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बुधवार, 19 सितंबर 2012

मंजिलें अपनी जगह...रास्ते अपनी जगह


जिस चुनावी विकल्प को देने के ऐलान के साथ जंतर मंतर पर अगस्त के पहले सप्ताह में टीम अन्ना ने अपना अनशन समाप्त किया था...उसी के चलते करीब डेढ़ साल तक भ्रष्टाचार के खिलाफ...लोकपाल के समर्थन में मुहिम चलाने वाले अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के रास्ते अलग हो गए। एक मंजिल की तरफ बढ़ रहा काफिला दो अलग अलग रास्तों पर निकल पड़ा...और इसके साथ ही अलग अलग हो गए अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के रास्ते। अन्ना ने टीम के टूटने पर दुख जताते हुए तल्ख तेवरों में ये भी कहा कि कोई भी राजनीति में उनके नाम और तस्वीर का इस्तेमाल न करे। हालांकि इसके संकेत दिल्ली में हुई बैठक से एक दिन पहले ही मिल गए थे...जब पुणे में अन्ना ने रास्ते अलग अलग होने की बात कही थी...साथ ही अन्ना ये भी कहने से नहीं चूके थे...कि राजनीति में लोग स्वार्थ के लिए आते हैं...और मैं कभी न तो राजनीतिक दल का गठन करूंगा और न ही राजनीति में कदम रखूंगा। अन्ना ने जनलोकपाल के लिए अपने आंदोलन को पूर्व की तरह जारी रखने की बात कही है तो केजरीवाल ने राजनीतिक दल गठन करने का फैसला लिया है...जिसने दोनों के रास्ते अलग करने की नींव भी रखी है। अब बड़ा सवाल ये है कि दो रास्ते जो एक मंजिल की तरफ जा रहे हैं...उन दोनों ही रास्तों से मंजिल तक पहुंचना कितना आसान है। अरविंद केजरीवाल की अगर बात करें तो इनके चुने रास्ते से मंजिल तक जल्दी पहुंचने का आभास तो होता है...लेकिन असल में ये रेगिस्तान में नजर आने वाली वो मरीचिका की तरह है जो मुसाफिर को पास ही मे पानी होने का आभास तो कराती है...लेकिन वास्तव में वो आंखों का धोखा ही होता है। इस रास्ते से गुजरने के लिए खुद को रेतीले तूफान का भी सामना करना पड़ता है...जिससे अगर नहीं बच पाए तो ये न सिर्फ रास्तों को मिटा देता है बल्कि मुसाफिर को ही लील जाता है। वैसे भी इस रास्ते को चुनने के साथ ही अन्ना ने केजरीवाल से किनारा कर लिया...किरण बेदी औऱ केजरीवाल के बीच पहले ही मतभेद जाहिर हो गए थे...ऐसे में किरण बेदी उनके साथ इस रास्ते को चुनेंगी इसकी उम्मीद भी नहीं है। यानि कि जैसे ही आंदोलन में राजनीति ने प्रवेश किया वैसे ही आंदोलन को लीड कर रही टीम बिखर गई...ऐसे में आने वाले दिनों में दूसरे सहयोगियों का भी केजरीवाल से किनारा करने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। यानि की इस रास्ते में केजरीवाल जैसे जैसे आगे बढ़ेंगे उनके साथ ईमानदार सहयोगियों का बने रहने की संभावना बहुत कम है...ऐसे में कैसे केजरीवाल ईमानदार औऱ स्वच्छ छवि के लोगों को साथ लेकर मंजिल तक पहुंच पाएंगे...ये बड़ा सवाल है। अरविंद के राजनीतिक दल गठन करने के पीछे की एक वजह शायद ये भी हो सकती है कि कहीं न कहीं अरविंद को लगता होगा कि आंदोलन के रास्ते अन्ना ने अपना पूरा जीवन भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में लगा दिया...और अन्ना ने कई भ्रष्ट अधिकारियों और मंत्रियों को कुर्सी छोड़ने पर मजबूर भी कर दिया...लेकिन इसके बाद भी भ्रष्टाचार कम होने की बजाए बढ़ा ही है...ऐसे में वे भी अगर आंदोलन के ही रास्ते अपनी लड़ाई को जारी रखेंगे तो शायद इसमें सालों लग जाएंगे...ऐसे में क्यों न राजनीति के रास्ते संसद में पहुंचा जाए...ताकि संसद में भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल के समर्थन में आवाज़ बुलंद किया जा सके। केजरीवाल को शायद ये भी लगता होगा कि आज के समय में जब युवा नौकरी के लिए कुछ भी करने को तैयार है...तो उनके ऐशो आराम की सरकारी नौकरी छोड़ने का असर युवाओं पर पड़े और देश की युवा शक्ति राजनीति के रास्ते पर उनका साथ दे...तो क्यों न राजनीतिक दल का गठन किया जाए और इस रास्ते पर आगे बढ़ा जाए। ये एक वजह में से एक हो सकती है...लेकिन असल वजह जो भी हो रास्ता तो अब केजरीवाल ने चुन ही लिया है...ऐसे में देखते हैं ये रास्ता केजरीवाल को कहां लेकर जाता है। अन्ना हजारे की जहां तक बात है अन्ना ने राजनीती के रास्ते की बजाए अपने उसी रास्ते पर आगे बढ़ने का संकल्प दोहराया है...जिस पर वे सालों से चलते आ रहे थे...निश्चित तौर पर अन्ना को इस बात का आभास होगा कि अगर वे राजनीति के दलदल में जाएंगे तो कीचड़ उन पर भी उछलेगा...जो उनकी लड़ाई को अंजाम तक पहुंचने में बाधक हो सकता है। सवाल ये भी है कि क्या खुद को अपने अहम सहयोगियों से अलग करने के बाद एक बार फिर से जनलोकपाल की मांग को लेकर अन्ना अपना आंदोलन उस रूप तक...उस मुकाम तक ले जा पाएंगे...जो सरकार को प्रभावी जनलोकपाल लाने पर विवश कर दे।
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रविवार, 16 सितंबर 2012

शिंदे के बोल और मनमोहन की खामोशी


हमारे देश को गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे साहब कहते हैं कि बोफोर्स घोटाले की तरह जनता एक लाख 86 हजार करोड़ के कोयला घोटाले को बी भूल जाएगी...और जिनके हाथ काले हैं वो फिर से सफेद हो जाएंगे। शिंदे साहब इसमें ये भी जोड़ते हैं कि जनता की याददाश्त बहुत कोमजोर होती है...हालांकि कोयला घोटाले पर सरकार को घेर रही भाजपा ने बोफोर्स कांड के बाद 1989 के चुनाव नतीजों की याद दिलाकर कांग्रेस पर हमला बोला है...लेकिन बड़ा सवाल ये है कि जैसा शिंदे ने इस बयान पर बवाल होते देख अपनी सफाई दी है कि उन्होंने तो मजाक में ये सब कहा था...क्या वाकई में ये शिंदे का मजाकिया बयान था या फिर ये उनके दिल की बात थी जो जुबां पर आ ही गयी। शिंदे साहब आप की बात मान भी ली जाए तो भी ऐसे समय में जब आपकी सरकार के मुखिया पर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों...तो क्या आपको ये मजाक शोभा देता है...गृहमंत्री जैसी महत्वपूर्ण कुर्सी पर बैठकर ऐसा बयान देना आपको शोभा देता है...जनता की याददाश्त पर सवाल उठाना वो भी अपनी गलतियों के लिए क्या ये आपको शोभा देता है। चलिए आपने मजाक में ही कहा...लेकिन कहीं न कहीं ये बात आपके दिल में रही होगी तभी तो जुबां पर भी आयी...मजाकिया अंदाज में ही सही। कहीं न कहीं आपके क्या...आपकी सरकार...आपकी पार्टी...आपके साथी नेताओं से इस तरह की आपकी बात होती होगी...तभी तो आपने ये सब बयां किया। वैसे आपकी इस बात से तो मैं भी सहमत हूं कि जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है...ये बात सच भी है...वरना बार बार भ्रष्टाचार करने के बाद शायद नेता चुनाव न जीतते और मंत्री न बन पाते। वैसे भी ये मानव स्वभाव है कि किसी भी चीज का असर हमारे दिमाग पर 24 से 48 घंटे तक रहता है...और उसके बाद हम चीजों को भूलने लगते हैं। उदाहरण ही देख लें....हम सड़क पर कोई भीषण दुर्घटना देखते हैं तो अगले 24 से 48 घंटे तक खुद संभल कर गाड़ी चलाते हैं...लेकिन उसके बाद फिर उसी ढ़र्रे पर आ जाते हैं...और ये सिलसिला चलता रहता है। शिंदे जी जनता की याददाश्त कमजोर न होती तो शायद आप जैसे नेता दोबारा विधायक, सांसद या मंत्री नहीं बन पाते...क्योंकि आपको कुर्सी तक पहुंचने से रोकने के लिए आपके इस तरह के गैर जिम्मेदाराना बयान ही काफी हैं...जिसे बयां करने में आपको तो शर्म नहीं आती..लेकिन जनता का सिर शर्म से झुक जाता है...कि ये कहने वाला व्यक्ति बहुत ही महत्वपूर्ण कुर्सी पर बैठा हमारे देश का गृहमंत्री है। खैर इन चीजों से आपको फर्क नहीं पड़ता क्योंकि आप तो जनता की कमजोरी जानते हैं कि कुछ भी करो...कुछ भी बोलो...चुनाव तक तो जनता सब भूल जाएगी। वैसे हिंदुस्तान की जनता के बारे में आपका सामान्य ज्ञान कमजोर लगता है...इस विषय में आपका सामान्य ज्ञान बढ़ाना चाहूंगा कि माना जनता जल्दी चीजों को भूल जाती है...लेकिन ये मत भूलिएगा कि जब जब जनता ने ठाना है...तो अच्छे अच्छों को सत्ता से बेदखल करके ही दम लिया है। 1977 और 1989 के चुनाव के नतीजे तो आपको याद ही होंगे...जब जनता ने अपनी इस ताकत को दिखा दिया था कि वो अगर ठान ले तो सत्ता किसी के बाप की जागीर नहीं है...और ऐसे लोगों को सत्ता में रहने का कोई अधिकार नहीं है। जनता अगर आपको सत्ता तक पहुंचा सकती है तो सत्ता से बेदखल भी कर सकती है...इसलिए जब भी बोलें तो जरा संभल कर...वरना चुप ही रहें...अच्छा न बोल सकें...देश के विकास की बातें न बोल सकें...जनकल्याण की बातें न बोल सकें...तो अपनी सरकार के मुखिया से ही कुछ सीख ले लें...वो करतें कुछ भी हों...लेकिन रहते खामोश ही हैं।

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शनिवार, 15 सितंबर 2012

M से मनमोहन...M से मुश्किल


कोयला घोटाले की आग बुझी भी नहीं थी कि महंगाई और रिटेल में 51 प्रतिशत एफडीआई को मंजूरी देकर यूपीए सरकार ने मानो अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मार ली। दो दिनों में दो बड़े फैसले के खिलाफ जहां समूचा विपक्ष सरकार के खिलाफ लामबंद हो गया हैवहीं प्रधानमंत्री देश के आर्थिक हालात में सुधार के लिए इन फैसलों को सही ठहरा रहे हैं...लेकिन इसको लेकर विपक्ष के साथ ही सरकार के सहयोगियों के रवैये को देखते हुए तो यही लगता है कि फिलहाल आने वाले दिन सरकार के लिए आसान नहीं होंगे। ऐसे में बड़ा सवाल ये भी उठता है कि क्या यूपीए 2 अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा कर पाएगी या फिर कोयला घोटाले की आग पर महंगाई और एफडीआई का घी सरकार की बलि ले लेगा। एफडीआई की अगर बात करें तो सरकार एफडीआई में 51 प्रतिशत विदेशी निवेश के पीछे तर्क दे रही है कि इससे रिटेल सेक्टर में करीब एक करोड़ नौकरियां मिलेंगी...आर इसके साथ ही बिचौलियों पर लगाम लगेगी औऱ किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम मिलेगा...लेकिन विपक्ष का तर्क है कि इससे छोटे दुकानदार खत्म हो जाएंगे...और विदेशी कंपनियां बाजार का विस्तार नहीं करेंगी...औऱ मौजूदा बाजार में ही काबिज हो जाएंगी..जिससे इससे जुड़े करीब 4 करोड़ लोगों पर इसका असर पड़ेगा...इसके अलावा भी तमाम तर्क देकर विपक्ष के साथ ही सरकार की सहयोगी पार्टियां एफडीआई का विरोध कर रही हैं। हालांकि एफडीआई पर राज्य सरकारों के पास ये अधिकार है कि वे अपने राज्य में एफडीआई लेकर आएं या नहीं...लेकिन इसके बाद भी विपक्ष को सरकार का ये फैसला रास नहीं आ रहा है। डीजल के दामों में वृद्धि और रसोई गैस में प्रति परिवार सिलेंडर का कोटा फिक्स करने पर तो सिर्फ सरकार के खिलाफ धरना प्रदर्शन और विरोध के ही स्वर सुनाई दे रहे थे...औऱ सरकार के सहयोगी नाराज होने के बावजूद समर्थन वापस लेने पर विचार नहीं कर रहे थे...लेकिन उसके तुरंत बाद सरकार के एफडीआई के कदम पर समूचे विपक्ष के साथ ही सरकार की सहयोगी पार्टियां भी लामबंद हो गयी हैं...औऱ सरकार से फैसला वापस न लेने पर समर्थन वापस लेने की धमकी दे रही हैं। मनमोहन सरकार के लिए इसमें सबसे बड़ी मुश्किल साबित हो रहे हैं चार एम...ममता, मायावती, मुलायम और एम करुणानिधि। विरोध तो मुख्य विपक्षी दल भाजपा समेत समूचा विपक्ष कर रहा है लेकिन मनमोहन सरकार के सहयोगियों का विरोध सरकार पर भारी पड़ सकता है। मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी की अगर बात करें तो सपा के 23 सांसद हैं, मायावती की बहुजन समाज पार्टी के 21, ममता की तृणमूल कांग्रेस के 19 सांसद हैं तो एम करूणानिधि की द्रमुक के 18 सांसद हैं। वर्तमान में सरकार को लोकसभा में 317 सांसदों का समर्थन हासिल है...जबकि जरूरत 272 सदस्यों के समर्थन की है। अगर मनमोहन सरकार से चार एमयानि ममता, मुलायम, मायावती और एम करूणानिधि समर्थन वापस ले लेते हैं तो सरकार के पास सिर्फ 236 सासंद रह जाएंगे...यानि कि सरकार अल्पमत में आ जाएगी। हालांकि इन सभी दलों ने अभी सरकार को सिर्फ धमकी दी है...और पार्टी की बैठक के बाद इस पर फैसला लेने की बात कही है...लेकिन जिस तरह के तेवर चारों के हैं...उसको देखते हुए तो नहीं लगता कि मनमोहन की मुश्किलें कम होने जा रहा हैं। मुद्दा सिर्फ एक होता तो सरकार को मैनेज करने में भी आसानी होती लेकिन...यहां तो पहले से ही जल रही कोयला घोटाले की आग के बीच महंगाई और एफडीआई का बम भी सरकार ने फोड़ दिया है। विपक्ष के साथ ही सहयोगियों के तेवरों के बाद भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का ये बयान कि सारे फैसले देशहित में हैं...और अगर हम जाएंगे तो भी लड़ते हुए जाएंगे ये साफ करने के लिए काफी है कि सरकार फिलहाल विपक्ष और सहयोगियों के दबाव में आने वाली नहीं है...यानि कि सरकार शायद इस बात के लिए भी पहले से ही तैयार है कि सरकार गिर भी सकती है...औऱ मनमोहन का ये बयान कि लड़ते हुए जाएंगे ये भी बयां कर रहा है कि वे मान चुके हैं कि सरकार का जाना तय है...ऐसे में क्यों न बिना झुके कुछ कड़े फैसले लिए जाएं...और सरकार की उस छवि से बाहर निकला जाए जो कड़े फैसले लेने में पीछे हटती हो। बहरहाल मनमोहन सरकार के लिए सबसे बड़ी मुश्किल एम फैक्टर ही बना हुआ है...और ये एम फैक्टर राजनीति के चार बड़े सूरमा हैं...ऐसे में देखना ये होगा कि ये सूरमा मनमोहन सिंह पर हावी होते हैं या फिर मनमोहन सिंह एम फैक्टर पर विजय हासिल कर अपनी उस बयान को सही ठहराने में कामयाब होते हैं...जो उन्होंने हाल में तेहरान से लौटते वक्त अपने विशेष विमान में दिया था कि वे 2014 तक प्रधानमंत्री बनें रहेंगे और जो लोग सत्ता पाने के ख्वाब देख रहे हैं...वो 2014 का इंतजार करें। हम तो बस इतना ही कह सकते हैं कि एम फैक्टर से निपटने के लिए बेस्ट ऑफ लक मनमोहन सिंह साहब।

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मंगलवार, 11 सितंबर 2012

इन्होंने तो महंगाई को भी दे दी मात !


महंगाई की रफ्तार भी गजब की है...किसी भी चीज पर चढ़ बैठती है...और ऐसा भागती है कि पूछो मत...रूकने का नाम ही नहीं लेगी मुई। इतनी निरंतरता और तेजी से बढ़ती है कि कमबख्त सोचने का वक्त ही नहीं मिलता...बस कुछ सामान खरीदने बाजार जाते हैं तो महंगाई को कोसते रहते हैं ओर सत्ता में बैठे लोगों को। जब किसी चीज के दाम बढ़ते हैं या फिर बढ़ने की ख़बर आती है तो लोगों का खून खौल उठता है...और याद आता है पीपली लाइव फिल्म का महंगाई पर बना मशहूर गाना महंगाई डायन खाए जात है एक बार फिर से डीजल और रसोई गैस के दाम बढने की खबर ने इस बेचैनी को और बढ़ा दिया है। पेट्रोलियम मत्री जयपाल रेड्डी साहब तो 5 दिनों में ही अपनी जुबान से पलट गए...7 सितंबर 2012 को रेड्डी साहब बयान देते हैं कि फिलहाल बहुत जल्दी पेट्रोल, डीजल, केरोसीन और रसोई गैस के दाम नहीं बढ़ने जा रहे हैं...लेकिन 11 सितंबर 2012 को वे कहते हैं कि दाम बढ़ना तो तय है। खैर दाम तो देर सबेर बढ़ेंगे ही...पहले ज्यादा बढ़ेंगे फिर विरोध के स्वर उठेंगे तो तय रणनीति के तहत मामूली कमी कर दी जाएगी...लेकिन दाम तो बढ़ेंगे ये तय है। अब तो लोगों को आदत सी हो गयी है...इस सब की...वैसे भी कौन सा इस सब पर बस चलता है उनका। बढ़ती महंगाई के अनवरत सिलसिले के बीच ऐसा लगता है कि महंगाई से दौड़ में कोई जीत ही नहीं सकता...लेकिन हमारे देश में एक जमात ऐसी भी है जो महंगाई क्या अच्छी अच्छी चीजों को पीछे छोड़ देती है। और कौन हमारे देश के राजनेता...इनकी संपत्ति के बढ़ने की गति इतनी तेज है कि महंगाई उससे कोसों पीछे रह जाती है। जिस तरह से हमारे राजनेताओं को संपत्ति में दिन दोगुना रात चौगुना ईजाफा हो रहा है...उससे तो यही जाहिर होता है कि इस दौड़ में उनसे आगे निकलने का माद्दा किसी में नहीं है...फिर ये महंगाई क्या चीज है। दिमाग पर ज्यादा जोर डालने की जरूरत नहीं है...कुछ ही दिन पहले चले जाइये...जब पीएमओ की वेबसाइट से खुलासा हुआ कि हमारे प्रधानमंत्री समेत उनके मंत्रिमंडल सहयोगियों की संपत्ति में बेहिसाब बढ़ोतरी हुई है। सिर्फ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अगर बात करें तो एक साल में उनकी संपत्ति दोगुनी हो गयी है। बीते साल उनकी संपत्ति जहां करीब 5 करोड़ रूपए थी...वो अब बढ़कर करीब 11 करोड़ हो गयी है। कैबिनेट मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने तो सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिए...उनकी संपत्ति की कीमत करीब 52 करोड़ रूपए बतायी गयी है...जबकि एक और कैबिनेट मंत्री शरद पवार की संपत्ति करीब 22 करोड़ रूपए और पी चिंदबरम की संपत्ति करीब 12 करोड़ है। ये सिर्फ कुछ नाम है। प्रधानमंत्री के मंत्रिमंडल में कई ऐसा करोड़वीर हैं...जिनकी संपत्ति उन्हें इस तमगे का सही हकदार बना देती है। वैसे मनमोहन सिंह के एक सहयोगी ऐसे भी हैं जिन्हें ये तमगा हासिल करने में फिलहाल देर लग रही है...वेबसाईट कहती है कि रक्षा मंत्री ए के एंटोनी के पास सिर्फ 55 लाख रूपए की संपत्ति है। निरंतर बढ़ती महंगाई के इस दौर में करोड़वीर का ये तमगा हमारे अधिकतर सांसदों और राज्यों की विधानसभा के विधायकों पर भी एकदम फिट बैठता है...बस मुंह चिढ़ाता है तो देश की गरीब जनता तो जिसे दो वक्त तक की रोटी मयस्सर नहीं है...और ऊपर से बढ़ती महंगाई ने उसके मुंह से वो निवाला भी छीन लिया है।
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सोमवार, 10 सितंबर 2012

क्यों पैदा होते हैं असीम त्रिवेदी सरीखे कार्टूनिस्ट ?


असीम त्रिवेदी ने विवादित कार्टून को लेकर बवाल मचा है...असीम पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया जाता है तो समाचार चैनलों से लेकर सोशल नेटवर्किंग साइटस तक सिर्फ ये ही मुद्दा छाया रहता है। सवाल खड़े उठते हैं कि क्या एक कार्टून बनाना देशद्रोह हो सकता है...क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में किसी शख्स को अपनी बात को अभिव्यक्त करने पर देशद्रोह के आरोप में जेल में डाल देना ठीक है। देशद्रोह के जिस कानून के तहत असीम त्रिवेदी को जेल में डाल दिया जाता है वो कानून 152 साल पुराना है जिसे 1860 में उस वक्त बनाया गया था...जब हम ब्रिटिश हुकुमत के गुलाम थे और उस वक्त ब्रिटिश महारानी के खिलाफ बोलने वाले को राजद्रोह के तहत गिरफ्तार कर लिया जाता था। इन 152 सालों में बड़े बड़े बदलाव आए..1947 में हमें आजादी भी मिली...स्वतंत्र भारत में हर भारतीय को खुली हवा में सांस लेने का अधिकार मिला...अधिकार मिला अभिव्यक्ति का...अपनी बात को खुलकर कहने का...लेकिन अफसोस इस बात का है कि आजादी से पहले हम ब्रिटिश हुकुमत के गुलाम थे...वो लोग हमारा शोषण कर रहे थे...तो आज हमारे अपने ये सब करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते। असीम पर राजद्रोह का मुकदमा दर्ज होने के बाद जो नाटकीय घटनाक्रम हुआ उसे देखते हुए तो ये सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि क्या वाकई में 152 साल पुराना ये कानून आज प्रासंगिक है। क्या वाकई में असीम ने विवादित कार्टून बनाकर जो काम किया वो देशद्रोह की श्रेणी में आता है। ऐसा इसलिए भी लगने लगता है क्योंकि जिस तरह मुंबई पुलिस पहले राजद्रोह का मुकदमा दर्ज कर लेती है उसके बाद असीम की रिमांड की जरूरत न होने की बात कर सरेंडर करती है...औऱ असीम के कार्टून को लेकर और उस पर दर्ज देशद्रोह के मुकदमे को लेकर पुलिस की कानूनी सलाह लेने पर विचार करने की खबरें सामने आती हैं...उससे तो कम से कम यही लगता है। खैर 152 साल पुराना कानून 21वीं सदी में कितना प्रासंगिक है ये एक बड़ा मसला है...और निश्चित तौर पर इस पर बड़ी बहस की जरूरत है...लेकिन ऐसे वक्त पर ये सवाल उठाना बहुत जरूरी लगता है कि आखिर क्यों असीम जैसे कार्टूनिस्टों को ऐसे कार्टून बनाने की जरूरत पड़ती है...ये विचार उनके मन में क्यों आया। असीम का विवादित कार्टून सीधे तौर पर देश को चला रही सरकार पर प्रहार था और असीम ने अपने कार्टून के जरिए ये अभिव्यक्त करने की कोशिश की थी कि किस तरह भ्रष्टाचार देश को खा रहा है...और किस तरह सरकार में शामिल लोग भ्रष्टाचार में डूबे हैं। यानि की हमारे देश के नेता भ्रष्ट न होते...तो निश्चित तौर पर भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता सड़कों पर न उतरती। हाल ही में अन्ना के आंदोलन की बात करें...बाबा रामदेव के आंदोलन की बात करें...कोयला घोटाले की भेंट चढ़े संसद के मानसून सत्र की बात करें तो सबकी जड़ के पीछे एक ही वजह थी भ्रष्टाचार। ऐसा में हमारे नेताओं को ये सोचना चाहिए इस पर मंथन करना चाहिए कि आखिर असीम त्रिवेदी को विवादित कार्टून बनाने की जरूरत क्यों पड़ी...भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों को आवाज़ उठाने की जरूरत क्यों पड रही है...बजाए इसके की बेवजह की बातों पर बयानबाजी करें औऱ अपने साथी राजनेताओं पर कीचड़ उछालें। राजनेता अगर इस पर मंथन करें और सिर्फ ये सोचें की देश की जनता का कल्याण कैसे होगा...देश से गरीबी, भूखमरी कैसे दूर होगी...देश से बोरोजगारी कैसे हटेगी...भारत विकासशील देश से विकसित राष्ट्र कैसे बनेगा तो शायद किसी असीम त्रिवेदी को किसी का कार्टून बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी...भविष्य में कोई और दूसरा असीम त्रिवेदी पैदा ही नहीं होगा...और कार्टून बनाने पर अपनी बात अभिव्यक्त करने पर किसी असीम त्रिवेदी सरीखे कार्टूनिस्ट पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज नहीं होगा। ये तय राजनेताओं को करना है...और राजनेताओं ने समय रहते इसे तय नहीं किया तो राजनेताओं को ये बात नहीं भूलनी चाहिए कि लोकतंत्र के त्यौहार यानि की चुनाव में फिर जनता तय करेगी कि उनके देश को चलाने के लिए उन्हें कैसा व्यक्ति चाहिए...कोई ऐसा व्यक्ति जिसके खिलाफ असीम त्रिवेदी जैसे कार्टूनिस्ट कार्टून बनाने पर मजबूर हों या फिर एक ऐसा व्यक्ति जो सिर्फ ये सोचे की भारत की तरक्की कैसे होगी...अंतिम पंक्ति में खड़े भारतवासी की तरक्की कैसे होगी।
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शनिवार, 8 सितंबर 2012

सुख बिना सत्ता की चाह...बड़ी मुश्किल है ये राह !


रालेगण में अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों का पार्टी बनाने का फैसला अभी भविष्य के गर्भ में है...लेकिन जिस तरह अरविंद केजरीवाल ने बैठक के बाद बयान दिया कि उनकी पार्टी से स्वच्छ छवि के लोग ही चुनाव लड़ेंगे और उन्हें बड़े त्याग के लिए तैयार रहना होगा...इससे तो ये साफ जाहिर होता है कि अरविंद केजरीवाल पार्टी गठन को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है। 17 – 18 सितंबर को अन्ना के साथ सहयोगियों की बैठक में माना सहमति बनने के बाद केजरीवाल एंड कंपनी पार्टी का गठन कर भी लेती है...तो ये बात तो अन्ना ने साफ कर ही दी है कि वे पार्टी में शामिल नहीं होंगे। लेकिन उनकी पार्टी में शामिल होने वाले औऱ चुनाव लड़ने वाले लोग क्या जिस त्याग की बात अरविंद केजरीवाल कर रहे हैं वो कर पाएंगे। दरअसल अरविंद केजरीवाल जिस त्याग की बात कर रहे हैं उसके अनुसार उनकी पार्टी में शामिल होने वाला व्यक्ति ईमानदार और स्वच्छ छवि का ही होगा...और हर साल उसे अपने बैंक खाते की जानकारी सार्वजनिक करनी होगी...साथ ही उसके अंदर समाज सेवा की भावना हो। अगर वो चुनाव जीत जाता है तो सरकारी सुख सुविधाओं से दूर रहेगा....मसलन सरकारी बंगले में नहीं रहेगा...लाल बत्ती की गाडी भी नहीं रखेगा। इसमें शर्त ये है कि ये सारी शर्तें चुनाव लड़ने से पहले ही लागू कर दी जाएंगी। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि जिन शर्तों की बात अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी कर रही है क्या वे खुद उन शर्तों पर खरे उतर पाएंगे...माना केजरीवाल और उनके सहयोगी इन शर्तों को निभा भी लेंगे...तो भी कितने दिन। उनके साथ जुड़ने वाले...उनकी पार्टी से चुनाव लड़ने वाले लोग इन शर्तों को पूरा करने के लिए हामी भरेंगे और हामी भर भी देते हैं तो कितने वक्त के लिए इन्हें निभा पाएंगे। ये सवाल इसलिए भी जायज है क्योंकि राजनीति एक ऐसा दलदल है जिसमें एक बार घुसने के बाद अपने आपको इसमें डूबने से बचा पाना और अपने दामन को उस दलदल के कीचड़ से बचा पाना आसान काम नहीं है। सत्ता ऐसी चीज है जो अच्छे अच्छों के दिमाग खराब कर देती है...अगर माना केजरीवाल एंड कंपनी को सत्ता के सिंहासन तक पहुंचने का मौका मिलता है, हालांकि ये लगभग असंभव है...तो क्या केजरीवाल एंड कंपनी खुद को और अपने समर्थकों को सत्ता के नशे में चूर होने से बचा पाएगी। बहरहाल केजरीवाल एंड कंपनी ने लोगों को चुनावी विकल्प देने के लिए राजनीति के दलदल में घुसने का फैसला तो उसी दिन ले लिया था..जिस दिन जंतर मंतर से टीम अन्ना का अनशन समाप्त हुआ था...लेकिन देखना ये होगा कि अन्ना के बिना केजरीवाल एंड कंपनी कैसे अपने मिशन में कामयाब हो पाएगी...वो भी ऐसी वक्त में जब लोकपाल के समर्थन में औऱ भ्रष्टाचार के खिलाफ इस मिशन को शुरू करने वाले और नेतृत्व प्रदान करने वाले अन्ना हजारे आगे की लडाई में उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े नहीं होंगे।

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गुरुवार, 6 सितंबर 2012

मायावती, आरक्षण और वोटबैंक !


 जिस जनता का भरोसा जीतकर आप सत्ता में काबिज होते हैं...अगर वही जनता आपको नकार दे तो दिल पर क्या गुजरती है...ये सत्ता से बेदखल होने वाले राजनेताओं से बेहतर कौन समझ सकता है। हालांकि राजनीतिक दलों और इसके शिकार राजनेताओं की फेरहिस्त काफी लंबी है...लेकिन कुछ एक नाम ऐसे होते हैं...जो हर वक्त जुबान पर रहते हैं...ऐसा ही एक नाम है बसपा सुप्रीमो मायावती का...देश की राजनीति की दशा दिशा तय करने वाले सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में जिस अंदाज में मायावती ने 2007 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को पटखनी देकर सत्ता में वापसी की थी...उसे शायद ही कोई भूला होगा...लेकिन 2012 के चुनाव में जनता ने माया को दिखा दिया कि उनकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरने पर...उनसे किए वादे पूरा न करने पर वो आपको सत्ता से बेदखल भी कर सकती है। खैर जनता ने अपनी ताकत का एहसास मायावती को करा दिया...जिसका नतीजा ये रहा कि 2007 में 206 सीटें जीतने वाली बसपा 2012 में 79 सीटों पर ही सिमट के रह गयी। अपने पारंपरिक वोट बैंक का विश्वास खो चुकी मायावती ने एक बार फिर से मिशन 2014 के तहत नयी रणनीति के तहत उन्हें साधने का काम शुरू कर दिया है...औऱ इस बार मायावती का हथियार बन रहा है प्रमोशन में आरक्षण। इसके लिए माया ने राज्यसभा में आवाज भी बुलंद की औऱ आखिर केन्द्र सरकार ने सर्वदलीय बैठक में आम राय न बनने के बाद भी प्रमोशन में आरक्षण बिल को केन्द्रीय कैबिनेट में मंजूरी दे दी। केन्द्रीय कैबिनेट में बिल के ड्राफ्ट को मंजूरी क्या मिली मायावती की बांछे खिल गयी...और माया को लगने लगा कि प्रमोशन में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए संविधान संशोधन विधेयक संसद में पारित हो जाएगा तो शायद इस का ढिंढोरा पीटकर कम से कम 2014 के आम चुनाव में अपने पारंपरिक वोट बैंक को साधने का बढिया मौका मिल जाएगा। ये बिल संसद में पास हो जाए इसके लिए मायावती ने बकायदा कोयला घोटाले पर सदन में हंगामा मचा रही भाजपा नेताओं से मुलाकात कर उनसे बिल पास होने तक हंगामा न मचाने की भी अपील की...लेकिन माया की इस अपील का भाजपा पर कोई असर नहीं हुआ। जैसे ही राज्यसभा में संविधान संशोधन विधेयक पेश हुआ वही हुआ जिसका कि अंदेशा था...और हंगामे के बीच बिल का विरोध कर रही सपा सांसद नरेश अग्रवाल और बसपा सांसद अवतार सिंह भिड गए...लिहाजा सदन की कार्यवाही स्थगित हो गयी। बिल को लेकर माया की चिंता इस बात से और ज्यादा जाहिर हो गयी जब सत्र खत्म होने से एक दिन पहले मायावती बिल पास न होने पर भाजपा और कांग्रेस दोनों को कोसती हैं...और मायावती को अचानक संसद का हंगामा और कोयला घोटाला याद आ जाता है...जो माया को बीते 10 दिनों में याद नहीं आया और न ही उस पर मायावती कोई प्रतिक्रिया आयी...लेकिन जब संविधान संशोधन बिल इसके चलते हो रहे हंगामे में फंस गया तो मायावती को हंगामा औऱ कोयला घोटाला दोनों नजर आने लगता है और माया हंगामा करने वाली भाजपा के साथ ही सरकार को भी कोसना नहीं भूली। बहुत साफ है कि मायावती का सिर्फ एक ही एजेंडा है कि किसी तरह बस प्रमोशन में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए संविधान संशोधन विधेयक पास हो जाए...ताकि मिशन 2014 के लिए माया अपनी झोली में इसका श्रेय डालकर एक बार फिर से मतदाताओं को लुभाने की तैयारी कर लें। हालांकि माया ने अभी भी हार नहीं मानी है...और इस बिल के लिए बकायदा मानसून सत्र का समय बढ़ाने या फिर इसके लिए विशेष सत्र की मांग भी माया ने कर डाली है...लेकिन देश के वर्तमान राजनीतिक परिदृष्य को देखते हुए तो बिल्कुल भी नहीं लगता कि मायावती की मंशा फिलहाल बहुत जल्द पूरी होने के कोई आसार बन रहे हैं। बहरहाल मायावती भले ही इसके पीछे वर्ग विशेष के पिछडेपन का हवाला देते हुए उनके उत्थान और विकास का तर्क दे रही हों...लेकिन ये माया भी अच्छी तरह जानती हैं कि उनके बगैर वो भी कुछ नहीं है...लिहाजा आवाज तो बुलंद करनी ही होगी...क्या पता इसका इसी बहाने इसका फल इससे लाभांवित होने वाले वर्ग विशेष माया को 2014 के आम चुनाव में दे दे। जो शायद उत्तर प्रदेश विधानसभा में करारी मात के माया के जख्मों को भी कुछ हद तक भरने में सफल हो जाए। खैर माया की मंशा कब पूरी होती है...या कहें कि होती भी है कि नहीं..ये तो भविष्य के गर्भ में है...लेकिन माया ने दिखा दिया कि अपने वोटबैंक को कैसे सुरक्षित रखा जा सकता है...कैसे साधा जा सकता है। माया तो सिर्फ एक उदाहरण हैं...वोटबैंक की राजनीति के चलते अपने फायदे के लिए अजब – गजब कारनामे और किसी भी हद तक जाने वाले तो इतिहास के पन्नों में भी हमें कई मिल जाएंगे...लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि हमारे देश की जनता की याददाश्त बहुत कमजोर है...वो चीजों को जल्दी और आसानी से भूल जाते हैं...या यूं कहें कि याद ही नहीं रखना चाहती।  

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मंगलवार, 4 सितंबर 2012

आरक्षण मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है !



सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण को लेकर जमकर बवाल मचा है...एक बड़ा गुट आरक्षण के खिलाफ है तो दूसरा गुट आरक्षण के समर्थन में हैं। ऐसे में इन दोनों ही गुटों के वोटों पर निगाह गड़ाए रखने वाले हमारे राजनेता कहां पीछे रहने वाले थे। आखिर आरक्षण का ये जिन्न बाहर भी तो इन्हीं के श्रीमुख से निकलता आया है। आरक्षण पर लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष और भारतीय दलित राजनीति के प्रमुख नेता रामविलास पासवान कहते हैं कि आरक्षण हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है...तो आरक्षण पर दलित राजनिति की प्रमुख महिला नेत्री और बसपा सुप्रीमो मायावती के सुर तो पासवान से भी ज्यादा बुलंद हैं...वहीं समाजवादी पार्टी के सुर आरक्षण पर कुछ बदले बदले से हैं...समाजवादी पार्टी ने तो साफ कर दिया है कि आरक्षण प्राकृतिक नियमों के खिलाफ है...लिहाजा इसके खिलाफ उनके तीखे स्वर नरम नहीं पड़ने वाले। सरकार तो पहले ही प्रमोशन में आरक्षण के पक्ष में दिखाई दी...और इसका सुबूत केन्द्रीय कैबिनेट के उस फैसले ने दे दिया...जिसने प्रमोशन में आरक्षण बिल को मंजूरी दे दी। अब बची मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी...प्रमोशन में आरक्षण को लेकर भाजपा ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं...शायद भाजपा इस असमंजस में है कि इस ज्वलंत मुद्दे को किस तरह भुनाया जाए...प्रमोशन में आरक्षण का समर्थन कर इससे लाभांवित होने वाले वर्ग विशेष के वोट बैंक में सेंध लगाकर या फिर इसका विरोध कर अपेक्षाकृत बड़े वर्ग की सहानुभूति बटोर कर वो भी ऐसे समय में जब कांग्रेस, बसपा, लेफ्ट समेत तमाम दूसरे राजनीतिक दल उनकी नाराजगी मोल ले चुके हैं। बहरहाल देर सबेर भाजपा भी अपने पत्ते खोल ही देगी...लेकिन सरकार को प्रमोशन में आरक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलटने के लिए अभी सदन में संविधान संशोधन विधेयक पेश करना है...और इसे पास भी कराना है...लेकिन सरकार को बाहर से समर्थन दे रही समाजवादी पार्टी की बिल को लेकर नाराजगी और भाजपा की चुप्पी सरकार के लिए फिलहाल सबसे बड़ा सिरदर्द बनी हुई है। आरक्षित वर्ग की अगुवाई करने वाले रामविलास पासवान, मायावती और इनके सरीखे दूसरे राजनेता तो अपने वोटबैंक बचाने की जद्दोजहद में जल्द से जल्द इसे लागू करवाना चाहते हैं...और इन दलों की पूरी कोशिश ये है कि इसी बहाने आगामी लोकसभा चुनाव में अपनी सीटों की संख्या को बढाया जाए। पासवान जहां बिहार में दलित वोटबैंक के सहारे अपनी खोई जमीन वापस पाने की फिराक में हैं तो मायावती भी विधानसभा चुनाव में मात खाने के बाद कम से कम 2014 के आम चुनाव में ज्यादा से ज्यादा लोकसभा सीटों पर नीला झंडा फहराना चाहती हैं...और मायावती की कोशिश भी यही होगी कि इस बार अपनी सीटों की संख्या 21 से बढ़ाकर कम से कम 30 से 40 की जाए...ताकि केन्द्र की राजनीति में माया का कद बढ़े। चलो ये तो थे तर्क प्रमोशन में आरक्षण बिल का पुरजोर समर्थन करने वाले दो दलों के...अब बात करते हैं समाजवादी पार्टी की आखिर क्यों सपा प्रमोशन में आरक्षण के विरोध में है। सपा इसके पीछे भले ही जो भी तर्क दे...लेकिन इस बात से सपा के नेता इंकार नहीं कर सकते कि इस फैसले के विरोध के पीछे 2014 के आम चुनाव ही हैं। सपा ये बात जानती है कि अगर वो इस फैसले का पुरजोर विरोध करेगी तो देशभर में न सही कम से कम उत्तर प्रदेश के उन समान्य वर्ग के उन 16 लाख सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवार के साथ ही सामान्य वर्ग के दूसरे लोगों की सहानुभूति तो वो आम चुनाव में बटोर ही सकती है। हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में सपा ने 224 सीटें हासिल कर पूर्ण बहुमत हासिल किया था...औऱ बसपा को सत्ता से बेदखल कर अखिलेश यादव मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुए थे। जिसके बाद मुलायम सिंह के राष्ट्रीय राजनीति में पूरी दमदारी के साथ ताल ठोकने के इरादे भी जाहिर हो गए थे। ऐसे में 2014 के आम चुनाव में सपा प्रदेश में पार्टी के पक्ष में बने माहौल को भुनाना चाहती है...सपा की पूरी कोशिश है कि प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से कम से कम 60 सीटों पर साइकिल को रेस जितायी जाए। इससे पहले भी 2004 में सपा ने 80 में से 39 सीट हासिल की थी...जबकि 2009 में उसकी सीटों की संख्या सिमटकर 23 हो गयी थी। लेकिन इस बार सपा की निगाहें कम से कम 60 सीटों पर है...ऐसे में प्रदेश के करीब 16 लाख सरकारी कर्मचारी और उनके परिवार के साथ ही सामान्य वर्ग के दूसरे लोगों के वोट सपा की इस मंशा को साकार करने के करीब तो पहुंचा ही सकते हैं...फिर भला सपा प्रमोशन में आरक्षण का विरोध क्यों न करे। उत्तर प्रदेश देश की राजनीति में अहम भूमिका निभाता है क्योंकि सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीट उत्तर प्रदेश में हैं...और इस प्रदेश में राजनीतिक दलों का प्रदर्शन उन्हें केन्द्र की सत्ता की तरफ लेकर जाता है। ऐसे में केन्द्र की सत्ता में काबिज होने का ख्वाब देख रही भाजपा भी शायद प्रमोशन में आरक्षण के मुद्दे पर अभी इसलिए खामोश बैठी है कि आखिर किया क्या जाए। जाहिर है 2014 का आम चुनाव भाजपा के जेहन में है और इसी को ध्यान में रखते हुए पार्टी इस मुद्दे पर कोई स्टैंड लेगी...जो कम से कम उसे फायदा न भी पहुंचाए तो कम से कम नुकसान भी न पहुंचाए। अब कांग्रेस की अगर बात करें तो प्रमोशन में आरक्षण पर केन्द्रीय कैबिनेट के फैसले ने जाहिर कर दिया है कि कांग्रेस देश में ये संदेश देना चाहती है कि कांग्रेस का हाथ दलितों के साथ है...इसी बहाने ही सही दलित वोट बैंक के कुछ वोट छिटककर उसके पाले में आ जाएं...लेकिन 2004 लगातार केन्द्र की सत्ता में काबिज कांग्रेस की हैट्रिक में ये दलित वोट के साथ ही सामान्य वर्ग के वो वोट भी निर्णायक भूमिका में होंगे जिन्हें फिलहाल कांग्रेस नाराज कर चुकी है। लेकिन देखने वाली बात भी होगी कि लोगों की नाराजगी क्या 2014 तक बनी रहेगी क्योंकि हमारे देश के लोग चीजों को भूल बहुत जल्दी जाते हैं। बहरहाल ये तय तो मतदाताओं ने ही करना है...जिसमें हर वर्ग के लोग हैं...कि 2014 के आम चुनाव में प्रमोशन में आरक्षण का मुद्दा कितना हावी रहता है और ये राजनीतिक दलों के प्रदर्शन पर कितना असर डाल पाता है। हम तो यही कहेंगे कि आरक्षण जैसे मुद्दों पर तो कम से कम राजनीतिक दल वोटबैंक की राजनीति से बाज आएं...और जरूरतमंदों के साथ न्याय हो...उनको उनका हक मिले...फिर चाहे वो किसी भी जाती या बिरादरी के क्यों न हों। इस मौके पर बिल गेट्स की कही एक बात मुझे याद आती है...जो मैंने कहीं पढ़ी थी कि …“अगर आप गरीब घर में पैदा होते हैं तो इसमें आपका कोई कसूर नहीं है...लेकिन अगर आप गरीब ही मर जाते हैं तो इसमें पूरा दोष सिर्फ और सिर्फ आपका ही है”…यानि की योग्यता लंबे समय तक दबी नहीं रह सकती...उसे कोई नहीं रोक सकता...और योग्य व्यक्ति मुश्किल हालात औऱ विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी योग्यता से हर वो मुकाम हासिल कर लेता है जिसे पाने की वो ठान लेता है।

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सोमवार, 27 अगस्त 2012

प्रधानमंत्री जी ये कैसे बोल...खोल दी अपनी ही पोल


प्रधानमंत्री जी ये कैसे बोल...खोल दी अपनी ही पोल

वैसे तो हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह साल में दो ही बार हिंदी में बोलते हैं (अंग्रेजी में भी कभी कभी बोलते हैं) 15 अगस्त और 26 जनवरी को...अभी 15 अगस्त बीते ज्यादा दिन नहीं हुए हैं...लेकिन सोमवार को संसद भवन के बाहर अचानक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कोयला घोटाले पर बोलते हुए देखा वो भी हिंदी का शेर बोलते हुए देखा तो यकीन नहीं हुआ कि 26 जनवरी से पहले इतनी जल्दी मनमोहन सिंह के श्रीमुख से हिंदी में बोल निकलेंगे। खैर प्रधानमंत्री बोले तो सही...लेकिन प्रधानमंत्री शायद ये नहीं समझ पाए कि उनके ये बोल उनकी ही पोल खोल गए। दरअसल कोयला घोटाले पर अभी तक चुप्पी साधे बैठे मनमोहन सिंह ने कुछ इस अंदाज में बयां किए अपने जज्बात...प्रधानमंत्री ने कोयला घोटाले पर कहा कि...'हजारों जवाबों से अच्छी है मेरी खामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू रखी'मौनी बाबा (हाल ही में बाबा रामदेव का दिया मनमोहन सिंह को नाम) के नाम से भी मशहूर हो चुके हमारे प्रधानमंत्री साहब ने खुद इस शेर को बोलकर ये साबित कर दिया कि उन्हें मौनी बाबा क्यों कहा जाता है। इस शेर के साथ ही अपने दिए बयान से भाजपा पर भी कोयला घोटाले के लिए सवाल खडे करने पीएम ने खुद पर ही कई सवाल खडे कर दिए। 1 लाख 86 हजार करोड़ जैसे बड़े कोयले घोटाले पर प्रधानमंत्री ने अपनी चुप्पी का हवाला देकर ये साबित कर दिया कि वो इस मुद्दे को लेकर कितने गंभीर हैं। रही सही कसर पूरी कर दी प्रधानमंत्री के उस बयान ने जिस पर उन्होंने कैग रिपोर्ट को तथ्यविहीन बताकर कैग के अस्तित्व पर ही सवाल उठा दिया। मैंने कहीं पढ़ा था कि संविधान निर्माता बाबा भीमराव अंबेडकर ने संविधान सभा की बहस के दौरान कहा था कि कैग इस देश का सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी होगा...क्योंकि वह यह तय करेगा कि जनता का पैसा उसी तरह से खर्च हो रहा है कि नहीं जैसा जनादेश संसद को मिला है...यानि कि सरकार जनता के पैसे का दुरूपयोग तो नहीं कर रही है...ऐसे में हमारे देश के प्रधानमंत्री कैग पर सवाल खड़ा करते हैं तो देश के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है। चार दिनों तक संसद में हंगामा होने के बाद सामवोर को जब प्रधानमंत्री के संसद में बयान देने की खबर आयी तो सभी को लगा था कि शायद मनमोहन सिंह कोयला घोटाले पर बनी भ्रम की स्थिति को दूर करने के साथ ही अपने ऊपर लगे आरोपों का करारा जवाब देंगे...लेकिन प्रधानमंत्री अपनी छवि से बाहर नहीं निकल पाए और वही बयान देकर वापस लौट गए जो कैग रिपोर्ट आने के बाद से ही सरकार के कारिंदे मीडिया के सामने दे रहे थे। प्रधानमंत्री ने एक शेर सुनाकर अपनी मजबूरी भी जनता के सामने पेश कर दी कि विपक्ष कितना ही हल्ला मचा ले...वे नहीं बोलने वाले....ऐसा लगता हो जैसे बोलने की मनाही है हमारे प्रधानमंत्री को अब कौन मना करता होगा...ये यहां लिखने की जरूरत मैं नहीं समझता। खैर ये तो रही हमारे मजबूर और कमजोर प्रधानमंत्री (कोयला घोटाले के बाद तो यही लगता है) की...कोयला घोटाले पर हल्ला मचाने वाली भाजपा भी इस मुद्दे पर दूध की धुली नहीं प्रतीत होती है। भाजपा शासित राज्यों के तत्कालीन मुख्यमंत्रियों पर भी प्रधानमंत्री को खत लिखकर कोल ब्लॉक की नीलामी न करने का अनुरोध करने के आरोप लग रहे हैं...सोमवार को भोपाल में तो बकायदा कांग्रेसियों ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए मुख्यमंत्री के इस्तीफे तक की मांग कर डाली...यानि जो तीर भाजपा ने केन्द्र सरकार पर चलाया है...इसके जवाब में भाजपा शासित मुख्यमंत्रियों को भी ऐसे ही तीर का सामना करना पड रहा है। रविवार को टीम केजरीवाल ने भी भाजपा पर कोयला घोटाले में शामिल होने का आरोप लगाकर उसे भी कांग्रेस की पंक्ति में खड़ा करने का प्रयास किया था। प्रधानमंत्री तो अपने बयान और विशेष हिंदी के शेर से सरकार की सफाई तो पेश नही कर पाए उल्टा अपने ऊपर ही सवाल खड़े कर अपनी ही पोल खोलकर चल दिए हैं...लेकिन अब सवाल ये है कि कोयले के मुद्दे पर सरकार को घेरने के साथ ही इस मुद्दे को लेकर संसद ठप करने वाली भाजपा अपने पर लगे इन आरोपों से खुद को पाक साफ कैसे साबित करती है।

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रविवार, 26 अगस्त 2012

अन्ना की छाया बनी केजरीवाल की छटपटाहट !


अन्ना की छाया बनी केजरीवाल की छटपटाहट !

जंतर मंतर पर सफेद टोपी पहने लोगों को हुजूम...जिस सफेद टोपी पर 25 दिन पहले तक लिखा होता था मैं अन्ना हूं...उसी टोपी पर जब निगाह पड़ी तो मैं और हूं तो था...पर मैं औऱ हूं के बीच में ढाई शब्दों की बजाए पांच शब्द नजर आए। टोपी पर मैं और हूं के बीच में अन्ना की जगह लिखा था केजरीवाल...मैं केजरीवाल हूं। ये वही केजरीवाल हैं जो खुद कल तक अन्ना की टोपी लगाकर घूमा करते थे...लेकिन अब ये वो केजरीवाल नहीं हैं...अब शायद ये चाहते हैं अन्ना के परछाई से बाहर निकलकर अपनी ऐसी काया बनाई जाए जो दूसरों को परछाई दे सके। जंतर मंतर पर 3 अगस्त 2012 को टीम अन्ना का आंदोलन जब चुनावी विकल्प के एलान के साथ समाप्त हुआ था उसके बाद से ही अन्ना हजारे और उनके सहयोगी सुर्खियों से उतर गए थे। इसके ठीक बाद 9 अगस्त 2012 को बाबा रामदेव ने दिल्ली के रामलीला मैदान में सरकार के खिलाफ ताल ठोक दी तो मीडिया जगत की सुर्खियों में छाने के साथ ही सरकार की सबसे बड़ी परेशानी का सबब भी बाबा बन गए...और आखिरकार 14 अगस्त को बाबा ने अपना अनशन खत्म किया। इस आंदोलन ने टीम अन्ना के आंदोलन की चमक फीकी कर दी थी...ऐसे में अरविंद केजरीवाल एंड टीम को शायद ये समझ में आ गया था कि जनता की निगाहों में चढ़े रहना है तो सुर्खियां तो बटोरनी ही होंगी...क्योंकि हिंदुस्तान की जनता की याददाश्त बहुत कमजोर है...या यूं कहें कि जनता को शार्ट टर्म मेमोरी लॉस की बीमारी है...जिसके चलते ये बहुत जल्दी चीजों को भूल जाती है और गलती करने वाले को जल्दी ही माफ भी कर देती है...ऐसा न होता तो सत्ता से बेदखल होने के बाद बार – बार भ्रष्टाचारी सत्ता में काबिज ही न होते। खैर इस केजरीवाल एंड टीम ने कोयला घोटाले को हथियार बनाकर सरकार को घेरने की रणनीति बनाई और दिल्ली पुलिस को छकाते हुए ये लोग अपने मंसूबों में कामयाब भी रहे...साथ ही केजरीवाल ने इस बहाने सरकार को अपनी ताकत का एहसास भी करा दिया कि अन्ना हजारे इस प्रदर्शन में साथ नहीं है तो क्या फिर भी लोग हमारे साथ हैं...औऱ कुछ हद तक इससे केजरीवाल अन्ना की परछाई से बाहर झांकने में कामयाब भी हुए हैं। केजरीवाल एक अच्छे मकसद के लिए लड़ रहे हैं...और अब वो इस लड़ाई को राजनीति के मैदान में उतरकर ही लड़ेंगे...जो केजरीवाल के लिए आसान तो बिल्कुल नहीं होगा...क्योंकि केजरीवाल अन्ना की परछाई से बाहर झांकने में तो कामयाब रहे हैं...लेकिन अन्ना की तरह लाखों – करोड़ों लोगों के लिए एक ऐसी काया बनना जो उनको परछाई दे सके...केजरीवाल के लिए मुश्किल भरा और सालों लंबा रास्ता भी है। इस काया को पाने के लिए जब अन्ना जैसे व्यक्तित्व को करीब 30 से 40 साल का वक्त लग गया तो केजरीवाल तो अभी उनका अंश मात्र भी नहीं हैं। वो भी ऐसे वक्त में जब उनके सहयोगियों से उनके विचार उनकी भाननाएं मेल नहीं खा रही हैं। यहां बात हो रही है इंडिया अगेंस्ट करप्शन की प्रमुख सदस्य किरण बेदी की...जो आईएसी की नींव का मजबूत हिस्सा भी हैं। लेकिन भाजपा के विरोध के मुद्दे पर केजरीवाल और बेदी की सोच अलग – अलग प्रतीत होती है। केजरीवाल सबको भ्रष्ट मानकर उनका विरोध करने की बात करते हैं तो किरण बेदी इससे इत्तेफाक नहीं रखती। उनकी नजर में भाजपा का विरोध करना ठीक नहीं है क्योंकि भाजपा सत्ता में नहीं है। ये मतभेद आगे चलकर गहरा जाते हैं और केजरीवाल के साथ बेदी की जुगलबंदी अगर टूटती है तो इसका सीधा असर आईसीए के साथ ही केजरीवाल की क्रेडिबीलिटी पर पड़ेगा और लोगों का विश्वास उन पर कम हो सकता है...जिसका सीधा असर उनके आंदोलन पर पड़ेगा। बहरहाल ये तो भविष्य के गर्भ में है...लेकिन जो वर्तमान में है उसकी अगर बात करें तो पीएम मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के आवास के घेराव के बाद केजरीवाल अपने मकसद के पूरा होने की बात करते हैं...ऐसे मे सवाल ये उठता है कि आखिर केजरीवाल का समर्थकों संग घेराव का मकसद था क्या...? ऐसा तो नहीं कि केजरीवाल को लगता हो कि अगस्त 2011 में और 25 जुलाई 2012 से 3 अगस्त 2012 तक जंतर मंतर पर अन्ना हजारे के साथ मिलकर भ्रष्टाचार से घिरी सरकार और भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ जो माहौल देशभर में टीम अन्ना ने तैयार किया कहीं उसका फायदा कोई और या यूं कहें मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा उठा ले जाए...और शायद इसी वजह से पीएम औऱ सोनिया के आवास के साथ ही आईएसी ने विपक्षी पार्टी के अध्यक्ष के निवास का घेराव कर जनता को ये संदेश देने की कोशिश की...कि भाजपा भी दूध की धुली नहीं है और भाजपा के नेता भी भ्रष्टाचार के समुद्र में गोते लगा रहे हैं...लिहाजा कांग्रेस का विकल्प भाजपा तो नहीं हो सकती। केजरीवाल अगर ऐसा सोचते हैं तो आईएसी के इस घेराव से जहां कांग्रेस को फायदा मिलता दिखाई दे रहा है वहीं भाजपा को इससे नुकसान ही हुआ है। कांग्रेस को फायदा इसलिए भी हुआ है क्योंकि कांग्रेस तो पहले से ही भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी है और ताजा कोयला घोटाले में भाजपा ने उसकी नाक में दम कर रखा था...ऐसे में कोयला घोटाले पर आईएसी का कांग्रेस के साथ ही भाजपा का भी विरोध करने और कोयला घोटाले में भाजपा के भी शामिल होने के आरोप लगाने पर कांग्रेस ने राहत की सांस ली होगी...जबकि भाजपा को इन आरोपों पर सफाई देनी पड़ सकती है।

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शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

मध्यावधि चुनाव चाहती है भाजपा !



कैग ने संसद में कोयला आवंटन पर रिपोर्ट क्या पेश की बवाल मच गया। रिपोर्ट पेश होने के बाद चार दिनों में प्रधानमंत्री के इस्तीफे को लेकर विपक्ष के हंगामे के चलते संसद 4 मिनट भी नहीं चली और विपक्ष के हंगामे के चलते सदन की कार्यवाही चार दिन तक लगातार स्थगित होती रही। सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या सिर्फ हंगामा करने से किसी चीज का समाधन निकल सकता है...जाहिर है नहीं लेकिन इसके बाद भी भाजपा ने लगातार हंगामा कर सदन को नहीं चलने दिया। ये बात भाजपा भी अच्छी तरह से जानती है कि पीएम इस मामले पर किसी भी सूरत में इस्तीफा नहीं देने वाले...क्योंकि प्रधानमंत्री अगर इस्तीफा देते हैं तो ये सीधे तौर पर सरकार की हार होगी...प्रधानमंत्री की हार होगी...और ये मान लिया जाएगा कि कोयला घोटाले में सरकारी खजाने को 1 लाख 86 हजार करोड़ रूपये का नुकसान जानबूझकर पहुंचाया गया...और क्योंकि उस समय कोयला मंत्रालय खुद प्रधानमंत्री के पास था तो इसके लिए प्रधानमंत्री भी जिम्मेदार हैं...ऐसे में सरकार इस मुद्दे पर बहस के लिए तैयार होने की बात कर रही है...लेकिन भाजपा इस्तीफे की अपनी मांग पर अड़ी हुई है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस बहस के लिए इसलिए भी तैयार हो गयी है कि क्योंकि कांग्रेस चाहती है कि अगर हार हो तो बिना लड़े क्यों हारें...कम से कम संसद में बहस के बहाने लड़ाई तो लड़ी ही जा सकती है...और विपक्ष के सवालों में सरकार न उलझी तो जीतने का एक मौका तो रहेगा ही...लेकिन बिना बहस के ही प्रधानमंत्री इस्तीफा दें दें...तो फिर ये एक तरह से साबित भी हो जाएगा कि कोयले में दलाली तो हुई ही है। भाजपा भी चाहे तो प्रधानमंत्री के इस्तीफे की जिद छोड़ कर बहस में हिस्सा लेकर सरकार को घेर सकती है...हो सकता है कि बहस के दौरान इस मामले की ऐसी कई बारीकियां निकल कर सामने आ जाएं...जो उनके सवालों को और पैना कर दे...और सरकार घिर जाए...लेकिन यहां पर ऐसा लगता है कि भाजपा अंदरखाने कुछ और ही रणनीति पर काम कर रही है। इसको इस तरह से भी देख सकते हैं कि बीते कुछ महीने से लगातार जिस तरह से जंतर मंतर पर लोकपाल को लेकर टीम अन्ना ने आंदोलन किया...उसके बाद 09 अगस्त से दिल्ली के रामलीला मैदान में रामदेव ने लोकपाल, कालाधन वापस लाने और सीबीआई की स्वायत्तता को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला...उसके बाद से ही देशभर में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक माहौल बना हुआ है...औऱ इन दोनों आंदोलनों में जनता की भागीदारी ने इस बात को पुख्ता भी किया है। लोगों ने खुलकर इन आंदोलनों में हिस्सा लिया जो कहीं न कहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों का जनाक्रोश था। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने तो रामदेव के मंच पर जाकर आंदोलन का खुलकर समर्थन भी किया था। भाजपा ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बने माहौल को कहीं न कहीं भांप लिया है और ऐसे वक्त पर भाजपा के हाथ ये मुद्दा भी लगा है...तो भाजपा शायद यही चाहती है कि मौका देख कर चौका मार दिया जाए...यानि सरकार को इस मुद्दे पर घेरकर पूरी तरह बैकफुट पर लाया जाए...और ऐसी स्थिति उत्पन्न की जाए ताकि देश में मध्यावधि चुनाव की नौबत आ जाए...और लोगों के बीच यूपीए सरकार के घोटालों का ढिंढ़ोरा पीट पीटकर सत्ता की चाबी हथिया ली जाए। भाजपा को ये लगता है कि अगर ऐसा होता है तो उसके लिए केन्द्र की सत्ता में लौटना का इससे सुनहरा अवसर दूसरा नहीं हो सकता। इसके अलावा कोई दूसरा कारण भाजपा की इस बालहठ के पीछे फिलहाल तो नजर नहीं आ रहा है...क्योंकि भाजपा ये भी अच्छी तरह से जानती है कि संसद में हंगामे के कारण रोजाना करोड़ों रूपये फिजूल बर्बाद हो रहे हैं। संसद की कार्यवाही के दौरान बात करें तो प्रति मिनट 26 हजार रूपये का खर्च आता है...जबकि प्रति घंटा ये खर्च 22 लाख रूपये है...और पूरे दिन का खर्च 7.8 करोड़ रूपये है। यानि कि चार दिनों तक जो संसद की कार्यवाही हंगामे की भेंट चढ़ी उसमें तकरीबन 15 करोड़ रूपये बर्बाद हुए। सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलती तो जनकल्याण की कई योजनाओं पर चर्चा हो सकती थी...जन कल्याण से जुड़े कई बिल पास हो सकते थे...लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ...क्योंकि हमारे देश के राजनेताओं को जनता के हितों से शायद कोई सरोकार नहीं है। सरोकार होता तो शायद कोयला आवंटन में घोटाला ही न होता...इससे पहले के कई घोटाले ही नहीं होते...और संसद की कार्यवाही हंगामे की भेंट नहीं चढ़ती। उम्मीद करते हैं हमारे राजनेता अपने राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर जनता के हितों की बात करेंगे...जनकल्याण के लिए काम करेंगे...ताकि लोगों का विकास हो देश का विकास हो।  

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आरक्षण - सड़क से संसद तक



प्रमोशन में आरक्षण को लेकर घमासान जारी है...सड़क से लेकर संसद तक हर तरफ आरक्षण को लेकर बवाल मचा है। मायावती को इससे कुछ ज्यादा ही प्यार है...हो भी क्यों न भई आखिर माया की राजनीति भी तो आज तक इसी के सहारे परवान चढ़ती आयी है। अब 2007 की ही बात कर लेते हैं...उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के नतीजे आये तो शायद ही मायावती ने सोचा होगा कि उनका हाथी विधानसभा की दो तिहाई सीटों पर कब्जा कर लेगा। अब भला क्यों माया आरक्षण को लेकर हो हल्ला न मचाए...अभी तो बहुत साल राजनीति करनी है इन्हें। ये हाल सिर्फ मायावती का नहीं बल्कि देश के तमाम राजनीतिक दलों के नेताओँ को भी यही हाल है...वे भी अपनी अपनी सहूलियत के हिसाब से अपने अपने वर्ग के लोगों के लिए आरक्षण की बात करते आये हैं। चलिए ये तो थी माया औऱ दूसरे राजनेताओं की बात जो अपनी राजनीति चमकाने के लिए आरक्षण के जिन्न को समय समय पर बोतल से बाहर निकालने से गुरेज नहीं करते। आप ही सोचिए क्या वाकई में सरकारी नौकरी में आरक्षण के बाद प्रमोशन में भी किसी वर्ग विशेष के लिए आरक्षण जायज है। क्यों नहीं योग्यता का पैमाना ही यहां पर उपयोग किया जाए। लेकिन अफसोस ऐसा है नहीं...जाति धर्म के आधार पर राजनीति करने वाले सरकार चला रहे हमारे राजनेताओं को तो अपने वोट बैंक को साधना है...ऐसे में वे ये कैसे होने देते...नौकरी में प्रमोशन के लिए सत्ता पर बैठे इन लोगों ने आरक्षण लागू कर दिया। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने इसे अनुचित ठहराते हुए इस पर रोक तो लगा दी...लेकिन इसके बाद भी हमारे नेतागण हर इस जुगत में लगे हैं कि प्रमोशन में आरक्षण बहाल करने के लिए संविधन संशोधन विधेयक पास हो जाए। हालांकि कांग्रेस पहले ही इसके पक्ष में दिखाई दी जब 9 अगस्त 2012 को सरकार ने सदन में जोरदार हंगामे के बाद इस विधेयक को सदन में पेश करने की बात कही। हालांकि विधेयक रखे जाने से पहले प्रधानमंत्री ने अपने निवास पर 21 अगस्त 2012 को इस पर आम सहमति के लिए सर्वदलीय बैठ भी बुलाई...लेकिन ये बैठक भी बेनतीजा ही समाप्त हुई। सपा नेताओं के संविधान संशोधन विधेयक का पुरजोर विरोध करने के बाद सरकार ने 22 अगस्त को सदन में संविधान संशोधन विधेयक पेश करने की योजना टाल दी। हालांकि सरकार ने अपनी मंशा तो जाहिर कर ही दी है कि वो देर सबेर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए संविधान संशोधन विधेयक लेकर आएगी...यानि की प्रमोशन में आरक्षण सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ फिर से लागू हो जाएगा। अगर ऐसा होता है तो इस मुद्दे को लेकर दो गुटों  में बंटे सरकारी कर्मचारी कैसे एक दफ्तर में एक छत के नीचे साथ काम कर पाएंगे...वो भी उस स्थिति में जब एक कर्मचारी का जूनियर उसका सीनियर हो चुका होगा...या हो जाएगा...जाहिर है इससे कर्मचारियों में कुंठा आएगी...औऱ वो अपना सौ प्रतिशत नहीं दे पाएंगे...जो वैसे भी ज्यादातर सरकारी कर्मचारी नहीं देते हैं। खैर ये तो प्रमोशन में आरक्षण लागू होने के बाद की बात है...लेकिन इसको लागू करवाने में सरकार के सामने भी मुश्किलें बहुत हैं। मनमोहन सरकार कभी नहीं चाहेगी कि सपा की नाराजगी दूर किए बगैर वो संविधान संशोधन विधेयक सदन में पेश करे...औऱ सरकार की पूरी कोशिश विधेयक को पेश करने से पहले सपा को मनाने की भी होगी। साथ ही सरकार के सामने सबसे बड़ी और मुश्किल चुनौती सरकारी कर्मचारियों का वो बड़ा गुट है जो लगातार प्रमोशन में आरक्षण का विरोध कर रहा है। इस गुट ने साफ भी कर दिया है कि अगर प्रमोशन में आरक्षण लागू होता है तो वो बिना सूचना के अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले जाएंगे। अब सरकार अगर प्रमोशन में आऱक्षण लागू करने के लिए संविधान संशोधन विधेयक पेश करती है तो सरकार को सरकारी कर्मचारियों के इस गुट की नाराजगी झेलनी पड़ेगी जो सरकार को 2014 के आम चुनाव में भारी पड़ सकती है। ऐसे में सरकार भले ही बिल को लेकर अपनी मंशा जाहिर कर चुकी हो...लेकिन अंदरखाने इसको लेकर चिंतन जरूर चल रहा है कि आखिर वो करे तो क्या करे। बहरहाल सड़क से लेकर संसद तक जारी इस लड़ाई में किसके चेहरे पर खुशी झलकेगी और किसके चेहरे पर नाराजगी ये तो वक्त ही बताएगा...फिलहाल प्रमोशन में आरक्षण के जिन्न ने सबकी नींद जरूर उड़ाकर रखी है।

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सोमवार, 13 अगस्त 2012

जो टिकट खरीदता है...लाटरी भी उसी की खुलती है।


जो टिकट खरीदता है...लाटरी भी उसी की खुलती है।

शीर्षक थोड़ा अजीब है...जो लाटरी खरीदता है...लाटरी भी उसी की खुलती है...लेकिन मसला ही कुछ ऐसा है कि शायद लाटरी के माध्यम से ये बात आसानी से समझ में आ जाए। दरअसल मुद्दा है आंदोलन का...बात 1974 में सत्ता पलट देने वाले भ्रष्टाचार, बदहाल शिक्षा, बेरजगारी और महंगाई के खिलाफ जेपी के आंदोलन की नहीं...लोकपाल को लेकर अन्ना हजारे के आंदोलन की भी नहीं...और न ही विदेशी बैंकों में जमा कालाधन वापस लाने को लेकर बाबा रामदेव के आंदोलन की है...लेकिन हम जब आगे बढ़ेंगे तो निश्चित ही 74 के जेपी के आंदोलन और हाल ही में जंतर मंतर पर हुए टीम अन्ना के आंदोलन के साथ ही बाबा रामदेव के आंदोलन का जिक्र इसमें जरूर आएगा। दरअसल बात है कि क्या जब किसी चीज की अति हो जाए तो उसके लिए आंदोलन की जरूरत है...और आंदोलन का कितना असर होता है...क्या वाकई में आंदोलन अपने मुकाम पर आसानी से पहुंचता है। हिंदुस्तान के परिपेक्ष्य में अगर बात करें तो भ्रष्टाचार अपने चरम पर है...ऐसा कोई दिन नहीं बीतता...जिस दिन टीवी चैनल पर या अख़बार में किसी न किसी घोटाले की खबर न आती होया छपती हो...गाहे – बगाहे इनमें लिप्त लोगों को सालों के बाद सजा भी होने की खबरें आती हैं...लेकिन इसके बाद भी ये सिलसिला रूकने की बजाए बढ़ता जा रहा है। शोषण जनता का होता है...और जनता के पैसे से भ्रष्ट कर्मचारी, अफसर और राजनेता ऐश करते हैं...इसके बाद भी जनता चुप रहती है...चुपचाप सब कुछ सहती है...या यूं कहें कि ये उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है कि उन्हें सरकारी दफ्तर में अपने छोटे से लेकर बड़े काम तक के लिए रिश्वत देनी पड़ती है...ऐसा भी कह सकते हैं कि लोगों ने इसे अपने दिलो दिमाग में बैठा लिया है...और उन्हें भी ये आसान तरीका लगता है कि ऐसे ही सही उनका काम हो गया...और लोग बजाए भ्रष्टाचार के इस बात की चर्चा करते दिखाई दे जाते हैं कि मैंने तो फलां काम सिर्फ 500 या 1000 रूपए की रिश्वत देकर करा लिया...जबकि सामने वाले उस काम के लिए 3000 से 4000 रूपए मांग रहा था...यहां ये स्थिति होता है कि लोग सोचते हैं कि उन्होंने अपने 2500 से 3000 रूपए बचा लिया। इसमें इनका भी कोई दोष नहीं है, दरअसल स्थिति है ही ऐसी की अगर बिना रिश्वत दिए वे अपना काम करवाना चाहें तो उसमें तमाम तरह की आपत्तियां लगा दी जाती हैं...और उस काम को होने में महीनों और कई बार सालों लग जाते हैं...ऐसे में लोगों को लगता है कि कुछ पैसे देकर अपना काम करवा लेना एक आसान विकल्प है। लेकिन उनका ये आसान विकल्प भ्रष्ट कर्मचारियों, अफसरों और नेताओँ के लिए हथियार बन जाता है और वे इसे अपनी ताकत समझने लगे हैं। और जब ये ताकत उनकी आदत में शुमार हो जाती है तो अति होना लाजिमी है। बात ऐसी ही किसी अति के खिलाफ आंदोलन की जरूरत पर हो रही थी...लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आंदोलन की शुरूआत कौन करे...कौन भ्रष्टाचार से मुक्ति पाने के लिए आंदोलन की बिगुल बजाए। असल जिंदगी में लोग अपनी दो वक्त की रोटी जुगाड़ने में ही इतने व्यस्त रहते हैं कि अगर किसी दिन काम पर न जाएं तो शायद उस दिन घर में चूल्हा न जले...ये हकीकत है उन करोड़ों परिवारों की जो गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं...और जिनके लिए रोज कुंआ खोद कर पानी पीना उनकी मजबूरी है। लेकिन सवाल ये भी है कि अगर आंदोलन की बिगुल नहीं बजेगा तो कैसे कुंभकर्णी सरकार की नींद टूटेगी। आंदोलन की जरूरत भी है...और इसका बिगुल बजाने की भी...क्योंकि जैसा कि शीर्षक है कि अगर आपको लाटरी जीतनी है तो लाटरी का टिकट तो खरीदना ही पड़ेगा...यानि बदलाव लाना है...भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए सरकार को जगाना है तो आंदोलन तो करना ही होगा...जब आंदोलन होगा तो निश्चित ही भ्रष्टाचार से त्रस्त लोग आंदोलन से जुड़ेंगे...भले ही वो समय न दे पाएं...इतिहास गवाह है ऐसे आंदोलन को भारी जनसमर्थन मिलता आया है...1974 में भ्रष्टाचार, बदहाल शिक्षा, महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ जय प्रकाश नारायण ने आंदोलन का बिगुल बजाया था तो आंदोलन के समर्थन में सड़कों पर हुजूम उमड़ पड़ता था...गली नुक्कड़ों में पटना के प्रसिद्ध कवि सत्यनारायण अपनी कविताओँ से शब्द गर्जना करते थे तो लोगों को जोश ए जुनून आसामन को छूने लगता था...सत्यनारायण कहते थे...
जुल्म का चक्कर और तबाही कितने दिन...हम पर तुम और सर्द स्याही कितने दिन...ये गोली, बंदूक, सिपाही कितने दिन...सच कहने की मनाही कहो कितने दिन, कितने दिन
जेपी के उस आंदोलन ने सत्ता पलट दी थी...जेपी ने उस आंदोलन की नींव रखी थी...या यूं कहें कि लाटरी का टिकट खरीदा था...अगर जेपी आंदोलन रूपी लाटरी का टिकट नहीं खरीदते तो शायद आज इस लेख में 1974 के जेपी आंदोलन का जिक्र मैं नहीं कर रहा होता...ये अलग बात है कि जेपी के सफल आंदोलन के नतीजे जरूर विफल रहे...लेकिन जेपी ने इसकी शुरूआत तो की ही। ठीक इसी तरह अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए लोकपाल की वकालत करते हुए आंदोलन किया...और बाबा रामदेव ने विदेशी बैंकों में जमा कालाधन वापस लाने के लिए आंदोलन का शंखनाद किया...यहां भी हमें देखने को मिला कि इन दोनों आंदोलनों को भारी जनसमर्थन मिला...यानि लोग भ्रष्टाचार से त्रस्त हैं...इसलिए लोगों ने बढ़चढ़कर आंदोलनों में भाग लिया...परिणाम भले ही कुछ भी हों...इसके पीछे की उनकी मंशा कुछ भी रही हो...लेकिन अन्ना हजारे और बाबा रामदेव ने लाटरी का टिकट खरीदने की हिम्मत तो जुटायी...अब लाटरी खुले या न खुले ये अलग बात है...लेकिन आप इस बात को नहीं झुठला सकते कि जो लाटरी का टिकट खरीदता है...लाटरी उसी की निकलती है। इसलिए कुछ करने की ईच्छा है...कुछ करने का मन है तो परिणाम की मत सोचिए...लाटरी का टिकट जरूर खरीदें...वरना आपकी स्थिति भी वैसी ही हो जाएगी जैसी कि जो किस्सा मैं नीचे सुनाने जा रहा हूं...उसमे मंदिर के पुजारी की हुई थी।
एक मंदिर का पुजारी जिसने अपना पूरा जीवन प्रभु की भक्ति में गुजार दिया...एक दिन भगवान की मूर्ति के सामने खड़ा होकर बोला...हे प्रभु – मैंने जीवन में आज तक आपसे कुछ नहीं मांगा...सदा आपकी तन मन से सेवा की...बस मुझ पर एक कृपा कीजिए और मेरी एक दस लाख की लाटरी खुलवा दीजिए...ये कहकर पुजारी घर चले गए...पुजारी रोज आते...रोज प्रभु से प्रार्थना करते लेकिन पुजारी की लाटरी नहीं खुली...इस तरह जब 2 माह बीत गए...तो एक दिन पुजारी ने गुस्से में प्रभु से कहा – प्रभु मैंने आपकी भक्ति में कोई कमी नहीं छोड़ी...दिन रात आपकी भक्ति की...फिर भी आपने मेरी विनती नहीं सुनी और मेरी लाटरी नहीं खुली। पुजारी के सामने अचानक भगवान प्रकट होते हैं...और पुजारी से कहते हैं...वत्स पहले जाकर लाटरी का टिकट तो खरीद लो

दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com

गुरुवार, 9 अगस्त 2012

‘रामलीला’ में महाभारत


रामलीला में महाभारत

भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के अधूरे आंदोलन और चुनावी विकल्प देने के टीम अन्ना के फैसले का जनता ने स्वागत भी किया तो इसका विरोध भी हुआ...ऐसे में लोगों की निगाहें रामदेव के आंदोलन की तरफ भी थी। 9 अगस्त की सुबह से ही रामलीला मैदान में समर्थकों का रैला लगा हुआ था...और हर कोई रामदेव के पहुंचने के इंतजार में था। सबको उममीद थी कि रामदेव आएंगे तो आंदोलन की दिशा और इस लड़ाई की रणनीति पर से पर्दा उठाएंगे...तय कार्यक्रम के तहत रामदेव ने दिल्ली के रामलीला मैदान से आंदोलन का शंखनाद भी किया...लेकिन सरकार के प्रति रामदेव के ढीले तेवर और तीन दिन के सांकेतिक अनशन के एलान ने रामदेव के उन दावों की हवा निकाल दी...जो वे आंदोलन से पहले तक या यूं कहे जून 2011 में रामलीला मैदान में दिल्ली पुलिस की रावणलीला के बाद से ही वे करते आए थे...कि अबकी लड़ाई आर पार की लड़ाई होगी। रामदेव का ईरादा आर पार की लड़ाई का रहा भी हो तो शायद अन्ना के आंदोलन के हश्र से रामदेव ने सबक जरूर लिया होगा। रामदेव को इस बात को अंदेशा हो गया होगा कि अन्ना के आंदोलन की तरह केन्द्र सरकार ने उनके आंदोलन को भी नजरअंदाज कर दिया तो आर पार की लड़ाई का ऐलान कहीं उनके ही गले की हड्डी न बन जाए...जो न तो उगलते बने और न ही निगलते। अब रामदेव तीन दिन के अनशन की बात कर रहे हैं...औऱ सरकार को भी उन्होंने अपनी मांगों पर विचार के लिए इतने ही दिन का समय दिया है...लेकिन जो सरकार जंतर मंतर पर टीम अन्ना के 10 दिन के आंदोलन से नहीं डिगी...उनके लिए रामलीला मैदान में तीन दिन का आंदोलन क्या चीज है...इसका अंदाजा आंदोलन की शुरूआत के साथ ही उस वक्त हो गया था...जब आंदोलन शुरू होने के कुछ ही देर बाद केन्द्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद का बयान आता है कि रामलीला तो हर साल होती है...बस किरदार बदल जाते हैं...खुर्शीद का ये बयान तीखे कटाक्ष के साथ ही सीधा ईशारा था रामदेव के लिए कि आप कितना भी हो हल्ला मचा लो...सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। हालांकि हरिद्वार से सांसद और केन्द्रीय संसदीय कार्य राज्यमंत्री हरीश रावत ने ये जरूर कहा कि बातचीत के रास्ते खुले हैं...लेकिन यहां रामदेव दो कदम आगे निकल गए और हरीश रावत से कह दिया कि सोनिया गांधी से कह दो कि बातचीत के द्वार तो हमारे भी खुले हैं...हम तो आए ही हरिद्वार से हैं। बातचीत के लिए रामदेव भी तैयार हैं और सरकार भी...लेकिन यहां पर बड़ा सवाल ये है कि आखिर पहल कौन करे...बहरहाल रामदेव ने तीन दिन का वक्त सरकार को देने के साथ ही अपने आंदोलन के लिए यह कहकर आगे का रास्ता खुला रखा कि आंदोलन की आगे की रणनीति का खुलासा वे 12 अगस्त को करेंगे...यानि की अगर सरकार इन तीन दिनों में उनकी मुख्य मांग...कालाधन वापस लाने, मजबूत लोकपाल लाने और सीबाआई की स्वायत्तता पर संजीदगी से विचार नहीं करती तो आंदोलन का बिगुल वे बजाते रहेंगे। हालात तो इसी ओऱ ईशारा कर रहे हैं कि रामदेव के आंदोलन में भले ही लोगों का भारी जनसमूह उमड़ रहा हो लेकिन सरकार किसी भी हालत में किसी भी तरह की बातचीत के मूड में नहीं दिख रही...ऐसे में रामलीला मैदान के बाद रामदेव के आंदोलन का अगला पड़ाव क्या होगा और किस रूप में होगा ये देखना रोचक होगा।

दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com


गुरुवार, 2 अगस्त 2012

अन्ना, जनलोकपाल और राजनीति !



भ्रष्टाचार के खिलाफ एक और लड़ाई का अधूरा अंत हो गया...हालांकि इस लड़ाई के नायक अन्ना हजारे कहते हैं कि राजनीति से गंदगी को हटाना है तो राजनीति में ही जाना होगा...या यूं उऩकी बात को समझ लें कि अच्छे लोगों को चुनने का विकल्प जनता के सामने लाना होगा...लेकिन अन्ना ये क्यों भूल गए कि जिस विकल्प की वे बात कर रहे हैं...उसे सामने लाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है...वो भी इतने कम समय में जब डेढ़ साल बाद देश में आम चुनाव होने हैं। माना वो इस चुनौती को पार पा भी लेते हैं तो उससे भी बड़ा सवाल ये है कि उस अलोकप्रिय विकल्प (उम्मीदवार) पर उस क्षेत्र की जनता क्यों भरोसा करेगी...क्यों उसे वोट देकर संसद भेजेगी। हां अन्ना की टीम के कुछ लोकप्रिय सदस्यों मसलन अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, मनीष सिसौदिया, कुमार विश्वास आदि भले ही अपनी लोकप्रियता को भुना भी ले जाते हैं तो क्या गारंटी है कि बाकी के अलोकप्रिय विकल्प लोगों के लिए वाकई में एक बेहतर विकल्प बन पाएंगे। ऐसी कई और चुनौतियां...जैसे चुनाव के लिए पैसे का इंतजाम, ग्रामसभा से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक अपने ईमानदार जुझारू कार्यकर्ताओं की टीम खड़ी करना आदि टीम अन्ना के सामने आएंगी अगर वे राजनीति में उतरने की बात को अमली जामा पहनाते हैं तो। खैर ये तो वो बातें है चुनौतियां हैं जो फिलहाल भविष्य के गर्भ में हैं...लेकिन सबसे बड़ा सवाल वर्तमान में ये है कि जंतर मंतर पर जनलोकपाल के न आने तक जान देने का दम भरने वाले अन्ना को आखिर ऐसी क्या आफत आन पड़ी कि बीच राह में आर पार की लड़ाई के आंदोलन से अन्ना को कदम पीछे खींचने पड़ गए। अन्ना के पैर पीछे खींचने से उनके समर्थकों के साथ ही भ्रष्टाचार के त्रस्त उन करोड़ों देशवासियों को भी झटका लगा है जिन्हें लगने लगा था कि अन्ना ही वो शख्स हैं जो भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए सरकार को जनलोकपाल लाने पर मजबूर कर सकते हैं। शायद आंदोलन के नौ दिन बाद भी सरकार की बेरूखी...जानबूझकर आंदोलन को नजरअंदाज करना और केजरीवाल, मनीष सिसौदिया और गोपाल राय की तबियत ज्यादा बिगड़ना भी इसकी बड़ी वजह हो सकता है...लेकिन आंदोलन से पहले टीम अन्ना ने हर स्थितियों पर मंथन कर कोई वैकल्पिक योजना तैयार की होती तो शायद ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं होती। आंदोलन खत्म करने का अन्ना का ये कदम जहां उनके समर्थकों के साथ ही भ्रष्टाचार से त्रस्त हर उस देशवासी को हैरान और निराश करने वाला है...वहीं केन्द्र सरकार को तो मानो मुंह मांगी मुराद मिल गयी हो। अन्ना के मंच से अनशन समाप्त करने की घोषणा करने के बाद कांग्रेस नेताओं को प्रतिक्रिया से इस बात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि अनशन के खत्म होने का वे कितनी बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। जंतर मंतर से शुरू हुई इस अधूरी लड़ाई को अन्ना दूसरे रूप(राजनीति) में जारी रखने की बात तो कर रहे हैं...लेकिन इस लड़ाई को उसके अंजाम तक पहुंचाना आसान तो बिल्कुल भी नजर नहीं आता। लड़ाई का ये दूसरा रूप कीचड़ का वो दलदल है जहां इंसान भले ही कितना भी कुशल खिलाड़ी क्यों न हो अपने आप को लाख कोशिशों के बाद भी घुटने तक दलदल में डूबने से नहीं बचा पाता...टीम अन्ना को तो ऐसी खिलाड़ियों को खोजने के साथ ही उन्हें खेलना भी सिखाना है...वो भी बहुत कम समय में...जबकि दूसरी तरफ उनके सामने दलदल में पहले से ही बड़े बड़े सूरमा ताल ठोक कर बैठे हैं।












दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 1 अगस्त 2012

शिंदे...पावर और धमाका !



शिंदे...पावर और धमाका !

सुशील कुमार शिंदे का ओहदा जरूर बढ़ गया...लेकिन जिन हालात में शिंदे की ऊर्जा मंत्रालय से विदाई हुई...और गृह मंत्रालय में शिंदे का पहला दिन रहा...उसे शिंदे तो शायद ही कभी भूल पाएंगे। ऊर्जा मंत्रालय में आखिरी दिन पावर ग्रिड फेल होने से जब आधा भारत अंधेरे में डूब गया तो शिंदे के चेहरे की हवाईयां उड़ गयी थी...लेकिन ऊर्जा मंत्रालय के प्रमुख से जवाब तलब करने की बजाए हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह साहब ने शिंदे को गृह मंत्री बनाकर मानो शिंदे को इसका ईनाम दे दिया हो...कि शिंदे तुमने तो 24 घंटे में नार्दर्न, ईस्टर्न और नार्थ ईस्टर्न तीन ग्रिड को एकसाथ फेल कर वाकई में कमाल कर दिया। शिंदे जानते थे कि ग्रिड फेल होने पर जवाब तो देना ही पड़ेगा लिहाजा उन्होंने देर नहीं कि और अगले दिन सुबह ही गृह मंत्रालय पहुंचकर गृह मंत्री की कुर्सी संभाल ली...लेकिन शिंदे यहां भी नहीं बच पाए और पुणे में एक के बाद एक चार धमाकों ने रही सही कसर पूरी कर दी...अब जवाब तो देना ही था...पावर ग्रिड फेल होने पर मंत्रालय बदल जाने से वहां तो बच गए थे...लेकिन यहां नहीं बच पाए। कहने को उनके पास कुछ था भी नहीं सो जांच की बात कर बचने की कोशिश करते दिखाई दिए। बहरहाल जो भी हो पुणे में रमजान के माह में औऱ रक्षा बंधन से ठीक एक दिन पहले सीरियल ब्लास्ट ने एक बार फिर से खुफिया एजेंसियों के साथ ही सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल के रख दी है। आम आदमी कितना सुरक्षित है इसका अंदाजा महज इस बात से लगाया जा सकता है कि आतंकी आसानी से कहीं भी बम रख कर चले जाते हैं...और खुफिया एजेंसियों के साथ ही पुलिस प्रशासन धमाके के बाद हरकत में आते दिखाई देते हैं...हालांकि इस बार अच्छी खबर ये रही कि इन धमाकों में किसी की जान नहीं गयी...और न ही कोई गंभीर रूप से घायल हुआ है...लेकिन विडंबना ये भी है कि इस बात की खैर मनाकर कि कोई हताहत नहीं हुआ है...हमारी सरकार राहत की सांस लेती है...और जांच के बहाने ये मामले ठंडे बस्ते में चले जाते हैं....बजाए इसके की आगे से ऐसी घटनाएं न हो...दोषियों की गिरफ्तारी हो औऱ उन्हें सजा हो। चिदंबरम साहब के बाद शिंदे साहब ने गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली है तो उम्मीद शिंदे साहब से भी है कि आम नागरिक की सुरक्षा के साथ कम से कम खिलवाड़ न हो और ऐसी घटनाओं को कम से कम रोकने की पूरी कोशिश तो की ही जाए...लेकिन जिस तरह से शिंदे साहब का गृह मंत्रालय संभालते ही और उनके पुणे दौरे से ऐन पहले चार सीरियल बम ब्लास्ट से स्वागत हुआ है...उसके बाद शिंदे साहब के लिए आम भारतीय की सुरक्षा और ऐसी घटनाओं को होने से रोकना किसी मुश्किल चुनौती से कम नहीं है। हम तो बस यही दुआ कर सकते हैं कि आतंकी अपने नापाक ईरादों में कभी कामयाब न हों...और हिंदुस्तान में हर कोई बिना किसी डर के रह सके...बिना डर के कहीं भी आ जा सके...गुड लक शिंदे साहब गुड लक।  

दीपक तिवारी

deepaktiwari555@gmail.com

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

वो तेरे नसीब की बारिशें किसी और छत पर बरस ग

वो तेरे नसीब की बारिशें किसी और छत पर बरस गयी...जो तुझे मिला उसे याद रख...जो न मिला उसे भूल जा....प्रकाश पंत के लिए बहुगुणा का शेर...

नारायण दत्त तिवारी से खास बातचीत


नारायण दत्त तिवारी से खास बातचीत...तिवारी को भरोसा पूरे पांच साल चलेगी उत्तराखंड की बहुगुणा सरकार...

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

नक्सली, आदिवासी...जवान और सवाल ?


नक्सली, आदिवासी...जवान और सवाल ?

बीते हफ्ते छत्तीसगढ़ में मारे गए 19 लोग नक्सली थे या आम आदिवासी इसको लेकर विवाद गहराने लगा है...सीआरपीएफ की इस कार्रवाई पर कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं...जबकि राज्य सरकार के साथ ही सीआरपीएफ ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। अंग्रेजी के कई नामी अख़बारों के साथ ही बड़े समाचार चैनल भी जोर शोर से सीआरपीएफ की इस कार्रवाई पर सवाल तो खड़े कर रहे हैं...हो सकता है कि इन आरोपों में दम भी हो...और इसमें नक्सलियों के साथ ही कुछ आदिवासी भी मारे गए हों...लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में नक्सली उन आदिवासियों में से ही हैं...जो आम आदिवासियों की तरह जीवन व्यतीत करते हैं...और इस बात की किसी को कानों कान ख़बर तक नहीं होती कि ये आदिवासी ही असल में नकस्ली हैं। ये लोग इलाके में मौजूद पुलिस और सेना के जवानों की हर गतिविधी पर नज़र भी रखते हैं...और मौका मिलते ही उन्हें नुकसान पहुंचाने से भी नहीं चूकते हैं। बीते कुछ सालों में जवानों पर हुए नक्सली हमलों ने इस बात को और पुख्ता कर दिया है कि आदिवासियों के भेष में नक्सली गांवों में रह रहे हैं...औऱ जवानों के हर मूवमेंट पर वे नज़र भी रखते हैं। अप्रेल 2010 में दंतेवाड़ा में सीरपीएफ के 75 जवानों की मौत ने इस पर अपनी मुहर भी लगा दी थी कि नक्सलियों को जवानों की मूवमेंट की पूरी जानकारी थी और उन्होंने पूरी रणनीति के तहत सीआरपीएफ के जवानों में हमला कर 75 जवानों की जान ले ली। इसके बाद भी समय समय पर उन जगहों पर लैंड माइन से विस्फोट करना जहां से सीआरपीएफ जवानों का काफिला गुजरने वाला था...इस बात को साबित करने के लिए काफी है। लौटते हैं असल मुद्दे पर यानि बीते पखवाड़े मारे गए उन 19 लोगों पर जिस पर विवाद गहराने लगा है कि ये नक्सली थे कि आम आदिवासी। ये पहली बार नहीं हुआ है इससे पहले भी जब – जब नक्सली मारे गए हैं...सवाल खड़े किए जाते रहे हैं कि मारे गए लोग नक्सली नहीं थे...बल्कि आम आदिवासी थे...और देश के कुछ प्रतिष्ठित अंग्रेजी के अख़बार और कुछ बड़े समाचार चैनल बड़ी संजीदगी से इस मुद्दे तो हवा देते रहे हैं...और इसके साथ ही कुछ खास लोगों को प्रमोट करते रहे है। यहां पर इनका तर्क होता है कि वे लोग आम आदिवासी के साथ हो रहे जुल्म के खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं...लेकिन यहां पर ये चीज समझ में नहीं आती कि जब नक्सली हमले में हमारे देश के वो जवान शहीद होते हैं...जो अपने परिवार को छोड़ सैंकड़ों – हजारों किलोमीटर दूर घोर नक्सल इलाकों में अपनी जान हथेली पर रखकर नौकरी कर रहे होते हैं...जहां पर उन्हें खुद नहीं पता होता कि कब उनकी जीवन की डोर थम जाएगी...और ऐसा होता है तो उस समय ये नामी गिरामी अख़बार और समाचार चैनल कहां चले जाते हैं...उस समय तो ये सिर्फ इस खबर को एक बार छापकर-दिखाकर इतिश्री कर लेते हैं। नक्सली हमलों में शहीद हुए इन जवानों के परिवार की सुध लेने की फुर्सत इन अखबारों औऱ समाचार चैनलों के पास नहीं होती है...कि वे कैसे किस स्थिति में हैं...हां ये सब अगर इन जवानों की नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई में होता है...तो इसके उल्ट ग्राइंड जीरो से रिपोर्टिंग का ढोल पीट पीटकर ये इन जवानों पर निर्दोषों की हत्या का दोष मढ़ते नहीं थकते हैं। बहरहाल छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ की नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं...लेकिन इससे पहले जब – जब नक्सलियों के हमले में जवान शहीद होते रहे हैं...तब – तब सिर्फ शोक संवेदना व्यक्त कर इस सब को भुला दिया जाता है...ऐसा क्यों इसका जबाव शायद सीआऱपीएफ की कार्रवाई पर हमेशा ऐसे सवाल उठाने वालों के पास नहीं होगा। बहरहाल इसको लेकर बहस जारी है देखते हैं ये कहां जाकर थमती है।













दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com