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रविवार, 22 अप्रैल 2012

एमपी नहीं मुख्यमंत्री कहो...



विजय बहुगुणा अब एमपी नहीं है मुख्यमंत्री बन गए हैं...खबरदार जो उनको एमपी बोला...उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार 20 अप्रेल को मुख्यमंत्री आवास पर बहुगुणा का जनता दरबार लगा...लोग अपनी फरियाद लेकर मुख्यमंत्री के पास पहुंचे थे...कुछ लोग ऐसे भी थे...जो बहुगुणा के एमपी रहते हुए की उनकी चिट्ठी लेकर पहुंचे थे...बहुगुणा साहब ने जब वो चिट्ठी देखी तो चुप रहे बिना नहीं रह सके...बोले अब मैं मुख्यमंत्री बन गया हूं...एमपी नहीं रहा।
बेशक कांग्रेस में चली सीएम की कुर्सी की जंग में बहुगुणा की विजय हुई...लेकिन एमपी साहब शायद ये भूल गए कि अभी तो विधायकी का चुनाव लड़ना है...और जैसे हालात प्रदेश कांग्रेस में है...उससे तो लगता नहीं कि बहुगुणा साहब आसानी से इस अग्निपरीक्षा को पास कर पाएंगे। बहरहाल हम बात कर रहे थे बहुगुणा के पहले जनता दरबार की...ये तो जनता दरबार का सिर्फ एक किस्सा था...मुख्यमंत्री का जनता दरबार था...वो भी प्रदेश के नए नए सीएम का तो लोगों को भी बड़ी उम्मीदें थी...हर कोई जनता दरबार में अपनी अर्जी इस उम्मीद से लेकर आया था कि शायद सीएम साहब उनकी तकलीफें कुछ कम करेंगे...लेकिन जनता दरबार में जनता को दो घंटे इंतजार कराने के बाद जब बहुगुणा पहुंचे तो बड़ी जल्दी में दिखाई दिए...मानो जनता दरबार बुलाकर सीएम साहब ने कोई बड़ी गलती कर दी हो।
कुछ जरूरतमंद नौकरी की आस में पहुंचे थे...तो कुछ आर्थिक सहायता की उम्मीद लेकर...लेकिन कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ का नारा देने वाले पार्टी से आने वाले बहुगुणा के पास न तो जरूरतमंदों के लिए नौकरी थी औऱ न ही आर्थिक सहायता देने के लिए कोई बजट। ये बात शायद आपको हज़म न हो लेकिन ये सौ प्रतिशत सच है...पौड़ी का रहने वाला रमेश सेलाकुइ में एक फैक्ट्री में काम के दौरान अपना एक हाथ गंवा बैठा था...जनता दरबार में बड़ी आस के साथ पहुंचे रमेश ने जब बहुगुणा को नौकरी की अर्जी दी तो बहुगुणा ने बिना उसका दर्द समझे...बिना उसकी परेशानी समझे दरखास्त लौटा दी...अरे बहुगुणा साहब नहीं देते नौकरी न सही...कम से कम उस गरीब का दर्द तो बांट लेते...वह तो आपको अपना मुख्यमंत्री समझ कर ही जनता दरबार में पहुंचा था...लेकिन आप अब एमपी नहीं रहे न...अब तो आप सीएम बन गए हैं...सीएम...अब आपको क्या मतलब किसी के दर्द से। लालढांग से आए एक औऱ शख्स की आर्थिक सहायता की अर्जी पर बहुगुणा साहब कहने से नहीं हिचकिचाए...इतना ही मिल सकता है...ज्यादा बज़ट नहीं होता हमारे पास...हां विधायकों के वेतन भत्ते बढ़ाने की बात जब आती है...तब बजट की कमी नहीं होती सरकार के पास...नहीं है तो बस जरूरतमंदों की सहायता के लिए बजट।
कुछ इसी तरह बहुगुणा साहब ने आधे घंटे में करीब डेढ़ सौ फरियादियों को निपटा दिया...यानि कि समय 30 मिनट औऱ फरियादी 150...एक फरियादी को दिए 12 सेकेंड...माना आपका वक्त कीमती है...लेकिन कोई 12 किलोमीटर से आया था तो कोई 120 किलोमीटर दूर से...कुछ तो चार सौ से पांच सौ किलोमीटर दूर से पहुंचे थे...लेकिन उन्हें नसीब हुए आपके सिर्फ 12 सेकेंड। किसी की मदद न करते न सही कम से कम इत्मिनान से उनकी समस्या ही सुन लेते शायद उनके चेहरे पर सकून तो देखने को मिलता...लेकिन जिस जल्दी में आप आए औऱ गए...उससे तो हर कोई आपके जनाने के बाद बस यही कहता नजर आया...बहुगुणा साहब सही कहा आपने अब आप एमपी नहीं रहे अब आप वाकई में मुख्यमंत्री बन गए हो। यही तो आप सुनना चाह रहे थे न कि अब मैं मुख्यमंत्री बन गया हूं...आपने तो एहसास भी करा दिया लोगों को...उनकी गलतफहमी दूर कर दी।

deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

लाख टके का सवाल !


लाख टके का सवाल !

कभी कभी अपनों से करीबियां भी भारी पड़ जाती है...जी हां प्रदेश के नए मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के अपनों के साथ तो यही होता दिख रहा है। बहुगुणा को जब मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली थी तो बहुगुणा के करीबी विधायक या कहें उनके अपने विधायक तो खुश थे...आखिर उनके नेता मुख्यमंत्री जो बन गए थे...लेकिन जिन्हें सबसे ज्यादा खुशी हुई थी...वे ही अब परेशान नजर आ रहे हैं...वजह साफ है...बहुगुणा मुख्यमंत्री तो बन गए लेकिन उन्हें विधायकी का चुनाव अभी जीतना बाकी है...यानि बाकी है बहुगुणा की असल अग्निपरीक्षा...लेकिन बहुगुणा के सामने सबसे बड़ा संकट ये है कि आखिर बहुगुणा चुनाव लड़ें तो कहां से...कौन विधायक बहुगुणा के लिए सीट खाली करेगा। खबरें तो यहां तक हैं कि कांग्रेस अपने किसी विधायक से सीट खाली कराने की बजाए भाजपा के किसी विधायक से सीट खाली कराने की फिराक में है...जैसा 2007 में भाजपा ने किया था...औऱ धूमाकोट से कांग्रेस विधायक टीपीएस रावत को लोकसभा सीट का लालच देकर उनसे सीट खाली करवाई थी। अगर कांग्रेस की ये रणनीति सफल होती है तो कांग्रेस भाजपा से अपना बदला भी पूरा कर लेगी। हालांकि ये काम कांग्रेस के लिए बिल्कुल भी आसान नहीं है...लेकिन फिर भी कांग्रेस कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। खबर तो यहां तक है कि कांग्रेस की नजरें सहसपुर विधानसभा सीट पर है...जहां से भाजपा के सहदेव पुंडीर विधायक हैं...औऱ सहदेव पुंडीर बहुगुणा के लिए सीट भी खाली कर सकते हैं। कांग्रेस की ये रणनीति अगर फेल हो जाती है तो फिर लाख टके का सवाल ये है कि आखिर बहुगुणा को कौन सिपहसालार अपने नेता के लिए विधायकी से इस्तीफा देगा। गंगोत्री से विधायक विजयपाल सजवाण, रायपुर से विधायक उमेश शर्मा काउ, प्रतापनगर से विधायक विक्रम सिंह नेगी, नरेन्द्रनगर से विधायक सुबोध उनियाल औऱ टिहरी से निर्दलीय विधायक दिनेश धनै मुख्यमंत्री बहुगुणा के बाहद करीबी माने जाते हैं...और अपने नेता के लिए खाली कर सकते हैं सीट। हालांकि बहुगुणा के पास अभी चुनाव लड़ने के लिए करीब चार महीने का वक्त है...लेकिन बहुगुणा इस इंतजार को जल्द खत्म करना चाहेंगे...इसके लिए बकायदा जोड़ तोड़ शुरू भी हो गयी है...लेकिन लाख टके का सवाल बरकरार है कि आखिर वो चुनाव लड़ेंगे कहां से...कौन करेगा बहुगुणा के लिए सीट खाली। बहुगुणा की निगाहें भी अपनों की तरफ ही है लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद से बहुगुणा अपनों के भी कुछ नहीं कर पाए...अपने मंत्रिमंडल में किसी अपने को जगह नहीं दिला पाए...ऐसे में उनके अपने भी उनसे कहीं न कहीं नाराज़ भी है। बहरहाल भाजपा में सेंध लगाने के साथ ही अपनों को सीट खाली कराने के लिए मनाने की जोड़तोड़ जारी है...देखते हैं कांग्रेस की जोड़तोड़ क्या रंग लाती है...भाजपा के गढ़ में लगेगी सेंध या फिर कांग्रेस के गढ़ में ही होगी जंग...सवाल लाख टके का है...लेकिन जो भी हो जंग तो रोमांचक होने की उम्मीद है।

दीपक तिवारी
deepaktiwari555@gmail.com


मंत्री बनेंगे हरक ?



मंत्री बनेंगे हरक ?

हरक सिंह रावत उत्तराखंड कांग्रेस में एक ऐसा नाम जो नेता प्रतिपक्ष होने के नाते चुनाव से पहले से ही कांग्रेस में मुख्यमंत्री की बड़े दावेदार थे...लेकिन जब मुख्यमंत्री की कुर्सी न मिली तो हरक ने कर दी बगावत...ऐसे में हरक ने ऐलान कर दिया कि मुख्यमंत्री की कुर्सी न मिली न सही...लेकिन वे अब मंत्रीपद भी नहीं लेंगे...लेकिन फिर भी मंत्रीमंडल में एक कुर्सी खाली छोड़ दी गयी कि शायद देर सबेर हरक मान जाएंगे तो उन्हें कैबिनेट मंत्री बना दिया जाएगा...लेकिन हरक नहीं मानें...ऐसे में हरक को डिप्टी सीएम बनाने की चर्चाएं जोर पकड़ने लगी...लेकिन जब आलाकमान ने प्रदेश में डिप्टी सीएम के पद से साफ इंकार कर दिया तो हरक को लेकर फिर असमंजस कि स्थिति बन गयी...कि आखिर हरक को कैसे एडजस्ट किया जाए। दिल्ली में आज के घटनाक्रम से एक बार फिर से हरक सिंह के मंत्री बनने की संभावनाएं प्रबल होने लगी हैं। दरसअल दिल्ली में डेरा डाले बैठे हरक ने मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से आज सुबह उनके दिल्ली स्थित निवास में जाकर मुलाकात की...इस मुलाकात के तुरंत बाद बहुगुणा दस जनपथ पहुंचे...जहां पर उन्होंने सोनिया गांधी से मुलाकात की...जिसके बाद से ही ये चर्चाएं जोर पकडने लगी है कि बहुगुणा मंत्रिमंडल की खाली पड़ी कुर्सी शायद अब हरक सिंह को ही मिलेगी। पहले हरक की बहुगुणा से मुलाकात और फिर बहुगुणा का दस जनपथ पहुंचना ये साफ संकेत दे रहा है कि हरक सिंह को एडजस्ट करने की कवायद तेज हो गयी है...औऱ बहुत जल्द बहुगुणा आलाकमान के आदेश के बाद इसका ऐलान भी कर देंगे कि प्रदेश के 11वें कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत ही होंगे। देर से ही सही हरक सिंह रावत को भी शायद ये एहसास हो गया होगा कि अब जिद पर अड़ने से कुछ नहीं होने वाला...जब हरीश रावत की बगावत उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी न दिला पायी तो कैसे उनकी ये तमन्ना पूरी होती। ऐसे में धारी देवी की कसम खाकर मंत्री पद न लेने का ऐलान करने वाले हरक सिंह रावत को समझ में आ गया होगा कि बिना कुर्सी के पांच साल सेवा करना आसान काम नहीं है...लिहाजा खाली पड़ी मंत्री की कुर्सी ले ही ली जाए...औऱ धारी देवी से कसम तोड़ने की माफी मांग ली जाए। वैसे भी हरक सिंह रावत राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं...इतना तो समझते ही होंगे कि राजनीति में सही समय पर सही फैसला लेने से चूक गये तो बाद में पछतावे के अलावा हाथ कुछ नहीं लगता।

दीपक तिवारी
deepaktiwar555@gmail.com

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

कहीं देर न हो जाए...


कहीं देर न हो जाए...
मंगलवार को दिल्ली में राष्ट्रीय गंगा बेसिन प्राधिकरण की अहम बैठक हुई। बैठक की अध्यक्षता करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि हमारे पास समय कम है औऱ गंगा को बचाने के लिए त्वरित कदम उठाए जाने की जरूरत है...मनमोहन सिंह ने गंगा के संरक्षण को लेकर अपनी चिंता जाहिर करते हुए इस दिशा में तेजी से काम करने की बात भी कही...लेकिन प्रधानमंत्री के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि जब उन्हें गंगा नदी की इतनी ही चिंता थी...तो गंगा की सफाई के लिए 2009 में प्रधानमंत्री की ही अध्यक्षता में गठित गंगा बेसिन की बैठक सिर्फ दो ही बार क्यों हुई...औऱ 17 अप्रेल को भी बैठक इसलिए बुलाई गयी...क्योंकि गंगा की अविरलता के लिए पर्यावरणविद जीडी अग्रवाल ने हरिद्वार में अनशन शुरू कर दिया था...औऱ गंगा की अविरलता के साथ ही गंगा बेसिन की बैठक बुलाए जाने की भी वे मांग कर रहे थे...जब उन्होंने अऩशन नहीं तोड़ा तो तब प्रधानमंत्री ने 23 मार्च को अग्रवाल को आश्वासन दिया था कि 17 अप्रेल को गंगा बेसिन की बैठक बुलाई जाएगी...जिसके बाद ही जीडी ने अपना अनशन समाप्त किया था...यानि कि मंगलवार को हुई इस बैठक में प्रधानमंत्री भले ही गंगा की वर्तमान दशा पर चिंतित दिखाई दे रहे हों...लेकिन इस बैठक की वजह ये बिल्कुल भी नहीं है। 2009 में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में गंगा बेसिन का गठन हुआ तो गंगा भक्तों को उम्मीद जगी थी कि शायद अब गंगा की दुर्दाशा सुधरेगी...लेकिन गंगा बेसिन का गठन खानापूर्ति ही साबित हुआ...तीन सालों में इतने अहम मुद्दे पर सिर्फ दो बार प्रधानमंत्री को गंगा संरक्षण की याद आयी। बहरहाल बात करते हैं बैठक की...बैठक में पांच राज्यों उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्रियों ने शिरकत की...इसके साथ ही गंगा की अविरलता की मांग कर रहे प्रमुख संत भी बैठक में शामिल हुए। बैठक में सबसे अहम मुद्दा उत्तराखंड में गंगा पर बनी बिजली परियोजनाएं थी। गंगा भक्त चाहते हैं कि गंगा पर बनी परियोजनाएं तत्काल बंद कर दी जाएं...जबकि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा करोडों की लागत से निर्मित इन परियोजनाओं को जारी रखने के पक्ष में थे...बैठक में बहुगुणा ने जोरदार तरीके से परियोजनाओं के समर्थन में आवाज़ बुलंद भी की...लेकिन बैठक में मौजूद चार राज्यों के मुख्यमंत्री औऱ संत उनके इस कदम में खिलाफ थे। वहीं पर्यावरणविद जीडी अग्रवाल भी स्वास्थ्य खराब होने की वजह से बैठक में नहीं पहुंचे...ऐसे में बैठक में इस पर कोई फैसला नहीं हो पाया। गंगा की अगर बात करें तो जीवनदायिनी माने जाने वाली गंगा नदी 11 राज्यों की 40 प्रतिशत आबादी को पानी मुहैया कराती है...लेकिन देवी का दर्जा प्राप्त इस नदी में रोजाना 90 करोड़ लीटर दूषित पानी जाता है...जबकि गंगा की सफाई के लिए लगे सीवेज प्लांट रोजाना केवल एक अऱब दस करोड़ लीटर गंदे पानी के शोधन करने की स्थिति में है। गोमुख से गंगासागर तक गंगा लगातार मैली हो रही है...औऱ गंगा की सफाई के लिए ही 2009 में राष्ट्रीय गंगा बेसिन प्राधिकरण का गठन हुआ औऱ इसके गंगा की सफाई पर करोड़ों रूपये खर्च भी कर दिए गये...लेकिन गंगा इन तीन सालों में और ज्यादा मैली हो गयी...ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या सिर्फ गंगा की सफाई के नाम पर प्राधिकरण आदि का गठन करने से गंगा को उसके पुराने स्वरूप में लौटाया जा सकता है...क्या सिर्फ दिल्ली में साल में एक बार बंद कमरे में गंगा संरक्षण पर चिंता जाहिर करते ये काम किया जा सकता है...नहीं न...लेकिन ये बात हमारे प्रधानमंत्री औऱ उन जिम्मेदार लोगों को क्यों नहीं समझ आती जो गंगा की सफाई के इस अभियान से सीधे जुड़े हुए हैं...औऱ जिनके पास संसाधन भी है औऱ इसके लिए पैसों की कोई कमी भी नहीं है...कमी है तो बस ईच्छाशक्ति की। शायद इन लोगों को ये बात समझ भी आ जाए...लेकिन कहीं देर न हो जाए।

दीपक तिवारी
 deepaktiwari555@gmail.com

बुधवार, 28 मार्च 2012

लॉयल्टी


लॉयल्टी

ज़माना जरूर बेईमानी का है...लेकिन बेईमाने के धंधे में भी लॉयलटी की ही कदर है...जो लॉयल नहीं है वो किसी काम के नहीं...फिर चाहे धंधा बेईमानी का हो...या फिर...राजनीति। कहते भी हैं कि लॉयल्टी में बड़ी ताकत होती है...अपने काम के प्रति हमेशा लॉयल रहो...जिसके लिए काम कर रहे हो...जिसके साथ काम कर रहे हो उसके लिए हमेशा लॉयल रहो...देर सबेर लॉयल्टी का ईनाम आपको जरूर मिलेगा...लेकिन ज़रा सोचो तब किसी पर क्या गुजरती होगी...जब लॉयल रहने के बाद आपको किनारे कर दिया जाए। आप भी सोच रहे होंगे कि आखिर ये लॉयल्टी का बात आखिर उठी क्यों है...दरअसल उत्तराखंड में चुनाव के नतीजे क्या आए...मानो कांग्रेस के विधायकों औऱ नेताओं ने दिखाना शुरू कर दिया कि वे अपने नेताओं के प्रति कितने लॉयल हैं। सवाल मुख्यमंत्री की कुर्सी का था...लेकिन कुर्सी एक थी औऱ दावेदार कई...ऐसे में दावेदारों में ही जंग छिड़ गयी कि पार्टी के लिए किसने कितनी सेवा की है...पार्टी के लिए कौन कितना लॉयल है। कसर तो किसी ने नहीं छोड़ी थी...चाहे हरीश रावत हों...विजय बहुगुणा हों...सतपाल महाराज हों...हरक सिंह रावत हों...इंदिरा हृद्येश हों या फिर यशपाल आर्य...लेकिन सबको चौंकाते हुए बाजी मार ले गये विजय बहुगुणा...औऱ मिल गयी मुख्यमंत्री की कुर्सी...ऐसे में दूसरे दावेदारों इसे कैसे बर्दाश्त करते...उनके समर्थक विधायकों को मिल गया मौका...अपने पसंदीदा नेता के लॉयल्टी टेस्ट में पास होने का...फिर उन्होंने देर कहां करनी थी...खोल दिया आलाकमान के फैसले के खिलाफ मोर्चा...आखिर ऐसे मौके बार – बार तो आते नहीं...यहां जो दौड़ में पीछे थे...उन्होंने तो आलाकमान के फैसले को ही नियति मान लिया...लेकिन जो दौड़ में आगे रहने के बाद पिछड़ गये थे...उन्होंने हार नहीं मानी औऱ अपना लिए बगावती तेवर। आलाकमान पर फैसला बदलने के लिए खूब जोर डाला...लेकिन जब लगा दाल नहीं गलने वाली तो समझौता का रास्ता तो था ही...कुर्सी न मिली न सही समझौते के बहाने कुछ तो हाथ लगेगा...सीधा मतलब है भागते भूत की लंगोटी ही सही। चुनाव में खंडित जनादेश मिला था...निर्दलीय, यूकेडी पी ऱऔ बसपा विधायकों के समर्थन की बैसाखी से सरकार खडी थी...तो दस जनपथ भी बेबस था...समझौते के बिंदुओं पर लगा दी मुहर। अब समझौते के बहाने हरीश रावत एंड कंपनी को तो मिल गयी सरकार में बड़ी हिस्सेदारी...लेकिन जो बहुगुणा के लॉयल रहे...पार्टी के लॉयल रहे वे रह गये खाली हाथ...यानि कि लॉयल्टी टेस्ट में पास होने के बाद भी उम्मीद के विपरित सौगात तो मिली नहीं दरकिनार कर दिए गये...यानि की लॉयल्टी...राजनीति से मात खा गयी...कहते भी हैं राजनीति में सब चलता है...सब कुछ होता है...या कहें कुछ भी हो सकता है...इसलिए जनाब जब राजनीति के मैदान में हो...तो हर चीज के लिए तैयार रहो...राजनीति में लॉयल्टी से कुछ नहीं होता...होता है तो सही समय पर सही फैसला लेने से...यानि मौका देखो के चौका मारो...यही राजनीति है...औऱ कुर्सी पानी है तो सिर्फ लॉयल्टी से काम नहीं चलने वाला।
दीपक तिवारी

सोमवार, 19 मार्च 2012

बहुगुणा की मुश्किल


टीम बहुगुणा
विजय बहुगुणा ने ऐलान तो कर दिया है कि मंगलवार को वे मंत्रीमंडल का गठन करेंगे...लेकिन कांग्रेस में मचे बवाल के बाद बहुगुणा के लिए ये काम हरगिज आसान नहीं होगा...ऐसे में कौन कौन शामिल होगा बहुगुणा की टीम में इसको लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। सीएम की कुर्सी की लड़ाई के बाद बहुगुणा के लिए ये काम सबसे बडी मुश्किल है...एक तरफ हरीश रावत समर्थक विधायक बगावत का झंडा बुलंद करके बैठे हैं और दूसरी तरफ हरक सिंह रावत की नाराजगी जग जाहिर हो चुकी है तो दोनों खेमों को बहुगुणा कैसे संतुष्ट कर पाएंगे। वहीं निर्दलियों औऱ यूकेडी पी औऱ बसपा की बैसाखियों के सहारे खडी बहुगुणा की सरकार के लिए उन्हें भी मंत्री पद से नवाजना एक मजबूरी है...तीन निर्दलीय, एक यूकेडी पी औऱ 3 बसपा के विधायकों में से अगर चार मंत्रीपद इधर चले जाते हैं तो बहुगुणा के पास सात मंत्री पद बचते हैं जिनमें उन्हें हरीश रावत खेमे को संतुष्ट करने के साथ ही पार्टी के वरिष्ठ विधायकों का भी ख्याल रखना है। ऐसे में मंत्रीमंडल की जो तस्वीर जो फिलहाल जेहन में उभर रही है वो कुछ ऐसी है।
डालते हैं एक नजर बहुगुणा के संभावित मंत्रीमंडल पर...
इंदिरा हृद्येश
अमृता रावत
सुरेन्द्र सिंह नेगी
यशपाल आर्य
प्रीतम सिंह
दिनेश अग्रवाल
दिनेश धनै (निर्दलीय)
हरीश दुर्गापाल (निर्दलीय)
मंत्री प्रसाद नैथानी (निर्दलीय)
प्रीतम सिंह पंवार (यूकेडी पी)
सुरेन्द्र राकेश (बसपा)
वहीं गोविंद कुंजवाल विधानसभा अध्यक्ष बनाए जा सकते हैं।
...ये वे कुछ नाम है जिन्हें सारे समीकरणों के बाद भी बहुगुणा किसी कीमत पर नकारने की स्थिति में नहीं होंगे...लेकिन इसके बाद भी कांग्रेस में मचा बवाल आसानी से शांत होने वाला नहीं है...बहरहाल बुहुगुणा जब अपनी टीम का जब ऐलान करेंगे तो तस्वीर साफ हो जाएगी कि कांग्रेस में थमा तूफान शांत होगा या फिर पार्टी औऱ बहुगुणा के लिए कोई नयी मुसीबत लेकर आएगा।
दीपक तिवारी

बुधवार, 14 मार्च 2012

कुर्सी बडी चीज है


कुर्सी बडी चीज है

बहुगुणा को मुख्यमंत्री की कुर्सी क्या मिली मानो प्रदेश कांग्रेस में भूचाल आ गया...राजनीती में कुर्सी बडी चीज है...ऐसे में कुर्सी की आस लगाए बैठे कांग्रेसियों से मानो उनका सब कुछ छीन लिया गया हो। कुर्सी के सबसे प्रबल दावेदार केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत औऱ उनके समर्थको विधायकों ने कुर्सी हाथ से निकलती देख बगावत कर दी। नतीजन देहरादून में शपथ ग्रहण समारोह में सिर्फ गिनती के ही विधायक पहुंचे...तो सरकार के भविष्य पर भी सवाल उठने लगे...हरीश रावत औऱ उनके समर्थकों के बगावती तेवरों को देख लगने लगा था कि कुर्सी की लडाई कांग्रेस को ले डूबेगी...लेकिन दिल्ली में आज के घटनाक्रम के बाद इसमें विराम लगता दिखाई दे रहा है। हरीश रावत आज संसद के बजट सत्र में नहीं पहुंचे...उनके समर्थक सांसद प्रदीप टम्टा भी संसद से नदारद रहे। माना जा रहा था कि हरीश रावत और उनके समर्थक विधायकों के बगावती तेवर औऱ उग्र हो सकते हैं...लेकिन दिल्ली में मौजूद कांग्रेसी सूत्रों की मानें तो हरीश रावत ने आज अपने सरकारी निवास पर समर्थक विधायकों औऱ सांसद प्रदीप टम्टा के साथ चर्चा के बाद नरम रूख अपनाने का फैसला लिया है। सूत्रों की मानें तो हरीश रावत आलाकमान के सामने शक्ति प्रदर्शन करना चाहते थे कि आलाकमान ने उनको कुर्सी ना सौंप गलत फैसला लिया है...औऱ भविष्य़ में उनको नजरअंदाज किया गया तो कम से कम उत्तराखंड में कांग्रेस के लिए भारी मुश्किलें खडी हो सकती हैं। हरीश रावत का ये भी कहना है कि बहुगुणा को सीएम बनाने से पहले आलाकमान ने उनसे कोई चर्चा नहीं की...जब्कि वे 40 सालों से उत्तराखंड की राजनीति में सक्रिय हैं। बहरहाल हरीश रावत पार्टी को अपनी शक्ति दिखाना चाहते थे...जो उन्होंने दिखा भी दिया...ऐसे में हरीश रावत के तेवर नरम पडने के बाद बहुगुणा के लिए ये जरूर राहत भरी खबर है...वहीं आलाकमान हरीश रावत को कैबिनेट मंत्री का ईनाम देती है या फिर हरीश रावत औऱ उनके समर्थकों को बगावत की सजा...ये तो वक्त ही बताएगा...फिलहाल मुख्यमंत्री बहुगुणा जरूर कह रहे होंगे...थैंक्यू हरीश रावत।

दीपक तिवारी

रेल का सपना


रेल का सपना
रेल बजट से उत्तराखंड वासियों को इस बार बडी उम्मीद थी...कि शायद इस बार बजट में रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी पहाड में रेल चढाने के लिए बजट में जरूर इसे शामिल करेगे...लोगों की ये उम्मीद बेवजह भी नहीं थी...इसके पीछे की एक बडी वजह थी...प्रदेश के पांचों सांसद औऱ सभी के सभी कांग्रेसी...और केन्द्र में सरकार भी कांग्रेस की...लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात...रेल मंत्री ने बजट में उत्तराखंड को दरककिनार कर दिया। हालांकि रेल बजट पेश करने से पहले दिनेश त्रिवेदी का कहना था कि बजट से पहले सभी सांसदों औऱ सभी प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों से सलाह मशवरा किया गया है...ताकि हर राज्य के लिए बजट में कुछ ना कुछ हो...लेकिन बजट पेश होने के बाद साफ हो गया कि रेल मंत्री की बातों में कितना दम था। बजट में उत्तराखंड के उपेक्षित रहने के पीछे बडी वजह प्रदेश के पांचों कांग्रेसी सांसद हरीश रावत, प्रदीप टम्टा, के सी सिंह बाबा, सतपाल महाराज और विजय बहुगुणा भी है...जाहिर है ये पांचों सांसद प्रदेश की जनता का आवाज़ को पुरजोर तरीके से रेल मंत्री के सामने नहीं रख पाए...जिस वजह से छुकछुक गाडी में सफर करना पहाड के लोगों के लिए एक सपने की तरह रह गया। खास बात यह है कि आजादी के बाद से भारतीय़ रेल ने लंबी छलांग लगायी...लेकिन उत्तराखंड में आज़ादी के बाद से एक किमी भी नई रेल लाईन नहीं बिछ पायी...इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड कितना उपेक्षित रहा है। हालांकि कुछ समय पहले रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी ने गौचर में ऋषिकेश से लेकर कर्णप्रयाग तक की प्रस्तावित रेल लाईन का शिलान्यास किया था...लेकिन ये प्रस्तावित रेल मार्ग जमीन के मसले को लेकर राजनीति की भेंट चढ गया...ऐसा ही कुछ हाल चंपावत – बागेश्वर रेल लाईन का भी हुआ जो सर्वे हो जाने के बाद भी अधर में लटकी हुई है। हालत ये है कि उत्तराखंड में रेल मैदान को छूती हुई ही निकल जाती है...औऱ पहाड के लिए रेल आज भी एक सपना बना हुआ है। जिन मैदानी इलाकों में रेल सेवा है भी वहां के लोग लंबे समय से देश के प्रमुख शहरों के लिए सीधी रेल सेवा की मांग कर रहे हैं...लेकिन उनकी ये आवाज दिल्ली पहुंचने से पहले ही दम तोड देती है। बहरहाल उत्तराखंड में अपनी महत्वकांक्षाओं को पूरा करने को लेकर प्रदेश के सांसद अपनी ही पार्टी के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद करते नहीं थकते...लेकिन प्रदेश के विकास के लिए प्रदेशवासियों के लिए उनके पास समय नहीं है...शायद यही वजह है कि रेल के नक्शे में उत्तराखंड का वजूद ना के बराबर है...औऱ पहाड पर रेल का चलना पहाड के लोगों के लिए किसी सपने से कम नहीं है। उम्मीद करते हैं कि शायद हमारे सांसद दिल्ली में अपनी आवाज प्रदेश की जनता के लिए बुलंद करेंगे ताकि पहाड का विकास हो यहां के लोगों को विकास हो...औऱ अगला रेल बजट उत्तराखंड के लिए खुशियों की सौगात लेकर आये।
दीपक तिवारी

बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

आपदा से कम नहीं सडक हादसे...



बाईक औऱ स्कूटर पर स्टंट करते युवा आपको कहीं ना कहीं जरूर दिख जाएंगे...स्टंट करने में भले ही इन युवाओं को खूब मजा आता हो...लेकिन ये नहीं जानते कि इनका ये मजा ना जाने कब इऩके लिए जीवन भर की सजा बन जाए। बाईक और स्कूटर पर खतरनाक स्टंट करते युवाओँ की टोली आये दिन किसी ना किसी हाईवे पर दिखाई दे जाती है...इन युवाओं को ना तो पुलिस का खौफ होता है...औऱ ना ही मौत का। सडक दुर्घटनाओं में 40 प्रतिशत लोगों की मौत टू व्हीलर औऱ ट्रक की वजह से होती है...जिसमें भी अधिकतर मौत सिर में चोट लगने की वजह से होती हैं...यानि की हेलमेट ना पहनने के कारण भी लाखों लोग हर साल बेमौत मारे जाते हैं। दुनिया भर में हर घंटे तकरीबन 40 लोग सड़क दुर्घटना में मारे जाते हैं जिनकी उम्र 25 साल से कम होती है। भारत में हर साल करीब अस्सी हजार से ज्यादा लोगों की मौत सडक दुर्घटना में होती है...करीब एक करोड से ज्यादा लोग गंभीर रूप से जख्मी होते हैं...और लगभग तीन लाख लोग हमेशा के लिए अपाहिज हो जाते हैं। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाईजेशन के मुताबिक पूरी दुनिया के मुकाबले, भारत सड़क दुर्घटनाओं में अव्वल है...2010 की ही अगर बात करें तो तकरीबन एक लाख 60 हजार लोग सड़क दुर्घटना में मारे गए थे। नेशनल क्राईम रिकार्ड ब्यूरो (एन.सी.आर.बी) की रिपोर्ट के मुताबिक आंध्र प्रदेश सड़क दुर्घटना में 12 प्रतिशत के साथ सबसे बड़ा भागीदार है। आंध्र प्रदेश के बाद दूसरे नंबर पर 11 प्रतिशत के साथ उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र है। दुनिया में भारत सडक दुर्घटनाओं में अव्वल है...भारत में इतनी मौतें शायद किसी बडी आपदा के आने से नहीं होती हैं जितनी मौत सडक दुर्घटनाओं में होती है। देखा जाए तो भारत में सडक दुर्घटनाएं आपदा का रूप ले चुकी हैं...और सडक पर चलते चलते आने वाली ये आपदा कब किसे मौत की नींद सुला दे कोई नहीं जानता। सडक पर आने वाली इस आपदा के शिकार लोगों में टू व्हीलर पर बिना हेलमेट के चलने वाले लोगों की संख्या कहीं ज्यादा है। ऐसा नहीं है कि हम इस आपदा से बच नहीं सकते...हम इस आपदा से बच सकते हैं अगर हम जरा सी सावधानी बरतें...टू व्हीलर चलाते समय हेलमेट पहनें तो काफी हद तक हम इस आपदा में होने वाली मौत के आंकडे को कम कर सकते हैं। आज की भागदौड भरी जिंदगी में जीवन का पहिया तेजी से दौड रहा है...फैसला आपके हाथ में है...कि आपको दौडते रहना है...या फिर किसी दिन अचानक रूक कर बिखर जाना है।

दीपक तिवारी

सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

मैं आज़ाद हूं...


मैं आज़ाद हूं...

गुलामी के उस दौर में जब गोरों के जुल्म को देश के तमाम लोगों ने नियति मान लिया था...उसी दौर में एक किशोर गोरी हुकूमत की ताबूत में कील ठोकने पर आमदा हो जाए तो इसे हम क्या कहेंगे...गोरों के बनाये कायदे कानून तोडने के लिये एक छोटे से लडके को जिसकी उम्र १५ या १६ साल की थी और जो अपने को आज़ाद कहता था उसे बेंत की सजा दी गयी। वह नंगा किया गया और बेंत की टिकटी से बांध दिया गया। जैसे-जैसे बेंत उस पर पडते थे और उसकी चमडी उधेड डालते थे...वह 'महात्मा गान्धी की जय' चिल्लाता था। हर बेंत के साथ वह लडका तब तक यही नारा लगाता रहा, जब तक वह बेहोश न हो गया। बाद में वही लडका उत्तर भारत के क्रांतिकारियों के दल का एक बडा नेता बना...जी हां मैं बात कर रहा हूं...महान बलिदानी क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की जो 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में गोरी हुकुमत से युद्ध लड़ते-लड़ते शहीद हो गए थे...1922 में गाँधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन को अचानक बन्द कर देने के कारण आजाद की विचारधारा में बदलाव आया और वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़ कर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसियेशनके  सक्रिय सदस्य बन गये। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में 9 अगस्त 1925 को काकोरी काण्ड को अंजाम दिया इसके बाद सन् 1927 में 'बिस्मिल' के साथ 4 प्रमुख साथियों के बलिदान के बाद उन्होंने उत्तर भारत की सभी क्रान्तिकारी पार्टियों को मिलाकर एक करते हुए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसियेशन का गठन किया तथा भगत सिंह के साथ लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत का बदला सॉण्डर्स का वध करके लिया। चन्द्रशेखर आज़ाद ने अपने स्वभाव से साहसी, स्वाभिमानी, हठी और वचन के पक्के थे। वे न दूसरों पर जुल्म कर सकते थे और न स्वयं जुल्म सहन कर सकते थे। ईमानदारी और स्वाभिमान के ये गुण बालक चन्द्रशेखर ने अपने पिता से विरासत में सीखे थे। साण्डर्स की हत्या और दिल्ली एसेम्बली बम काण्ड में फांसी की सजा पाने वाले तीन क्रान्तिकारी साथियों भगत सिंह, राजगुरुसुखदेव की शहादत के बाद चन्द्रशेखर आज़ाद बेहद दुखी हो गये थे। एक रोज इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में बैठ आजाद को गोरे सिपाहियों ने घेर लिया...आजाद ने अंग्रेजों के आगे आत्मसमर्पण करने की बजाए जान देना बेहतर समझा और अपने पास बची आखिरी गोली खुद को मार ली। यह दुखद घटना 27 फरवरी 1931 के दिन घटित हुई और हमेशा के लिये इतिहास में दर्ज हो गयी। आजाद की पुण्यतिथी पर आपको आजाद के जीवन के कुछ संस्मरणों से अवगत कराना चाहूंगा...एक बा‍र आजाद कानपुर के मशहूर व्यवसायी सेठ प्यारेलाल के निवास पर एक समारोह में आये हुये थे...प्यारेलाल प्रखर देशभक्त थे और प्राय: क्रातिकारियों की आथि॑क मदद भी किया क‍रते थे...आजाद और सेठ जी बातें कर ही रहे थे तभी सूचना मिली कि पुलिस ने हवेली को घेर लिया है...प्यारेलाल घबरा गये फिर भी उन्होंने आजाद से कहा कि वे अपनी जान दे देंगे पर उनको कुछ नहीं होने देंगे। आजाद हँसते हुए बोले-"आप चिंन्ता न करें, मैं कानपुर के लोगों को मिठाई खिलाये बिना जाने वाला नहीं।" फिर वे सेठानी से बोले- "आओ भाभी जी! बाह‍र चलकर मिठाई बांट आयें।" आजाद ने गमछा सिर पर बाँधा, मिठाई का टो़करा उठाया और सेठानी के साथ चल दिये। दोनों मिठाई बांटते हुए हवेली से बाहर आ गये। बाहर खडी पुलिस को भी मिठाई खिलायी। पुलिस की आँखों के सामने से आजाद मिठाई-वाला बनकर निकल गये और पुलिस सोच भी नही पायी कि जिसे पकडने आयी थी वह परिन्दा तो कब का उड चुका है...चन्द्रशेखर आज़ाद हमेशा सच बोलते थे। एक बार आजाद पुलिस से छिपकर जंगल में साधु के भेष में रह रहे थे तभी वहां एक दिन पुलिस आ गयी। पुलिस ने साधु वेश धारी आजाद से पूछा-"बाबा....आपने आजाद को देखा है क्या?" साधु भेषधारी आजाद तपाक से बोले- "बच्चा आजाद को क्या देखना, हम तो हमेशा आजाद रहते‌ हें हम भी तो आजाद हैं।" पुलिस समझी बाबा सच बोल रहा है, वह शायद गलत जगह आ गयी है अत: हाथ जोडकर माफी माँगी और उलटे पैरों वापस लौट गयी। ऐसे थे आजाद...27 फरवरी को चंद्रशेखर आजाद की पुण्यतिथि थी...जिनका योगदान भारत की आजादी में इतना अहम है कि जब ये योद्धा गोरों से लोहा लेते हुए शहीद होता है तो उसकी शहादत को महात्मा गांधी से लेकर मदनमोहन मालवीय सरीखे स्वतंत्रता सेनानी महान बलिदान करार देते हैं...लेकिन हमारे देश में बडे – बडे नेताओं के जन्मदिन औऱ पुष्यतिथी पर तो बडे बडे आजोयन होते हैं...लेकिन देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले महान क्रांतिकारियों के ना तो जन्मदिन किसी को याद रहता है औऱ ना ही शहादत। हमारे देश की सरकार को तो आजाद की शहादत तो याद रही नहीं...औऱ ना ही उऩ राजनीतिक दलों के नुमाइंदों को जो अपनी पार्टी के किसी नेता के जन्मदिन या पुण्यतिथी पर शहरों को बैनर – पोस्टरों से पाट देते हैं...लेकिन जिनकी बदौलत आज ये लोग खुली हवा में सांस ले पा रहे हैं...उनकी जन्मदिन औऱ शहादत तक इन्हें याद नहीं रहती।
दीपक तिवारी

गंगा तेरे वास्ते...



गंगा तेरे वास्ते बातें तो बड़ी बड़ी होती हैं...आंदोलन किये जाते हैं...धरना प्रदर्शन किये जाते हैं...करोडों की योजनाएं बनायी जाती हैं...धरना...प्रदर्शन औऱ आंदोलनों से कोई अपनी राजनीति चमका रहा होता है...तो करोडों की योजनाओं से गंगा को साफ करने वाले अपनी जेबें रोशन कर रहे होते हैं...ये सब होता है गंगा तेरे वास्ते...लेकिन मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं कि गंगा तू आज पहले से और ज्यादा मैली हो गयी है...तेरी अविरलता...निर्मलता...स्वच्छता धुंधली पडती जा रही है। इसी अविरलता और स्वच्छता को लेकर संत समाज हमेशा से आवाज बुलंद करता रहा है...लेकिन ये वही संत हैं...जो परंपरा के नाम पर किसी संत के निधन पर उस संत के शव को जल समाधि देने की बात कहते हुए गंगा में बहा देते थे...उस शव से गंगा में फैल रहा प्रदूषण इन संतों को नजर नहीं आता था...लेकिन सालों पुरानी ये परंपरा को एक संत ने ही तोडा है...एक नया इतिहास रचा है...ताकि गंगा की निर्मलता...स्वच्छता बरकरार रहे...गंगा तेरे वास्ते...महंत शंकर दास ने अपना शरीर छोडने से पहले संत समाज से कहा था कि जल समाधि के नाम पर उनका शव गंगा में ना बहाया जाए...बल्कि उसे जलाया जाए...महंत ने इसकी शुरूआत तो कर दी है...लेकिन बडा सवाल ये है कि क्या संत समाज महंत शंकर दास की गंगा के वास्ते इस आहुति की जोत को क्या जलाए रखने में सफल होगा...या फिर महंत शंकर दास की आहुति की ये जोत...उऩकी राख ठंडी होने के साथ ही मंद पड़ जाएगी। महंत शंकर दास ना सिर्फ संत समाज के लिए ये जोत जलाकर गये हैं...बल्कि गोमुख से लेकर गंगासागर तक गंगा के तट पर बसने वाले उन 40 करोड लोगों के लिए भी इस जोत को रोशन करके गये हैं...लेकिन क्या ये 40 करोड लोग इस जोत की मशाल को थाम कर गंगा के तटों पर फेंके जाने वाले करोडों टन कचरे की मात्रा को कम करने का संकल्प लेंगे। गंगा की अविरलता औऱ स्वच्छता कुछ हद तक बच सकती है...अगर संत समाज और गंगा के तट पर बसने वाले 40 करोड लोग महंत शंकर दास की जोत को जलाए रखने में कामयाब रहते हैं। गंगा को साफ करने के लिए करोडों खर्च किये जा चुके हैं औऱ करोडों की योजनाएं पाइपलाइन में हैं...लेकन गंगा की अविरलता और स्वच्छता सही मायने में तब तक नहीं लौट सकती जब तक हम गंगा में फेंकें जा रहे करोडों टन कचरे को रोकने में कामयाब नहीं होते...और ये सब होगा आपकी अपनी इच्छाशक्ति से...तो आज आप भी संकल्प लें अपने आस पास की गंगा को गंगा ही रहने दें...कोई गंदा नदी नाला ना बनने दे...सिर्फ गंगा के वास्ते।

दीपक तिवारी

गुरुवार, 19 जनवरी 2012

जूतम पैजार


जूतम पैजार

पिछले कुछ समय से जूते का चलन बढता जा रहा है....फर्क सिर्फ इतना है कि पहले जूता सिर्फ पैर में नजर आता था.....लेकिन अब जूता हाथों में हथियार के रूप में नजर आता है...इसका पहला फायदा तो ये है कि आसानी से आप जूते को कडी से कडी सुरक्षा वाली जगह पर ले जा सकते हैं...और मौका मिलने पर भरी सभा में सामने वाले की ईज्जत उतार सकते हैं...औऱ इससे सामने वाले को ऐसी चोट लगती है....कि शायद ही सामने वाले इसका दर्द कभी भूल पाये।
जूता मारने की परंपरा तो बरसों से रही है...कभी चोरी करते पकडे गये किसी चोर को जुतिआया जाता रहा है...तो कभी मनचलों की जूतम- पैजार होती आयी है...लेकिन सबसे पहले जूता रूपी अस्त्र तब सुर्खियों में आया जब ईराक में जॉर्ज बुश पर चला था जूता। पत्रकार मुंतज़र-अल-जैदी ने सबके सामने एक के बाद दो जूते दे मारे थे बुश पर लेकिन किस्मत अच्छी थी कि बच गए बुश।
इसके बाद हिंदुस्तान में भी पत्रकार मुंतज़र-अल-जैदी का फार्मूला खूब हिट हुआ औऱ जूता बन गया नया हथियार...इसके पहले शिकार बने हमारे गृहमंत्री पी चिदंबरम...फिर बारी थी बरसों से पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी की...हथियार रूपी जूते का ये सिलसिला यहीं नहीं रूका समय समय पर इसका भरपूर उपयोग होता रहा...कभी कांग्रेस नेता जनार्दन द्रिवेदी तो कभी सांसद नवीन जिंदल पर। ऐसा नहीं है कि सिर्फ राजनेता ही सरेआम बेईज्जत हुए...टीम अन्ना के सदस्य प्रशांत भूषण और अरविंद केजरीवाल पर भी ऐसे ही हमले हुए। प्रशांत भूषण को जहां एक युवक ने उऩके केबिन में घुसकर जमकर लात घूसों से पीटा...वहीं केजरीवाल पर लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान चप्पल फेंकी गयी।
भरी सभा में नेताओं को बेईज्जत करने का ये तरीका भी खूब हिट हो रहा है। गाहे बगाहे लोग नेताओं पर जूते – चप्पल मारकर उन्हें बेईज्जत करने में नहीं चूक रहे हैं। नेताओं को सरेआम बेईज्जत करने का ये चलन अब दूसरे रूप में भी सामने आ रहा है...जिसके पहले शिकार बने केन्द्रीय मंत्री शरद पवार...एक कार्यक्रम में पहुंचे शरद पवार को तो एक युवक ने उस समय जोरदार थप्पड रसीद कर दिया जब वे पत्रकारों के कुछ सवालों का जवाब दे रहे थे। शरद पवार भले ही युवक के खिलाफ कोई कारवाई न करने की बात कर रहे हों...लेकिन सरेआम कैमरे के सामने पडे थप्पड़ का दर्द शायद ही शरद पवार कभी भूल पाएं।
ऐसा ही कुछ घटनाक्रम पिछले दिनों बाबा रामदेव के साथ भी घटा...जब एक व्यक्ति ने उऩके चेहरे पर दिल्ली में पत्रकार वार्ता के दौरान काली स्याही डाल दी...हालांकि यहां पर बाबा रामदेव के समर्थकों ने इसके पीछे कांग्रेस का हाथ बताते हुए बदले के भाव से दिल्ली में कांग्रेस दफ्तर के बाहर सोनिया गांधी के पोस्टर पर कालिख पोत दी। ये कुछ एक उदाहरण थे जो बीते कुछ समय में घटित हुए...जिनके जरिए कहीं पर नाराज लोगों ने अपने – अपने तरीके से सामने वाले को बेईज्जत किया। हालांकि ज्यादातर ऐसे मामलों में इसके शिकार नेताओं ने बेईज्जत करने वाले को माफ कर बडप्पन दिखाने का प्रयास किया...लेकिन इसका दर्द शायद ही उनके दिल से कभी जाए।
कुल मिलाकर पैरों की शान बढाने वाला जूता जाने कब किसके सिर का ताज बन जाए...कहना मुश्किल है। कभी दूसरों को अपने जूते की नोंक में रखने वाले नेताओं को इसी जूते का भय अब सताने लगा है। 
एक कहावत आपने भी शायद सुनी होगी कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते...ये बात अब शायद आमजनता को भी समझ आ गयी है...इसलिए जनता के पैसे को लूटने वाले भ्रष्ट नेताओं को सबक सिखाने के लिए लोगों ने जूते – चप्प्ल...लात – घूंसे सबका इस्तेमाल बेधडक शुरू कर दिया है...शायद जूतम पैजार के डर से ही सही भ्रष्ट नेताओं को थोडी अक्ल आ जाए। देखते हैं हमारे राजनेताओं को अक्ल आती है या एक बार फिर किसी कोने से किसी नेता पर जूता चलने की खबर पहले आती है।

दीपक तिवारी

गुरुवार, 12 जनवरी 2012

राजनीति


राजनीति 

पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर औऱ गोआ में चुनाव की सरगर्मियां अपने चरम पर हैं...सबकी निगाहें इन चुनाव में हैं। देश की राजनीति में दखल रखने वाले सबसे अहम प्रदेश उत्तर प्रदेश में अपना झंडा बुलंद करने के लिए सभी पार्टियों ने ऐडी चोटी का जोर लगा रखा है। 403 विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में एक बार फिर से महिलाओं के सहारे ही राजनीतिक पार्टियां सत्ता के गलियारों तक पहुंचने का ख्वाब देख रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में सबका सूपडा साफ करने वाली बसपा की कमान जहां एक महिला मायावती के हाथ में है। वहीं भाजपा उमा भारती के सहारे तो कांग्रेस रीता बहुगुणा जोशी के सहारे उत्तर प्रदेश में अपनी खोई जमीन वापस पाने की फिराक में हैं। हालांकि कांग्रेस के लिए राहुल गांधी ने अपनी पूरी ताकत इस चुनाव में झोंक दी है...लेकिन मुख्य भूमिका में कांग्रेस की प्रदेशाध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी ही हैं...दूसरी तरफ भाजपा ने मप्र की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के सहारे उत्तर प्रदेश में अपनी पूरी ताकत लगा दी है। कुल मिलाकर इस चुनाव के जरिए नारी शक्ति एक बार फिर से देश को अपनी ताकत का एहसास कराने को बेताब दिखाई दे रही है। हाल ही में पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों भी हम नहीं नकारा सकते। दोनों ही राज्यों में दबी कुचली व उपेक्षित माने जाने वाली नारी ने एक बार फिर से अपनी शक्ति का एहसास कराया...और अपनी विजयी पताका फहराते हुए राजनीति हल्कों में खलबली मचा दी। पश्चिम बंगाल में जहां 34 सालों से कायम वामपंथी सरकार को जनता ने नकार दिया...वहीं ऐसा ही कुछ तमिलनाडु में भी घटा औऱ करुणानिधी सरकार को भी जनता ने आइना दिखा दिया। पश्चिम बंगाल औऱ तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों में जीतने वाली दोनों पार्टियों तृणमूल कांग्रेस औऱ अन्ना द्रमुक की कमान महिला ममता बनर्जी औऱ जयललिता के हाथ में थी...जनता ने पुरूष की बजाए महिला नेतृत्व पर अपनी मुहर लगायी। जो देश में महिलाओं के लिहाज से एक सकून देने वाली खबर थी...और इससे निश्चित ही महिलाओं में नयी ऊर्जा का संचार भी हुआ है। राजनीति में महिलाओं ने समय समय पर अपनी शक्ति का एहसास सबको कराया है। बात भले ही सोनिया गांधी की करें जब सोनिया ने 20 साल पहले 21 मई 1991 को अपने पति व तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद देर से ही सही कांग्रेस की कमान संभाली और सबके भारी विरोध के बाद भी एक बार फिर से कांग्रेस को स्थयित्व प्रदान किया.....औऱ साबित कर दिया कि महिला की ताकत क्या होती है।
...और यही काम पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने वामपंथी सरकार को परास्त करके दिखा दिया। जिसके बाद ममता ने पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने का गौरव हासिल किया वहीं वह देश में 14वीं महिला मुख्यमंत्री भी बनीं.....वहीं दूसरी तरफ जयललिता ने दूसरी बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।
.....सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलन के जरिए जनता में अपनी पैठ बना लेने वाली ममता बनर्जी की सादगी औऱ मेहनत का ही नतीजा था कि जनता ने वाममोर्चा को नकारते हुए ममता की तृणमूल कांग्रेस पर अपना भरोसा जताया...औऱ भारी बहुमत से विजयी बनाया...वहीं दूसरी बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने वाली जयललिता ने भी भ्रष्टाचार के समुद्र में गोते लगा रही द्रमुक सरकार के खिलाफ जनता का विश्वास जीतने में सफल रही।
...पश्चिम बंगाल औऱ तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के नतीजों के जरिए नारी ने भारत ही नहीं समूचे विश्व को अपनी शक्ति का एहसास करा दिया..जो काम इससे पहले दिल्ली में शीला दीक्षित औऱ उत्तर प्रदेश में मायावती कर चुकीं थी। पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु में जनता ने महिला नेतृत्व पर भरोसा दिखाकर राजनीति को अपनी बपौती समझने वाले राजनेताओं को करारा जवाब भी दिया है। एक बार फिर से सबसे बडे प्रदेश उत्तर प्रदेश में चुनावी बिसात बिछ चुकी है...औऱ नारी एक बार फिर से अपनी शक्ति दिखाने को बेताब है।

दीपक तिवारी