गुरुवार, 12 जुलाई 2012
वो तेरे नसीब की बारिशें किसी और छत पर बरस ग
नारायण दत्त तिवारी से खास बातचीत
नारायण दत्त तिवारी से खास बातचीत...तिवारी को भरोसा पूरे पांच साल चलेगी उत्तराखंड की बहुगुणा सरकार...
मंगलवार, 3 जुलाई 2012
नक्सली, आदिवासी...जवान और सवाल ?
नक्सली, आदिवासी...जवान
और सवाल ?
बीते हफ्ते
छत्तीसगढ़ में मारे गए 19 लोग नक्सली थे या आम आदिवासी इसको लेकर विवाद गहराने लगा
है...सीआरपीएफ की इस कार्रवाई पर कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं...जबकि राज्य सरकार के
साथ ही सीआरपीएफ ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। अंग्रेजी के कई नामी
अख़बारों के साथ ही बड़े समाचार चैनल भी जोर शोर से सीआरपीएफ की इस कार्रवाई पर
सवाल तो खड़े कर रहे हैं...हो सकता है कि इन आरोपों में दम भी हो...और इसमें
नक्सलियों के साथ ही कुछ आदिवासी भी मारे गए हों...लेकिन इस बात से इंकार नहीं
किया जा सकता कि छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में नक्सली उन आदिवासियों में
से ही हैं...जो आम आदिवासियों की तरह जीवन व्यतीत करते हैं...और इस बात की किसी को
कानों कान ख़बर तक नहीं होती कि ये आदिवासी ही असल में नकस्ली हैं। ये लोग इलाके
में मौजूद पुलिस और सेना के जवानों की हर गतिविधी पर नज़र भी रखते हैं...और मौका
मिलते ही उन्हें नुकसान पहुंचाने से भी नहीं चूकते हैं। बीते कुछ सालों में जवानों
पर हुए नक्सली हमलों ने इस बात को और पुख्ता कर दिया है कि आदिवासियों के भेष में
नक्सली गांवों में रह रहे हैं...औऱ जवानों के हर मूवमेंट पर वे नज़र भी रखते हैं।
अप्रेल 2010 में दंतेवाड़ा में सीरपीएफ के 75 जवानों की मौत ने इस पर अपनी मुहर भी
लगा दी थी कि नक्सलियों को जवानों की मूवमेंट की पूरी जानकारी थी और उन्होंने पूरी
रणनीति के तहत सीआरपीएफ के जवानों में हमला कर 75 जवानों की जान ले ली। इसके बाद
भी समय समय पर उन जगहों पर लैंड माइन से विस्फोट करना जहां से सीआरपीएफ जवानों का
काफिला गुजरने वाला था...इस बात को साबित करने के लिए काफी है। लौटते हैं असल
मुद्दे पर यानि बीते पखवाड़े मारे गए उन 19 लोगों पर जिस पर विवाद गहराने लगा है
कि ये नक्सली थे कि आम आदिवासी। ये पहली बार नहीं हुआ है इससे पहले भी जब – जब
नक्सली मारे गए हैं...सवाल खड़े किए जाते रहे हैं कि मारे गए लोग नक्सली नहीं
थे...बल्कि आम आदिवासी थे...और देश के कुछ प्रतिष्ठित अंग्रेजी के अख़बार और कुछ
बड़े समाचार चैनल बड़ी संजीदगी से इस मुद्दे तो हवा देते रहे हैं...और इसके साथ ही
कुछ खास लोगों को प्रमोट करते रहे है। यहां पर इनका तर्क होता है कि वे लोग आम
आदिवासी के साथ हो रहे जुल्म के खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं...लेकिन यहां पर ये चीज
समझ में नहीं आती कि जब नक्सली हमले में हमारे देश के वो जवान शहीद होते हैं...जो
अपने परिवार को छोड़ सैंकड़ों – हजारों किलोमीटर दूर घोर नक्सल इलाकों में अपनी
जान हथेली पर रखकर नौकरी कर रहे होते हैं...जहां पर उन्हें खुद नहीं पता होता कि
कब उनकी जीवन की डोर थम जाएगी...और ऐसा होता है तो उस समय ये नामी गिरामी अख़बार
और समाचार चैनल कहां चले जाते हैं...उस समय तो ये सिर्फ इस खबर को एक बार
छापकर-दिखाकर इतिश्री कर लेते हैं। नक्सली हमलों में शहीद हुए इन जवानों के परिवार
की सुध लेने की फुर्सत इन अखबारों औऱ समाचार चैनलों के पास नहीं होती है...कि वे
कैसे किस स्थिति में हैं...हां ये सब अगर इन जवानों की नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई
में होता है...तो इसके उल्ट ग्राइंड जीरो से रिपोर्टिंग का ढोल पीट पीटकर ये इन
जवानों पर निर्दोषों की हत्या का दोष मढ़ते नहीं थकते हैं। बहरहाल छत्तीसगढ़ में
सीआरपीएफ की नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं...लेकिन इससे पहले जब
– जब नक्सलियों के हमले में जवान शहीद होते रहे हैं...तब – तब सिर्फ शोक संवेदना
व्यक्त कर इस सब को भुला दिया जाता है...ऐसा क्यों इसका जबाव शायद सीआऱपीएफ की
कार्रवाई पर हमेशा ऐसे सवाल उठाने वालों के पास नहीं होगा। बहरहाल इसको लेकर बहस
जारी है देखते हैं ये कहां जाकर थमती है।
दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com
शनिवार, 23 जून 2012
गंगा कब बनेगी लंदन की टेम्स !
गंगा
कब बनेगी लंदन की टेम्स !
टेम्स नदी को लंदन
की गंगा भी कहा जाता है। करीब 80 लाख की आबादी वाला लंदन शहर टेम्स के किनारे बसा
है। टेम्स नदी चैल्थनम में सेवेन स्प्रिंग्स से निकलती है और ऑक्सफार्ड, रैडिंग,
मेडनहैड, विंड्सर, ईटन और लंदन जैसे शहरों से होती हुई 346 किलोमीटर की यात्रा
पूरी कर इंग्लिश चैनल में जाकर गिरती है। टेम्स कभी दुनिया का सबसे व्यस्त जलमार्ग
हुआ करता था। लंदन की आबादी बढ़ने के साथ ही टेम्स नदी में भी प्रदूषण बढ़ता गया। टेम्स
नदी की सफाई के लिए हालांकि समय समय पर लंदन में कई अभियान शुरू किए गए...लेकिन
2000 में शुरू हुई टेम्स रिवर क्लीन अप अभियान टेम्स के लिए वरदान साबित हुआ। इस
अभियान के तहत साल में तय एक दिन चैल्थनम, ऑक्सफार्ड, रैडिंग, मेडनहैड, विंड्सर,
ईटन और लंदन जहां जहां से टेम्स नदी गुजरती है...हर जगह लोग एकत्र होकर नदी की
सफाई करते हैं। पिछले 13 सालों से टेम्स रिवर क्लीन अप अभियान निरंतर जारी है...2012
में इस अभियान के तहत 21 अप्रेल को टेम्स नदी की सफाई की थी। इस अभियान की खास बात
ये है कि सफाई के लिए टेम्स के तट पर पहुंचने वाले सभी लोग सफाई का सारा सामान
अपने साथ लेकर आते हैं...और साल में तय उस दिन पूरी 346 किलोमीटर लंबी टेम्स नदी
की सफाई की जाती है...ताकि किसी भी एक हिस्से में गंदगी रहने पर पूरी नदी फिर से
प्रदूषित न हो जाए। ये वहां के लोगों के जज्बे और इच्छाशक्ति का ही नतीजा है कि बहुत
कम समय में ही अपने बल पर वहां के लोगों ने टेम्स को वापस उसके पुराने स्वरूप में
लौटा दिया। लंदन पर्यावरण विभाग के अधिकारियों ने भी टेम्स को उतना ही स्वच्छ
बताया है...जितनी स्वच्छ टेम्स आज से डेढ़ सौ साल पहले थी। ये तो बात थी ब्रिटेन
की गंगा की…एक गंगा हिंदुस्तान में भी है...जो यहां
बसने वाले लोगों के लिए सिर्फ नदी नहीं बल्कि आस्था का वो सैलाब है जिसमें डुबकी
लगाकर हर कोई अपने आप को पापों से मुक्त समझता है। गोमुख से गंगासागर तक पच्चीस सौ
पच्चीस किलोमीटर की लंबी यात्रा में गंगा इसके किनारे बसने वाले करीब 40 करोड़
लोगों को तारते हुए चलती है...लेकिन इस गंगा का जल अब गंदा जल हो गया है...ये हम
नहीं कह रहे समय समय पर आ रही रिपोर्ट ने इसे साबित कर दिया है। ऐसे में सवाल ये
उठता है कि जब लंदन में करीब एक करोड लोग 346 किलोमीटर लंबी टेम्स को साल में एक
दिन साफ कर सकते हैं तो क्या हम पच्चीस सौ पच्चीस किलोमीटर लंबी गंगा को एक दिन में...चलिए
माना एक दिन में मुश्किल है...एक महीना में...एक महीने भी अगर ज्यादा लगता है...तो
क्या एक साल में तो साफ कर सकते हैं...पूरी तरह साफ नहीं कर सकते तो इसकी शुरूआत
तो कर सकते हैं...इसमें गंदगी को जाने से तो रोक सकते हैं। ऐसा नहीं है कि हमारे
यहां गंगा की सफाई के लिए अभियान न छेड़े गए हों...सरकार ने कुछ न किया हो...ये सब
हुआ...इसके लिए अब तक करोड़ों रूपए खर्च भी किए जा चुके हैं...लेकिन ये पैसा कहां
खर्च हुआ...गंगा कितनी साफ हुई ये किसी से छुपा नहीं है। स्वच्छ गंगा के लिए एसी
कमरों में बड़ी बड़ी बहस तो होती हैं...धरने प्रदर्शन भी होते हैं...लेकिन गंगा की
सफाई के लिए हाथ नहीं उठते...जो करेगी सरकार करेगी...ये जिम्मेदारी सरकार की है...गंगा
जिसे हम मां कहते हैं उसकी सफाई के लिए...उसे स्वच्छ रखने के लिए हमारी कोई
जिम्मेदारी नहीं है...एक बार सोचिएगा जरूर...जवाब आपके पास ही है...बस जरूरत है उस
पर अमल करने की...और यकीन मानिए जिस दिन इस पर अमल हो जाएगा...गंगा को अपने पुराने
स्वरूप में आने में देर नहीं लगेगी।
दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com
सोमवार, 18 जून 2012
रायसीना की रास...विवादों का इतिहास
रायसीना की रास...विवादों का इतिहास
देश के सर्वोच्च पद
के लिए महाभारत छिड़ा है...सर्वोच्च पद की लड़ाई अब प्रतिष्ठा का सवाल बन गयी है। हम
बात कर रहे हैं रायसीना की रास..यानि राष्ट्रपति पद को लेकर मची तकरार की। सरकार
और विपक्ष में तो छोड़िए...सरकार और उनके सहयोगियों में ही तकरार चरम पर है...एक
दूसरे को देख लेने तक की धमकियां दी जा रही हैं। सर्वोच्च पद को लेकर ये तकरार आज़ाद
भारत के इतिहास में कोई पहली बार नहीं हुई है। 26 जनवरी 1950 को आज़ाद भारत का
संविधान लागू होने से पहले ही रायसीना की रास थामने को लेकर तकरार शुरू हो गयी
थी...जो बीच बीच में कुलाचें भरती रही...और एक बार फिर से रायसीना को लेकर महाभारत
अपने चरम पर है। अब सहयोगी तृणमूल कांग्रेस नाराज हो तो हो...प्रणव के नाम पर साथ
दे या न दे...ममता बनर्जी चाहे जितना चिल्ला ले...यूपीए ने साफ कर दिया है कि
रायसीना तो प्रणव मुखर्जी को ही भेजेंगे। सपा, बसपा के समर्थन ने भी यूपीए की
हिम्मत बढ़ा दी हैं...अब एक एम यानी ममता यूपीए से अलग हो भी जाएं तो क्या...दो
एम...यानि मुलायम और मायावती तो साथ खड़े ही हैं। प्रणव की जीत को लेकर भले ही
यूपीए आश्वस्त दिखाई दे रही हो...लेकिन एनडीए और लेफ्ट ने अभी अपने पत्ते नहीं
खोले हैं। रायसीना की रेस में वर्तमान हालात ने तो रायसीना की रास विवादों के
इतिहास में एक और पन्ना जोड़ दिया है। इतिहास के ये दुर्लभ पन्ने देश के सर्वोच्च
पद से जुडे विवादों की स्याही से लिखे गए हैं। जिसका पहला पन्ना आज़ाद भारत के
पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और पंडित जवाहर लाल नेहरू के बीच हुए
विवादों से लिखा गया है। छब्बीस जनवरी 1950
को आजाद भारत का संविधान लागू होने के पहले ही राष्ट्रपति पद के लिए तत्कालीन
गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालचारी और संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ बाबू राजेन्द्र
प्रसाद में होड छिड़ गई थी। बंबई से प्रकाशित होने वाले एक साप्ताहिक में चार जून 1949 के अंक में इस विवाद की खबर छप गई। आनन-फानन में आला नेताओं के स्तर पर
इसका खंडन किया गया। इसके बाद 10 दिसंबर 1949 को पंडित जवाहर लाल नेहरु ने डा राजेन्द्र प्रसाद को एक खत लिखा जिसका
आशय कुछ यूं था कि ‘ उन्होंने श्री बल्लभ भाई पटेल से इस
संदर्भ में विचार विमर्श किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सभी दृष्टिकोण से
सर्वोत्तम और सर्वाधिक सुरक्षित रास्ता यह होगा कि राजगोपलचारी को राष्ट्रपति बना
दिया जाए’। पत्र पाकर राजेन्द्र बाबू बहुत दुखी
हुये और उन्होंने उसी दिन नेहरु जी को जवाब दिया कि वो किसी पद की दौड़ में शामिल
नहीं है...लेकिन कांग्रेस संसदीय बोर्ड ने राष्ट्रपति पद के लिए राजेन्द्र बाबू का
नाम पूर्ण बहुमत से पारित कर दिया...और वे भारत के पहले राष्ट्रपति चुने गये। राजेन्द्र
प्रसाद के पहले कार्यकाल से पहले भले ही पंडित नेहरू से उनकी ठनी रही...लेकिन
नेहरू देश का दूसरा राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन को बनवाना चाहते थे...लेकिन
यहां भी नेहरू की नहीं चली और राजेन्द्र प्रसाद लगातार दूसरी बार राष्ट्रपति चुने
गए। ये घटना विवादों के इतिहास में दूसरे पन्ने पर दर्ज हुई। बात मई 1957 की है जब डॉ
सर्वपल्ली राधाकृष्णन का उपराष्ट्रपति के रुप में कार्यकाल समाप्त हो रहा था...ऐसे
में नेहरू ने उन्हें देश के दूसरे राष्ट्रपति के रूप में कांग्रेस का प्रत्याशी
बनाने का आश्वासन दे दिया। दरअसल डॉ राधाकृष्णन नेहरु की निजी पंसद थे क्योंकि
उनकी सोच नेहरु की अभिजात्य संस्कृति में फिट हो जाती थी। इसी बीच मौलाना अबुल
कलाम आजाद ने कांग्रेस के आलाकमान के प्रतिनिधि की हैसियत से डा राजेन्द्र प्रसाद
से मिलकर उनसे दूसरी बार राष्ट्रपति पद का कांग्रेसी उम्मीदवार बनने का अनुरोध
किया। राजेंद्र बाबू ने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। इस फैसले से पं नेहरु हैरान रह
गए। पंडित नेहरु डा राधाकृष्णन को राष्ट्रपति बनाने का वचन दे चुके थे। उन्होंने
डा राधाकृष्णन को कांग्रेस का प्रत्याशी बनाने के लिए तमाम कोशिशें की। इसके लिए राज्यों
के मुख्यमंत्रियों को खत लिखे और यहां तक की सार्वजनिक मंचों पर कहा कि इस बार
राष्ट्रपति उत्तर भारत का नहीं दक्षिण भारत का होना चाहिए...इसे भारतीय राजनीति का
दुर्भाग्य ही कहेंगे..कि यहीं से भारतीय राजनीति में भाषा व क्षेत्रवाद का
बीजारोपण हुआ। नेहरु की लाख कोशिशों के बावजूद मार्च 1957 में कांग्रेस
संसदीय बोर्ड की बैठक में सर्वसम्मति से डा राजेन्द्र प्रसाद का नाम राष्ट्रपति पद
के लिए कांग्रेसी प्रत्याशी के रुप में प्रस्तावित किया गया। पं नेहरु ने बोर्ड के
निर्णय को मायूसी से स्वीकार कर लिया और दूसरी बार डा राजेन्द्र प्रसाद पुनः देश
के राष्ट्रपति बने। 1967 के आम चुनाव ने देश की फिज़ा बदली और
17 राज्यों में से 6 राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकार सत्ता में आयी...ऐसे में इन
सरकारों को डर था कि इंदिरा गांधी राष्ट्रपति के माध्यम से उनकी सरकार को बर्खास्त
करवा सकती थी...ऐसे में इन्होंने राष्ट्रपति के लिए कांग्रेस उम्मीदवार जाकिर
हुसैन के सामने न्यायाधीश सुब्बाराव को उतार दिया। जाकिर हुसैन उपराष्ट्रपति थे और
आजादी के बाद से लगातार कांग्रेस प्रत्याशी बिनी किसी मुश्किल के चुन लिए जाते
थे...लेकिन इस बार हालात जुदा थे। सुब्बाराव के समर्थकों का तर्क था कि देश के
बदले राजनीतिक हालात में जब छह राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकार है तो किसी विशेष
दल का राष्ट्रपति नहीं होना चाहिए। कांग्रेसियों ने अपने प्रचार में मुद्दा बनाया
की देश में पहली बार मुस्लिम राष्ट्रपति बनने जा रहा है और हिन्दू सम्प्रदायवादी
ताकतें उन्हें परास्त करना चाहती हैं उनकी पराजय से भारत ही नहीं समूचे विश्व के
मुस्लिम समुदाय में गलत संकेत जायेगा। इसी असमंजस के बीच चुनाव हुआ और आखिरकार जीत
डा जाकिर हुसैन की हुई। जाकिर हुसैन अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके और 3 मई 1969
को उनका आक्समिक निधन हो गया...ऐसे में उपराष्ट्रपति वीवी गिरी कार्यवाहक
राष्ट्रति बने। 6 माह के अंदर नए राष्ट्रपति का चुनाव होना था। कांग्रेस ने नीलम
संजीवा रेड्डी को उम्मीदवार बनाया..लेकिन इंदिरा गांधी वीवी गिरी को राष्ट्रपति
बनवाना चाहती थी। ऐसे में इंदिरा ने यहां पर एक सियासी चाल खेली जिसने कांग्रेस को
ही चारों खाने चित्त कर दिया। इंदिरा ने सभी लोगों से अपनी अंतर्रात्मा की आवाज़
पर वोट देने की अपील की...और आखिरकार जीत वीवी गिरि की हुई। ये रायसीना से जुड़े
इतिहास के वे पन्ने हैं जिन्हें विवादों की स्याही ने अमिट बना दिया है। इसमें एक
और ताजा पन्ना जुड़ गया है...2012 का राष्ट्रपति चुनाव जो किसी महाभारत से कम नहीं
लग रहा है। इस महाभारत में जुबानी हथियारों से जमकर एक दूसरे पर वार किया जा रहा
है...किसी को किसी का कोई लिहाज नहीं है...शायद सही मायने में यही तो राजनीति है।
दीपक
तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com
मंगलवार, 12 जून 2012
शनिवार, 9 जून 2012
कौन बजाएगा सितार ?
कौन
बजाएगा सितार ?
विजय बहुगुणा के
मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही सबसे बड़ा सवाल ये था कि बहुगुणा चुनाव कहां से
लडेंगे। मुख्यमंत्री जहां पर भी जाते पत्रकारों के सवालों की बौछार के बीच सबसे
अहम सवाल ये भी होता कि मुख्यमंत्री जी आप चुनाव कहां से लड़ेंगे। इसी बीच एक
नाटकीय घटनाक्रम के तहत सितारगंज से भाजपा विधायक किरण मंडल ने इस्तीफा देकर भाजपा
में खलबली मचा दी। बहुगुणा की तारीफ करने वाले मंडल के इस्तीफे के बाद मुख्यमंत्री
ने भी सितारगंज जाकर वहां करोड़ों की घोषणाएं कर उनका दिल जीतने की पूरी कोशिश की।
जिसके बाद से ही ये कयास लगाए जा रहे थे कि बहुगुणा सितारगंज से ही ताल ठोकेंगे। आखिरकार
सितारगंज उपचुनाव की तारीख घोषित होने के बाद बहुगुणा ने भी अपने पत्ते खोलते हुए
ऐलान कर दिया कि वे सितारगंज से ही चुनाव लड़ेंगे। बहगुणा ने 13 जून को नामांकन
भरने का भी ऐलान किया है। मुख्यमंत्री ने तो चुनाव लडने का ऐलान कर दिया...लेकिन
भाजपा ने इस पर अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं...हालांकि खबरें हैं कि भाजपा
सितारगंज उपचुनाव में खंडूरी या कोश्यारी में से किसी एक को मैदान में उतार सकती
है। बहरहाल सितारगंज उपचुनाव कांग्रेस के साथ ही भाजपा के लिए भी प्रतिष्ठा का
सवाल है। बहुगुणा के लिए तो ये चुनाव उनकी किस्मत तय करेगी कि वे मुख्यमंत्री बने
रहेंगे या नहीं...जबकि भाजपा हर हाल में न सिर्फ अपनी खोई हुई सीट को वापस हासिल
करने को पूरी ताकत लगाएगी...बल्कि बहुगुणा की हार में प्रदेश में सरकार बनाने की गुंजाईश
भी तलाशेगी। बहरहाल चुनाव की बिगुल बज चुका है और 08 जुलाई को प्रत्याशियों की
किस्मत ईवीएम में कैद हो जाएगी...हालांकि वक्त अभी काफी है...ऐसे में भाजपा और कांग्रेस दोनों में से कोई भी मिशन सितारगंज फतह
में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहेगा।
दीपक
तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com
बुधवार, 6 जून 2012
टॉयलेट में 35 लाख !
टॉयलेट में 35 लाख !
हिंदुस्तान में दो भारत बसते हैं इसका एहसास एक बार फिर से हो गया...जब आरटीआई एक्टिविस्ट सुभाष कुमार अग्रवाल की आरटीआई ने योजना आयोग का बड़ा खुलासा कर दिया। आरटीआई में जानकारी भी ऐसी सामने आयी...जिस पर यकीन करना मुश्किल था...लेकिन ये जानकारी खुद योजना आयोग से आयी थी...तो फिर कैसे भरोसा नहीं होता। मामला दरअसल ये है कि योजना आयोग ने दिल्ली स्थित मुख्यालय योजना भवन में दो टॉयलेट पर 35 लाख रूपये खर्च कर डाले...जिसमें से 5 लाख 19 हजार रूपये दोनों टॉयलेट में एक्सेस कंट्रोल सिस्टम लगवाने में खर्च कर दिए गए। इसके लिए बकायदा योजना आयोग के 60 अफसरों को एक्सेस कार्ड भी जारी कर दिए...ताकि इन अफसरों के अलावा कोई दूसरा व्यक्ति टॉयलेट का इस्तेमाल न कर सके। एक्सेस कार्ड ने 1947 के पहले की वो याद ताजा कर दी...जब अधिकतर चीजों को यहां तक की पक्की सड़क को भी सिर्फ गोरे ही इस्तेमाल करते थे...और भारतीयों को उन चीजों के इस्तेमाल की इजाज़त नहीं थी...यानि एक बार फिर से ऐसा लगने लगा कि वे दिन वापस आ गए हैं...बस फर्क इतना है कि तब राज करने वाले गोरे थे...अब अपने ही लोग हैं। बहरहाल हम बात कर रहे थे 35 लाख के टॉयलेट की...ज्यादा दिन नहीं हुए हैं जब प्रधानमंत्री ने देश के वर्तमान आर्थिक हालात का हवाला देते हुए खर्चों में कमी करने की बात कही थी...औऱ अधिकारियों को भी ऐसी ही हिदायत दी थी। ऐसे समय में योजना आयोग का ये कारनामा अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। हैरत की बात तो ये भी है कि आरटीआई में मिली जानकारी कहती है कि आयोग के तीन और टॉयलेटों को इसी तर्ज पर अपग्रेड किया जाना है...यानि कि अभी इसी तरह टॉयलेट पर लाखों रूपए और खर्च किए जाने हैं। योजना आयोग का ये कारनामा ये बताने के लिए काफी है कि आखिर शुरूआत में...मैं क्यों हिंदुस्तान में दो भारत बसने की बात कर रहा था...एक भारत वो है जहां पर गरीब और पिछड़े लोग रहते हैं...जिनके पास शौचालय तो बहुत दूर की बात है...रहने को छत तक नहीं है...और एक भारत है...नहीं नहीं भारत नहीं...एक इंडिया है...जहां पर योजना आयोग के जैसे अधिकारी 35 लाख रूपए का टॉयलेट इस्तेमाल करते हैं। ऐसा नहीं है कि योजना आयोग पहली बार ऐसी किसी घटना के चलते चर्चा में आया हो...इससे पहले भी रोजाना 28 रूपए से ज्यादा खर्च कने वाले को गरीब न मानने वाले आयोग की अनोखी रिपोर्ट गरीबों का उपहास उड़ाती दिखी थी। बीते साल मई से अक्टूबर के बीच योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया का विदेश दौरा भी ऐसी ही कुछ कहानी बयां कर रहा था...जब आरटीआई से मिली जानकारी से पता चला कि विदेश दौरे पर अहलूवालिया का एक दिन का खर्च 2 लाख रूपए से भी ज्यादा था। बहरहाल बात 35 लाख के टॉयलेट की हो रही है...ऐसे में इस पर अहलूवालिया साहब का कहना है कि हमारे देश में ज्यादातर सरकारी इमारतों के साथ ही वहां के टॉयलेट की हालत बहुत खराब है...और योजना आयोग का टॉयलेट बेहतर हो रहा है तो इसमें हर्ज ही क्या है...वे ये भी कहते हैं कि आयोग के दफ्तर में वीवीआईपी के साथ ही विदेशी प्रतिनिधि भी आते हैं...इसलिए भी टॉयलेट पर इतना पैसा खर्च किया गया है। इनकी दलीलें मुझे तो समझ के परे लगती हैं...लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि काश ये पैसा जरूरतमंदों पर खर्च हुआ होता तो औऱ कुछ नहीं तो कम से कम लाखों लोगों को खासकर महिलाओं को खुले में शौच के लिए नहीं जाना पड़ता।
दीपक तिवारी
सोमवार, 4 जून 2012
रामदेव – गडकरी मुलाकात कितनी सियासी !
रामदेव – गडकरी
मुलाकात कितनी सियासी !
मिशन 2014 की तैयारी में जुटी
भाजपा को अब बाबा रामदेव का ही सहारा...कालेधन और भ्रष्टाचार के
मुद्दे पर भाजपा का समर्थन लेने भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के घर पहुंचे बाबा
रामदेव को समर्थन देने का ऐलान कर गडकरी ने तो ये जता ही दिया है कि भाजपा के मिशन
2014 में रामदेव और उनके आंदोलन की भूमिका अहम होगी। गडकरी जिस अंदाज में रामदेव
से मिले उससे भी ये अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि भाजपा अब रामदेव की शरण
में आ गयी है। अब भले ही गडकरी साहब कालेधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ रामदेव के
आंदोलन को समर्थन देने की बात कह रहे हों...लेकिन दिल्ली में गडकरी के आवास पर हुई
इस मुलाकात के कई सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। रामदेव बाबा को भी सफाई
देने की जरूरत पड़ रही है...बाबा कहते हैं...ये राजनीति नहीं है...ये देश का सवाल
है...इसलिए हम भाजपा ही नहीं सभी राजनीतिक दलों से समर्थन मांग रहे हैं। अब बाबा
कितनी ही सफाई दें लेकिन हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से पहले
बाबा रामदेव के उस बयान को कैसे भुलाया जा सकता है जिसमें रामदेव ने लोगों से खुले
शब्दों में भाजपा को वोट देने की अपील की थी। बाबा काला धन भारत में वापस लाने के
साथ ही देश की प्रतिष्ठा और विकास की बात करते हैं...तो भाजपा भी अब उनके साथ खड़े
होने का दम भर रही है...भाजपा की निगाहें मिशन 2014 पर हैं...और रामदेव एंड कंपनी
की सीढ़ी के सहारे भाजपा अपने मिशन को पूरा करने में जुट गयी है...ऐसे में देखना
ये होगा कि भाजपा के मिशन 2014 में रामदेव भाजपा की नैया पार लगाने में कितने सफल
होते हैं।
दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com
शनिवार, 2 जून 2012
साढ़े पांच रूपये महंगा हुआ पेट्रोल !
साढ़े पांच रूपये महंगा हुआ पेट्रोल !
23 मई को पेट्रोल की
कीमत में साढ़े सात रूपये का ईजाफा होता है...तो खूब हो हल्ला मचता है...मानव
स्वभाव भी है कि किसी भी चीज का असर हमारे दिमाग में 24 से 48 घंटे तक रहता है।
यहां भी ऐसा ही हुआ था...अगले ही दिन राजनीतिक दलों के साथ आम लोग भी सड़कों में
उतर आए और पेट्रोल की कीमतों में हुई साढ़े सात रूपये की बेतहाशा बढ़ोतरी को वापस
लेने की मांग उठी...लेकिन जैसे जैसे समय बीतता गया...ये गुस्सा कम होता गया। 31 मई
को एनडीए के भारत बंद ने एक बार फिर से लोगों को इसकी याद दिला दी। इसकी याद भी उसके
अगले ही दिन धुंधली पड़ गयी...ऐसे में पेट्रोल की कीमतों पर भारी दबाव झेल रही
केन्द्र सरकार के दबाव का असर कहें या फिर कच्चे तेल की कीमतों में कमी होना...तेल
कंपनियों ने पेट्रोल 2 रूपये सस्ता करने का ऐलान कर दिया। साढ़े सात रूपये की बढ़ोतरी
के बाद दो रूपये की कमी ऊंट के मुंह में जीरे के समान है...लेकिन लोग ये सोच कर
खुश हैं कि पेट्रोल सस्ता हो गया है। ये तेल कंपनियों का सोचा समझा एजेंडा था कि
पहले पेट्रेल की कीमत में जरूरत से ज्यादा ईजाफा कर दो और फिर उसमें मामूली कटौती
कर दो या फिर वाकई में कच्चे तेल की कीमत का असर है...ये तो बहस का मुद्दा है।
लेकिन अगर वाकई में दो रूपये की कटौती कच्चे तेल की कीमतों में कमी का असर है तो इससे
पहले जब कच्चे तेल की कीमत में आयी थी...तो तब तेल कंपनियों ने क्यों नहीं पेट्रोल
की कीमतें कम की थी। इसका सीधा मतलब ये निकलता है कि पहले कीमतों में मोटा ईजाफा
कर दो...औऱ जब इस पर लोग हो हल्ला मचाने लगे तो मलहम के नाम पर अपने ऐजेंडे के तहत
कीमतों में मामूली कटौती कर दो...ताकि लोग बढ़ी हुई कीमत को आसानी स्वीकार कर
लें...औऱ इस पर हो हल्ला न मचे...जो कि इस बार तेल कंपनियों ने किया है। बहरहाल
सरकार भले ही इस सब का दोष तेल कंपनियों के सिर मढ़ रही हो...लेकिन पर्दे की पीछे
की सच्चाई किसी से छिपी नहीं है। ऐसा नहीं है कि पेट्रोल की कीमत में बढ़ोतरी के
कुछ दिन उसमें कमी करने का ये खेल पहली बार खेला गया है...जब – जब पेट्रोल की
कीमतें बढ़ी हैं...तब - तब ये सब होता आया
है...पहले और इस बार में फर्क सिर्फ इतना है कि इससे पहले पेट्रोल के दामों में
ईजाफा इस हद तक कभी नहीं हुआ था। दो रूपये की कटौती होने के बाद पेट्रोल साढ़े
पांच रूपये अभी भी महंगा है...जो भी बीते कई सालों के हिसाब से अच्छी खासी बढ़ोतरी
है। लोग हर बार मान जाते हैं...और चीजों को भूल जाते हैं...शायद यही चीज तेल
कंपनियों और हमारी सरकार की ताकत बन जाती है...और महंगाई बढ़ने का सिलसिला कभी
नहीं रूकता। हालांकि समय – समय पर हुए चुनाव में जनता ने ऐसे लोगों को अपनी ताकत
का एहसास कर उन्हें सत्ता से बेदखल कर आईना भी दिखाया है...लेकिन सवाल ये उठता है
कि क्या सरकार में बैठे लोगों की ये जिम्मेदारी नहीं बनती कि आमजन से जुड़े
मुद्दों पर राजनीति से ऊपर उठकर काम किया जाए।
दीपक
तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com
शुक्रवार, 1 जून 2012
बहगुणा का गुणा - भाग
बहगुणा का गुणा - भाग
सियासत की गुणा भाग कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुए विजय बहुगुणा ये
अच्छी तरह जानते हैं कि उनकी असली अग्निपरीक्षा यानि कि उपचुनाव जीतना अभी बाकी
है...तभी वे राजनीतिक औऱ संवैधानिक रूप से इस कुर्सी पर बने रह पाएंगे। ऐसे में
उपचुनाव से पहले बहुगुणा उपचुनाव में अपनी विजय सुनिश्चित करने के लिए कोई कोर कसर
नहीं छोड़ रहे हैं। इसकी बानगी पहले हरिद्वार में और उसके बाद विधानसभा के बजट
सत्र में देखने को मिली जब बहुगुणा ने भीषण गर्मी में बिजली कटौती की मार झेल रहे
प्रदेशवासियों को बिजली कटौती से निजात दिलाने का ऐलान किया था...और 24 घंटे बिजली
सप्लाई की बात कही थी...लेकिन अगले ही दिन मुख्यमंत्री की इस घोषणा की हवा तब निकल
गई जब राजधानी में ही तीन घंटे तक बत्ती गुल हो गयी। ये पहली बार नहीं हुआ...इसके
बाद लगातार बत्ती गुल होने का सिलसिला जारी है। अंदाजा लगाया जा
सकता है कि जब प्रदेश की राजधानी में मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद बिजली का ये हाल
है तो प्रदेश के दूसरे हिस्सों में हालात क्या होंगे। यूपीसीएल की वेबसाइट कहती है
कि हरिद्वार औऱ ऊधम सिंह नगर के ग्रामीण इलाकों में 6 घंटा 10 मिनट तक बिजली कटौती
हो रही है तो कोटद्वार, नैनीताल और मसूरी को छोड़कर प्रदेश के सभी पहाड़ी इलाकों
में दो – दो घंटे तक बिजली कटौती हो रही है। ये हाल तब है जब कि ऊर्जा विभाग खुद
मुख्यमंत्री के पास है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या मुख्यमंत्री को प्रदेश
में ऊर्जा की वास्तविक आपूर्ति और खपत के बारे में जानकारी नहीं है...या फिर सिर्फ
वाहवाही लूटने के लिए बहुगुणा साहब खुले मंचों से ये ऐसी घोषणा कर रहे हैं।
यूपीसीएल की वेबसाईट ये भी कहती है कि प्रदेश में ऊर्जा की उपलब्धता 33.63 मिलियन
यूनिट है जब्कि खपत 35.53 मिलियन यूनिट है..औऱ वर्तमान में प्रदेश में 1.90 मिलियन
यूनिट की रोस्टिंग यानि की कटौती की जा रही है। मुख्यमंत्री के जेहन में भले ही उपचुनाव
का जिन्न घूम रहा हो...और बहुगुणा किसी भी सूरत में उपचुनाव में विजय हासिल करना
चाहते हों...लेकिन भीषण गर्मी में बिजली की गुणा – भाग मुख्यमंत्री के लिए उपचुनाव
विजय की डगर मुश्किल बना सकती है। शायद उत्तराखंड के नए नवेले सीएम साहब को ये
नहीं पता कि उनके श्रीमुख से निकला एक – एक शब्द जहां किरण मंडल मामले में पहले से
ही खार खाए बैठी भाजपा को उपचुनाव के लिए नया मुद्दा दे रहा है वहीं बहुगुणा की उपचुनाव
विजय की उम्मीदों पर भी ग्रहण लगा सकता है।
दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com
शनिवार, 26 मई 2012
राम, गंगा और भाजपा का मिशन 2014
राम, गंगा और भाजपा का मिशन 2014
राम के बाद गंगा का सहारा…जी हां राम के बाद अब भाजपा गंगा मैया की शरण में आ गयी है…निर्मल गंगा को लेकर उमा भारती के नेतृत्व में भाजपा बड़ा आंदोलन करेगी…मुंबई में 25 मई को राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में जहां 2014 के लोकसभा चुनाव की तैयारियों और रणनीति को लेकर चर्चा हुई वहीं 2014 को ध्यान में रखते हुए भाजपा राम के बाद गंगा की शरण में आ गयी है। गंगा को लेकर पहले भी अभियान छेड़ने वाली भाजपा का फायरब्रांड नेता उमा भारती ने कार्यकारिणी की बैठक में पवित्र गंगा की सुरक्षा और प्रदूषण मुक्ति नाम से प्रस्ताव पेश किया। प्रस्ताव में गंगा की दुर्दशा और गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए अब तक के अभियानों की विफलता का भी जिक्र किया…साथ ही गंगा की अविरल धारा के लिए जनजागरण अभियान शुरू करने का भी संकल्प लिया गया। भाजपा का आरोप है कि गंगा को राष्ट्रीय नदी का दर्जा दिए जाने के बाद भी गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए। उमा भारती के कहने पर बैठक में मौजूद सभी नेताओं को गंगा की रक्षा का संकल्प भी लिया। निर्मल गंगा के लिए भाजपा बड़ा आंदोलन करेगी…जिसके लिए भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने एक कमेटी के गठन का भी ऐलान किया। इसके साथ ही आंदोलन की कमान भी उमा भारती को सौंपी गयी है। भाजपा भले ही अपना प्रस्तावित आंदोलन अविरल गंगा और स्वच्छ गंगा के नाम पर होने की बात कर रही हो…लेकिन यहां भी भाजपा ने एक तीर से दो निशाने साधने की कोशिश की है। भाजपा ने ये एजेंडे दरअसल मिशन 2014 ध्यान में रखकर तैयार किया है ताकि राम के बाद अब गंगा के नाम पर लोगों को साधा जाए…और उनकी धार्मिक आस्था को जगाकर एक बार फिर राम की तरह गंगा के नाम पर वोट बटोरे जाएं। गोमुख से लेकर गंगासागर तक गंगा 25 सौ 25 किलोमीटर की यात्रा तय करते हुए पांच राज्यों उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के गुजरती है…औऱ करीब 40 करोड लोग गंगा के तट पर रहते हैं…यानि की देश की आबादी का करीब तीसरा हिस्से का तो गंगा से सीधे जुड़ाव है…और बाकी लोग आस्था से तो गंगा से जुड़े ही हुए हैं…यानि की राम के बाद अब गंगा के सहारे भाजपा अपने मिशन 2014 को सफल बनाने की कोशिश कर रही है। बहरहाल राम के बाद गंगा की शरण में आयी भाजपा का आंदोलन गंगा को प्रदूषण से कितनी मुक्ति दिला पाता है और गंगा मैया की कितनी कृपा होती है ये तो समय ही बताएगा लेकिन एक बार फिर से धर्म के नाम पर भाजपा ने सत्ता का चाबी हासिल करने की पूरी तैयारी कर ली है।

दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com
शुक्रवार, 25 मई 2012
भाजपा…संविधान और गडकरी
नितिन गडकरी जब तीन साल पहले भाजपा
के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के रूप में ताजपोशी हुई थी तो हर कोई हैरान था। अध्यक्ष
बनने से पहले राष्ट्रीय राजनीति के नए नवेले चेहरे गडकरी को कुर्सी मिली तो भाजपा
ही नहीं बल्कि गैर भाजपाई दलों के नेताओं के साथ ही आम लोगों के लिए भी गडकरी
उत्सुक्ता का विषय बन गए थे। भाजपा में बड़े बड़े दिग्गज़ों की जगह गडकरी को जब
कुर्सी मिली थी तो इतना तो साफ हो ही गया था कि गड़करी भाजपा के शीर्ष नेताओं की
नहीं बल्कि संघ की पसंद थे…और संघ की पसंद होने के नाते गडकरी
की ताजपोशी के विरोध करने की हिम्मत भी दूसरे भाजपाई नहीं उठा सके थे। भाजपा के
राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गड़करी की अध्यक्ष पद पर ताजपोशी को दिसंबर 2012 में तीन साल पूरे हो जाएंगे…और भाजपा के संविधान के अनुसार राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यकाल तीन
साल का होता है…साथ ही भाजपा का संविधान भी कहता है
कि राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर एक ही व्यक्ति की ताजपोशी दो बार लगातार नहीं हो सकती…लेकिन नितिन गड़करी इसके बाद भी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने
रहेंगे। जी हां 24 मई को मुंबई में भाजपा की राष्ट्रीय
कार्यकारिणी की बैठक में भाजपा ने अपने संविधान में इस संबंध में संशोधन कर दिया
है जिससे एक ही व्यक्ति के दो बार लगातार राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर ताजपोशी का
रास्ता साफ हो गया है। राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भाजपा के पूर्व
राष्ट्रीय अध्यक्ष ने संविधान में संशोधन का प्रस्ताव रखा…जिसका अनुमोदन पूर्व अध्यक्ष वैंकेयानायडू ने किया…जिसे कार्यकारिणी ने हरी झंडी दे दी है…लेकिन अभी इस पर भाजपा की राष्ट्रीय परिषद की मुहर लगनी बाकी है।
दरअसल संघ 2014 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर पार्टी
अध्यक्ष बदलने के मूड में नहीं था…जिसके चलते ही नौ महीने बाद हुई भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की
बैठक में सबसे पहले गड़करी को लगातार दूसरी बार अध्यक्ष बनाने के लिए पार्टी के
संविधान में संशोधन किया गया। खबर तो यहां तक है कि अनुशासित पार्टी होने का दावा
करने वाली भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में संविधान में संशोधन को लेकर
विरोध के स्वर भी उठे। भाजपा नेता संघप्रिय गौतम और जेके जैन ने प्रस्ताव पर चर्चा
कराने की भी मांग की…लेकिन इनकी बात को दरकिनार कर
कार्यकारिणी ने प्रस्ताव को हरी झंडी दिखा दी…जिसका मतलब साफ है कि दिसंबर 2012 में गड़करी का कार्यकाल समाप्त होने के बाद दोबारा से उनकी ताजपोशी
तय हो गयी है। गड़करी की दूसरी पारी का मतलब साफ है कि भाजपा 2014 का लोकसभा चुनाव गड़करी की अगुवाई में ही लड़ेगी…लेकिन देखने वाली बात ये होगी कि क्या 2014 के लोकसभा चुनाव में गड़करी अपना कमाल दिखाकर भाजपा को केन्द्र की
सत्ता में वापस लौटाने में कामयाब हो पाएंगे या नहीं।
दीपक तिवारी
बुधवार, 23 मई 2012
पेट्रोल की साढ़े साती...
22 मई को यूपीए
सरकार ने तीन साल पूरे किए...दिल्ली में भव्य भोज का भी आयोजन किया...अक्सर खामोश
रहने वाले हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी यूपीए 2 के तीन साल पूरे होने पर दमदारी से कहा कि अब कड़े फैसले लेने का वक्त आ गया है...और हैरत की बात तो ये है कि अक्सर अपने वादों को पूरा न करने वाली सरकार के
मुखिया ने अगले ही दिन अपनी कही बात पर मुहर लगा दी। पेट्रोल के दाम में साढ़े सात
रुपये का ईजाफा हो गया। अब भले ही सरकार इसके पीछे तेल कंपनियों के घाटे के साथ ही
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का तर्क दे लेकिन सच्चाई किसी से छुपी नहीं है। लोगों
को उम्मीद थी की सरकार के तीन साल पूरे होने पर शायद सरकार आम लोगो को महंगाई से
निजात दिलाने के लिए कारगर कदम उठाएगी...सरकार ने त्वरित कदम भी उठाए लेकिन ये
महंगाई की मार से पहले से ही जूझ रहे लोगों के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं था। यूपीए
सरकार के तीन साल पूरे होने पर हमारे रिमोट संचालित प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह
सरकार की तारीफों के पुल बांधते नजर आ रहे थे...औऱ विश्व के खराब आर्थिक हालातों
के बाद भी भारत की तेज आर्थिक रफ्तार का श्रेय लेने से भी नहीं चूके। लेकिन
प्रधानमंत्री ये भूल गए कि ये उनकी सरकार की गलत नीतियों का नतीजा है कि भारत में
महंगाई अपने चरम पर है...और उसके लिए वे और उनकी सरकार के वे लोग भी कम जिम्मेदार
नहीं है। कड़े फैसले लेने के मनमोहन सिंह के बयान के बाद लगा था कि शायद अब उनकी
सरकार के भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ और देश के बाहर जमा काले धन को लेकर उनकी
सरकार कड़े फैसले लेगी...लेकिन 24 घंटे के अंदर ही पैट्रोल के दाम बढ़ने की खबर
के साथ ही साफ हो गया कि उनकी बातों में कितना दम था...औऱ उनका ईशारा कौन से कड़े
फैसले लेने की ओर था। पेट्रोल के दामों में बढ़ोतरी की अगर बात करें तो फरवरी 2010
से 15 बार पेट्रोल के दामों में बढ़ोतरी हुई है। साढ़े सात रुपये की ताजा बढ़ोतरी
के बाद भी तेल कंपनियां डेढ़ रूपए प्रति लीटर नुकसान की बात कह रही है...यानि की
आने वाले दिनों में भी पेट्रोल के दामों में बढ़ोतरी होने की बात से इंकार नहीं
किया जा सकता है। पेट्रोल की कीमतों में ईजाफे की खबर के बाद से ही आम लोगों में
जबरदस्त गुस्सा है। वहीं मुख्य विपक्षी दल भाजपा के साथ ही यूपीए के सहयोगियों
ने भी पेट्रोल के दामों में इतनी बढ़ी बढ़ोतरी का विरोध करते हुए सरकार से रोल बैक
की मांग की है। पेट्रोल के दामों में लगी आग जैसे जैसे आम लोगों तक फैल रही
है...वैसे वैसे लोगों के गुस्से का ज्वालामुखी धधक रहा है...ऐसे में सरकार ने इस
ज्वालामुखी को ठंडा करने के लिए कारगर कदम नहीं उठाए तो ये 2014 में यूपीए 2 की
हैट्रिक के सपने पर पानी जरूर फेर देगा। बहरहाल पेट्रोल के दामों में बढ़ोतरी के
बाद से इस पर बवाल मचना तय है...और देशभर से आ रही खबरें भी कुछ इसी ओर ईशारा कर
रही हैं...ऐसे में सरकार पेट्रोल की इन बढ़ी हुई कीमतों पर आम जनता के हित में कोई
फैसला लेती है या फिर तेल कंपनियों के दबाव के आगे घुटने टेक देती है ये आने वाले
कुछ दिनों में साफ हो जाएगा। वहीं
उत्तराखंड सरकार ने पेट्रोल की बढ़ी हुई कीमतों पर 25 प्रतिशत वैट न लेने का फैसला
लेकर प्रदेशवासियों को राहत देने की कोशिश की है...इससे प्रदेश में पेट्रोल की
कीमतों में एक रुपये 87 पैसे की कमी तो आएगी...लेकिन ये राहत पहले से ही महंगाई की
मार झेल रहे लोगों के लिए ऊंट के मुंह में जीरे के समान लगती है।
दीपक
तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com
गुरुवार, 17 मई 2012
सेनापति
सेनापति
कांग्रेस में सेनापति यानि मुख्यमंत्री की
लड़ाई में तो बाजी विजय बहुगुणा ने मारी...लेकिन भाजपा को सेनापति यानि नेता
प्रतिपक्ष चुनने में पसीना आ गया है। सरकार बने दो माह से ज्यादा का वक्त हो गया
है...लेकिन लगता है भाजपा अभी भी सत्ता में लौटने का ख़्वाब संजोए बैठी है। भाजपा
को उम्मीद है कि बहुगुणा विधायकी का चुनाव आसानी से नहीं जीत पाएंगे...और ऐसे में
अगर वे उपचुनाव में बहुगुणा को पटखनी देने में कामयाब हो जाती है तो एक बार फिर से
सत्ता में लौटने का रास्ता खुल सकता है। शायद यही वजह है कि भाजपा ने अभी तक नेता प्रतिपक्ष
पर अपने पत्ते नहीं खोले हैं...जाहिर है कि अगर ऐसी परिस्थिति बनती है तो भाजपा
में भी कांग्रेस की तरह मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए दावेदारों की फेरहिस्त लंबी
हो जाएगी...और उसमें एक नाम नेता प्रतिपक्ष का भी जुड़ जाएगा। उपचुनाव को लेकर
बहुगुणा ने अभी तक भले ही अपनी चुप्पी न तोड़ी हो...लेकिन सदन में सामने वाली खाली
कुर्सी पर बहुगुणा भी चुटकी लेने से नहीं चूक रहे हैं। 28 मई से विधानसभा का बजट
सत्र शुरू होने जा रहा है...जो 8 जून तक चलेगा...ऐसे में बिना सेनापति की भाजपा
सेना कैसे फ्रंटफुट पर आकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलेगी वो भी ऐसे समय में जब इस
बार अधिकतर भाजपा विधायक पहली बार चुन कर आए है। बहरहाल बजट सत्र में अभी करीब
डेढ़ सप्ताह से ज्यादा का वक्त है...बहगुणा भी सार्वजनिक मंचों से उपचुनाव पर जल्द
चुप्पी तोड़ने की बात कह चुके हैं...लेकिन भाजपा सदन में सेनापति को लेकर अपने
पत्ते खोलने को तैयार नहीं हैं...यानि भाजपा का पूरा ध्यान आगामी सत्र की बजाए उस
उपचुनाव पर है...जो बैकफुट पर खड़ी भाजपा को सत्ता की लड़ाई में फ्रंटफुट पर ला
सकता है।
दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com
गुरुवार, 10 मई 2012
कैसे होगी नैया पार ?
कैसे होगी नैया पार ?
उत्तराखंड के
मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा...जिनका नाम ही विजय है। कांग्रेस में मुख्यमंत्री की
दौड़ में बहुगुणा ने विजय भी पायी...उसके बाद भले ही जमकर बवाल मचा...लेकिन समझौते
की टेबल पर सब कुछ मैनेज कर लिया गया। अब भले ही अपनों के लिए बहुगुणा के पास कुछ
नहीं बचा...लेकिन खुद कुर्सी पाना भी कम बड़ा काम नहीं था...वो भी ऐसे समय में जब
इस कुर्सी के लिए दावेदार उनसे भी कद्दावर थे। बहुगुणा कुर्सी तो पा गए...लेकिन एक
विजय अभी बाकी है...जिसने बहुगुणा की नींद उड़ा रखी है। जी हां हम बात कर रहे हैं उपचुनाव की...जिसका
सामना करना बहुगुणा के लिए अभी बाकी है...यानि की असली अग्निपरीक्षा से तो बहुगुणा
को गुजरना अभी बाकी है। हालांकि बहुगुणा के सामने सबसे बड़ा सवाल फिलहाल ये है कि
वो इस अग्निपरीक्षा पर कहां पर विजय प्राप्त करना चाहेंगे...हालांकि बहुगुणा खुद
ही इस बात को कह चुके हैं कि 15 मई को ये इंतजार भी खत्म हो जाएगा...यानि बहुगुणा
15 मई को साफ कर देंगे कि किस सीट से वे विधायकी के लिए ताल ठोकेंगे। बहुगुणा के लिए ये फैसला लेना आसान काम नहीं है...क्योंकि प्रदेश
कांग्रेस में जैसी परिस्थिति दिखाई दे रही हैं...उसके हिसाब से तो बहुगुणा को किसी
विधायक से सीट खाली कराना ही भारी पड़ता दिखाई दे रहा है। वो भी ऐसी सीट जहां से
बहुगुणा को सौ प्रतिशत अपनी विजय की उम्मीद हो। अंदरखाने कांग्रेस में इसको लेकर
जोड़तोड़ चल भी रही है...लेकिन इसे सार्वजनिक चुनाव लड़ेने से ऐन पहले किया
जाएगा...ताकि विरोधियों को सक्रिय होने का वक्त न मिले। बहुगुणा के लिए बड़ी
मुश्किल ये भी है कि उनके सामने सबसे बड़े विरोधी पार्टी के अंदर ही हैं...और उनके
आसपास ही हैं...और ये वही लोग हैं...जिन्हें दौड़ में बाहर कर बहुगुणा ने सीएम की
कुर्सी हथिया ली थी। वो लोग भले ही सब कुछ ठीक होने की भले ही बात कर रहे
हों...लेकिन उनके समर्थक कोई मौका नहीं छोड़ रहे है बहुगुणा की नींद उड़ाने का।
बहुगुणा भी ये चीज अच्छी तरह जानते हैं लिहाजा वे अभी भी डैमेज कंट्रोल की मुहिम
जारी रखे हुए हैं। अब विरोधी खेमे के विधायकों को लाल बत्ती देने का मामला हो या
फिर उनकी मांगों पर दिल खोलकर घोषणाएं करने का...बहुगुणा कहीं नहीं चूक रहे हैं।
बहुगुणा ये बात अच्छी तरह से जानते हैं कि डैमेज कंट्रोल में कहीं कोई कसर बाकी रह
गयी तो इसका सीधा असर उनकी उस अग्निपरीक्षा पर पड़ेगा...जिससे होकर उन्हें अभी
गुजरना है...और बहुगुणा को ये डर भी है कि दस जनपथ की कृपा से आयी ये कुर्सी कहीं
छिटक न जाए। राजनीति में कुर्सी बड़ी चीज है...और जब राजनीतिक हालात उत्तराखंड के
जैसे हों...तो कुर्सी का खेल बड़ा ही रोचक हो जाता है...कांग्रेस में चले कुर्सी
के खेल में पहली बाजी तो विजय बहुगुणा ने मारी...लेकिन अब बहुगुणा खुद इस खेल के
चक्रव्यूह में इस तरह फंस गए हैं कि उनके लिए इसे पार पाना आसान नहीं दिखाई दे रहा
है।
दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com
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