश्वास के साथ नेता इसे लेते हैं।

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रविवार, 14 अक्टूबर 2012

क्या खुर्शीद साहब नेताओं का रेट ही गिरा दिया !


आजतक ने सलमान खुर्शीद के चैरेटेबिल ट्रस्ट के खिलाफ ऑपरेशन धृतराष्ट्र में लाखों के घालमेल का पुलिंदा क्या खोला...केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद सफाई देते देते थक गए लेकिन फिर भी सफाई देने में नाकामयाब ही दिखाई पड़ रहे हैं। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में सम्मानित होने के बाद रविवार को लंदन से लौटे खुर्शीद अपने ट्रस्ट पर लगे आरोपों पर सफाई देने से पहले आम आदमी को अपमानित करने से नहीं चूके। मीडिया से मुखातिब होने से पहले खुर्शीद साहब कहते हैं कि वे सड़क पर खड़े किसी आदमी के सवालों का जवाब नहीं देंगे...जाहिर है उनका ईशारा उनके इस्तीफे की मांग को लेकर उनके खिलाफ मोर्चा खोल कर बैठे अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी की तरफ था...लेकिन खुर्शीद साहब आप ये क्यों भूल गए कि जिस पैसे के घालमेल का आरोप आपके ट्रस्ट पर लगा है वो पैसा तो सड़क पर घूमने वाले, सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले, धरना प्रदर्शन करने वाले आम आदमी का ही तो है...और आम आदमी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ सड़क पर ही तो उठाएगा...मोर्चा सड़क पर ही तो खोलेगा...ऐसे में आप आम आदमी के सवालों का जवाब क्यों नहीं देंगे...सिर्फ इसलिए कि आम आदमी ने आपको चुना या फिर इसलिए कि आप केन्द्रीय कानून मंत्री हैं। आपने भले ही अरविंद केजरीवाल की ओर ईशारा करते हुए ये बात कही...लेकिन सवाल तो आपने आम आदमी पर भी खड़े कर दिए। ऐसे में आपके ट्रस्ट में घालेमल हुआ या नहीं हुआ ये तो अलग बात है...लेकिन आप आम आदमी के प्रति अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते...क्योंकि ये तो आप भी अच्छी तरह समझते होंगे कि आम आदमी अगर आपको चुन कर संसद में भेज सकता है तो आम आदमी अगले चुनाव में आपकी जमानत भी जब्त करवा सकता है। लगता है प्रेस कांफ्रेंस शुरु होने से पहले लंदन में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में सम्मानित होने की इतराहट आप में बाकी थी...शायद इसलिए ही आप ऐसा बोल गए...वरना जनता का जनप्रतिनिधि...आम आदमी का जनप्रतिनिधि कम से कम आम आदमी के लिए ऐसी बात तो कतई नहीं करता। आप जिस पद पर बैठे हैं...वहां पर भी आपकी पहली जवाबदेही आम आदमी के प्रति...इस देश की जनता के प्रति ही बनती है...और इसे आप चाहकर भी नकार नहीं सकते...क्योंकि आम आदमी ठान ले तो...किसी का भी खासकर नेताओं, मंत्रियों का वक्त बदलते देर नहीं लगती...वैसे भी चुनाव में अब वक्त ही कितना रह गया है...इसलिए इससे पहले जनता आपकी जवाबदेही तय करने की सोचे...आप जवाबदेह बन जाओ...वरना अर्श से फर्श पर आते देर नहीं लगेगी। वैसे सलमान साहब आप पर लगे आरोपों में कितनी सच्चाई है ये तो आप और आपके ट्रस्ट से जुड़े लोग ही बेहतर जानते होंगे...लेकिन जब से आप पर ये आरोप लगे हैं...समूचे विपक्ष के साथ ही दबी जुबान में ये बात भी सुनने को मिल रही है कि...मंत्री जी ने नेताओं को रेट ही खराब कर दिया...चर्चाएं ये भी हैं कि अगर घालमाल करना ही था तो नेताओं के स्टेटस का तो कम से कम ख्याल रखते...करोड़ों में तो घालमेल करते...क्या लाखों में ही मामला निपटा लिया।
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शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

न तो वोट पेड़ पर लगते हैं...और न ही जनता की याददाश्त कमजोर है


केन्द्र सरकार के कड़े फैसलों के बाद देशभर की दो संसदीय सीटों पश्चिम बंगाल की जांगीपुर और उत्तराखंड की टिहरी सीट पर देशभर की निगाहें थे। जांगीपुर में देश के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के बेटे और कांग्रेस प्रत्य़ाशी अभिजीत मुखर्जी की किस्मत दांव पर थी तो टिहरी में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के बेटे और कांग्रेस प्रत्याशी साकेत बहुगुणा के भाग्य के साथ ही सीएम बहुगुणा की प्रतिष्ठा भी दांव पर थी...लेकिन दोनों ही उपचुनाव के नतीजे कांग्रेस के लिए मायूसी ही लेकर आए। भले ही जांगीपुर में कांग्रेस ने जीत दर्ज की लेकिन जीत का अंतर कांग्रेस के माथे पर बल लाने के लिए काफी है...वो भी तब जब टीएमसी ने जांगीपुर सीट पर अपना प्रत्याशी नहीं उतारा था। जिस सीट पर 2009 में कांग्रेस के टिकट पर प्रणव मुखर्जी करीब सवा लाख से अधिक मतों से जीते हों...उस सीट पर उनका बेटा सिर्फ 2536 वोटों से ही जीत दर्ज कर पाया। उत्तराखंड के टिहरी की अगर बात करें तो इस सीट पर अपने बेटे साकेत के लिए तमाम विरोधों और विवादों के बीच सीएम आलाकमान से जीत की गारंटी के साथ टिकट लेकर आए थे...और इसके लिए मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कोई कसर भी नहीं छोड़ी थी। लेकिन जब ईवीएम ने नतीजे बाहर फेंके तो मुख्यमंत्री बहुगुणा के चेहरे का रंग भी उड़ गया। भाजपा प्रत्याशी महारानी राज्य लक्ष्मी शाह ने कांग्रेस प्रत्याशी साकेत बहुगुणा को 22 हजार 431 वोट से करारी शिकस्त दी। पश्चिम बंगाल के जांगीपुर की बात हो या फिर उत्तराखंड की टिहरी की दोनों ही सीटों पर जनता ने कांग्रेस को बता दिया कि न तो वोट पेड़ पर लगते हैं और न ही जनता की याददाश्त कमजोर होती है...जो कि सरकार के घोटालों को जल्द भूल जाए। यहां पर हमारे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री का बयान याद दिलाना चाहूंग...जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश के नाम संबोधन में कहा था कि- पैसे पेड़ पर नहीं लगते...साथ ही हमारे गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कोयला घोटाले पर कहा था कि- बफोर्स की तरह जनता कोयला घोटाला भी भूल जाएगी। इसके साथ ही इन दो उपचुनाव की नतीजों के पीछे जिसका सबसे बड़ा हाथ है वो शायद रसोई गैस सिलेंडर है...जिसे सरकार के एक फैसले ने आम आदमी की पहुंच से दूर कर दिया। पेट्रोल के दाम या खाद्य सामग्री के दाम बढ़ते हैं तो जनता को उतनी तकलीफ नहीं होती क्योंकि ये चीजें महंगी भले ही हो जाएं...लेकिन जनता को आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं...जबकि एक - एक गैस सिलेंडर के लिए आमजन को नाको चने चबाने पड़ते हैं...और उस पर भी सिलेंडर के दाम बढ़ाने के साथ ही रसोई गैस सिलेंडर का कोटा फिक्स करने के केन्द्र की कांग्रेस नीत सरकार के फैसले ने पहले से ही महंगाई से त्रस्त आम जनता के गुस्से में घी का काम किया और नतीजा सबके सामने है। उत्तराखंड में जहां राज्य मे कांग्रेस सरकार होने के बाद भी कांग्रेस को करारी हार झेलनी पड़ी...वहीं पश्चिम बंगाल में कांग्रेस बमुश्किल हारते हारते बची। उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल के उपचुनाव भले ही केन्द्र की यूपीए सरकार के लिए सदन में संख्या के लिहाज से बहुत मायने नहीं रखते हों...लेकिन देश में केन्द्र सरकार के फैसलों के बाद बने माहौल का असर इन दोनों उपचुनाव में साफ देखने को मिला है। जिसका बड़ा असर नवंबर में हिमाचल प्रदेश औऱ दिसंबर में गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनाव में साफ तौर पर देखने को मिलेगा। दोनों ही राज्यों में वर्तमान में भाजपा की सरकार है...और कांग्रेस दोनों ही राज्यों में वापसी का दावा कर रही है...लेकिन कांग्रेस की राह कितनी आसान है इन दो उपचुनाव के नतीजों ने इसका आभास भी करा दिया है। बहरहाल जनता ने उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल के उपचुनाव में जता दिया कि कहीं न कहीं केन्द्र के फैसले के खिलाफ ये उसका गुस्सा है...जिसे सही वक्त पर सरकार ने नहीं पहचाना तो आने वाले चुनावों में कांग्रेस का सफाया हो सकता है। इसका ये मतलब बिल्कुल भी नहीं कि जनता का रूझान देश के मुख्य विपक्षी दल भाजपा या किसी दूसरी पार्टी की तरफ है...क्योंकि अगर जनता भाजपा के साथ होती तो इन फैसलों के खिलाफ खुलकर मतदान करती। उत्तराखंड की टिहर सीट पर हुए उपचुनाव में टिहरी की कुल 43 फीसदी जनता वोट देने पोलिंग बूथ तक पहुंची तो पश्चिम बंगाल के जांगीपुर सीट पर ये आंकड़ा 60 फीसदी रहा। हालांकि 60 फीसदी मतदान ठीक ठाक माना जाता रहा है...लेकिन इस सीट पर 2009 में 84.71 प्रतिशत मतदान हुआ था...जिसके मुकाबले इसे ठीक ठाक तो नहीं माना जा सकता। इसका सीधा मतलब ये निकलता है कि जनता ये समझ चुकी है कि सत्ता में कोई भी रहे न तो भ्रष्टाचार और घोटाले रूकेंगे और न ही आमजन की मुश्किलें कम होंगी...इसलिए शायद उत्तराखंड की टिहरी सीट पर 57 फीसदी जनता तो पश्चिम बंगाल की जांगीपुर सीट पर 40 फीसदी जनता पोलिंग बूथ तक पहुंची ही नहीं। ये न सिर्फ दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए बल्कि उन राजनीतिक दलों के लिए खतरे की घंटी है जो ये सोचते हैं कि वोट पेड़ पर लगते हैं और जनता की याददाश्त भी कमजोर होती है। खैर समझने वालों के लिए ईशारा काफी होता है...और जनता ने ईशारा कर दिया है...देखना ये होगा कि कितने समझदार ये ईशारा समझते हैं।

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शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012

रामदेव पर सरकार का ब्रह्मास्त्र


योगगुरु बाबा रामदेव के गुरु शंकरदेव के रहस्यमंय ढंग से लापता होने की गुत्थी अब सीबीआई सुलझाएगी...वही सीबीआई जिस पर बाबा रामदेव आरोप लगाते हैं कि ये केन्द्र सरकार की सबसे बड़ी ताकत है...और इसका इस्तेमाल सरकार अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने में करती है...अगर बाबा की बात में दम है तो इसका मतलब सीबीआई के सहारे अब सरकार ने क्या रामदेव की घेराबंदी शुरू कर दी है। वैसे बाबा इस बात को चाह कर भी नहीं कह सकते...क्योंकि ये उनके गुरु शंकरदेव का जो मामला है...और उन पर हरिद्वार के ही कई संतों के साथ कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने भी अपने गुरु को गायब करवाकर उनकी हत्या करने तक का आरोप मढ़ा है। ऐसे में बाबा कैसे सीबीआई जांच के सरकार के फैसले के खिलाफ बोल सकते हैं। अगर संतों के और दिग्विजय सिंह के आरोप झूठे हैं और बाबा रामदेव पाक साफ हैं तो बाबा तो निश्चय ही सरकार के इस फैसले का स्वागत करंगे। लेकिन क्या सच्चाई यही है...या कुछ और…? बाबा रामदेव के गुरु की शंकरदेव की अगर बात करें तो शंकरदेव 14 जुलाई 2007 को हरिद्वार के कृपालुबाग आश्रम कनखल से रहस्यमय तरीके से लापता हो गए थे...जिस पर 16 जुलाई को रामदेव के सहयोगी आचार्य बालकृष्ण ने कनखल थाने में रिपोट दर्ज कराई थी। 10 अप्रेल 2012 को पुलिस ने इस मामले में फाइनल रिपोर्ट लगाकर फाइल को बंद कर दिया था। इस दौरान बाबा रामदेव ने कभी भी अपने गुरु शंकरदेव को तलाश करने के लिए पुलिस पर न तो दबाव बनाया और न ही कोई प्रयास कि...जो निश्चित तौर पर चौंकाने वाली बात है...और इस दौरान रामदेव पर अपने गुरु को गायब करवाने के भी आरोप लगे। अपने गुरु के प्रति रामदेव के उदासीन रवैये को देखकर रामदेव सवालों के घेरे में तो आते ही हैं...और शायद रामदेव के केन्द्र सरकार पर लगातार हमले से बौखलाई केन्द्र सरकार ने राज्य की कांग्रेस सरकार के कंधे पर बंदूक रखकर मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी है...जो रामदेव को घेरने की सरकार की रणनीति का ही एक हिस्सा दिखाई देता है। इससे पहले भी सरकार विभिन्न एजेंसियों के माध्यम से रामदेव को नोटिस पर नोटिस भेज कर बाबा का जीना हराम कर ही चुकी है...और अब शंकरदेव के लापता होने के मामले की जांच सीबीआई को रामदेव के पीछे छोड़कर सरकार ने अपने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया है। सरकार का रामदेव के खिलाफ ये दांव कितना सफल होगा...ये तो वक्त ही बताएगा...लेकिन ऐसा भी लगता है कि सरकार ने अपने ब्रह्मास्त्र को छोड़ने में कुछ ज्यादा ही जल्दी कर दी और वो भी ऐसे समय में जब रामदेव अपने आंदोलनों के जरिए केन्द्र सरकार की नाक में दम किए बैठे हैं...ऐसे वक्त पर सरकार के इस फैसले से तो यही संदेश सबके बीच जाएगा कि बौखलाई सरकार ने रामदेव को जबरन घेरने के लिए ही ये कदम उठाया है...यानि कि रामदेव को इसका नुकसान होने की बजाए फायदा ही पहुंचता दिखाई दे रहा है। क्योंकि ऐसे में रामदेव के समर्थकों को विश्वास उनके प्रति कम नहीं होगा बल्कि और भी बढ़ेगा...जो रामदेव की ताकत को और बढ़ाएगा। बहरहाल रामदेव के एक के बाद एक सरकार पर वार के बाद सरकार ने रामदेव के खिलाफ राज्य की कांग्रेस सरकार के जरिए ब्रह्मास्त्र तो फेंका है...लेकिन देखना ये होगा कि आर पार की इस लड़ाई में जीत किसकी होती है...रामदेव की या फिर सरकार की।
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गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

आबरु लुटे तो लुटे...इन्हें फर्क नहीं पड़ता


हरियाणा में एक महीने में बलात्कार की 16 घटनाएं हो जाती हैं...पुलिस ज्यादातर मामलों में आरोपियों को गिरफ्तार करने में भी नाकाम साबित होती है...ऐसे में यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी जो कि खुद एक महिला हैं...हरियाणा के जींद में एक पीड़ित दलित परिवार के घर पहुंचती है...सोनिया पीड़ित परिवार को ढ़ांढ़स तो बंधाती हैं...लेकिन घर से बाहर निकलते ही वे भूल जाती हैं कि वे भी शायद एक महिला हैं...ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि बाहर निकलकर सोनिया गांधी से तो कम से कम एक इतने संवेदनशील मुद्दे पर ऐसे बयान की उम्मीद कतई नहीं थी। सोनिया इन घटनाओं के लिए राज्य की कांग्रेस सरकार...जो कि उनकी ही पार्टी की है...पर ये कहते हुए पर्दा डालने की कोशिश करती हैं...कि बलात्कार की घटनाएं तो देशभर में हो रही हैं...खैर सोनिया ने ये कहा सो कहा...सोनिया के इस बयान के बाद से इस मुद्दे पर राजनीति गर्मा जाती है...और तमाम विपक्षी दल सोनिया के इस बयान की आलोचना करते हैं...लेकिन योगगुरु बाबा रामदेव जिनकी कर्मभूमि भले ही हरिद्वार हो लेकिन उनकी जन्मभूमि तो हरियाणा हैं...लगता है इस बयान से कुछ ज्यादा ही आहत हो गए...और सोनिया पर ये कहकर वार करते हैं कि...सोनिया जी अगर ये घटना आपकी बेटी के साथ होती तो क्या तब भी आप ऐसा ही बयान देती। अब रामदेव के इस बयान के पीछे की वजह सिर्फ और सिर्फ सोनिया का बयान ही था या फिर केन्द्र सरकार के खिलाफ उनकी बौखलाहट ये तो आप भी बेहतर समझ गए होंगे। बहरहाल सोनिया के बयान के बाद उठे बवाल को रामदेव ने ये कहकर उबाल जरूर दे दिया...अबकी बार रामदेव ने सीधा सोनिया गांधी पर हमला बोला था...वो भी तीखा तो कांग्रेसी कहां पीछे रहने वाले थे। एक एक कर केन्द्र सरकार के मंत्री और कांग्रेसी नेता रामदेव पर बरस पड़ते हैं...औऱ रामदेव के योगगुरु होने पर ही सवाल खड़े कर देते हैं। बड़ा सवाल ये भी है कि रामदेव के जिस बयान पर कांग्रेस बौखलाई हुई है...शायद कांग्रेस ये भूल गई कि ऐसा ही कुछ बयान कांग्रेस नेता रीता बहुगुणा ने करीब ढाई साल पहले दिया था...जब रीता ने बुलंदशहर में सरेआम एक सभा में कहा था कि उत्तर प्रदेश में अपराध का बोलबाला है और यूपी में लड़कियों की ईज्जत लूटी जा रही है...और बसपा सरकार तसल्ली के लिए मुआवजा बांट रही हैं...इसलिए मैं कहती हूं की दो लाख रूपए मुझ से ले लो और कर दो मायावती का बलात्कार फिर देखते हैं क्या होता है। रीत बहुगुणा जोशी के इस बयान के बाद बसपा कार्यकर्ताओं ने रीता के घर में आग लगा दी थी...लेकिन आज रामदेव सोनिया गांधी पर कुछ ऐसा ही बयान देते हैं तो कांग्रेस बौखला जाती है। राजनीति को इसी लिए सियूटिब्लयूटी का खेल कहा जाता है...जो अपने पर सूट करे वो तो सही है...जो न करे उस पर सामने वाले की जमकर खबर ले लो। बयानों की इस जंग के बीच इनेलो के ओम प्रकाश चौटाला साहब खाप पंचायतों के उस फैसले का समर्थन करते दिखाई देते हैं...जिसमें खाप पंचायतें कहती हैं...कि लड़कियों की शादी 15 वर्ष की उम्र तक कर देनी चाहिए ताकि बलात्कार की घटनाओं को कम किया जा सके। एक नई जुबानी जंग शुरू  जाती है...लेकिन हरियाणा में एक महीने में हुई बलात्कार की घटनाओं के पीड़ित औऱ उनके परिवार पर क्या गुजर रही होगी...इसका ख्याल किसी को नहीं है। विडंबना तो ये है कि पीडितों के हिमायती बनने वाले ये राजनीतिक दल किसी भी घटना के बाद घड़ियाली आंसू बहाते तो दिखाई दे जाते हैं...लेकिन इन घटनाओं को कम करने या रोकने के लिए...और आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए कोई सख्त कदम उठाने के लिए पहल करते नहीं दिखाई देते। इसे देश का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि हमारे राजनेता हर घटना पर राजनीति करने से बाज नहीं आते फिर चाहे किसी की बहू – बेटी की इज्जत आबरू की क्यों न दांव पर लगी हो। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ें तो इसकी भयावहता खुद बयां करते नजर आते हैं कि वाकई में देशभर में महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं। हरियाणा की ही अगर बात कर लें तो औसतन यहां रोज दो लड़कियां बलात्कार की शिकार हो रही हैं। पुलिस के आंकड़ें कहते हैं कि 2012 में हरियाणा में अब तक करीब 460 बलात्कार की घटनाएं हो चुकी हैं। जबकि 2011 में ये संख्या 733 थी। ये तो महज वे आंकड़ें हैं जो दर्ज हैं...ऐसे सैंकड़ों मामले और भी हैं जो किसी सरकारी रजिस्टर में लोक लाज के भय से या फिर दबंगों के डर से दर्ज नहीं हो पाते...यानि कि ये घटनाएं जितनी सामने आती हैं...उससे कही ज्यादा होती हैं। ऐसे में सवाल यही उठता है कि आखिर कब भले मानस का लबादा ओढ़कर हमारे बीच में घूम रहे ऐसे वह्शी दरिंदों के खिलाफ पुलिस और राज्य सरकारें उनके रसूख औऱ राजनीतिक कनेक्शन को दरकिनार करते हुए दबंगई से उनके खिलाफ कार्रवाई करेंगी...और उन्हें जेल की सलाखों के पीछे भेजेंगी ताकि युवतियां – महिलाएं बैखौफ होकर घर से बाहर निकल सकें...हालांकि ऐसा तब तो कम से कम संभव नहीं दिखाई देता जब तक सरकार में बैठे लोग भाई भतीजावाद और अपनी कुर्सी की महत्वकांक्षा को त्याग कर काम नहीं करेंगे। उम्मीद करते हैं कि अगली बार देश के जिम्मेदार नेताओं और लोगों से तो कम से कम ऐसे बयान सुनने को न ही मिले...जिनसे लोगों को बड़ी उम्मीदें हैं। उम्मीद तो ये भी कर सकते हैं कि ऐसी घटनाएं ही हमें सुनने को न मिले...हालांकि ऐसी बातें तो हमारे राजनेता भी बखूबी कर लेते हैं...लेकिन कहते हैं न अच्छा सोचना और अच्छा करना दोनों में बड़ा फर्क है...बस जरूरत है तो इस बात को समझने कि...देखते हैं इस चीज को समझने वाले हमारे देश में कितने लोग हैं।
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सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

पल पल क्यों बदल रहे हैं अन्ना ?


अगस्त के पहले सप्ताह में दिल्ली के जंतर मंतर पर जब अन्ना हजारे ने अपनी टीम के साथ चुनावी विकल्प देने के वादे के साथ अचानक अनशन समाप्त करने की घोषणा की थी...तो कहा जाने लगा था कि इस आंदोलन की भ्रूण हत्या हो गई है...एक लंबे सन्नाटे के बाद फिर से सुगबुगाहट शुरु होती है और बीते एक महीने के भीतर ही अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल में राजनीतिक दल गठन पर मतभेद की खबरें सुर्खियां बनती हैं...और इसी बीच अन्ना केजरीवाल से किनारा कर लेते हैं...और अपना नाम और फोटो तक के इस्तेमाल न करने हिदायत देते हैं...अन्ना यहीं नहीं रूकते इसके बाद लगातार कभी अपने बलॉग के जरिए तो कभी मीडिया के सवालों के जवाब में केजरीवाल पर निशाना साधने से नहीं चूकते...इस दौरान अन्ना राजनीति को गंदा कहते हुए इस रास्ते के चयन पर केजरीवाल को जमकर कोसते भी हैं...इस बीच लोगों तक भी ये संदेश जाता है कि अन्ना और केजरीवाल के रास्ते अलग अलग हैं...और अन्ना नई टीम के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ एक नया जनांदोलन खड़ा करेंगे...लेकिन 01 अक्टूबर को सुबह अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया से मुलाकात के बाद अचानक अन्ना शाम को केजरीवाल के राजनीति के रास्ते को सही ठहराते हुए चुनाव लड़ने पर न सिर्फ केजरीवाल का समर्थन करने का ऐलान करते हैं बल्कि केजरीवाल से दिल्ली के चांदनी चौक से कपिल सिब्बल के खिलाफ चुनाव लड़ने की सलाह देते हुए उनके पक्ष में चुनाव प्रचार करने पर भी हामी भरते दिखाई देते हैं। इस सब घटनाक्रम के बीच न सिर्फ अन्ना के समर्थक बल्कि आम जनता भी असमंजस में जरूर होगी कि आखिर बीते एक महीने में क्यों अन्ना अपनी बात पर कायम नहीं सके। क्यों पल पल अन्ना ने अपने बयान और फैसले बदले...आखिर सुबह केजरीवाल और सिसौदिया के बीच ऐसी क्या गुफ्तगु हुई कि एक दिन पहले तक केजरीवाल को कोसने वाले अन्ना अचानक उनके साथ खड़े होते दिखाई दिए। हालांकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि डेढ़ साल पहले शुरू हुई जनलोकपाल की इस लड़ाई में अन्ना के साथ केजरीवाल और उनके दूसरे सहयोगी कंधा से कंधा मिलाकर खड़े रहे और इस आंदोलन की सफलता का श्रेय इनको भी उतना ही जाता है जितना कि अन्ना हजारे को। लेकिन डेढ़ साल तक जो टीम एक साथ कंधा से कंधा मिलाकर खड़ी थी...वो टीम बीते एक महीने में ताश के पत्तों की माफिक बिखर गई। अन्ना के केजरीवाल के समर्थन करने के बयान के बाद अब लगने लगा है कि शायद फिर से आने वाले वक्त पर ये सभी लोग एक मंच पर दिखाई दे सकते हैं। लेकिन सवाल बना हुआ है कि आखिर अन्ना के पल पल बदलते बयानों के पीछे कोई गुस्सा या नाराजगी थी...या फिर कुछ औऱ। अन्ना के केजरीवाल से किनारा करने के बाद जहां उनके समर्थक भी दो गुटों में बंट गए थे...तो वहीं आमजन का मिजाज भी सामने दो रास्ते देख बदलने लगा था...लेकिन अन्ना के बदलते बयानों के बाद अब फिर से संशय गहराने लगा है कि आखिर अन्ना की मंशा क्या है...क्यों अन्ना एक पल तो केजरीवाल के राजनीति के रास्ते को गलत ठहराते हैं और दूसरे ही पल केजरीवाल के रास्ते को सही ठहराते हुए उनके समर्थन की बात करते हैं। क्या इस तरह अन्ना हजारे अपनी इस लड़ाई में अपने समर्थकों के साथ ही लंबे समय तक आमजन का भरोसा बनाए रखने में कामयाब रह पाएंगे। बहरहाल अन्ना और केजरीवाल के बनते बिगड़ते रिश्तों के बीच उनके समर्थकों के साथ ही आमजन असमंजस में है कि आखिर वो करें तो क्या करें...अन्ना को चाहिए कि ऐसी संशय की स्थिति को पैदा होने से रोकें...ताकि उनके समर्थकों और आमजन का विश्वास उन पर बना रहे और एक अच्छे मकसद के लिए शुरु हुई लडाई अपने अंजाम तक पहुंच सके...और इस देश की जनता को भ्रष्टाचार से 100 प्रतिशत नहीं तो कम से कम कुछ हद तक तो राहत मिल सके।

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रविवार, 30 सितंबर 2012

झूठा कौन – अन्ना हजारे या अरविंद केजरीवाल ?



जिस आंदोलन ने सरकार की चूलें हिला दी थी...उस आंदोलन को खड़ी करने वाली टीम एक झटके में बिखर गई...ऐसे में जाहिर है इसका दर्द इतने जल्दी दिल से नहीं जाएगा...गाहे बगाहे इसके पीछे की दास्तां और इसका दर्द जुबां पर आ ही जाता है...19 सितंबर 2012 को केजरीवाल से राजनीतिक दल के गठन पर मतभेद के बाद अपने सहयोगियों से किनारा कर जब अन्ना दिल्ली से रालेगण सिद्धी लौटे तो उसके बाद से कभी अन्ना ने अपने बलॉग के जरिए तो कभी पत्रकारों के सवाल देते हुए इस दर्द को जाहिर किया और अपरोक्ष रूप से इसके लिए केजरीवाल पर भी निशाना साधा। ब्लॉग के जरिए जहां अन्ना ने राजनीति को आंदोलन का बंटाधार करने के लिए जिम्मेदार ठहराया तो साथ ही ये भी कहा कि राजजीतिक दल गठन के फैसले के समर्थन में वे कभी रहे ही नहीं...अन्ना के इस बयान के बाद ये भी सवाल उठता है कि जब अगस्त में जंतर मंतर में अन्ना हजारे और उनकी टीम ने जनता को चुनावी विकल्प देने की जरूरत बताते हुए अपना अनशन समाप्त किया तो उस वक्त क्यों नहीं अन्ना ने इसका विरोध किया...आखिर क्यों अन्ना ने अनशन के समाप्त होने के कुछ दिनों बाद अपनी मंशा स्पष्ट करते हुए किसी राजनीतिक दल के गठन और उसके साथ जुड़ने के खिलाफ होने की बात कही। अन्ना अगर राजनीति में आने के पक्षधर नहीं थे...जैसा वे कह रहे हैं तो इसका सीधा मतलब ये निकलता है कि अन्ना पर जंतर मंतर पर अनशन समाप्त करने के वक्त या उससे पहले अपने कुछ सहयोगियों का चुनावी विकल्प के फैसले का समर्थन करने का भारी दबाव था। हालांकि अरविंद का ताजा बयान इसको झुठलाते हुए नजर आता है...जिसमें अरविंद ने कहा है कि राजनीतिक दल गठन के इस फैसले के समर्थन में अन्ना भी थे, लेकिन अब न जाने क्यों वे इस बात से इंकार कर रहे हैं। कई ऐसे सवाल हैं जो लगातार जेहन में उठ रहे हैं कि आखिर कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ...लेकिन अन्ना जिस तरह से लगातार अब बड़े ही तल्ख लहजे में राजनीतिक दल गठन करने के फैसले का विरोध करते हुए अपने पूर्व सहयोगियों को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं उससे तो फिलहाल ये साफ होता दिख रहा है कि चुनावी विकल्प के फैसले पर अन्ना पर अपने कुछ सहयोगियों का भारी दबाव था...किरण बेदी के इस बयान के बाद भी इस पर मुहर लगती दिखती है...जिसमें वे ये कहती हैं कि जिन लोगों को राजनीति बेहतर विकल्प लगा वे अपने रास्ते चले गए हैं...और जो लोग आंदोलन के साथ थे...वो अन्ना हजारे के साथ खड़े हैं। बहरहाल देर सबेर इस पर से भी पर्दा उठ ही जाएगा...लेकिन फिलहाल अन्ना ने साफ कर दिया है कि जनलोकपाल के समर्थन में आंदोलन जारी रहेगा और आंदोलन ही एकमात्र रास्ता है जो भ्रष्टाचार मिटाने के लिए जनलोकपाल की लड़ाई को उसके अंजाम तक पहुंचाएगा। इसके लिए दिल्ली में अन्ना अब नई टीम बनाने की कवायद में भी जुट गए हैं...जिसमें स्वयं सेवकों के साथ ही रिटायर आईएएस, आईएफएस और आईपीएस अधिकारियों के साथ ही कई बड़े नाम शामिल हो सकते हैं...लेकिन यहां पर भी सवाल ये खड़ा उठता है कि क्या नई टीम के साथ भी अन्ना का आंदोलन उस ऊर्जा...उस धार के साथ आगे बढ़ पाएगा...और अपने अंजाम तक पहुंच पाएगा। 

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शनिवार, 29 सितंबर 2012

अन्ना ने क्यों की अनशन से तौबा ?


अन्ना हजारे ने ऐलान कर दिया है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी लड़ाई जारी रहेगी लेकिन वे अब इस लड़ाई के दौरान अनशन नहीं करेंगे। अन्ना न कहा कि सरकार पर दबाव बनाने के लिए वे आंदोलन का सहारा लेंगे...और ये आंदोलन मुद्दों पर ही आधारित होगा। अन्ना की भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के इतिहास पर नजर डालें तो सामने आता है कि अन्ना के अभी तक के सभी आंदोलन में अनशन ही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। अन्ना का पहला बड़ा आंदोलन महाराष्ट्र में ही शुरु हुआ था जब 1991 में  अन्ना हज़ारे ने महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा की सरकार के कुछ भ्रष्ट' मंत्रियों को हटाए जाने की मांग को लेकर भूख हड़ताल की। ये मंत्री थे- शशिकांत सुतर, महादेव शिवांकर और बबन घोलाप। अन्ना ने उन पर आय से अधिक संपत्ति रखने का आरोप लगाया था। सरकार ने उन्हें मनाने की बहुत कोशिश की, लेकिन आखिरकार सरकार को दागी मंत्रियों शशिकांत सुतर और महादेव शिवांकर को हटाना ही पड़ा। इसके बाद 1997 में अन्ना हज़ारे ने सूचना का अधिकार अधिनियम के समर्थन में मुंबई के आजाद मैदान से अपना अभियान शुरु किया। 9 अगस्त 2003 को मुंबई के आजाद मैदान में ही अन्ना हज़ारे आमरण अनशन पर बैठ गए। 12 दिन तक चले आमरण अनशन के दौरान अन्ना हज़ारे और सूचना का अधिकार आंदोलन को देशव्यापी समर्थन मिला। आख़िरकार 2003 में ही महाराष्ट्र सरकार को इस अधिनियम के एक मज़बूत और कड़े मसौदे को पारित करना पड़ा। बाद में इसी आंदोलन ने राष्ट्रीय आंदोलन का रूप ले लिया। इसके परिणामस्वरूप 12 अक्टूबर 2005 को भारतीय संसद ने भी सूचना का अधिकार अधिनियम पारित किया। अगस्त 2006, में सूचना का अधिकार अधिनियम में संशोधन प्रस्ताव के खिलाफ अन्ना ने 11 दिन तक आमरण अनशन किया, जिसे देशभर में समर्थन मिला। इसके परिणामस्वरूप, सरकार ने संशोधन का इरादा बदल दिया। 2003 में अन्ना ने कांग्रेस और एनसीपी सरकार के चार मंत्रियों... सुरेश दादा जैन, नवाब मलिक, विजय कुमार गावित और पद्मसिंह पाटिल को भ्रष्ट बताकर उनके ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ दी और भूख हड़ताल पर बैठ गए। तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार ने इसके बाद एक जांच आयोग का गठन किया। नवाब मलिक ने भी अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। आयोग ने जब सुरेश जैन के ख़िलाफ़ आरोप तय किए तो उन्हें भी त्यागपत्र देना पड़ा। इसके बाद बीते साल जलनोकपाल के समर्थन में दिल्ली में दो बार और मुंबई में एक बार उनके अनशन ने सरकार को हिला कर रख दिया। और इस साल अगस्त में जंतर मंतर पर उनके अनशन ने फिर से सरकार की नींद उड़ा कर रख दी थी। लेकिन इसके बाद से ही अनके सहयोगियों के राजनीतिक दल गठन के फैसले के बाद अन्ना ने अपने सहयोगियों के किनारा कर अपना आंदोलन जारी रखने की बात कही...और अब ये साफ कर दिया है कि अब अन्ना अनशन नहीं करेंगे बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ और जनलोकपाल के समर्थन में अपनी लड़ाई तो जारी रखेंगे लेकिन अनशन नहीं करेंगे। बड़ा सवाल ये है कि आखिर क्यों अन्ना ने अपनी ताकत लंबे समय तक भूखे प्यासे रहकर अनशन करने से तौबा कर ली...क्या अन्ना को इस बात का आभास हो गया है कि उनकी ये लड़ाई लंबे वक्त तक चलेगी और लंबे समय तक अगर लड़ाई को जारी रखना है तो फिर बढ़ती उम्र में अपने स्वास्थ्य का ख्याल भी रखना होगा...ऐसे में अगर लंबे समय तक इस लड़ाई को जारी रखना है तो कहीं न कहीं अनशन से किनारा करना होगा...और आंदोलन के रूप में इस लड़ाई को जारी रखना होगा। इस साल अगस्त में अन्ना के अनशन पर नजर डालें तो पता चलता है कि सरकार ने आंदोलन को नजरअंजदाज करने की कोशिश की ताकि अन्ना और उनके पूर्व सहयोगी हताश होकर अपना अनशन समाप्त कर दें...और कुछ हद तक सरकार अपनी इस रणनीति में कामयाब भी रही थी...और अनशन अचानक से समाप्त हो गया...और इसके बाद टीम अन्ना में जो कुछ हुआ...इसकी कल्पना तक शायद किसी ने नहीं की थी। सरकार भी इस बात को समझ चुकी है कि अन्ना और उनके सहयोगियों में मतभेद के बाद का बिखराव अब आंदोलन में वो धार नहीं ला पाएगा...ऐसे में अब सरकार के लिए इसे नजरअंदाज करना औऱ आसान हो गया है। अन्ना भी इस बात को समझ गए हैं औऱ शायद इसलिए उन्होंने आंदोलन के रूप में इस लड़ाई को जारी रखने का ऐलान किया है। बहरहाल जो भी हो अन्ना की ये लड़ाई निश्चित तौक पर एक अच्छे मकसद के लिए दिखाई पड़ती है...ऐसे में हम तो बस यही कह सकते हैं...गुडलक अन्ना।

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गुरुवार, 27 सितंबर 2012

कांग्रेस का डर बना भाजपा की ताकत


कहते हैं समय खराब हो तो किसी से नहीं भिड़ना चाहिए...पिटाई आपकी ही होगी...कांग्रेस को भी शायद ये समझ में आ गया है लगता है...आरटीआई एक्टिविस्ट अंजलि दमानिया के भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी पर लगाए आरोप पर कांग्रेस की चुप्पी तो कम से कम यही जाहिर करती है। कांग्रेस शायद ये जानती है कि पहले से ही कोयला घोटाले पर चौतरफा हमला...फिर महंगाई और एफडीआई पर सरकार के फैसले से मचा बवाल सरकार की किरकिरी करा चुका है...साथ ही महाराष्ट्र में सिंचाई घोटाले में सहयोगी एनसीपी के डिप्टी सीएम अजित पवार का इस्तीफे ने उसकी मुश्किलों को बढ़ा रखा है। ऐसे में गडकरी पर अपने व्यापारिक हितों के लिए केन्द्रीय मंत्री और एनसीपी के अध्यक्ष शरद पवार के भतीजे और तत्कालीन सिंचाई मंत्री अजित पवार को बचाने के लिए घोटाले को दबाने के आरोप के बाद भी कांग्रेस ने चुप्पी साधी है। आखिर ऐसा क्या हुआ जो कांग्रेस ने गडकरी पर लगे आरोप पर भाजपा को घेरने की बजाए रक्षात्मक रूख अपना लिया है और पूरे मामले में चुप्पी साध रखी है। दरअसल ये सारा खेल कुर्सी का है...कांग्रेस को निश्चित तौर पर बढ़िया मौका मिला था...लेकिन बदकिस्मती से महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार और एनसीपी की बैसाखी पर खड़ी है...ऐसी ही कुछ स्थिति केन्द्र में भी है...जब ममता के समर्थन वापस लेने के बाद यूपीए सरकार के लिए छोटे से छोटा दल भी महत्वपूर्ण हो गया है...यानि कि केन्द्र में भी एनसीपी के समर्थन का उतना ही महत्व है जितना कि महाराष्ट्र में। अब कांग्रेस अगर इस मुद्दे को लेकर गडकरी को घेरती तो छींटे शरद पवार की दामन पर भी उछलते...क्योंकि गडकरी से शरद पवार के व्यापारिक संबंध की बात आने के साथ ही जिस नेता पर सिंचाई घोटाले में लिप्त होने का आरोप है वो शरद पवार का भतीजा है। जाहिर है कांग्रेस चाहकर भी आक्रमक नहीं हो सकती क्योंकि कांग्रेस का आक्रमक रवैया शरद पवार को नागवार गुजर सकता है और शरद पवार की नाराजगी कांग्रेस की महाराष्ट्र सरकार के साथ ही केन्द्र की यूपीए सरकार पर भी भारी पड़ सकती है...लिहाजा कांग्रेस ने चुप्पी साधना ही बेहतर समझा...ताकि मामला धीरे धीरे शांत हो जाए और फिर लोग उसे भूल जाएं...जैसे कि हमारे सुशील गृहमंत्री शिंदे साहब का सोचना भी है। खैर ये तो रही कांग्रेस की मुश्किल अब बात करें गडकरी पर लगे आरोप कि तो ये तो जग जाहिर है कि गडकरी पहले उद्योगपति हैं उसके बाद राजनेता...अब व्यापार करना है तो शरद पवार क्या किसी से भी हाथ मिला सकते हैं। और अगर अंजलि दमायनी के आरोप सही हैं तो भी ऐसा लगता नहीं कि अंजलि अपने इन आरोपों को साबित कर पाएंगी...क्योंकि अंजलि भले ही ये साबित कर दें कि वे गडकरी से मिलने गई थी...लेकिन गडकरी पर जो बातें कहने का आरोप उन्होंने लगाया है उसे साबित करना अंजलि के लिए आसान नहीं होगा या यूं कहें कि नामुमकिन दिखाई पड़ता है। हालांकि अंजलि के सहयोगी और हाल ही में राजनीतिक पार्टी के गठन का ऐलान करने वाले अरविंद केजरीवाल ने अंजलि के आरोपों के बाद अब खुद गडकरी के खिलाफ मोर्चा खोल लिया है...औऱ गडकरी पर सवालों की बौछार कर दी है...लेकिन केजरीवाल भी गडकरी को घेर पाएंगे इसकी उम्मीद कम ही है। वैसे अंजलि आरोप अगर सही हैं तो देश की जनता के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य और कुछ नहीं हो सकता कि जिस पार्टी को मुख्य विपक्षी दल होने के नाते सरकार के गलत कामों और फैसलों पर नजर रखते हुए उसे घेरना चाहिए वे ही लोग अपने फायदे के लिए आपस में सांठ गांठ करने में लगे हुए हैं। बहरहाल गडकरी ने अंजलि पर झूठे औऱ बेबुनियाद आरोप लगाने की बात कहते हुए अंजलि दमानिया को कानूनी नोटिस जरूर भेज दिया हैऐसे में देखना ये होगा कि अंजलि अब गडकरी के नोटिस का जवाब किसी पुख्ता सबूत के साथ देती हैं या फिर इस मामले का यहीं पटाक्षेप हो जाएगा।
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मंगलवार, 25 सितंबर 2012

रामदेव ने किया विश्वासघात !


योगगुरू बाबा रामदेव जो उनके लाखों भक्तों के लिए विश्वास का दूसरा नाम है। लेकिन अगर ये विश्वास टूट जाए तो...हालांकि आंख बंद कर उऩकी बात का समर्थन करने वाले उनके अनुयायी इस बात को नकार देंगे कि रामदेव उनके साथ कभी विश्वासघात कर सकते हैं...लेकिन ऐसा हो रहा है। बड़ी से बड़ी बीमारी को योग और आयुर्वेद से ठीक करने का दावा करने वाले बाबा रामदेव किराने का सामान भी बेचते हैं...बाबा के किराना सामान पर भी लोग उतना ही भरोसा करते हैं जितना कि उनके योग और आयुर्वेदिक दवाओं पर। लेकिन खाद्य विभाग के लिए गए रामदेव की फैक्ट्री उत्पादों के सैंपल फेल होने के बाद बड़ा सवाल ये उठने लगा है कि क्या बाबा रामदेव भी मिलावटखोर और कालाबाजारी करने वालों की तरह अपने सामान में मिलावट कर रहे थे। बाबा के 6 उत्पादों सरसों का तेल, शहद, काली मिर्च, जैम, बेसन और नमक के खाद्य विभाग की टीम ने सैंपल लिए थे...लेकिन ये सैंपल मानक पर खरे नहीं उतरे। इसके साथ ही एक और खुलासा हुआ है कि बाबा रामदेव के कई उत्पाद ऐसे हैं...जिन्हें बाबा की फैक्ट्री नहीं बनाती थी...यानि वे कहीं और बनते थे औप रामदेव अपना ब्रांड नेम लगाकर उनको बेचते थे। खाद्य विभाग को बाबा के उत्पादों पर जो आपत्ति है उसके अनुसार...जिस सरसों के तेल को पतंजलि फूड पार्क का लेबल लगाकर बेचा जा रहा है वह आर एंड जे ऑयल एंड फेट प्राइवेट लिमिटेड झोटवाड़ा जयपुर राजस्थान ने तैयार किया है और इसके ऊपर आरोग्य शब्द लिखा है जो गैरकानूनी है। वहीं काली मिर्च के पैकेट पर भी आरोग्य लिखा गया है साथ ही पैकेट पर न्यूट्रीशनल वैल्यू की जानकारी भी नहीं है। इसी तरह जिस नमक को पतंजलि कंपनी के नाम से बेचा जा रहा है, वो कच्छ गुजरात स्थित अंकुर कंपनी का उत्पाद है। बाबा का शुद्ध शहद लीची से निर्मित है और इसमें सिर्फ 5 प्रतिशत ही शहद है। अनानास जैम के पैकेट पर शुद्ध शब्द का इस्तेमाल किया गया है जबकि इसमें फ्लेवर का प्रोयोग किया गया है। वहीं आरोग्य बेसन पैकेट पर आरोग्य लिखा है लेकिन शुद्ध शाकाहारी का लेबल नहीं है। जबकि बाबा अपने योग शिविरों में भक्तों और अनुयायियों से रामदेव यही कहते फिरते थे कि उनके उत्पादों गुणवत्ता सर्वोत्तम है और सारे उत्पाद उनकी फैक्ट्री में ही बनते हैं। इसका मतलब क्या बाबा अपने भक्तों से अनुयायियों से झूठ बोल रहे थे...उनके साथ विश्वासघात कर रहे थे। हालांकि अभी भी बाबा इस सब को केन्द्र सरकार की साजिश बताते हुए खुद को पाक साफ साबित करने की कोशिश कर रहे हैं...लेकिन क्या वाकई में ये साजिश है या फिर बाबा के लाभ योग का एक हथकंडा ये तो वक्त ही बताएगा...लेकिन बाबा रामदेव के लिए ये अच्छी बात है कि जिस माहौल में, जिन परिस्थितियों में ये सब कुछ सामने आया है...ऐसे में उनके भक्त और अनुयायी ऐसी किसी बातों पर विश्वास नहीं करेंगे...क्योंकि उनको भी शायद यही महसूस होगा कि सरकार के खिलाफ हल्ला बोलने के बाद ही बदले की भावना से सरकार बाबा रामदेव को बदनाम करने की साजिश रच रही है। खैर देर सबेर तो सच सामने आ ही जाएगा...लेकिन अगर वाकई में ऐसा है तो बावा पर सवाल उठने लाजिमी है...क्योंकि बाबा एक तरफ स्वदेशी का नारा देते हैं मिलावटखोरों, कालाबाजारी करने वालों के साथ ही भ्रष्टाचारियों के खिलाफ जहर उगलते हैं...दूसरी तरफ उनके उत्पादों के नमूनों का मानक पर खरा न उतरना बाबा पर आंख बंद कर भरोसा करने वालों के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है। वैसे बाबा की संपत्ति को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं...ऐसे में अगर मिलावटखोरी की ये बात साबित हो जाती है तो फिर से उनकी संपत्ति को लेकर भी सवाल उठने लगेंगे कि क्या बाबा ने ये संपत्ति भी इसी तरह घालमेल कर अर्जित की है। वैसे जितने कम समय में रामदेव ने अपने साम्राज्य को स्थापित किया है...वो तो कम से कम इसी ओर ईशारा करता है। 1995 में दिव्य योग ट्रस्ट की स्थापना कर सिर्फ योग सिखाना शुरू करना...उसके बाद 2006 में पतंजलि योगपीठ की स्थापना के साथ आयुर्वेदिक दवाएं बनाना औऱ बेचना शुरू करने का साथ ही आयुर्वेद पर रिसर्च और योग की ट्रेनिंग देना और फिर एफएमसीजी के क्षेत्र में कदम रखना...और इस दौरान करीब 1100 करोड़ की संपत्ति अर्जित कर लेना...ये आसान काम तो नहीं है। बहरहाल रामदेव कितने सही हैं और कितने गलत ये तो वक्त ही बताएगा...लेकिन फिलहाल तो रामदेव एक और मुश्किल में घिर ही गए हैं...अब ये उनके पीछे पड़ी सरकार का रचा मायाजाल है या फिर रामदेव का मकड़जाल ये तो वक्त ही बताएगा।

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शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

ठीक कहा प्रधानमंत्री जी...पैसे पेड़ पर नहीं लगते


सरकार से ममता की विदाई के बीच सरकार के फैसलों पर सफाई देने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दूरदर्शन में रात आठ बजे प्रकट हुए...तो लोगों को बड़ी उम्मीद थी कि शायद मौनी बाबा की उपाधि पा चुके मनमोहन सिंह का मौन टूटेगा तो शायद वे जनता की हक की बात करेंगे...हिंदी से परहेज करने वाले हमारे प्रधानमंत्री ने हिंदी में बोलना शुरू किया तो ये उम्मीदें और ज्यादा बढ़ गयीं...लेकिन प्रधानमंत्री का संबोधन एक प्रधानमंत्री का संबोधन न होकर कांग्रेस का घोषणापत्र सरीखा समझ में आया। प्रधानमंत्री सिर्फ वही बोले...जो लगातार पिछले कुछ दिनों सरकार के मंत्री महंगाई और एफडीआई पर सरकार के फैसले के बचाव में बोल रहे थे। प्रधानमंत्री के संबोधन में इतना नया जरूर था कि प्रधानमंत्री ने लोगों का सामान्य ज्ञान ये कहकर बढ़ा दिया कि पैसे पेड़ पर नहीं लगते...अरे मनमोहन सिंह साहब आपने तो जनता के मुंह की बात छीन ली...बढ़ती महंगाई से परेशान जनता यही तो आपको बताने की कोशिश कर रही है कि पैसे पेड़ पर नहीं लगते...इसलिए महंगाई पर काबू करो। पैसे पेड़ पर लगते तो आपको महंगाई बढ़ाने से कौन रोक रहा था...फिर तो आप बस बढ़ाए जाओ...लेकिन साहब ये पैसे एक आम आदमी...एक गरीब आदमी बड़ी मेहनत से कमाता है...मामूली सी कमाई में उसे सारे खर्च वहन करने होते हैं...देश की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा सिर्फ इतना ही पैसा रोज कमा पाता है कि किसी तरह दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हो सके...ऐसे में आप इस चीज का जवाब दे दीजिए...कि आपके इन फैसलों से देश की इस बड़ी आबादी को क्या लाभ होगा। क्या इन्हें नौकरी मिल पाएगी…? क्या ये लोग बड़े बड़े स्टोर से सामान खरीदने की हिम्मत जुटा पाएंगे...? क्या वाकई में इनतो किफायती दरों में वस्तुएं उपलब्ध हो पाएंगे। इस बारे में भी जरूर सोचिएगा...जब आप देश हित में फैसले लेते हैं तो इन फैसलों से ऐसे लोगों को कितना फायदा होगा...ये शायद आप नहीं सोचते...एक अर्थशास्त्री भी होने के नाते आपके तर्क...आपके फैसले बिल्कुल सही हो सकते हैं...लेकिन क्या वास्तव में ये फैसले आखिरी पंक्ति में खड़े व्यक्ति का विकास कर पाएगी...ये जरूर सोचिएगा। माना आपके फैसलों से देश का आर्थिक विकास होगा...लेकिन क्या ये विकास रोजी रोटी के जुगाड़ में दिन गुजार देने वाले लोगों को विकास कर पाएगा। एफडीआई की बात करें तो निश्चित तौर पर वाहन, बीमा और टेलीकॉम के क्षेत्र में एफडीआई के अच्छे नतीजे रहे हैं...लेकिन यहां बड़ा सवाल ये भी खड़ा होता है कि आखिर ये फैसले लेने के लिए आपने यही वक्त क्यों चुना जब सरकार पहले से ही एक लाख 86 हजार करोड़ रूपए के कोयला घोटाले के आरोपों से घिरी थी। क्या ये सिर्फ कोयला घोटाले पर मचे बवाल को शांत करने की रणनीति थी। खैर इन आरोपों पर आपके पास देश के खराब आर्थिक हालात जैसे कई तर्क मौजूद हैं...जो आपने दिए भी हैं...लेकिन दूरदर्शन पर जनता को दूर से दर्शन देकर आपने जो सफाई दी है...वो तो कम से कम गले नहीं उतर रही है...उम्मीद करते हैं आपका ये मौन सिर्फ सरकार के फैसलों के बचाव में ही न टूटे बल्कि उनके सामने भी टूटे जिनके बैठने के लिए आप प्रधानमंत्री होने के बावजूद अपनी कुर्सी छोड़ देते हैं...जिनकी हामी के बिना आप कोई फैसला नहीं ले पाते...हमने तो कुछ ऐसा ही सुना है...अब यहां किसका जिक्र हो रहा है...ये भी अगर लिखना पड़े तो फिर तो पढ़ने वालों के सामान्य ज्ञान पर शक करने जैसा होगा।

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